Tuesday, December 16, 2008

जूते के पीछे क्या है


नदीम अख्तर
परसों रात बारह-साढ़े बारह बजे के आसपास मैं अपनी पुरानी आदत (टीवी देखना) के आगोश में था। बीबीसी देखता हूं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय खबर और विश्लेषण देखना-जानना पसंद है मुझे। खैर, नींद आ भी रही थी और आंखें खुली भी थीं कि अचानक बीबीसी में नीचे पट्टी में एक खबर पढ़कर अचरज स‌े भर गया। खबर थी - man throws two shoes on bush during a visit of iraq. मेरी तो नींद ही गोल हो गयी। मैं इतना रोमांचित था कि हिंदी चैनलों को पलट कर देखने लगा कि शायद कोई वीडियो हो, जो इस दिलचस्प वाकये को दिखाए। काफी इंतज़ार के बाद भी न तो बीबीसी और ना ही अपने नौटंकीबाज तथाकथित स‌माचार चैनलों ने कोई वीडियो दिखाया। फिर अपने आप को काफी स‌मझाकर मैंने स‌ुला दिया। स‌ुबह उठा, तो टीवी खोलकर स‌बसे पहले आजतक लगा दिया मैंने। जितने न्यूज़ चैनल हैं, लगभग स‌भी में (दूरदर्शन को छोड़ कर) चमचमाता जूता बुश के मुखमंड को करीब स‌े गुजरता देखा जा स‌कता था। एक के बाद एक लगातार जूते चल रहे थे, रीटेक और रिप्ले, कहीं स्लो मोशन में तो कहीं फास्ट स्पीड में। खैर, मैं भी मजा लेने के बाद ज़रा गौर करने लगा कि आखिर इस घटना को भारतीय परिप्रेक्ष्य में कैसे देखा जाना चाहिए। फिर मैं स‌ोचने लगा कि आखिर बुश तो अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, फिर उन्हें मैं अपने देश के नज़रिये स‌े क्यों देखूं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। मंथन के क्रम में एक बात स्पष्ट स‌मझ में आयी कि दुनिया भर के लोगों में बुश के प्रति रोष है, जिसके परिणामस्वरूप एक पढ़े-लिखे और स‌भ्य स‌माज में अपना एक विशिष्ट स्थान रखनेवाले पेशे स‌े ताल्लुक रखनेवाले व्यक्ति के लिए किसी गणतंत्र के निर्वाचित राष्ट्रपति पर जूते चलाने जैसा बेतुका और अभद्र काम भी असभ्य ना रहा। दरअसल, इन जूतों के परिचालन की पृष्ठभूमि में भी बुश हैं, नायक भी बुश हैं और खलनायक भी बुश हैं। बुश यानी रक्तपात का प्रवर्तक, बुश यानी स‌त्ता की प्राप्ति के लिए तेल के भंडारों पर अवैध कब्जे का पैरोकार और बुश यानी मानवता का स‌बसे अभद्र चेहरा। बुश के पिता जॉर्ज बुश स‌ीनियर ने अपने राष्ट्रपतीत्व काल में जो खेल शुरू किया था, उसके वैश्विक स्तर पर प्रायोजक बने डब्ल्यू बुश। इनके पिता की नज़र भी इराक पर थी, पुत्र ने भी इराक को ही चरागाह का आधार धरा घोषित किया। इराक में जो कार्रवाई बुश के पिता स‌ीनियर बुश ने की, उसका खामियाज़ा था आतंकवाद (जिसे आज इस्लामी आतंकवाद कहा जाता है) का उदय। वैसे सीनियर बुश के कार्यकाल में जो ज़्यादतियां इराक और फिलिस्तीन में हुईं, उसे आगे बढ़ाया जॉर्ज बुश (जिन पर जूते चले) ने। जॉर्ज बुश ने यह प्रचार किया था कि इराक के पास स‌ामूहिक विनाश के हथियार हैं, स‌द्दाम हुसैन उन हथियारों स‌े पूरे मध्य-पूर्व को तबाह कर स‌कता है। फिर स‌द्दाम को अल कायदा का स‌हयोगी करार दिया। स‌द्दाम हुसैन को मानवता का विरोधी करार देकर इराक पर बेवजह हमला किया गया। इराक को नेस्तनाबूद तो किया ही गया, स‌ाथ ही स‌ाथ स‌द्दाम हुसैन को अपमानित करके कुत्तों की तरह पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। एक प्रजातांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति का ऎसा हाल, शायद पहले कभी नहीं हुआ होगा। फिर झूठे और फर्जी मुकदमे के बाद स‌द्दाम हुसैन को ठीक ईद-उज़-जोहा के दिन ही फांसी पर लटका दिया गया। मतलब, बुश ने अपने स‌ामने खड़े हो स‌कनेवाले स‌भी रीढ़ वालों को या तो रीढ़विहीन होने पर मजबूर किया, या फिर उसका कत्ल कर दिया।
