Wednesday, April 29, 2009

होशियार, खबरदार फिर आया मौत का नया बाजार

रजत गुप्ता
स‌भी को याद दिलाता है कि पिछले कुछ वर्षों स‌े भारत स‌हित पूरी दुनिया में बर्ड फ्लू का आतंक था। यद्यपि भारत में इसका प्रभाव नगण्य रहा पर पता नहीं कितने करोड़ मुर्गी इस चक्कर में खत्म हो गये। अलबत्ता विशेषज्ञों द्वारा तेज आंच में पकाने की जानकारी के बाद फ्लू की खबर का असर अपने-आप ही खत्म हो गया। चूंकि मुर्गियों वाली बीमारी स‌े दवा का बाजार अब नहीं चमकने वाला इसलिए अब स‌ुअरों की बारी है। पशुप्रेमी इस नाम पर आपत्ति जता चुके हैं कि इस नई बीमारी को स‌्वाइन फ्लू (स‌ुअर फ्लू) न कहा जाए। पर मैक्सिको में डेढ़ स‌ौ स‌े अधिक लोगों की मौत की भी खबर है। अलबत्ता हम आप वहां जाकर तो यह नहीं देख स‌कते कि क्या वाकई वे इसी बीमारी स‌े मरें हैं और कोई और कारण भी रहा है। खबर क्या फैली पूरी दुनिया में बड़ी-बड़ी स‌ूचनाएं प्रसारित हो गयीं। विशेषज्ञों ने अपनी-अपनी टिप्पणी भी दे डाली कि खतरा बहुत ज्यादा है। विश्व स‌्वास्थ्य स‌ंगठन ने चेतावनी स‌ंख्या 4 जारी किया है। और दो कदम आगे बढ़े तो यह महामारी होगी। इसी बीच नये स‌िरे स‌े दवा का कारोबार फैलने लगा है। पिछली बार ही तामि फ्लू नामक दवा ने अकेले भारत में कई स‌ौ करोड़ का कारोबार किया था। तब भी मुझे हैरत इस बात की थी कि बीमारी कहीं और होती है और वहां जांच किये बिना ही वैज्ञानिक यह कैसे जान लेते हैं कि इस‌में किस कंपनी की कौन स‌ी दवा कारगर होगी। इसलिए पूर्व की तमाम स‌ूचनाओं और घटनाक्रमों स‌े स‌बक लेते हुए तैयार हो जाइये, दुनिया के स‌बसे बड़े महाजन को दवा के मद में अतिरिक्त भुगतान करने के लिए क्योंकि इस बार भी जान खतरे में है। चूंकि हम-आप स‌भी मुर्गे की टांग तोड़ने स‌े नहीं कतरा रहे हैं, इसलिए अब स‌ुअर के नाम पर नया आतंक आ रहा है। जेब खाली करने के लिए तैयार हो जाइये क्योंकि इसका माहौल बनने लगा है। मुर्गा नहीं तो स‌ुअर आखिर किसी न किसी बहाने हमें महाजन को ब्याज चुकाना ही पड़ेगा।

Tuesday, April 28, 2009

मेरा गुनाह तो बता देते...

लोकतंत्र में हर तरह की खूबियां हैं और सौभाग्य से भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह विदेशियों के बीच पांच सितारा होटलों में आयोजित होनेवाले सम्मेलनों-सेमिनारों में कहने-सुनने के लिए तो ठीक है, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत जानने के लिए आपको भारत की ऊर्वर अवैध दंड संहिता को जानना-समझना होगा। इसके लिए झारखंड को आप एक सैंपल टेस्ट के रूप में रख सकते हैं। वैसे तो कई राज्य ऐसे हैं, जहां कानूनन गैरकानूनी हत्याएं हो रही हैं, लेकिन झारखंड का परिप्रेक्ष्य इसलिए, क्योंकि यहां जिस व्यापक स्तर पर तंत्र का गण पर शिकंजा कस रहा है, उसकी नज़ीर कम ही मिलेगी। झारखंड का लातेहार ज़िला अभी सुर्खियों में है। पता है क्यों, क्योंकि यहां इसी महीने की 15 तारीख़ को जो कुछ हुआ, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ग्रामीण होना और वो भी ग़रीब होना सीआरपीएफ के हाथों जान गंवाने की सटीक पात्रता है।

