Wednesday, April 30, 2008

दुनिया के दस बड़े आतंकी


धनकुबेरों की टाप टेन लिस्टिंग करनेवाली फोर्ब्स पत्रिका ने अब दुनिया के दस बड़े आतंकियों की लिस्ट जारी की है. अब तक फोर्ब्स की सूची में मुकेश अंबानी के होने पर अगर गर्व कर सकते हैं तो इस सूची में भी दाऊद इब्राहिम ने भारत का नाम रोशन? किया है.

फोर्ब्स का दावा है कि टाप टेन लिस्ट तैयार करते समय उसने दुनिया की कई सारी एजंसियों से मदद ली है.आतंकियों की टाप टेन लिस्ट तैयार करने में पत्रिका ने कई सारे पहलुओं का ध्यान रखा है. अपहरण, कब्जा, स्मगलिंग, उगाही और वैश्कि स्तर पर हत्याओं को मुख्यरूप से आधार बनाया गया है. पत्रिका कहती है कि दुनियाभर में आतंकवादियों सामूहिक रूप से काम करने की भावना पनप रही है जिसके कारण हत्या करनेवाले आतंकियों और दूसरे प्रकार के अपराधियों में एक प्रकार का मजबूत नेक्सस बनता जा रहा है.

1. पहले नंबर पर ओसामा बिन लादेन के अलावा कोई हो भी नहीं सकता है. पत्रिका का अंदेशा है कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के वजीरिस्तान में छिपा हुआ हो सकता है. अमेरिकी सरकार ने ओसामा के सिर 25 मिलियन डालर का इनाम रखा है. जाहिर है वही दुनिया का सबसे बड़े आतंकी का खिताब पा सकता है.

2. दूसरे नंबर पर है मैक्सिको का ड्रग तस्कर जैक्वीन गुजमान. गुजमान कोलंबिया ड्रग नेटवर्क की मजबूत कड़ी है और यूएस में कोकीन सप्लाई का उसका सबसे बड़ा नेटवर्क है. पुलिस उसे पकड़ने के लिए बेताब है और उस पर 5 मिलियन डालर का इनाम है.

3. तीसरे नंबर पर है उजबेकिस्तान का अलमिजान. अलमिजान हथियारों का सौदागर है. इसके अलावा वह ड्रग तस्करी तथा मैच फिक्सिंग का भी कारोबार करता है. उस पर आरोप है कि वह ओलंपिक खेलों को भी फिक्स करवाता है. अमरीकी प्रशासन उसे पकड़ने को बेताब लेकिन संभावना है कि वह रूस की सरहदों में सुरक्षित है.

4. चौथे नंबर पर इंडिया मोस्ट वांटेड दाऊद इब्राहिम. पत्रिका का कहना है कि दाऊद भी पाकिस्तान में छिपा हो सकता है. पत्रिका का कहना है कि वह अलकायदा नेटवर्क का अहम हिस्सा हो सकता है. पत्रिका यह भी संदेह व्यक्त करती है कि उसका आईएसआई से गहरे ताल्लुकात हो सकते हैं.

5. पांचवे नंबर पर है इटली का मेसिना डेनारो. पत्रिका का दावा है कि यह बहुत ही ताकतवर और संगठित आतंकी संगठन का संचालन करता है. इटली में आतंकियों के खिलाफ चले सरकारी अभियान को रोकने के लिए डेनारो ने भारी संख्या में बम विस्फोटों को अंजाम दिया था जिसे कोसा नोस्त्रा कैम्पेन कहा गया था.

6.1994 में 100 दिन तक चले मारकाट में आठ लाख रवांडावासियों के कत्ल के लिए जिम्मेदार फेलिसियन काबुगा अफ्रीका का मोस्ट वांटेड अपराधी है. काबुगा हुतू संप्रदाय का मुखिया है और उसने रवांडा की तुत्सी आबादी के खिलाफ जमकर कत्लेआम करवाया. उसने अपने धन और रेडियों स्टेशन का इस्तेमाल करने के अलावा तुत्सी समुदाय के खात्मे के लिए हथियारों और अन्य सैनिक साजो सामान की आपूर्ति करवाई.

