Saturday, September 6, 2008

वूमन नहीं सुपर वूमन चाहिए

मोनिका गुप्ता
आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण के ढेरो उदाहरण के बावजूद लिंग भेद की िस्थति जस की तस बनीं हुई है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमें वैवाहिक विज्ञापनों में देखने को मिलता है। यदि आप किसी दैनिक अखबार या पत्रिका में प्रकाशित होने वाले विज्ञापन पर गौर करें तो लिंगभेद का सहज एहसास होगा। लंबी, छरहरी, गोरी, सुंदर, कॉन्वेंट एड्यूकेटेड, कामकाजी, घर मैनेज करने वाली और इन सब पर घरेलू । अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं में इन शब्दों से निकलने वाले विज्ञापन यह आभास कराते है जैसे शादी के लिए वूमन नहीं सुपर वूमन चाहिए। आज आदमी संस्कारों से घरेलू लड़की तो चाहता है लेकिन उसे कामकाजी भी होना है, घर को मैनेज करने वाली भी होना है, बच्चों और सास ससुर की देखभाल करने वाली भी होना है। केवल सुपर वाइफ ही नहीं सुपर मॉम, ग्लैमर डॉल, प्रोफेशनल और एक लड़की को बाहर से अंदर तक सभी कामों में दक्ष भी होना है। जिसे अंग्रेजी भी बोलना है और घूंघट में भी रहना है। आज अधिकतर माता पिता या स्वयं लड़का भी अपने लिए ऐसी ही जीवनसाथी की तलाश करता है। महिलाओं के अधिकार, सशक्तीकरण और समानता की बड़ी बातें करने वाले लोग भी जब अपने लिए पत्नी और बहू की तलाश करते है तो ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से परहेज नहीं करते। इन विज्ञापनों के प्रारंभ में वधू की तलाश के लिए निलकलने वाले शब्दों पर गौर करें तो बदलते समय का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई पड़ेगा। वर्ष 1960 में वैवाहिक विज्ञापन में सुंदर और कुंवारी शब्द पर जोर दिया जाता था। विवाह के लिए जाति और नारियोचित गुणों का विशेष ध्यान रखा जाता था। सुंदरता को योग्यता से ज्यादा महत्व मिलती थी। 1970 में इस सोच में थोड़ा बदलाव आया। हालांकि सुंदरता अब भी पहली प्राथमिकता रही। लेकिन उसके साथ आकर्षक व्यक्तित्व कद काठी और अंग्रेजी बोलने वाली लड़कियों (इंग्लिश स्पीकिंग, कॉन्वेंट एड्यूकेटेड) जैसे शब्द जुड़ते गये। 1980 के दशक में भी शारीरिक सुंदरता को महत्व दिया गया। लेकिन साथ ही महिला के लिए कामकाजी (अनिंर्ग वूमन) होना अच्छे वर की चाह करने वालों के लिए आवश्यक हो गई। वहीं 1990 में "सुंदर' और "कुंवारी' शब्द का स्थान "लंबी' और "गोरी' जैसे शब्द ने ले लिया। इस समय प्रशिक्षित और दक्ष लड़कियों की मांग वैवाहिक विज्ञापन में देखने को मिली। सबसे ज्यादा महत्व प्रशिक्षित महिलाओं का था, वहीं शारीरिक सुदंरता अब भी पहली शर्त्त है। 1995 के आसपास वैवाहिक विज्ञापन में लड़कियों का कामकाजी होना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। विज्ञापन में सबसे ज्यादा जोर इसी बात पर दिखाई दिया जाने लगा कि लड़कियां कामकाजी होनी चाहिए और कुंवारी शब्द का महत्व पीछे छूट गया। हालांकि जाति, धर्म, शारीरिक सुंदरता की स्थिति पहले की ही तरह मजबूत रही। यदि आज विज्ञापनों पर नजर दौडाएं तो साफ पता चलता है कि शारीरिक सुंदरता के साथ अब ज्यादा जोर मनी मेकिंग लाइफ पार्टनर के लिए दिया जाता है। फिर चाहे वह दहेज के माध्यम से आये या फिर लड़की कामकाजी हो। बात जहां तक जाति, धर्म और परिवार के लिए है तो इन वैवाहिक विज्ञापनों में 90 फीसदी में इसका महत्व ज्यों का त्यों बना हुआ है।

15 comments:

शोभा कुमारी said...

