Wednesday, July 20, 2011

देश और देस का फर्क

रजत गुप्ता
लंदन में एक टेलीफोन टैपिंग का मामला स‌रकार के गले की हड्डी बनी है। वहां के कई प्रमुख पुलिस अधिकारियों को इसी वजह से इस्तीफा देना पड़ रहा है। इधर झारखंड में टेलीफोन टैपिंग का मामला चुनाव स‌माप्त होते ही
मानों रद्दी की टोकरी में चला गया है। स‌भी को याद दिला दें कि डॉ अजय के साथ कुख्यात नक्सली नेता स‌मर जी के बात-चीत का टेप भाजपा नेता और पूर्व विधायक स‌रयू राय ने मीडिया को उपलब्ध कराया था। आनन-फानन में पुलिस ने मामले की जांच करते हुए रांची के पास नगड़ी से दो लोगों को हिरासत में लेकर यह दलील देने की कोशिश की कि इन लोगों ने स‌मर जी के नाम पर यह बात की थी।
दूसरी तरफ भाजपा के बड़े नेता विश्वास के साथ मामले की जांच की मांग करते रहे और डॉ अजय के नक्सली संबंधों का हवाला देते रहे। जैसे-जैसे मामला गरमा रहा है, स‌रकारी अधिकारी इससे कन्नी काट रहे हैं। राज्य के

गृह स‌चिव जे.बी. तुबिद और डीजीपी जी.एस. रथ ने अब तक चुप्पी साध रखी है जबकि चुनाव जीतने के तुरंत बाद खुद डॉ अजय ने मामले की सीबीआई जांच की मांग कर कई लोगों की परेशानी बढ़ा दी है।
राज्य स‌रकार के जिम्मेदार अधिकारियों की परेशानी इस टेप की बात-चीत से नहीं, केंद्र स‌रकार के कहर से है। केंद्रीय वित्त मंत्री के कार्यालय की कथित जासूसी प्रकरण के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स‌भी स‌रकारी

एजेंसियों को ऎसी गतिविधि रोकने का स्पष्ट निर्देश दिया था। खबर है कि पिछले 15 जून तक ही ऎसे उपकरण लौटाने के भी निर्देश थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया था कि किसी और के पास ऎसे उपकरण पाये जाने
की स्थिति में उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।अब सीडी के बाहर आने के बाद राज्य स‌रकार का पुलिस महकमा स‌कते में है क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने निर्देश के बाद भी यहां गुपचुप तरीके से टेलीफोन टैपिंग के उपकरण काम कर रहे हैं। यही वजह है कि स‌रकारी अधिकारी इस मामले पर कुछ बोलने से कतरा रहे हैं।
मालूम हो कि मोबाइल फोन के जमाने में मोबाइल की बात-चीत सुनने के लिए पहले जी.एस.एम. इंटरस‌ेप्टर इस्तेमाल में लाये गये। बाद में सी डी एम ए फोन के लिए भी उपकरण लगाये गये। यानी राज्य पुलिस के गुप्तचर विभाग के पास किसी भी फोन अथवा मोबाइल पर होने वाली बात-चीत को रिकार्ड करने का

उपकरण उपलब्ध था।
नियमः किसी का भी फोन टैप करने के लिए राज्य के गृह स‌चिव की अनुमति आवश्यक है। नक्सली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस नियम में बदलाव करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि पुलिस महकमा बिना इस अनुमति के भी सात दिनों तक किसी की भी बात-चीत को सुन स‌कता है। इन सात दिनों के भीतर विभाग को गृह स‌चिव की अनुमति प्राप्त कर संबंधित टेलीफोन सेवा प्रदाता कंपनी को उपलब्ध कराना था। ऎसा नहीं कर पाने की स्थिति में संबंधित कंपनी खुद ही इस टेलीफोन टैपिंग को रोक स‌कती थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के इस आदेश के बाद भी अगर पुलिस विभाग ने डॉ अजय का टेलीफोन टैप किया है तो केंद्रीय आदेश की अवहेलना के लिए राज्य पुलिस का विशेष विभाग जिम्मेदार माना जाएगा। राज्य के डीजीपी ही इस विभाग के भी मुखिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आदेश की अवहेलना के लिए दंड का भी प्रावधान किया है। लिहाजा रंगे हाथों अनधिकृत टेलीफोन टैपिंग के लिए पकड़े जाने वालों में राज्य के आला अधिकारी ही हैं, जो हर कीमत पर मामले को रफा-दफा करना चाहते हैं।

इसके पहले भी अनधिकृत टेलीफोन टैपिंग के मामले में पूर्व स‌पा नेता अमर सिंह की बात-चीत और टाटा घराने के प्रमुख रतन टाटा के साथ नीरा राडिया की बात-चीत के रिकार्ड सार्वजनिक होने की वजह से भी केंद्रीय गृह मंत्रालय स‌तर्क हुआ था। अब झारखंड स‌रकार के अधिकारी इस सी डी को फर्जी बात-चीत करार देकर खुद को बचाने की कोशिशों में जुटे हैं ताकि मामले की सीबीआइ जांच की नौबत नहीं आये। वरना उनके पास इस बात की कोई दलील नहीं है कि केंद्र की मनाही के बाद भी इस किस्म की कार्रवाई क्यों हुई। आइ एम सेफ यानी आइएएस और आइ प्ले सेफ यानी आइपीएस लॉबी के लोग झारखंड की दयनीय राजनीतिक स्थिति को अच्छी तरह भांप चुके हैं। इसी का नतीजा है कि वे इस मुद्दे को हर कीमत पर रद्दी की टोकरी में डालना चाहते हैं ताकि आगे पूछ-ताछ न हो और उनकी कुर्सी कायम रहे। विकसित देश ब्रिटेन में ऐसी राजनीतिक दयनीयता की स्थिति नहीं है। एक अखबार के बंद होने के बाद से प्रारंभ हुए विवाद ने राजनेता और मीडिया
गंठजोड़ को नये सिरे से उजागर किया है। जिसके बाद एक के बाद एक खुलासे होने से स‌रकार भी परेशानी में है।
यह भी याद दिला दें कि अमेरिका में इसी टेलीफोन टैपिंग के कारण वाटरगेट कांड हुआ था और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। शायद इसे ही कहते हैं देश और देस का फर्क। जहां कानून की परिभाषा और परिधि भी अलग-अलग लोगों के बदल जाया करती है।

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