7.पेड्रो एंटोनियो मारीन सातवें नंबर पर है. वह कोलंबिया एफएआरसी का नेता है जिसकी स्थापना 1960 में की गयी. यह वामपंथी झुकाव वाली संस्था है जो फिदेल कास्त्रो को अपना नेता मानती है. इस वक्त पेड्रो पर अपहरण, वसूली और ड्रग सप्लाई के कई मामले चल रहे हैं. अमरीकी सुरक्षा विभाग का कहना है कि असल में एफएआरसी आज दुनिया के सबसे बड़े कोकीन बाजार पर कब्जा किये हुए है. दुनिया में कुल कोकीन सप्लाई के आधे पर इसी संस्था का नियंत्रण है. अमरीकी सरकार ने 5 मिलियन डालर का इनाम रखा है.

8. जोसेफ कोने लार्ड रेजिस्टेन्स आर्मी (एलआरए) का मुखिया है और युगांडा में अपनी सरकार स्थापित करने के लिए नृशंत हत्याओं का दोषी है. एलआरए के कारण अब तक 20 लाख लोग विस्थापित हुए हैं और बच्चों का अपहरण सबसे ज्यादा एलआरए ने नाम दर्ज है. ऐसा समझा जाता है कि 60 हजार बच्चों का अपहरण कर उन्हें बचपन से ही गुरिल्ला युद्ध के लिए तैयार करने की ट्रेनिंग दी जा रही है. कोने पर आरोप है कि वह बच्चों से जबरन लूटपाट और हत्याएं कराने के साथ ही उनका यौन शोषण भी करवाता है. बच्चों को ट्रेनिंग के दौरान अपने ही मां-बाप की हत्या करने के लिए उकसाया जाता है. कोने पर 33 आपराधिक मामले दर्ज है.

9. जेम्स ह्विटी बल्गर बोस्टन में रहनेवाला अमेरिक आईरिश नागरिक है और उसके ऊपर साउथ बोस्टन में अवैध ड्रग कारोबार और उगाही का आरोप है. लगभग एक दशक तक एफबीआई ने कई हत्याओं के आरोप में बल्गर का पीछा किया लेकिन नाकाम रही. एफबीआई का दावा है कि वह अमरीका और यूरोप में अपना नेटवर्क चला रहा है. आशंका यह भी है कि वह आईरिश आर्मी के साथ मिला हुआ है. वैसे बल्गर टाप टेन आतंकियों में सबसे बूढे हैं उनकी उम्र 78 साल है.

10. ओमिद तहलवी या फिर नीनो 37 साल का है और टाप टेन आतंकियों में सबसे कम उम्र नीनो की ही है. नीनो पर आरोप है कि वह व्यावसायिक धोखाधड़ी में माहिर है और यूरोप, मध्यपूर्व और अमेरिका के लोगों को अपना शिकार बनाता है. पिछले नवंबर में वह पकड़ा गया था लेकिन अति सुरक्षित ब्रिटिश कोलंबिया जेल से वह फरार हो गया.

Monday, April 28, 2008

क्रिकेट को चीयरलीडर का तड़का


प्रभाष जोशी बता रहे हैं कि आईपीएल के तड़का क्रिकेट ने सास-बहू के सीरियलों को पछाड़ दिया है. जनता तड़का क्रिकेट देख रही है. इस प्रसिद्धि में चीयर लीडर्स का कितना हाथ है यह कहना अभी मुश्किल है

लेकिन बाजार की इच्छा होगी कि अमेरिका से बुलाई गयी ये लड़कियां कम कपड़ों में नाचती रहें. थोड़े ही दिनों में आप पायेंगे कि सर्वे बता रहे हैं कि चीयर लीडर्स के कारण खेल का रोमांच बढ़ता है. ज्यादा प्रतिशत लोग कहेंगे कि वे क्रिकेट का लुत्फ इन चीयर लीडर्स के साथ उठाना चाहते हैं.

