भारत में यह पहला प्रंसग नहीं है कि जब किसी संपादक को अशिष्ट ढंग से बर्खास्त किया गया है। इसे ऐसा अंतिम प्रसंग भी नहीं कहा जा सकता। किन्तु अभी हाल तक `एशियन ऐज` के संपादक रहे एमजे अकबर की इस तरह की गई बर्खास्तगी ने कतिपय मौलिक प्रश्न उपस्थित कर दिए हैं। क्या मालिक को यह हक है कि वह अपने संपादक को जब चाहे मनमाने ढंग से बर्खास्त कर दें? कुछ दिन पूर्व जब अकबर अन्य दिनों के समान प्रात:काल अपने कार्यालय जा रहे थे तो रास्ते में ही उन्हें स्टाफ के एक सदस्य ने मोबाइल पर बताया कि उनका नाम प्रिन्टलाइन से हटा दिया गया है। वह कार्यालय गए उन्होंने अपने कागज पत्र समेटे और वहां से चले आए। अखबार के मालिक ने न तो पुनर्विचार ही किया और खेद जताना तो दूर स्पष्टीकरण का कोई पत्र ही उन्हें मिला। मेरी धारणा है कि मालिक ने जो हैदराबाद के एक वरिष्ठ कांग्रेसजन हैं, यह कदम उठाया, उन पर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से दबाव था कि वह अकबर से छुटकारा पा लें. दस जनपथ के विचार में एमजे अकबर सोनिया गांधी के प्रबल विरोधी थे।
सामान्य तौर पर कहें तो कहना होगा कि अतीत में भी कई अन्य संपादक हटाए गए हैं। फ्रैंक मौरेस, खुशवंत सिंह, जार्ज वर्गीस, प्राण चोपड़ा, एस मुलगांवकर, एचके दुआ और विनोद मेहता भी राजनीतिक दबाव का शिकार हुए थे। यदि मुझे ठीक-ठीक याद है तो इनमें से मात्र दो संपादक ही ऐसे रहे जिन्होंने मालिकों से टक्कर ली। प्राण चोपडा ने स्टेट्समैन से सीधे ही टक्कर ली और वर्गीस ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया की मार्फत। इन से एक का प्रबंधन से समझौता हो गया, जबकि दूसरे के मामले में सरकार ने प्रेस काउंसिल ही भंग कर दी। जो संदेश गया वह यह कि संपादक एक निपटाऊ माल है। जिसे जब चाहा बैठा दिया गया और जब मन आया हटा दिया गया। आपातकाल के बाद संपादकों के लिए हालात और भी जटिल हो गए, जब मालिकों ने यह पाया कि वे सरकार के समक्ष दंडवत कर देते हैं। उन्होंने (मालिकों ने) सोचा कि संपादक पर तो दबाव लाने भर की आवश्यकता होती है। दबाव जब भी पडे़गा तो वे आसानी से समर्पण कर देंगे।
मालिक और सरकार में नजदीकी बढ़ी, क्योंकि सरकार ने यह देखा कि उनसे निपटना कहीं अधिक आसान है क्योंकि उनके अन्य कई हित भी हैं। संपादक तेजी के साथ अपनी महत्ता से खिसक कर सरकार और मालिक के बीच संपर्क सेतु की स्थिति में आ गए हैं। वीआईपी स्वागत समारोहों, भोज स्थलों तथा ऐसे ही अन्य स्थानों पर मालिक अब देखे जाने लगे हैं, जबकि एक समय था, जब ऐसे आयोजनों में मात्र संपादक ही जा पाते थे। मालिकों का प्रोफाइल भी बदल गया है। नई पीढ़ी जो विदेशों से लौटी है, वह सामाजिक तौर पर महत्वाकांक्षी और अधिक दुनियादार है। मुझे याद है कि स्टेसमैन के मैनेजिंग डायरेक्टर सीआर ईरानी ने मुझसे पूछा था, `मंत्री तुम्हारे बजाय मुझे क्यों नहीं बुलाते, जबकि मैं उनके लिए संपादक की अपेक्षा कहीं कुछ ज्यादा कर सकता हूं।` इस सबके बावजूद अकबर के मामले ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठा दिए हैं। संविधान अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी देता है। जवाहर लाल नेहरू ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि श्रमजीवी पत्रकारों को मालिकों द्वारा मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सके, कानून बनवाया था। इस तरह उन्होंने एक लिहाज से रिपोर्टिंग और टिप्पणी करने वालों को एक तरह से संरक्षण दिलाया। मगर इस व्यवस्था को ठेके की उस योजना ने मात दे दी है, जो मालिकों ने लागू की है।
सवाल यह है कि यदि मालिकों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग उन पत्रकारों के माध्यम से, जिनके सिर पर ठेके की तलवार लटकी है, एक हथियार के तौर पर किया जाएगा तो फिर प्रेस की उस आजादी का क्या होगा, जिस की गारंटी संविधान निर्माताओं ने दी थी? उन्होंने तो यह सोचा तक भी नहीं होगा कि ऐसा भी समय आ जाएगा कि जब ऐसे हालात बन जाएंगे, जब पत्रकार मालिकों के इशारे पर ही थिरकने को बाध्य हो जाएगें। यदि ऐसा है तो फिर यह मानना होगा कि मूल संवैधानिक गारंटी पर पुनर्विचार का समय आ गया है।