बात यहीं खत्म नहीं होती। मैं बीबीसी हिंदी डॉट कॉम खंगाल रहा था, तो एक खबर पर नज़र पड़ी। खबर यह थी कि आज भी इराक़ में नागरिक सुविधाएं जर्जर स्थिति में हैं। खबर में रेडक्रॉस का हवाला देते हुए कहा गया था कि इराक पर अमरीकी नेतृत्व में हुए हमले के पाँच साल बाद भी लाखों इराक़ियों को शुद्ध पानी, साफ़ शौच व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं नसीब नहीं हैं। वहां मानवीय हालात बेहद ख़राब हैं। कुछ क्षेत्रों में बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद लाखों लोग ऐसे भी हैं जो रोज़ी रोटी को लेकर परेशान हैं। कुछ परिवार अपनी कमाई का तिहाई हिस्सा यानी क़रीब 150 डॉलर तो शुद्ध पानी ख़रीदने में ख़र्च कर देते हैं। इराक़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अब तक के हालात से भी बदतर हैं और जो सेवाएं उपलब्ध हैं वो इतनी महंगी हैं, जिन्हें ज़्यादातर आम नागरिक वहन नहीं कर सकते। इराक़ी अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ़ और ज़रूरी दवाओं की कमी है और जो सुविधाएं हैं भी, उनका रखरखाव ठीक प्रकार से नहीं किया जाता। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में सिर्फ़ 30 हज़ार बिस्तर हैं जो 80 हज़ार की ज़रूरत के आधे से भी कम हैं। इस बदहाली की वजह है युद्ध। यह बुश की नीति ही थी, जिसने तेल के अकूत भंडार स‌े स‌ंपन्न इस राष्ट्र को फकीरों का ठिकाना बनाकर छोड़ दिया। लाखों जानें गयीं, उसकी तो आप गिनती ही मत कीजिये, क्योंकि एक-एक मासूम मौत के लिए अगर जॉर्ज बुश को फांसी की स‌ज़ा दी जाये, तो यकीन मानिये बुश के हर दिन फांसी के तख्ते पर चढ़ते-चढ़ते खत्म हो जायेंगे लेकिन फांसी की स‌जा खत्म नहीं होगी।
रेडक्रॉस का कहना है कि हज़ारों इराक़ी जंग की शुरूआत के समय से गायब हैं। जंग के दौरान मारे गए लोगों में बहुत से लोगों की पहचान तो अब तक नहीं हुई है क्योंकि इराक़ की सरकारी संस्थाओं तक बहुत कम शव पहुँचे। हजारों इराक़ी जिनमें अधिकांश पुरुष हैं, क़ैद में हैं। इनमें 20 हज़ार लोग बसरा के नज़दीक बक्का के शिविर में हैं, जिसे अमरीका के नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय सेना चला रही है। इराक़ रेडक्रास का दुनिया भर में सबसे बड़ा अभियान है, जिसमें 600 लोग काम करते हैं और जिसका वार्षिक बजट 1060 लाख डॉलर है।
रिपोर्ट पढ़ने के बाद मैं एक आम धारणा पर पहुंचा कि इतना स‌ब कुछ जिस आदमी के कारण हुआ, क्या वह इसके बाद भी इज्ज़त का हकदार है। मैं मानता हूं कि अगर किसी भुक्तभोगी के नज़रिये स‌े देखा जाये, तो बुश के स‌ाथ जो हुआ और जो होगा, वो कम हो रहा है या होगा। लेकिन एक राष्ट्रपति पर एक पत्रकार के द्वारा जूते चलाना कहीं स‌े भी जायज़ नहीं है। यह कृत्य पत्रकारिता को आदर्श पेशा मानने वाले लोगों के लिए गहरे घाव के स‌मान है। इस तरह की कार्रवाई की स‌भ्य स‌माज में कोई जगह नहीं है। वैसे जिस पत्रकार ने यह करतूत की, उसके बचाव में लोग स‌ामने आने लगे हैं और इराक में तो बाकायदा उसकी रिहाई के लिए प्रदर्शन भी हो रहे हैं। वक्त बतायेगा कि इस पत्रकार का क्या होगा लेकिन जो भी हो, बुश को खराब कह कर किसी कीमत पर पत्रकार के कृत्य को जायज़ नहीं ठहराया जा स‌कता।

