Friday, February 6, 2009

अखबार से निकाले जाते ये बेचारे...

मोनिका गुप्ता
मंदी ने तो जैसे लोगों का जीना ही हराम कर रखा है। किसी न्यूज चैनल को देख लें या फिर कोई अखबार उठाकर पढ़ लें। ऐसा कोई दिन न होगा जिसमें आपको मंदी की मार, मंदी का प्रभाव, मंदी के कारण छंटनी आदि आदि पढ़ने, देखने और सुनने को ना मिले। हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की गई जिसमें बताया गया कि वर्ष 2008 के आखिरी तीन महीनों में पांच लाख लोगों की नौकरियां गयी और आने वाले समय में पूरे विश्व में पांच करोड़ लोगों के बेरोजगार होने की आशंका जतायी गयी। इससे देश के युवा और कामगार इतने ज्यादा भयभीत हो गये कि दिन-रात नौकरी बचाने के बारे में सोचने लगे। देश के इतिहास में यह पहला मौका है, जिसमें एक स्नातक को कम पढ़े लिखे लोगों की तुलना में नौकरी खोजने की इतनी ज्यादा चिंता होगी। अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में तो तथाकथित मंदी का बहाना बनाकर बहुत पहले ही छंटनी करनी शुरू कर दी गई। देश के विभिन्न हिस्सों से मजदूर काम छोड़कर घर लौट आये। कई कंपनियों में तो हजारों की संख्या में कर्मचारियों को निकाल दिया गया। अब बड़ी-बड़ी कंपनियों में छंटनियां हो रही हों, तो मीडिया हाउस कैसे पीछे रह सकता है। सो उसने भी अपने कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया। इस क्षेत्र में सबसे पहले गाज गिरी विज्ञापन विभाग के कर्मचारियों पर। जो विज्ञापन लाने में अक्षम रहे उन्हें सबसे पहले बाहर का रास्ता दिखाया गया, क्योंकि मालिक अब कंटेट इज द किंग की पुरानी अवधारणा पर विश्वास नहीं करते। उन्हें पता है कि बाजार में बने रहने के लिए मनी इज द किंग का अनुसरण करना बेहद जरूरी है। इसी मंदी का शिकार होकर सकाल टाइम्स दिल्ली का ऑफिस बंद हो चुका है और टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, प्रभात खबर सरीखे अखबारों में छंटनियां जारी है। अब बात करते है कि संपादकीय विभाग की। जब छंटनी हो रही हो तो इनपर भी गाज गिरना स्वाभाविक है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि गाज गिरेगी तो किस पर। जाहिर है उनपर जो कमज़ोर हों, जिनकी भूमिका कंपनी या फिर व्यक्ति विशेष के लिए मायने नहीं रखती या फिर जिसकी कंपनी के ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों से नहीं बनती। इन सब के बीच इस बात पर गौर करना बेहद जरूरी है कि जिस किसी मीडिया हाउस में छंटनियां हो रही हैं, वहां छंटनी के शिकार 5000-15000 रुपये मासिक कमाने वाले लोग हैं। गौर करने लायक बात यह है कि जिस मीडिया हाउस का सालाना टर्न ओवर करोड़ों का हो वहां इस स्तर के कर्मचारियों को हटाने से क्या फायदा होगा। जबकि इस स्थिति में भी मासिक 50,000-1,00,000 कमाने वाले कर्मचारियों की नौकरी बरकरार है। ऐसे में मुख्य मुद्दा यह है कि जब प्रोडक्शन की बात होती है तो निचले स्तर के कर्मचारी याद आते हैं और जब क्रेडिट लेने की बात होती है तो ऊपर के लोगों की पीठ ठोंकी जाती है। लेकिन मंदी का शिकार यदि कोई बनता है तो वह है प्रोडक्शन में सबसे अधिक योगदान देने वाला कर्मचारी।

7 comments:

जयंती कुमारी said...

हां, आपने बिल्कुल ठीक लिखा है। यहां ऊपर के पदों पर बैठे लोग हजारों-हजार रुपया ऐंठ रहे हैं और नीचे के लल्लू-पंजुओं को निशाना बनाया जा रहा है। मुझे तो यह भी जानकारी है कि रांची के पुराने और नामी और अखबार में लोगों को आपसी दुश्मनी साधने के लिए दो गुटों के लोगों के द्वारा चिन्हित कर-कर के प्रताड़ित किया जा रहा है। काम से निकालने की धमकियां दी जा रही हैं और कुत्तों की तरह खटवा कर काम करवाया भी जा रहा है। महिलाओं पर भी गाज गिरी है। इधर से उधर और उधर से इधर करके आर्थिक मंदी के नाम पर खूब होली खेली जा रही है। मुझे तो शक है कि कहीं...

योगेश भारती said...

सच्ची कितना गंदा हो रहा है ना। मैं तो स्तब्ध हूं कि कहीं मेरी भी न चली जाये... नौकरी। वैसे मैं यह जानता हूं कि मेरी चाटूकारिता की जो आदत है, वो मुझे नौकरी में बनाये रखेगी। आखिर मैं भी तो हूं बॉस का चमचा.....हीहहाहहाहहीहा.....

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

aapki aur jayanti ji kee baaton se main sahamat hoon....!!

आशीष said...

खून तो खून है गिरेगा तो जम जाएगा
जुर्म तो जुर्म है बढ़ेगा तो मिट जाएगा

इंतजार किजीए बादल के दूर हटने का

अखिलेश सिंह said...

मंदी तो बहाना है, कम खर्चे में ज्यादा काम करवाने के बहाना यहाँ प्रबंधन को मिल गया है. बहाने बनाकर पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है ..जाहिर है ऐसे में प्रबंधन के चमचो की ही नौकरी बचेगी....

महामंत्री - तस्लीम said...

देखिए, यह मंदी किस किसकी जान लेती है।

संगीता पुरी said...

जीवन के मध्‍य नौकरी से निकाले जाने पर लोग क्‍या करेंगे.......मेरे ख्‍याल से सभी लोगों के तनख्‍वाह को कुछ प्रतिशत कम करके भी तो खर्च को समायोजित किया जा सकता है।