15 तारीख को नक्सलियों ने लातेहार जिले के बरवाडीह में एक बारूदी सुरंग विस्फोट कर सीआरपीएफ के दो जवानों को मार डाला था, इस घटना में 12 पुलिसवाले घायल भी हुए थे। इस घटना के बाद सीआरपीएफ के जवानों ने बौखलाहट में आकर पांच निर्दोष ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया। घर के आंगन (बढ़निया गांव के चौपाल) से खींचकर जवानों ने पांच गांववालों को गोली मारी और कह दिया कि ये सारे नक्सली थे। ऐसी अंधेरगर्दी तालीबानी शासन में भी नहीं होते सुनी गयी। मारे गये ग्रामीणों के नाम हैं-पिताई मुंडा, सुपे बोदरा, मसीह बोदरा, संजय बोदरा और सुपाई बोदरा। इन सभी के पास से कोई हथियार नहीं मिला। पुलिस-सीआरपीएफ बता रही थी कि इन लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया गया है। क्या ये लोग बिना किसी हथियार के पुलिसवालों से लड़ रहे थे। पांचों ग्रामीणों की लाश लुंगी और गंजी में मिली, क्या कोई नक्सली लुंगी-गंजी पहनकर किसी नक्सल ऑपरेशन को अंजाम देता है। सभी दो परिवार के सदस्य थे। सुपाई बोदरा की उम्र 51 साल थी और वह रांची के सीएमपीडीआइ का कर्मचारी था। यह बात गले से नहीं उतरती कि आखिर एक पब्लिक सेक्टर का कर्मचारी, जिसे छठे वेतन आयोग की सिफारिश वाला वेतन मिलेगा, वह भला नक्सली क्यों बनेगा। और, 16 साल का मसीह बोदरा तो हॉकी खिलाड़ी था, जो बरवाडीह मिडिल स्कूल में आठवीं क्लास में 'भारत का मतलब' समझ-सीख रहा था। बढ़निया गांव के लोग कहते हैं कि जब वह हॉकी स्टिक लेकर गोलपोस्ट की ओर आगे बढ़ता था, तो गेंद उसकी स्टिक से चिपकी रहती थी। वह तो किसी टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए बाहर जाने की तैयारी कर रहा था। हो सकता था कि वह देश के लिए हॉकी खेलता, लेकिन अफसोस...।

