Thursday, January 29, 2009

रात,खो गया मेरा दिल!!

कल रात ही मेरा दिल चोरी चला गया,
और मुझे कुछ पता भी ना चला,
वो तो सुबह को जब नहाने लगा,
तब लगा,सीने में कुछ कमी-सी है,
टटोला,तो पाया,हाय दिल ही नहीं !!
धक्क से रह गया सीना दिल के बगैर,
रात रजाई ओड़ कर सोया था,
मगर रजाई की किसी भी सिलवट में,
मेरा खोया दिल ना मिला,
टेबल के ऊपर,कुर्सी के नीचे,
गद्दे के भीतर,पलंग के अन्दर,
किसी खाली मर्तबान में,
या बाहर बियाबान में,
गुलदस्ते के भीतर,
या किताब की किसी तह में,

और आईने में नहीं मिला
मुझे मेरा दिल !!
दिल के बगैर मैं क्या करता,
घर से बाहर कैसे निकलता,

मैं वहीं बैठकर रोने लगा,
मुझे रोता हुआ देखकर,
अचानक बेखटके की आवाज़-सी हुई,
और जब आँखे खोली,
तो किसी को अपने आंसू पोंछते हुए पाया
देखा तो,
सामने अपने ही दिल को
मंद-मंद मुस्कुराते पाया,
दिल से लिपट गया मैं और पूछा उसे,
रात भर कहाँ थे,
बोला,रात को पढ़ी थी ना आपने,
गुलज़ार साहब की भीगी हुई-सी नज़्म,
मैं उसी में उतर गया था,
और रात भर उनकी नज्मों से

बहुत सारा रस पीकर

मैं आपके पास वापस आ गया हूँ.....!!

6 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

अत्यन्त सुंदर अभिव्यक्ति , भावनाओं की धरातल पर संवेदनात्मक उपस्थिति अच्छी लगी , बधाईयाँ !

रवीन्द्र प्रभात said...

अत्यन्त सुंदर अभिव्यक्ति , भावनाओं की धरातल पर संवेदनात्मक उपस्थिति अच्छी लगी , बधाईयाँ !

परमजीत बाली said...

बहुत उम्दा रचना है।बहुत गहरे उतर गई।

दर्पण साह said...

भूतनाथ जी गुलज़ार तो गुलज़ार हैं. और शुक्र है आपका दिल वापस तो आ गया.
यहाँ तो दिल....

...जब बच्चा था तो भाग भाग के
.... जंगल जंगल..... , लकड़ी की काठी बीनने जाता था.
माँ ने कई बार मारा...
शिकायत करने फ़िर उनके पास...
क्या पता कर दे कुछ जादू?
...बुगली झिगल झाई

और फ़िर जब जवान हुए,
तो लगा तेरे बिना ज़िन्दगी ज़िन्दगी नही....,
दिल भी टूटा तो गुलज़ार साहब के पास चले गए दिल के दोनों टुकड़े 'उसकी' शिकायत करने, कहा तो था गुलज़ार सा'अब ने ( मुझसे ही कहा यूँ लगा मुझे) राह पे चलते हैं.....
तमन्ना तो अब भी है....
फिर से अइयो बदरा बिदेशी.
वाकई खूब लिखा आपने....
आप और मुझ, दोनों में गुलज़ार L.C.M. (न्यूनतम समापवर्तक ) है.
इस उत्कृष्ट लेख के लिए बधाई स्वीकारें....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर लिखा है आपने

दर्पण साह said...

@ भूतनाथ जी बता दीजिये आपका घर NCR से कितना दूर पड़ेगा. अपने माँ और अपनी यादें से तो हम भी दूर हैं हो सकेगा तो आपके से ही मिल आयंगे. और वैसे भी सबकी माँ एक ही स्कूल से पढ़ी होती हैं......