Sunday, June 20, 2010

kamyunist :ek saral vishleshan

                                                           मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!


                       कम्युनिस्ट,ये एक ऐसा शब्द है जो पिछ्ले सौ सालों से पूरे विश्व के राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक फलक पर छाया हुआ है,इसके लाभ-हानि का विश्लेषण करने से पुर्व यदि हम इसके इतिहास पर नज़र डालते हैं तो हम पाते हैं कि जैसा कि हम किताबों के द्वारा जिस क्म्युनिज्म को जानते-समझते हैं वास्तविक स्थितियों को देख्नने पर इससे इत्तर ही बात दिखायी देती है और सबसे बडी बात तो यह कि इस आंदोलन ने एक खास समय में  बेशक पूरे विश्व को उद्वेलित किये रखा है मगर सच तो यह कि जिन आदर्श स्थितियों का खाका इस वाद से संबंधित पुस्तकों में खींचा और दिखाया गया है या जाता है,उसका साकार रूप रत्ती-भर भी वास्तविक घरातल पर नहीं दिखायी दिया या दिखायी ही देता है,अपने पाठ्य और और उसी के वास्तविक रूप में इतने भीषण अंतर का यह ब्रह्मंड में एक अकेला दुर्लभ उदाहरण है और यह बात पूरे विश्व के साथ एक बहुत भद्दा मज़ाक है जो इतने लंबे समय से किया जा रहा है,जिससे पूरे विश्व में किसी भी किस्म के लाभ कइ बजाय अनन्त गुणा हानियां जी ज्यादा हुई हैं!!  
                      किसी समय में उपरोक्त पंक्तियों का लेखक भी अपने विचारों में कम्युनिस्ट ही था और अपने पुंजीवादी दोस्तों में के साथ इसके  पक्ष में बहस आदि करता रहता था,मगर जब भारत और विश्व में इसके कारण हुए असर पर नज़र डाली तो इसकी आंखे फटी-की-फटी रह गयी,कम-से-कम भारत के संबंध में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के योगदान को जांचा परखा तो यही पाया कि यह तो ऐसा "अलबत्त" विचार है जो अपने परिवेश-संस्कार और स्थितियों के संदर्भ में सोचना तक नहीं जानता,उस पर विचार करके उसी की कसौटी पर कोई निर्णय लेना तो बहुत दूर की बात है,यहां तक कि इसे इस बात की तमीज तक नहीं कि इसके उल्टे-सीधे "अ-"वैचारिक निर्णयों से न सिर्फ़ आर्थिक-सामाजिक नुकसान होता है बल्कि एक देश का सामाजिक और भावनात्मक नुकसान होता है और मज़ा यह कि इसके बदले किसी को भी रत्ती भर भी किसी किस्म का लाभ नहीं होता बजाय इसके कि कुछ लोग खुद को बुर्जुवा-बौद्धिक समझ कर अपने अहंकार का पोषण कर लेते हैं,अपनी बच्चे जैसी हेठी से अपने ही समाज के एक बडे हिस्से को नुकसान पहुंचा कर अपनी पीठ ठोकने का एक नायाब उदाहरण है यह,एक बार फिर कह दूं कि यह एक बडा भद्दा मज़ाक है जो सौ सालों से पूरे विश्व को एक अपूरनीय क्षति पहुंचा रहा है, जिसका नुकसान देश ने अपनी आज़ादी के समय झेला था,जिसका नुकसान कभी देश की आर्थिक राजधानी रहा बंगाल आज तक झेल रहा है,ना सिर्फ़ झेल रहा है,बल्कि पिछ्ले साठ सालों में यह सौ सालों पीछे जा चुका है,जिसके एक पुर्व मुख्यमंत्री अपने कुछ पिछ्ले कृत्यों के लिए माफ़ी मांगते है...और शायद अपनी नज़र में देश के सामने बरी हो जाते हैं मगर क्या इतिहास का चक्का उल्टा घूम सकता है क्या वापस लौट कर फिर से ज़िंदगी शुरू की जा सकती है ??
