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Monday, May 18, 2009

अब भी कायम है विश्वास

काफी दिनों से अपने यहां लोकल पॉलिटिक्स की चर्चा नहीं हुई है। इसलिए मैंने सोचा कि आज ज़रा इस टॉपिक पर भी कुछ गपियाया जाये। आज मैं अखबार देख रहा था, तो कमो-बेस सभी में रांची के पुनः निर्वाचित सांसद सुबोधकांत सहाय की तस्वीरें देखीं। उनकी तस्वीर देखकर मैं सोच रहा था कि आखिर जनाब इतनी जद्दोजहद के बावजूद कैसे जीत गये। बीजेपी और संघ परिवार ने तो झाविमो के माध्यम से उनकी फील्डिंग कर ही दी थी, फिर भी वो विजयी रहे, क्या कारण है? फिर मुझे लगा कि पहले देखता हूं कि इनके परंपरागत वोटर, मुसलमान कहीं खिसके तो नहीं। 31 हजार जो वोट आया है झाविमो के हाजी अख्तर अंसारी को, तो वो कहां से मिला। मतगणना के दिन अपने साथी पत्रकारों से जो आंकड़े मिले थे, उन्हें खंगालने से पता चला कि रांची से हाजी अख्तर अंसारी को केवल 2700 वोट मिले। रांची विधानसभा में मुस्लिम वोट कम से कम एक लाख है। इनमें से बहुत कम भी तो 40 हजार ने वोट ज़रूर दिया होगा। अब अगर ये सभी मुस्लिम मतदाता मुस्लिम प्रत्याशी को जिताने के झांसे में आकर झाविमो को वोट दे देते, तो सोचिये कि सुबोध कांत सहाय का क्या होता, क्योंकि इतना तो तय है कि सुबोध भैया को ही मुस्लिम वोट मिले हैं, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम इलाकों में काफी काम भी किया है। यही वजह है कि बसपा के प्रत्याशी मो सरफुद्दीन को भी मुस्लिम वोट नहीं मिले। भाजपा को तो रांची से मुस्लिम वोट काफी कम मिलते हैं। तो समझ में यही आता है कि आज भी रांची शहरी क्षेत्र के मुसलमानों का विश्वास सुबोधकांत में कायम है।

Sunday, April 12, 2009

इंतखाब के नवाब

देख लीजिये फिर ये जनाब आये हैं
स‌ाथ अपने पांच स‌ाला इंकलाब लाये हैं
रोटी की शिकायत क्या खाक करते हैं
ये तो फिरंगी जूस का स‌ैलाब लाये हैं
आपको फुर्सत नहीं ढाई आखर पढ़ने की
ये आलमी भाईचारे का किताब लाये हैं
जुल्म-सितम की अब कभी बात न होगी
ये अमन-ओ-चैन वाला जुर्राब लाये हैं
किस्मत आप फूटी है, इन्हें क्यों कोसना
ये बूढ़ों को जवान करने का खिजाब लाये हैं
अब कहने की ज़रूरत नहीं कि ग़रीब हैं हम
स‌ाथ अपने ये दौलत बेहिसाब लाये हैं
चंद दिनों की बात है, फिर आप ही कहेंगे
इंतखाब के जरिये नया नवाब लाये हैं

Friday, April 10, 2009

जूते के पीछे क्या है, जूते के पीछे?

क्षमा का प्रार्थी हूं कि इस लेख को रजत दा के भेजने के दो दिनों के बाद पोस्ट कर रहा हूं। असल में इसे कंपोज़ करने में देरी हुई और प्रकाशन स‌प्ताह होने के कारण मुझे स‌मय नहीं मिल पाया। क्षमा याचना पुनः।

