Tuesday, February 7, 2012

इस गुजरते हुए वक्त को देख......!!

इस गुजरते हुए वक्त को देख 
और अपने कीमती जीवन को जाया होते हुए देख !
कोई निम्नतम-सी कसौटी को ही तू चुन,
और इस कसौटी पर खुद को ईमानदारी से परख !
जिस तरह यह वक्त गुजर जाएगा 
उसी तरह पागल तू भी वापस नहीं आएगा....!!
पगले,अपनी असीम ताकत को पहचान 
इस तरह बेचारगी को अपने भीतर मत पैदा कर 
हालात किसी भी काल बहुत अनुकूल नहीं हुए कभी 
कभी किसी के लिए भी नहीं..
सभी अपनी-अपनी लड़ाईयां इसी तरह लड़ा करते रहे हैं ओ पगले
फर्क बस इतना कि कोई अपने लिए,कोई सबके लिए !
तूने अपने जीवन को यह कैसा बना रखा है ओ मूर्ख...?
जीता तो है तू खुद के लिए,और बातें करता है बड़ी-बड़ी !
इस तरह की निंदा-आलोचना से क्या होगा....
सबसे पहले तुझे खुद को ही बदलना होगा
सबको उपदेश देने से पहले तू खुद के बारे में सोच...
सड़क पार आकर आम जनता के लिए जी....
तब यह धरती तेरी यह आकाश तेरा ही होगा...
अगर इस राह में मर भी गया तू
तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर नाम तेरा ही होगा...!
मादरे-वतन की मिटटी से कभी गद्दारी मत कर-मत कर-मत कर
ज़िंदा अगर है तो आदमियत की मुखालिफत मत कर
सिर्फ कमा-खाकर अपने और अपने बच्चों के लिए जीना है फिर
अपनी खोल-भर में सिमटा रह ना,बड़ी-बड़ी बातें मत कर
तेरे वतन को तुझसे कभी कोई उम्मीद रत्ती भर भी नहीं रे मूर्ख !
तू अभी की अभी मर जा,नमक-हलाली की बातें मत कर...!!
(कोई इन शब्दों को खुद पर ना ले,इन शब्दों में जो गुजारिश है,वो सिर्फ खुद के लिए है,इतना पढ़-भर लेने के लिए धन्यवाद !!)

Monday, February 6, 2012

तिरंगा के नीचे खादी टोपी के सहारे देशभक्ति का ढोंग कब तक चलता रहेगा?

