Friday, July 24, 2009

और कितनी लड़कियों के कपड़े खोलोगे

मोनिका गुप्ता
इस देश में स्त्री जाति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि जब तक वो देवी नहीं बन जाती तबतक पूजनीय नहीं बनती। यूं तो इस देश में कोई ऐसा त्योहार या उत्सव नहीं होता, जब नारी को महिमामंडित नहीं किया जाता। बुद्धिजीवियों की ऐसी कोई सभा नहीं होती, जहां नारी गरिमा का बखान नहीं किया जाता, लेकिन इसी देश में ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा जाता जब स्त्री को बेइज्जत नहीं किया जाता। असम में पिछले साल एक आदिवासी लड़की को सरेआम निर्वस्त्र कर दिया गया था। उस समय मीडिया वालों ने खूब कवरेज किया। तीन-चार महीने तक उसे दिखाते रहे। उड़ीसा के कंधमाल में भी एक सिस्टर के साथ दुष्कर्म किया गया था और उसे अर्द्धनग्न अवस्था में सड़कों पर निकाल दिया गया था। कल की ही बात है कि पटना में भी कुछ ऐसा ही तमाशा हुआ। पटना के एग्जीविशन रोड में एक लड़की को वहशी भीड़ द्वारा सरेआम निर्वस्त्र किया गया। इस जगह से कुछ दूरी पर ही स्थानीय थाना पड़ता है, लेकिन 45 मिनट के इस तमाशे की खबर थाने को नहीं हुई। सैकड़ों लोगों की भीड़ इस लड़की के शरीर से हटते कपड़े पर अपनी आंख सेंकती रही, लेकिन किसी ने मदद करने की कोशिश नहीं की। पब्लिक तो फिर भी पब्लिक है, मान लें कि उस समय वहां मौजदू लोगों ने अपनी आंखों की शर्म बेच दी हो, मान लें कि उस भीड़ का हिस्सा बनने में मौजूद लोगों की आत्मा मर चुकी हो, मान लें कि ओछी और गंदी मानसिकता के साथ वहां के लोगों ने इस तमाशे को देखा हो और उसकी चर्चा भर की हो, मान लें कि किसी डर से कोई मदद के लिए आगे नहीं आया हो, लेकिन यह कैसे मान लें कि इस घटना को कवर करने वाले मीडियाकर्मी भी इसी श्रेणी के हों। ये कैसे मान लें कि 45 मिनट के इस तमाशे में किसी मीडिया कर्मी को इस बात की सुध न रही हो कि पुलिस को सूचित करें, या मदद के लिए आगे आयें
; लेकिन उनसे इन सभी बातों की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यदि ऐसा हुआ होता तो 45 मिनट के इस तमाशे को हर चैनल वाले लगातार छह से आठ घंटे तक कैसे दिखाते। टीआरपी कैसे बढ़ती। पीठ कैसे ठोंके जाते, शाबाशी कैसे मिलती और इस घटना को कैमरे में कैद करके बार-बार उसे देखने का सौभाग्य कैसे मिलता। इन सभी (अ)मानवीय सुखों से तो वंचित हो जाते ना। इसलिए ऐसा कुछ नहीं हो सका। इसलिए समाचार प्रसारित करते समय इस त्रास्दी के संदर्भ में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, भारी भरकम शब्दों का प्रयोग करने वाले मीडिया वालों की आंखों की शर्म कहां बिक गयी। क्यों उन्हें इस बात की सुध नहीं हुई की नपुंसकों की इस भीड़ में वे ही अकेले पौरुष दिखायें। इस तरह की घटनाओं को कवर करनेवाले और छह से आठ घंटे तक चैनलों में दिखाने वाले क्या ये नहीं सोचते कि कभी उस जगह उनके घर की बहू-बेटी भी हो सकती है। कौन देखना चाहता है ऐसी खबरों को। किसके लिए परोस रहे हैं ये सब। क्या उसी भीड़ की मानसिकता वाले लोगों के लिए।

10 comments:

नदीम अख़्तर said...