रजत कुमार गुप्ता
जॉर्ज बुश पर जूता क्या चला, जूता चलाने का तो फैशन चल पड़ा। जिसे जब देखो जूता चलाकर दूसरों का भला कर जाता है। भारत के गृहमंत्री पी चिदांवरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह के साथ भी यही फॉर्मूला लागू होता है। करीब एक दशक से कांग्रेस बीट पर ही काम करने वाले इस पत्रकार को एक अदना सा जूता इतनी ख्याति दिला गया, जितना उनका काम नहीं दिला पाता। बावजूद इसके सवाल लाख टके का कि आखिर जूते के पीछे क्या है। जूता के आगे तो दिखता है कि नाराजगी है पर जूता के चलते ही जो कुछ हुआ, उससे यह सवाल उठाना प्रासंगिक हो गया है। अमरीका से चीन होते हुए अब यह मसला दिल्ली दरबार तक आ पहुंचा। आम तौर पर प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को चिरकूट समझने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी जरनैल के चारों तरफ घूमती नजर आयी। जिस खबरिया चैनल पर देखो, वही चलता हुआ जूता और बचते हुए केंद्रीय गृहमंत्री।
आमतौर पर आज के दौर के "सफल' पत्रकार राजनीति से खुद को दूर रखने की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं पर रात की दिल्ली कुछ और कहानी बयां करती है। लिहाजा क्या वाकई जरनैल ने उत्तेजनावश जूता फेंका, यह जानबूझकर जूते को लक्ष्यभ्रष्ट होने दिया या किसी और ने उसके जूते के बहाने अना निशाना साधा, यह लाख टके का नहीं स्विस बैंक में जमा भारत के कालेधन वाले करोड़ों-अरबों रुपये का सवाल है।
सवाल इसलिए अधिक कीमती हैक्योंकि दिल्ली के अनेक दिग्गज नेताओं के आंख की किरकिरी बने जगदीश टाईटलर को पार्टी ने टिकट दिया है। इससे पहले भी उन्हें इन्हीं आरोपों की वजह से मंत्री पद छोड़ने के साथ-साथ राजनीतिक वनवास पर जाना पड़ा था। टाईटलर के वनवास के दिनों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे दिल्ली के नेताओं को फिर से एक कद्दावर नेता के उभरने से परेशानी हो रही थी। जरनैल के जूते ने ऐसे लोगों को नये सिरे अपना टाईटलर विरोधी अभियान तेज करने का मसाला दे दिया है।
सभी जानते हैं कि यह चुनावी मौसम हैं। इस मौसम में बेवक्त बारिश, तूफान और कई-बार भूकंप तक आता रहता है। वरुण बाबा की जूबां क्या फिसली, तूफान खड़ा हो गया, जिसमें अंत-अंत में अपने रोड रोलर के साथ लालू प्रसाद भी फंसे नजर आ रहे हैं। ऐसे माहौल में जूता चलने से किसे क्या फायदा होने वाला है, इसे समझे बिना कहानी का क्लाईमैक्स समाप्त नहीं होता। आखिर यह भी तो एक पहेली है, अब बूझो तो जानें।

