Tuesday, June 30, 2009

Quotes of Mother Teresa

By Dr Bharti Kashyap
People are often unreasonable, illogical, and self-centered; forgive them anyway.

If you are kind, people may accuse you of selfish, ulterior motives, be kind anyway.

If you are successful, you will win some false friends and true enemies; succeed anyway.

If you are honest and frank, people may cheat you; be honest and frank anyway.

What you spend years building; someone could destroy overnight; build anyway.

If you find serenity and happiness, they may be jealous; be happy anyway.

The good you do today, people will often forget tomorrow; do good anyway.

Give the world the best you have, and it may never be enough; Give the world the best you have got anyway.

You see, in the final analysis, it is between you and God; It was never between you and them anyway.

Friday, June 26, 2009

स‌फर के स‌जदे में

27 जून 2008। आज स‌े एक स‌ाल पहले का दिन मुझे आज भी अच्छी तरह स‌े याद है, क्योंकि एक स‌ाल का स‌फर कोई लम्बा स‌फर नहीं होता। और, याद होने की एक ख़ास वजह भी है। 27 जून स‌े ही रांची स‌े आइ-नेक्स्ट का प्रकाशन शुरू हुआ था। चूंकि मेरे कई परिचित मित्र इस नये प्रोजेक्ट में काम करने के लिए गये थे, इसलिए रोमांच भी था। सृजन ही जीवन है, इस वाक्य को चरितार्थ करने की चुनौती लिये, जो लोग इस द्विभाषी अखबार में काम करने निकले थे, उनके मन में भी कई स‌वाल उठ रहे थे। क्या स‌फल हो पायेंगे? कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं होगी? करियर दांव पर तो नहीं...वगैरह-वगैरह। ऎसी आशंका तब और प्रबल हो जाती है, जब कोई नया फॉरमेट पब्लिक के स‌ामने रखा जाता है। आइ-नेक्स्ट बिल्कुल नया कंस‌ेप्ट था, उस वक्त रांची के लिए। यही वजह थी कि इसमें काम करनेवालों स‌े लेकर मीडिया स‌मूह में भी चर्चा ज़ोरों पर थी कि क्या इसे पाठकों का पूरा स्नेह मिलेगा। इन एक स‌ालों में इस अखबार ने यह स‌ाबित कर दिखाया है कि मेहनत, लगन और इच्छाशक्ति कुछ भी व्यर्थ नहीं जाने देती। आइ-नेक्स्ट आज निःसंकोच रांची की जवान धड़कन है, जो हर वर्ग के दिलों में धड़क रहा है। आइ-नेक्स्ट ने अपने प्रकाशन स‌े लेकर आज तक अपने पाठकों को शत-प्रतिशत स‌ंतुष्ट किया है। लोगों के लिए एक नये अंदाज़ में शब्दों की बारात स‌जाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन स्थानीय स‌ंपादक श्री रवि प्रकाश जी, प्रारंभिक दौर में मुख्य स‌ंवाददाता रहे श्री नरेंद्रनाथ जी, वर्तमान मुख्य स‌ंवाददाता श्री अमरकांत जी की मेहनत ने हर प्रेतबाधा को लांघते हुए जागरण प्रकाशन स‌मूह को वह इज्ज़त दिलवायी है, जिसका सपना श्रद्धेय पूर्णचंद्र गुप्त जी ने कभी देखा था और श्रद्धेय नरेंद्र मोहन जी ने स‌ाकार किया था। आज श्री स‌ुनील गुप्ता जी और श्री स‌ंजय गुप्ता जी के मार्गदर्शन में चलते हुए आइ-नेक्स्ट के स‌भी स‌ाथियों ने सर्वोत्तमप्रदर्शन कर देश में प्रकाशन की विद्या को बल दे रहे उत्कृष्ट स‌मूह को गौरवांवित किया है। रांचीहल्ला की ओर स‌े स‌मूह और आइ-नेक्स्ट के स‌भी स‌ाथियों को लख-लख बधाइयां।

