Tuesday, November 25, 2008

साम्राज्यवाद के खिलाफ, लोकतंत्र के लिए

यह लेख स‌ह भाषण कल शाम को ही भाई स‌चिन (नई इबारतें) ने मुझे भेजा। लेख बड़ा था इसलिए इसे पढ़ने में देर हो गयी। प्रणय कृष्ण जी ने अपनी बातों में जो यथार्थ के पुट डाले हैं, वह लाजवाब हैं। उम्मीद है आप भी इनसे स‌हमत होंगे.
आज पूंजी के गढ़ में अभूतपूर्व संकट उभर आया है। नया साम्राज्यवाद जिसने भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नयी विश्व व्यवस्था, पूंजी के संकट को हल करने के लिए कायम की थी, उसे यह एहसास को चला है कि इस तरकीब ने भी पूंजी के जन्मजात संकट यानी मंदी को हल करने की क्षमता खोनी शुरू कर दी है। बराक ओबामा का अमरीका के राष्ट्रपति पद पर सत्तारूढ़ होना इसी परिघटना को सूचित करता है। आज अर्थशास्त्रियों के बीच भीषण बहस चल रही है कि अमरीका में बैंकों की आत्महत्या पूंजी के लंबे चलने वाले आधरभूत संकट का आगाज़ है या फिर थोड़े समय में समाप्त हो जाने वाली तात्कालिक समस्या। बहरहाल इस संकट से उबरने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं वे साम्राज्य के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं। अमरीका की सरकार दिवालिया हो रहे कारपोरेट बैंकों को संकट से उबारने के लिए सामान्य नागरिकों की कमायी से पाए टैक्सों को झोंक रही है। यानी मुनाफे तो पूंजीपति घरानों की निजी संपत्ति है जबकि नुकसान का सामाजीकरण किया जा रहा है। उपभोग आधरित आर्थिक विकास के चलते बैंकों ने अपनी पूंजी से कई गुना ज्यादा कर्ज बांटा ताकि लोग खूब खर्च कर सकें। जाहिर है कि ये कर्ज किसी वास्तविक पूंजी के बदले नहीं दिए गए थे, लिहाजा इनके न लौटने पर ये बैंक दिवालिया हो गए। पिछले 30 सालों से विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में एक ऐसी बैंकिंग प्रणाली का विकास हुआ जिसने उत्पादक-पूंजी की जगह सट्टा-पूंजी के माध्यम से पूंजी पर मुनाफे को जबर्दस्त ढंग से बढ़ाया। खेती, उद्योग और व्यवसाय में निवेश के जरिए लोगों को रोजगार देते हुए यह मुनाफा नहीं आया। यह मुनाफा पैसे से पैसा बनाने की तरकीब से आया। दूसरे विश्वयुद्ध( के बाद लगभग 40 वर्ष तक अति-उत्पादन और मंदी से निपटने में कीन्सवादी कल्याणकारी राज्य पर आधरित आर्थिक विकास का ढांचा कारगर रहा। लेकिन उसके कारगर रहने में अमरीका द्वारा दुनिया भर में थोपे गए युद्धोंके जरिए सैन्य-औद्योगिक मुनाफे की भी बड़ी भूमिका रही। 70 के दशक के आखीर और 80 के प्रारंभ में इस ढांचे ने काम करना बंद कर दिया और तभी से रीगन और थैचर के नेतृत्व में पूंजी के उस युग की शुरुआत हुई जिसे भूमंडलीकरण या नई विश्व व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। इस व्यवस्था को सिर्फ रीगन या थैचर ने कायम नहीं किया बल्कि तमाम तीसरी दुनिया के देशों के सामंती-पूंजीपति तबकों ने अपने ही देशों की लूट में फायदे का हिस्सेदार बनने के लिए खुशी-खुशी इस व्यवस्था को अंगीकार किया। हमारे देश के हुक्मरानों ने भी ऐसा ही किया। इस व्यवस्था के तहत पूंजी और संपत्ति के विकास और प्रवाह के नियमन पर अलग-अलग देशों ने अपनी राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से जो भी उपाय किए थे उन्हें खत्म किया गया, बहुराष्ट्रीय पूंजी को संप्रभु देशों की खेती, उद्योग, विपणन, व्यापार, जल-जंगल-जमीन, शिक्षा और मानवीय संसाधनो में घुसपैठ कर बेतहाशा मुनाफा कमाने की छूट दी गई। निजीकरण के जरिए सरकारों ने जनता के पैसे से कायम किए गए उद्योगों को औने-पौने बड़े पूंजीपति घरानों के हवाले किया। विदेशी मालों के लिए संप्रभु देशों ने अपने बाजार खोल दिए और जिन मालों के उत्पादन में वे आत्मनिर्भर थे वे भी बाहर से आने लगे। टैक्स कम किए गए ताकि पूंजीपति के पास निवेश के लिए अधिक पूंजी हो जिससे विकास हो, कारपोरेट टैक्सों को कम करने का नतीजा यह हुआ कि सरकारों के पास सामाजिक कल्याण-शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार पर खर्च करने के लिए और खेती आदि में किसानों और छोटे-मझोले उद्योगों को सहायता (सिब्सडी देने के लिए पूंजी नहीं बची। विभिन्न देशों की पूंजीवादी या गैर-पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं को एक ही विश्व बाजार अर्थव्यवस्था में सोख लिया गया। मुनाफा बढ़ाने के लिए सस्ते श्रम और कच्चे माल की तलाश में उत्पादन को बड़े पूंजीपति देशों से हटाकर तमाम तीसरी दुनिया के देशों में स्थानान्तरित करने की मुहिम चलायी गई, जिसे आउटसोर्सिंग कहा जाता