Thursday, September 3, 2009

ब्रांडेड दारू और गांधीवाद की छाप...

गांधी के तीन बंदरों का सांकेतिक इस्तेमाल अंगरेजी शराब के प्रचार में वाल पेंटिंग के रूप में चमकते हुए देखने को मिला. अब विगत माह नीलाम हुए उनके चश्मा-चप्पल और कटोरे के साथ किसी मॉडल के आने का इंतजार कीजिए, जो गांधीजी के कटोरे में दारू डालकर बोलेगी- इट्स ए राइट च्वायस ऑफ बापू!

निराला

मैं बुरा देख नहीं सकता

मैं बुरा बोल नहीं सकता

मैं बुरा सुन नहीं सकता...

क्योंकि मैं ऑफिसर हूं. आप भी अपना ऑफिसर स्वयं ढूढिए. पीजिए...

यह नया विज्ञापन है या पुराना, यह सही-सही नहीं पता लेकिन एक शराब का प्रचार कुछ इसी अंदाज में एक छोटे से ढाबे की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में उभरा हुआ देख कर स्वाभाविक तौर पर नया लगा और चौंकानेवाला भी. पिछले दिनों रांची-पटना हाइवे पर मोटरसाइकिल से गुजरने के क्रम में जिस एक ढाबे पर थोड़ी चाय-पानी के लिए रूकना हुआ था, वहीं यह वाल पेंटिंग देखने को मिला. यह ढाबा एनएच-33 पर है. रांची से पटना की ओर जाने पर कुछ ही दूरी पर जैविक उद्यान के पास. इसे देखने के बाद कुछ देर तक और वहां रूक गया. यह सोच कर कि कोई शराब पीने वाला आये तो जरा उसके अंदाज से इस प्रचार का मिलान किया जाये. जाहिर-सी बात है, उस ढाबे पर बैठ कर दारू पीने वाले गांधी का नाम लेकर दारू पीते हैं, खरीदते हैं. मजाक में ही सही. ढाबा मालिक मौजूद नहीं थे तब. वहां के कर्मियों को यह पता नहीं था कि इस प्रचार को कंपनी वालों ने दीवार पर रंगवा दिया है या ढाबा मालिक ने. यह तो पता नहीं चल सका लेकिन वहां से चलते समय कुछ बातें याद आने लगी.

इंटरनेट की दुनिया में गांधी का नाम अश्लील चुटकुलों में प्रयोग में लाने, चर्चित टीवी शो में बड़ी-बड़ी हस्तियों के सामने, सेलिब्रिटियों के द्वारा गांधी की तुलना मल्लिका शेहरावत और सलमान खान से कर लेने के बाद गांधी के नाम पर चल रहे तरह-तरह के खेल-तमाशे में शराब का यह प्रचार एक नयी कड़ी के रूप में पिछले कई वर्षों से चलन में आ गया है. मुझे याद आ रहा था पिछले दिनों की नीलामी वाली बात. पिछले दिनों मीडिया में गांधी का चप्पल, चश्मा और कटोरे का नीलाम होना छाया हुआ था. कुछ हंगामा भी मचा रहे थे. ज्यादा हंगामा इसलिए था, क्योंकि एक शराब कंपनी के संचालक ने गांधी के सामानों को हासिल करने के लिए उसकी बोली लगायी थी. कुछेक ने यह आशंका जतायी थी कि कल को क्या पता गांधी के उस कटोरे में दारू लेकर कोई मॉडल गांधी का चप्पल और चश्मा पहनकर प्रचार करते हुए बोले:- यह गांधी का च्वाइस है... इसमें असंभव भी तो कुछ नहीं दिखता. आज उस छोटे से ढाबे पर चमक रहा दारू का प्रचार, जिसमें गांधी के तीनों बंदरों का बिंब के तौर पर इस्तेमाल बिना किसी हिचक के हुआ है. कल को कोई मॉडल भी गांधी के चश्मे, चप्पल और कटोरे के साथ- दारू पिलाने का पाठ पढ़ाये कि- इट्स ए राइट चवाइस ऑफ बापू...!

पता नहीं, अपने ही देश अपने नामों का इतने तरीके से इस्तेमाल होते हुए देख गांधीजी क्या सोच रहे होंगे.

5 comments:

अर्शिया said...

सोच क्या रहे होंगे, रो ही रहे होंगे।
( Treasurer-S. T. )

रंजना said...

क्या कहा जाय.....सचमुच बोलती बंद (शब्दहीन) हो गयी....

Udan Tashtari said...

गांधीजी क्या सोच रहे होंगे....इसकी चिन्ता करते होते तो क्या बात होती!!!

Suman said...

nice

'अदा' said...

नदीम,
बहुत ही अच्छा ओब्सेर्वेशन है
तुम्हारा. गाँधी जी तो हमारे मन और जीवन से बहुत पहले ही पलायन कर चुके हैं, जैसी सोच और जैसा चरित्र आज देखने को मिल रहा है उसमें गाँधी जी रह ही नहीं सकते और वो बहुत खुश भी होंगे कम से कम इस गलीज से दूर तो हैं
गाँधी जी का नाम-ओ-निशाँ ही मिट जाना था वो तो भला हो 'मुन्ना भाई ' जिसने हलकी-फुलकी कॉमेडी ही सही ने नयी पीढी से गाँधी जी कि मुलाकात करवा दी..
और एक बात जब अपने नेता ही २ अक्टूबर को सरे आम मांसाहार कर रहे हैं तो गाँधी जी को मॉडल बनाने के लिए रोकेगा कौन ? गाँधी जी को सारी दुनिया झुक झुक कर प्रणाम करती है, गांधी पर फिल्म बनाने के लिए डेविड अतान्बरों को आना पड़ा विदेश से, पता नहीं कितने- कितने करोड़ खर्च करके बकवास से बकवास फिल्म बन रही है लेकिन आज पूरे हिन्दुस्तान में एक माई का लाल नहीं पैदा हुआ जो गाँधी पर फिल्म बना सके, गाँधी सिर्फ हिन्दुस्तान में पैदा हुए, अपना काम किया और चले गए और हम जैसे स्वार्थ के अंधे उनसे दारू ही बिकवा सकते हैं और कुछ नहीं.......छि छि लानत है ...डूब मरो सब के सब....