Monday, May 26, 2008

आख़िर क्यों बर्खास्त हुए एम जे अकबर

भारत में यह पहला प्रंसग नहीं है कि जब किसी संपादक को अशिष्ट ढंग से बर्खास्त किया गया है। इसे ऐसा अंतिम प्रसंग भी नहीं कहा जा सकता।

किन्तु अभी हाल तक `एशियन ऐज` के संपादक रहे एमजे अकबर की इस तरह की गई बर्खास्तगी ने कतिपय मौलिक प्रश्न उपस्थित कर दिए हैं। क्या मालिक को यह हक है कि वह अपने संपादक को जब चाहे मनमाने ढंग से बर्खास्त कर दें? कुछ दिन पूर्व जब अकबर अन्य दिनों के समान प्रात:काल अपने कार्यालय जा रहे थे तो रास्ते में ही उन्हें स्टाफ के एक सदस्य ने मोबाइल पर बताया कि उनका नाम प्रिन्टलाइन से हटा दिया गया है। वह कार्यालय गए उन्होंने अपने कागज पत्र समेटे और वहां से चले आए। अखबार के मालिक ने न तो पुनर्विचार ही किया और खेद जताना तो दूर स्पष्टीकरण का कोई पत्र ही उन्हें मिला। मेरी धारणा है कि मालिक ने जो हैदराबाद के एक वरिष्ठ कांग्रेसजन हैं, यह कदम उठाया, उन पर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से दबाव था कि वह अकबर से छुटकारा पा लें. दस जनपथ के विचार में एमजे अकबर सोनिया गांधी के प्रबल विरोधी थे।

सामान्य तौर पर कहें तो कहना होगा कि अतीत में भी कई अन्य संपादक हटाए गए हैं। फ्रैंक मौरेस, खुशवंत सिंह, जार्ज वर्गीस, प्राण चोपड़ा, एस मुलगांवकर, एचके दुआ और विनोद मेहता भी राजनीतिक दबाव का शिकार हुए थे। यदि मुझे ठीक-ठीक याद है तो इनमें से मात्र दो संपादक ही ऐसे रहे जिन्होंने मालिकों से टक्कर ली। प्राण चोपडा ने स्टेट्समैन से सीधे ही टक्कर ली और वर्गीस ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया की मार्फत। इन से एक का प्रबंधन से समझौता हो गया, जबकि दूसरे के मामले में सरकार ने प्रेस काउंसिल ही भंग कर दी। जो संदेश गया वह यह कि संपादक एक निपटाऊ माल है। जिसे जब चाहा बैठा दिया गया और जब मन आया हटा दिया गया। आपातकाल के बाद संपादकों के लिए हालात और भी जटिल हो गए, जब मालिकों ने यह पाया कि वे सरकार के समक्ष दंडवत कर देते हैं। उन्होंने (मालिकों ने) सोचा कि संपादक पर तो दबाव लाने भर की आवश्यकता होती है। दबाव जब भी पडे़गा तो वे आसानी से समर्पण कर देंगे।

मालिक और सरकार में नजदीकी बढ़ी, क्योंकि सरकार ने यह देखा कि उनसे निपटना कहीं अधिक आसान है क्योंकि उनके अन्य कई हित भी हैं। संपादक तेजी के साथ अपनी महत्ता से खिसक कर सरकार और मालिक के बीच संपर्क सेतु की स्थिति में आ गए हैं। वीआईपी स्वागत समारोहों, भोज स्थलों तथा ऐसे ही अन्य स्थानों पर मालिक अब देखे जाने लगे हैं, जबकि एक समय था, जब ऐसे आयोजनों में मात्र संपादक ही जा पाते थे। मालिकों का प्रोफाइल भी बदल गया है। नई पीढ़ी जो विदेशों से लौटी है, वह सामाजिक तौर पर महत्वाकांक्षी और अधिक दुनियादार है। मुझे याद है कि स्टेसमैन के मैनेजिंग डायरेक्टर सीआर ईरानी ने मुझसे पूछा था, `मंत्री तुम्हारे बजाय मुझे क्यों नहीं बुलाते, जबकि मैं उनके लिए संपादक की अपेक्षा कहीं कुछ ज्यादा कर सकता हूं।` इस सबके बावजूद अकबर के मामले ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठा दिए हैं। संविधान अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी देता है। जवाहर लाल नेहरू ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि श्रमजीवी पत्रकारों को मालिकों द्वारा मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सके, कानून बनवाया था। इस तरह उन्होंने एक लिहाज से रिपोर्टिंग और टिप्पणी करने वालों को एक तरह से संरक्षण दिलाया। मगर इस व्यवस्था को ठेके की उस योजना ने मात दे दी है, जो मालिकों ने लागू की है।