हम  हैं तो, समाज है। समाज है, राज्य है। राज्य है, तो देश है। देश है, तो संविधान और व्यवस्था है।  और हमी में से कुछ लोग हैं, जो व्यवस्था को चलाते हैं। हमीं में से  कुछ  लोग थे, जिसने आजादी के बाद भारतीय  संविधान  की रचना की। और अपने देश और भारतीय जनमानस की जरूरत और भावना के अनुरूप व्यवस्था चलाने की योजना बनाई, लेकिन इनकी योजनाओं में कहाँ खोट रह गयी कि आजादी की आधी सदी बीत जाने के बाद भी आम आदमी वहीं के वहीं खड़ा है। बल्कि यूँ कहा जाये कि सारी संवैधानिक जगहों पर दबंगों ने अपना कब्जा जमा लिया है। पंचायत हो या विधानसभा या फिर लोकसभा, सभी सभाओं में वैसे ही लोग पहुँच रहे हैं, जो संवैधानिक सामंतवादी व्यवस्था के पोषक हो गये हैं। और उनके साथी अंग्रेजों के मुलाजिम के तर्ज पर चल रहे हैं। जिनके कारण आम आमदी का जीवन अस्त-पस्त और त्रस्त है। इस व्यवस्था से। 
संविधान निर्माताओं ने  संविधान बनाते वक्त कहीं न कहीं जरूर कुछ ऐसी कोई त्रुटि  छोड़ रखी थी या उनके मन में जरूर कहीं न कहीं धूर्तता थी कि, जिसके बदौलत वे अंग्रेजों से भी ज्यादा क्रूरता के साथ राज्य कर सके। और वही हो भी रहा है। भौतिक रूप से जितने भी निर्माण हुए हैं, या हो रहे हैं, सभी में मजदूरों की अहम भूमिका रही है, लेकिन वो मजदूर कहाँ हैं, आज तक हमारा  संविधान  उन मजदूरों को इज्ज्त की जिन्दगी नहीं दी। जो किसान पूरे देश की भूख मिटाने का जिम्मा लिया हुआ है। वे भूखे मर रहे हैं। उन्हें सिर्फ आश्वासन दिया जाता है। भविष्य में जिन्दा रहने की ट्रेनिंग दी जाती है। इस  संविधान  ने हमें डरा कर रखा हुआ है। नाना प्रकार के मान मर्यादा के नाम पर। मानहानि का डर दिखा कर। आज अपने देश की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है। जब राष्ट्र की कोई अपनी भाषा ही नहीं होगी, तो हमारे अधिख्य 85 प्रतिशत आबादी जो पेट से ऊपर नहीं उठ पा रही हैं, देश की व्यवस्था में कैसे हिस्सा ले सकती हैं? उनके साथ कब तक झूठ बोला जाता रहेगा कि सरकार आम आदमी की है! आम आदमी की परिभाषा अब तो नये सिरे से तैय करने की जरूरत आ पड़ी है। जैसी व्यस्था चल रही है, इसमें सिर्फ डर ही डर है, बोलने की आजादी भी नहीं है। हमें आदालत के नाम पर डराया जा रहा है, तोसंविधान  के फंला अनुच्छेद के नाम पर डराया जा रहा है। नाना प्रकार के डर। जिसके कारण हमारे देश में लाखों की संख्या में केस-मुकदमों में फंसे बेगुनाह लोग मरते जा रहे हैं। केस की सुनवाई वर्षों तक लंबित रहने के कारण। कहाँ आम आदमी का भारत है? समाज के कुछ वर्गों के लिए तो योजनाओं का एक धेला भी नसीब नहीं होता!
हमारी इस व्यवस्था ने समाज को कई हिस्सों में बाँट कर रख दिया है। जिनके लिए योजना बनाई जाती हैं, उन तक उसका लाभ पहुँच नहीं पाता। क्यों? क्यों इतनी कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद 30 प्रतिशत ग्रामीण एवं शहरी आबादी नाले-नालियों के किनारे कचड़ों में जीवन गुजार रही है? कल्याणकारी व्यवस्था किसका कल्याण कर रही है? इन्हें वर्तमान में जीने का मौका क्यों नहीं दे रही है, ये व्यवस्था? इन सारे प्रश्नों का जवाब कब मिलेगा, कौन देगा? बगैर जवाब दिये तिरंगा के नीचे खादी टोपी लगाकर देशभक्ति का ढोंग कब तक चलता रहेगा? 
अरुण कुमार झा 
प्रधान संपादक 


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अरुण कुमार झा द्वारा दृष्टिपात के लिए 1/28/2012 06:40:00 AM को पोस्ट किया गया
 

राजघाट तो चले जाना मगर बिड़ला हाऊस मत जाना मेरे बेटे....!!

