Tuesday, February 17, 2009

मंदी के बहाने बेनकाब हिंदी मीडिया

अभिषेक श्रीवास्तव

ऐसा शायद भारतीय हिंदी मीडिया के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. चाहे वे अखबार हों, पत्रिकाएं या खबरिया चैनल, छंटनी का अभियान चारों और धड़ल्‍ले से जारी है. जाहिर है पिछले एक दशक के दौरान भारत ने मीडिया का उभार बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी की खाद के सहारे होते देखा है. वही दौर बाजार में उछाल का गवाह भी रहा है. यह बात कई बार कही जा चुकी है कि उदारीकरण के दौर में जो निजी मीडिया अस्तित्‍व में आया, वह पूरी तरह बाजार से संचालित होता रहा है. लेकिन मीडिया के स्‍वयंभू झंडाबरदार खुद पर सवाल न लगे, इस कारण से इस तथ्‍य को झुठलाते रहे हैं.

अमेरिका के वॉल स्‍ट्रीट से शुरू हुई तथाकथित वैश्विक आर्थिक मंदी ने इस प्रस्‍थापना को सिद्ध कर दिया है कि मुख्‍यधारा का मीडिया पूरी तरह बाजार पर आधारित है और इसके कंटेंट से लेकर रूप तक सब कुछ बाजारू ताकतों के हितों को पुष्‍ट करता है. इस बात को समझने के लिए एक नजर पिछले आठ साल यानी 2000 से लेकर 2008 तक भारत में मुख्‍यधारा के मीडिया के विकास पर डाल लें और उसके बाद पिछले तकरीबन तीन-चार महीनों में यहां हुई छंटनी की वारदातों के बरअक्‍स रख कर देखें.

बात शुरू होती है पिछले साल अक्‍टूबर से, जब 'सियार आया-सियार आया' की तर्ज पर भारत में मंदी के आने का एलान किया गया. किसी को तब तक उम्‍मीद नहीं थी कि विनिर्माण और निर्यात के क्षेत्र को छोड़ कर बहुत बड़ा असर किसी अन्‍य उत्‍पादक या सेवा क्षेत्र पर पड़ेगा. लेकिन कम ही लोग यह समझ पा रहे थे कि तीन-चार साल पहले टाइम्‍स समूह द्वारा प्राइवेट ट्रीटी में निवेश का जो खेला शुरू किया गया था, उसकी मार अब दिखाई देगी.
उस वक्‍त तमाम लोगों ने टाइम्‍स समूह के इस कदम की आलोचना की थी कि उसने निजी कंपनियों और निगमों में पूंजी निवेश के लिए एक कंपनी का निर्माण किया है, हालांकि कई ने यह भी कहा था कि भारतीय मीडिया में ट्रेंड सेटर तो यही प्रतिष्‍ठान रहा है और आगे चल कर कई अन्‍य मीडिया प्रतिष्‍ठान इसी की राह पकड़ेंगे. लिहाजा, बड़ी चोट टाइम्‍स समूह के कर्मचारियों को लगी जब टाइम्‍स जॉब्‍स डॉट कॉम और इस समूह के अन्‍य पोर्टल से करीब 500 लोगों से चुपके से इस्‍तीफा लिखवा लिया गया और खबर कानों-कान किसी तक नहीं पहुंची. इसके बाद दिल्‍ली के मीडिया बाजार में हल्‍ला हुआ कि यह समूह 1400 पत्रकारों की सूची तैयार कर रहा है जिनकी छंटनी की जानी है. यह महज शुरुआत थी. तब तक अन्‍य मीडिया प्रतिष्‍ठानों में छंटनी की कोई घटना नहीं हुई थी.
अचानक पत्रकारों को नौकरी से निकाले जाने के मामलों की बाढ़ आ गई. अमर उजाला ने पंजाब में कई संस्‍करण बंद कर डाले. एक दिन रोजाना की तरह सकाल टाइम्‍स के करीब 70 कर्मचारी जब दिल्‍ली के आईटीओ स्थित अपने दफ्तर पहुंचे, तो उन्‍हें दीवार पर तालाबंदी की पर्ची चस्‍पां मिली. दैनिक भास्‍कर ने कई पत्रकारों को इधर-उधर कर दिया और जंगल की आग की तरह खबर फैल गई कि सियार आ चुका है.
मंदी का सियार नवभारत टाइम्‍स में तब से लेकर अब तक करीब दस पत्रकारों को निगल चुका है. काफी जोश-खरोश से फरवरी 2008 में शुरू किए गए हिंदी के इकनॉमिक टाइम्‍स में आठ लोगों की सूची तैयार कर दी गई और तीन को बख्‍शते हुए पांच को उनके घरों का रास्‍ता दिखा दिया गया. ये सारे ऐसे डेस्‍क पर काम करने वाले नए पत्रकार थे जिनका वेतन शुरुआती पांच अंकों में था.