अपने सबसे आधुनिक महानगर मुंबई के कुछ नेताओं को आईपीएल मैचों के दौरान नाचनेवाली लड़कियों की भंगिमाओं पर एतराज हुआ. इन छोटी-छोटी चढ्ढियों और चोलियों में उनकी नाच की भाव भंगिमाएं ऐसी कि यही सब दिखाने के लिए वे नाच रही हैं. आखिर इन्हीं नेताओं ने मुंबई के बार-बालाओं पर पाबंदी लगवाई थी. बार बालाएं तो फिर भी बार के हाल में नाचती थीं ये चीयरलीडर तो खुले स्टेडियम में नाच रही हैं. नेताओं के नैतिक बोध को चोट लगनी ही थी. और उनने पुलिस से कहा कि यह नंगा नाच नहीं चलेगा. कुछ ने विधानसभा में बात उठाई. और तो और शत्रुघ्न सिन्हा को भी यह चीयरलीडर वाला नाच ठीक नहीं लगा. उनने कहा-" इन मैचों में क्रिकेट ढूंढना मुश्किल है और इससे खेल का मजाक उड़ाया जा रहा है."

मुंबई पुलिस ने नेताओं की सुन ली. नवी मुंबई के पुलिस आयुक्त रामराव वाघ ने कहा है कि रविवार की रात नेरूल के पाटिल स्टेडियम में आनेवाली टीमों के मालिकों को कहा गया है कि घरेलू और बाहरी टीमों के साथ जो चीयरदल आये हैं उनको कपड़े आचार संहिता के मुताबिक पहनने होंगे. इंडिया विन स्पोर्ट्स के निदेशक कौशिक राय ने भी कहा है कि ऊंचे पैंट और उरोजों का विभाजन दिखानेवाली चोलियां बिल्कुल नहीं चलेंगी. यानी मुंबई पुलिस और वहां के नेता जिसे अश्लील समझते हैं उस पर पाबंदी लगा दी गयी है.

हैदराबाद में पाकिस्तान के आलराउंडर बल्लेबाज शाहिद अफरीदी ने सबसे पहले चीयरलीडर्स पर यह कहते हुए सवाल उठाया कि अगर आईपीएल पूरे परिवार का मनोरंजन हो तो फिर लड़कियों का ऐसा नाच कैसे दिखाया जा सकता है. इमरान खान भले ही लेडी किलर कहे जाते रहे हों लेकिन 20-20 विश्वकप के दौरान चीयरलीडर्स पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने भी कहा था- वे लड़कियां तो एक तरह से खेल से ध्यान हटाती हैं. लेकिन बाजार की ताकतों का साथ देनेवाला हमारा भद्रलोक चीयरगर्ल के कपड़ों और नाच दोनों पर कोई ऐतराज नहीं दिखाता. इसलिए तो 20-20 के साथ चीयरगर्ल आती हैं और जिन्हें ऐतराज होना चाहिए वे मजा ले रहे हैं.

हमारे चैनल बार-बार चियरगर्ल पर ब्रेक लेते हैं. अखबार क्रिकटरों की नहीं चीयरलीडर्स की फोटो छापते हैं. एक अखबार ने पंजाब टीम की मालकिन प्रीति जिन्टा का अपनी टीम की हौसला अफजाई करते हुए फोटू छापा और नीचे लिखा कि उनके ऐसा करने पर भी टीम दोनों मैच हार गयी. मानों प्रीति जिन्टा की हौसला अफजाई करने से ही टीम को जीत जाना चाहिए था. जैसा बाजार चाहता है मीडिया उसे सच बनाकर दिखाता है. तभी तो चीयरलीडर्स के कपड़ों और नाचने पर हमारे राजनेताओं के ऐतराज पर हमारे अखबार हंसी उड़ा रहे हैं. वे पूछते हैं कि नैतिकता की बात करने का नेताओं का क्या अधिकार है? नहीं होगा. लेकिन सरेआम नंगई बेचनेवाले बाजार और अंधसेवकों को ऐसा करने का क्या अधिकार है? नेता तो फिर भी जनता से चुने गये हैं. इस बाजार को किसने चुना और अधिकार दिया कि वे हमारे समाज के नैतिकता के मूल्य तय करें?

क्या हम अपने परिवारों को ऐसा परिमिसिव बनाना चाहते हैं कि उसके सामने कुछ भी हो जाए और वह ऐतराज न करे? क्या भारतीय समाज अब सिर्फ यूरोप के बाजारू मूल्यों के सामने गिरवी रखने के लिए ही बचा है? या हमारा मीडिया ही बाजार का चीयरलीडर हो गया है?

कागद कारे, जनसत्ता

कौन हैं ये चीयरलीडर?