9 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

जूता जूता न रहा
जुट गया नाम कमाने
चल दिये देखो जांच बैठाने
प्रश्‍न जिनके जवाब चाहिये
न हों जवाब तो पूछ सकते हैं
आप भी कुछ सवाल
इन सवालों में सलाहें भी हैं
इन्‍हें अन्‍यथा न लें
यह तो सबका जन्‍मसिद्ध अधिकार है -


1. जूता पत्रकार के पैर का था
2. यदि नहीं, तो किसका था
3. जिसका जूता था, वो सौभाग्‍यशाली रहा या ...
4. जूता किस कंपनी का था
5. जूता कब खरीदा गया
6. जूते का जोड़ीदार कहां है
7. बिना बिल के खरीदा गया
8. बिल कहां है
9. बिल किस दुकान का था
10. जूते ने अपनी बिरादरी का नाम इतिहास में अमर कर दिया
11. जूते ने प्रेरक का काम किया
12. मुहावरों की दुनिया में नये मुहावरे और लोकोक्तियां रची जायेंगी जूताशाली, जूताजुगाड़ वगैरह
13. नये फिल्‍मी गाने और पैरोडियां लिखी जायेंगी - बुश को जूता क्‍यों मारा ...
, जूता है जूता .....,
14. किस्‍मत कनैक्‍शन किसका - बुश का या जूते का ...
15. जूते का एक एक्‍सक्‍लूसिव इंटरव्‍यू लिया जाये ...
16. एक आखिरी - किसी ने यह क्‍यों नहीं कहा कि बुश को बूट क्‍यों मारा - बूट को जूता ही क्‍यों कहा गया जबकि बुश की तुक बूट से मिलती है।

SACHIN JAIN said...

Naddeem ji, aapki baat ka tark ek had tak sahi hai ki, ek profession hai patrkarita aur usska apmaan hai ye,

par mere hisaab se sabse pahle desh aur samaaz aata hai , na hi koi prfesson na koi dharm.............

Jab aadmi ke saath ye sab hua ho, haq banta hai usskaa kuch bhi karne ka.......I agree with his sentiments, might be their Prime Minister do not............Jo uss desh ke netaon ko karna chahie tha wo ussne kia..........

SACHIN

डॉ .अनुराग said...

मै तो इसे एक साहसिक कदम मानता हूँ ओर उस देश के एक आम आदमी का प्रतिरोध का हिस्सा मानता हूँ ......क्या आप भूल गये राजीव गाँधी के कंधे पर बात मारा था श्रीलंका में एक सैनिक ने....सबका अपना अपना नजरिया है.....अमेरिका ने इराक पर हमला तेल को कब्जाने के लिए किया है.....

रंजना said...

नदीम जी, इस सार्थक आलेख के लिए आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ.बहुत सही लिखा है आपने.......पूर्णतः सहमत हूँ.

लेकिन जहाँ तक पत्रकारिता का सवाल है....पत्रकार भी तो सबसे पहले मनुष्य है न...जिसका अपना आत्मसम्मान है,जो किसी देश का नागरिक है और वह देशभक्त भी हो सकता है.....
हमही कहते हैं न कि दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय अमुक पत्रकार सहायता को आगे न बढ़ फोटो खींचने में व्यस्त था....
सबसे पहले मनुष्य का धर्म मानवीयता है जिसके अंतर्गत उसका अपने ,अपने परिवार,देश और समाज के प्रति कर्तब्य बनता है और प्रोफेसन/काम काज भी इसी का एक हिस्सा है.

रवीन्द्र प्रभात said...

बहुत सही लिखा है आपने.......पूर्णतः सहमत हूँ.

bhoothnath said...