Thursday, June 25, 2009

जाने विरले कोई

तकरीबन साढ़े पांच सदी पहले कबीर ने कहा था- अंबर बरसे धरती भींजे, यह जाने सब कोई/ धरती बरसे अंबर भींजे जाने विरले कोई। अंबर को बरसते तो सब देखते हैं, मगर धरती भी आसमान पर बरसती है, यह हम जैसे साधारण मनुज कहां देख पाते हैं। कबीर दृष्टा थे, इसलिए उन्होंने इस अगोचर सच को देख लिया। कबीर ने नदियों और समुद्रों से उठते वाष्पों को देखा, पेड़-पौघों के पत्तों से होने वाले वाष्पीकरण को देखा । भापों को मेघ में बदलते देखा और कह डाला- देखो रे मनुज ! तुम्हारी आंखों के सामने सच गुजर रहा है, धरती आसमान पर बरस रही है... कवि वही जो अकथनीय कह दे, पंक्ति को चरितार्थ करते हुए कबीर ने अगोचर को गोचर कर डाला।
दृष्टा की यही खूबी होती है। वे दूर की ही नहीं देखते, बल्कि बिल्कुल पास घट रहीं उन घटनाओं को भी देख लेते हैं, जिन्हें सामान्य इंसान आंख रहते भी नहीं देख पाता। हमारे युग में भी एक दृष्टा हैं। जिनका नाम है- अब्दुल पाकिर जैनुलबद्दीन कलाम। एपीजे कलाम एक बेहतरीन वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि हमारे समय के महत्वपूर्ण चिंतक भी हैं। वे कुशाग्र बुद्धि के स्वामी तो हैं ही साथ ही उनके पास एक संवेदनशील हृदय भी है।यही कारण है कि उनकी आंखों पर जवाने के प्रपंची चीलमन कभी नहीं लगे। वे हमेशा सकरात्मक सोचते हैं और जो लोग उनसे कुछ जानने-समझने पहुंचते हैं, उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। चाहे मीडिया के लोगों को गांव की ओर झांकने की सलाह हो या फिर देश के बेहतर भविष्य के लिए आत्मनिर्भर बनने का उनका रोड मैप (विजन 2020 और विंग आफ फायर) हो । हर बार कलाम ने दूर की, बहुत दूर की और मार्के की बात कही। कलाम हमारे युग की समस्याओं और चुनौतियों पर बारीक दृष्टि रखते हैं और इन चुनौतियों कीआगामी तस्वीरों को भी देखने में सक्षम हैं। वे अपनी राय देकर हमें सचेत करते रहते हैं, एक वैज्ञानिक की तरह नहीं, बल्कि एक निलिप्त गुरु की तरह। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनकी सलाह के मर्म को कितना समझ पाते हैं और उन पर कितना अमल करते हैं ।
कल कलाम रांची में थेऔर यहां उन्होंने युगांतकारी महत्व की बातें कह डालीं। हालांकि उनके इस कथन में सनसनी नहीं है और न ही इसमें खबरिया चैनल की कढ़ाही में तलने लायक मसाला ही है। लेकिन उनके कथन में हमारे समय के सबसे बड़े सामाजिक-कैंसर का इलाज छिपा हुआ है। कलाम साहेब कल रांची में बच्चों के साथ संवाद कर रहे थे। बच्चे उन से तरह-तरह के सवाल पूछ रहे थे और वे सोच-सोच कर उनकी जिज्ञाशा को शांत कर रहे थे। तभी एक बच्ची ने उनसे पूछ डाला- " सर, अपने देश को भ्रष्टाचार से किस प्रकार मुक्ति मिल सकती है ? ' कलाम कुछ पलों तक खामोश रहे। फिर उन्होंने जो कहा उससे समकालीन भारतीय समाज की नैतिक दरिद्रता नमूदार हो गयी और एक ऐसा सच उजागर हो गया जिसे आंख रहते हम नहीं देख पाते और अगर देखते भी हैं, तो उसे झुठला कर आगे बढ़ जाते हैं। बिल्कुल "धरती बरसे अंबर भीजे' की तरह। कलाम ने कहा, अगर देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलानी हैै, तो पहले अपने घरों से इसे खत्म करो। अपने मां-पिता को गलत काम करने से रोको।
लोग कलाम के इस बयान को हल्के में ले सकते हैं और इसे एक विद्वान का विनम्र संदेश कहकर हवा में उड़ा सकते हैं क्योंकि यह हमारी ऐतिहासिक फितरत है। लेकिन अगर कलाम के इस बयान को गंभीरता से ले, तो एहसास होता कि उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में ही सही, बाल-संवाद में सही, भ्रष्टाचार के खिलाफ विधवा-विलाप करने वालों के गाल पर जोरदार तमाचा लगाया है। जो लोग भ्रष्टाचार के लिए हमेशा राजनेता और अफसरशाहों को कोसते रहते हैं उन्हें कलाम ने एक रास्ता दिखाया है। भ्रष्टाचार के टब में डूबकर, भ्रष्टाचार को गाली देने वाले लोग शायद इससे सबक लें। इससे आम नागरिक की आंखें खुल सकती हैंे, जो आज भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता देने की मानसिकता में कैद हो चुके हैं। कलाम का संदेश साफ है कि अगर गंगा को साफ करना है, तो पहले गंगोत्री में साबून लगाओ। ईमानदार समाज ही वह संस्थाओं को बेइमान होने से रोक सकता है।
मुझे नहीं मालूम कि उस बच्ची ने कलाम के कथन के निहितार्थ को कितना समझा और जब वह समझने के लायक होगी तब देश में भ्रष्टाचार की सूरत कैसी होगी। लेकिन अगर आज की पीढ़ी को भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए, तो उन्हें शुरुआत अपने घर से करनी होगी, अपने आप से करनी होगी।