चीयरलीडर्स की शुरूआत अमेरिका में हुई. 1880 के दशक में विश्वविद्यालयीन खेलों में पहली बार चीयरलीडरों ने अपने-अपने टीमों के उत्साहवर्धन के लिए सामूहिक प्रदर्शन का सहारा लिया. लेकिन पहला चीयरलीडर इवेन्ट मिनिसोटा विश्वविद्यालय के खेलों में जानी कैंपबेल नाम के एक शख्स ने चीयरलीडर के रूप में अपना प्रदर्शन 1898 में किया. 1923 तक चीयरलीडरों की टीम में केवल पुरूष ही होते थे. 1923 के बाद इसमें महिलाएं शामिल हुईं. अपनी टीम के उत्साहवर्धन के लिए प्रयास करना यही उन चीयर लीडरों का काम होता था और इसमें नामी-गिरामी नये पुराने सभी छात्र शामिल होते थे.

फिर धीरे-धीरे यह स्कूल के खेलों में भी शामिल हो गया और आज हर प्रकार के खेलों में चीयरलीडर्स शामिल होते हैं. इनका अपना ड्रेस कोड होता है जिसमें लड़कियों के लिए छोटी टाप अत्यंन्त छोटी स्कर्ट होती है. वे अपने हाथों में कुछ ऐसा खिलौना, चमकी, पमपम आदि रखते हैं जिसका प्रदर्शन करके वे अपनी ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं. इसके अलावा नट-नटनियों के तर्ज पर वे अन्य कई शारिरीक कौशल का प्रदर्शन भी करते हैं. अमेरिका में चीयरलीडिंग खुद एक प्रकार का खेल हो गया है जैसे अपने यहां नट-नटियों का खेल. वे खेलों के दौरान शारीरिक और कौशल प्रदर्शन भी करते हैं. बास्केटबाल और बेसबाल के मैचों में चीयरलीडर्स हमेशा मौजूद रहते हैं.

Saturday, April 26, 2008

वतन से दूर, कैद में मजबूर


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पंजाब के गुरदासपुर जिले से 1991 में गायब हुए कृपाल सिंह को पाकिस्तान में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है. हर तरफ से निराश उनका परिवार चुपचाप इस दर्द को झेल रहा है. उनके परिजन कहते हैं कि पूर्वसैनिक कृपाल नशे की हालत में अनजाने में ही सीमा पार कर गया था. मगर सरहद पार के अधिकारियों को ऐसा नहीं लगता.

इस साल मार्च में पूर्व भारतीय जासूस कश्मीर सिंह की रिहाई से मुस्तकाबाद सैयदान गांव के निवासी कृपाल के घरवालों की उम्मीदें एक बार फिर से बंध गई हैं. कृपाल के 28 वर्षीय भतीजे अश्विनी ने दो अप्रैल को वाघा सीमा पर पाकिस्तान के पूर्व मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी से मुलाकात की और उनसे कृपाल को रिहा करवाने की प्रार्थना की.

भारत के 490 और पाकिस्तान के 210 कैदी एक-दूसरे की जेलों में अभिशप्त जीवन जी रहे हैं. ये संख्या उस सूची में दर्ज है जिसे इस साल 31 मार्च को दोनों देशों की सरकारों ने एक दूसरे को सौंपा है. कैदियों में कई ऐसे हैं जो सजा की मियाद पूरी होने के बाद भी सलाखों के पीछे हैं. एक बड़ी संख्या उनकी भी है जिनकी सुनवाई अभी शुरू भी नहीं हुई है. कैदियों पर घुसपैठ, वीजा शर्तों का उल्लंघन या जासूसी जैसे आरोप हैं.

प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों को पत्र लिखने, मीडिया के सामने रोने और आधिकारिक लिखा-पढ़ी में अपनी कोशिशें और वक्त जाया करने के बाद इन कैदियों के घरवाले कश्मीर सिंह जैसे एक और चमत्कार की उम्मीद में अंसार बर्नी की तरफ देख रहे हैं.

