Friday, August 8, 2008

द्वंद्व में फंसा मध्यवर्ग





प्रमोद

वाह रे बदलता दौर और मध्यवर्ग ! सब-कुछ जानकर भी सत्य से मुंह मोड़ता भारतीय मध्यवर्ग त्रिशंकु की स्थिति में फंसा सच को झूठ और झूठ को सच सिद्ध करने में निरंतर लगा रहता है। आधुनिकता का मोह और संस्कारों को बचाने की चिंता में परेशान रहने वाला मध्यवर्ग न तो संस्कारों को ही बचा सका है और न ही सम्पूर्ण रूप में आधुनिकता को ही अपना सका है। चलो भईया, आख़िर मुझे क्या पड़ी है? अरे! मैं भी तो उसी मध्यवर्ग का हिस्सा हूँ जो संस्कार और आधुनिकता के द्वंद्व में फंसा छटपटा रहा है। यही छटपटाहट मुझे अपनी स्थिति को विश्लेषित करने के लिए प्रेरित कर रही है।
मैंने एक बार यात्रा के दौरान दो प्रबुद्ध मध्यमवर्गीय व्यक्तियों में भी इस छटपटाहट को महसूस किया। मेरे सामने की सीट पर बैठे दो सहयात्री इस बात पर जोर दे रहे थे कि बच्चों को अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा देनी चाहिए। वहीं उन्हें यह चिंता भी खाए जा रही थी की आज के बच्चे रामायण पठन या श्रवण क्यों नही करते। आख़िर रामचरित मानस नैतिक मूल्यों और सामाजिक-पारिवारिक संबंधों के बचाए रखने के लिए एक मानक ग्रन्थ है। सही बात है भाई, हम अंग्रेजी पद्धति की पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ अपने सामाजिक-पारिवारिक ढांचे को भी बचाए रखने का महती कार्य करेंगे। पर बेचारा वह बच्चा जो अपने स्कूल में पिता को 'डैड' और माता को 'माम' पुकारने की शिक्षा पाता है और पिता 'डैड' एवं माता 'माम' सुनकर फूले नही समाते, क्योंकर रामचरित मानस के द्वारा निर्धारित संस्कारगत मूल्यों को समझे। वह शेक्सपियर के द्वारा रचित प्रेम सम्बन्धी मान्यताओं से जुड़कर बड़ा होता है और फ़िर इतना बड़ा हो जाता है कि माता-पिता के साथ संबंधों को सम्बन्ध-मात्र समझ बैठता है।
यह तो एक नमूना मात्र है। वास्तव में यह द्वंद्व अत्यन्त गहरे स्तर पर मौजूद है। मध्यमवर्ग की यह विशिष्ट प्रवृति है की वह एक ओर तो आधुनिकता कि प्रच्छाया को शंकित नजरों से देखता है तो दूसरी ओर उस आधुनिकता का सम्पूर्ण परित्याग भी नही कर पाता। उसे एक ओर यह संस्कारों की सुरक्षा कर सकने में बाधक नजर आता है तो दूसरी ओर बदलती परिस्थितियों में जन्मी आवश्यकताओं का साधक नजर आता है। ऐसे में उसकी गति "भई गति सांप छुछुंदर केरी" वाली हो जाती है, न तो उगलते बनता है और न निगलते। तब शुरू होती है त्रिशंकु वाली स्थिति। न तो मध्यवर्ग पूर्णतया आधुनिक हो पाता है और न ही अपने संस्कारों को बचा पाता है और कभी आधुनिकता पर तो कभी संस्कारों पर झुंझलाता है।
कई परम्पराएँ निश्चित तौर पर बदली है। पहले पुत्र आते -जाते बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेता था और अब हाय-हैल्लो कहकर अपनी ओर से औपचारिकता निभा लेता है। संयुक्त परिवार का स्थान एकल परिवार ले रहा है। यह परम्पराओं के ध्वस्त होने का संकेत है। आधुनिकता तेजी से अपने पैर पसार रही है। ऐसे में भारतीयता की पहचान उसकी परंपरागत संस्कारों के साथ मध्यवर्ग के साथ ही बच रही थी पर वह भी आधुनिकता के चकाचौंध में खोती जा रही है। निश्चय ही अंग्रेजी पढने या अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने में कोई बुराई नही है पर बुराई है अंग्रेजियत को अपनाने में।
एक आधा-अधूरापन मध्यवर्ग के जीवन में गहरे स्तर पर दिखाई पड़ता है। वह बहुत कुछ पाना चाहता है पर इसके लिए कुछ भी खोना नही चाहता। नतीजतन बिना कुछ देखे-सुने अंधी दौड में भागता है, ठोकर खाकर गिरता है, पुनः उठता है और फ़िर ठोकर खाता है। यह ठोकर इसकी नियति बन जाती है और तब वह अपनी चोट को सहलाते हुए पीछे मुड़ता है। अपने आप को छुपाने के लिए परम्पराओं की तलाश करता है पर उसे लगता है की अंधेरे में कुछ आँखें उसका पीछा कर रही हैं और फ़िर वह बदहवास सा भागता चला जाता है।
मध्यवर्ग की यही दोहरी मानसिकता उसके विकास के राह में रोड़े अटकाता है। आधुनिकता के वह नजदीक पहुंचना चाहता है पर उसकी आर्थिक स्थिति भी आड़े आ जाती है और फ़िर वापस लौटने के लिए वह जो बहाना ढूंढ़ता है वह है संस्कार। वह संस्कार का दमन थामने का प्रयास करता है पर नजरे पुनः स्वार्थ संलिप्त आधुनिकता की ओर खिंची चली जाती है और वह फ़िर परंपरागत संस्कारों को छोड़ आगे की ओर बढ़ता है पुनः लौटने के लिए। मध्यवर्ग निरंतर इसी चक्र में फंसा हुआ छटपटा रहा है और छटपटाहट के इस संत्रास से उसे मुक्ति तभी मिल सकती है जब वह एक को पूरी तरह से त्याग दे।


3 comments:

मोनिका गुप्ता said...

वाह प्रमोद जी आपने मध्यवर्ग की दोहरी मानसिकता को बखूबी अपने आलेख में शब्दों के माध्यम से सजाया है.सचमुच आज का मध्यवर्ग आधे अधूरे जीवन शैली से ग्रस्त है.

नदीम अख़्तर said...

आप बहुत अच्छा लिखे हैं. आपसे ऐसी ही रचनाओं की उम्मीद है, जरी रहे सिलसिला

bhoothnath said...

दोहरापन तो आदमी का शायद स्वाभाविक चरित्र है,दरअसल एक-दूसरे को देखने के बाद सबको वही पाने की इच्छा होती है,जो दूसरे के पास है,चाहे अपनी अंटी में उसे पाने की ताकत न हो ,अपनी हैसियत के बाहर कि चीज़ के बारे में आदमी उलटा ही उडाने लगता है ,गोया कि अंगूर न मिलने पर खट्टे ही ना कहलाते है ,तो आदमी का दोगलापन जान भुझ कर ओढा हुआ है !मिले तो ऐसा और ना मिले तो वैसा !!ये जीवन के हर क्षेत्र में है !शायद इसे ही सर्वाइवल कहते हों !?