है। ऐसे व्यवसायों में जिन्हें रोजगार मिला उन्हें राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा पगार मिलने लगी, लेकिन निचले और मèयम वर्गों के बड़े हिस्से की वास्तविक आय में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। आय में बढ़ोत्तरी न होने से मांग घटी और मांग के मुकाबले उत्पादन ज्यादा होने की समस्या फिर सर उठाने लगी। दूसरी ओर ध्नी तबकों ने उत्पादन की जगह सट्टेबाजी के जरिए मुनाफा बढ़ाने की ओर कदम बढ़ाया। हमारे देश में पिछले एक दशक में लगभग 1लाख 36 हजार किसानों ने आत्महत्या की। ये आमतौर पर वे किसान थे जिन्होंने दुनिया की मंडी में बिकाऊ फसलें कर्ज लेकर उगाई थीं लेकिन उनकी फसलें बिक नहीं सकीं। आज अर्थव्यवस्था में ज्यादातर मजदूरों को ठेके पर काम करना पड़ता है और उनकी दैनिक जरूरतों की चीजें बाजार में ही उपलब्धहैं। जिन्हें खरीदने के लिए उनकी आय कभी भी पूरी नहीं पड़ती। गांव छोड़कर दूर-दराज के इलाकों में रोजगार की तलाश में भटकने वाले ये भारतीय नागरिक इस विश्व व्यवस्था में इंसान से एक दर्जा कम वजूद रखते हैं। विकास दर और सेंसेक्स की उछाल में रमे मुट्ठी भर सफल हिंदुस्तानी 20 करोड़ ऐसे भूखे हिंदुस्तानियों से रहन-सहन, बोली-बानी, जीवनशैली से पूरी तरह अलग हो चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय खाद्यनीति शोध संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक हमारा देश सबसे ज्यादा भूखा है। अमरीका में आए ताजा वित्तीय भूचाल ने आउटसोर्सिंग के बूते और स्टॉक माकेर्ट के सट्टों के जरिए अमीर हुए मध्यवर्गीय भारतीयों को पहली बार यह एहसास दिलाया है कि अंतत: वे इसी देश के रहने वाले हैं जो कि भूखा और दुखी है। भारत में आउटसोर्सिंग उद्योग की 40 फीसदी आय विकसित देशों के वित्तीय क्षेत्रा से आती है। इस क्षेत्र में आई तबाही के चलते बैंगलोर और नोएडा व गुडगांव जैसे समृद्धि के नए टापू भी डूबने से शायद ही बच पाएं। कई जगह दो लाख रूपए महीना पाने वाले 20 हजार पर आ गए। छंटनी इन उद्योगों से बड़े पैमाने पर हो रही है। शेयर दलालों और व्यवसायियों की आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं। अमरीका में भारतीय मूल के व्यवसायी ने सपरिवार खुदकुशी कर ली। भारत में इस भूचाल के पड़ने वाले प्रभावों को सट्टा बाजार की गिरावटों, मंहगाई, रूपए की दर में गिरावट और विकास की संभावित दरों में गिरावट में देखा जा सकता है। दरअसल पूंजीपतियों के लिए किसानों की जमीन हड़पकर विदेशी पूंजी के बूते उन्हें तमाम टैक्सों से मुक्ति देते हुए जिस विकास के मॉडल को भारत के हुक्मरान यहां लाद रहे हैं वह भारी तबाही और विस्थापन के बावजूद चल नहीं सकेगा। परमाणु करार करके सत्ताधरियों ने अमरीका के आण्विक रिएक्टर उद्योग को डूबने से बचा लिया है। तमाम सैन्य समझौते अमरीका के सैन्य उद्योगों को राहत देंगे। इस तरह हम लगातार अमरीका के संकट को हल करने में हलाक होते जाएंगे। दरअसल पिछले दो दशकों से सरकारों ने पूरे देश को ही खुदकुशी की राह पर बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अमरीका के `वार ऑन टेरर´ में शामिल होकर हमारी सरकारों ने अमरीका के शत्रुओं को अपना शत्रु बना लिया है। देश चतुदिर्क आतंकवाद के हमले झेल रहा है। दक्षिण एशिया में भारत और अमरीका की रणनीतिक साझेदारी तमाम पड़ोसियों से हमें अलगाव में डाल देगी। इस्राइल के साथ भारत के मजबूत होते रिश्तों ने मèय एशिया में भी भारत के प्रति नकारात्मक भावनाओं को जन्म दिया है। हमारा देश अमरीका के पिछलग्गू के रूप में देखा जा रहा है और दुनिया भर में अमरीकी हमलों से तबाह होते लोग हमें भी अपना दुश्मन मान बैठें तो कोई आश्चर्य नहीं। आज देश अंदर और बाहर से जितना असुरक्षित है उतना शायद ही कभी रहा हो। अमरीकी साम्राज्यवाद का टाइटैनिक 21वीं सदी में तेजी से बर्फीली चट्टान से टकराने की ओर बढ़ रहा है। हमारे शासकों ने देश की नौका उसके साथ बांध् दी है, जिससे संबंध्-विच्छेद के लिए जनता का संग्राम आज की देशभक्ति और युगधर्म है।

