Tuesday, July 29, 2008

रेनकोट


मोनिका गुप्ता
अपनी पूरी मस्ती और शोख अदाओं के साथ सावन हमारे सिरहाने आ चुपचाप खड़ा हो चुका है। वातावरण सुगंधित है, प्रकृति में हरियाली छाई हुई है, बादल घुमड़ घुमड़ कर अपने हर्ष का परिचय दे रहे है, वर्षा की रिमझिम बूंदे जीवनदायिनी बन चुकी है और मन उल्लासित है। बच्चे पानी में कागज के नाव तैरा रहे है जिन्हें देखकर लगता है कि सावन ने दस्तक दी है। जब नववधूएं अपने हाथों में मेंहदी रचाकर मायके में अपने प्रिय के आने का इंतजार करती है तब उनकी आंखों में सावन दिखाई देता है। जब गांवों में झूले डलने लगते है और मंगल गीत गाये जाते है तब पता चलता है कि सावन आहिस्ते-आहिस्ते दस्तक दे रहा है। जब बहनें अपने भाइयों के लिए तरह तरह की राखियां बनाती हैं, तो उनके प्यार में दिखता है सावन। जब कांवरिया मीलों चलकर अपने अराध्य देव को जल चढ़ाते है तो उनकी भक्ति में सावन के आने का एहसास होता है। सबसे अलग सावन होता है युवाओं का । प्रेयसी या प्रिय का दिख जाना ही उनके लिए सावन के दर्शन से कम नहीं होता। इस सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो, तो किसी भी गांव या छोटे शहर में, जहां पेड़ों पर झूला डाले किशोरियां, नवयुवतियां या फिर महिलाओं का झुंड देखने को मिले, वहां दो पल ठहर जाइए। वहां दिखेंगी आपको सावन की मस्ती। उनकी हंसी ठिठोली में, उनकी अठखेलियों में। हर व्यक्ति को सावन का यह झूला अपने उम्र के विभिन्न पड़ाव में अपने लोगों से मिलता रहता है। यही झूला हम सबको मिला है मां की बांहों के झूले के रूप में, कभी पिता, कभी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, भैया-भाभी, दीदी या फिर अपने प्रिय के बांहो का झूला। भला कौन भूल सकता है इन प्यार भरे झूलों को?
आज सावन बदल गया है। आने के पहले खूब तपिश देता है, अपने आगमन का विज्ञापन करता है। छतरी, रेनकोट और विज्ञापन के होर्डिंग के रूप में। पर जब कभी यह रात में आ धमकता है, तो सारे विज्ञापन धराशायी हो जाते हैं। न छतरी काम आती है और न ही रेनकोट। गृहस्थी की पूरी झांकी सड़कों पर तैरती नजर आती है, अपने आशियाने के तिनके समेटते नजर आते हैं झोपड़ी के लोग। सावन वहां भी आता है, पर रात में ही कुछ मजदूर लग जाते हैं, बंगले का पानी उलीचने में। नाली खोद दी जाती है, ताकि पानी झोपड़पट्‌टी की तरफ जा सके और बंगले साफ सुथरे और मनोरम दिख सके। रात में बिजली धोखा न दे जाए, इसलिए नया इन्वर्टर खरीदा जाता है। बच्चों के झूलने के लिए एक सीट वाला आधुनिक झूला हॉल में लगा दिया जाता है, पर इसमें वह मज़ा कहां, जो गांव में आम के पेड़ पर लगे झूले में है या फिर उस झोपड़पट्‌टी के सामने एक पेड़ पर साइकिल के खराब टायरों से बने हुए झूले में है। जिसपर बच्चे झूलते हैं, खिलखिलाते हैं, एक दूसरे को झुलाते और फिर गिरने पर रो कर घर चले जाते हैं। सावन खाली बैठे शहरी मज़दूर का भी है, लोकगीतों के साथ खेतों में बुवाई करती महिलाओं का भी है, बीज के लिए कर्ज़ देते व्यापारी का, बाइक पर सरपट भागते युवाओं का, घर में कैद होकर खेलते बच्चों का भी है ये सावन। सावन के रंग की कोई सीमा नहीं। सावनी रंग अलग-अलग तरह से लोगों के चेहरे पर अपना प्रभाव छोड़ता है। इसलिए तो कहा जाता है कि किसी के चेहरे पर यूं ही नहीं खिलता सावनी रंग। रंगों की रंगत में सावनी झूलों की डोर अब भीगने लगी है। टूटते लोगों का सहारा भी बनता है सावन और तिनका-तिनका लोगों को तोड़ भी देता है सावन। कई आंखें हैं, जिनमें सावन की हरियाली दिखती है। पर उससे भी अधिक सैकड़ों आंखें हैं, जिनमें सावन ने आज तक दस्तक ही नहीं दी है। उन्हें पता ही नहीं, क्या होता है और कैसा होता है सावन?

2 comments:

बाल किशन said...

"टूटते लोगों का सहारा भी बनता है सावन और तिनका-तिनका लोगों को तोड़ भी देता है सावन। कई आंखें हैं, जिनमें सावन की हरियाली दिखती है। पर उससे भी अधिक सैकड़ों आंखें हैं, जिनमें सावन ने आज तक दस्तक ही नहीं दी है। उन्हें पता ही नहीं, क्या होता है और कैसा होता है सावन? "
अति सुंदर!
बहुत अच्छा लिखती हैं आप.

नदीम अख़्तर said...

आपका लिखा हुआ बहुत अच्छा लगा. आप ऐसे ही रांचीहल्ला के लिए लिखते रहिये.
धन्यवाद