बिल्कुल ठीक कहा है आपने. आज के युग में लड़के के घर वाले अपने लिए बहू नहीं, बल्कि सुपर बहू चाहते हैं. सब चाहते हैं की जो लड़की मेरे बेटे की वाइफ बने वह कमा के दौलत घर लाये. फ़िर खाना पका के सब को परोसे. फ़िर बच्चे भी पैदा करे और उन्हें पल पोस के बड़ा करे और हाँ ज्यादा जबान नहीं चलाये. इससे भी बढ़ कर ये की अपनी किसी इच्छा को अभिव्यक्त करने की जुर्रत न करे. मतलब आज जिसके घर में लड़का है उसके घर वाले यही सोचते हैं कि मालदार बाप की बेटी मिल जाए, जो अपने घर में फूलों की तरह पाली गयी हो, जिससे उसका रूप रंग निखारा हुआ हो उसी से अपने बेटे की शादी करेंगे और मोटे पैसे लेकर उसको नौकरानी का दर्जा दे देंगे. ये सभी की मानसिकता नहीं, लेकिन 80 फीसदी की यही तमन्ना है.
शोभा कुमारी
12 k/१ सेक्टर 4 धुर्वा, रांची

prashant singh, ranchi said...

मैं भी इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ, लेकिन एक बात तो ये भी है कि कई घरों में आज आग लगी है, तो कारण बहुएँ ही बनी हैं? क्या कहेंगे..

Anonymous said...

एक बिल्कुल सही लिखा हुआ आलेख लिखती रहे जरुरी हैं नर नारी ये बात समझे और जाने और कहे भी

Ravi said...

nice work sis you done a very good work and in this article you used to express the present mentality of society while they are searching for a bridegroom even though they are not thinking that how can a single human being be having this much quality and how a girl be this much versatile............my best wishes carry on and do best than better........

sunil choudhary said...

aap ladkon ke liye yogy hone ki shart rakhate ho. job me hona chahiye. acchi salary wala hona chahiye. kya koi kisi jobless youth se shadi kar sakta hai. nahi na. to monica ji phir kya galat hai ki super woman kao chahta ho.isme harz hi kya hai, sari yogytayen ladkon me hi kyin dekhi jaye. ladikiyin me kyon nahi?

Anonymous said...

great comment sunil
yes all woman need to become self sufficient and also at par and above with man then they should demand equality
WAKE UP INDIA WOMAN

sunil choudhary said...

आप लड़कों के लिए योग्य होने की शर्त रखते हो . जॉब में होना चाहिए . अच्छी पगार वाला होना चाहिये . क्या कोई किसी जोब्लेस यूथ से शादी कर सकती है . नही न. तो मोनिका जी फिर क्या ग़लत है कि सुपर वूमन कोई चाहता हो.इसमे हर्ज़ ही क्या है, सारी योग्यताएं लड़कों में ही क्यों देखी जाए. लड़कियों में क्यों नही?

bhoothnath said...

monikaa ji,aurton ki barabari ki baat karnaa aur baat hai...use apni zindgi ke vyavahaar men shaamil karnaa aur baat ....hamame se kisi ki bhi bahan rah me kisi se baate karti nazar aa jaaye... hamaari asliyat turat baahar aa jaati hai ...hamame se kisi ki biwi oonche swar me aawaaz nikaale hamaara pauroosh jaise jaag jaataa hai... lekhakho ki baato ka bharosaa kyaa... kisi ke bhi ghar me jhaakiye ...wahi sab kuch hai.. kahin daba-dhanka.. kahin ooghdra- nanga.... sach sirf-v-sirf yahi hai ki aurat ko hamne vastoo maanaa hai ...khud aurat ne bhi apne-aap ko waisaa hi banaa liyaa hai ...sundar..saaf-soothri...goyaa ki sajakar rakhne laayak ..ya pakakar khane laayak ....!!mai hairan hu magar mai kya kar saktaa hu,kyunki mai to bhoot hun !!!

bhoothnath said...