नई विश्व-व्यवस्था में समायोजित होने के क्रम में हमारे देश की सत्ताधरी पार्टियों ने जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी के साथ-साथ उड़ीसा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, बंगाल हर कहीं जल-जंगल-जमीन पर कब्जा, विरोध् में उठने वाले आंदोलनों का बर्बर दमन, राजनीति से बुनियादी मुद्दों को गायब कर धर्म-जाति-क्षेत्र के नाम पर जनता को लड़ाना, इस युद्द के अनेक रूप हैं। जिन जनविरोधी कामों को सरकारें जनाक्रोश के डर से खुद नहीं कर पातीं उन्हें अदालतें अंजाम दे रही हैं। सरदार सरोवर बांध् को ऊंचा करने से लेकर पास्को और वेदान्त जमीन हड़प मामलों, दिल्ली में सुपर शॉपिंग मॉल की श्रृंखला को फायदा पहुंचाने के लिए सीलिंग जैसे फैसले कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने वाले और मेहनतकश जनता के खिलाफ हैं। पिछले 2 दशकों में अदालती भ्रष्टाचार, कारपोरेट घरानों और राजनीतिक दलों से प्रभावित न जाने कितने फैसलों के बारे में चर्चाएं आम हैं। गाजियाबाद के अदालती कर्मचारियों के पी.एफ. घोटाले में जजों की संलिप्तता से संबंधित मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश तक सुनवाई में बैठने से कन्नी काट गए। कलकत्ता हाईकोर्ट का भ्रष्टाचार में आरोपी एक जज खुलेआम ललकार रहा है कि हिम्मत हो तो,महाभियोग चलाकर देखो।
भूमंडलीकरण के दौर की राजनीति सत्ता की पार्टियों के बीच नूराकुश्ती बनकर रह गई है। जनता से निपटने के लिए काले कानूनों, फर्जी एन्काउन्टरों और अमरीका के साथ सैन्य साझेदारी के सभी पक्षधर हैं। अपने ही देश को विदेशियों के साथ मिलकर लूटने में हमारे देश का दलाल पूंजीपति और नौकरशाह तबका लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गैर-संसदीय हथियारबंद सेनाएं इस हद तक ताकतवर हो चुकी हैं कि उनकी बम फैक्ट्रियां पकड़ी जाती हैं, उनके सदस्य मालेगांव जैसी जगहों पर बम विस्पफोट में लिप्त पाए जाते हैं, फिर भी उन पर प्रतिबंध लगाने की बात कोई सरकार नहीं सोच पाती। उन्होंने देश की सेना, नौकरशाही और गुप्तचर व्यवस्था तक में इस हद तक घुसपैठ बना ली है कि सत्ता में रहे बगैर भी उनकी हमलावर क्षमता कापफी अधिक है। कम से कम आज की तारीख में किसी भी और राजनीतिक अथवा गैर-राजनीतिक समूह की मारक क्षमता उनसे अधिक नहीं है। आज देश में यह पता लगाना बहुत मुश्किल है कि किसी खास आतंकी घटना के पीछे वास्तव में कौन है। अल्पसंख्यकों पर हमले इस्लामी आतंकवाद के हौव्वे के नाम पर या फिर धर्मांतरण के नाम पर खुलेआम जारी हैं। राजसत्ता के द्वारा भी और संघ परिवार द्वारा भी। जामिया का बाटला हाउस एन्काउन्टर हो या मुंबई में राहुल राज का एन्काउन्टर, तमाम निर्दोष लोग एक फासीवादी होती जा रही राज्य मशीनरी के शिकार हो रहे हैं। जबकि खुलेआम हिंदुओं को आत्मघाती दस्ता बनाने की अपील करने वाले बाल ठाकरे या उत्तर भारतीयों पर कहर ढाने वाले राज ठाकरे कानून और संविधन से ऊपर हैं। हाल के वर्षों में दया नायक सहित करीब बीसियों एन्काउन्टर स्पेशलिस्टों के मामले प्रकाश में आ चुके हैं जिन्होंने माफियाओं के लिए काम करते हुए अरबों की संपत्ति खड़ी की। यही वह मंजर है जब हम आज धुमिल की धरती पर अपना 11 वां राष्ट्रीय सम्मेलन कर रहे हैं।
जहां फासीवादी राजनीति खुद को लगातार संस्कृति के खोल में पेश करती रही है वहीं जन संस्कृति को लगातार राजनीतिक होते जाना पड़ेगा। वाल्टर बेंजामिन ने लिखा था `होमर के समय में जो मनुष्यता ओलंपियन देवताओं के मनन का विषय थी, अब वह अपने ही मनन का विषय है। उसका आत्म-निर्वासन इस हद तक बढ़ चुका है कि वह अपने ही विनाश का अनुभव प्रथम कोटि के सौन्दर्यात्मक आनंद की तरह कर सकती है। राजनीति की यही दशा है जिसे फासीवाद सौन्दर्यात्मक बनाता जा रहा है। कम्युनिज्म कला का राजनीतिकरण करके ही इसका जवाब देता है।´´ (इल्युमिनेशंस, अनुवाद हैरी जॉन, फॉन्टाना, 1992, पृ. 235, द वर्क ऑपफ आर्ट इन द एज ऑपफ मकैनिकल रिप्रोडक्शन दरअसल आज हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या लगातार हिंदी में डब होकर आ रही हालीवुड की डिजास्टर मूवीज़ पर èयान दें तो बेंजामिन की बात अिध्क पुष्ट होगी। बेंजामिन के ही शब्द लें तो `सौन्दयीर्कृत राजनीति का उच्चतम रूप युद्ध है´। खाड़ी युद्ध से लेकर सद्दाम की पफांसी तक टी.वी. के पर्दे पर देखते हुए करोड़ों लोगों ने विनाशलीला को एन्जॉय किया है। सनसनी की खोज में फर्जी मुठभेड़ तक आयोजित कराने वाले टी.