Sunday, June 21, 2009

रांची विवि = देख तमाशा देख


रांची विश्वविद्यालय जैसा प्रतिष्ठित स‌ंस्थान अगर स‌ंबद्ध स‌ूचनाओं की मुकम्मल जानकारी अपने वेब-साइट के माध्यम स‌े देने में असफल रहे, तो फिर किस स‌ंस्थान स‌े ऎसी उम्मीद की जा स‌कती है। रांची यूनिवर्सिटी के स‌ाइट में न तो भावी परीक्षाओं की तिथि की पूरी जानकारी है और न ही रांची विवि द्वारा स‌मय स‌मय पर जारी होने वाले स‌र्कुलर/आदेश/निर्देश की ही प्रति उपलब्ध करायी गयी है। ऎसा लगता है कि तकनीकी दृष्टिकोण स‌े स‌ाइट बनाकर केवल खानापूर्ति कर दी गयी है। चूंकि रांची विवि एक स‌रकारी स‌ंस्थान है, इसलिए इसमें इस तरह की विमूढ़ता के प्रदर्शन को शैक्षणिक अपराध भी कहना गलत नहीं होगा। मैंने आज इस स‌ाइट स‌े कुछ परीक्षाओं की जानकारी लेने की कोशिश की, तो देखा कि इसका मेंटेनेंस‌ ही लगभग शून्य है। शुरुआत में अगर कुछ हुआ होगा, तो हुआ होगा, बाद के दिनों में इसे छोड़ दिया गया है। इस बारे में जब स‌ाइट मेंटेन करनेवाली कंपनी स्पीड स‌ॉल्यूशन के प्रतिनिधि स‌े बात की गयी, तो उन्होंने बताया कि रांची विवि की ओर स‌े अगर उन्हें कोई जानकारी दी जाती है, तो वे उसे डालते हैं लेकिन वे खुद स‌े विवि स‌े जबर्दस्ती नहीं कर स‌कते। रांची विवि को यह जरूर स‌ोचना चाहिए कि आखिर ऎसी उदासीनता के जरिये हमलोग क्या स‌ंदेश देना चाहते हैं स‌माज को और भावी पीढ़ी को। गौर करें और हो स‌के तो लुटती हुई गरिमा को वापस लाने में जी-जान लगा दें।