अब क्योंकि न तो शासकों और न ही मालिकों के मन में प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति आदर की कोई भावना है, राष्ट्र के समक्ष एक चुनौती उपस्थित है। यह चुनौती ऐसी है, जिसे लोकतांत्रिक समाज को अपनी उस राज्य शासन व्यवस्था के हित में स्वीकार करना होगा, जिसमें स्वतंत्र प्रेस उन स्तम्भों से एक है, जिन पर यह ढांचा खड़ा है। दरअसल इस सिद्धांत को नेहरू की पुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने तब ध्वस्त कर दिया है, जब उन्होंने पहले `प्रतिबद्धता` के बारे में कहा था और तदुपरांत आपातकाल थोपकर प्रेस का गला घोंटा था। उनकी विदाई के बाद से परिदृश्य और धूमिल हो गया। जब जनता सरकार सत्तासीन थी और वह भी एक हिंसा विग्रह त्रस्त घर थी कि जिसमें यही ज्ञात नहीं हो पाता था कि दायां हाथ क्या कर रहा है और बाएं कि उसे चिंता नहीं होती थी, तब के थोड़े से समय को छोड़कर हालात ने ऐसी करवट ली कि मालिक और सरकार के बीच सांठगांठ और सुदृढ़ हो गयी चाहे शासन कांग्रेस का हो या भाजपा का, सरकार के आलोचकों के लिए कोई ठोर-ठिकाना ही नहीं रह गया। चतुर्थ स्तम्भ पर सर्वाधिक विघातक प्रभाव तो निगमित (कारपोरेट) क्षेत्र से पड़ा है। प्रेस की आजादी का एक अलग ही अर्थ लिया जाने लगा है। निगमित क्षेत्र सरकार से भी अधिक सशक्त हो गया। अब वही धुन निर्धारित करता है। उपलब्ध वस्तुओं को अधिकाधिक लाभ के लिए आगे लाना ही तो निगमित क्षेत्र का मन भावन सिद्धांत है। वही अब प्रेस के मामले में भी अपनाया जा रहा है। एक समय पर पत्रकारिता एक पेशा थी अब उसने एक उद्योग का रूप ले लिया है। अखबार एक उत्पाद है, उसी तरह जैसे साबुन अथवा टैलकम पाउडर है। अब आदर्शवाद का उनसे कोई नाता नहीं है और न ही किसी सामाजिक कर्तव्य का कोई सरोकार रह गया है। अब तो यही डगर है कि जो बिकता है, उसी से सरोकार है।
परिणाम यह है कि प्रेस की विचारों के प्रसारक के रूप में तो मृतवत सी हालत है। टीवी नेटवर्क का हाल तो और भी बुरा है। मीडिया अब टाइटल टैटल (शीर्ष-प्रलाप) का वाहक मात्र होकर रह गया है। फिल्म स्टार और क्रिकेट क्षेत्र के चर्चित नाम मीडिया के लिए प्रतिमा सी महत्वपूर्ण हो गए हैं और आप उन्हें अखबारों में छाए हुए देखते हैं और टीवी पर्दों पर भी उन्हीं की उबकाऊ पुनरावृत्ति होती है। इस समग्र प्रक्रिया में मीडिया की विश्वसनीयता बलि चढ़ रही है। लोगों का अब मुद्रित शब्द पर से भरोसा अधिकाधिक घटता जा रहा है और उस पर से भी जो वे पर्दे पर देखते हैं। वे दिग्भ्रमित हैं।
(यह आलेख कुलदीप नैयर ने लिखा है, जो विस्फोट.कॉम से साभार लिया गया है)
1966 में मिहिर सेन ने दुनिया के 6 सबसे संकरे जलमार्गों को तैर कर पार करने का रिकॉर्ड बनाया था। इनमें श्रीलंकाई समुद्र तट तलाईमन्नार से भारतीय हिस्से धनुषकोडि के बीच का जलमार्ग भी था। हिंद महासागर के इस हिस्से से बड़े जहाज और नौकाएं नहीं गुजर सकते क्योंकि यहां पानी की गहराई मात्र डेढ़ से साढ़े तीन मीटर तक ही है। इसकी तलहटी मायोसीन युग के चूना पत्थर की मोटी तह से बनी है। अंग्रेजों ने इस उथले समुद्री हिस्से को एडम्स ब्रिज नाम दिया और भारतीय हिंदू इसे रामायण में वर्णित राम सेतु के नाम से जानते रहे । आज कोच्चि या पश्चिमी तट से चेन्नई या फिर पूर्वी तट के किसी अन्य बंदरगाह तक जाने के लिए जहाजों को इस उथले जलक्षेत्र की वजह से श्रीलंका का चक्कर काटना पड़ता है। 2,427 करोड़ रूपए की सेतु समुद्रम परियोजना का उद्देश्य पाक खाड़ी से मन्नार की खाड़ी के बीच 44।9 नॉटिकल मील की दूरी का रास्ता तैयार करना है। इससे पश्चिमी और पूर्वी तट के बीच की यात्रा 400 नॉटिकल मील या 21 घंटे तक कम हो जायेगी।