वी. चैनलों ने अपराध्, युद्ध और अंधविश्वास को उपभोक्ता वस्तुओं में बदला है। कारगिल युद्ध के आसपास भारत-पाक रिश्तों पर बनी फिल्म ने अंधराष्ट्रवाद और मुस्लिम-विरोध् को कलात्मक आनंद में बदला। फर्जी एन्काउन्टर के स्पेशलिस्टों को नायक का दर्जा दिलाया। अखबार में लिखने वाले तमाम कॉलमनिस्ट गुजरात जनसंहार से लेकर कंघमाल तक की घटनाओं को स्वाभाविक बनाने के प्रयास में तरह-तरह के तर्क गढ़ते रहे हैं। फर्जी एन्काउन्टर पर सवाल उठाने वाले देशद्रोही बताए जाते हैं। देशभक्ति को इतना सस्ता बनाया गया कि कोई भी मापिफया, डकैत या लंपट भी पाकिस्तान अथवा मुशरर्पफ को चार गाली देकर या फिर पाकिस्तान के खिलापफ भारतीय क्रिकेट टीम की जीत पर पटाखे पफोड़कर देशभक्त का तमगा पा सकता है। अमरीका के खिलापफ कुछ भी बोलने पर तत्काल आपको चीन या पाकिस्तान का समर्थक घोषित कर दिया जाएगा। आस्था का दायरा अब पुलिस और सेना तक पहुंच गया है। जिस तरह हमारे सारे अच्छे कर्मों के लिए विधता उत्तरदायी है और बुरे कर्मों के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं और विधता के दंड को हमें स्वीकार करना चाहिए, उसी तरह अब पुलिस और सेना जिस किसी को प्रताड़ित करती है उसे उसके बुरे कर्मों का परिणाम बताया जा रहा है। पुलिस, सेना और राजसत्ता आज के नए भगवान हैं, जिन पर उंगली उठाना कुफ्र है। भीतर तक सड़ चुकी अदालती व्यवस्था के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने वाले भ्रष्ट नेता-नौकरशाह और अपराधी हर रोज अखबारों और टी.वी. के पर्दों पर दिख जाते हैं। जिस न्याय व्यवस्था को ऐसे तत्वों का सम्मान मिले उसकी न्यायप्रियता के बारे में सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। जिस तरह का कॉमन सेंस कारपोरेट मीडिया, शैक्षणिक संस्थाएं, अदालतें, जातिगत संस्थाएं, धर्मगुरु आज बना रहे हैं, वह फासीवाद के ही अनुकूल है और साम्राज्यवाद के मंसूबों को पूरा करने वाला है।
ऐसे में सांस्कृतिक प्रतिरोध् के कौन से रूप हो सकते हैं? संस्कृति या कला के राजनीतिकरण की दिशा क्या हो सकती है? किस तरह की संस्थाएं हम बना सकते हैं? जनांदोलनों की देश में कोई कमी नहीं, भले ही वे किसी संगठित पार्टी या विचारधरा द्वारा संचालित न भी हो रहे हों। क्या प्रतिरोध सांस्कृतिक कर्म का इनसे कोई रिश्ता जुड़ पाता है? क्या साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा, नाटक या फिर बौद्धिक विमर्श के क्षेत्र में काम कर रहे लोग व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों की चेतना को बड़े पैमाने पर अभिव्यक्त कर पा रहे हैं? देश के गरीबों का एक बहुत बड़ा तबका अपनी-अपनी जाति के बड़े लोगों के पीछे अपने सांस्कृतिक-वैचारिक पिछड़ेपन के कारण घिसट रहा है। जाहिर है यह स्थिति गरीबों को सचेतन वर्ग के रूप में राजनीतिक रूप से गोलबंद होने से रोकती है। क्या हमारा संस्कृतिकर्म उन वैचारिक और सांस्कृतिक जंजीरों से उन्हें मुक्त करने में कोई भूमिका निभा रहा है जिनमें जकड़े हुए वे अपने ही शोषकों को मजबूत करने को अभिशप्त हैं? साहित्य-संस्कृति सिर्फ इसी अर्थ में राजनीति के आगे चलने वाली मशाल हो सकती है कि वह जनान्दोलनों के लिए रास्ता सापफ करे, गरीबों को वर्ग सचेतन बनाने में वैचारिक और सांस्कृतिक अस्त्रा मुहैया करे। जबकि संस्कृति और उसकी संस्थाओं का एक बहुत बड़ा दायरा बाजार या राजसत्ता ने घेर लिया है (और लोकसंस्कृति भी इस दायरे से मुक्त नहीं हैद्ध तब उन दोनों से स्वायत्त कोई वैकल्पिक दायरा क्या हम निर्मित कर सके हैं? इस दायरे का ठोस रूप संगठन के अलावा शायद ही कुछ और हो, लेकिन संस्कृति और बौद्धिक कर्म में लगे हुए ढेर सारे धर्मनिरपेक्ष और किंचित प्रगतिशील लोग भी बाजार अथवा राजसत्ता की अपेक्षा संगठन को ही अपनी स्वतंत्रा रचनात्मकता में बड़ी बाधा माने बैठे हैं। क्या बाजार अथवा राजसत्ता असंगठित क्षेत्र हैं? सच तो यह है कि बाजार और राजसत्ता ही नहीं बल्कि सामंती मूल्यों वाली हमारी समाज-व्यवस्था जिसमें जातिगत विशेषाधिकार और जातिगत कलंक आज भी बड़ी भूमिका निभाते हैं, हमारे समाज के स्वाभाविक संगठन हैं। परिवार व्यवस्था को भी ऐसा ही मानना चाहिए। मुश्किल यह है कि इसी व्यवस्था में रहते हुए उसके प्रति रैडिकल आलोचनात्मक दृष्टि के साथ हमें प्रतिरोध् के लिए संगठित होना है। यह टेढ़ी खीर है, धरा के विरुद्ध तैरना है लेकिन और कोई विकल्प नहीं है।