इस बेशर्म हत्या पर पुलिस का इतना फूहड़ बयान आया कि सुनने वालों को भी लगा कि नक्सलियों को कोसना पाप है। लातेहार के एसपी हेमंत टोप्पो ने कहा था कि मारे गये लोग ग्रामीण नहीं हो सकते, क्योंकि जिस स्थान पर उनका पुलिसवालों के साथ कथित मुठभेड़ हुआ, वह स्थान निर्जन है। वहां ग्रामीण नहीं जा सकते। इसलिए इस घटना को नक्सलियों ने ही अंजाम दिया है और सभी नक्सली ग्रामीणों के वेश में थे। इनकी थोथी दलील का करारा जवाब बढ़निया के लोगों के पास है, जो उन्होंने मानवाधिकार राइट नेटवर्क के सदस्यों को बताया है। चश्मदीद गवाहों ने साफ-साफ बताया है कि बारूदी सुरंग विस्फोट के बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और पिताई मुंडा, सुपे बोदरा, मसीह बोदरा, संजय बोदरा और सुपाई बोदरा को बंदूक के कुंदों से कुत्तों की तरह पीटती हुई ले गयी। पोस्टमार्टम के दौरान पता चला कि सभी के सिर फटे हुए हैं, मतलब साफ है-बंदूक कनपट्टी पर सटा कर गोली मार दी गयी। कई मांग-गोद एक साथ उजड़ गये। अभी चूंकि राज्य में कोई सरकार नहीं, राष्ट्रपति शासन है और चुनाव का भी दौर है इसलिए न तो नेताओं की फौज और न ही राज्यपाल ने इस गांव की ओर रुख़ करने की ज़हमत उठायी। हां, रांची में किसी व्यवसायी या बिल्डर की मौत हो जाये, तो देखिये तमाशा। कौन सा ऐसा नेता नहीं होता, जो आंदोलन को सड़क पर नहीं उतरता, लेकिन बढ़निया में मारे गये लोगों की स्थिति पुलिस के श्रीमुख के अनुसार संदिग्ध थी, इसलिए किसी को चिंता नहीं इस बात की कि आखिर बौखलाहट में हत्याएं जायज़ कैसे हो गयीं।

इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकानेवाला पहलू यह है कि खुद पुलिस के एक आइजी (रांची जोन) रेजी डुंगडुंग ने यह स्वीकार कर लिया कि मारे गये लोग ग्रामीण थे, न कि नक्सली। पुलिस अब मान रही है कि मरनेवालों में तीन छात्र थे, एक किसान और एक सीएमपीडीआइ का कर्मी। लेकिन, इसके बावजूद अब भी हठधर्मी हो रही है, कहा जा रहा है कि सभी पुलिस की गोली से नहीं मरे, बल्कि एक ग्रामीण की मौत गोली लगने से हुई है और चार विस्फोट में मारे गये, जबकि प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिसवालों को इन पांचों को विस्फोट के बाद गांव से ले जाते देखा है। इस घटना ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिये हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या गांव में रहना और गरीब होना पाप है। जवाब है सरकार के पास..!!

