Sunday, December 6, 2009

बाबरी का सवाल और जस्टिस लिब्राहन

नदीम अख़्तर

लिब्राहन आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी, वह लीक भी हुई और दूसरे ही दिन संसद में पेश भी हो गयी। लेकिन, एक सवाल तो रह ही गया कि आखिर जांच आयोगों की प्रासंगिकता क्या है? अमूमन देखा गया है कि लंबे इंतजार के बाद जब रिपोर्ट आती भी है, तो सरकार उन्हें धूल फांकने के लिए छोड़ देती है।

सोलह साल और छह महीने का इंतजार, 48 विस्तार और 8 करोड़ खर्च। 16वीं शताब्दी के एक ऐतिहासिक धरोहर को डेढ़ लाख कार सेवकों द्वारा तीन घंटे में गिराये जाने के बाद किसी ने यह सोचा भी नहीं होगा कि इस घिनौने खेल के कप्तान और खिलाड़ियों का नाम जानने में एक आयोग को डेढ़ दशक से ज्यादा समय लग जायेगा। शायद जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्राहन ने भी यह नहीं सोचा होगा कि सरकारों का लचीला और सुरक्षा कवच प्रदान करनेवाला रवैया इस कदर मेहरबान होगा कि उन्हें इस आयोग के माध्यम से आधा करोड़ से भी ज्यादा रुपये (करीब 60 लाख बतौर वेतन और भत्ते) मिल जायेंगे। अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच कर चुके लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट से एक साथ कई सवाल खड़े हो गये हैं। सबसे अहम सवाल तो यह है कि क्या सरकारें किसी मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने के लिए ही आयोगों का गठन करती हैं? क्या न्याय और भुक्तभोगी के बीच किसी आयोग की रिपोर्ट के लिए वर्षों का इंतजार एक दीवार का काम नहीं करता? आज तक जितने आयोग गठित हुए, देश और देशवासियों को उनके निष्कर्षों का कितना लाभ मिला है? ऐसे कई सवाल मुंह बाये खड़े हैं, जिनका जवाब इतिहास के गर्भ में समाया है।

कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट 1952 के तहत सरकार किसी घटना के बाद ज़रूरत पड़ने पर जांच आयोग गठित करती है। इस कानून में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि किसी भी आयोग की रिपोर्ट को सरकार मानेगी ही। यही वजह है कि सरकारें सिफारिश न मानने की स्वतंत्रता का फायदा उठाती आयी हैं। मनोनुकूल सिफारिश न हुई, तो जांच रिपोर्ट खारिज कर दी जाती रही है। असल में जांच आयोगों का राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होना कोई नयी बात नहीं है। दंगे या फिर किसी घपले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए फौरन जांच आयोग का गठन कर दिया जाता है। फिर "अनुकूल' समय पर रिपोर्टें खारिज की जाती रही हैं।

राजीव गांधी हत्याकांड की जांच का जिम्मा जैन कमीशन को मिला था। जैन आयोग ने आठ वर्षों तक जांच की। रिपोर्ट सौंपी गयी, तो उसकी सिफारिशों में काफी पेचीदगियां पायी गयीं। जस्टिस एमसी जैन ने अपनी रिपोर्ट में मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक और पीएलओ के नेता यासर अराफात तक के नाम का उल्लेख किया था। इसके अलावा एम करुणानिधि से पूछताछ की जरूरत बतायी थी। रिपोर्ट इतनी बुरी तरह से उलझन पैदा करनेवाली थी कि उसकी सिफारिशों का मुअम्मा सरकार से हल न हो सका। वाजपेयी सरकार ने जब संसद में इस रिपोर्ट का कृत कार्रवाई प्रतिवेदन (एटीआर) पेश किया, तो उसमें साफ-साफ कहा गया था कि इस मामले में एमडीएमए (मल्टी डिसीप्लिनरी मॉनिटरिंग एजेंसी) कार्रवाई करेगी। वाजपेयी सरकार के शासनकाल में अर्जुन सिंह हर छह महीने पर एक चिट्ठी केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी को भेजा करते थे। वह पूछते थे कि आखिर करुणानिधि के संबंध में क्या हो रहा है। उसके बाद केंद्र में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार बनी और करुणानिधि भी उसमें शामिल रहे, न तो जैन कमीशन की रिपोर्ट पर कांग्रेस ने अमल किया और न ही अब उसकी कोई खोजबीन हो रही है। कुल मिलाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

