Friday, August 8, 2008

एक बम मेरे घर




विवेकरंजन श्रीवास्तव


हम बम-बम भोले के पुजारी हैं, हर पूजा पाठ पर बम की तरह नारियल फोड़ते हैं, और विस्फोट के बाद के दृष्य सा हवन करते है। धुएं से कमरे में उपस्थित लोग ऑंखे मलते बाहर निकलते है मानो भीड़ को तितर बितर करने के लिये अश्रु गेैस छोड़ी गई हो, दीवाली हो, न्यू इयर हो या क्रिकेट मैच में कोई विकेट गिरा हो, बम चलाकर खुषी का इजहार करना हमारी परम्परा हैं। बच्चे के जन्म, शादी आदि मौको पर सार्वजनिक रूप से बंदूक दागना बड़ी इज्जत का प्रतीक माना जाता है। कहने का मतलब यह है कि मुंऐ आतंकवादी बेवजह शहर शहर में बम फोड़ते घूम रहे हैं, हम बम से डरने वाले लोग नहीं हैं, हर शादी शुदा हिन्दुस्तानी सजा धजा कर एक एक जिंदा बम अपनी पत्नी के रूप में लिये शान से घूम रहा है। वैसे पत्नी रूपी बम की सही विवेचना की जावे तो मेरे जैसे अल्पज्ञ भी बता सकते है कि पत्नी किसी परमाणु बम से कम नहीं होती, जो बिना चले ही केवल अपने होने के अहसास मात्र से ही ढ़ेरो काम करवा लेती है, जैसे अमेरिका अपने परमाणु बमों के बूते दुनियां पर राज कर रहा है, कुछ इसी तरह मेरी, और जहॉं तक मैं समझता हूँ, ज्यादातर पित्नयां सारी गृहस्थी पर राज करती है। बम बम भोले सबका दाम्पत्य सुखी रखें, यदि गलती से पत्नी रूपी बम फटा तो गृहस्थी तबाह होते देर नहीं लगती। घर परिवार बिखर जाता है। आदमी विक्षिप्त हो जाता है। पत्नी बम, विस्फोट से पहले की तैयारियों में क्या आती हैं, बच्चों को खाना मिलना दूभर हो जाता है, फिर विस्फोट की वे तैयारियां तभी सिमटती है, जब मॉंगे पूरी तरह पूरी हो जावें, और एकाध नई साड़ी, प्रायिष्चत के तौर पर गिफ्ट की जावे। इस तरह कभी-कभी तो मुझे मेरी बम नुमा पत्नी किसी आतंकवादी से कम नहीं लगती, जिसके आतंक के साये में मैं वैसा ही सहमा बैठा हूँ, जैसे जयपुर, बैंगलोर, मुम्बई, अहमदाबाद, सूरत वगैरह वगैरह शहरो की बेगुनाह जनता, जाने किसी मकसद से, जाने किस खुदा की इबादत में, जाने किसकी जान लेने पर तुले हैं, जाने कौन आतंकवादी ? जाने क्यों ? सच तो यह है कि ज्यादातर समय, ज्यादातर पित्नयां बम नहीं, फुलझड़ी की भूमिका में होती हैं, खुद को शनै: शनै: जलाते हुये, घर परिवार, बच्चों, पति को रौशन करती रहती है। और ऐसा होता है परिवार के परस्पर प्रेम से। देश में आज जगह जगह जो बम लटक रहे हैं, मंदिर, मिस्जद, रेलो, ठेलो में विस्फोट हो रहे हैं, उसका मूल कारण देषवासियों में परस्पर प्रेम की कमी ही है। विदेषी ताकतें धर्म के नाम पर लोगों को बरगला रही हैं। इस पर नियंत्रण का एक मात्र उपाय यही है कि प्रेम का बम फोड़ा जावे, विष्वास की आवाज हो, प्रगति का प्रकाष हो, विकास का धमाका हो, आतंक अपने आप दम तोड़ देगा, और आतंकवादी देष की मूल धारा में वैसे ही समाहित हो जावेगें जैसे पित्नयां अपने मायके को भूलकर, अपने घर में रम जाती है।

2 comments:

रश्मि said...

क्‍या उम्‍दा ‍वि‍चार है?

मोनिका गुप्ता said...

विवेक जी आपका आलेख है तो बहुत अच्छा और वर्तमान परिदृश्य को भली भांति बताया है आपने. लेकिन भइया पत्नी की तुलना जो आपने बम से की है उसमे काफी शब्द दिए है लेकिन उसके बाद जो पत्नी का गुणगान किया है उसमे शब्दों की बड़ी कंजूसी कर दी है. अब कमसे कम पत्नी को तो शब्दों से महरूम मत कीजिये.