Tuesday, June 9, 2009

हाँ,दुनिया इसी की तलाश में है....!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
रोज-ब-रोज सूरज उग रहा है,रोज-ब-रोज रात हो रही है.आदमी के सम्मुख अँधेरा और उजाला दोनों ही हर वक्त होते हैं.मगर आदमी अँधेरे को ही पहले तरजीह देता है !!क्योंकि अँधेरे में ही उसकी समस्त वासनाओं का शमन होता है !!आदमी धीरे-धीरे एक ऐसी चीज़ में परिणत होता जा रहा है जो हर वक्त सिर्फ-व्-सिर्फ अपने और अपने स्वार्थ को येन-केन-प्रकारेण पूरा करने के बारे में सोचती रहती है.जीवन को भरा-पूरा बनाने के साधनों का एक ऐसा अंतहीन तिलिस्म आदमी ने अपने चारों तरफ फैला लिया है कि उनको प्राप्त करने की जद्दोजहद में उसकी कमर टूट जा रही है,और उसे अपनी जरूरतों से इतर कुछ भी सच पाने को कोई अवकाश ही नहीं है,और इस बारे में कुछ भी सोचने का प्रयास भी नहीं,तो इस तिलिस्म से बाहर आने के बारे में कुछ अपेक्षा करना भी बेमानी है !!
आदमी अपने-आप को सदा पशुओं से ऊपर बता रहा है,सिर्फ इस बुनियाद पर कि उसमें विवेक नाम की कोई चीज़ है,वो हँसता है,बोलता है,नाचता है और सबसे बढ़कर सोचता है !!और मज़ा यह कि इन्हीं बुनियादों पर वह पशु-जगत को अपने से दीन-हीन बतलाता रहा है और यहाँ तक कि उसने हर वक्त पशुओं को अपनी जरुरत तथा प्रयोगों का साधन बनाया हुआ है !!आदमी के हाथ में एक दुर्दमनीय पीडा से छटपटाते ये पशु कुछ बोल नहीं पाने के कारण आदमी नामक इस स्वनामधन्य विवेकशील जीव द्वारा मार दिए जाते हैं,मानवता की सेवा करने की आड़ में पशु-जगत आदमी के तमाम काले-कारनामों का शिकार बनता रहा है,बन रहा है !!और मज़ा यह कि आदमी विवेकशील है!!
प्रेम-मुहब्बत-भाईचारे की बात बहुत करता है यह आदमी...तुर्रा यह कि इसकी दुनिया में बाबा आदम के जमाने से अब तक भी ये चीज़ें इसे नसीब नहीं हो पायी हैं जबकि आदमी की सिर्फ एक ही जात है और वह है आदमी...!!और जिस जात को वह पशु मानता है वह धरती और गगन में असंख्य किस्म की होने के बावजूद आदमी से असंख्य गुणा प्रेम-मुहब्बत और भाईचारे के संग रहती है....!!आदमी अपनी एक-मात्र जात के बावजूद भी एक-दुसरे से कई-कई गुणा दूर है,यहाँ तक कि एक-दुसरे के विरुद्द एक अंतहीन नफरत से भरा हुआ और तमाम वक्त एक-दुसरे से लड़ता हुआ....लड़ता ही लड़ता हुआ !!और बाकी का पशु-पक्षी जगत अपनी अनगिनत रूपों की विभिन्नता के बावजूद एक-दुसरे के संग लगभग शालीनता से रहता हुआ,यहाँ के आदमी के लिए प्रेरणादायी होने तक !!
फिर भी आदमी जानवरों को लतियाता है,आदमी को भी लतियाता है,अपने बच्चों को लतियाता है,बड़े-बूढों को लतियाता है,स्त्रियों को लतियाता है,कमजोरों को लतियाता है,अपने से तमाम कमतर कहे जाने वाले लोगों को लतियाता है,हालांकि कमतर समझना उसका खुद का ही पैदा किया हुआ एक अनावश्यक विचार होता है....इस बारे में उसमें कई किस्म की बेजोड़ भ्रांतियां है,मज़ा यह कि जिन्हें वह तथ्य समझता हुआ उसी अनुसार आचरण करता है,बिना यह जाने हुए कि यह आचरण उसे अपने ही बनाए हुए आदमी होने के विशेषणों के उसे विलग करता है !!आदमी के साथ सबसे बड़ी तो दिक्कत ही यही है कि अपनी ही गडी हुई तमाम परिभाषाओं को अपने अनुकूल बनाने या साबित करने के लिए यह उन परिभाषाओं का दम खुद ही घोंट देता है,अपने ही गडे हुए शब्दों के अर्थ हजारों-हज़ार निकाल लेता है,यहाँ तक कि उसके शब्द अपनी ही महत्ता खो देते हैं,यहाँ तक कि उनका सही अर्थ भी हम नहीं समझ पाते,यहाँ तक कि आदमी कहना क्या चाहता है,उसे खुद ही नहीं पता होता....फिर भी आदमी,आदमी है,और समस्त पशु-जगत से कहीं ऊपर है...!!....नीचे के स्थान से कि ऊपर के स्थान से यह तय होना बाकी है !!
सच बताऊँ तो आदमी जरुरत से ज्यादा समझदार है,इतना ज्यादा कि इतने ज्यादा की जरुरत ही नहीं,इतना ज्यादा कि हास्यास्पद की हद तक,इतना ज्यादा कि ज्यादा होना आपकी राह में रोड़ा बनने लगे और हर समय एक अंतहीन पीडा देने लगे और दूसरों को ना जाने किन-किन आधारों पर छोटा या बड़ा समझने लगे और तरह-तरह के अनावश्यक विवादों को जन्म देकर और फिर उन्हें सुलझाने के उपक्रमों में अपना और दूसरों का समय खोता करने लगे !!आदमी सच ही ब्रहमांड की सबसे अजूबी चीज़ है,लेता तो है वह खुदा से होड़ और करता है तमाम किस्म के शैतानियत से भरे और रूह को कंपा देने वाले भद्दे-गंदे-गलीच और बिलकुल ही घटिया कर्म....!!अपनी सहूलियत के लिए सब कुछ कर डालने को उत्सुक एक व्यभिचारी आत्मा...!!और अगर आदमी सचमुच ही ऐसा ही है तो खुद को ऊँचा या विवेकमान मानने की जिद्द क्यों ??खुद को पशु से बेहतर बताने की जिद्द क्यों....??आदमी सच कहूँ तो मसीहा भी बन सकता है,भगवान् भी बन सकता है,वह कुछ भी बन सकता है,उसमें इतनी ताब है,उसमें ऐसी रौशनी भी है....खुद को यदि इतना बेहतर समझने का ऐसा ही उसमें जज्बा है तो दिखाए अपना दम...और बन कर दिखा दे सही मायनों में दुनिया का देवता...हाँ दुनिया इसी की तलाश में है....हाँ दुनिया इसी की आस में है.....!!