सवाल यह है कि यदि मालिकों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग उन पत्रकारों के माध्यम से, जिनके सिर पर ठेके की तलवार लटकी है, एक हथियार के तौर पर किया जाएगा तो फिर प्रेस की उस आजादी का क्या होगा, जिस की गारंटी संविधान निर्माताओं ने दी थी? उन्होंने तो यह सोचा तक भी नहीं होगा कि ऐसा भी समय आ जाएगा कि जब ऐसे हालात बन जाएंगे, जब पत्रकार मालिकों के इशारे पर ही थिरकने को बाध्य हो जाएगें। यदि ऐसा है तो फिर यह मानना होगा कि मूल संवैधानिक गारंटी पर पुनर्विचार का समय आ गया है।


अब क्योंकि न तो शासकों और न ही मालिकों के मन में प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति आदर की कोई भावना है, राष्ट्र के समक्ष एक चुनौती उपस्थित है। यह चुनौती ऐसी है, जिसे लोकतांत्रिक समाज को अपनी उस राज्य शासन व्यवस्था के हित में स्वीकार करना होगा, जिसमें स्वतंत्र प्रेस उन स्तम्भों से एक है, जिन पर यह ढांचा खड़ा है। दरअसल इस सिद्धांत को नेहरू की पुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने तब ध्वस्त कर दिया है, जब उन्होंने पहले `प्रतिबद्धता` के बारे में कहा था और तदुपरांत आपातकाल थोपकर प्रेस का गला घोंटा था। उनकी विदाई के बाद से परिदृश्य और धूमिल हो गया। जब जनता सरकार सत्तासीन थी और वह भी एक हिंसा विग्रह त्रस्त घर थी कि जिसमें यही ज्ञात नहीं हो पाता था कि दायां हाथ क्या कर रहा है और बाएं कि उसे चिंता नहीं होती थी, तब के थोड़े से समय को छोड़कर हालात ने ऐसी करवट ली कि मालिक और सरकार के बीच सांठगांठ और सुदृढ़ हो गयी चाहे शासन कांग्रेस का हो या भाजपा का, सरकार के आलोचकों के लिए कोई ठोर-ठिकाना ही नहीं रह गया। चतुर्थ स्तम्भ पर सर्वाधिक विघातक प्रभाव तो निगमित (कारपोरेट) क्षेत्र से पड़ा है। प्रेस की आजादी का एक अलग ही अर्थ लिया जाने लगा है। निगमित क्षेत्र सरकार से भी अधिक सशक्त हो गया। अब वही धुन निर्धारित करता है। उपलब्ध वस्तुओं को अधिकाधिक लाभ के लिए आगे लाना ही तो निगमित क्षेत्र का मन भावन सिद्धांत है। वही अब प्रेस के मामले में भी अपनाया जा रहा है। एक समय पर पत्रकारिता एक पेशा थी अब उसने एक उद्योग का रूप ले लिया है। अखबार एक उत्पाद है, उसी तरह जैसे साबुन अथवा टैलकम पाउडर है। अब आदर्शवाद का उनसे कोई नाता नहीं है और न ही किसी सामाजिक कर्तव्य का कोई सरोकार रह गया है। अब तो यही डगर है कि जो बिकता है, उसी से सरोकार है।


परिणाम यह है कि प्रेस की विचारों के प्रसारक के रूप में तो मृतवत सी हालत है। टीवी नेटवर्क का हाल तो और भी बुरा है। मीडिया अब टाइटल टैटल (शीर्ष-प्रलाप) का वाहक मात्र होकर रह गया है। फिल्म स्टार और क्रिकेट क्षेत्र के चर्चित नाम मीडिया के लिए प्रतिमा सी महत्वपूर्ण हो गए हैं और आप उन्हें अखबारों में छाए हुए देखते हैं और टीवी पर्दों पर भी उन्हीं की उबकाऊ पुनरावृत्ति होती है। इस समग्र प्रक्रिया में मीडिया की विश्वसनीयता बलि चढ़ रही है। लोगों का अब मुद्रित शब्द पर से भरोसा अधिकाधिक घटता जा रहा है और उस पर से भी जो वे पर्दे पर देखते हैं। वे दिग्भ्रमित हैं।

एक बात सुनिश्चित है कि मीडिया अपनी विश्वसनीयता गंवा चुका है, जिसे वह वापस नहीं ला सकता। अब लोगों को उस पर भरोसा नहीं रहा। आम आदमी की आकांक्षाओं का अभिवक्ता होने का अपना अधिकार वह गंवा चुका। यदि प्रेस की आजादी की मशाल फिर से कभी जली तो अनेक अकबरों की वापसी भी होगी।
(यह आलेख कुलदीप नैयर ने लिखा है, जो विस्फोट.कॉम से साभार लिया गया है)