सबसे शर्मनाक घटना तो हिंदुस्‍तान दैनिक में हुई जब एक साथ 13 पत्रकारों को बगैर कोई कारण बताए बाहर कर दिया गया. ये सभी 20 से 30 साल से हिंदुस्‍तान टाइम्‍स समूह के कारिंदे थे. दूसरे, इनमें से सभी मैदानी इलाकों के रहने वाले थे.
यह प्रक्रिया अब भी जारी है और खबरें हैं कि एकाध नए चैनलों की भ्रूण हत्‍या होने वाली है और हिंदी के बिजनेस अखबार अपना बोरिया-बिस्‍तर समेटने वाले हैं.
सवाल उठता है कि क्‍या सचमुच भारतीय मीडिया पर मंदी का असर है या यह सिर्फ एक बहाना भर है. हफ्ता भर भी नहीं हुआ है कि कुछ बड़े पत्रकार अमेरिकी परिपाटी पर केंद्र सरकार से मीडिया के लिए राहत पैकेज मांगने गए थे. चुनावी साल में सरकार ने सबसे तेज कदम उठाते हुए अखबारी कागज पर तमाम किस्‍म के शुल्‍क हटा दिए. जिस दिन यह खबर आई, उसके अगले ही दिन टाइम्‍स ग्रुप से एक और शुरुआती पांच अंकों वाले पत्रकार को चलता कर दिया गया.
यह सही है कि विज्ञापनों से आने वाले राजस्‍व में भारी कमी आई है, लेकिन वैश्विक मंदी का असली असर अर्थव्‍यवस्‍था के उस क्षेत्र पर पड़ा है जहां वित्‍तीय पूंजी का नंगा नाच चलता है और जो सिर्फ सट्टेबाजी में लगाई जाती है. जाहिर है, जो समूह स्‍टॉक एक्‍सचेंज में सूचीबद्ध होंगे, उन्‍हें कुछ ज्‍यादा असर पड़ सकता है, लेकिन ऐसे कम ही हैं.

(इस रिपोर्ट की दूसरी कड़ी पढ़िये रविवार.कॉम में। यह रिपोर्ट भी रविवार स‌े ही स‌ाभार ली गयी है। रिपोर्ट के लिए आलोक पुतुल जी और अभिषेक श्रीवास्तव जी को स‌ाधुवाद।)

3 comments:

राजेश कुमार said...

मुझे लगता है कि मीडिया में मंदी के असर की ऑडिटिंग होनी चाहिए। आज स‌े आठ माह पूर्व जब मंदी का असर इस पेशे पर नहीं था (अभी भी नहीं ही है।) तब मीडिया स‌मूहों की आमदनी कितनी थी और अब जबकि मंदी का हौवा खड़ा किया गया है, कितनी राशि आ रही है। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाये। मेरा मानना है कि बाज़ार को भी परिपक्वता दिखाते हुए उन मीडिया स‌मूहों में मानव शक्ति की कमी के कारण 'प्रोडक्ट' में आ रही कमियों को उजागर करना चाहिए, जहां वे विज्ञापन देते हैं। इससे स‌मूहों पर अच्छा प्रोडक्ट निकालने का दबाव पड़ेगा, जो अंततः लोगों की बहाली की दिशा में ही मीडिया स‌मूहों को कदम उठाने पर मजबूर करेगा।

समीर सृज़न said...

ये सूरत-ऐ-हाल सिर्फ़ हिन्दी मीडिया का नही...मीडिया की सारी विधा का यही हाल है..मंदी की इस दौर में जिसने भी उम्मीद का दामन नही छोड़ा वही आगे जाएगा.. उम्मीद की जानी चाहिए की मीडिया के दिन भी बहुरेंगे बस ये देखना है इंतजार कितना लंबा है...

Science Bloggers Association said...

ऐसा होने का कोई कारण तो समझ में नहीं आता। पर ऐसा हुआ है, इसलिए इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता। कारण क्‍या है, ये तो ईश्‍वर ही जाने।