मीडिया के साथियों को ज़रा ऐतराज होगा, यह मैं जानता हूं, लेकिन हकीकत यह है कि-
मीडिया के लोगों ने एक वाक्य गढ़ लिया है-हम अपना काम कर रहे हैं, आप अपना कीजिये... बेशर्मी के साथ कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले इस तरह के कृत्यों को अंजाम भी दिलवाने में पीछे नहीं रहते। कई मामले ऐसे सामने आये हैं, जिनमें मीडियाकर्मियों की संलिप्तता से न्यूज़ बना कर लोगों तक परोसा गया है। अब ज़रा इस खबर पर गौर कीजिए। मीडिया की उपस्थिति में अगर किसी लड़की के कपड़े खोले जा रहे हैं, तो आप उस समय भी इसी सिद्धांत का पालन करें कि वो अपना काम कर रहे हैं, मैं अपना काम कर रहा हूं.. आप बुद्धिजीवी हैं, आपको समाज का आईना कहा जाता है। आप ही मूढ़ता प्रदर्शित करेंगे, तो आपमें और गदहे में क्या अंतर रह जायेगा। गदहा भी यही करता है। धोबी कपड़े धोता है, गदहा उसे लाद कर लाता-ले जाता है। आप गदहे नहीं हैं, जो आपको पता नहीं कि क्या हो रहा है। अरे जिस समय लड़की भाग रही थी, उसी समय आपने उसे सुरक्षा क्यों नहीं दी? किसी मीडिया वाले की बहू-बेटी होती, तो क्या कैमरा वैसे ही चलता रहता या वहां एक तोड़ मार हो गया होता कुछ भी होने से पहले ही। सच्चाई को सामने लाने के लिए संवेदना को साइडलाइन करना होता है, यह तो ठीक है लेकिन किसी शर्मनाक घटना को होने से बचाने के लिए संवेदना को भी दिल में जगह देनी होगी। खैर, भारत में मीडिया को मिली छूट का जो बेजा इस्तेमाल हो रहा है, वह आनेवाले दिनों में इस देश को कहां ले जायेगा, इसका आकलन अभी जल्दबाजी होगा।

नीरज गोस्वामी said...

मीडिया कर्मी अगर सिर्फ जो हो रहा है उसे दिखाने के लिए ही हैं तो किसे जरूरत है उनकी....क्या वो इंसान नहीं, आप ने सच कहा कम से कम इंसानियत के नाते ही वो पुलिस को बुला सकते थे...हम और हमारी शर्म किस हद तक गिर चुकी है...
नीरज

Anonymous said...


why just media even on blogs all those wo try to write on woman issues are treated with an attitude .

अंशुमाली रस्तोगी said...

नदीमजी, हमें मीडिया के ऐतराज से कहीं ज्यादा समाज के ऐतराज पर ध्यान देना चाहिए। दरअसल, ऐतराज की भूमिका में मीडिया और समाज दोनों एक ही प्लेटफार्म पर खड़े दिखाई देते हैं। सबकुछ को देखते और हंसते हुए। खासकर कपड़े फटती महिलाओं में इन्हें वही सबकुछ नजर आता है।
उक्त खबर शर्मनाक है। पर उस बेशर्मी का क्या कीजिएगा जिसे समाज ने आत्मसात किया हुआ है।
मोनिका की यह बात काबिले-गौर है, "सैकड़ों लोगों की भीड़ इस लड़की के शरीर से हटते कपड़े पर अपनी आंख सेंकती रही, लेकिन किसी ने मदद करने की कोशिश नहीं की।"

निशाचर said...

इन मीडिया वालों की खुद की मां-बहन के साथ (ईश्वर न करे) ऐसा हो रहा होता तो क्या ये उसकी तस्वीर उतारते हुए ये जुमला उछाल पाते "हम तो अपना काम कर रहे हैं". इन्होने एक मर्यादित और रचनात्मक पेशे को गलीचता के गर्त में धकेल दिया है.