Tuesday, May 20, 2008

राम-सेतु पूरी तरह से भौगोलिक प्राकृतिक संरचना

मित्रों नमस्कार
मैं आपको बता दूँ कि संकल्प जी का एक और पत्र मिला है मुझे। उन्होंने अपने कुतर्कों से फ़िर कुछ सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मुझसे राम-सेतु के बारे में मेरे राय जानने चाहे हैं। मैं साफ कहता हूँ कि राम-सेतु पूरी तरह से भौगोलिक प्राकृतिक संरचना है। इसका किसी मानव या महा मानव से या देवी-देवता से कोई सम्बन्ध नही है। ये मेरे अपने विचार हैं और इसमे कोई दो राय नहीं कि रामायण एक महाकाव्य है जिसका कोई वातविक प्रमाण उपलब्ध नही है। संकल्प जी आपकी जानकारी के लिए राम-सेतु से जुड़े कुछ वैज्ञानिक पक्ष यहाँ दे रहा हूँ। और मित्रों नीचे संकल्प जी का तीसरा पत्र भी है।
राम-सेतु : कुछ तथ्य
image1966 में मिहिर सेन ने दुनिया के 6 सबसे संकरे जलमार्गों को तैर कर पार करने का रिकॉर्ड बनाया था। इनमें श्रीलंकाई समुद्र तट तलाईमन्नार से भारतीय हिस्से धनुषकोडि के बीच का जलमार्ग भी था। हिंद महासागर के इस हिस्से से बड़े जहाज और नौकाएं नहीं गुजर सकते क्योंकि यहां पानी की गहराई मात्र डेढ़ से साढ़े तीन मीटर तक ही है। इसकी तलहटी मायोसीन युग के चूना पत्थर की मोटी तह से बनी है। अंग्रेजों ने इस उथले समुद्री हिस्से को एडम्स ब्रिज नाम दिया और भारतीय हिंदू इसे रामायण में वर्णित राम सेतु के नाम से जानते रहे । आज कोच्चि या पश्चिमी तट से चेन्नई या फिर पूर्वी तट के किसी अन्य बंदरगाह तक जाने के लिए जहाजों को इस उथले जलक्षेत्र की वजह से श्रीलंका का चक्कर काटना पड़ता है। 2,427 करोड़ रूपए की सेतु समुद्रम परियोजना का उद्देश्य पाक खाड़ी से मन्नार की खाड़ी के बीच 44।9 नॉटिकल मील की दूरी का रास्ता तैयार करना है। इससे पश्चिमी और पूर्वी तट के बीच की यात्रा 400 नॉटिकल मील या 21 घंटे तक कम हो जायेगी।

संकल्प जी का तीसरा पत्र

Greetings Friends

Good Morning Friends,
One more letter and one more attempt to hide the real feelings what the blog was originally supposed to convey. Mr. Nadeem, I'm really amazed at your persistence and the kind of language you use to playfully divert the concentration of gullible readers away from your malicious comments. If you were truly Secular in your outlook (something that you claim you are), you wouldn't have posted such controversial blogs in the first place? Also should it be considered a co-incidence, that the same blog contains comments against the treatment of Men and Women in US Army? It is quite easy to make out what you are up to and what's up your mind...
Yes, one of the most important objectives of any faith or religion is to make Human Beings out of man. Every religion preaches love and none teaches hatred. Not even against enemies. But people like Mr. Nadeem, who are ailing with some grudges in their minds and hearts against every religion other than their own, do not believe in this. They find out innovative methods to propogate their own views and opinions.
Mr. Nadeem, I still don't understand, what can be your vested interests in RAM-SETU being not re-constructed??? Why don't you want it to happen??? Probably Mr. Nadeem would be kind enough to enlighten us all on this issue........
Regards,
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नमस्कार मित्रों
आज फ़िर संकल्ड देसाई जी का एक पत्र मिला जिसमे उन्होंने मुझे कुछ नसीहत दी है। मुझे ऐसा लगता है कि संकल्प देसाई जी एक ऐसी मानसिकता वाले आदमी हैं, जो सच्चाई से जान बूझ कर मुँह फेर लेना ही पूर्ण रूप से सच मानते हैं। संकल्प जी मैं यही कहना चाहूँगा कि आप मेरे बारे मी कोई धारणा बनने से पहले मेरे ब्लॉग को पढ़ लें। मैंने अफगानिस्तान और इराक में महिलाओं कि स्थिती पर भी आलेख लिखा है, जहाँ इस्लामी कानून से शासन हो रहा है। मैं किसी धर्म विशेष का विरोध नही कर रहा हूँ, संकल्प जी। इतनी सी बात आपके समझ मे क्यों नही आ रही है। मैं किसी धर्म का विरोधी भी नही हूँ, अरे धर्म टू व्यक्ति को सभ्य बनने का एक मात्र साधन है, फिर हम लोग किसी भी धर्म को कैसे ख़राब सकते हैं। मैं तो सिर्फ़ इसलिए डी एन झा जी का लेख प्रकाशित किया था, क्यूंकि मुझे उसमे कई ऐसी जानकारी मिली जो मैं पहले से नहीं जानता था। मैंने सोचा कि और भी लोग इसे पढ़ें और अपनी राय देन। मुझे ये कहाँ पता था कि आप मुझ पर ही साम्प्रदायिक होने का आरोप मढ़ देंगे? वैसे भी आप जो बातें मुझे बताने कि कोशिश कर रहे हैं, वैसी बातों का कई दशकों से इस देश में भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि संकल्प जी जैसे लोग एक न एक दिन भ्रम के तिलस्म को तोड़ कर ज्ञान (gyaan) की सत्ता को स्वीकार करेंगे। बस डर है कि कहीं बहुत देर न हो जाए। वैसे संकल्प जी का लजा पत्र भी इस पोस्ट के साथ प्रकाशित कर रहा हूँ।
नदीम अख्तर
संकल्प देसाई जी का दूसरा पत्र