दिल्ली आये हो मेरे बेटे ?
तो मेरी समाधि तो देखने का मन तो होगा ही !
रिंग रोड पर एक शांत और सुरम्य जगह बनायी गयी है मेरी समाधि के लिए 
बहुत विशाल और बहुत हरितिमा वाली जगह है वो मेरे बेटे !
और हजारों लोग आया करते हैं वहाँ मेरी समाधि पर मत्था टेकने 
उस जगह का उससे पहले का कोई इतिहास नहीं है मेरे बेटे 
सिवाय इसके कि वो यमुना के किनारे फैली एक खाली भूमि थी
मैंने सोचा भी ना कभी कि इस जगह पर कभी मैं लिटाया जाउंगा..!
और अब जब रोज आते हुए हजारों लोगों को यहाँ देखता हूँ तो पाता हूँ कि
कोई सवाल ही नहीं उठता किसी के मन में कि मैं क्यूँ मारा गया
मुहसे जुडी किसी जगह पर मुझे लिटाया जाता तो शायद यह सवाल उठता भी !
मगर राजघाट ने मेरी ह्त्या को गौण कर मुझे शहीद मात्र बना दिया है !
और मेरे मरने के कारणों पर गोबर लेप दिया है मेरे बेटे !
जो,अगर तुम बिड़ला हाऊस गए,तो वो प्रश्न उठ सकते हैं तुम्हारे मन में !
मैं क्यूँ मारा गया,किस तरह मारा गया ??
समय के साथ ये सवाल अँधेरे में गुम हो गए हैं कहीं
उत्तर की अभिलाषा तो व्यर्थ ही है !
मगर मेरे बेटे बिड़ला हाऊस में मेरे निशाँ देखकर
तुम खुद को रोक नहीं पाओगे,और
हर किसी को निरुत्तर पाकर खुद भी व्यथित हो जाओगे !!
मगर अब यह जो वक्त चल रहा है मेरे बेटे,यह उतना ही फिजूल है,
जितनी फिजूल हो बन गयी है मेरी मौत मेरे वतन की आजादी के बाद !
अब यहाँ ,मेरा हत्यारा बताता है कि उसने मुझे क्यूँ मारा
और उसके तो प्रशंसा के कसीदे भी पढ़े जाने लगे हैं अब !
हर कोई उसके तर्कों से अभिभूत होने लगा है अब
कि मैंने अपने जीवन के अंत में कुछ खास लोगों के सोचे गए
विचारों के अनुसार ना चल कर बड़ी भयंकर गलती की !!
तीस सालों तक छोटे-छोटे पग चल कर जिस देश की आत्मा को मैंने जगाया
अपने नाजुक हथियारों के बल पर लोगों अपने बल पर खड़ा होना सिखाया !
अगर उस देश के कल के पैदा होने वाले ये कम-अक्ल बच्चे
मुझसे मेरे कामों का हिसाब मांगे कि मैंने ऐसा क्यूँ किया-वैसा क्यूँ किया !
तो मैं किस-किसको क्या जवाब दूं मेरे बच्चे
हर आदमी अपना इतिहास खुद लिखा करता है मेरे बच्चे
और हर आदमी से गलतियां भी बेशक हुआ ही करती हैं
मुझसे सदा यह गलतियां होती रहीं शायद कि
कि मैं सदा वतन को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश करता रहा !
जो एक-दुसरे के खून के प्यासी दो कौमों को कभी पसंद नहीं थी
मैं सदा अपने प्यारे वतन के हित के बारे में सोचता रहा
और सदा अपनी-अपनी कौम के हित के बारे में सोचते रहे और तो और
उनके नुमाइंदे अपनी-अपनी गद्दी के हित की बाबत सोचते रहे
अगर मेरा सोचना इतना गलत भी था गलती से भी अगर
तो बातचीत करते ना मुझसे....
अगर इतना ही हुनर था मेरे हत्यारे में तो वो खुद ही देश आजाद करा लेता...!!
मगर मेरी ह्त्या का का अर्थ तो यही हुआ ना
कि मुझसे बातचीत के उनके सारे तर्क भोथरे ही हुए होंगे !
मुझे मारा गया किसी और ही कारणवश मेरे बच्चे
और बिड़ला हाऊस में यही सवाल फिर से उठा सकती है
मुझपर चली हुई उस हत्यारे की आखिरी गोली
इसलिए मेरी तुमसे विनम्र राय है मेरे बेटे
कि राजघाट तो चले जाना मगर बिड़ला हाऊस मत जाना मेरे बेटे....!!



Sunday, February 5, 2012

आ...अब हम सब मिलकर अपने वतन की किस्मत को बदल दें...!!


