Saturday, March 7, 2009

महिला होने का रोना न रोएं


मोनिका गुप्ता

आठ मार्च को मनाया जाना वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस फिर से खबरों में है। कहीं चैनल शुरू हो रहे है तो कहीं महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए नयी योजनाओं की घोषणा की जा रही है। साथ ही मंदी के कारण आने वाले समय में करोड़ों महिलाओं के लिए बेरोजगार होने का समाचार भी प्रमुखता से देखने सुनने को मिल रहा है। तथाकथित प्रबुद्ध महिलाओं का एक समूह हर बार की तरह इस बार भी महिला दिवस मना रहा है। महिलाओं को एकत्रित करने से लेकर उस दिन पहनी जाने वाली साड़ी भी उनका मुख्य मुद्दा है। वहीं हाट बाजार में सब्जी बेचने वाली, सुबह सुबह सड़कों पर झाड़ू लगाने वाली, मजदूरी करने वाली और चतुर्थवर्गीय काम करने वाली महिलाओं को नहीं पता कि महिला दिवस क्या होता है? इसकी जानकारी उनको है जो प्रतिदिन समाचार पत्र पढ़ती हो, न्यूज चैनल देखती हो, बाहरी दुनिया से संपर्क रखती हो, सरकारी और निजी कार्यालयों में काम करती हो, व्यापार करती हो। लेकिन विडंबना यह है कि इनके पास महिला दिवस मनाने का समय नहीं है। इन्हें सुबह उठकर घर के काम काज के साथ सुबह ऑफिस के लिए तैयार होना है और शाम होते होते घर जाने के बारे में सोचना है ताकि फिर से अगले दिन की तैयारी हो सके। समय उनके पास है जो घर के एसी रूम से निकलकर एसी कार में बैठती हो और फिर महिला दिवस में आयोजित होने वाले सम्मेलन के लिए एसी हॉल का रुख करती हो। इनके पास इस दिन खर्च करने के लिए पैसा भी होता है और मुद्दे भी। मुद्दे भी उधारी होते और पैसे भी। बाहरी संपर्क के कारण दबी कुचली महिलाओं के बारे में जो जानकारियां मिलती है वहीं बनते है इन सम्मेलनों के मुद्दे। हर बार बड़ी-बड़ी बातें होती है, नारे लगाये जाते है, घोषनाएं होती है, महिलाएं चिल्ला-चिल्लाकर महिला दिवस की सार्थकता सिद्ध करती है इस दिन। लेकिन गौर करने वाली बात है कि महिला दिवस की सार्थकता क्या है? क्यों जरूरी है महिला दिवस मनाना? क्या इसलिए कि आप महिला होने का रोना रो सकें। क्या इसलिए कि दुनिया अब तक आपको केवल महिला समझती है और क्या इसलिए कि आपको बराबरी चाहिए। जब भी मुद्दे उठाए जाते है तो हमेशा एक बात पर जोर रहता है बेचारी महिला सड़कों पर सब्जियां बेचती है, उन्हें गुलामों की तरह खरीदा बेचा जाता है, उन्हें काम के लिए उचित वेतन नहीं मिलता, घर में उनकी कोई भूमिका नहीं होती, उन्हें विपरीत परिस्थितियों में मजदूरी करनी पड़ती है, वे हिंसा की शिकार है। इन सभी बातों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया जाता है कि वह महिला है, इसलिए शोषित है, दुखी और उपेक्षित है। क्या देश में ऐसे पुरुषों की कमी है जो सड़कों पर सब्जियां बेचते है, मजदूरी करते है, गुलामों की तरह खरीदे बेचे जाते है और विपरीत परिस्थितियों में भी काम करने को मजबूर होते है। क्या कभी वे चिल्लाकर चिल्लाकर पुरूष दिवस मनाने की वकालत करते है। नहीं ना। फिर महिलाएं क्यों रोना रोती है महिला होने का। अपनी योग्यता सिद्ध कीजिए, अपनी क्षमता बढ़ाइए, अपने होने का परिचय दीजिए, स्वयं को सशक्त बनाइए। अगर महिलाएं इसके लिए प्रयास करती है तो कम से कम महिला होने का रोना नहीं रोना पड़ेगा और न ही अधिकार मांगने पड़ेगे वे खुद मिल जाएंगे। तब न मुद्दे बाकी रहेंगे और न ही महिला दिवस मनाने की जरूरत पड़ेगी।

5 comments:

संगीता पुरी said...

तब न मुद्दे बाकी रहेंगे और न ही महिला दिवस मनाने की जरूरत पड़ेगी ... बिल्‍कुल सही ।

शोभा said...

वाह बहुत सुन्दर बात कही है आपने। यही आत्मविश्वास तो चाहिए।

sareetha said...

महिला वादी संगठन के लिए यह मौका एक शगल है । आँकड़ों के ज़रिए और्तों पर हो रही ज़ुल्म ज़्यादतियों पर शब्दों की जुगाले कर्ने से समस्याएँ हल नहीं हुआ करती ,हाँ संगठनों को उनके बेहतरीन प्रयास के लिए ज़्यादा अनुदान मिलने लगता है सरकार स्र ।

mayur said...

sach likha hai aapne ,jarurat hai sirf swayam ki madad ki
`सोशल ट्रीटमेंट´का संकल्प लेना होगा

महिला दिवस पर कुछ सार्थक इधर भी पड़ सकते हैं । महिला सशक्त हों.राष्ट्र सशक्त होगा

Vivek said...

Good article Monika, but you also need to realize that ours is a male dominated society. Imporoper educational system, domestic violance, lack of more gender sensitive type of laws/traditions and other hostile situations are some of the reasons for this..Till this gets corrected, the female gender of the species shall once again find themselves helplessly subjected to extreme basic gender-based, gender-degrading, male dominant aggressive attitude and reduced to their basic sexual and reproductive functions without having been given the chance to develop all of her potentials.
Celerating Womens day is just a gesture that it is my duty to express our gratitude to all women in my life, as a mother, sister, friend, wife.. In fact, we don't any special day to show our feeling..Isn't it..

Carry on the good work and a very happy belated women's day to all female readers :-)