Reply to Communal Nadeem

Namaskar Mr. Nadeem,
As every literate and educated person (which I am) would understand from the blog, that it has not been written by you. You have merely picked it up from some publication and published it to satisfy your psuedo socialist motive of spreading awareness (read: spreading hatred towards Hindus). I raised my voice NOT against the article but YOUR action to post only that information which has something to do with Hinduism (Ram Setu) and Christianinty (US Army) or probably Indian Hindus and US, as you look at it.
Let me ask you a few questions :-
If you are really so much concerned about the plight of women in the world, then why don't you post blogs which bring out the reality about the condition of women in ISLAMIC countries. Aren't you aware of child marriages in Afghanistan, where a 12 yr old girl is married to a 56 yr old groom. Haven't you heard of Mercy Killings and the famous Mukhataran Mai case in Pakistan. Please enlighten all of us including yourself by posting such blogs on your site. Click here to come face to face with Islam -
During partition, people on both sides were promised that they would be allowed to follow their chosen faith. Hindu India has kept up its promise, but look at what Islamic Pakistan has done. Haven't you ever come across any news article which says that many Hindu Temples are in a very bad state in Pakistan. Hindus in that country are not even allowed to go to the temples and pray to their diety. I request all of you to please, please look at this posts....
Mr. Nadeem Akhtar, I, a proud Hindu of the most tolerant country of the world, request you not to spread more hatred against any community whatsoever. If you really want to spread awareness among some issues that you feel need social attention, you must look at it not from any communal angle. LEARN TO SPEAK THE TRUTH. If Islamic women are being treated like animals in almost all Islamic countries, there's no point of advocating human rights for women in the US Army!!!
Anxiously waiting for your reply. Do so only after you go through the links...... And if you doubt the authencity of the links I have attached, GOD bless you........
SANKALP DESAI


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नमस्कार मित्रों
आज सुबह मुझे एक मेल मिला जिसमे मुझे बहुत सारे सुभ्वाचानो से नवाजा गया है.
कारण यह है कि इस ब्लॉग में कल ही मैंने एक पोस्ट किया है जो इतिहास से
संबंधित है. सबसे पहले मैं ये बता दूँ की ये लेख मेरा नही है, बल्कि प्रख्यात
इतिहासकार डी एन झा का लिखा हुआ है. मुझे यह इतिहास के सन्दर्भ में कुछ नयी
जानकारी देने वाला और एक नयी बहस का रास्ता खोलने वाला लगा, इसलिए मैंने इसे
अपने ब्लॉग में जगह दी. मैंने इसमे साफ-साफ लिख दिया कि यह लेख रविवार.कॉम से
साभार लिया गया है, फिर भी एक साहब संकल्प देसाई जी को मेरा इसे प्रकाशित करना
शायद ठीक नही लगा. खैर, उन्होंने मुझे जो नसीहत, सलाह और इज्ज़त दी है, उसे मैं
आप सभी के साथ बांटना चाहता हूँ. और आपकी भी राय जानना चाहता हूँ कि आख़िर किस
हद तक पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर समाज को आगे बढाया जा सकता है. जिस लेख पर
आपत्ती है, वो नीचे है. मैं आग्रह करूंगा कि मुझे जो पत्र संकल्प देसाई जी ने
भेजा है, वो पढ़ने से पहले मूल आलेख, जो झा जी का है वो जरूर पढ़ लें. वैसे मैं
संकल्प देसाई जी और उनकी मानसिकता वाले सभी लोगों से इतना ही कहूँगा कि अगर
आपको लेख में दिए गए तथ्यों से तकलीफ हुई है, टू मैं आपसे माफ़ी माँगता हूँ.
नदीम अख्तर
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संकल्प देसाई जी का पहला पत्र

Reply to Bastard Nadeem

Mr. Nadeem Akhtar,

I think you should limit your intelligence to your fraud religion
which preaches something else and practices something totally
different. Also the product of your religion, samples like you are so
rude and idiotic, that they don't even care to respect other Gods, as
in this article you didn't care to write Shri Ram or Bhagwan Shri RAM,
but instead wrote the name only. I want to bring this to your notice
that you illiterate bastards should atleast learn some decency and
only then should take to writing.