          सबसे बडी बात तो यह है कि एक वैसा "विचार"जो सालों-साल तक एक बहुत बडी आबादी को दिग्भ्रमित करता हुआ यह सपने दिखा कर कि वे एक दिन खुद ही राजा होंगे,एक दिन अचानक "होश" में आकर सबके सामने अपने ज़ुर्म स्वीकार करता हुआ यह कहता है कि उससे बहुत बडी गलती हुई और उसे माफ़ किया जाये !!अपनी आकांक्षाओं पर इस तरह अचानक कुठाराघात पाकर उस जनता पर क्या बीतती होगी जो अब तक उन्हीं "बुजुर्वों""बौद्दिकों"  के बहलावे-मुगालते में जीती आयी थी,जिसके लिए उनके बाप-दादाओं ने अपनी उम्र गवांयी थी....और सबसे बडी बात कि उनके उन्ही बाप-दादाओं ने ना जाने कितनी ही मासूम जानों का कत्ल किया था...विश्व में अपना परचम लहराने के लिए लाखों लोगों का खून बहाया गया था,निर्दोष लोगों को पल भर में मौत के घाट उतार दिया गया था,लेकिन जिन आम लोगों ने,जिन आम कार्यकर्ताओं ने इस "विचार" के लिए अपनी बलि देकर इस विचार के बारे में कुछ भी नहीं सोचने वालों तक की जान ले ली....उन्हीं विचारों के समर्थक "आम" कार्यकर्ताओं की जिंदगी का हाल क्या है....और इसी विचार के ऊंचे दर्जे के लोगों के रहन-सहन का स्तर क्या है...अगर इसे भी उतनी ही तत्परता से समझ लिया जाता तो इस आदर्श-से मगर "अबूझ"-से विचार का पतन इसकी शुरुआत के साथ ही खत्म हो जाता.....!!
            सच तो यह है कि इस क्रान्ति के वाहकों में भी वर्ग-भेद है....उपरी स्तर के और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में का यह भेद सच कहें तो अन्धे की आंखे खोल दे....मगर क्या है कि अकसर तमाम किस्म के "बाबाओं" के अंध-समर्थकों की आंखो पर एक ऐसी तिलिस्मी पट्टी पडी रहती है कि उस बाबा का समुचा महल ढ्ह जाने के पश्चात भी नहीं हटने को आती....दरअसल किसी भी बाबा के तमाम अंध-समर्थकों का कुल-अहंकार ही उस बाबा का अहंकार होता है,बाबा के अहंकार का पोषण उसके समर्थक करते हैं...और बदले में उससे भी बडा अहंकार का आभामंडल पाते हैं.....एक समय बाद शायद बाबा तो अपने कर्मों के लिए माफ़ी मांग ले....मगर समर्थकों का अहंकार नहीं टूटता...वे उस खंडित परचम को उठाए रहते हैं इस उम्मीद में कि शायद अब भी सब कुछ वापस लौट जाये.....अब भी सब कुछ पहले की तरह वैसे-का-वैसा हो जाये....हम अपने बाबा के चुतड साफ़ कर-करके उसका प्रसाद पाते रहें....अन्धे लोगों की इसी भीड के कारण बाबा का साम्राज्य कायम रहता है....बाबा ऐश-मौज करता हुआ जीवन की भव्यता को भोगता रहता है और भक्त-गण अपना तन-मन-धन उस पर लुटाते रहते हैं.....बिना यह जाने कि "भीतर-ही-भीतर" क्या "चल"रहा है....क्या "पक" रहा है.....!!
           और मज़ा यह है कि कम्युनिज्म इससे जरा भी...जरा-सा भी अलग नहीं है...और ना ही कभी था भी....इसके बाबा लोग दरअसल तब भी "ज़ार-सरीखा"जीवन भोग रहे थे....और आज भी उनके घरों के भीतर झांक कर देखा जा सकता है कि अन्दर क्या पक रहा है....क्या चल रहा है....बेशक कुछ लोग मिल अवश्य फ़क्कड मिल जायेंगे....मगर तब भी यह सच जरा भी खत्म हो जायेगा कि उनके विचारों ने देश और विश्व का कितना बडा नुक्सान किया है....और क्या इसकी कभी भरपायी की जा सकती है....??देश और काल के सन्दर्भ में की जाने वाली गलतियां कोई छोटे बच्चों द्वारा की गयी गलतियों की तरह नहीं होती कि बच्चे ने ये तोड़ दिया तो उसकी जगह दूसरी चीज़ ले आये....ऐसी गलतियां व्यापक परिणाम देती हैं...जो अक्सर ऐसे साबित होते हैं कि जिसके अंजाम-स्वरुप ना जाने क्या कुछ घट जाता है...क्या-क्या मिट जाता है...क्या बदल जाता है....कितनी जानें चली जाती हैं...आबादी-की आबादी मिट जाती है सभ्यता नष्ट हो जाती है....शिक्षा-व्यवस्था बदल दी साक्ति है....संस्कार और परम्पराएं बदल जाते हैं....यहाँ तक कि इतिहास का भी रद्दोबदल कर दिया जाता है....बच्चे तो क्या बड़े भी असल बात को जानने-समझने से ना-वाकिफ रह जाते हैं...यहाँ तक कि बिना-किसी बात के (या कि गलत जानकारी की बात )आपस में बरसों झगड़ते रह जाते हैं....
