Friday, December 5, 2008

एक प्रजाति, लज्जाविहीन

राकेश कुमार
जी हां, नेताजी कहते हैं। सारी जनता सुनती है और देखती है आतंकवादी विस्फोट में अपनों का बहता खून। क्या कहना! लगता है यह एक धारावाहिक है। सोप ओपेरा। या कह सकते हैं कि एक तरह की सिरीज चल रही है, जैसे क्रिकेट की िसरीज चलती है, उसी प्रकार। हर साल खेल होना है। खेल होता है। और फिर ... कहते हैं...सुनते हैं और देखते हैं का सिलसिला चल पड़ता है।
इन नेताओं की खाल इतनी मोटी हो गयी है कि अब किसी चीज का असर नहीं होता है। उनके अंदर की आत्मा सिर्फ पद और पैसे के लिए जगी रहती है। उसमें व्यक्ति, समाज, राज्य और देश के प्रति कोई लगाव नहीं रह गया है। ये किसी को भी बेच सकते हैं। इन्हें पता ही नहीं चलता की वे क्या बेच रहे हैं। इसी होड़ में यह लगी हुई है यह प्रजाति। जी हां, यह एक किस्म की प्रजाति ही है, जो दिखने में मानव जैसी है, पर व्यवहार में उससे कोसों दूर। आइए जानते हैं कि इस प्रजाति का जन्म कैसे हुआ या हो रहा है।
एक व्यक्ति है। एक बार वह गलती से चुनाव जीत जाता है। नेता बन जाता है। ऐसे ही गठजोड़ की राजनीति में वह मंत्री भी बन जाता है। अब उसके पास बहुत सारी जवाबदेहियां आ जाती हैं। अब जवाबदेही को बचाने के लिए उनको सुरक्षा की जरूरत पड़ती है। और उनके आगे पीछे सुरक्षाकर्मियों की तैनाती हो जाती है। अब वही व्यक्ति आम जनता नहीं रह जाता है। यहां से उसके गुणों में अंतर आना शुरू हो जाता है। अब वह आदमी-आदमी में अंतर करने लगता है। और इस तरह एक नयी प्रजाति का विकास होता है। अब वह अपनी मानव जाति को भूल जाता है।
पहले ऐसी कोई प्रजाति नहीं होती थी। ऐसा माना जाता है कि इनका विकास मानव जाति के एक खास वर्ग के खास कार्य में सफलता को देखते हुए, समय के साथ हुआ है। इस प्रजाति के विकास में लगभग 40-50 वर्षों का समय लगा है। अपने विकास के आरंभिक काल में यह प्रजाति काम करने के प्रति सजग रहती थी। समाज में काम भी होता था। उनमें मानव जाति के अधिकांश गुण मिलते थे। हृदय के धनी और दिमाग के तेज, कर्तव्यपरायण, सजग, कुछ करने की चाहत और देश के प्रति सच्ची भावना। आज भारत में यह सत्तालोलुप, भ्रष्ट, कपटी प्रजाति बहुसंख्य है। ऐसा कहा जाता है कि इसका उदय भारत से ही हुआ होगा, क्योंकि ऐसे लक्षण वाले मानव जाति का वर्णन इतिहास में कभी-कभार मिलता है। देश को गुलाम कराने में इस तरह की प्रजाति का बड़ा योगदान माना गया है। मीर जाफर और जयचंद आज भी इस प्रजाति के आदर्श हैं। कुछ वर्षो बाद, विकासकाल में इनके गुणों में भारी बदलाव आने लगा। आज उपलब्ध प्रजाति के गुणों का पदापर्ण तेजी से हुआ। स्वार्थ की भावना प्रबल होती गयी। आपसी विश्वास क्षीण होने लगा। िदखावटी कार्य करने की चाहत बढ़ती गयी। जबरदस्ती लोकप्रियता पाना इनका प्रमुख कार्य बनता गया। इन पर समस्याओं का प्रभाव कम होता गया। इनकी खाल मोटी होती गयी। बिना काम किये पैसा कमा लेना, इनका मुख्य लक्षण है, इसी काल में दिखाई पडता है। देश के प्रति समपर्ण की सच्ची भावना का ह्रास इसका एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है।
आज के इस मीडिया युग में यह प्रजाति पूरी तरह से निखर गयी है। अब यह हर जगह दिखाई पड़ जाती है। इनके गुणों में व्यापक वृद्धि हुई है। इनकी संख्या भी तेजी से बढ़ती जा रही है। टीवी चैनलों में अपना प्रभाव बराबर दिखाते रहना, इनके पुराने गुण का नवीन संस्करण है। इनमें लोगों को सुनने की क्षमता का ह्रास तेजी से हुआ है। स्वार्थपरायणता का विकास इतनी तेजी से हुआ है कि आज इनका स्वरूप अपने प्रचीन रूप से बिलकुल अलग दिखाई पड़ता है। कभी रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा था, ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी, ये सब तारण के अधिकारी। आज के संदर्भ में नारी को छोड़ दिया जाये, तो बाकी सारे गुण इनमें पाये जाते हैं। शायद तुलसीदास ने भी नहीं सोचा होगा कि मानव के ज्ञान के लिए लिखा गया यह दोहा, किसी एक प्रजाति के गुणों को दर्शाने का काम करेगा।
इसके विकास के कारणों में एक प्रमुख कारण मानव द्वारा इनके कार्यों, व्यवहारों को स्वीकारना, बढ़ावा देना भी है। कालांतर में हुई यह प्रजाति आज मानवता की दुश्मन दिखाई पड़ती है। मनुष्य के विकास में अब ये बाधक की भूमिका निभा रहे हैं। इसलिए जितनी जल्दी हो, इनसे निजात पाने के लिए मनुष्य को कोई न कोई कठोर निर्णय लेकर अमल करने की आवश्यकता है, अन्यथा यह प्रजाति अपने विकास की अंतिम दहलीज को पार कर जायेगी और मानव का अस्तित्व संकट में आ जायेगा।
(लेखक दैनिक प्रभात खबर में कार्यरत हैं)

4 comments:

आनंद कुमार अग्रवाल said...

बिल्कुल ठीक कहा है आपने, यह प्रजाति है ही बेशर्म। इसे देश स‌े कोई लेना-देना नहीं, अपनी जेब भरते हैं और जनता को मूर्ख बनाते हैं। वैसे इसमें आम लोगों का भी कुसीर है, जो ऎसे लोगों को चुनते हैं।

bhoothnath said...

एक प्रजाति, लज्जाविहीन ..............
नदीम भाई, ये तो आपने कह ही दिया ...अब बाकी ही क्या रह गया कहने को...हाँ इतना अवश्य है...ये सब पढ़कर...देखकर...सुनकर...भी तो इन्हें लज्जा नहीं आएगी..... "लज्जा" अरे ये क्या बला है भाई.....!!??

सतीश said...

मुझे लगता है कि नेताओं की जगह अगर रोबोट भी रहेंगे, तो ज़्यादा अच्छे तरीके स‌े देश चलेगा। राकेश भाई को इस लेख के लिए स‌ाधुवाद.

Anonymous said...

very good indeed the approach of the writer