अरे ओ लालची पागल इंसान !
देख उधर उत्तर-पूर्व में तेरा पडोसी हो रहा है महान
जिससे अपनी भूमि वापस लेने की खायी थी कसमें
अब उससे आँख मिलाना भी नहीं है तेरे बस में !
सिर्फ अपना घर और तिजोरी भरने में मशरूफ तू
क्या तुझमें गैरत नाम की कोई चीज़ बची भी है,
कि देश के एक अदने से आम इंसान से तू आँख मिला भी सके ??
अबे कितना खायेगा बे तू कितना खायेगा बे ?
अबे मर जाएगा...अबे मर जाएगा !!
अबे कभी इस तरह तो सोच कर देखा कर कि
जब खुद की निजी ताकत और शानो-शौकत से
मिलती है तुझको इतनी ज्यादा खुशी
तब समूचे देश की तरक्की और महानता से
हरेक देशवासी को मिलेगी कितनी अपार खुशी !!
अगर तू जरा सा भी अपने लालच को विराम दे सके अगर
तेरे वतन को बहुत राहत मिल जायेगी अरे ओ कमीने रहबर !!
इन्हें गाली नहीं,अपने आने वाले कल का आगाज समझ
कि मुझे मार भी देगा तू, तो ये गालियाँ गली-गली उठने वाली हैं
तू ये समझ ले कि अब बस तेरी शामत आने ही वाली है !!
अरे अंधे ,आँख खोल और देख कि
चारों तरफ चीन-चीन-चीन की आवाजें आ रही हैं !
और यहाँ भारत में तेरे कारनामों से
देश की इज्ज़त की अर्थी उठी जा रही है...!!
तुझे देश की अर्थी निकालने के लिए ही पैदा किया था
तेरे माँ-बाप ने...??
भारतमाता की आबरू लूटने के लिए ही आज़ाद करवाया था
इस वतन को तेरे बाप के बाप के बाप ने....??
तेरे बाप के बाप को मरे तो अभी ज्यादा वक्त भी नहीं बीता
अरे मेरे भाई ये तूने क्या कर दित्ता....क्या कर दित्ता....!!??
शाम को जो लौट कर घर वापस आ जाए, उसे भूला नहीं कहते है !
वक्त पर जो संभल जाए ,उसे बड़े माफ कर देते हैं !!
तू सच जान मेरे अनाम-अनजान भाई
तेरी-मेरी भारतमाता का दिल बहुत बड़ा है !
और तेरे सामने भी अभी रास्ता बहुत लंबा पड़ा है !!
अब भी जाग जाए अगर तू अगर ओ भले इंसान
भारत के भाग ही जाग जायेंगे, बन जाएगा फिर ये महान !!
बहुत दिनों तक अपने सपनों को ढो लिया रे ओ पागल
तेरे सामने हो रहा है तेरे ही वतन का मातम
आ...गले मिल...स्वार्थों को एक तरफ रख
आ... हम सब अपने सारे स्वार्थों को अब ताक पर धर दें....
आ...अब हम सब मिलकर अपने वतन की किस्मत को बदल दें...!!

Saturday, February 4, 2012

तकलीफ में जीना बहुत मुश्किल होता है, होता है ना ?


तकलीफ में जीना बहुत मुश्किल होता है,
होता है ना ?
और जब हम यह जानते हों कि
इस तकलीफ को हम शायद मिटा भी नहीं सकते
तब ??
अपने निजी जीवन की तकलीफों को तो
अक्सर मिटा ही लेते हैं हम
कभी आसानी से तो कभी कठिनाईयों से
मगर अपने आस-पास और दूर की तकलीफों का क्या करें
जिनके बारे में रोज पढते हैं और देखते हैं !
हमारे ही आसपास बहुत सारे लुटेरे रहते हैं
जो तरह-तरह से हमारे वतन को लूटते हैं
और बेरहम हैं वो इतने कि
खुद के पकडे जाने के भय से
किसी की ह्त्या भी कर देते हैं,या करवा देते हैं !!
हमारे आस-पास हमारे राज्य या देश का लूटा जाना
कोई कुछ पैसों-भर का खेल नहीं है दोस्तों
यह खेल है करोडों का,अरबों का,खरबों का
मगर यह खेल कुल इतना भर भी नहीं दोस्तों
यह प्रश्न का वतन की आबरू का
इसके माथे का शर्म से झुक जाने का
और उसके बावजूद भी हमारे सत्तानशीनों की बेहयाई का
और अपनी तमाम करतूतों के बावजूद के जा रही थेथरई का !!
ऐसा क्यूँ है दोस्तों कि हमारे वतन में जो भी,जहां भी
सत्ता में है,मद में चूर है
और मादरे-वतन की इज्ज़त का उसे कुछ होश ही नहीं है !!
ऐसा क्यूँ है दोस्तों कि यहाँ हर ताकतवर
कमजोरों पर जुल्म-ही-जुल्म ढाने को तत्पर है
और किसी भी मानवीयता का उसमें लेश मात्र भी नहीं है.....
इस तकलीफ के साथ जीना मुश्किल ही नहीं,असंभव है दोस्तों
और अपनी या हम सबकी इस तकलीफ का क्या करना है
आईये हम सब मिलकर सोचते हैं
और सोचकर कुछ कर गुजरते हैं क्योंकि
तकलीफ में जीना बहुत मुश्किल होता है,
होता है ना ?

