Saturday, May 9, 2009

मां तुझे सलाम...

डॉक्टर भारती कश्यप ने एक बार फिर अपनी सहृदयता का परिचय देते हुए मां के जज़्बे को सलाम करनेवाला एक खूबसूरत सा तोहफा रांचीहल्ला को भेजा है। वैसे तो उनकी सीडी एक दिन पहले ही मिली थी, लेकिन तबियत नासाज़ रहने के चलते मैं इसे कल ही पोस्ट नहीं कर पाया, इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। डॉ भारती कश्यप एक अद्भुत प्रतिभा की धनी हैं, जिसका अंदाजा दुनिया भर की मांओं की समर्पित इस स्लाइ़ड शो से हो जाता है। रांचीहल्ला सलाम करता है दुनिया की एक एक मां को और मां के जज़्बे को। मां तुझे सलाम....!!

8 comments:

मोनिका गुप्ता said...

मां को शब्दों या चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करना तो असंभव है। साथ ही इस दुनिया में मां की उपस्थिति किसी विशेष दिन के द्वारा दर्ज नहीं की जा सकती। लेकिन दुनिया में हर किसी की मां को रांचीहल्ला का चरणस्पर्श, जिसके माध्यम से डॉ. भारती कश्यप ने मां की उस छवि को आवाज दी है जिसके कारण युग-युगांतर से समाज में नैतिक मूल्य स्थापित हो रहे है। जिसके मार्गदर्शन में ही मानवता बची हुई है। जिसकी ममता की छांव ही आदमी को आदमी बनाती है।

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर .. डा भारती कश्‍यप की सहृदयता तो हमलोग भी देख ही चुके हें .. बहुत अच्‍छा लगा था उनसे मिलकर।

जयंती कुमारी said...

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है। लाजवाब लगा ये शो। मेरी तरफ से भी मां तुझे सलाम....

योगेश भारती said...

nice tribute to the Mothers all over the world. thanks Mam!!

कोमल शर्मा said...

hi, This is komal here. WOW What a good Show. Thanks to you all. Folks you have made my soul cry for my mother through this slide show. I LOVE YOU MOM....

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

मां तुझे सलाम... इस रचना की चर्चा समयचक्र में . बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण . बधाई

हिमांशु । Himanshu said...

बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति । माँ को नमन ।

भूतनाथ said...

माँ के बारे में मैं क्या कहूँ अब.........आँखे नम हो जाती हैं माँ की किसी भी बात पर........दरअसल माँ का कृत्य इतना अद्भुत होता है कि उसका पर्याय धरती पर ना कभी हुआ और ना कभी हो भी सकता है......आदमी की सीमितताओं के बीच भी माँ जिन कार्यों को अपने जीवन में अंजाम देती है....वह उसे एक अद्भुत व्यक्तित्व में परिणत कर देते हैं....माँ सृष्टि का ही एक व्यापक रूप है.... माँ प्रकृति का ही इक पर्याय है....माँ अपनी ससीमताओं के बावजूद भी एक असीम संरचना है....मगर सच तो यह है कि आप जब आप माँ के बारे में कुछ भी कहने बैठते हो तो आपके तमाम शब्द बेहद बौने लगने लगते हैं.....सृष्टि के आरम्भ से ही धरती पर विभिन्न तरह के जीवों की प्रजातियों में माँ नाम की इस संज्ञा और विशेषण ने अपनी संतान के लिए जो कुछ भी किया है... उसके सम्मुख अन्य कुछ भी तुच्छ है....और आदमी की जाति में तो माँ का योगदान अतुल्य है...........!!!
माँ के बारे में आप यह भी नहीं कह सकते कि उसने हमारे लिए कितना-कुछ सहा है....सच तो यह है कि हम तो यह भी नहीं जान सकते कि उसे इस "कितना-कुछ" सहने में भी कितना अनिर्वर्चनीय सुख.....कितना असीम आनंद प्राप्त होता है.....आप तनिक सोचिये प्रकृति की वह सरंचना कैसी अद्भुत चीज़ होगी.....जो अपनी संतान को पालने में आने वाली हर बाधा को अपनी सीढ़ी ही बना लेती है.....संतान के हर संकट को खुद झेल लेती है....संतान के हर दुखः में चट्टान की तरह सम्मुख खड़ी हो जाती है....और तो और इस रास्ते में आने वाले तमाम दुखः और तकलीफ भी उसके आनंद का अगाध स्रोत बन जाते हैं....जबकि आदमी की आदिम प्रवृति दुखों से पल्ला झाड़ने की होती है.....!!
दोस्तों....!! माँ की बाबत हम कुछ भी लिखें....बेहद-बेहद-बेहद कम होगा.....एक मादा,एक औरत के रूप में चाहे जैसी भी हो,माँ के रूप में तो वह अद्भुत ही साबित होती है(मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा.....जो इस मामले में संभव हैं)............आदमी की जात को इस बात के लिए ऊपर वाले का सदा कृतज्ञ रहना चाहिए कि उसे हर घर में....हर परिवार में माँ के रूप में एक ऐसी सौगात मिली है....जिसका बदला वह जन्मों-जन्मों तक भी नहीं चुका सकता....!!
और बस इसी एक वजह से उसे समूची स्त्री जाति की अपार इज्ज़त करनी चाहिए... और जो खुन्नस उसके मन में स्त्री के प्रति किसी भी कारण से मौजूद है....तो उसे उन कारणों की ही पड़ताल करनी चाहिए....ताकि तमाम प्रेम-संबंधों और दैहिक-संसर्गों के बावजूद आदमी और औरत के बीच जो कुहासा है....वो छंट सके.....स्त्रीत्व के मूल्य स्थापित हो सकें.....आदमियत अपना गौरव पा सके....और स्त्री अपना खोया हुआ वजूद......!!