                              भारत में भी कमोबेश यही होता रहा है....बल्कि कम्युनिस्टता के मामले में तो यह बात हज़ार फ़ीसदी सच्ची है...भारतीय-स्वाधीनता संग्राम में इसका रोल....अंग्रेजों की तरफदारी....स्वतंत्रता-सेनानियों को पकडवाने में अग्रेजों को इनका सहयोग....प्रमुख भारतीय नेताओं को दी जाने वाली इनकी गालियाँ.... मुस्लिम-लीग जैसे बिना सोच वाले निराधार संगठन को ना सिर्फ सहयोग बल्कि आगे बढ़कर भारत नाम के राष्ट्र की ह्त्या कर इसके विभाजन को एक ऊंचा वैचारिक आधार प्रदान करने की बिना-सोची समझी रणनीति.... कम्युनिज्म का आधा-अधूरा अध्ययन....पराये राष्ट्रों की तरफदारी...अव्यवहारिक बातों का  पोषण ......भारत बन चुकने के बाद अपनाई गयी नीतियाँ....चीन के आक्रमण के समय भी चीन की तरफदारी....और समय-समय पर चीन की ही प्रशंसा और हद दर्जे की नीचता पर जाकर भारतीय नेताओं की निंदा....(उस वक्त आज की तरह के टटपुन्जिये नेता परिदृश्य में नहीं थे...सब देश-भक्त और व्यापक सोच वाले नेता हुआ करते थे ) और सबसे बड़ी बात तो यह है कि अपनी सोच और अपने विचार को लागु करने के लिए व्यापक हिंसा...नृशंस हत्याएं...सामूहिक नरसंहार...यह कम्युनिस्ट सोच का प्रमुख औजार है,दुर्भाग्यवश यह औजार मध्ययुगीन-अमानवीय-असभ्य और निहायत ही अ-लोकतांत्रिक है और यहाँ तक कि बिलकुल गैर-जिम्मेदाराना भी है,  
                             सच तो यह है कम्युनिज्म शब्द भले अपने मूल रूप में एक आदर्शवादी है...मगर वास्तविकता तो यह है कि यह है बिलकुल अ-प्राकृतिक... क्योंकि प्रकृति भी दरअसल कम्युनिस्ट बिलकुल नहीं है...दरअसल इस समूचे ब्रह्माण्ड में कहीं भी,कभी भी,एक पल के लिए भी कम्युनिज्म नहीं हैं...अब जबकि अ-समानता से भरे इस ब्रह्माण्ड में जब तरह-तरह की विषमताएं भरी पड़ी हैं तो कम-से-कम इंसान जैसे सो कोल्ड बुद्धिमान जीव को प्रकृति की इच्छा समझ ही लेनी चाहिए....साथ ही यह भी समझना चाहिए कि विविधता ही प्रकृति की ताकत है और विविधता ही उसकी-हमारी-हम सबी सुन्दरता भी....बेशक आदमी नाम का यह जीव अपने भीतर विवेक नाम की शीतल छाँव के चलते कमजोरों-मजलूमों की हालत देखकर-महसूस कर पसीज जाता है और उसे अत्यंत आदर्शवादी स्थितियों के सुन्दर-सुन्दर विचार आने लगते हैं मगर उस विचार को जिस तरह साकार रूप देने का हौसला और रास्ता चाहिए होता है....वह दुर्भाग्यवशात आदमी के पास नहीं है...या अब तक तो नहीं है....और होने की कोई संभावना भी मुझे दिखाई नहीं देती....क्योंकि मेरी समझ से आदमी अपने स्वभाव से एक लोभी और संग्रह-वृत्ति का जीव है...अपनी इस वृत्ति के चलते उसमें एक-समान भाव या समान भाव संभव ही नहीं है....