साहित्य के ही क्षेत्र को लें। आजकल यह कहने का चलन हो गया है कि साहित्य प्रतिरोध् का क्षेत्र है, मानो कि यह कोई स्वयंसिद्ध त हो। लेकिन यदि हम प्रकाशन जगत, सरकारी खरीद, साहित्य-संस्कृति की सरकारी संस्थाओं, कारपोरेट घरानों के साहित्यिक जाल पर नजर दौड़ाएं तो साहित्य की वर्तमान दशा-दिशा पर उनके प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह मानना गलत होगा कि पूंजीवादी बाजार और राजसत्ता ने साहित्य के क्षेत्र को अछूता छोड़ दिया है। जब हम साहित्यिक आलोचना की दुनिया पर नजर डालते हैं तो साहित्य के उत्पादन संबंधें के बारे में, उसके उपभोग पक्ष के बारे में कम ही जानकारी मिल पाती है। विचारधारा की बातें जरूर मिलती हैं लेकिन साहित्य उत्पादन की वस्तुगत परिस्थितियों पर नजर कम जाती है। हमारे संगठन के साथ यह बात जरूर शुरू से रही आई कि हमने इस पक्ष को अनदेखा कभी नहीं किया। साहित्य और संस्कृति के समाजशास्त्र, आलोचना की राजनीति, आलोचना की सामाजिकता, संस्कृति विमर्श के समकालीन संदर्भ, साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक हमले के दौर में जनभाषाओं की चुनौतियों, साहित्य में वर्ग की अवधरणा आदि पर हाल के वर्षों में हमारे अध्यक्ष महोदय ने खास बल दिया है। यदि हम अपने पहले महासचिव गोरख पाण्डेय के लेखन को याद करें तो यह बात हमारे लिए नई नहीं है। नया है वह परिवेश जिसमें इन अवधरणाओं को नए रूपों में व्यावहारिक धरातल पर विकसित करने की जरूरत है। हमने अभी इस स्तर पर कम ही काम किया है। अभी तो हमारे बीच ही इन्हें स्पष्ट होना बाकी है। स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समूहों की अिस्मता के साहित्य की आजकल चर्चा कापफी है। हमने वैचारिक स्तर पर इन विमर्श में हस्तक्षेप किया है और कोशिश की है कि इन विमर्श के वर्गसार को विश्लेषित किया जाए और उन्हें अभिजन वर्ग की जगह गरीब तबकों के संघर्षों की अभिव्यक्ति की दिशा में प्रेरित किया जाए। यह स्वागतयोग्य बात है कि दलित लेखकों का बड़ा हिस्सा साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण का विरोधी है जबकि दलित राजनीति और उसके वैचारिक नेताओं का बड़ा तबका उसका सहयोगी है। साहित्य के दायरे के सिकुड़ने को लेकर चिंतित कई लोग उसे बाजारोन्मुख बनाने के लिए `टैलेन्ट हन्ट´ में उतरे हुए हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि मुनाफे के प्रकाशनतंत्र के जरिए ही किताबें लोगों तक पहुंचने की जगह करोड़ों की सरकारी खरीद में महज़ कुछ लाइबे्ररियों में पहुंचाई जाती हैं जिन तक जनता की पहुंच नहीं है। क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि सिंगूर-नंदीग्राम, नर्मदाघाटी, किसानों की आत्महत्या, चेंगारा (केरल के दलितों के भूमि संघर्षों, कश्मीर घाटी और पूर्वोत्तर प्रान्तों में सैनिक दमन के खिलापफ छोटे बजट की डाक्यूमेन्ट्री फिल्में तो बनी हैं, लेकिन इन संघर्षों के बीच जीते मरते लोगों की दास्तानें 40 करोड़ लोगों की हिंदी भाषा के साहित्य में दर्ज नहीं हो पा रही हैं? यह सच है कि पिछले 2 दशकों में साहित्य ने सांप्रदायिकता, सामंती उत्पीड़न और बाजारवाद की आलोचना के बहुरंगी चित्रा उपस्थित किए हैं लेकिन अभी भी संघर्षरत आमलोगों ने, किसानों-नौजवानों और आदिवासियों ने हमारे साहित्य को अपने जीवन संघर्ष के लिए जरूरी नहीं पाया है। जिनके पास संघर्षों के अनुभव हैं उनके पास अभिव्यक्ति के साध्न नहीं और जिनके पास अभिव्यक्ति के साध्न और कौशल है उनके पास उन अनुभवों का आत्मीय परिचय नहीं। क्या इस खाईं को हमारा साहित्य पाट पाया है ? मुक्तिबोध् को कचोट थी कि `मैं उनका ही होता जिनसे रूप-भाव पाए हैं´ या फिर गोरख पाण्डेय ने लेखकों के विचारधरात्मक रूपान्तरण, अंतर्वस्तु और रूप के द्वंद्वात्मक संबंध तथा संप्रेषण की समस्या को सुलझाने को कार्यभार माना था। इस कार्यभार को वहन करना आज भी क्या उतना ही जरूरी नहीं है ? गोरख जी ने लिखा था ``कलात्मकता और लोकप्रियता एक दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी हैं। हम मध्यवर्ग के लिए या उच्चवर्ग के लिए किसान और मजदूर के जीवन और संघर्ष से जुड़ी रचनाएं नहीं करते, हमारे प्राथमिक श्रोता और पाठक खुद मजदूर और किसान हों, इस पर ध्यान देना चाहिए।´´ जिस तरह उस समय शास्त्रीयतावाद, आधुनिकतावाद और अराजकता की प्रवृत्तियों से लड़ना पड़ा था, उसी तरह से आज भी इन चिंताओं को वहन करने वाले तमाम लोगों को उत्तर-आधुनिकता, उत्तर-संरचनावाद और उत्तर-औपनिवेशिकता के शासकवर्गीय भाष्य से प्रेरित उन सिद्धांतों से जरूर ही दो-दो हाथ करना पड़ेगा जो इतिहास, यथार्थवाद और विचारधरा के विरोध् में प्रस्तावित किए जा रहे हैं। इस भ्रम में किसी को नहीं रहना चाहिए कि इस तरह के भाष्यों और सिद्धांत को कुछ व्यक्ति अभिव्यक्त कर रहे हैं बल्कि ये प्रयास सांस्थानिक हैं। हमारी अकादमियां पश्चिम के जिन सत्ता-केन्द्रों से जुड़ी हुई हैं, यह उनका एजेंडा है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय भाषाओं का साहित्य अमरीका की लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में