चुनाव के दिन
लच्छेदार बातें !!
नेताओं के द्वारा
शब्दों की टट्टी !!
जिनका कोई नहीं अर्थ
वो ढपोरशंखी शब्द !!
दिलासा देते सबको
कुछ वाहियात लोग !!
जो माँ को बेच दे,ऐसे लोग
भारत माँ के तारणहार !!
खा-पीकर जुगाली करते
ये मनचले-मनहूस लोग !!
इनको यहाँ से बाहर निकालो लोगों
इन सबको पटखनी दे दो ओ लोगों !!
इन माँ के बलात्कारियों ने
चुतिया बनाया बनाया तुम्हे साथ साल.......
इन सड़क पर पीट कर अधमरा करो लोगों !!
तुम सबके साथ रो रहा हूँ मैं भी.....
इन सालों को दफन कर दो ओ लोगों !!
अपराधियों को कतई वोट मत दे देना
उनके साथ तुम ना रेपिस्ट बन जाना !!
भारत मांग रहा है आज बलिदान
कम-से-कम इतना तो दो प्रतिदान !!
एक वोट जरूर से जाकर दे आना
वरना इस देश को अपना ना कहना !!
तुम्हारा एक वोट संविधान के माथे पर
एक बहुमूल्य तिलक है ओ लोगों !!
इसे वाजिब उम्मीदवार को देकर
इसकी पवित्रता बचा लो ओ लोगों !!
इस देश ने दिया है अगर तुम्हे कुछ भी
इस देश को आज बचा लो ओ लोगों !!
Tuesday, March 31, 2009
Monday, March 30, 2009
अल्ला रे क्या हूँ मैं.....???
अपनी ही धून में गम हूँ मैं
बस थोड़ा सा गुमसुम हूँ मैं !!
मुझसे तू क्या चाहता है यार
अरे तुझमें ही तो गुम हूँ मैं !!
बस गाता ही गाता रहता हूँ
कुछ सुर हूँ,कुछ धून हूँ मैं !!
याँ से निकलकर कहाँ जाऊं
आज इसी उधेड़बून में हूँ मैं !!
जागने और सो जाने के बीच
किसी और की ही रूह हूँ मैं !!
अल्ला रे मेरा क्या होगा यार
कि ख़ुद तो मैं हूँ ना तुम हूँ मैं !!
"गाफिल" मुझे इतना तो बता
मैं अकेला हूँ कि हुजूम हूँ मैं !!
बस थोड़ा सा गुमसुम हूँ मैं !!
मुझसे तू क्या चाहता है यार
अरे तुझमें ही तो गुम हूँ मैं !!
बस गाता ही गाता रहता हूँ
कुछ सुर हूँ,कुछ धून हूँ मैं !!
याँ से निकलकर कहाँ जाऊं
आज इसी उधेड़बून में हूँ मैं !!
जागने और सो जाने के बीच
किसी और की ही रूह हूँ मैं !!
अल्ला रे मेरा क्या होगा यार
कि ख़ुद तो मैं हूँ ना तुम हूँ मैं !!
"गाफिल" मुझे इतना तो बता
मैं अकेला हूँ कि हुजूम हूँ मैं !!
Friday, March 27, 2009
आखिर क्या चाहते हैं हम वरुण से
इन दिनों मीडिया में कतूहल का विषय है वरुण गांधी का अतिवाद। टीवी खोलने पर लगभग सभी समाचार चैनलों में वरुण गांधी "जय श्रीराम" टाइप के नारे लगाते दिख जाते हैं। बहुत सारी आलोचनाएं होती रहती हैं, उनकी। एंकर कहता है-ऎसे भड़काऊ बयान देने वाला कोई और नहीं बल्कि यह है वरुण दंगाई गांधी!! मुझे हंसी भी आती है इन खबरों और वरुण की भाषा पर और क्रोध भी आता है। क्रोध इसलिए नहीं आता क्योंकि मैं भी मुसलमान हूं और वरुण गांधी ने मुस्लिम विरोधी बातें कही हैं। मैं तो इस बात से पूरी तरह मुअय्यन हूं कि अरे वरुण गांधी हिन्दुओं की सभाओं में भले ही मुस्लिम विरोधी बयान दे दें, लेकिन अगर उन्हें कहिए कि एक सभा है, उसमें 70 हिन्दू और 30 मुस्लिम या अन्य धर्म के लोग बैठे हैं, वहां चल के ज़रा अपना कथित हिन्दू प्रेम उजागर कीजिए, तो वे निश्चित तौर पर मुंह से ए फॉर एप्पल भी नहीं बोल पायेंगे। वजह भी है ना- वरुण गांधी कोई पुराने खिलाड़ी नहीं हैं। डरपोक किस्म के नेता (उन्हें नेता न मानने वाले मुझे माफ करें) हैं। असल में समाजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ जो उम्मीदवार उतारा है (रियाज़ अहमद), वह मुसलमान है और उसका पीलीभीत में अच्छा-खासा प्रभाव है, ऎसा कुछ लोगों ने बताया है, मैं नहीं जानता कि वास्तविकता क्या है लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि वरुण उनसे डरे हुए हैं, तभी तो वो अपनी सभाओं में रियाज़ को कभी ओसामा बताते हैं, तो कभी दाउद का भाई-भतीजा। असल में उन्हें रियाज़ को हराने का एक उपाय सूझा था कि उनके खिलाफ हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण किया जाये। उन्होंने अपनी चुनावी वैतरणी पार करने के लिए राम-नाम का सहारा ले लिया। वैसे भी भारत में हिन्दू भावनाओं के बल पर कोई भी व्यापार किया जा सकता है। कम से इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि आज इंडिया में सबसे सेलेबल आइटम भावना है और हिन्दुओं की भावना तो थोक में बिकती है। मिसाल के तौर पर - टीवी पर आपने साउना बेल्ट बिकते देखा होगा, जो होम शॉपी और क्या-क्या नाम से कंपनियों के माध्यम से टेलीब्रांडिंग होती है। अंग्रेजों की दस्त उस साउना बेल्ट के साथ हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक रुद्राक्ष फ्री दिया जा रहा है। अब जिसे रुद्राक्ष चाहिए, वो न चाह कर भी साउना बेल्ट खरीद रहा है। जिसकी खा कर मोटाने की औकात नहीं, वह पतला होने का नाड़ा खरीद रहा है। क्यों, क्योंकि उसकी आस्था है रुद्राक्ष में। खैर, कहने का मतलब यह हुआ कि वरुण गांधी पहचान चुके हैं उस दुकान को, जहां कबाड़ की तरह भावनाओं का अंबार है और जो बहुत ही कम कीमत पर वोटों के बदले कैश करायी जा सकती हैं। और, वरुण गांधी के पास ऎसा कोई वीज़न भी नहीं है, जिसके माध्यम से वह एक संघर्षशील नेता के रूप में उभरें। उनमें इतना माद्दा भी नहीं दिखता कि वह देश भर की खाक छानते हुए हर क्षेत्र की समस्याओं को पार्टी में ज़ोरदार ढंग से रखें और उनपर सर्वसम्मत राय कायम करायें। ये सब उसके अंदर होता है, जिसके संस्कार मज़बूत होते हैं। अगर संजय-मेनका-वरुण परिवार से ऎसे संस्कार की कोई उम्मीद रखता है, तो या तो वह आदमी मूर्खता की पराकाष्ठा को पार कर चुका है या फिर वह दुनिया के रस्मों-रिवाज से अंजान है।कहा जाता है कि बच्चों पर उसके माता-पिता की करनी का असर बहुत ही प्रभावी ढंग से पड़ता है। आपको क्या लगता है कि वरुण गांधी इससे अछूते रह गये होंगे। थोड़ा ऎतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने से पता चलता है कि संजय गांधी बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे। रंगीन मिजाज़ तो थे ही। मेनका गांधी में भी ये दोनों खासियत थी, है भी। शोहरत की चाहत में मेनका अपने पति के नक्श-ए-कदम पर चलने वाली महिला हैं। वह इसके लिए कुछ भी कर सकती हैं। संजय गांधी क्लब-बार में थिरकने के शौक को झटक कर कैश करते हुए मेनका गांधी को पूरे देश ने देखा था, वरना उनमें ऎसा कुछ नहीं था, जिसके चलते इंदिरा गांधी अपने बेटे की शादी ऎसी लड़की से करती। एक तो मेनका अपनी जवानी में नशाखोरी को लेकर बदनाम थीं और दूसरी वह एक मॉडल थीं, जिन्हें पैसों के लिए अमीरों की पार्टियों में कैटवाक करने से लेकर डांस करने तक