Friday, March 27, 2009

आखिर क्या चाहते हैं हम वरुण स‌े

इन दिनों मीडिया में कतूहल का विषय है वरुण गांधी का अतिवाद। टीवी खोलने पर लगभग स‌भी स‌माचार चैनलों में वरुण गांधी "जय श्रीराम" टाइप के नारे लगाते दिख जाते हैं। बहुत स‌ारी आलोचनाएं होती रहती हैं, उनकी। एंकर कहता है-ऎस‌े भड़काऊ बयान देने वाला कोई और नहीं बल्कि यह है वरुण दंगाई गांधी!! मुझे हंसी भी आती है इन खबरों और वरुण की भाषा पर और क्रोध भी आता है। क्रोध इसलिए नहीं आता क्योंकि मैं भी मुसलमान हूं और वरुण गांधी ने मुस्लिम विरोधी बातें कही हैं। मैं तो इस बात स‌े पूरी तरह मुअय्यन हूं कि अरे वरुण गांधी हिन्दुओं की स‌भाओं में भले ही मुस्लिम विरोधी बयान दे दें, लेकिन अगर उन्हें कहिए कि एक स‌भा है, उसमें 70 हिन्दू और 30 मुस्लिम या अन्य धर्म के लोग बैठे हैं, वहां चल के ज़रा अपना कथित हिन्दू प्रेम उजागर कीजिए, तो वे निश्चित तौर पर मुंह स‌े ए फॉर एप्पल भी नहीं बोल पायेंगे। वजह भी है ना- वरुण गांधी कोई पुराने खिलाड़ी नहीं हैं। डरपोक किस्म के नेता (उन्हें नेता न मानने वाले मुझे माफ करें) हैं। असल में स‌माजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ जो उम्मीदवार उतारा है (रियाज़ अहमद), वह मुसलमान है और उसका पीलीभीत में अच्छा-खासा प्रभाव है, ऎसा कुछ लोगों ने बताया है, मैं नहीं जानता कि वास्तविकता क्या है लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि वरुण उनसे डरे हुए हैं, तभी तो वो अपनी स‌भाओं में रियाज़ को कभी ओसामा बताते हैं, तो कभी दाउद का भाई-भतीजा। असल में उन्हें रियाज़ को हराने का एक उपाय स‌ूझा था कि उनके खिलाफ हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण किया जाये। उन्होंने अपनी चुनावी वैतरणी पार करने के लिए राम-नाम का स‌हारा ले लिया। वैसे भी भारत में हिन्दू भावनाओं के बल पर कोई भी व्यापार किया जा स‌कता है। कम स‌े इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि आज इंडिया में स‌बसे स‌ेलेबल आइटम भावना है और हिन्दुओं की भावना तो थोक में बिकती है। मिसाल के तौर पर - टीवी पर आपने स‌ाउना बेल्ट बिकते देखा होगा, जो होम शॉपी और क्या-क्या नाम स‌े कंपनियों के माध्यम स‌े टेलीब्रांडिंग होती है। अंग्रेजों की दस्त उस‌ स‌ाउना बेल्ट के स‌ाथ हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक रुद्राक्ष फ्री दिया जा रहा है। अब जिसे रुद्राक्ष चाहिए, वो न चाह कर भी स‌ाउना बेल्ट खरीद रहा है। जिसकी खा कर मोटाने की औकात नहीं, वह पतला होने का नाड़ा खरीद रहा है। क्यों, क्योंकि उसकी आस्था है रुद्राक्ष में। खैर, कहने का मतलब यह हुआ कि वरुण गांधी पहचान चुके हैं उस दुकान को, जहां कबाड़ की तरह भावनाओं का अंबार है और जो बहुत ही कम कीमत पर वोटों के बदले कैश करायी जा स‌कती हैं। और, वरुण गांधी के पास ऎसा कोई वीज़न भी नहीं है, जिसके माध्यम स‌े वह एक स‌ंघर्षशील नेता के रूप में उभरें। उनमें इतना माद्दा भी नहीं दिखता कि वह देश भर की खाक छानते हुए हर क्षेत्र की स‌मस्याओं को पार्टी में ज़ोरदार ढंग स‌े रखें और उनपर स‌र्वसम्मत राय कायम करायें। ये स‌ब उसके अंदर होता है, जिसके स‌ंस्कार मज़बूत होते हैं। अगर स‌ंजय-मेनका-वरुण परिवार स‌े ऎसे स‌ंस्कार की कोई उम्मीद रखता है, तो या तो वह आदमी मूर्खता की पराकाष्ठा को पार कर चुका है या फिर वह दुनिया के रस्मों-रिवाज स‌े अंजान है।
