Wednesday, August 5, 2009

मन करता है इस जज़्बे को सजदा करूं

निराला
रांची का एक मोहल्ला है इदरीस कॉलोनी। उसी मोहल्ले की एक संकरी गली में रहता है मो मेराजुद्दीन उर्फ रमजान का परिवार। यह परिवार उद्यमिता की एक मिसाल रहा है. दो दशक पहले तक रमजान का परिवार आर्थिक विपन्नता के उस क़गार पर था, जिसमें दो व"त का भोजन भी नसीब होने की गारंटी नहीं थी। लेकिन अपने अब्बा के इंतकाल के बाद रमजान व उनके दो भाइयों ने लगन, मेहनत और हुनर से घर की आर्थिक हैसियत में बदलाव लाया। रमजान और उसके दोनों भाई लकड़ी के कारीगर हैं। यह परिवार एक बार फिर आर्थिक, मानसिक परेशानियों के भंवर में फंसा है लेकिन एक बड़ी मिसाल भी फिर से कायम हुई है। मिसाल ऐसी, जो बनावटी होते घर-परिवार और समाज के रिश्ते में जीवंतता का अहसास कराती है।
हुआ यह है कि रमजान को पिछले वर्ष बुखार आने की शिकायत हुई। रांची में इलाज हुआ। बकौल रमजान, एक डॉक्टर साहब ने बुखार की जगह टीबी की दवा चला दी। नतीजतन 30 वर्षीय रमजान की दोनों किडनी डैमेज हो गयी। यह खबर उस परिवार पर बिजली गिरने की तरह थी। रमजान इलाज के लिए वेल्लौर गया। वहां क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि आपको किडनी चाहिए, ट्रांसप्लांट करने के लिए। रमजान का इलाज कराने उनके साथ उनकी दोनों बहन सैफु निशा और अफसरी खातून भी गयी थीं। दोनों बहनें किडनी देने के लिए तुरंत तैयार हो गयीं। बड़ी बहन 40 वर्षीया सैफु निशा की किडनी का टेस्ट हुआ। उसके पति को छपरा से बुलाकर सहमति के हस्ताक्षर लिये गये। निशा के पति मुबारक अली बताते हैं- मुझे जैसे ही पता चला कि मेरी पत्नी अपने भाई के लिए किडनी देना चाहती है, मैं तुरंत सब काम छोड़कर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने वेल्लौर पहुंच गया। वह कहते हैं- बहन अपने भाई के लिए कुछ करना चाहती थी, यह मेरे लिए खुशी की बात थी. मुबारक ट्रक ड्राइवर हैं।
अब सैफु निशा की एक किडनी रमजान के शरीर में सेट हो चुकी है। रमजान के इलाज में अब तक आठ लाख का खर्च आ चुका है। हर माह करीब दस हजार की दवा लेनी पड़ रही है। बरसात में लकड़ी का धंधा मंदा है, सो रोजमर्रा के खरचे में भी मुश्किलें आ रही हैं। भाई का इलाज कराने के लिए रमजान के दोनों भाइयों और दोनों बहनों ने अपनी सारी जिंदगी की कमाई, अर्जित संपत्ति को लगा दिया है। सैफु निशा को यह परवाह नहीं कि उसे एक किडनी के सहारे अब जिंदगी भर रहना होगा। इतना ही नहीं, वह छपरा के एक गांव में बसे अपने ससुराल से पल-पल भाई रमजान की खबर लेती है। समय पर दवा खाया कि नहीं, अच्छे से हो या नहीं...वगैरह-वगैरह। भाई-बहन के रिश्ते की यह मिसाल शायद अब के परिवेश में देखने को कम ही मिलता है।

4 comments:

'अदा' said...

प्यारे नदीम,
सबसे पहले आज राखी है और तुम्हारी बधाई मुझे मिल गयी, मेरी ओर से तुम्हें ढेर सारा प्यार मिले...अगर रांची में होती तो आज हम भाई-बहन कितने खुश होते यह शायद शब्द नहीं बता पाएंगे... लेकिन मैं आज भी बहुत खुश हूँ और यही दुआ है कि तुम जहाँ भी हो खूब खुश रहो, खूब तरक्की करो..
आज राखी के पावन पर्व के पावन अवसर पर तुमने भाई-बहन के प्रेम का अतुलनीय उपहार दिया है, मैं सैफु निशा, रमजान और मुबारक भाई, इनका प्रेम देख कर नत-मस्तक हो गयी..वास्तव में ऐसा प्रेम कहाँ मिलता है देखने को, उनसे कहें कि उनकी इस बहन ने भी अपनी दुआएं भेजी हैं उनके लिए.
और तुम्हें एक बार फिर बहुत बहुत आशीष इतनी अच्छी बात बताने के लिए...
खुश रहो
आपा

शोभना चौरे said...

rksha bandhan ke din bhai bahn ke is atut aur nisvarth prem se prichay karane ke liye dhnywad

Vijay Kumar Sappatti said...

nadeem ji

post padhkar meri aankhe bheeg gayi hai ji .. ab kahan ke hindi aur kahan ke muslim , hamare isi ekta ko ye neta kharab karte rahte hai ,,,,,, naman


regards

vijay
please read my new poem " झील" on www.poemsofvijay.blogspot.com

Vijay Kumar Sappatti said...

aur isi bhai chaare ki umeed me isi jazbe ki umed me hum sab bhatkate rahte hai ....