I don't think that you people would ever understand any thing that's
good, hence i'm not expecting any correction or improvement in your
language. But if you want to live in India, then do so.........

And first go and check the authenticity of Mecca and Madina..........
there are cent percent chances that they too would be fraudulent just
as your community........

Sunday, May 18, 2008

मिथक इतिहास नहीं हो सकता

डी एन झा

यह प्रख्यात इतिहासकार डीडी कोसंबी का जन्मशती वर्ष है. कोसंबी गणित के विद्वान थे. जो सबसे बडी बात उनके बारे में है, वह यह कि उन्होंने पेशेवर इतिहासकार न होते हुए भी इतिहास लेखन पर बडा असर डाला. वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न थे. उन्होंने संस्कृत के टेक्स्ट पर आधारित ग्रंथों, आर्कियोलॉजी, गणित में अभूतपूर्व काम किया. इतिहास में तो उनका योगदान है ही.

उनके इतिहास लेखन को शुरू में पसंद नहीं किया गया. जैसे एएस अल्तेकर थे, जो उन्हें पसंद नहीं करते थे. कोसंबी का मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी लोगों को खटकता था. उन्हें बहुत दिनों तक एक इतिहासकार के रूप में मान्यता तक नहीं दी गयी. पटना विश्वविद्यालय पहला विश्वविद्यालय था, जिसने कोसंबी को एक इतिहासकार के बतौर बुलाया. कोसंबी पटना पहली बार आये 1964 में. उन्हें प्रो रामशरण शर्मा ने बुलाया था. उन्होंने अपने लेक्चर के दौरान स्लाइड शो प्रस्तुत किया था.

डी डी कोसंबी

1907-1966

उन्होंने पुणे के आसपास के इलाकों से प्राप्त मोनोलिथिक मॉन्यूमेंट्स के आधार पर यह साबित किया था कि हमारे समाज में उपस्थित धार्मिक विश्वासों और परंपराओं के सूत्र प्रागैतिहासिक जमाने तक जाते हैं, भले ही उनका रूप बदल गया है.

इस लेक्चर के बाद काफी लोग ऐसे थे, जिन्होंने विरोध जाहिर किया. उनमें के कुछ उठ कर चले भी गये. वे विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक थे. उनसे वे ऐतिहासिक तथ्य बरदाश्त नहीं हुए. इस तरह कोसंबी ने देवी-देवताओं के प्रागैतिहासिक अवशेष ढूंढे और यह धार्मिक विश्वासवाले लोगों के लिए हजम करनेवाली चीज नहीं थी. वे भला इसे कैसे स्वीकार करते कि उनके देवी-देवता असल में प्राक इतिहास के पात्र हैं.


इसके बाद इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने इलाहाबाद में उन्हें आमंत्रित किया. कोसंबी की किताबें पहले आ गयी थीं. उन्हें इतिहासकार के रूप में मान्यता बाद में मिली. आज हम पाते हैं कि भारत में इतिहास के क्षेत्र में जितनी भी बहसें चल रही हैं, उनका कहीं-न-कहीं कोसंबी के लेखन से तार जुडता है.

हम पाते हैं कि कोसंबी का लेखन बहुत बडा था. जैसे कि अभी भारतीय इतिहास लेखन में सामंतवाद को लेकर बहस चल रही है कि भारत में सामंती प्रथा थी या नहीं जैसी कि यूरोप में थी. भारत को एक राष्ट्र के बतौर देखा जाये या नहीं. सब ऑल्टर्न स्टडीज वाले कहते हैं कि चूंकि आजादी की लडाई के दौरान छोटे समुदायों का कोई नेता नहीं था, हालांकि उनके विद्रोह थे, तो फिर इसे राष्ट्र कैसे माना जाये. यह सब चुनौतियां हैं.

हालांकि सबऑल्टर्न स्टडीज का मतलब तो यह है कि वह छोटे और हाशिये पर के लोगों और समुदायों का अध्ययन करे, मगर वे लोग वर्तमान इतिहास लेखन को ही खारिज करने लगे हैं. प्रो रामशरण शर्मा ने कितना पहले शूद्रों और दलितों पर लिखा. अब सब ऑल्टर्न वालों का कहना है कि प्रो शर्मा का लेखन कुलीन और अभिजात लेखन है.

इतिहास लेखन एक जटिल प्रक्रिया है और यह कई सवालों के स्तरों से गुजरने के बाद शुरू होता है. कोई भी इतिहासकार जब लिखने बैठता है तो उसे समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति और जिस समस्या का अध्ययन करना है, उसको लेकर तीन सवाल उठाने चाहिए. पहला सवाल यह कि समस्या क्या है, दूसरा कि कहां है और तीसरा सवाल यह कि समस्या क्यों पैदा हुई. इन सवालों के जवाब खोजने के दौरान इतिहासकार बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर खोज लेते हैं. सामाजिक विकास की परिघटनाओं को समझने के क्रम में ही उसके दायरे में सामाजिक विकास आदि सब परिप्रेक्ष्य आ जाते हैं.

