Friday, March 5, 2010

रौनक अपहरण काण्ड के बहाने.......!!


झारखण्ड की राजधानी रांची में घटे रौनक अपहरण कांड के विभिन्न पहलुओं को देखते हुए यह जाहिर होता है कीसाईबर जगत और मोबाइल जगत की पैठ किस प्रकार अपराध जगत में बढती जा रही है,सूचना-संचार औरसुविधा के ये साधन किस प्रकार अपराध-जगत के अनिवार्य घटक बन चुके हैं !! नेट द्वारा चैट और मोबाइल द्वाराबातचीत की सहायता से किसी को अपने जाल में फंस कर किसी का अपहरण-फिरौती-ब्लैकमेल-औरअपराध-जगत में लाने की कु-चेष्टा....वगैरह-वगैरह !!
मोबाइल द्वारा फ्रेंडशिप और अन्य...चीज़ों के लिए नव-युवाओं को उकसाना,यह भी एक नया व्यापार वर्तमान मेंबड़े जोरों-शोरों से जारी है,जिसमें सामान्य दिनों में अख़बारों में छपने वाले फ्रेंडशिप के जो विज्ञापन हम आये दिनदेखते हैं,उसमें लड़कियों की मेम्बरशिप तो फ्री होती है,मगर उसी मेम्बरशिप के लिए लड़कों से कहीं बहुत अधिकपैसे वसूले जाते हैं,इससे यह भी जाहिर है कि इस सबमें क्या घपलेबाजी है!!
नेट की दुनिया या मोबाइल की दुनिया में यह एक नया मगर फलता-फूलता बाज़ार है,जिसमें भावनाओं का शोषणकरके एकदम से जवान होते युवाओं को चुंगल में फांसा जाता है,तत्पश्चात उनके साथ कुछ अश्लील हरकत कर उन्हेंहमेशा ब्लैकमेल भी किया जा सकता है,उनसे कोई भी काम करवाया जा सकता है या फिर यह सब कुछ ना करकेसीधे-सीधे फिरौती भी वसूली जा सकती है,मगर हर स्थिति में एक बात जो उजागर होती है,वो यह है कि इनअपराधों में किसी महिला या लड़की की क्या भूमिका है !!
एक जवान होती लड़की जो पढ़-लिखकर कुछ बन भीसकती है,या कोई अन्य कार्य भी कर सकती है,मगर आसान पैसे की चाहत इन्हें कहाँ खींचकर ला रही है,बेशकइसकलियुगी समाज में बहुत कुछ गंदे से गन्दा "कर्म"....घृणित से घृणित अपराध घटित हो रहे हैं,मगर इस तर्कसे लड़कियों द्वारा भावनाओं के इस घटिया से खेल में शामिल होना किसी भी तरह वाजिब नहीं ठहराया जासकता...फिर तो समझ लीजिये कि आने वाले दिनों में प्रेम की की चिता ही जलने वाली है!!
प्रेम या दोस्ती को ढालबनाकर इस प्रकार के अपराध मानवीयता का रेप है...यह रेप सीधे-सीधे किये गए रेप से कई गुना घटिया-टुच्चाकार्य है और यह कार्य चाहे युवक करे या युवती....एकदम से अमानवीयता की पराकाष्ठा है!!
इस प्रकार के अपराध कर युवा जो समाज बना रहे हैं,उसमें आने वाले दिनों में विश्वास नाम की चीज़ का नामलेवाही नहीं बचेगा ...जरा सोचिये दोस्तों कि तब आप कैसे तो प्यार करेंगे और कैसे तो दोस्ती...और जब ऐसी जीवनदायक चीज़ें ही नहीं बचेंगी तो फिर आप भी कैसे बचोगे ??इस लिए अब इस समाज को यह सोचने की आवश्यकताहै कि पैसे को भगवान बनाकर आप जीने के लिए क्या सचमुच एक सार्थक समाज बना सकते हो या फिर एकलालची-व्यभिचारी और स्वार्थ की गन्दगी से परिपूर्ण एक ऐसा गटर बना रहे हो,जिसमें आप ना जी ही सकते हो नामर ही सकते हो....हाँ सिर्फ घुट ही सकते हो....!!
अब भी हम यह नहीं सोच पाए तो फिर कभी नहीं सोच पाएंगे क्यूंकिजल्द ही यह गन्दगी,
जो हमारे चारों तरफ फैलती जा रही है,हम सबको लील जाने वाली है !!इस सड़ांध भरी सोच कोहम अपने भीतर से अभी की अभी निकाल फेंके,यह एकदम से जरूरी है और इसे पूर्ण करने का उत्तर-दायित्वमीडिया के सर पर भी है !!