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Monday, August 9, 2010

जीभें क्या-क्या करती हैं...

आदिवासियों-दबे कुचलों की आवाज़ बुलंद करने में जीवन भर तत्पर रहे अश्विनी जी ने हमें यह कविता भेजी है। मौका है विश्व आदिवासी दिवस का। उनका आह्वान है कि संघर्ष का संकल्प ही नयी दुनिया के सृजन का एकमात्र विकल्प है। उनकी ओर से आप सभी को हूल जोहार!!


कुछ जीभें लपलपाती हैं
कुछ जीभें लार टपकाती हैं

कुछ जीभें डंस लेती हैं

कुछ जीभें
जीभ काट लेती हैं
तो कुछ जीभें
समूचे वजूद को ही
चट कर जाती हैं
पर सबसे क्रूर
वो जीभें होती हैं
जो जिंदगी भर
किसी देह पर
आबादी के एक बड़े हिस्से की
मेधा और पहचान पर
विषैले सांप की तरह
रेंगती रहती है
और आपके वजूद को
अजगर का शिकार बनाये रखती है