कैटलॉग होता है, उनका चयन और वर्गीकरण होता है, उनके कैनन बनाए जाते हैं। अभी तो अंग्रेजी में लिखे या अनूदित भारतीय साहित्य की ही पश्चिम के अकादमिक हलकों और कारपोरेट पुरस्कार-दाताओं में पूछ है,लेकिन वह दिन दूर नहीं जब यह सब कुछ भारतीय भाषाओं की मौलिक कृतियों तक भी पहुंचेगा। दरअसल मानवाधिकार से लेकर साहित्य तक सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधि का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो पश्चिम के संस्थागत प्रयासों से अछूता हो। यह व्यक्तियों की बात नहीं है और न ही उनकी इच्छा-अनिच्छा से प्रभावित होने वाली चीज है। जाहिर है कि पश्चिम के कारपोरेट फाउन्डेशनों, बड़ी पूंजी के एन.जी.ओ. और एम्बेसियों को हमारी भाषाओं और साहित्य या हमारे मानवाधिकार आंदोलनों में दिलचस्पी महज़ विश्वबंधुत्व के चलते नहीं है। उनके एजेंडा स्पष्ट हैं।
हमने हाल के दिनों में फिल्म समारोहों के बेहतर आयोजन के अनुभव प्राप्त किए हैं। एक वह समय भी जरूर था जब फिल्म डिवीजन सार्थक और गरीबों के जीवन संघर्षों पर बनने वाली छोटे बजट की फिल्म को फाइनेन्स कर दिया करता था और वे दूरदर्शन पर दिखाई भी जाती थीं। इन फिल्म के खिलापफ बाजारू फिल्में बनाने वाले यह आरोप लगाते थे कि गरीब आदमी यों ही जीवन की चक्की में पिसता रहता है और अगर यही सब फिल्म के पर्दे पर भी वह देखेगा तो उसकी निराशा और दु:ख और बढ़ेंगे जबकि कॉमर्शियल फिल्म की मार-धड़, सेक्स और सनसनी उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, राहत तो देते हैं। फिर भी यह कहना होगा कि इन भोथरे तर्कों से लोहा लेते हुए समानान्तर फिल्म का निर्माण प्रतिरोधी कला की दृष्टि के साथ होता रहा। लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में वे संस्थाएं जानबूझ कर नष्ट की गईं जो सार्थक सिनेमा को थोड़ी पूंजी उपलब्ध करा दिया करती थीं। आज अज़ीज़ मिर्जा, बेनेगल या निहलानी तक को माकेर्ट फ्रेंडली बनने पर मजबूर होना पड़ रहा है। दूसरी तरपफ डॉक्यूमेंटरी फिल्म ने अनेक आंदोलनों को डॉक्यूमेंट किया है। हमारे साथियों ने तमाम ऐसी फिल्म व तीसरी दुनिया के प्रतिबिंबनिर्माताओं की फिल्म को दिखलाया है। जरूर हमारे साथी संघर्षरत जनता की फिल्म का निर्माण करने में सक्षम होंगे लेकिन ऐसा वे तभी कर सकेंगे जब वे पूंजी के तर्क का मुकाबला संगठन के तर्क से कर सकेंगे।
नाटक के क्षेत्रा में भी यही बात कमोबेश लागू है। हमारे साथियों ने नुक्कड़ और स्टेज दोनों पर बिहार की बाढ़ से लेकर जामिया नगर के फर्जी एन्काउन्टर तक बेहद लोकप्रिय नाटक खेले हैं। नाट्य विध का हमारा अनुभव बिहार में सामंतवाद विरोधी किसान आंदोलन के साथ-साथ पनपा है। भगतसिंह जन्मशती के अवसर पर उनके जीवन पर भी हिरावल ने नाटक खेला। 1857 से लेकर हाल के अमरीकी वित्तीय भूचाल तक न जाने कितने विषय ऐसे हैं जिन पर हम नाटकों के जरिए आम जनता को सरलता से अपनी बात पहुंचा सकते हैं। इसे संस्थाब( रूप दिए जाने की ओर कुछ कदम हमने जरूर बढ़ाए हैं। परफार्मिंग आर्टिस्ट हमारे सांस्कृतिक आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता बन सकें और रोजी-रोजगार की चिंता उन्हें हर दिन न साले इसके लिए बड़े प्रयास की जरूरत है।
बेगूसराय के पिछले सम्मेलन के बाद जनमत पत्रिका ने कुछ एक महत्वपूर्ण बहसों में हस्तक्षेप किया है - खासतौर से 1857 से संबंधित बहसों में। कुछ प्रगतिशील मित्रों को 1857 को पहला स्वाधीनता संग्राम या भारतीय राष्ट्र की प्रसवपीड़ा कहे जाने से आपत्ति है। वे इसे सामंती प्रतिक्रिया मानते हैं। जनमत में छपे लेखों में यह कहा गया था कि मार्क्स-एंगेल्स ने इसे प्रथम स्वाधीनता संग्राम माना था। ये साथी यह मांग करते हैं कि उन्हें यह दिखाया जाए कि माक्र्स-एंगेल्स ने ऐसा कहां लिखा। अब उन्हें कौन यह बताए कि उन्होंने इस बात को एक वाक्य में नहीं बल्कि 80 हजार शब्दों में लिखा है। शब्द ही पकड़ना है तो मार्क्सके शब्द हैं `राष्ट्रीय-विद्रोह´। राष्ट्रीय विद्रोह कहते हुए मार्क्स राष्ट्र की बात कर रहे हैं? जाहिर है वे भारत की बात कर रहे हैं, जो राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में था और 1857 इस प्रक्रिया का जरूरी पड़ाव था। यह राष्ट्रीय विद्रोह किसके खिलाफ था? जाहिर है कि औपनिवेशिक अंग्रेज शासकों के खिलापफ था। भारतीय राष्ट्र का औपनिवेशिक शासकों के खिलापफ विद्रोह अगर स्वाधीनता संग्राम नहीं तो और क्या कहा जाएगा? और मार्क्सभी इससे अलग क्या कह रहे थे?
