Wednesday, May 7, 2008

33 बटा 50

एक युग से आंसुओं, नारों, मांगों और फोटू कमिटी की बरसात हो रही थी। कल गर्मी के बावजूद संसद के एअरकंडिशन में कलेजे में ठंडक लिये वैसे ही मुस्कराई देश की संसदीय महिलाएं जैसे कभी मुस्कराती थीं टूथपेस्ट बेचने वाली महिलाएं। आखिर पेश हो गया राज्यसभा में संविधान संशोधन 108 वां विधेयक। इसमें संसद और विधान सभा में आबादी के 50 प्रतिशत को 33 प्रतिशत रिजरवेशन मिल सकेगा।

ज्यादा नहीं बरसात का इंतजार कीजिए। यहां इसका मतलब रिमझिम बूंदाबादी या मूसलाधार बौछार से नहीं है। बरसात का मतलब होता है संसद का मॉनसून अधिवेशन है। तब पता चलेगा कि यह विधेयक दुष्यंत कुमार कि ‘बूंद तो टपकी थी मगर वो बूंदों–बारिश और है, ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं।’

एक युग लगा दुबारा पेश होने में तो एक युग लग जाएगा पास हो कर अधिनियम बनने में। जो भी हो विधेयक हमेशा राज्यसभा में जमा रहेगा। 1996 में लोक सभा में पेश हुआ था। लोकसभा मरी तो विधेयक की भी मृत्यु हो गई। तब से यह सालाना फोटू कमिटी भर ही थी। राज्यसभा अमर है, वैसे ही यह विधेयक अमर है।

यह अमरता चौराहे पर खड़ी प्रतिमा के समान है। बिना जबान है। यह बोलना तभी आरंभ कर सकती है जब लोकसभा भी पास कर दे। पड़ोस के लोकसभा में कब पहुंचेगा यह 33 बटा 50 –कौन जाने। हमारी सरकार और संसद नौ दिन चले ढ़ाई कोस पर भी तो चलती है।

इस विधेयक ने एक सत्य तो साबित ही कर दिया कि हम मर्द कितना डरते हैं औरत जात नाम की बला से। और डरे भी क्यों नहीं इस नारी नामक शक्ति से। बचपन में मां बन कर डांटती– फटकारती रही। इतना ज्यादा दुलारा कि हम किसी काम के न रहे।

ताकत चाहिए तो देवी दुर्गा की शरण में जाओ। विद्या चाहिए तो देवी सरस्वती है। पैसा चाहिए तो उल्लू पर सवार लक्ष्मी देवी हैं। सब डराती– हड़काती रहती हैं। हम भी घर में फोटू लगा कर इन देवियों को प्रणाम कर अपने काम काज पर निकल जाते थे।

मर्दों की पार्टी समाजवादी पार्टी ने इस विधेयक को रोकने की पूरी फोटू कमिटी कोशिश की। कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी को छोड़ कर बाकी घोंघा प्रसाद वंसंत लाल नुमा हिंदी भाषी राज्यों की राष्ट्रीय पार्टियों की शिकायत रही कि इसमें पिछड़ों– दलितों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था नहीं है।

हालांकि शिकायत भाजपा को भी है कांग्रेस से कि अकेले-अकेले महिलाओं के ठेकेदार बने जाते हो, चुनाव में महिला वोट के उम्मीदवार बने जाते हो। पिछड़ा– दलित उद्धार वाली पार्टियों को क्यों ऐसा लगता है कि चुनाव में सिर्फ ऊंची ऊंची महिलाएं ही खड़ी होंगी। अरे भाई, अब तक पुत्रों को खड़ा करते रहे हो, अब बहुओं को खड़ा करो। अच्छा, बहू खड़ी हो जाएगी चुनाव में तो घर में खाना कौन बनाएगा या 33 प्रतिशत मर्द सांसद–विधायक नहीं बन पाएंगे।

ऐसे मोकों पर फिर दुष्यंत कुमार याद आते हैं, ‘तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह, तू एक ज़लील– सी गाली से बेहतरीन नहीं है।’ पर कौन समझाए दलितों–पिछड़ों–वंचितों के मुकादमों को कि दुष्यंत कुमार ने यह भी कहा था, ‘ज़रा सा तौर तरीकों में हेर फेर करो, तुम्हारे हाथ में कॉलर हो, आस्तीन नहीं।’

यह है सच 33 बटा 50!

यह व्यंग्य जुगनू शारदेय ने josh18 के लिए लिखा है।