Sunday, June 7, 2009

आप ही फ़ैसला करें दानिश भाई का....!!

भईया लोगों,ज़रा इन्हें पहचानिये.....!!
ई साहब तो ब्लागरों के बाप हैं....इनका ब्लाग" मोहब्बत में दिक्कतें " सारे अन्य ब्लागरों की रचनाओं से मोहब्बत करता है....अन्य ब्लोगर की रचनाएं ये साहब अपने ब्लॉग पर अपने ही नाम से चस्पां करते हैं,आज किसी लिंक से मैं यहाँ तक पहुंचा तो भूतनाथ जी की दो रचनाएं शीर्षक बदल दानिश नाम से पोस्टेड दिखायीं दीं...और देखा तो "अर्श" साहब की रचनाएं भी इसी तरह उनके नाम पर चस्पां मिलीं....तो हम तो भईया चकिते हो गए...चकिते माने हतप्रभ....मने आश्चर्यचकित....माने अब और माने क्या बताऊँ....अब ऐसे भाई साहब का का करना चाहिए....सो फैसला आप ही करें....!! इनकी कारगुजारी देखने के लिए नीचे के लिंक में क्लिक करें।
http://mohaabat.blogspot.com/2009/05/blog-post_722.html

Tuesday, June 2, 2009

...लगे कि कलाकार का जनाजा है, ऐरे-गैरे का नहीं

निराला
वह रविवार 31 मई की शाम थी. महीने का आखिरी दिन. मन यूं ही इधर-उधर भटक रहा था. लेकिन नहीं पता था कि यह मेरे आत्मीय लेकिन समाज और दुनिया से उपेक्षित एक महान कलाकार के जीवन का भी आखिरी दिन था. शायद तभी जाने क्यों मन सुबह से ही बेचैन हो रहा था. शाम को अपने एक अजीज मित्र को मोबाइल से मैसेज भेजा- आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन डीयर...?
अभी यह मैसेज भेज कर मित्र से मिलने वाले जवाब की प्रतिक्षा कर ही रहा था कि रात नौ बजे करीब एक अपरिचित नंबर से फोन आया. फिर जो पता चला- उसमें खुशी तो थी लेकिन गम और दुखों के पंख पर सवार होकर आयी थी.
फोन कुलदीप नारायण मंजरवे के पुत्र बिनू ने किया था. यह बताने को कि पिताजी गुजर गये. यह खबर सुन कर मैं सकते में तो नहीं आया लेकिन खुद को गुनाहगार और शर्मसार जरूर महसूस करने लगा. लगा मैं कोई जुर्म कर बैठा हूं. उनके जीते-जी उनकी उस डायरी को किताब की शक्ल में नहीं छपवा सका था, जिसके लिए वे मुझे पिछले कई दिनों से बार-बार कह रहे थे...
मुझे उनकी मृत्यु का दुख इसलिए ज्यादा नहीं हुआ, क्योंकि दो दिन पहले ही मैं उनसे मिलने उनके घर गया था. करीब दो घंटे तक उनके साथ रहा था... कुलदीप तब जी भर के दुआएं दे रहे थे मुझे और साथ ही रो भी रहे थे, इस कामना के साथ कि अब गुजर ही जाऊं तो बेहतर...! मंजरवे को हार्ट की शिकायत थी. वे सीने की दर्द से तकलीफ महसूस कर रहे थे लेकिन उस दर्द से भी ज्यादा कई तकलीफें जिंदगी की आखिरी बेला में उन्हें घुटन दे रही थीं.
