Wednesday, October 14, 2009

पशुओं का अखबार

कथाकार रत्नेश कुमार की यह लघु कथा आपको अंदर से सोचने को मजबूर न कर दे, तो कहियेगा कई पत्रकारों ने इस कथा का ई-मेल से आदान प्रदान किया। रजत दा ने यह मेल मुझे भेजा और कहा कि इसे रांचीहल्ला में प्रकाशित करो। आप भी रत्नेश जी की लेखनी का आनंद उठाइये।

पशु समाज के मन-मस्तिष्क में आया कि मानव समाज की तरह अपना भी एक अख़बार हो। मनुष्य के अख़बार में हमारे पशु समाज का कवरेज कम होता है। यदि हमारे पशु समाज का अपना अख़बार होगा तो अधिक-से-अधिक कवरेज होगा। भेड़िया बोला, "रुपया मेरा, किंतु संपादक मेरी मर्जी का होगा। सियार ने कहा, "रुपया आपका होगा, तो निःसंदेह संपादक आपकी मर्जी का ही होगा। भेड़िया मुस्कराया। सियार ने सिर हिलाया।

शेर गरजा, "मेरे रहते दूसरा कैसे संपादक बन सकता है?"

सियार हाथ जोड़कर बोला, "क्षमा करें वनराज, आप शासक हैं, शासन कीजिए। संपादक का काम अपने अधीनस्थ सेवक को दीजिए। शिकायत का मौका न दूँगा। यदि शिकायत हो तो मेरा सिर ले लीजिए। यह सिर आपका ही तो है। शेर सियार की विनम्रता से प्रभावित हुआ। उसने कहा, "सियार जी, आप में एक संपादक का जन्मजात लक्षण है। हमें आपके लक्षण और प्रतिभा का लाभ उठाना चाहिए।" जब तक शेर बोलता रहा, सियार भक्त हनुमान की तरह हाथ जोड़े रहा और प्रभु-प्रभु के सदृश वनराज-वनराज करता रहा। मन-ही-मन मुस्कराते भेड़िया की आँख़ें सियार की ओर उठीं। सियार गद्गद् हो गया। उसे लगा कि उसे संपादक का नियुक्ति पत्र मिल गया। शेर को शेरनी ने इशारे से बुला लिया। उसके दवा का वक्त हो गया था। भेड़िया और सियार ने बैलों की नियुक्ति उप-संपादक के पद पर की और कुत्तों को मुख्य/विशेष संवाददाता बनाया। चूँकि कुत्तों में सूंघने की शक्ति अधिक होती है। समाचार सूंघना कुत्तों के ही वश का है। कौओं को भी कार्यालय संवाददाता/स्टिंगर बनाया गया, जिससे आने-जाने वालों, उद्घाटन समापन करनेवालों की सूचना-ऊचना, ख़बर-उबर मिल सके। कोयल ने सियार से संपर्क किया। सियार ने कोयल को बहुत मुश्किल से मिलने का समय दिया। उसके बाद मिलने पर कई दिन आज-कल कर उसे दौड़ाता रहा। वह अंततः बोला, "अख़बार में तुम्हारा क्या काम? कोयल ने कहा, "कला, साहित्य और संस्कृति का एकाध पन्ना तो रहेगा ही। वह बोला, "मैनेजमेंट पक्षी को लेने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। कौओं पर ही ब़डी मुश्किल से राजी हुआ।

जहां तक कला-संस्कृति की बात है, तो बिल्ली है ही। मैनेजमेंट म्याऊं पसंद है। उसे कूक से परहेज है। मैं तो चाहता हूँ कि तुम अख़बार का अंग बनो। तुम्हारे रहने से अख़बार पढ़ने वालों को लगेगा कि वसंत है, मैनेजमेंट का डिसीजन अख़बार में... नो एडजस्टमेंट विदाउट मैनेजमेंट्स कॉन्सेंट। कोयल लौट गयी। सियार जी के संपादन में अख़बार निकला और निकल रहा है। शेर बिस्तर पर है। शेरनी सेवा कर रही है। भेड़िया साहब प्रसन्न हैं।

(वागर्थ-पृष्ठ संख्या 116, अक्तूबर, 2009 से साभार)

4 comments:

मोनिका गुप्ता said...

सचमुच बेमिसाल। यह छोटी सी कहानी मीडिया और प्रबंधन के घालमेल की बिल्कुल सही तस्वीर पेश करती है। आज किस तरह प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रबंधन हावी है, उसका सटीक चित्रण है। इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिसको जो अच्छा लगे, वही योग्य है वाली मानसिकता मीडिया हाउस में भी स्थापित हो चुकी है।

जयंती कुमारी said...

बहुत ही गंभीर और मारक लेख है। सचमुच सियारों की जमात कोयलों को प्रबंधन की इच्छा के अनूसार किनारे लगा रही है। इस पर मोनिका जी ने बिल्कुल सही कहा है कि प्रबंधन के मन को जो भाये, वही योग्य है। बाकी सब बेकार....

Suman said...

सियार जी, आप में एक संपादक का जन्मजात लक्षण है।saty vachan

रंजीत said...

मेरा मानना है कि जब जनता और सियार में ठनेगी तो जीत जनता की ही होगी। अब देखते हैं कि जनता इन सियारों को कब तक पहचानती है, इनके "हुवा-हुवा' को संगीत समझने की गलतफहमी से कब निकलती है? वैसे राज मार्गों के लोग इनकी तरफदारी में खड़े हैं।