इसी तरह 1992 के मुम्बई दंगों के बाद एक और आयोग का गठन हुआ था-श्रीकृष्ण आयोग। इस आयोग के प्रमुख जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने पांच साल बाद 1998 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग को भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। जनवरी 1996 में शिवसेना और भाजपा की सरकार ने इस आयोग को बरखास्त कर दिया था। बाद में 28 मई 1996 को इसे फिर से बहाल किया गया। श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार ने स्वीकार नहीं किया। अगर आयोग की सिफारिशों को अमल में लाया जाता, तो सरकार को न केवल शिवसेना के नेताओं व कार्यकर्ताओं को सलाखों के पीछे भिजवाना पड़ता, बल्कि उन 31 पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई करनी होती, जो आयोग द्वारा सीधे तौर पर साम्प्रदायिक दंगों में सक्रिय भूमिका अदा करने, लूट और ऐसे ही कई आरोपों में दोषी पाये गये थे। जबतक शिवसेना और भाजपा सत्ता में रही, तबतक तो श्रीकृष्ण आयोग की एक न चली, लेकिन आश्र्चर्यजनक रूप से महाराष्ट्र की सत्ता कांग्रेस-एनसीपी के हाथों में आने के बावजूद इस आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। दूसरी ओर 1993 के ही मुम्बई बम धमाकों के आरोपियों को टाडा अदालत ने सजा सुना दी, लेकिन उससे पहले हुए दंगों के आरोपियों को सजा नहीं दी जा सकी।

आयोगों की राजनीति न केवल जीवित लोगों को बचाने के लिए होती आयी है, बल्कि दिग्गज नेताओं की मौत पर पर्दादारी के लिए भी सिफारिशें खारिज की जाती रही हैं। 30 अप्रैल 1996 को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने केंद्र की भाजपानीत राजग सरकार को निर्देश दिया था कि वह जोरदार तरीके से जांच कराकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवित या मृत होने के संबंध में जारी संशय की स्थिति को समाप्त करे। इसके बाद सरकार ने जस्टिस मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता में जांच आयोग (एक सदस्यीय) का गठन कर दिया। आयोग ने जांच में लंबा समय खींचा। दस साल के बाद 17 मई 2006 को जब आयोग की रिपोर्ट सदन पटल पर रखी गयी, तो सरकार ने इसकी सिफारिशों को खारिज कर दिया। रिपोर्ट में यह साफ-साफ कहा गया था कि 1945 में कथित विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु नहीं हुई थी और न ही जापान के रेन्कोजी मंदिर में रखी राख नेताजी की अंत्येष्टि के हैं। रिपोर्ट में 1945 में नेताजी के रूस में ठहरने के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की गयी थी और इस बारे में गहन जांच की बात कही गयी थी। भारत सरकार ने रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह निष्कर्षों से इत्तेफाक नहीं रखती। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने संसद में सरकार की तरफ से यह सफाइर् दी थी कि इस मामले पर पूवर्वर्ती शाहनवाज खां जांच समिति तथा जीडी खोसला आयोग के निष्कर्षों को सरकार अधिक विश्र्वसनीय मानती है। जबकि इसके ठीक विपरीत 28 अगस्त, 1978 को लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाइर् ने उक्त दोनों जांचों के निष्कर्षों के संबंध में कहा था,"18 अगस्त 1945 को मंचूरिया की हवाइर् यात्रा के दाैरान तैहोकु हवाइर् अड्डे पर विमान दुघर्टना में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की रिपोटर् के बारे में दो बार जांच की गइर् है, जिनमें से एक मेजर जनरल शाहनवाज खां की अध्यक्षता में एक समिति द्वारा की गयी थी आैर दूसरी पंजाब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त्ा न्यायाधीश जीडी खोसला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच समिति द्वारा की गयी थी। पहली समिति ने बहुमत से आैर श्री खोसला ने उनकी मृत्यु संबंधी रिपोटर् को सच माना था। उसके बाद से इन दो रिपोर्टों में पहुंचे निष्कर्षों की सच्चाइर् को लेकर उचित शंकाएं प्रस्तुत की गइर् हैं तथा साक्षियों की गवाही में अनेक महत्वपूणर् असंगतियां देखी गइर् हैं, कुछेक अन्य आैर अधिक समकालीन सरकारी दस्तावेजी रिकाडर् भी उपलब्ध हो गये हैं। इन शंकाओं आैर असंगतियों तथा रिकार्डों के प्रकाश में सरकार यह स्वीकार करने में दिक्कत महसूस करती है कि पिछले निणर्य असंदिग्ध थे।' एक ही मुद्दे पर अलग-अलग सरकारों के बिल्कुल भिन्न नज़रिये से इन आरोपों को बल मिलता है कि आयोग की सिफारिशें सरकारों की मनमानी की शिकार होती हैं।

