Saturday, October 25, 2008

ज़र्रे से आफताब तक

झारखंड के नेताओं पर लग रहे भ्रष्टाचार के ताबड़तोड़ आरोपों की हकीकत क्या अदालती हस्तक्षेप से सामने आ पायेगी?











नदीम
अख्तर

"लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो, जिसके मुंह में लगाम है।'
प्रख्यात कवि धूमिल की अंतिम कविता की ये अंतिम पंक्तियां हैं। जिस समय उन्होंने ये पंक्तियां लिखी होंगी, उस समय भले ही इनकी प्रासंगिकता कहीं और रही होगी लेकिन आज झारखंड में इसकी व्याख्या आम आदमी की सटीक तस्वीर सामने लाने वाली सिद्ध हो रही है। झारखंड के कुछ लोहारों (राजनेताओं) की वजह से घोड़ों (आम आदमी) के मुंह लहुलुहान हैं। पिछले महीने (सितंबर 2008) सत्ता और बिचौलियों की सांठगांठ के ऐसे-ऐसे उदाहरण सामने आये, जिनसे राज्य का एक बड़ा वर्ग स्तब्ध हुआ। मीडिया ने मसालेदार खबरें छापीं और राजनीतिक विरोधियों ने खूब छींटाकशी की। बात इतनी बढ़ी कि अदालत की दहलीज़ तक जा पहुंची। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल यह रह गया कि क्या भ्रष्टाचार के ये आरोप कभी सिद्ध भी हो पायेंगे।
अब इसे कालक्रम का खेल ही कहेंगे कि एक नवसृजित राज्य में लूट संस्कृति की शुरुआत के आठ साल के बाद कहानी का पटाक्षेप हुआ भी तो राज्य के बाहर। मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गत 17 सितंबर की सुबह दुबई जाते वक्त जमशेदपुर (झारखंड) निवासी संजय चौधरी नामक एक व्यक्ति को कस्टम विभाग के लोगों ने रोका। तलाशी के दौरान इस व्यक्ति के पास से भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिली। वह विदेशी मुद्रा दुबई ले जा रहा था, जिसे नेशनल बैंक ऑफ दुबई के खाते में जमा कराया जाता। स्थानीय मीडिया ने यह दावा किया कि जिस संजय चौधरी को मुंबई कस्टम ने पकड़ा, उसके संबंध पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से रहे हैं। यही वजह है कि कल तक एक मामूली सा व्यवसाय करनेवाला व्यक्ति आज एक अरबपति बन गया। इस दौरान कई दस्तावेज़ गुपचुप तरीके से मीडिया को उपलब्ध कराये गये, जिनमें झारखंड के खाली होते खज़ाने की असलियत छुपी है। हद तो तब हो गयी, जब पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने यह कह दिया कि वे किसी संजय चौधरी को नहीं जानते। दूसरी ओर दस्तावेज़ बताते हैं कि जिस संजय चौधरी को उन्होंने पहचानने से इंकार कर दिया, उसके पासपोर्ट की अनुशंसा खुद मधु कोड़ा ने की थी। बात यहीं खत्म नहीं हुई। किसी ज़माने में पार्टी लाइन के कारण मधु कोड़ा के शुभचिंतक रह चुके भाजपा विधायक सरयू राय ने यह खुलासा कर दिया कि संजय चौधरी और मधु कोड़ा एक साथ थाइलैंड गये थे। सरयू राय कहते हैं - "मधु कोड़ा को यह बताना चाहिए कि 2005 में विजयादशमी के दिन कोलकाता से थाई एयरवेज़ के जहाज़ से जब वे बैंकॉक गये थे, तो उनके साथ दो अन्य लोग कौन थे। क्या वे संजय चौधरी और बिनोद सिन्हा नहीं थे।' असल में आरोप यह है कि मधु कोड़ा ने अपने कार्यकाल के दौरान संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के माध्यम से अनैतिक तरीके से अकूत संपत्ति अर्जित की और सत्ता से नज़दीकी का इस्तेमाल करते हुए सारा धन विदेशों में निवेश किया। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि आखिर झारखंड के खज़ाने से कितने अरब रुपये बाहर जा चुके हैं।
वैसे इस मामले में जो दूसरा नाम सामने आया है वह है बिनोद सिन्हा का। उनके खाकपति से अरबपति बनने की अलग कहानी है। बेइंतहा ज़मीन-जायदाद, कई फ्लैट, महंगी गाड़ियों व फैक्ट्रियों के मालिक बिनोद सिन्हा झारखंड गठन से पहले एनएसयूआइ के चाईबासा नगर अध्यक्ष हुआ करते थे। उस समय लघु सिंचाई विभाग में ठेकेदारी करते थे, जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत 95,000 रुपये कर्ज लिये थे। इसके बाद चार वर्षों (2003-07) में बिनोद सिन्हा अकूत संपत्ति के मालिक हो गये। आखिर इतना सबकुछ कैसे हुआ? सीएम हाउस के कुछ नियमित आगंतुक कहते हैं - "मधु कोड़ा के कार्यकाल में कभी एक भी काम, चाहे वह निजी हो या सरकारी, बिना बिनोद सिन्हा या संजय चौधरी के नहीं हुआ। सीएम हाउस से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और अन्य सचिवालयों में मधु कोड़ा से ज़्यादा आदेश इन दोनों के द्वारा अफसरों को दिया जाता था, जिसका समय से पालन भी हो जाता था।'