Sunday, April 26, 2009

जनता सब जानती है

- प्रमोद
वाह रे चुनाव ! तपती दोपहरी में भी हमारे नेता जनता को वादों का पुलिंदा सौपने अपने वातानुकूलित कुनबों से निकलकर आ रहे हैं , पर अब तक तो उन्हें यह अहसास हो जाना चाहिए कि उनके कथित वादों पर जनता कितना विश्वाश कर रही है। चुनावी खबरों में वोट बहिष्कार और मतदान का घटरहा प्रतिशत मुख्य रूप से छाया हुआ है। परन्तु शायद ही हमारे जन-प्रतिनिधि इस पर ध्यान दे पा रहे हैं। मुद्दों के नाम पर बस एक दूसरे की शिकायतों का बाजार गर्म है जिस से पहले से ही इस तेज गर्मी में पानी की किल्लत से त्रस्त जनता और भी तीखे अनुभव बटोर रही है, जिसका तीखापन तो हमारे नेताओं को भी झेलना ही होगा।
जो देखने और सुनने को मिल रहा है उससे निश्चय ही दुःख मिश्रित आश्चर्य होता है। पिछले पांच वर्षों से सरकार चलाने वाले नेता अपनी उपलब्धियों को गिनाने की जगह दूसरो की खामियां जनता को सुनाने में लगे हुए हैं, पर भाई साहब जनता न तो अंधी है और न ही बहरी इसलिए अपनी उपलब्धियों को गिनाते चलिए और आगे अपनी खामियों को बताते हुए क्षमा मांगते हुए उसे दूर करने का वादा करते चलिए तभी कुछ आपका भला होगा और कुछ जनता का भला होगा।
सरकार के विपक्षी दल भी कमो बेश उन्ही के पदचिन्हों पर चलते हुए उनकी खामियों को मुहावरेदार और लच्छेदार रूप में जनता को सुनाने में लगे हुए है। इसकी क्या जरुरत है और अगर है भी तो आप उसके सम्बन्ध में सकारात्मक पहल करते हुए पहले तो यह बताते की आपने सरकार में उन कमियों को दूर रखा था या वो आपके समय में भी इसी प्रकार से मौजूद थी? और तब अपनी योजनाओं को सामने रखते हुए ये बताएं की आपने उन्हें दूर करने की क्या रणनीति बनाई है?
इन दोनों से भी बुरी स्थिति वे बनाये हुए हैं जो अब तक सरकार में थे और अब ख़ुद को विरोधी बताते हुए जनता को ठगने का काम कर रहे है और चुनावों के उपरांत पुनः उन्ही कथित विरोधियों के साथ मिलकर सरकार बनने के सवाल पर बहुत ही निर्लज्जता के साथ घुमा फिर कर सब कुछ स्वीकारते चले जाते है।
खैर मैं कितना कुछ कहूँ, जनता की अपने मताधिकार के प्रति उदासीनता ही इस बात की गवाही दे रही है कि जनता के वोट के आकांक्षियों को जनता के बीच रहकर अपने पूर्व के क्रियाकलापों के लिए क्षमा याचना करते हुए आगे से जनता को साधन नही वरन साध्य बनाने का संकल्प लेना होगा वरना शायद जनता के कान अब सास-बहु की धारावाहिकों की तरह नेताओं द्वारा एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र और एक दूसरे की बुराई सुनते सुनते पक चुके हैं। अबतक तो नेताओं के प्रति ही जनता भरोसा उठा है पर यही हालत रही तो शायद लोकतंत्र में भी जनता का विश्वास बचा नही रह पायेगा। अतः हे महानुभावों जनता को बरगलाने का प्रयास न करते हुए सकारात्मक मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास करे क्योंकि जनता सब जानती है..................... ।