अपनी गाडी पर नंबर की जगह "प्रेस" लिखवाकर बीवी बच्चों को सैर कराते हैं और दूसरों की गाड़ी का चालान न होने पर पुलिस को भ्रष्ट बताते है. खुद "प्रेस" का परिचयपत्र दिखाकर दुनिया - जहान में रौब ग़ालिब करते फिरते हैं और अधिकारियों और नेताओं की लाल बत्ती से ऐतराज जताते हुए घंटों कुकरहांव मचाते हैं. शराब और बोटी के लालच में नेताओं की पार्टियों में बिन बुलाये भी पहुँच जाते हैं और समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार और नैतिक मूल्यों के पतन पर चैनल पर घंटों लेक्चर देते और दूसरों की टांग खींचते रहते हैं.

इन्होने ही, सब कुछ बार -बार दिखाकर जनता के "चलता है" रवैये को पुष्ट किया है साथ ही अपराधियों का मनोबल भी बढाया है क्योंकि अगर जनता ऐसे अपराधियों को पीटती है तो ये पुलिस को निकम्मा और जनता को वहशी बताकर मानवाधिकारों के कबूतर उडाते शांतिदूत बन जाते है.

इनके दोगलेपन का कोई अंत नहीं........

सलाम ज़िन्दगी said...

नदीम जी आपने जो कहा है वो बिल्कुल सही है आज मीडिया जो तर्क देता है कि हम वही दिखाते है जो लोग देखना चाहते है...पर वो ये भूल जाते है कि समाज की ये मानसिकता को बनाने में खुद मीडिया सबसे ज्यादा जिम्मेदार है...और सबसे महत्तवपूर्ण बात.. वो ठेकेदार जो सिर्फ औरतों नाम पर आग लगाते है और रोटियां सेकते है ऐसे मौके पर उपस्थित भीड़ में उनकी संख्या सबसे ज्यादा होती है.....सुधी सिद्धार्थ.

ज्योति सिंह said...

sabne sab kuchh kah diya .ek aurat ,aurat ki dasha pe kya kahe ?sirf mazak aur tamasha ban kar rah gayi samaj me, afsos ke siva kuchh nahi .aese charcho se mann bhar aata hai .

शोभना चौरे said...

kai bar andilno me gussai bheed gadiyo koany samano ko jla deti hai .aur aisi amanveey ghtnao me chupchap tmasha dekhti hai .midiya to doshi hai hi par vha khde smaj ke log bhi utne hi doshi hai .

'अदा' said...

हमारे देश के नवजवान, अधेढ़, मिडिया, पुलिस सभी अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं और बहुत खूबी से कर रहे हैं, क्योंकि ये और कुछ हो न हों सबसे पहले पुरुष हैं और अपनी पशुता को तृप्त करना इनका पहला मकसद हैं, आप क्या सोचते हैं की अगर उस स्थान पर इनकी माँ-बहन होती तो इनका खून खौल जाता, नहीं बिलकुल नहीं उसे भी ये ऐसे ही देखते ऐसी ही फोटो उतारते क्योंकि यही इनका चरित्र हैं, इनकी मानसिकता हैं...., यह भारत है,,, तब भी तो यही हुआ था जब द्रौपदी का चीर हरण हुआ था, उस वक्त भी भीष्म, ध्रितराष्ट्र और भी उस सभा में जितने थे उन्होंने क्या किया था, अपनी आँखें ही तो सेकीं थी....ये भी तो उन्हीं के वंशज हैं....वही कर रहे हैं जो अपने खून में लेकर आये हैं.....इनसे मुझे पौरुष की उम्मीद नहीं हैं,,,अगर कुछ अच्छा कर जायेंगे तो वाकई आसमान हिल जाएगा और धरती फट जायेगी.....बस मैं और कुछ नहीं कहना चाहती हूँ.....इति

Dr. M. P. Mishra said...

All the truth have been put on surface, nothing is left now. I am highly impressed with Monica's report and comments by Nadim, and Ada.I pray-
O God! Reform thy world, beginning with me.

Thanks to Ranchi Halla