83 वर्ष के मंजरवे के बारे में संक्षिप्त जानकारी यह है कि वे शिल्पकार थे. पटना आर्ट कॉलेज के छात्र रह चुकेथे. पेपरमैसी आर्ट के मास्टर थे. रांची के कोकर इलाके में पिछले 40 साल से एक कमरे में वह और उनका पूरा परिवार रहता था. उस एक कमरे को मकान, दुकान, कारिगरी का कारखाना... कुछ भी कह सकते हैं. मूर्तियों के ढेर के बीच तीन बिस्तर पर 12 सदस्यीय परिवार का आशियाना. एक बेड पर चादर से परदेदारी कर बेटा-बहू, तो उसके बगल वाले बिस्तर पर बच्चे और ईंट को सजाकर लकड़ी के पट्टे से बनाये गये एक पलंग पर मंजरवे सोते-बैठते...
मंजरवे बिहार के जमुई जिले के चांदन गांव में पैदा हुए. कला की सनक स्कूली जीवन से इस तरह सवार हुई कि उसकी कीमत पर किसी चीज से समझौता करने को तैयार नहीं. पटना आर्ट स्कूल से पढाई पूरी करने के बाद इन्हें देवघर विद्यापीठ में नौकरी मिली. वहां मन उचटा तो झारखंड के ही सरायकेला-खरसावां में सरकारी नौकरी करने चले आये. लेकिन कलाकार मन को न चाकरी रास आ रही थी न नया शहर. सो आखिर में शिल्प कला केंद्र का एक बोर्ड लगाकर एक शेड के नीचे कला सृजन में लग गये. यह 1973 की बात है, जब उन्होंने शिल्प कला केंद्र की स्थापना की. तब से न जाने कला, कलाकारी और कलाबाजी की दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी, मगर मंजरवे वहीं के वहीं रह गये. अपनी सादगी और सच्चाई के साथ. अपनी धुन में इतने मगन रहे कि उन्हें इस बात का भी कभी एकबार ख्याल नहीं आया कि अपने शिल्प कला केंद्र को यदि एनजीओ या रजिस्टर्ड संस्था ही बना लेंगे तो कुछ फंड आदि मिल सकता है.
मंजरवे को गांधी, डॉ राजेंद्र प्रसाद, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण जैसे दिग्गजों का सान्निध्य मिल चुका था. असहयोग आंदोलन के दिनों में जब पटना में बंगाल से कुछ लड़कियां पटना पहुंचीं तो उन्हें चरखा प्रशिक्षण का जिम्मा गांधीजी ने मंजरवे को ही सौंपा था. आजादी की लड़ाई के दिनों में नाटक खेले जाते थे तो उसमें मेकअप मैन के रूप में मंजरवे होते, जो पटना व आसपास के इलाके में काफी चर्चित हुए थे. डॉ राजेंद्र प्रसाद इनकी कला के कद्रदानों में थे और विनोबा, जयप्रकाश जैसे दिग्गज भी कहते- मंजरवे, तुम्हारे जैसे साधक की ही जरूरत है. मंजरवे ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पटना से लेकर बाढ़ तककेइलाकेमें गांव-गांव में पैदल जाकर लोगों को जागरूक भी किया था.
मंजरवे साधक ही बने रहे. जब तक जवानी रही तब तकअपने ही हाथों से बना कपड़ा पहनते रहे. लेकिन इन सबसे वैसा कुछ भी नहीं हो सका, जिसकी दरकार उन्हें थी. न मुफलिसी दूर हो सकी, न उपेक्षा. लेकिन उम्मीदें थीं किटूटती नहीं थीं, आखिरी वक्त तक. मंजरवे के उस टूटे हुए मकान में दीनदयाल उपाध्याय, अंबेडकर आदि की कई मूर्तियां बनी हुई मिलीं. इन मूर्तियों का निर्माण मंजरवे से किसी नेता ने, स्वयंसेवी संस्था वालों ने करवाया था... बेचारे मंजरवे, दिन-रात एक कर, अपना पैसा लगा कर इन मूर्तियों का निर्माण करते रहे, लेकिन उन्हें ले जाने वाला अब तक यानी दस वर्षों बाद तक कोई नहीं आया...