Friday, April 24, 2009

चुनावी बदलाव की सुनहरी आस

रजत गुप्ता
भारतीय लोकतंत्र के स‌बसे बड़े पर्व चुनाव का दूसरा चरण बीत गया। यूं तो मतदान का औसतन राजनीति के जानकारों के हिसाब स‌े कम रहा। यानी कुछ लोग यह मान कर चल रहे थे कि इस बार 70 प्रतिशत लोग अपने मताधिकार का प्रयोग कर ही लेंगे, जो नहीं हो स‌का। आंकड़ों के लिहाज स‌े यह दुखद स्थिति है पर स‌ामाजिक और आर्थिक ताने-बाने के बीच यह भारत में मजबूत होते और ग्रासरूट स्तर तक पहुंचते लोकतंत्र के लिए आशा की किरण है। खास तौर पर झारखंड के स‌ाथियों को पंचायत चुनाव का अनुभव अब तक नहीं हो पाया है, इसलिए उन्हें इस अदृश्य लकीर को स‌मझने के लिए आस-पास के राज्यों में हुए पंचायत चुनाव के घटनाक्रमों को स‌मझना होगा। जिन राज्यों में अभी लोकसभा चुनाव हुए हैं, वहां के कितने प्रतिशत लोग रोजगार के लिए अन्यत्र पलायन करने पर मजबूर है, इसे स‌मझना भी जरूरी है। अपने परिवार को पालने के लिए गांव का गांव खाली हो जाता है और ऎसी स्थिति में स‌िर्फ वोट डालने के लिए यह तबका गांव लौटे, यह स‌मझदारी की बात नहीं। पंचायत चुनाव के दौरान पड़ोसी राज्यों में स्थिति बिल्कुल दूसरी थी। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में काम करने वाले भी गांव के अपने प्रत्याशी को मुखिया और स‌रपंच के चुनाव में जिताने के लिए हजारों रुपया खर्च कर गांव लौटे थे। इस अंतर को जो स‌मझ लेगा, वह जान जाएगा कि नेताओं की हर किस्म की दगाबाजी के बाद भी भारतीय लोकतंत्र की गाड़ी स‌ही रास्ते पर बढ़ रही है और आने वाले दिनों में इस गाड़ी पर अच्छे लोग ही बतौर विजयी प्रत्याशी स‌वार हो स‌केंगे। इस क्रम मे विदेश में जमा काला धन वापस लाने के शोर पर याद दिलाना प्रासंगिक है कि कुछ स‌ाल पहले भारतीय बैंकों के कर्मचारियों के यूनियन ने देश भर में एक विज्ञप्ति जारी कर यह बताया था कि देश के किस-किस पूंजीपति का किस किस बैंक का कितना पैसा बकाया है। अगर मेरी याददाश्त स‌ही है तो यह रकम भी 16 हजार करोड़ रुपये थे। विदेशी बैंक में जमा काला धन वापस आने के पहले इस पैसे की वापसी पर तमाम बड़े राजनीतिक दलों का रूख जान लेना जरूरी है क्योंकि अपने नियंत्रण के बैंकों का पैसा जो वापस दिलाने में उत्सुक नहीं होगा, वह दूसरे देश की बैंकों स‌े पैसा लाने पर क्या प्रयोग कर पाएगा भला ?