अब रामसेतु के मुद्दे को ही लें. जितने भी दक्षिणपंथी लोग हैं, उनका कहना है कि नासा ने जो एरियल फोटो लिये हैं, उनसे यही सिद्ध होता है कि यह वही पुल है, जिसे राम के जमाने में वानर सेना ने बनाया था. लेकिन नासा ने ऐसा कभी नहीं कहा. नासा ने कहा था कि यह जियोलॉजिकल फॉरमेशन है जो कि लाखों वर्ष पुराना है. लेकिन लोग यह बात नहीं सुन रहे हैं.

असल में मिथकों के साथ दिक्कत यह है कि जो चीज आपके सामने होती है, उसे आप मिथ से जोड देते हैं. एक उदाहरण जनकपुर का है. जनकपुर को सीता का जन्मस्थान बताया जाता है. मगर वह सीता का जन्मस्थान हो ही नहीं सकता. वह स्थान मुश्किल से 200 साल पुराना है.


अगर मिथकों से कोई भौगोलिक संरचना जुड जाती है, तब भी उस मिथक को इतिहास नहीं माना जा सकता. सरकार ने रामसेतु के संदर्भ में इतिहासकारों की एक कमेटी बनायी थी, जिसमें प्रो रामशरण शर्मा, डॉ पदइया और प्रो बैकुंठन जैसे लोग थे. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि इस संरचना का मिथकों और रामायण में वर्णित रामसेतु से कोई लेना-देना नहीं है.

एक मिथक के इतिहास का रूप लेने का भ्रम पैदा होने की प्रक्रिया जटिल होती है. बार-बार कोई कहानी अगर लोगों के बीच दोहरायी जाये, उसे प्रस्तुत किया जाये तो वह लोकप्रिय होती जाती है.

हम इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. बिहार के गांवों में लोग काफी समय से आल्हा-ऊदल की कहानी गाते हैं. अगले सौ सालों में मान लीजिए कि कोई इसे लिपिबद्ध कर दे. उसके बाद इसे काव्य मानना शुरू कर दिया जायेगा. इस तरह लोकप्रिय वाचिक परंपरा लिखित साहित्य परंपरा में बदल जाती है. और फिर लिखित साहित्य को कालांतर में भ्रमपूर्वक इतिहास के बतौर ले लिया जाता है. रामायण के साथ यही हुआ.

हम देखते हैं कि काल और स्थान के अनुरूप रामायण भी अलग-अलग हैं. फादर कामिल बुल्के ने राम कथा पर जो शोध किया था, उसके तहत उन्होंने रामायणों की कुल संख्या 300 बतायी. मगर रामानुजम ने जो शोध किया, तो उनका कहना है कि कन्नड और तेलुगु में ही हजारों रामायण हैं. बाकी भाषाओं को तो छोड दीजिए. और उनके पाठों में भी अंतर है.


ऐसा इसलिए होता है कि कहानी जब ट्रेवल करती है, समाज का एक वर्ग जब दूसरे वर्ग की कहानी को अपनाता है, तो इसमें वह थोडी बदल जाती है और इसे अपनाने की प्रक्रिया की भी अपनी एक कहानी बन जाती है.

आमतौर पर उत्तर भारत में माना जाता है कि सीता बडी पतिव्रता स्त्री थीं. मगर संथालों के रामायण में सीता के चरित्र के बारे में बताया गया है कि उनके रावण से भी संबंध थे और लक्ष्मण से भी. बौद्धों का जो रामायण है-दशरथ जातक-उसमें राम और सीता को भाई-बहन बताया जाता है और वे बाद में शादी करते हैं. इन राम का संबंध अयोध्या से नहीं बल्कि बनारस से है.

तो यह कहना कि कोई भी कहानी स्थिर है, सही नहीं है. वाल्मीकि रामायण के बारे में इतिहासकारों का मानना है कि उसका पहला और अंतिम कांड बाद में लिखा गया. हमें इन चीजों को एक लचीले नजरिये से देखना चाहिए.

हम देखते हैं कि अभी की प्रमुख समस्या सांप्रदायिकता की है. इतिहासकारों को सांप्रदायिकता से लडना है. आरसी मजूमदार जैसे इतिहासकारों का बडा असर रहा है और जो दक्षिणपंथी गिरोह हैं, वे उन्हीं से अपनी लेजिटिमेसी ठहराते रहे हैं. मगर फिर भी आजादी के बाद से इतिहासकारों का नजरिया काफी वैज्ञानिक ही रहा है. इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में सैकडों इतिहासकार हैं. इतिहास कांग्रेस ने कभी भी सांप्रदायिक दृष्टि नहीं अपनायी. सांप्रदायिक पक्ष जो एक्सक्लूसिव विजन देता है, अल्पसंख्यकों के खिलाफ और अपने अतीत के बारे में वह बिल्कुल गलत है. जो भी इस देश में गंभीर रिसर्चर हैं, वे इसके विरुद्ध हैं. यह एक बडी चुनौती है.