Friday, February 3, 2012

अंधविश्वास से ऊपर उठें

यह तस्वीर सिर्फ आंखें खोलने के लिए है। नाग का पचास सिर नहीं होता, सिर्फ एक ही होता है। इसे फोटोशॉप में बनाया गया है।

Thursday, January 26, 2012

आज दिल बड़ा कुटुर-कुटुर कर रहा है !!


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

"आज बड़ा बेचैन है यार तू,क्या बात है ?"
"आज दिल बड़ा कुटुर-कुटुर कर रहा है यार !"
"कुटुर-कुटुर ?अबे ये क्या बला है ?"
"कुटुर-कुटुर माने वही,जो तुने अभी-अभी कहा,बेचैन !"
"तो सीधा-सीधा बोला कर ना,यूँ ऊट-पटांग क्या बकता रहता है ?"
"यार,कल से जो अपना गणतंत्र-दिवस पार हुआ ना,तब से ही मेरा दिल बड़ा ऐसा-वैसा-सा हो रहा था यार !"
"क्यों ?इस गणतंत्र-दिवस ने क्या बना-बिगाड़ दिया ?"
"अबे, इसीलिए तो बेचैन हूँ मैं कि ये गणतंत्र-दिवस जो बार-बार आता है और आकर चला जाता है,मगर उससे अपन जैसे लोगों का कुछ बनता क्यूँ नहीं !"
"अबे ऐसा क्या बिगड़ गया है तेरा ओ मोटे कद्दू कि बकवास किये जा रहा है तू ?"
"अबे,मैं मेरी नहीं,बल्कि अपन जैसे लोगों की बात कर रहा हूँ,जो गरीबी में जीते-जीते खटते-खटते मर-खप जाते हैं मगर जीवन का  यह संघर्ष कभी  ख़त्म  होने को ही नहीं आता !"
"अबे ये फिलासिफी झाड़ने लगा तू,आज कोई दर्शन-शास्त्र वगैरह पढ़ लिया क्या ?"
"अबे दर्शन वगैरह तो नहीं, मगर छूट्टी के कारण कई अखबार जरूर पढ़ लिए सवेरे-सवेरे "
"तो ऐसा क्या लिखा हुआ था अखबारों में कि अब तू मेरा भेजा खा रहा है ?"
"तो तू भी पढ़ कर देख ले ना खुद ही,तुझे भी पता चल जाएगा कि मैं बेचैन क्यूँ हूँ !"
"क्यों ?अखबार तो बहुत से लोगों ने पढ़ा है मगर कोई तेरी तरह बड़-बड़ तो नहीं कर रहा,तू पागल हो जाएगा तो क्या सब पागल हो जायेंगे?"
"अरे यार पहले इन अखबारों को तो देख,ये देख,ये देख,ये देख,क्या लिखा है इनमें बड़े-बड़े नामचीन लोगों ने,कि भारत का गणतंत्र अब व्यस्क हो रहा है,परिपक्वा  हो रहा है !"
"तो क्या गलत लिखा है या कहा है इन लोगों ने,अबे देख ना चारों तरफ कैसी लड़ाई-सी छिड़ी हुई है भ्रष्टाचार के खिलाफ,देखता नहीं आन्दोलन पर आन्दोलन हों रहें हैं !"
"अबे ये आन्दोलन हैं कि मेले हैं जैसे मिठाईयां बंट रही हैं रेवड़ियों की तरह ?"
"तू मजाक उड़ा रहा है इन सबका ?"
"मैं ना तो मजाक कर रहा हूँ,और ना मजाक उड़ा रहा हूँ किसी का,तू आँख खोल कर तो देख कि कैसे-कैसे लोगों की शिरकत है यहाँ,क्या इन आन्दोलनों के आयोजक यह जानते भी हैं कि कौन कहाँ का कैसा व्यक्ति उनके बीच आकर शामिल हो गएँ हैं और जिस पवित्र मशाल को वो पकड़ कर सरे-राह चल रहे हैं,वो मशाल को छूने लायक भी चरित्र नहीं उनका !"
"अबे वो कहावत सुनी नहीं तूने कि गेहूं के साथ घुन......!"