प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों को पत्र लिखने, मीडिया के सामने रोने और आधिकारिक लिखा-पढ़ी में अपनी कोशिशें और वक्त जाया करने के बाद इन कैदियों के घरवाले कश्मीर सिंह जैसे एक और चमत्कार की उम्मीद में अंसार बर्नी की तरफ देख रहे हैं. गौरतलब है कि 34 साल पाकिस्तान की जेलों में बिताकर कश्मीर सिंह हाल ही में रिहा होकर भारत वापस आए हैं. इन कैदियों के परिजनों को सरबजीत कौर की बहन दलबीर कौर से भी प्रेरणा मिली है जो अपने भाई की फांसी की सजा को बदलवाने की हरमुमकिन कोशिश कर रही हैं.

38 वर्षीय रशवीर कौर तब चार साल की थीं जब उनके पिता अजमेर सिंह ग्रेवाल अपने एक दोस्त से मिलने के लिए फीरोजपुर गए थे. उस दिन के बाद उनका कुछ पता नहीं चला. फिर 1982 में एक पाकिस्तानी जेल में उनसे मिलकर आए एक व्यक्ति ने ग्रेवाल परिवार को बताया कि अजमेर सिंह को पाकिस्तान में उम्रकैद की सजा सुनाई गई है. उन्हें पता चला कि अजमेर को वहां जंजीरों में जकड़ कर रखा गया है और आदेश है कि अगर वो भागने की ज़रा भी कोशिश करें तो उन्हें गोली मार दी जाए.

1999 में अजमेर सिंह के परिजनों में उम्मीद की एक किरण जगी. अधिकारियों ने बताया कि अजमेर की रिहाई के लिए जानकारियों के सत्यापन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. मगर फिर उसी साल करगिल युद्ध होने लगा और उम्मीद फिर से जाती रही. रशवीर कहती हैं, हमें तो जैसे श्राप मिला हुआ है. 2004 में अधिकारी फिर से सत्यापन के लिए आए. मगर फिर कुछ मिला तो वही लंबा इंतजार.

सीमावर्ती जिलों में जासूसों की कहानियां आम हैं. नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक पूर्व खुफिया अधिकारी बताते हैं, ये एक खुला राज है. मगर यदि आप ये मान लेते हैं कि आप जासूस हैं तो आपको बचाने कोई नहीं आएगा.

कृपाल और अजमेर सिंह के परिवार तो उनके जासूस होने की बात से इनकार करते हैं मगर पूर्व सैनिक रामनाथ की 65 वर्षीय पत्नी चंद्रकला भोलेपन में स्वीकार कर लेती हैं कि उनके पति जासूस थे. वो कहती हैं, उन्होंने 1975 में इंटेलीजेंस ब्यूरो के लिए एक जासूस के रूप में काम शुरू किया था. होशियारपुर जिले के निवासी और उस वक्त 37 साल के रामनाथ 1977 की एक सर्द सुबह में जो घर से निकले तो आज तक वापस नहीं आए. गायब हुए ज्यादातर लोगों की शिकायतों की तरह उनकी शिकायत पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया. रामनाथ के परिजन बताते हैं कि अधिकारियों ने उनके परिवार से पेंशन का वादा भी किया था मगर जब उन्हें इस बाबत पत्र लिखा गया तो इसका कोई नतीजा नहीं निकला. उस समय 25 साल की चंद्रकला ने पटाखा बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. 31 साल बाद अब इस परिवार ने सरकार से छोड़ बर्नी से अपनी उम्मीदें जोड़ ली हैं.

सरहद पार की दास्तानें इससे कुछ खास अलग नहीं हैं. पाकिस्तान के घाट-ए-बरोत के रहने वाले जरार बलोच 1989 में लाहौर से गायब हो गए थे. उनके घरवालों ने तो उनके जिंदा होने की उम्मीद ही छोड़ दी थी. मगर फिर उन्हें 1998 में एक चिट्ठी मिली जो जरार ने जम्मू एवं कश्मीर की एक जेल से भेजी थी. उनकी मां गंज बीवी कहती हैं कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने उन्हें मीडिया या मानवाधिकार संगठनों से बात न करने की चेतावनी दी है. वो पूछती हैं, मेरे बेटे को यहां की मिट्टी क्यों नसीब नहीं होनी चाहिए?”