अपने यहां सिर्फ दृष्टि की समस्या ही नहीं है. इतिहास लेखन को व्यवस्थाजन्य चुनौतियों से भी दो-चार होना पडता है. यह एक बडी कमजोरी है कि खुदाइयों के बारे में कुछ पता नहीं चल पाता कि उनमें क्या मिला और उनसे हम किस निष्कर्ष पर पहुंचें. दरअसल यह गलती आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की है. वह सब जगह खुदाई करवाती रहती है, मगर उसकी रिपोर्टें नहीं जमा की जातीं.

आप इसका नुकसान जानना चाहते हैं तो केवल अयोध्या विवाद का उदाहरण देना काफी होगा. इस विवाद में पूरा मामला इतना गडबडाया सिर्फ इसलिए कि बी लाल ने सालों तक खुदाई की रिपोर्ट नहीं जमा की. जो छोटी खुदाई हुई, कोर्ट के आदेश पर, सिर्फ उसकी रिपोर्ट जमा की गयी. उसके साथ भी छेड-छाड की गयी थी. जहां भी, जो भी अवशेष मिलता है, उसे भंडार में जमा कर दिया जाता है. उसके बारे में रिपोर्ट जमा ही नहीं होती. इससे पता नहीं चलता कि क्या मिला है और उसका क्या महत्व है।
यह आलोख रविवार.कॉम से साभार लिया गया है.

Friday, May 16, 2008

चलो कुछ रोज़ के िलए मर जायें

हम जीते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी
क्यूं ऐसा हो कि जब हम भर जाएं
तो कुछ दिनों के लिए हम मर जाएं
चंद रोज़ मर कर जब चाहें
वापस ज़िंदा होकर आएं
कुछ दिन पहले इंटरनेट को खंगालते हुए जब क्रायोनिक्स के बारे में पढ़ा तो अपने एक अजीज़ मित्र की ये कविता याद गई. लगा कि जिंदगी से भर जाने के बाद कुछ दिन के लिए मर जाना और फिर जिंदा होकर वापस आना अपनी जिंदगी रहते मुमकिन हो सकता है. दरअसल क्रायोनिक्स मौत के बाद शरीर को बेहद कम तापमान पर तब तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया है जब तक विज्ञान इतना विकसित हो जाए कि मुर्दों में जान फूंकी जा सके. शरीर को सुरक्षित रखने की इस प्रक्रिया को क्रायोप्रिजर्वेशन कहा जाता है. यानी हो सकता है कि एक दिन आप बहुत गहरी नींद से जागें और पाएं कि दुनिया 200 साल आगे निकल गई है और आप अपने आसपास किसी को भी नहीं जानते. या फिर जान भी सकते हैं अगर आपके इष्ट मित्रों ने भी आपके साथ खुद को क्रायोप्रिज़र्व्ड करवाया हो.

अगर आप अब भी ये सोच रहे हैं कि ये सब बातें अभी कागजी और फैंटसी की दुनिया में ही हैं तो आपको बता दें कि जानी-मानी मॉडल और अभिनेत्री पेरिस हिल्टन सहित करीब एक हजार शख्सियतों ने क्रायोप्रिजर्वेशन के लिए पंजीकरण करवा लिया है और 147 लोगों का तो क्रायोप्रिजर्वेशन हो भी चुका है. पेरिस हिल्टन के बारे में एक रोचक बात ये भी है कि वे अकेली नहीं बल्कि अपने कुत्ते के साथ फिर से जिंदा होना चाहती हैं.

फिलहाल अमेरिका में दो ऐसे संगठन हैं जो आपको मौत के बाद फिर से जी उठने की उम्मीद दे रहे हैं. ये हैं मिशिगन के क्लिंटन शहर में स्थित क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट और एरिजोना के स्कॉट्सडेल शहर में स्थित एल्कॉर. क्रायोनिक्स के ज़रिए फिर से ज़िंदा होने की इच्छा रखने वालों के पास दो तरह के विकल्प होते हैं. पहले विकल्प के अंतर्गत पूरे शरीर को सुरक्षित रखा जा सकता है. दूसरे विकल्प में शरीर से सिर को अलग कर सिर्फ उसे ही सुरक्षित रखा जाता है. इसके पीछे ये सोच होती है कि एक वृद्ध इंसान अपने जर्जर शरीर के साथ फिर से जीना नहीं चाहेगा और जब उसे जिंदा किया जाएगा तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली होगी कि उसके दिमाग के लिए एक नया शरीर भी तैयार होगा. जहां तक इन तरीकों में आने वाले खर्च का सवाल है तो एल्कॉर पहले विकल्प के लिए 80,000 और दूसरे विकल्प के लिए 42,000 पाउंड्स वसूलती है.