"हाँ-हाँ सुनी है ना सब मैंने भी ,मगर उस कहावत का यहाँ कोई लेना-देना नहीं है,यहाँ तो अंधे ही मशाल जलाने चले हैं,जिनका खुद का रास्ता ही गलत है,वो लोगों को रास्ता दिखाएँगे !?"
"अबे ज्यादा बकवास मत कर,वरना पब्लिक पीटेगी तूझे,एक तो पब्लिक सड़क पर आकर आन्दोलन कर रही है और तू है कि कुचरनी करने लगा!"
"अरे नहीं यार ऐसे आन्दोलनों का यही तो मजा है कि शरीफ तो शरीफ,चोर भी अपनी रोटी सेंक डालते हैं पराई आग में !"
"तो तू क्या विकल्प सुझाता है बे छिद्रान्वेषी ?जो हो रहा है उसे देख,समझ में आता है तो तू भी शरीक हो जा और नहीं समझ आता तो पडा रह अपने दड़बे में,बेमतलब की क्यूँ हांकता रहता है ?"
"हाँ,तू सही कहता है मगर मेरा मतलब यह नहीं कि हमें उसमें शरीक नहीं होना,मैं तो सिर्फ एक विसंगति की बात कर रहा हूँ,तूने ही आन्दोलन की बात की,वरना मैं तो कोई और ही बात कर रहा था !"
"हाँ तो बुद्धिजीवी साहब जी आप भी फरमाओ ना अपने विचार,हम आपके विचार-दर्शन के प्यासे हैं हूजूर !"
"अबे हर गणतन्त्र के दिन इसके कितने कसीदे पढ़े जाते हैं मगर हर गणतंत्र-दिवस के आते-आते इसके गणों को स्थिति खराब होती चली जाती है,सिर्फ तंत्र के चारणों की स्थिति ही सुधरती दिखती है,जो मलाई खा-खाकर मोटे हुए चले जाते हैं,मगर इनका पेट कभी भरता ही नहीं !"
"अबे पेट की आग और वासना की भूख कभी किसी की मिटती है क्या ?दो रुपल्ली से सौ,सौ से हजार,हजार से लाख,लाख से करोड़,करोड़ से अरब,अरब से खरब.....!!"
"अब बस भी कर...आदमी की इस फिलासिफी का अपन को भी पता है मगर इसी पता होने का बड़ा मलाल भी है कि आदमी साला इतना स्वार्थी,इतना लालची,इतना फरेबी-मक्कार क्यूँ होता है कि अपनी ही जात को बार-बार धोखा देकर बार-बार आदमियत को कलंकित तो करता ही है, आदमी नाम की जात पर संशय भी पैदा करता है,इससे वफादार तो साला कुत्ता होता है कुत्ता,जो अपने मालिक की लात भी खाता है तो भी उसीका वफादार बना रहता है,क्या यह आदमी जानवरों से भी कुछ नहीं सीख पाता !"
"अबे अब तू सचमुच पिटने का काम ही कर रहा है,आदमी की तुलना तू कुत्ते और अन्य जानवरों से कर ही नहीं रहा बल्कि आदमी को कुत्ते से भी गया-गुजरा बता रहा है!"
"तो इसमें गलत भी क्या कह रहा हूँ मैं,आदमी इस धरती का वह सबसे अजूबा जीव है जो हमेशा हर वक्त बड़ी-बड़ी बातें करता है,मगर उसपे खुद कभी  अमल नहीं करता !अगर आदमी अपनी कही गयी बातों पर पच्चीस प्रतिशत भी अमल कर ले तो दुनिया सचमुच बढ़िया बन सकती है !"
"सुन ना बे,इस वक्त तो मेरी दुनिया खुद खराब हुई जा रही है,पेट में बड़े-बड़े चूहे कूद रहे हैं,चल ना पहले इनको ख़त्म करने के लिए बिल्लियाँ पकड़ कर लाते हैं...!"
"हाँ यार !तेरी बात सुनकर मेरे पेट में भी कुछ वैसा-वैसा सा ही होने लगा है...चल-चल....!"
(और दोनों यार बातों की इस फिलासफी से निकल कर आटे-दाल की हकीकत में गम हो जाते हैं !!)   