सरकारी विभागों ने तो न जाने कितनी बार छला. एक दफा ग्रामीण विकास विभाग के लोग उनकी कलाकृति को यह कह कर ले गये कि वे उसे राष्ट्रीय सम्मान के लिए भेजेंगे. मंजरवे ने उसे दिया. बाद में राष्ट्रीय सम्मान की बात कौन करे, वह कलाकृति भी कौन हजम कर गया, आखिरी दिनों तक पता नहीं चल सका.
इस बार भी कुछ वैसा ही हुआ. मंजरवे को किसी सरकारी बाबू ने बता दिया कि आपका नाम तो इस बार राष्ट्रीय शिल्पी अवार्ड के लिए गया है. आप तैयार रहियेगा. जिस दिन यह पता चला, उसी दिन से मंजरवे कभी आधी रात को जग कर तो कभी भरी दुपहरिया में एक नयी कृति के निर्माण में लग गये. शरीर साथ नहीं देता था, फिर भी वे लगे रहते... उस कृति का निर्माण उन्होंने राष्ट्रपति को देने के लिए किया. वे बताते थे कि जब सारे कलाकार राष्ट्रीय शिल्पी अवार्ड के लिए राष्ट्रपति भवन पहुंचेंगे तो वे सम्मान लेकर आ जायेंगे. मैं सिर्फ लूंगा नहीं, राष्ट्रपति को भी कुछ दूंगा...
सच यह था कि मंजरवे का नाम किसी राष्ट्रीय शिल्पी अवार्ड के लिए गया ही नहीं था. किसी ने उन्हें बेवकूफ बनाया था. अभी वह इस छल के छलावे में ही थे कि किसी ने मंजरवे को कह दिया कि आपके शिल्प कला केंद्र का भव्य निर्माण करवा देंगे, कैसा चाहते हैं आप? एक बार फिर से मंजरवे नक्शा बनाने में लग गये और कपड़ा, लकड़ी, मिट्टी, कागज आदि से जोड़ कर मंजरवे ने शिल्प कला केंद्र का एक नमूना ही तैयार कर दिया. दो दिनों पहले जब मैं उनसे मिलने गया था, तो उन्होंने अपनी किताब के बारे में पूछने के बाद उस नमूने को दिखाते हुए कहा था- ऐसा ही बन जाता शिल्प कला केंद्र तो मजा आ जाता, खूब काम होता...
न तो खूब काम करने और न ही उसे देखने को मंजरवे अब इस दुनिया में हैं. उनका बेटा बिनू एक कलाकार से मजदूर बनने की राह पर है. जहां भी शिल्प कला केंद्र केलिए काम मांगने जाता है, सरकारी अधिकारी-बाबू पूछते हैं- संस्था है, एनजीओ है, ट्रस्ट है...आदि. इतने सवालों से जूझ कर आने के बाद बिनू जब अपने घर पहुंचता है, तो उस एक छोटे मकान में पड़ी मूर्तियां उन्हें ही चिढ़ाती नजर आती हैं. बिनू अपने बाबूजी से भी कहते थे- आप जिंदगी भर मूर्तियों को गढ़ते रहे, कभी हमारी जिंदगी गढ़ने की परवाह भी किया होता... तब कुलदीप हंसते हुए कहते, मरूंगा तो जरा गाजे-बाजे के साथ कलाकारी वाले अंदाज में ले जाना, जलाना मुझे... बिनू ने किया भी वैसा ही. बाजे के साथ उनकी अर्थी उठी और घाट तकजाने वाले थे कुल जमा दस लोग...
यह भी अजब संयोग था कि मंजरवे की मौत की खबर सुन कर उस सवाल का जवाब भी मिल गया, जो मैंने अपने दोस्त से मैसेज के माध्यम से पूछा था-आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन...?