मोनिका जी ,औरतों की बराबरी की बात करना और बात है...उसे अपनी जिंदगी के व्यवहार में शामिल करना और बात ....हममे से किसी की भी बहन राह में किसी से बातें करती नज़र आ जाए... हमारी असलियत तुरत बाहर आ जाती है ...हममे से किसी की बीवी ऊंचे स्वर में आवाज़ निकाले हमारा पौरूष जैसे जाग जाता है.. लेखकों की बातों का भरोसा क्या... किसी के भी घर में झांकिए ...वही सब कुछ है.. कहीं दबा- ढंका. कहीं उघाडा - नंगा.... सच सिर्फ़-व्-सिर्फ़ यही है कि औरत को हमने वस्तू माना है ... ख़ुद औरत ने भी अपने-आप को वैसा ही बना लिया है ...सुंदर.. साफ़-सुथरी ... गोया कि सजाकर रखने लायक ..या पकाकर खाने लायक ....!! मै हैरान हूँ मगर मै क्या कर सकता हूँ, क्यूंकि मै तो भूत हूँ !!!

amitesh said...

waiwahik wigyapano ka ek hi pakch apne rakha hai, agar naribodh ki bhawnawon ko thori der ke liye apne se alag rekh denti to enhi wigyapano ek sath war chahiye wale column ki bhi wartaman stihiti dikh jati.aaj ke jamane mai super man se kaam nahi chalta, ladkiyon ke pita ko super man ka baap chahiye. jinke paas paise ke sath sath wo sab kuch ho jinse unki batiyon ki jindgi jannat si ho jaye.

श्रद्धा जैन said...

bhaut achha lekh
jo sabko sochne par majboor kar de ki aakhir kya umeed lagaye hain wo ek ladhki se aur kyu aakhir wo aisa soch rahe hain

sunil choudhary said...

rachna ji
mai bhi is pach me hoon ki nari bhi ek purush ke saman khadi hoo. samnata to hono hi chahiye. purshon ko ye adhikar kisne diya hai dominate karne ka. mujhe jahan tak lagta hai ye adhikar bhi nari ne hi diya hai. par iske piche kahin na kahin surksha ki bhawana rahi hogi. waise bhi dono ke bich sirf itna hi antar hai ki nari physically men se kamzor hoti hai. mentally nahi.

bhoothnath said...

बहुत से लोगों का यह सोचना है कि लड़कों के लिए भी तो यह शर्त होती है कि इतनी पगार वाला ........आदि-आदि,तो लडकी के लिए भी ..............!! मगर ये तो मानना ही होगा कि सदियों से हमने लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग मापदंड तय किए हुए है !जहाँ लड़कों को पूरी आज़ादी और लड़कियों का पुरा दमन किया जाता है ! वैवाहिक जीवन के सन्दर्भ में तौलें तो क्या जो छुट आदमी अपने लिए बिना अपनी पत्नी से पूछे ही ले लेता है,वो छूट पत्नी को देगा ?? आदमी अक्सर क्रोधी,लालची,लूज-टेम्पर,व्यसनी,व्यभिचारी और अन्य भी कई "गुणों"से ओत-प्रोत होता है,क्या उसके लिए कोई शर्त है ??यदि यही "गुण"उसकी पत्नी में पाये जाएँ,तो क्या उसे और उसके परिवार वालों को बर्दाश्त होंगे??निम्नतम आय भी अगर आपकी नहीं है तो क्या शादी के बाद आप अपनी पत्नी और तत्पश्चात उससे होने वाले अपने बच्चों को भूखे मारेंगे ?? यदि माँ-बाप अपनी बच्ची के थोड़े-से सुख के लिए इतनी-सी बात सोचते हैं तो क्या वे पाप करते हैं,पेट भर रोटी देने की निम्नतम शर्त के अलावा वो कभी कहते हैं कि हमारी बिटिया को कम-से-कम निम्नतम सम्मान के साथ रखना??........क्या हम अपनी पत्नियों को वाकई उसका वास्तविक सम्मान या हक़ देते हैं??भाई साहब ये तो गनीमत है कि भारतीय माँ-बाप और उनकी बच्चियां हमारे सम्मुख कोई कठिन शर्त नहीं रखती,वरना स्त्रियों के प्रति हमारी लंद-फंद धारणाओं की बिना पर तो हमारा विवाह होना ही असंभव है!!दूसरे शब्दों में कहूँ तो कहना होगा कि हम तमाम पुरूष रंडवे ही रह जाएँ !!.......क्यों चलेगा क्या??
हम पुरुषों की तमाम खामियों के बावजूद हमारा वैवाहिक जीवन सफल है इसके लिए स्त्रियों को अनंत धन्यवाद दीजिये और अहसान मानिए उन समझदार स्त्रियों का जो हमारी तमाम लंठ-गिरी के बावजूद हमें माफ़ किए रहती है .....इसका १% भी अगर वे हों तो धक्के मार कर हम उन्हें घर से बहार कर देन!!(घर तो हमारा या हमारे बाप का है ना !!)