समस्या यह है कि जो मित्र इस महान विद्रोह को सामंती षड्यंत्र मानते हैं और व्यापक किसान-दस्तकार-बहुजन की भागीदारी को सामंती अनुकूलन, वे इतिहास को सर के बल खड़ा कर रहे हैं। मार्क्स ऐसा कतई नहीं मानते थे। वास्तव में ज्यादातर सामंत इस युद्ध में अंगे्रजों के ही साथ थे, जो नहीं थे वे व्यापक जन-भावना के दबाव से अनुकूलित थे. उनमें से कुछ के घोषणापत्रों की प्रतिक्रियावादी बातों से पूरे विद्रोह का सार ग्रहण कर लेना कौन सा इतिहासबोध है? फिर कौन यह दावा कर रहा है कि 1857 में शरीक सारे राजे-रजवाड़े सामाजिक क्रांति करना चाह रहे थे? कौन भला यह दावा करेगा कि इतने बडे जन-समर में ढेरों अंतर्विरोध नहीं थे? सवाल महज़ इतना है कि कौन सा अंतर्विरोध् प्रमुख है जिससे कि उसका चरित्र निर्मित हुआ। दरअसल यह इतिहासबोध् किसी के काम का नहीं, उस बहुजन समाज के काम का तो कतई नहीं जिनके पक्ष से लिखे जाने का वो दावा करता है क्योंकि वह उन्हें भारत की आज़ादी की लड़ाई पर उनकी वास्तविक और वाजिब दावेदारी से वंचित करता है। उत्तर-आधुनिक और भूमंडलीकरण के दौर में हमें लगातार अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों से अलग करने की कोशिशें हजारहां तरीकों से जारी हैं। लेकिन हमें अपने इतिहास के तमाम ऐसे प्रसंगों को सदैव नए संदर्भ में जगाना है जो कि दमन-शोषण के खिलापफ मनुष्य के अनवरत संघर्षों की याद दिलाते हैं। साथ ही लोकजीवन की तमाम ऐसी प्रतिरोधी परंपराओं से भी उन्हें जोड़ना है जो अभी भी जीवित हैं। 1857 पर चल रही हिंदी की बहसों को इसी प्रसंग में देखना होगा।
जनमत के प्रसंग में हमने इस बहस का जिक्र इसलिए किया कि अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बावजूद उसके हस्तक्षेप को रेखांकित किया जा सके। हमें मालूम है कि जनमत से जो अपेक्षाएं हमारे साथी और आम पाठक करते हैं उन्हें हम अभी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। अध्यक्ष महोदय सहित तमाम साथियों के बेहतर सुझाव हमें मिलते रहे हैं लेकिन इन पर अमल हम सदैव नहीं कर पाए हैं। जाहिर है कि इस सम्मेलन से भी सुझाव और आलोचनाएं हमें इसे बेहतर बनाने में मदद करेंगी।
पिछले बेगूसराय सम्मेलन में पूर्व-महासचिव श्री अजय सिंह ने सांस्कृतिक संकुल का जो प्रस्ताव रखा था उसे यहां दोहराने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह आज भी हमारा प्रमुख कार्यभार है जिसे हमें अब चरणबद्ध ढंग से पूरा करने की योजना लेनी होगी। संकुल में अब तक जो भी धनराशि एकत्रित हुई उसके बारे में कार्यकारी महासचिव रिपोर्ट रखेंगे लेकिन जिस एक महत्वपूर्ण उपलिब्ध की चर्चा यहां आवश्यक है वह है लेखक और संस्कृतिकर्मियों के लिए स्थापित सहायताकोष से सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री अमरकांत को 50 हजार रुपए दिया जाना। हमारी इस पहल को लोगों ने काफी सकारात्मक माना है। लेखक के स्वाभिमान की रक्षा में यह छोटा ही प्रयास सही, महत्वपूर्ण जरूर है।
पिछले सम्मेलन के कार्यभारों में राज्य इकाइयों का गठन एक महत्वपूर्ण कार्यभार था लेकिन यह काम अभी सिर्फ झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों के सम्मेलन के जरिए ही हो सका है। दिल्ली, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान के सम्मेलन की योजना हमें यहीं से लेनी होगी। राज्यों और दूसरे सांगठनिक निकायों (सांस्कृतिक संकुल और फिल्म समारोह के संयोजक अलग से रखेंगे और तब हम संगठन की समस्याओं पर गंभीर चर्चा सांगठनिक सत्र में कर सकेंगे।