से कोई परहेज़ नहीं था। मेनका कभी सुपर मॉडल नहीं रहीं। उन्हें पता भी था कि वह कभी शो-स्टॉपर नहीं बस सकेंगी, इसलिए उन्होंने फटाफट ऊपर पहुंचने का ज़रिया तलाश किया। सामने दिखे संजय गांधी। भारत के सबसे प्रभावशाली परिवार का हिस्सा बनने और भावी प्रधानमंत्री की हमराही बनने की चाहत लिये मेनका ने ऎसा कोई अवसर हाथ से नहीं जाने दिया, जिससे संजय गांधी उनके करीब न आयें। संजय की मौत के बाद मेनका अलग-थलग नहीं हुई थीं। वह चाहतीं तो संयम के साथ इंदिरा गांधी के परिवार का हिस्सा बनी रह सकती थीं, लेकिन उनकी महत्वकांक्षा उन्हें ऎसा करने से रोकती थी। उन्हें चाहिए था शोहरत, हर कीमत पर। और उन्हें मिली भी। वह अब तक चार बार केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं, जबकि इसी गांधी परिवार की एक और बहू सोनिया ने प्रधानमंत्री के पद को भी ठुकरा दिया है।
राजनीतिक महत्वकांक्षा के अलावा उन्होंने और भी कई कारनामे किये हैं, जिससे यह पता चलता है कि नीम के पेड़ से आम कभी नहीं आ सकता। और, जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। शायद आपको पता होगा कि जगजीवन राम मोरारजी देसाई सरकार में रक्षा मंत्री हुआ करते थे। उस समय मेनका गांधी की शादी संजय से हो चुकी थी। मेनका पत्रकारिता के माध्यम से अपने आप को देश में एक तरह से स्थापित करना चाहती थीं। उस समय उन्होंने एक मैग्जीन लॉन्च की-सूर्या। उस मैग्जीन को अच्छा बनाने के लिए इंदिरा गांधी ने अपने पुराने मित्र खुशवंत सिंह से कह दिया। खुशवंत मान गये और मैग्जीन में लेख लिखने के साथ-साथ कुछ संपादन का काम भी करने लगे। एक दिन जब खुशवंत सिंह सूर्या के दफ्तर आये, तो उन्हें मेनका गांधी ने एक लिफाफ दिया, जिसमें नौ तस्वीरें थीं सुरेश राम की। सुरेश राम कोई और नहीं बल्कि बाबू जगजीवन राम के बेटे थे। सुरेश उन नौ तस्वीरों में दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक 21 वर्षीय छात्रा सुषमा चौधरी के साथ सेक्स करते देखे जा सकते थे। तस्वीरें बिल्कुल स्पष्ट थीं और सभी तस्वीरें एक स्व चालित कैमरे से खुद सुरेश राम ने खींची थीं। जगजीवन राम कैबिनेट में दिनों-दिन काफी प्रभावशाली होते जा रहे थे और ऎसा लग रहा था कि मोरारजी देसाई की जगह वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे। ऎसी स्थिति में उनके दोस्तों के साथ-साथ उनके दुश्मनों की संख्या भी बढ़ चुकी थी। सुरेश राम खुद पॉलिटिक्स में नहीं थे, लेकिन उनके पिता के राजनीतिक जीवन पर उनकी अय्याशी की दास्तां छपने पर ज़रूर असर पड़ता। सुषमा चौधरी मध्य वर्गीय परिवार की लड़की थी, जो सिर्फ सुरेश राम से प्यार करती थी और यह भी नहीं जानती थी कि सुरेश शादी-शुदा है। सुरेश औरतों का आदी था, जिसे अपने पार्टनर के साथ सेक्स करते हुए अपनी ही तस्वीरें रखने का बहुत शौक था। उसने सुषमा के साथ सेक्स की तस्वीरें अपनी मर्सिडीज़ गाड़ी में रखी थीं, जिसे कह सकते हैं कि बाबू जगजीवन राम के विरोधियों ने चुराकर सीधे इंदिरा गांधी के चरणों में डाल दिया। चूंकि, राजनीतिक
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इज्जत लूट ली इन्होंने,
राजनीति
पापा मैं स्कूल नहीं जाउंगी !