sunil choudhary said...

भाई भूतनाथ पुरूषों के बारे में आपकी rai जानकर, आपकी बुद्धि पर तरस आती है. आप किस ज़माने के मर्दों की बात कर रहें है. भाई साहब ये पी-४ युग है. जहाँ अब लड़कों-लड़कियों में बहुत जयादा अन्तर नहीं है. कुछ फिजिकल अन्तर ही रह गया है. आप जिन पुरूषों की बात कर रहें है, हो सकता है आप भी उनमे शामिल होंगे. तभी तो नाम बदल कर अपनी बात रख रहें. पहचान छुपकर कुछ भी कहना आसान होता है. पर ये एक कमजोरी को भी दर्शाता है. इसलिए आपके बारे में कहा जा सकता है आप पुरूष ही नही..........है. शादी कर के दोनों साथ रहते है. इसमे कोई किसी पर एहशान नहीं करता.आप क्या गुनी है जो पुरुषों को न जाने क्या-क्या संज्ञा दे रहे है. आप ऐसे है तो सबको कृपया ऐसी श्रेणी में न रखे. परिवार चलाने में दोनों की सामूहिक जिम्मेवारी होती है. येही सफल दाम्पत्य जीवन होता है. वरना ब्रिटनी जैसी भी लड़कियां होती है जो शादी के अगले ही दिन तलाक लेती है.

bhoothnath said...

सुनील भाई, राम-राम ........मैं भूतनाथ वल्द राजीव थेप्रा,शहर रांची,राज्य झारखण्ड,देश भारत ,जाहिर है जीता-जागता मनुष्य हूँ,अगरचे हम वाकई जीने के रूप में मनुष्यता की सारी शर्तें पूरी करते हों!! ......३८ वर्ष का, दो बेटियों का बाप और एक पत्नी का पति हूँ ......जीवन मस्त है ...परिवार खुशहाल ......तीस लोगों का हमारा परिवार,उसके तमाम लोग मस्त ही हैं ....यहाँ बर्तन कम ही खड़कते हैं .....ओवर आल सब बढिया है ......जो देख रहा हूँ और जो भी देखता आया हूँ ....उसके लिए तो जो मैंने लिखा है,वो काफी कम है ..... !!उथला देखने से गहरी चीज़ें दिखायी नहीं देती और सच्चाई .....सच जानिए बड़ी वीभत्स है ....अपनी गलतियों को नज़रअंदाज करना आदमी की फितरत होती है !!बाकि मेरे विषय में तो मेरे जानने वाले ही बेहतर बता सकते हैं,ख़ुद अपने बारे में क्या लिखूं .....बाकि नाम छुपाने की बात रहने दे,सब कुछ बताया भी नहीं जाता !!......औरत क्या है ये हम जाने-न-जाने ....मर्द क्या है इसका खुलासा किसी औरत से ही कर लें ना ......सही बात लिखने का ये अर्थ तो कतई नहीं होता कि लिखने वाले के जीवन में भी वही घट रहा हो .....समझना चाहें तो बात बहुत आसान है ....वरना विवाद ....विवाद करना मेरा उद्देश्य नहीं ...सो मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ ....हम सब सिर्फ़ अपने-आप को व्यक्त करते हैं ....समझने वाला कुछ भी समझ सकता है ....कभी-कभी तकलीफ सामने वाले के बयां से ज्यादा ख़ुद अपने भीतर होती है ... पुरूष का अंहकार तो बड़े-से-बड़ा पहाड़ तोड़ सकता है ...बल्कि भगवान् को भी नीचा दिखा सकता है .....!!