कहा जाता है कि बच्चों पर उसके माता-पिता की करनी का असर बहुत ही प्रभावी ढंग स‌े पड़ता है। आपको क्या लगता है कि वरुण गांधी इससे अछूते रह गये होंगे। थोड़ा ऎतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने स‌े पता चलता है कि स‌ंजय गांधी बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे। रंगीन मिजाज़ तो थे ही। मेनका गांधी में भी ये दोनों खासियत थी, है भी। शोहरत की चाहत में मेनका अपने पति के नक्श-ए-कदम पर चलने वाली महिला हैं। वह इसके लिए कुछ भी कर स‌कती हैं। स‌ंजय गांधी क्लब-बार में थिरकने के शौक को झटक कर कैश करते हुए मेनका गांधी को पूरे देश ने देखा था, वरना उनमें ऎसा कुछ नहीं था, जिसके चलते इंदिरा गांधी अपने बेटे की शादी ऎसी लड़की स‌े करती। एक तो मेनका अपनी जवानी में नशाखोरी को लेकर बदनाम थीं और दूसरी वह एक मॉडल थीं, जिन्हें पैसों के लिए अमीरों की पार्टियों में कैटवाक करने स‌े लेकर डांस करने तक स‌े कोई परहेज़ नहीं था। मेनका कभी स‌ुपर मॉडल नहीं रहीं। उन्हें पता भी था कि वह कभी शो-स्टॉपर नहीं बस स‌केंगी, इसलिए उन्होंने फटाफट ऊपर पहुंचने का ज़रिया तलाश किया। स‌ामने दिखे स‌ंजय गांधी। भारत के स‌बसे प्रभावशाली परिवार का हिस्सा बनने और भावी प्रधानमंत्री की हमराही बनने की चाहत लिये मेनका ने ऎसा कोई अवसर हाथ स‌े नहीं जाने दिया, जिससे स‌ंजय गांधी उनके करीब न आयें। स‌ंजय की मौत के बाद मेनका अलग-थलग नहीं हुई थीं। वह चाहतीं तो स‌ंयम के स‌ाथ इंदिरा गांधी के परिवार का हिस्सा बनी रह स‌कती थीं, लेकिन उनकी महत्वकांक्षा उन्हें ऎसा करने स‌े रोकती थी। उन्हें चाहिए था शोहरत, हर कीमत पर। और उन्हें मिली भी। वह अब तक चार बार केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं, जबकि इसी गांधी परिवार की एक और बहू स‌ोनिया ने प्रधानमंत्री के पद को भी ठुकरा दिया है।
राजनीतिक महत्वकांक्षा के अलावा उन्होंने और भी कई कारनामे किये हैं, जिस‌से यह पता चलता है कि नीम के पेड़ स‌े आम कभी नहीं आ स‌कता। और, जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। शायद आपको पता होगा कि जगजीवन राम मोरारजी देसाई स‌रकार में रक्षा मंत्री हुआ करते थे। उस स‌मय मेनका गांधी की शादी स‌ंजय स‌े हो चुकी थी। मेनका पत्रकारिता के माध्यम स‌े अपने आप को देश में एक तरह स‌े स्थापित करना चाहती थीं। उस स‌मय उन्होंने एक मैग्जीन लॉन्च की-सूर्या। उस मैग्जीन को अच्छा बनाने के लिए इंदिरा गांधी ने अपने पुराने मित्र खुशवंत स‌िंह स‌े कह दिया। खुशवंत मान गये और मैग्जीन में लेख लिखने के स‌ाथ-साथ कुछ स‌ंपादन का काम भी करने लगे। एक दिन जब खुशवंत स‌िंह स‌ूर्या के दफ्तर आये, तो उन्हें मेनका गांधी ने एक लिफाफ दिया, जिसमें नौ तस्वीरें थीं स‌ुरेश राम की। स‌ुरेश राम कोई और नहीं बल्कि बाबू जगजीवन राम के बेटे थे। स‌ुरेश उन नौ तस्वीरों में दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक 21 वर्षीय छात्रा स‌ुषमा चौधरी के स‌ाथ स‌ेक्स करते देखे जा स‌कते थे। तस्वीरें बिल्कुल स्पष्ट थीं और स‌भी तस्वीरें एक स्व चालित कैमरे स‌े खुद स‌ुरेश राम ने खींची थीं। जगजीवन राम कैबिनेट में दिनों-दिन काफी प्रभावशाली होते जा रहे थे और ऎसा लग रहा था कि मोरारजी देस‌ाई की जगह वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे। ऎसी स्थिति में उनके दोस्तों के स‌ाथ-साथ उनके दुश्मनों की स‌ंख्या भी बढ़ चुकी थी। स‌ुरेश राम खुद पॉलिटिक्स में नहीं थे, लेकिन उनके पिता के राजनीतिक जीवन पर उनकी अय्याशी की दास्तां छपने पर ज़रूर असर पड़ता। स‌ुषमा चौधरी मध्य वर्गीय परिवार की लड़की थी, जो स‌िर्फ स‌ुरेश राम स‌े प्यार करती थी और यह भी नहीं जानती थी कि स‌ुरेश शादी-शुदा है। स‌ुरेश औरतों का आदी था, जिसे अपने पार्टनर के स‌ाथ स‌ेक्स करते हुए अपनी ही तस्वीरें रखने का बहुत शौक था। उसने स‌ुषमा के स‌ाथ स‌ेक्स की तस्वीरें अपनी मर्सिडीज़ गाड़ी में रखी थीं, जिसे कह स‌कते हैं कि बाबू जगजीवन राम के विरोधियों ने चुराकर स‌ीधे इंदिरा गांधी के चरणों में डाल दिया। चूंकि, राजनीतिक के कारण इंदिरा गांधी उन तस्वीरों का स‌ीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं कर स‌कती थीं, इसलिए उन्होंने अपनी बहू मेनका के पास इन तस्वीरों को पहुंचवा दिया। खुशवंत स‌िंह ने जब तस्वीरें देखीं, तो उन्होंने मेनका को स‌मझाया कि इन्हें छापने की गलती न की जाये। इसकी वजह भी उन्होंने बतायी, तीन-चार थीं। पहली तो यह कि इन तस्वीरों स‌े नग्नता झलकती है, जिसका प्रकाशन पत्रकारिता के मानदंडों के प्रतिकूल होगा। दूसरा यह कि स‌ुरेश राम का राजनीति स‌े कुछ लेना-देना नहीं, उस‌की तसवीर छाप कर हम उसके पिता जगजीवन राम का ही राजनीतिक करियर चौपट करेंगे, अतः बेटे की करनी का फल बाप को क्यों जाये। तीसरा यह कि स‌ुषमा जो इस पचड़े में घिसट कर रह जायेगी, उसकी इज्जत का ख्याल रखना पत्रकारिता का एक आदर्श होगा। चूंकि, स‌ुषमा न तो राजनीति जानती है और न ही उसे यह पता है कि स‌ुरेश राम स‌े प्यार करने का खामियाजा क्या हो स‌कता है, इसलिए भी इन तस्वीरों को प्रकाशित नहीं करना चाहिए। मेनका की महत्वकांक्षाओं के आगे खुशवंत स‌िंह के स‌ारे तर्क कागजी शेर स‌ाबित हुए। स‌ूर्या में स‌ेंटर-स्प्रेड पेज पर स‌ुरेश राम और स‌ुषमा चौधरी की कामसूत्री मुद्रा वाली स‌ेक्स करते हुए तस्वीर छपी। स‌ूर्या ने धूम मचा दिया, लेकिन मेनका के इस एक कदम स‌े तीन जिंदगियां बरबाद हुईं-जगजीवन राम, स‌ुरेश राम और स‌ुषमा चौधरी। स‌मय का पहिया तीस स‌ाल के बाद आज फिर अपने इतिहास को दोहरा रहा है। किसी ने एक लिफाफे में वरुण गांधी की एक ऎसी स‌ीडी लाकर किसी दफ्तर में रख दी, जिससे मेनका के बेटे की राजनीति पर शुरू होने स‌े पहले ही खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है।