भले वो समानता की बड़ी-बड़ी बातें अवश्य बनाता है....मगर दरअसल ये बातें उसके अहंकार की तुष्टि मात्र के लिए होती हैं...सच्चाई से कोसों दूर....व्यवहारिकता से बिलकुल परे...यह संभव ही नहीं है कि आप अपने बच्चे और किसी और के बच्चे को एक-समान नज़र से देखे...आप अपने सगे भाई के साथ तो समानता के साथ रह ही नहीं सकते,किसी और के साथ समानता तो बड़ी दूर की बात है...आपका अपना सगा भाई,जिसका आपके साथ एक साथ कार्य-व्यापार है,आपको पता नहीं कब किस जगह "लंघी" मार दे...या कि मार ही रहा हो...और आपको पता ही ना हो...ऐसे जीवन को पल-प्रति-पल देखते हुए भी कम्युनिज्म जैसी आदर्शवादिता की बातें करते हैं इससे ज्यादा हास्यास्पद भला और क्या होगा....!!
                        इस प्रकृति में शेर भी है...हिरन भी...भेड़िया भी है...बिल्ली भी....गाय भी है...घड़ियाल भी....हाथी भी है...चूहा भी....सबकी अपनी ताकत है...अपना शरीर है...सबकी अपनी डिमांड भी है अपनी शारीरिक तथा अन्य जरूरतों के हिसाब से....!!.....और आदमी के हिसाब में इसमें एक और इजाफा हो जाता है...वो है आदमी की खुद की इच्छा...उसके खुद के अहंकार के हिसाब से....तो भला आदमी एक-समान कैसे रह सकता है....अगर ऐसा हो भी पाया तो यह अ-प्राकृतिक और विचित्र हो जाएगा...क्यूंकि इससे आदमी का बहुरंगापन ही समाप्त हो जाएगा....उपरवाला क्या पागल था कि इस तरह की सृष्टि बनायी....!!क्या उसे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि आदमी के भीतर अक्ल डालकर वह एक साथ उसमें अहंकार-लालच-क्रोध-वासना-स्वार्थ और ना जाने किस-किस तरह के अवगुणों का समावेश कर दे रहा है.......दरअसल कम्युनिज्म आदमी के भीतर की एक हीन भावना ही है...दरअसल यह उसकी पीड़ा से ज्यादा उसके महान बनने-होने की इच्छा से जुडी हुई है....लेकिन आदमी को लगता है कि वह मजबूर आदमियों की दशा देखकर पीड़ित है....मगर यह बिलकुल नाजायज और आधारहीन तथ्य है...क्योकि अगरचे ऐसा होता...तो इस पीड़ा से द्रवित होकर आन्दोलन करने वाले लोग...आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले तमाम लोग बिलकुल आम लोगों की तरह एक सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे होते...मगर हमने देखा है...कम्युनिज्म का नारा लगाने वाले तमाम लोग अपनी-अपनी अय्याशियों में रत रहे हैं और उनके अनुयायी अपने अभाव से परिपूर्ण जीवन में अभिशप्त.....!!दरअसल ऐसा लगता है कि सब तरह की विचारधाराएं अपने प्रवर्तकों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती हैं....जिसकी आड़ में ये सो कोल्ड प्रवर्तक अपना उल्लू सीधा करते आयें हैं...बलिहारी है इनके तमाम अंधभक्तों की....!!
                        अंत में यही कि आदमी खुद में ही इतनी विसंगतियों से भरा पडा है....कि अच्छी-से-अच्छी विचारधाराएँ आदमी के पल्ले पड़कर कूड़ेदान के हवाले हो जाया करती हैं...आदमी एश और मौज का एक ऐसा इच्छाधारी नाग है कि अपनी मस्ती और स्वार्थ के लिए कभी भी,किसी को भी डँस सकता है....आदमी की इसी स्वार्थ-लोलुपता की अग्नि में समस्त अच्छी चीज़ें चूल्हे में झोंक दी जाती है...किसी भी बात की शुरुआत होती है....एक बड़ी भयानक आग से....मगर ठीक बीच रास्ते में ही आग तो चूल्हे वापस घुसा दी जाती है....बाकी बचती है ख़ाक....बाकी बचती है राख....जिसे कोई उड़ा ले या फांक ले.....कम्युनिज्म के साथ भी यही हुआ है....सिर्फ सौ सालों के शैशव-काल में ही आदमी के हित की सबसे आदर्शवादी सोच....आदमी के लिए मारक साबित हो चुकी है....इसे अपनाने वाले तमाम लोग इससे एक-एक कर अपना पल्ला झाड चुके हैं....जो बचे हुए हैं....वो कुछ अच्छे शब्दों को तलाश रहे हैं जिनकी सहायता से वे "भद्र-विचार"से पल्ला झाड़ने की अपनी प्रक्रिया को एक अच्छा जामा पहना सकें....तभी तो जिन कुछ जगहों पर यह वाद अपनी ख़ाक के रूप में बचा हुआ है...वहां इसे साम्यवादी पूँजीवाद का नामकरण से सुशोभित कर दिया गया है....यह बिलकुल वैसा ही है....जैसे सूर्यमुखी चंद्रमा   या कि अंधियारा सूर्य....हां...हा....हा...हा...हा...हा....सुन्दर शब्द शायद इसी सब को तो कहते हैं...जिसमें अच्छाई-बुराई दोनों एक साथ समा जाए....हम कहें सूरज तो लोग चाँद भी समझ लें....हम कहें आदमी तो लोग पशु भी समझ लें....एक बहुत प्यारा-सुन्दर और व्यापक विचार था साम्यवाद जो आदमी के भीतर रिक्त होती जाती संवेदना के साथ...के साथ यह मिटता चला गया....और आज के इस भयंकर पूजीवादी युग में,जहां पैसा ही सब कुछ है...भगवान् से भी कहीं बहुत ज्यादा(भले ही सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद उसी भगवान् की शरण में जाते हैं,मगर उससे पहले तक तो पैसा ही भगवान् होता है आदमी के लिए....)इसीलिए अगर आदमी में आदमियत की तनिक भी संभावना हो तो साम्यवाद की परिकल्पना एक अत्यंत आकर्षक विचार है...भले ही अ-प्राकृतिक ही सही....मगर जहां आदमी अपना समूचा विवेक धन-दौलत-स्वार्थ-लालच की तिजोरी में बंद कर भूल जाए...वहां समानता आदमी का बाप क्या....भगवान् भी नहीं ला सकता.....और भगवान् तो खुद भी दरअसल समानता चाहता ही नहीं....भले ही आदमी समानता-समानता का प्रपंच रच कर सारी उम्र असमानता का खेल खेलता रहे....और आखिरी वक्त मुसलमाँ भी हो जाए.....!!ऐसे इन्सां से भगवान् ही बचाए धरती को....!!
                          वर्ग-संघर्ष और वंचितों-बेसहारों के अधिकारों के नाम पर कभी शुरु किये गये साम्यवादी आंदोलन के "भूत" ने इन बेसहारों-वंचितों और निम्न वर्ग के लोगों को उनका उचित हक,आर्थिक लाभ, संपत्ति आदि दिलवा पाने में सफ़लता पायी हो या ना हो मगर अधिकारों को पाने के लिये जिस प्रकार से,जिस तरह के संघर्ष का आह्वान साम्यवाद ने किया है उसकी परिणति यह हुई है कि बार-बार काम रोको,कार्य-बहिष्कार,चक्का जाम आदि तरह के आन्दोलनों ने काम न करने की एक ऐसी प्रवृति को जन्म दे दिया है जो अमर है और अब अपनी किसी भी उचित-अनुचित बात को मनवाने के लिये पूरे विश्व में लागु की जाने लगी है,मगर इतना भी होता तो गनीमत होती,मगर इसे येन-केन-प्रकारेण लागू करवाने के लिये जिन हिंसक विधियों का सहारा लिया जाता है,यहां तक कि कभी-कभी इस विचार से असहमत वैसे लोगों,जिन्हे काम रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं और जो रोज की तरह अपने काम पर जाना चाहते हैं,उनके साथ किया जाने वाला हिंसक बर्ताव इस विचार-व्यवस्था पर अनेकों प्रश्न-चिन्ह खडे करता है,फिर अन्य लोगों और व्यवस्था के साथ किये जाने वाले उनके बर्ताव की बात ही क्या करनी....!!फिर एक बात जो और उभरती है वो यह भी है कि क्या यह संभव है कि दो अलग-अलग क्षमता वाले,तरह-तरह की बुद्धि वाले,थोडा कम-थोडा बुद्धि वाले ज्यादा,तरह-तरह के परिवेश वाले,तरह-तरह की गतिविधियों के क्षेत्र वाले व्यक्तियों का जीवन एक समान हो....??