अभी-अभी अपनी छोटी बिटिया मौली को स्कूल छोड़कर आ रहा हूँ,जिसे दस दिनों पहले ही स्कूल में दाखिल किया है....उसकी उम्र ढाई साल है....और रोज-ब-रोज स्कूल के दरवाजे पर पहुँचते ही इतना रोटी है कि उसे वापस घर ले आने को मन करता है....और तक़रीबन सारे ही बच्चे स्कूल के गेट के एब सम्मुख आते ही जोरों से चिंघाड़ मारना शुरू करते हैं....और सारा माहौल ही रुदनमय हो जाता है...कितनी ही माताओं की आँखे नम हो जाती हैं....और कुछ को तो मैंने बच्चों को छोड़कर गेट पर ही रोते हुए भी देखता हूँ....ख़ुद मेरी भी आँखे कुछ कम नहीं नम होती...मगर बच्ची को स्कूल जाना है तो जाना है...अब चाहे रोये...चीखे या चिल्लाए....अपना दिल काबू कर उसे रोता हुआ छोड़कर अपने को रोज वापस आ जाना होता है......!!सवाल बच्चे द्वारा नई जिन्दगी की शुरुआत का नहीं है....मेरे लिए सवाल बच्चे की उम्र का है...जो दो से ढाई साल का है...यहाँ तक कि बहुत से शहरों में तो ग्यारह-ग्यारह महीनों के बच्चे भी स्कूल में लिए जा रहे हैं...और उनके कामकाजी माता-पिता कितनी राजी-खुशी उन्हें स्कूल छोड़कर बड़े आराम से अपने काम को रवाना हुए जा रहे हैं.... और फिर बच्चा स्कूल से वापस दाई या नौकर के साथ लौटता है....और फिर माँ-बाप के वापस लौटने तक उन्ही के साथ अकेला या किसी की किस्मत अच्छी हुई तो किसी पार्क आदि में खेलने का मौका मिल जाता है.... जबकि हमने शायद छः या सात साल में स्कूल का स्वाद चखा था...उस उम्र में में भी हम,मुझे याद आता है कि हम रोया करते थे....और कई बार मन नहीं करता था तो माँ-बाप हमें स्कूल जाने से रोक भी दिया करते थे....माँ-बाप द्बारा दिया गया यह प्रेम आज भी उनके प्रति अथाह सम्मान के रूप में हमारे ह्रदय में कायम है....और कभी भी हम उनकी अवज्ञा करने की हिमाकत नहीं करते....और जहाँ तक किसी समस्या पर अपने विचारों और दुनिया की वस्तुस्थिति से उनको अवश्य रु-ब-रु कराते हैं.....अपने प्रेम को हमने अपनी माँ को इसी तरह समझाकर विवाह का जामा पहनाया था.....अलबत्ता झगडे तो कहाँ नहीं होते.....!!
लेकिन ये सब लिखने का कारण यह है कि ढाई साल से बच्चे से हम आख़िर चाहते क्या हैं....सवेरे इक बेहद ही गहरी और प्यारी नींद में सोये बच्चे को जबरन उठाना(ध्यान रहे कि उसकी उम्र कितनी है....!!!!!)और कभी धक्के मार कर कभी बहलाकर उसे तैयार करना....और रोते हुए ही उसे स्कूल को रवाना कर देना.....बेशक हम अपना अतीत नहीं देखते....हमने शायद सात साल की उम्र में पढ़ना शुरू किया....तो क्या हमारे ज्ञान में कोई कमी रह गई है....या किसी भी इंसान से हम कमतर इंसान हो गए हैं....!!
बच्चा अगर ढाई-तीन की उम्र से स्कूल ना जाकर चार-पाँच साल की उम्र में स्कूल जाए तो इसमें हर्जा क्या है.....??ये शुरू के बरस वो घर और उसके आस-पास खेलता रहकर और घर में ही खेलता-खाता हुआ बिना एग्जाम की जहमत उठाये हुए कुछ सीख-साख ले तो इसमें हर्जा क्या है.....??ढाई साल का इक बच्चा दुनियादारी कुछ सालों बाद ही सीख ले इसमें हर्जा क्या है.....??और अंत में एक बात यह भी कि हम अपने बच्चों से आख़िर चाहते क्या हैं.....????..........अपनी इच्छा से जो महत्वाकांक्षा उन्हें हम सौंपते है......आप मानिए या मानिए....जब वो कुछ बनने के लिए प्रोफेशनल बनाना शुरू करते हैं.....तो शायद उनकी नज़र में हम उनके माँ-बाप तो क्या,इक अजनबी से ज्यादा कुच्छ नहीं रह जाते....बेशक हम तब ता-जिन्दगी उनकी बेदर्दी को लेकर ता-जहाँ कलपते रहे...
जो हम रोपते हैं....वही हम पाते हैं.....हम बच्चे को ढाई साल से ही ख़ुद से दूर करना शुरू कर देते हैं....तो बच्चे से यह तनिक भी उम्मीद ना करे कि आने वाले समय में वो हमारे पास फटक पायेगा....या कि हमसे जुदा हुआ रह पायेगा....दोस्तों....बहुत-सी बातों पर हम विचार ही नहीं करते या सिर्फ़ विचार करके ही रह जाते हैं...उनके परिणामों की बाबत सोचना शायद हमारे बूते के बाहर होता है.....या किसी दबाव में हम आ जाते हैं.....जैसे अपनी ढाई साल की छोटी-सी बच्ची को डाला है मैंने स्कूल में अपनी घरवाली के दबाव में.....अपनी पिछली बच्ची प्राची की तरह......!!
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