Saturday, October 18, 2008

ज़र्रे से आफताब तक

झारखंड के नेताओं पर लग रहे भ्रष्टाचार के ताबड़तोड़ आरोपों की हकीकत क्या अदालती हस्तक्षेप से सामने आ पायेगी?














नदीम
अख्तर

"लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो, जिसके मुंह में लगाम है।'
प्रख्यात कवि धूमिल की अंतिम कविता की ये अंतिम पंक्तियां हैं। जिस समय उन्होंने ये पंक्तियां लिखी होंगी, उस समय भले ही इनकी प्रासंगिकता कहीं और रही होगी लेकिन आज झारखंड में इसकी व्याख्या आम आदमी की सटीक तस्वीर सामने लाने वाली सिद्ध हो रही है। झारखंड के कुछ लोहारों (राजनेताओं) की वजह से घोड़ों (आम आदमी) के मुंह लहुलुहान हैं। पिछले महीने (सितंबर 2008) सत्ता और बिचौलियों की सांठगांठ के ऐसे-ऐसे उदाहरण सामने आये, जिनसे राज्य का एक बड़ा वर्ग स्तब्ध हुआ। मीडिया ने मसालेदार खबरें छापीं और राजनीतिक विरोधियों ने खूब छींटाकशी की। बात इतनी बढ़ी कि अदालत की दहलीज़ तक जा पहुंची। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल यह रह गया कि क्या भ्रष्टाचार के ये आरोप कभी सिद्ध भी हो पायेंगे।
अब इसे कालक्रम का खेल ही कहेंगे कि एक नवसृजित राज्य में लूट संस्कृति की शुरुआत के आठ साल के बाद कहानी का पटाक्षेप हुआ भी तो राज्य के बाहर। मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गत 17 सितंबर की सुबह दुबई जाते वक्त जमशेदपुर (झारखंड) निवासी संजय चौधरी नामक एक व्यक्ति को कस्टम विभाग के लोगों ने रोका। तलाशी के दौरान इस व्यक्ति के पास से भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिली। वह विदेशी मुद्रा दुबई ले जा रहा था, जिसे नेशनल बैंक ऑफ दुबई के खाते में जमा कराया जाता। स्थानीय मीडिया ने यह दावा किया कि जिस संजय चौधरी को मुंबई कस्टम ने पकड़ा, उसके संबंध पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से रहे हैं। यही वजह है कि कल तक एक मामूली सा व्यवसाय करनेवाला व्यक्ति आज एक अरबपति बन गया। इस दौरान कई दस्तावेज़ गुपचुप तरीके से मीडिया को उपलब्ध कराये गये, जिनमें झारखंड के खाली होते खज़ाने की असलियत छुपी है। हद तो तब हो गयी, जब पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने यह कह दिया कि वे किसी संजय चौधरी को नहीं जानते। दूसरी ओर दस्तावेज़ बताते हैं कि जिस संजय चौधरी को उन्होंने पहचानने से इंकार कर दिया, उसके पासपोर्ट की अनुशंसा खुद मधु कोड़ा ने की थी। बात यहीं खत्म नहीं हुई। किसी ज़माने में पार्टी लाइन के कारण मधु कोड़ा के शुभचिंतक रह चुके भाजपा विधायक सरयू राय ने यह खुलासा कर दिया कि संजय चौधरी और मधु कोड़ा एक साथ थाइलैंड गये थे। सरयू राय कहते हैं - "मधु कोड़ा को यह बताना चाहिए कि 2005 में विजयादशमी के दिन कोलकाता से थाई एयरवेज़ के जहाज़ से जब वे बैंकॉक गये थे, तो उनके साथ दो अन्य लोग कौन थे। क्या वे संजय चौधरी और बिनोद सिन्हा नहीं थे।' असल में आरोप यह है कि मधु कोड़ा ने अपने कार्यकाल के दौरान संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के माध्यम से अनैतिक तरीके से अकूत संपत्ति अर्जित की और सत्ता से नज़दीकी का इस्तेमाल करते हुए सारा धन विदेशों में निवेश किया। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि आखिर झारखंड के खज़ाने से कितने अरब रुपये बाहर जा चुके हैं।
वैसे इस मामले में जो दूसरा नाम सामने आया है वह है बिनोद सिन्हा का। उनके खाकपति से अरबपति बनने की अलग कहानी है। बेइंतहा ज़मीन-जायदाद, कई फ्लैट, महंगी गाड़ियों व फैक्ट्रियों के मालिक बिनोद सिन्हा झारखंड गठन से पहले एनएसयूआइ के चाईबासा नगर अध्यक्ष हुआ करते थे। उस समय लघु सिंचाई विभाग में ठेकेदारी करते थे, जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत 95,000 रुपये कर्ज लिये थे। इसके बाद चार वर्षों (2003-07) में बिनोद सिन्हा अकूत संपत्ति के मालिक हो गये। आखिर इतना सबकुछ कैसे हुआ? सीएम हाउस के कुछ नियमित आगंतुक कहते हैं - "मधु कोड़ा के कार्यकाल में कभी एक भी काम, चाहे वह निजी हो या सरकारी, बिना बिनोद सिन्हा या संजय चौधरी के नहीं हुआ। सीएम हाउस से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और अन्य सचिवालयों में मधु कोड़ा से ज़्यादा आदेश इन दोनों के द्वारा अफसरों को दिया जाता था, जिसका समय से पालन भी हो जाता था।'
झारखंड को कंगाल कर अपना घर भरने की प्रक्रिया के तहत कई नाम सामने आये हैं, जिन्हें लेकर अब मामला अदालत में पहुंचा है। रांची निवासी दुर्गा उरांव ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका (जनहित-4007/2008) दायर कर हरिनारायण राय, एनोस एक्का, कमलेश सिंह, चंद्रप्रकाश चौधरी, दुलाल भुइयां, भानु प्रताप शाही और बंधु तिर्की (सभी राज्य के कैबिनेट मंत्री) की संपत्ति की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। इसी मामले में एक हस्तक्षेप याचिका रांची निवासी अरुण कुमार ने दायर की है, जिसमें उक्त लोगों के साथ-साथ मधु कोड़ा, बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी को भी पार्टी बनाते हुए इन तीनों की संपत्तियों की भी जांच सीबीआइ से कराने की मांग की गयी है। हालांकि अदालत ने इस मामले में अभी कोई फैसला नहीं सुनाया है लेकिन अगर अदालत ने दुर्गा उरांव और अरुण कुमार की याचिकाओं के आधार पर जांच के आदेश दिये, तो परत-दर-परत कई राज़ और खुलते चले जायेंगे।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे मामलों की वैधानिक ज़मीन कितनी मज़बूत होती है। झारखंड हाइकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता और याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं ऋतु कुमार कहती हैं - "लगभग इसी प्रकार का एक मामला पिछले साल (2007 में, वोल 4, एसएससी 380) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था(विश्र्वनाथ चौधरी बनाम केंद्र सरकार एवं अन्य)। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में सीबीआइ को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जांच का आदेश दिया था। अब हमें इंतज़ार है 21 तारीख का, जब उच्च न्यायालय का फैसला आता है।'
वैसे इस मामले में मधु कोड़ा और उनके सहयोगियों को भले ही प्रतिवादी बनाकर न्याय के कटघरे में खड़ा करने की गुहार लग रही हो लेकिन एक हकीकत यह भी है कि झारखंड गठन के बाद से लगभग सभी सरकारों में ऐसे लोग पर्दे के पीछे से खेलते रहे हैं जिनकी गिनती आज के संजय चौधरियों और बिनोद सिन्हाओं में हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। राज्य में जब पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे, तो भाजपा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभानेवाले एनोस एक्का (झारखंड पार्टी के इकलौते विधायक) के सहयोगी/मित्र तिलेश्र्वर साहू को एक बोर्ड में राज्य मंत्री का दर्जा बतौर ईनाम मिला था। उसके बाद उनके एक से एक कारनामों ने उन्हें इतनी ख्याति दिलायी कि अंततः मंत्री एनोस एक्का को ही उनसे किनारा कसना पड़ा। विभिन्न सरकारों को जोबा माझी (यूजीडीपी विधायक) के समर्थन की सौदेबाजी करनेवाले नजम अंसारी को सात साल से आवास बोर्ड की कुर्सी मिली हुई है। उन्होंने शहर के बीचों-बीच बेशकीमती ज़मीन बिल्डरों से बेच दी, तो विधानसभा से लेकर हाइकोर्ट तक के हस्तक्षेप ने पूरी पोल-पट्टी खोल कर रख दी। अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में अमरजीत सिंह उर्फ काले सरदार का बोलबाला था। इसके अलावा मुंडा को कंप्यूटर की शिक्षा देनेवाले तापस मल्लिक ने तो बाकायदा सीएम हाउस से उद्योग स्थापना के लिए सिंगल विंडो सिस्टम खोल रखा था। उस समय यह कहा जाता था कि अगर झारखंड में कुछ करना है, तो पहले तापस जी से हामी भरवा लें। यही हाल बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में भी था। उनकी करीबी महिला मित्र मंजू राय की सरकार में इस कदर पकड़ थी कि सुबह-सुबह कई लाल-पीली बत्तियों वाली गाड़ियों के मालिक मनचाही पोस्टिंग के लिए उनके यहां भीड़ लगाये रहते थे। मरांडी के ही एक और करीबी हुआ करते थे अशोक अग्रवाल जो दिल्ली से झारखंड की नीतियों को तय करने के माहिर माने जाते थे। मधु कोड़ा के कार्यकाल के ही एक और बैक-स्टेज परफॉर्मर थे अरुण श्रीवास्तव। वे थे तो कोड़ा के आप्त सचिव लेकिन उन्होंने क्रशर व्यवसाय में इस कदर पैठ बनायी कि आज झारखंड में इनका नाम गिने-चुने उद्यमियों में लिया जाता है।
इन नामों और कारनामों के बीच बड़ा सवाल यह रह जाता है कि क्या अगर किसी पर अपराध सिद्ध भी हो जाये और उन्हें सजा भी मिल जाये, तो झारखंड और यहां के आम नागरिकों को जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई कैसे होगी। इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन उससे पहले लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी हाइकोर्ट की ओर, जहां कम से कम यह तय हो जाना है कि आखिर ज़र्रे से आफताब तक के सफर में मुसाफिरों की कमीज़ गंदी हुई है या नहीं।
(द पब्लिक एजेंडा से साभार)