Sunday, January 8, 2012

ब्लागर्स मीट में रहा विचार का तेज, गजलों की ताजगी


रांची.जन सरोकारों से जुडी ख़बरों और विमर्श के लिए ब्लॉग बेहतर विकल्प ज़रूर है लेकिन उसके खतरे भी हैं.अभिवयक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगे.राजधानी स्थित एटीआइ के व्याख्यान कक्ष में हुए ब्लोगेर्स मिलन में यह बातें निकल कर सामने आयीं.इसके अलावा गजलों और कविताओं की रिमझिम बारिश भी होती रही.कनाडा से आई ब्लागर व कवयित्री स्वप्न मञ्जूषा अदा के सम्मान में इसका आयोजन आह्वान नामक सांस्कृतिक संस्था ने किया था.रांची, बोकारो, धनबाद और खूंटी के ब्लागर्स  और वर्चुअल स्पेस में लिखने वाले रचनाकारों ने इसमें शिरकत की.

विषय परिवर्तन करते हुए ब्लागर व पत्रकार विष्णु राज गढ़िया ने कहा कि नेट पर निसंदेह ख़बरों और विचारों का एक बूम है . अच्छे लिखने वाले भी हैं तो कहीं स्तरहीन लेखन से भी सामना होता है.ज़रुरत उसे एक सही दिशा देने क़ी है.फ़िज़ूल की बहस में पड़े बिना वैकल्पिक मीडिया की तलाश जारी है.वहीँ ब्लागर व पत्रकार देवेन्द्र गौतम ने विष्णु का समर्थन करते हुए कहा क़ी वर्चुअल स्पेस कल की पत्रकारिता का वैकल्पिक माध्यम है.उन्होंने बिहार झारखण्ड में  ब्लागर्स के संगठन  पर बल दिया.ब्लागर व कवयित्री रश्मि शर्मा ने कहा क़ि सम्प्रेषण के लिए उन्होंने ब्लाग्स को चुना.बाद में लोग मिलते गए और कारवां बढ़ता गया.कवि-लेखक रणेंद्र का कहंता था क़ि ब्लाग्स महज़ स्वांत सुखाय लेखन नहीं है.वर्चल जगत  इन दिनों कई बदलावों का वाहक बना.हमें उसकी ताक़त का सही इस्तेमाल करना है.ब्लागर राजीव थेपडा ने अच्छे लेखन के साथ बेहतर इंसान बनने पर जोर दिया.रंगवार्ता के संपादक अश्विनी पंकज ने कहा क़ि वर्चुअल स्पेस का हमें वाजिब इस्तेमाल करना चाहिए.ब्लागेर्स को अपनी संस्कृति, प्रकृति और प्रवृति पर विचार करना चाहिए.सही जानकारी देने की कोशिश करनी चाहिए.सामाजिक परिवर्तन में ब्लाग्स अच्छी भूमिका निभा सकता है.ब्लागर व शायर क़सीम अख्तर ने शायराना लहजे में अपनी बात कही.वहीँ ब्लागर व ज्योतिषाचार्य संगीता पुरी ने ज्योतिष को विज्ञान बताया.उन्होंने कहा क़ि उनके ब्लॉग का मकसद इसी का प्रचार करना है.रात अभी बाकी है, चिराग सहर तक जलने दो, ब्लागर व कवयित्री रजनी नैय्यर मल्होत्रा की इस ग़ज़ल को खूब दाद मिली.सम्मलेन की ख़ास मेहमान स्वप्न मञ्जूषा अदा ने कहा क़ि उनकी यह पहली ब्लाग्स मीट है.लेकिन बहुत ही सफल है.उन्होंने अपने मधुर स्वर में अपना एक गीत भी सुनाया: दूर के ढोल सुहावन भैया, दिन-रात यही गीत गावत हैं/ फ़ौरन आकर हम तो भैया बहुत बहुत पछतावत हैं .कार्यक्रम का संचालन शहरोज़ कमर ने और धन्यवाद ज्ञापन नदीम अख्तर ने किया.इस अवसर पर अरुण कुमार झा, कामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव  निरंकुश, दिलीप तेतरवे, आरती, संजय कृष्ण और नवीन शर्मा आदि मौजूद थे.

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नदीम अख्तर
द पब्लिक एजेंडा
9835193065
9852909234