झारखंड को कंगाल कर अपना घर भरने की प्रक्रिया के तहत कई नाम सामने आये हैं, जिन्हें लेकर अब मामला अदालत में पहुंचा है। रांची निवासी दुर्गा उरांव ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका (जनहित-4007/2008) दायर कर हरिनारायण राय, एनोस एक्का, कमलेश सिंह, चंद्रप्रकाश चौधरी, दुलाल भुइयां, भानु प्रताप शाही और बंधु तिर्की (सभी राज्य के कैबिनेट मंत्री) की संपत्ति की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। इसी मामले में एक हस्तक्षेप याचिका रांची निवासी अरुण कुमार ने दायर की है, जिसमें उक्त लोगों के साथ-साथ मधु कोड़ा, बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी को भी पार्टी बनाते हुए इन तीनों की संपत्तियों की भी जांच सीबीआइ से कराने की मांग की गयी है। हालांकि अदालत ने इस मामले में अभी कोई फैसला नहीं सुनाया है लेकिन अगर अदालत ने दुर्गा उरांव और अरुण कुमार की याचिकाओं के आधार पर जांच के आदेश दिये, तो परत-दर-परत कई राज़ और खुलते चले जायेंगे।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे मामलों की वैधानिक ज़मीन कितनी मज़बूत होती है। झारखंड हाइकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता और याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं ऋतु कुमार कहती हैं - "लगभग इसी प्रकार का एक मामला पिछले साल (2007 में, वोल 4, एसएससी 380) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था(विश्र्वनाथ चौधरी बनाम केंद्र सरकार एवं अन्य)। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में सीबीआइ को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जांच का आदेश दिया था। अब हमें इंतज़ार है 21 तारीख का, जब उच्च न्यायालय का फैसला आता है।'
वैसे इस मामले में मधु कोड़ा और उनके सहयोगियों को भले ही प्रतिवादी बनाकर न्याय के कटघरे में खड़ा करने की गुहार लग रही हो लेकिन एक हकीकत यह भी है कि झारखंड गठन के बाद से लगभग सभी सरकारों में ऐसे लोग पर्दे के पीछे से खेलते रहे हैं जिनकी गिनती आज के संजय चौधरियों और बिनोद सिन्हाओं में हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। राज्य में जब पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे, तो भाजपा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभानेवाले एनोस एक्का (झारखंड पार्टी के इकलौते विधायक) के सहयोगी/मित्र तिलेश्र्वर साहू को एक बोर्ड में राज्य मंत्री का दर्जा बतौर ईनाम मिला था। उसके बाद उनके एक से एक कारनामों ने उन्हें इतनी ख्याति दिलायी कि अंततः मंत्री एनोस एक्का को ही उनसे किनारा कसना पड़ा। विभिन्न सरकारों को जोबा माझी (यूजीडीपी विधायक) के समर्थन की सौदेबाजी करनेवाले नजम अंसारी को सात साल से आवास बोर्ड की कुर्सी मिली हुई है। उन्होंने शहर के बीचों-बीच बेशकीमती ज़मीन बिल्डरों से बेच दी, तो विधानसभा से लेकर हाइकोर्ट तक के हस्तक्षेप ने पूरी पोल-पट्टी खोल कर रख दी। अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में अमरजीत सिंह उर्फ काले सरदार का बोलबाला था। इसके अलावा मुंडा को कंप्यूटर की शिक्षा देनेवाले तापस मल्लिक ने तो बाकायदा सीएम हाउस से उद्योग स्थापना के लिए सिंगल विंडो सिस्टम खोल रखा था। उस समय यह कहा जाता था कि अगर झारखंड में कुछ करना है, तो पहले तापस जी से हामी भरवा लें। यही हाल बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में भी था। उनकी करीबी महिला मित्र मंजू राय की सरकार में इस कदर पकड़ थी कि सुबह-सुबह कई लाल-पीली बत्तियों वाली गाड़ियों के मालिक मनचाही पोस्टिंग के लिए उनके यहां भीड़ लगाये रहते थे। मरांडी के ही एक और करीबी हुआ करते थे अशोक अग्रवाल जो दिल्ली से झारखंड की नीतियों को तय करने के माहिर माने जाते थे। मधु कोड़ा के कार्यकाल के ही एक और बैक-स्टेज परफॉर्मर थे अरुण श्रीवास्तव। वे थे तो कोड़ा के आप्त सचिव लेकिन उन्होंने क्रशर व्यवसाय में इस कदर पैठ बनायी कि आज झारखंड में इनका नाम गिने-चुने उद्यमियों में लिया जाता है।
इन नामों और कारनामों के बीच बड़ा सवाल यह रह जाता है कि क्या अगर किसी पर अपराध सिद्ध भी हो जाये और उन्हें सजा भी मिल जाये, तो झारखंड और यहां के आम नागरिकों को जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई कैसे होगी। इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन उससे पहले लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी हाइकोर्ट की ओर, जहां कम से कम यह तय हो जाना है कि आखिर ज़र्रे से आफताब तक के सफर में मुसाफिरों की कमीज़ गंदी हुई है या नहीं।
( पब्लिक एजेंडा से साभार)

3 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

अच्छा विषय है...

bhoothnath said...

अब कहूँ तो क्या कहूँ कि हमारा नवोदित राज्य अपने जन्म की शुरुआत से ही ऐसे ग़लत और स्वार्थी हाथों में जा फंसा है..और इससे उबार ही नहीं पा रहा...एक सेनानी थे,जिनके हाथों में आज यहाँ का राज है... मगर उनके भी रवैये से ऐसी कोई उम्मीद नहीं बांधती !!

seema gupta said...

दीप मल्लिका दीपावली - आपके परिवारजनों, मित्रों, स्नेहीजनों व शुभ चिंतकों के लिये सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ दीपावली एवं नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं