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Saturday, October 11, 2008
पूजा का चंदा, भक्तों का धंधा...
नदीम अख्तर
बचपन में चंदे के बारे में सुनता था, तो यही लगता था कि यह एक पुण्य का काम है जिसके चलते लोग बहुत ही श्रद्धा से दान करते हैं और सवाब के हकदार बनते हैं। थोड़ा बड़ा हुआ तो बहुत सारी भ्रांतियां टूटीं। फिर समझने लगा कि चंदा मतलब मौज का इंतजाम। जो लोग पूजा-पंडाल सजाने, प्रतिमाएं स्थापित करने और नाना प्रकार के धार्मिक कार्यों के लिए पैसे इक्ट्ठे करते हैं, उनका ध्येय उन पैसों में से कुछ बचाकर दोस्त-यारों के साथ इन्जॉय करना होता है, ऎसा मुझे किशोरावस्था में लगता था जब मैं स्कूल और कॉलेज के दरम्यान था। मेरे मुहल्ले में भी ईद या फिर मुहर्रम की तैयारियों के लिए चंदे होते थे, एकाध बार मैं भी चंदा कलेक्टरों की जमात में शामिल हुआ था। गर्व के साथ यह कहता था कि हां, आज तो कर लिया हम लोगों ने बाजे का इंतजाम अब लरी-बत्ती के लिए चलो कुछ कढ़ाई-बुनाई करनेवाले करखनदारों के पास। फिर वहां से जो कुछ होता, उसी से गाने बजाने से लेकर मुहल्ले को सजाने तक का इंतजाम हो जाया करता था। कई बार तो अपनी जेब से पैसे लगे, तो इसका बहुत मलाल नहीं होता था, क्योंकि मुझे और मेरे नादान दोस्तों को यही लगता था कि चंदा तो पुण्य का काम है, हम लोग भी इस पुण्य के हकदार क्यों नहीं रहें। खैर, मेरे और चंदे के बीच की दोस्ती चंद दिनों की ही रही। कैरियर और काम का दबाव मुझे मोहल्ले से दूर लेता चला गया और मैं चंदे के बदलते स्वरूप का मूक गवाह बनता चला गया।
फ़िर धीरे-धीरे लड़कपन और किशोरावस्था की जो यादें थीं, उनमें छिपी सारी बातें एक-एक कर गलत साबित होने लगीं। जब जवान होकर अकलमंद कहलाने के योग्य हो गया (वैसे अभी तक पूरी अकल नहीं हुई है मुझे) तो पता चला कि चंदे का अर्थशास्त्र ही दूसरा है। चंदा स्रोत है कई लोगों के लिए अपने परिवार को चलाने का, चंदा वह ईमानदारी है, जिससे हर साल पूजा के बाद एक बस या बड़ी गाड़ी खड़ी हो जाती है, चंदा नाम है उस सुकर्म का जिससे घर के किसी फर्द की पुरातन से पुरातन बीमारी तक ठीक करवा ली जाती है, चंदा वरदान है उन बेघरों के लिए जो किसी एक साल मन से "काम" कर लेते हैं, तो एक फ्लैट खड़ी हो जाती है, चंदा उस चांदी का नाम है, जिसकी चमक कल तक के साइकिल छाप फटीचरों को दिलवा देती है महंगी गाड़ियां।...और इतना ही नहीं चंदा नाम है पान का जिसे चबाते ही मुखड़े का रसूख बढ़ जाता है। और, जब इतनी सारे सामाजिक विभेद को मिटाने वाले दान को रोकने की कोशिश होगी, तो अंजाम भी वैसा ही होगा न जैसा कल विर्सजन के समय रांची के पिस्का मोड़ स्थित रमा मोटर्स के साथ हुआ। क्या मांगा था बेचारे शिव सेना क्लब वालों ने। मात्र 11 हजार ही न। दे दिया होता, तो आज उनके (टाटा की गाड़ियों के शोरूम) प्रतिष्ठान का कबाड़ा तो नहीं हुआ होता न। शिवसेना क्लब वालों पर को ही क्यों दोष देना। भाई उन्होंने तो सीखा है एक प्रांत के नाम से मिलने वाले क्लब से, एक स्वतंत्रता सेनानी के नाम से मिलते जुलते क्लब से और लोक के साथ सच्चाई और अमरत्व का बखान करने वाले क्लबों जैसे कई अन्य से, जिनकी दुहाई ने रांची में व्यवसाय करनेवालों को बाप-बाप बोलवा दिया है।
आज सुबह जब मैंने भाई से न्यूज़पेपर लिया, तो सबसे ऊपर ही देखा कि रमा मोटर्स पर मां के भक्तों के हमले की खबर थी। लाखों के नुकसान की खबर थी और साथ ही साथ उस प्रतिष्ठान के मालिक राजू चौधरी का आक्रोश भरा बयान भी छपा था। दुख तो बहुत हुआ कि एक आदमी तिनका तिनका जुटा कर आपना व्यापार-व्यवसाय खड़ा करता है और कोई गुंडागर्दी कर एक झटके में सबकुछ साफ कर देता है। राजू चौधरी का आरोप है कि विसर्जन करने जा रहे मां के कथित भक्तों ने उनके यहां के सेल के पैसे भी उड़ा लिये। आरोप में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन जो कुछ सामने दिख रहा है उसके अनुसार हकीकत यह है कि रमा मोटर्स में हमला हुआ। और हकीकत यह भी है कि रमा मोटर्स में उन लोगों ने ही हमला किया, जिन्हें चंदा नहीं मिला था। अब सवाल यह उठता है कि क्या चंदे को लेकर कोई नीति है। क्या यह ज़रूरी है कि जो आदमी अच्छा बिजनेस कर रहा है, उसे चंदा या रंगदारी देना ही होगा। क्या पुलिस इस मामले में हस्तक्शेप करने के काबिल नहीं है। क्या जो लोग गुंडा या अपराधी तत्व हैं, उनकी पहुंच इतनी ऊंची है कि उन्हें कानून का राज दिखाया, समझाया ही नहीं जा सकता। और एक सवाल यह भी है कि आज पूजा पंडालों की भव्यता जो हम देखते हैं, उनमें लगे पैसे पूरी तरह से दोहन के होते हैं, तो ऎसी पूजा और भगवान के दरबार को सजाने का ढोंग कहीं से भी किसी भगवान या ईश्र्वर को मंजूर होगा। मुझे नहीं लगता कि आज जैसी पूजा हो रही है और जिस कदर लोगों को तकलीफ पहुंचाकर कुछ शरीफ लोग अपनी कमीज़ में शराफत का स्टार लगा रहे हैं, वो कहीं से भी किसी देवी-देवता स्वीकार करेंगे। बल्कि मुझे तो ऎसा लगता है कि पूजा के दौरान पंडाल-मेले के आयोजनकर्ता लोगों के खून चूस कर भगवान को खुश करने के बहाने अपनी झोली भर रहे हैं। इन परिस्थितियों में मुझे लोकतंत्र पर ही रोना आ जाता है। लगता है कि कम्युनिस्ट शासन ही इस सड़ी-गली व्यवस्था को ठीक कर सकती है। एक बार धार्मिक कार्यों पर निगरानी का डंडा चले, तो ऎसे कथित भक्तों की पतलून सरेआम गीली होती दिखेगी। शहर के जिन लोगों ने पूजा पंडालों का भ्रमण किया है, उनके लिए आयोजनकर्ताओं से सवाल पूछने का समय है कि हरामखोरी के पैसे आखिर भक्ति के पर्याय कैसे बन गये। लोगों के खून चूस कर पंडालों की छद्म भव्यता का आदेश किस भगवान ने दिया था। और अगर खुद में दम नहीं है, तो भीखमंगी करके समाज में अपने आप को ठेकेदार साबित करने की ज़रूरत क्यों आ पड़ी। क्यों....क्यों...क्यों?
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