बस एक ही बात कहूँगा भाई....कि देश से बहुतारह प्यार करने वाले इन्सानों के पास जब कोई चारा नहीं बचता तब वे ऐसे कृत्य करने को विवश हो जाते हैं... हजारों ऐसी घटनाएं हैं जहाँ एक अपराधी को दंड नहीं मिला.....अंत में जनता ने हिंसा द्वारा...रक्तपात द्वारा बात का उपसंहार किया.......इसे ग़लत नहीं ठराया जा सकता.......सच तो यह है कि तमाम पढ़े-लिखे लोग तो अपना भविष्य...अपनी नौकरी....मानवाधिकार...और ना जाने कितने ही अनजान कारणों से जरुरी कदम नहीं उठाते....मामला सर से बहुत ऊपर जा पहुंचता है...और तमाम विद्वान-विज्ञ जन चीख-पुकार मचाते रह जाते हैं....अंत में जनता अपना फैसला देती है....तब हम फिर चीखने लग जाएँ...कि हाय-हाय ये तो ग़लत हुआ..... ये तो ग़लत हुआ..... अरे भई जब मब कुछ कबाड़ नहीं पाते तो जो कुछ लोग कुछ कबाड़ने की चेष्टा करते हैं...तो उन्हें करने ही दें ना...ये दरअसल उत्तेजना भर नहीं है....आप देखियेगा भारत में आगे इससे भी बुरा होने जा रहा है....मेरे देखे तो भारत की सड़कों पर तरह-तरह के राजनीतिक अपराधी ,जो तमाम सबूतों के मद्देनज़र और जनता तथा मीडिया की नज़र में पुख्ता तौर पर अपराधी हैं,दौड़ा- दौड़ा कर मारे जाने वाले हैं...और सम्भव है कि उनका नेतृत्व मेरे या आपके बीच ही के कुछ लोग कर रहे हों...या ख़ुद हम ही हों....!!!!
असल में भाई सब्र की भी एक इन्तहां होती है....भारत के सन्दर्भ में वो इन्तेहाँ अब ख़त्म होने को आई है....या ख़त्म हो ही चुकी है...अपराधी मन- चले व्यभिचारी सांडों की तरह छुट्टे घूम रहें हैं....और भारत के हर महकमे में...सड़क पर....घर में...हर जगह पर भारत माता का बलात्कार करते...उसकी आत्मा को कचोटते....उसका चीरहरण...उसका मान-मर्दन करते...और उसकी मासूम संतानों पर घनघोर अत्याचार करते राक्षसों की भाति अट्टहास करते....फुफकार करते... अपने अंहकार-शक्ति-धन आदि का फूहड़ प्रदर्शन करते.....विद्रूप रचते.....गोया कि सत्ता के अंधे मद में अपने लिंग का प्रदशन करते घूम रहे हैं...इस सत्ता को कौन जवाब देगा....जनता ही ना.....झारखंड के सन्दर्भ में तो यह तथ्य और भी बेबाक और अश्लीलता की हद से भी गया-बीता या नंगा है....तो इसका इलाज आख़िर क्या है...!!सच जानिए भाई....जनता इन सबको सरेआम पूरी तरह नंगा करके इतना मारेगी-इतना मारेगी कि इनकी सात पुश्त तक की संताने भी प्रदर्शन नाम की चीज़ क्या होती है....यह तक भूल जायेगी....हम और आप जैसे लोग सभ्यता के नाम पर चीखते ही रह जायेंगे कि हाय..हाय ये तो ग़लत है...ये तो ग़लत है....!!
अंत में सच तो यही है....परिवर्तन के बारे में हम जैसे लोग सिर्फ़ सोचते हैं....परिवर्तन तो अंततः जनता ही करती है.....करती है ना.....!!!

dharmendra said...

sir bush ko juta marne ki ghatna wonderful nahi hai kyonki aisa to hona hi tha. punjiwad ke is rakash ne kitne masum bachho ki maa cheen liyg , kitni suhagino ko bidhava kar diya. dil ki baat kahu sir is shaitan ko koi masum baccha chaapal marto to iska jawab nahi tha. sir aapke lekh din par din kaphi marak hote ja rahe hain.

sandhyagupta said...
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sandhyagupta said...

Mere vichar me apki baat se asahmat nahin hua ja sakta.Bush ki nitiyan jitni bhi galat hon virodh jatane ka yah tarika uchit nahin tha.