अब ज़रा 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए गठित कमेटियों पर नज़र डाली जाये। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन किया था। इस आयोग को भी दंगों की जांच करने मेंदो साल लगे। 1986 में आयी इस आयोग की रिपोर्ट की भी लीपापोती कर दी गयी थी। बाद में कांग्रेस ने रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा का सदस्य बना दिया। इसे लेकर काफी हंगामा भी हुआ था। इसी मसले पर अलग-अलग समय पर कुल नौ आयोगों का गठन हुआ, जिनके निष्कर्षों को या तो दरकिनार कर दिया गया या फिर और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए फिर से एक आयोग गठित कर दी गयी। सिख विरोधी दंगों की जांच के मसले पर सबसे ताज़ा-तरीन आयोग 8 मई 2000 को केंद्र की राजग सरकार ने जस्टिस जीटी नानावती के नेतृत्व में गठित किया। नानावती ने भी पांच साल लगाये। रिपोर्ट 5 फरवरी 2005 को आयी। केंद्र में यूपीए की सरकार थी। पहले तो रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया, लेकिन सिखों के विरोध के कारण सज्जन कुमार को दिल्ली सरकार को सलाहकार पद से हटाना पड़ा और जगदीश टाइटलर को मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। बड़ी संख्या में मिले शपथपत्रों के आधार पर नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने या तो दंगाइयों को उकसाने का काम किया या फिर सिखों पर हमला करने में उनकी मदद की। प्रभावशाली और साधनसंपन्न लोगों के सहयोग के बिना इतने कम समय में इतने सिखों (2700 से ़ज़्यादा) की हत्या करना संभव नहीं था। आयोग ने यह भी कहा था कि दंगाई बेखौफ थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। ऐसी रिपोर्ट भला कांग्रेसनीत केंद्र सरकार कैसे स्वीकार करती, सो उसने सिरे से खारिज कर दिया। दूसरी ओर भाजपा के मनोनुकूल रिपोर्ट आने पर उसने नानवती आयोग की भूरी-भूरी प्रशंसा की।

अब बात लिब्राहन आयोग की। जस्टिस लिब्राहन ने जांच में हुए विलंब के लिए गवाहों की आनाकानी को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि हर तरह से कानूनी ताकतों से लैस आयोग से इतने दिनों तक गवाह कैसे खेलने में कामयाब होते रहे। गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए आयोग ने चार सौ बैठकें की। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह आयोग से 11 साल तक आंख-मिचौनी खेलते रहे। छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरायी गयी, 16 दिसंबर को आयोग का गठन हुआ और इसे तीन महीने के अंदर यानी 16 मार्च 1993 को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद लगातार विस्तार मांगा जाता रहा और सरकारें इस आयोग का विस्तार करती रहीं। जस्टिस लिब्राहन को प्रति माह 30 हजार रुपये बतौर वेतन मिल रहा था। इतनी ही राशि उन्हें आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त होते समय (नवंबर 2000) मिलती थी। आयोग के 22 कर्मचारियों के वेतन पर पांच करोड़ रुपये खर्च हुए। जस्टिस लिब्राहन को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त था, उन्हें आवास, कर्मचारियों की सुविधा सरकार की ओर से मुहैया करायी गयी थी, जो कमीशन का काम खत्म होने के बाद स्वतः समाप्त हो जायेगी। उतार-चढ़ाव के दौर से गुज़रते हुए लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट सदन में पेश तो हुई, पर नरसिंहराव जैसी बड़ी मछली को बेदाग घोषित करने और घिसी पिटी बातों को फिर से दोहराने के कारण रिपोर्ट में ज्यादा दम नहीं बचा है। सबसे अहम सवाल तो यह है कि इस रिपोर्ट के आधार पर अगर कोई न्याय होता भी है, तो क्या वह अन्याय से कुछ कम होगा?