Monday, September 1, 2008

बाढ़ में दौलतमारी का आषाढ़



नदीम अख्तर
बिहार में बाढ़ ने भले ही 30 लाख से भी ज़्यादा लोगों को रुलाया हो लेकिन इसी बाढ़ की आड़ में दौलतमारी के खेल का भी श्रीगणेश हो चुका है। अगर मानते हैं, तो ठीक नहीं तो रांची की सड़कों को निकल के देखिये। हर चौक चौराहे पर बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए भिक्षाटन करते कुछ अति उत्साहित लोग नज़र आ जायेंगे। इनमें से अधिकतर की नियत यही है कि किसी प्रकार दिन भर किसी के आंसुओं के बल पर जुटाये गये माल का एक बड़ा हिस्सा अपने घर में रख लें। आज सुबह जब घर से निकला तो एक चौराहे पर देखा कि कुछ नौजवाननुमा प्राणी हाथों में डिब्बा लिये गाड़ियों को रुकवा रहे हैं। डिब्बे पर स्टीकर चस्पा था - "बाढ़ पीड़ितों के लिए चंदा।'युवकों में से कुछ को मैं पहचान गया। इनके घर पर हर रोज़ अपने घर की सूनामी को काबू में करने के लिए जद्दोजहद होती रहती है। कुछ जुआरी, कुछ गंजेड़ी, कुछ पाकेटमार, कुछ नेता बनने की ललक में इसी बरसात में उगे हुए छातेदार सब्जी के विशेषणयुक्त प्राणी खुद को बाढ़ पीड़ितों के हितैषी करार देते हुए जबरन पैसे वसूल रहे थे। मैंने एक से पूछा - भाई, जिसे बाढ़ पीड़ितों की मदद करने की इच्छा होगी, वह जायेगा और प्रभात खबर या फिर राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन के राहत कोष में क्यों नहीं जमा करेगा, कोई तुम लोगों को क्यों दे पैसे? और अहम सवाल तो यह कि तुम लोगों के पास से पैसे बाढ़ पीड़ितों तक ही पहुंचेंगे, यह कैसे मान लिया जाये? जवाब भी सुन लीजिए, "आप पांच रुपया डाल के निश्र्चिंत हो जाइये, बाढ़े पीड़ित लोग के पास पहुंचेगा और.. कहीं नहीं, और वैसे भी उम्मीदे पर ना दुनिया कायम है भैया।' हैरानी हुई कि समाज किस कदर पतीत हो चुका है। अभी तीन दिन पहले में रात को ज़ी-न्यूज़ देख रहा था। खबर बाढ़ की ही चल रही थी। एक राहत शिविर में कुछ महिलाएं बैठी हैं, उनके सामने पीली भात है। बच्चे और बीढ़े भी हैं। कैमरा एक औरत पर फोकस होता है। रिपोर्टर उस महिला से पूछता है ः आपके घर वाले कहां हैं? महिला कुछ जवाब देने के बजाय कुढ़ कर रोने लगती है। दस दिनों के बाद उसे अन्न का दाना नसीब हुआ था, वह भी खा नहीं सकी क्योंकि उसके सीने में एक ऐसा पत्थर रखा था, जो परिवार के सभी सदस्यों की सलामती की जानकारी मिलने के बाद ही उतरेगा। ऐसी ही लाखों औरतें आज बेघर हैं। न सिर पर छत है और न ही तन से लिपटे चीथड़ों के अलावा कोई और जोड़ा। इस भयंकर त्रास्द विनाश के बीच जो लोग मुंह बिदोरते हुए सड़कों पर चंदेबाजी का खेल खेल रहे हैं, वास्तव में पृथ्वी यमराज के यमदूत ऐसे ही लोग हैं। मैं यह नहीं कहता कि संवेदनाएं हर किसी के अंदर मर चुकी हैं लेकिन सचमुच अगर लोगों के भीतर संवेदना है, तो सबसे पहले अपनी जेव से पैसे निकाल कर लोगों को एक ऐसे कोष में राशि जमा करानी चाहिए, जिसकी विश्र्वसनीयता हो। सचमुच जहां से पैसा सीधे बाढ़ में तबाह हुई हमारी मां-बहनों की जिंदगी में रोशनी लाने के काम में आये, पैसे वैसे ही कोष में जमा करने चाहिए। बाढ़ के नाम पर जो सैकड़ों दुकानें रातो-रात खुली हैं, उनका बहिष्कार होना चाहिए ताकि वास्तव में सामाजिक न्याय हो और इस दुख भरी घड़ी में जिसका एक नया पैसा भी किसी कोष में जाये, तो उसका लाभ असली हकदार को मिले।

5 comments:

prakash, ranchi said...

बिल्कुल सही नदीम जी आपने अपने लेख के माध्यम से संवेदनाओ को बाज़ार बनने वालो की अच्छी खिचाई की है .

soni, patna said...

नदीम जी मैंने आपका आलेख पढ़ा. सचमुच दिल को छु गई आपकी बात.आपके लेख से इस बात का विश्वास बना हुआ है की पत्रकारों की संवेदना पुरी तरह नही मरी है.आप जैसे लोग है जो इसके मार्ग को प्रसस्त करने में लगे हुए है.ऐसे ही लिखते रहिये और समाप्त होती जा रही संवेदना को जागते रहिये .

ramesh,orrisa said...

wah bahut accha aise hi lage rahiye aur likhte rahiye.aapke vicchar sachmuch bahut krantikari hai aur aap bahut aage tak jaiyege.meri subhkamna aapke saath hai.

shubhan, rajasthan said...

mujhe to lagta hai ab aap jaise sawndansil logo ko samaj se yah ummid hi nahi rakhni chaiye ki koi manviye mulyo ka khayal rakhe. yaha to jise dekho sab apni apni jholi varne me lage hai. kaha se aur kaise ummid ki ja sakti hai.

रंजीत said...

baadh piditon ko chande kee nahin aawaz kee jarurat hi. paise se unka kuch khas heet nahin hone wala ,unhen sarkaree samvedna kee jarurat hi takee samay par tatbandh recontruct ho jaye
Ranjit