क्रायोनिक्स के पैरोकार इसके पक्ष में भले ही तमाम दावे करें मगर इस पर विवाद और आपत्तियां उठती रही हैं. कुछ ऐसी वैज्ञानिक बाधाएं हैं जिनके बारे में कुछ लोगों का कहना है कि उनसे कभी पार नहीं पाया जा सकेगा. मसलन पूरे शरीर को सुरक्षित करने के लिए जिन रसायनों (क्रायोप्रोटेक्टेंट कैमिकल्स) का वर्तमान में इस्तेमाल किया जा रहा है उनसे शरीर को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचता है. ऐसे लोगों को फिर से जीवित करने के लिए नुकसान की इस प्रक्रिया को पलटने की जरूरत होगी. इसके साथ ही उस बीमारी का इलाज खोजे जाने की भी जरूरत होगी जिससे संबंधित व्यक्ति की मौत हुई थी.
मगर उम्मीद की किरण ये है कि विज्ञान उस बिंदु तक तो पहुंच ही गया है जहां उसने जीवन के स्वरूपों को जमी हुई और स्थिर अवस्था में रखने और फिर बाद में उसे पुनर्जीवित करने के तरीके खोज लिए हैं. मसलन लाल रक्त कोशिकाएं, स्टेम कोशिकाएं, शुक्राणु और अंडाणु को क्रायोबॉयोलॉजी का इस्तेमाल करके ही सुरक्षित रखने का चलन आम हो चुका है. हालांकि ये काफी सरल स्वरूप हैं और शरीर जैसे बेहद जटिल तंत्र को सुरक्षित रखना अब भी एक चुनौती है.

चलिए अब लगे हाथ ये भी जान लिया जाए कि शरीर को क्रायोप्रिजर्व्ड आखिर किया कैसे जाता है. जैसे ही दिल धड़कना बंद करता है और कानूनी परिभाषा के हिसाब से व्यक्ति की मौत हो जाती है तो शरीर को संरक्षित करने वाली टीम फौरन अपने काम में जुट जाती है. सबसे पहले और मरते ही शरीर को कम तापमान में रखकर दिमाग में पर्याप्त खून भेजने का इंतजाम किया जाता है ताकि दिमाग की कोशिकाएं सलामत रहें. गौरतलब है कि आक्सीजन मिलने से कोशिकाएं मरने लगती हैं. और यदि शरीर को तुरंत कम तापमान में रख दिया जाए तो ये प्रक्रिया धीमी हो जाती है. उदाहरण के लिए तापमान में 10 डिग्री कमी लाकर इस प्रक्रिया में लगने वाले समय को दुगुना किया जा सकता है. जिस जगह मौत हुई है वहां से क्रायोप्रिजर्वेशन किए जाने वाली जगह (क्रायोनिक्स फैसिलिटी) तक जाने के सफर में खून के थक्के बनने लगें इसके लिए इंजेक्शन की मदद से हेपेरिन नामक दवा दी जाती है.

अब शव को क्रायोनिक फैसिलिटी ले जाया जाता है और यहां सबसे पहला काम होता है शरीर में मौजूद 60 फीसदी पानी को बाहर निकालना. ये काम इसलिए किया जाता है कि अगर शरीर को सीधे ही बेहद कम तापमान पर तरल नाइट्रोजन में रख दिया जाएगा तो कोशिकाओं के भीतर पानी जम जाएगा. चूंकि पानी जमने पर आकार में फैल जाता है इसलिए ये कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाएगा. कोशिकाओं से मिलकर ऊतक(टिश्यू) बनते हैं., ऊतकों से मिलकर अंग और फिर अंगों से मिलकर शरीर. यानी कोशिका को सुरक्षित रखना बेहद अहम होता है. उनसे पानी को बाहर निकालकर उसकी जगह शरीर में क्रायोप्रोटेक्टेंट नामक रसायन भर दिए जाते हैं. ये कम तापमान पर जमते नहीं और इसलिए कोशिका उसी अवस्था में सुरक्षित रहती है. इस प्रक्रिया को विट्रीफिकेशन कहा जाता है.

इसके बाद शरीर को बर्फ की मदद से -130 डिग्री तापमान तक ठंडा किया जाता है. अगला कदम होता है शरीर को तरल नाइट्रोजन से भरे एक टैंक में रखना. यहां तापमान -196 डिग्री रखा जाता है.

इसके बाद कुछ रह जाता है तो सिर्फ जीवित होने का अनिश्चित इंतजार.
विकास बहुगुणा का लेख तहलका से साभार