                          अब आप खुद के ही जीवन को लें लें....क्या यह संभव है कि आपके अलग-अलग भाई या बेटे बिल्कुल एक ही तरह से एक ही काम करते होंओ...और जब काम करने का ढंग ही अलग-अलग दो व्यक्तियों का अलग-अलग होता है....तो फ़िर कैसी समानता...किस बात की समानता....किस तरह की समानता....??इस प्रकार तो दो घंटे काम करने वाले और सात घंटे काम करने वाले भी बराबर हो जायेंगे....कम अक्ल और ज्यादा अक्ल वाले भी बराबर हो जायेंगे यहां तक कि कम मेहनत करने वाले आलसी लोग और देह-तोड मेहनत करने वाले भी बराबर....ये कैसा मज़ाक है....ये कैसा पाखंड है...और इस तरह की मक्कारी के क्या परिणाम हो सकते हैं....इन सब बिल्कुल भी ध्यान ना देकर.....इन सब बातों को,प्रवृति  को काम ना करने का औजार भी बना लिया गया है सो एक और भयंकर पाखंड और मक्कारी है...यह एक बहुत बडी चालाकी है...जिससे अपने समुचे न्यस्त स्वार्थों को आन्दोलन की आड लेकर पूरा किया जाता है...भले ही राज्य या देश की पूरी ही व्यवस्था छिन्न-भिन्न ही क्यों ना हो जाती होओ....व्यवस्था को तहस-नहस कर अपनी तमाम नाजायज बातों को मनवाना,यह साम्यवादी सोच का मौलिक आविष्कार है,जिसे साम्यवादी जब चाहे,जहां चाहे,जैसे चाहे,जिस तरह चाहे, जिन परिस्थितियों में चाहे लागू कर सकते हैं...और यहीं पर शुरु होती है वह लडाई,जिससे वह आम लोगों से बिल्कुल कट जाता है,भले ही कहने को वह आम लोगों के लिए ही किया जा रहा आन्दोलन हो...लेकिन जब आप किसी अच्छी चीज़ को भी बार-बार गलत बातों के लिये लागू करना शुरू कर देते हैं तो अन्तत: वह चीज़ भी अच्छी नहीं रह जाती...
....!!
            साम्यवाद के साथ भी यही हुआ है....नकारा...काहिल...जाहिल लोगों ने काम-रोको आंदोलनों को अपना प्रमुख हथियार बना कर जनता को भी ना सिर्फ़ काहिल....जाहिल...नकारा बना डाला है...बल्कि जो काम करना भी चाहते हैं...उन्हें भी काम पर जाने से रोककर व्यवस्था को जबरन बंदी बना लिया है इन्होने...जो किसी भी तरह के व्यवस्था या किसी भी तरह के संविधान में अनुचित ही नहीं अपितु निक्रष्ट्तम है...घ्रणित है....आम जन के विरुद्द भी है...इस तरह की कार्यवाहियों से अन्तत: अव्यवस्था ही फैलती है...और किसी को मिलता भी कुछ नहीं...और दुखी करने वाली बात तो यह है कि बार-बार ऐसे ही कार्यों को अंजाम देने से यह भी लोगों का एक किस्म का अधिकार ही बन जाता है,या कि मान लिया जाता है,भले नाजायज ही सही...गलत चीज़ों को सही मान लिए जाने के संदेश भी गलत ही होते हैं...परिणाम तो खैर गलत होना लाजिमी ही ठहरा....और तो और चलो मान भी लिया जाये कि तुम्हारी बात ही ठीक है....तुम्हारे साथ गलत हो भी रहा है....तो इसका क्या मतलब है....तुम अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक उतर आओ...??इसके लिए लाखों-करोडों लोगों का जीवन तबाह कर दो...??देश और राज्य के आम जनों का अरबों-खरबों रुपये का व्यापार-धंधा चौपट कर दो....??...उनका खर्चा क्या तुम्हारा बाप देगा...??कर्ज़ ले-लेकर काम करने वाले छोटे-मोटे व्यापारी....रोज की देहाडी पर जीने वाले रिक्शे-ठेले-मजदूर-रेजा-खलासी....आदि-आदि जैसे तमाम लोग जिनके खून-पसीने की मेहनत से उनके परिवार का पेट भरता है...एक दिन के बंद से भी जिनका जीवन लथपथ हो जाता है....उनका क्या....??क्या यही आंदोलन होता है...??और कैसा आंदोलन,किसका आंदोलन,किसके लिए आंदोलन...??....अपने-अपने आकाओं की ऐश-मौज-मस्ती के लिए....!!कि उनके अहंकार की तुष्टि लिए...??कि अपनी ताकत दिखाने के लिए...!!कि लोगों में अपना भय व्याप्त करने के लिए....??क्या है ये सब...?? किसके  लिए है ये सब...??कौन कर रहा है ये सब....??किसकी शह पर हो रहा है ये सब...??