हमारा सांस्कृतिक आंदोलन और संगठन साम्राज्यवाद और सामंतवाद विरोधी किसान संघर्षों से ही जीवनी शक्ति प्राप्त करता रहा है। उसकी इस कार्यदिशा में कोई बदलाव अपेक्षित नहीं है। लेकिन गांव की ओर, जनपदीय बोलियों की ओर, लोकसंस्कृति की ओर इसी कार्यदिशा के साथ अधिक सक्रियता के साथ बढ़ना हमारे लिए बेहद जरूरी है। इसमें हम तमाम संगठनों और व्यक्तियों को साथ लेकर चलना चाहेंगे। बिहार के शाहाबाद क्षेत्रा के ग्रामीण और कस्बाई अंचलों में 1857 और भगतसिंह जन्मशती कार्यक्रमों की श्रृंखला, पिछले वर्ष कुशीनगर में जोगियापट्टी गांव में संयुक्त रूप से आयोजित लोकरंग कार्यक्रम, गाजीपुर में मुहम्मदाबाद ब्लॉक में आयोजित मेला इस दिशा में किए गए उदाहरणीय प्रयास हैं। जनकवि धुमिल के गांव में हमारे 11वें सम्मेलन का होना इसी कार्यदिशा को मूर्त रूप देने का प्रयास है।
पूरी 20वीं सदी में प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जमातों की अपेक्षा साम्राज्यवादी और फासिस्ट ताकतें संस्कृति का इस्तेमाल अपने हित में कर ले जाने में ज्यादा सपफल रहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके खिलापफ प्रतिरोध् की सांस्कृतिक कोशिशों को हम कम करके आंकें। आज पूरे लैटिन अमेरिका में हम नए किस्म की सांस्कृतिक सक्रियता, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों के साथ-साथ देख रहे हैं। क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देशों ने संस्कृति पर जोर बढ़ाया है। पूंजीवादी मूल्यों की अपेक्षा समाजवादी मूल्यों की श्रेष्ठता की स्थापना सांस्कृतिक अभियान का रूप ले रही हैं। आज जब पूंजीवादी शोषण इस हद तक पहुंच चुका है कि पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व पर ही संकट है तो समाजवाद महज़ बर्बरता से बचाव के लिए नहीं बल्कि मनुष्य प्रजाति के बचे रहने के लिए जरूरी है। आज सांस्कृतिक आंदोलन के लिए बायो-एथिक्स, बायो-कैमिस्ट्री, जेनेटिक टेक्नॉलॉजी, माइक्रो और नैनो दुनिया के तमाम सवाल भी प्रासंगिक हो उठे हैं क्योंकि मानवता और मानवीय संस्कृति के प्रसंग में उनके गंभीर परिणामों के प्रति जागरूकता बहुत जरूरी है। आज सांस्कृतिक कार्यवाही के क्षेत्रों में स्कूल, परिवार, मीडिया और तमाम स्थानीय समुदाय भी शामिल हैं। हम इन क्षेत्रों की अनदेखी नहीं कर सकते। नई विश्व-व्यवस्था के पक्ष में सहमति बनाने के लिए, बौद्धिक समुदाय को साम्राज्यवाद और फासीवाद की आलोचना और उसके विरोध् में कार्यवाही से अलग करने के लिए, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की मशीनरी भारी पैसा खर्च कर रही है। संस्कृतिकर्मियों पर हमले भी तेज हुए हैं। हम बंद दरवाजों के पीछे नहीं रह सकते। हमें सांस्कृतिक हमले से निपटने के लिए आत्मशिक्षण, आलोचनात्मक विवेक और सचेत सांस्कृतिक आदतों का विकास करना ही होगा। और यह सब बगैर संगठन की शक्ति के संभव नहीं।
अगले वर्ष से हम हर वर्ष भारत के विभिन्न राज्यों और भाषाओं में जन संस्कृति मंच के बिरादराना संगठनों का राष्ट्रीय उत्सव आयोजित करेंगे। कला और संस्कृति की तमाम विधाओं में हमारे साथी काम कर रहे हैं। हमारे तमाम नौजवान साथी जो दैनिक या साप्ताहिक अखबार निकालने, कम्युनिटी रेडियो या स्थानीय टी.वी. चैनलों की स्थापना या फिल्म निर्माण का सपना देखते हैं, उसे मैं असंभव नहीं मानता। इतना जरूर है कि हमें अपनी ताकत और कमजोरियों का सही-सही आकलन होना चाहिए। 60 के दशक के यूरोप के छात्र आंदोलन का एक नारा याद आता है `बी रिजनेबल: डिमान्ड द इम्पासिबल´ यानी समझदारी रखिए और असंभव की मांग कीजिए। 70 के दशक का एक नारा था `रियलिटी इज़ ए सब्स्टीट्यूट फॉर यूटोपिया´ अथार्त् यथार्थ आदर्शलोक का स्थानापन्न है। और यूटोपिया नहीं यथार्थ पर खड़े होकर हम जिस आदर्श और सौंदर्य की रचना करेंगे उसे संघर्षरत आमलोग, मजदूर-किसान-नौजवान और आदिवासी अपने जीवन संघर्ष के लिए जरूरी पायेंगे और इसी ओर तो हमारा सारा सांस्कृतिक आंदोलन लक्षित है।
(जन संस्कृति मंच का 11वां राष्ट्रीय सम्मेलन 9-10 नवंबर, खेवली रामेश्वर, बनारस, उत्तर प्रदेश में महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा पढ़ा गया पर्चा)

24 comments:

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