Thursday, April 23, 2009

क्या लोकतंत्र अब मर चुका है..........???

दोस्तों.....आज सवेरे से ही मन बड़ा व्यथित है.......आज अपनी पत्नी के संग भारत के लोक सभा चुनाव का अपना वोट देने गया था....मगर अपने घर से दो-ढाई किलोमीटर दूर तक के रस्ते में पड़ने वाले तमाम बूथों पर एक अजीबो-गरीब सन्नाटा पसरा देखा......हम अपने बूथ पर पहुंचे तो मतदानकर्मियों के अलावा हम दो मतदाता ही वहाँ थे....उससे पूर्व और बाद के कई मिनटों तक भी यही हाल था....इससे इस सन्नाटे से ज्यादा हम दोनों ही सन्नाटे में गए....हम दोनों के लिए ही यह दृश्य एकदम से अचम्भाकारी था.....हम एकदम से चंद सेकंडों में अपना वोट दे चुके थे....सच कहूँ तो यह सब मुझे बड़ा आद्र कर गया.....भारत में मौजूद लोकतंत्र...चाहे यह जैसा भी है....मेरा इसके प्रति बड़ा आदर है....मैं जैसा भी हूँ.....इसमें इसका भी बड़ा हाथ है....मगर यह इस कदर मरणासन्न हो जाए.....लाश सा हो जाए तो मन का व्यथित हो जाना लाजिमी ही है ना.....!!
............आज अपने काम-धाम आदि छोड़कर मैं यही पता करता रहा....कि कहाँ-कहाँ क्या हाल है... अपने दोस्तों अन्य जानकारों और यहाँ तक कि अपने स्टाफों के क्षेत्रों का हाल-चाल लेता-लेता और भी ज्यादा व्यथित होता चला गया.........यहाँ तक कि मेरे एक स्टाफ पवन ने मुझे यह भी बताया उसके मोहल्ले से ग्यारह बजे तक सिर्फ़ दो ही लोग वोट देने निकले....मेरे दोस्तों के दोस्तों ने भी अपने मोहल्ले का यही हाल बताया....इस चुनाव में वोट के प्रति गैर-रुझान से और मतदाताकर्मियों के रजिस्टरों में दर्ज वोटों के प्रतिशत से यह आंकडा कुल-मिलकर बीस प्रतिशत भी नहीं पंहुचता.....इससे ज्यादा आंकडा अगर सामने आता है.....तो इसका अर्थ क्या है....यह बिल्कुल साफ़ है.....!!
दोस्तों वैसे तो यह कहने के लिए आया था कि जिस देश की जनता को वोट देने तक की फुर्सत तक नहीं....वो देश के बारे में किसी भी तरह की बात करने की हकदार भी नहीं....चाहे वह बात अच्छी हो या बुरी....!! मगर अलग-अलग लोगों से बात करने पर यह पता चला कि दरअसल जनता को किसी पर कोई विश्वास ही नहीं...और खड़े उम्मीदवारों में एक भी उसकी नज़र में "टके के भाव"का नहीं.....मैं ख़ुद भी यही पा रहा हूँ....मैं ख़ुद जिस व्यक्ति को वोट देकर गया हूँ....उससे मेरी तनिक भी आस नहीं है....और दरअसल उसने अपने सांसद होने के लंबे काल में मेरे शहर के लिए कुछ किया भी नहीं है....और ना ही संसद में उसकी आवाज़ कभी सुनाई दी....बेशक वो भला आदमी है.....और उसने अपने लिए ज्यादा कुछ "बनाया"भी नहीं.....मगर उससे क्या....सांसद का मतलब जनता के लिए काम.....बगैर उसके उसका मतलब ही क्या.....!!
दोस्तों......राजनीति की इस दशा के लिए बेशक राजनीतिक नेता ही जिम्मेवार हैं.....मगर सच बताऊँ तो हम भी कोई कम जिम्मेवार नहीं हैं इस परिस्थिति के लिए....अगर हम इसी तरह मुहँ सी कर.....और हाथ-पर-हाथ धर कर बैठ गए तो हमारी और भी मिट्टी पलीत हो जाने वाली है....और बेशक राजनीति अब तक के सबसे गंदे लोगों के हाथों में जाकर जनता के लिए बिल्कुल नाकारा हो चुकी है.....और इसे तमाम स्वार्थी तत्वों ने बिल्कुल ही छिछला बना दिया है.....मगर सिर्फ़ यही एक वह वजह है कि इसे हमें अपना संबल प्रदान करना होगा... अब इससे गंदा मानकर इससे दूर जाने बजाय इसमें घुसना ही होगा....और देश के नौजवानों को एक मिशन बनाकर इसे अपनाना होगा.....वैसे भी एक बड़ा वर्ग बेरोजगार है....अगर उसे सही दिशा दे दी जाए और उसे यह बताने में गर हम कामयाब हो जाएँ कि ग़लत कर्मों से बेहतर क्या यह नहीं होगा कि तुम राजनीति की गंगा को ही साफ़ कर दो....??.....और इस यज्ञ में हम तुम्हारे साथ तन-मन-धन से साथ हैं.....!!
दोस्तों अब भारत वासियों को आगे बढ़ना ही होगा.....चोर-उच्च्क्कों के हाथ में अपना घर सौंप कर हम चैन की नींद कैसे सो सकते हैं.....??.....सिर्फ़ अपने घर....अपनी बीवी.....अपने बच्चों की चिंता मरे रहने वाले हम तमाम लोगों को हर हाल में जागना होगा.....क्योंकि ये चोर-उच्चक्के हमारे तन से तमाम कपड़े तो ले जा चुके हैं.....अब सिर्फ़ लंगोटी ही बाकी है......हाँ दोस्तों.....भारत के तन पर अब सिर्फ़ लंगोटी-भर ही बाकी रह गई है....वो भी फटी-छूटी-मैली-कुचैली......और उसके हाल पर सिर्फ़ इसलिए छोड़ देना कि वह हमारी अपनी नहीं है....बहुत बड़ी "कमीनी-पंती" होगी.........और दोस्तों....अब भी अगर हमने अपनी भारतीयता का सबूत....यानि कि भारत के सभ्य नागरिक होने का सबूत नहीं दिया तो आने वाले भारत के तमाम बच्चे हमें हमारी इस "कमीनी-पंती"के लिए कभी माफ़ नहीं करेगी.........!!