             मेरी जानकारी के मुताबिक तो भारत के साम्यवादियों को पिछ्ले पांच-छह दशकों से भारत के बाहर से अकुत धन मिलता रहा है....जो सालाना लाखों-लाख डालर हुआ करता है....और आज के दिन तक जारी है...अकेले सोवियत-रूस से १९५०-५१ से ही एक से लेकर पांच लाख डालर सालाना भारत में आता रहा है....ये धन कहां जाता है...किसके पास आता है....इसका हिसाब-किताब क्या है...??यह कोई नहीं जानता...और कोई जान भी नहीं पाएगा... साम्यवादी व्यवस्था का यह भी तो एक गुण है कि यह हाथ चोरी करे तो वह हाथ भी ना जान पाये...(ऐसा हमारी व्यवस्था में कुछ दूसरे ही अर्थों में हुआ करता था कि यह हाथ दान करे तो दूसरा हाथ भी ना जान पाये कि इस हाथ ने क्या किया है...!!)साम्यवादी व्यवस्था तक आते-आते इस विचार ने क्या रूप पाया है...यह मज़ेदार है...!!और इससे भी ज्यादा दिलचस्प तो यह है कि ऐसा सोचने वाले और करने वाले पढे-लिखे हैं...बौद्धिक हैं...यहां तक कि "मास" की चिन्ता करने के कारण महान तक हैं...!!मगर हाय रे यह महानता....अगर तुम्हें छोटी-छोटी बातों की तमीज तक नहीं...अगर तुम्हें मुर्खों को भी समझ आ जाने वाली बातों की अक्ल नहीं...अगर तब भी तुम खुद को महान साबित करने के लिए क्या-क्या कुछ नहीं किया करते....!!....मगर एक आखिरी बात अवश्य कहुंगा कि अक्ल की बात को यदि रहने भी दें तो काम-धाम रोक देने की कार्यवाही को कभी आंदोलन नहीं कहा करते....और दूसरी यह कि "टुकडों" पर पलने वाला कोई भी आंदोलन ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रहता....वे "टुकडे" भीतर के हों या बाहर के...टुकडों पर जीने वाले लोग आंदोलन नहीं किया करते....बल्कि उन्हे मिलने वाला हर "टुकडा"...उनके खुद के नकारापन...काहिली...और यहां तक कि हरामीपने को ही उजागर करता है...हरामीपने के द्वारा भले ही आम जनता की जान की कीमत पर आप अपनी और अपने आकाओं की जिंदगी को सुरक्षित कर सकते हैं...मगर इसे कम-से-कम आंदोलन तो मत कहिये जनाब....वरना हम तो यही कहकर चुप हो जाएंगे...कि....
                      वो बेदर्दी से सर काटें हैं अमीन और मैं कहूं उनसे
                      हुजुर आहिस्ता-आहिस्ता,जनाब आहिस्ता-आहिस्ता !!

2 comments:

सर्प संसार said...

आपका विश्लेषण पढकर अभिभूत हूँ।
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क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

Maria Mcclain said...

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