कई बार तो कैदियों की राष्ट्रीयता पर भी विवाद हो जाता है जिसका उदाहरण लुहार आमीना बाई के बेटे अहमद की ये अजीब और गरीब कहानी है. अमीनाबाई ने आज से आठ महीने पहले तक अमृतसर का नाम तक नहीं सुना था. आमिना का 10 साल का बेटा अहमद 1980 में गुजरात के सीमावर्ती कस्बे नलिया से गायब हो गया था. आमीना के पास अहमद की कोई तस्वीर नहीं थी इसलिए पुलिस उसे ढूंढ नहीं सकी. 28 साल बाद आमिना को अमृतसर जेल से भेजी गई अहमद की चिट्ठी मिली. आमिना कहती हैं, वह उम्रदराज लग रहा था मगर जैसे ही वो आगंतुक कक्ष में घुसा मैंने उसे पहचान लिया.

कई बार तो कैदियों की राष्ट्रीयता पर भी विवाद हो जाता है जिसका उदाहरण लुहार आमीना बाई के बेटे अहमद की ये अजीब और गरीब कहानी है.

पता चला कि इन सालों के दरम्यान अहमद पाकिस्तान में बस गया था और उसने कराची निवासी सीमा से शादी कर ली थी. दिसंबर 2006 में अहमद, सीमा के साथ अपनी मां के पास गुजरात जाने की कोशिश में वाघा सीमा पर पकड़ा गया. उसके पास कोई वीजा नहीं था इसलिए पंजाब पुलिस ने उसे विदेशी कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया. उसे अधिकतम एक साल की ही सजा हो सकती थी. पिछले साल हाईकोर्ट ने आमिना के पक्ष में फैसला देते हुए पंजाब पुलिस को इस दंपत्ति को रिहा करने का आदेश दिया था मगर वो दोनों आज भी जेल में हैं.

मार्च में खबरें आई थीं कि अमृतसर की सेंट्रल जेल में 46 पाकिस्तानी कैदी अपनी घरवापसी का इंतजार कर रहे हैं मगर पाकिस्तान उन्हें स्वीकार करने के लिए आगे नहीं आ रहा. सीमा का नाम तो इन कैदियों की सूची में था पर अहमद का नहीं. दरअसल अधिकारियों को पता चला कि अहमद असल में भारतीय नागरिक है. 1993 से पाकिस्तानी कैदियों की रिहाई के लिए कोशिशें कर रहे चंडीगढ़ के वकील रंजन लखनपाल ने अहमद और सीमा की रिहाई और उन्हें भारतीय नागरिकता दिलवाने के लिए एक याचिका दाखिल की है.

विदेश मंत्रालय की मानें तो पाकिस्तानी जेलों में 1971 के 74 युद्धबंदी हैं. पाकिस्तान हमेशा उनकी मौजूदगी से इनकार करता रहा है. इनमें बैडमिंटन की पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन दमयंती तांबे के पति फ्लाइट लेफ्टिनेंट वी वी तांबे भी शामिल हैं. भारत सरकार पर कई साल तक दबाव डालने के बाद इन कैदियों के 14 रिश्तेदारों के एक दल को पिछले साल जून में पाकिस्तान जाने की इजाजत दी गई थी. पर 12 जेलों का दौरा कर 500-600 किलोमीटर का सफर तय करने वाले इस दल को निराश ही लौटना पड़ा.

जनवरी 2007 में इन कैदियों के मामले पर एक आठ सदस्यीय भारत पाकिस्तान संयुक्त न्यायिक समिति का गठन किया गया था. गठन के एक साल बाद इसकी फरवरी 2008 में एक बैठक हुई जिसमें कैदियों की जल्द रिहाई के लिए कदम सुझाए गए. कमेटी के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के वकील नागेंद्र राय तहलका से बात करते हुए ईमानदारीपूर्वक स्वीकार करते हैं, सरकारों की ही कैदियों की रिहाई में कोई दिलचस्पी नहीं है.

समित के सदस्य जल्द ही एक-दूसरे की जेलों का दौरा करने वाले हैं. सवाल उठता है कि क्या इससे कैदियों के लिए कोई उम्मीद बंधती है? एक पूर्व खुफिया अधिकारी कहते हैं, कैदियों की रिहाई के लिए बनी समिति का सरकार की नजर में कोई मोल नहीं है.

शायद यही वजह है कि इन कैदियों और उनके परिवारों की जिंदगी बस आंकड़ों तक सिमट के रह गई है. ऐसे आंकड़े जिनका कोई मतलब नहीं.