Sunday, November 30, 2008

जीवन तो है इक आग......!!





कतरा-कतरा क्या मिला....कतरा-कतरा आग
कतरा-कतरा सूर है... और कतरा-कतरा राग !!
जीवन का तो मर्म क्या समझ पाये....आदम
थोड़ा-सा तो कर्म है और थोड़ा अपना "भाग" !!
इतना सपना मत देख..सपना इतना सच नहीं
सच तो सामने है देख..आँखे खोल और जाग !!
हाँ भइया मुश्किल तो बहुत है जीना मेरे प्यारे
लेकिन मुश्किल में जीना ही तो जीवन का राग !!
अजीब है ये जीवन कि कुछ लोग तो हैं खुशहाल
कुछ लोगों का बेहाल, और दामन भी है चाक !!
राख हो रहे हैं हर पल ख़ाक हो जाने को हैं अब
साँस-साँस हम जलें और हर धड़कन है इक आग
सुबह से शाम तक हर वक्त की यूँ ही है भाग-दौड़
ये भी कोई जीवन है"गाफिल",ये तो है खटराग !!

प्यारे पी.एम् साहेब....!!


प्यारे प्रधानमंत्री जी,
आपको इस देश के तमाम लोगों का राम-राम ,
आशा है सकुशल और सानंदित होंगे.....वैसे तो हम सब आम लोग आप लोगों की खुशियों के लिए भगवन से प्रार्थना करते हैं...मगर ना भी करें तो आप लोगों को क्या फर्क पड़ता है... (गलती से भगवान् लिख दिया है..आप अपनी सुविधानुसार खुदा..गाड...वाहे गुरु,जो भी चाहे कर लें...क्या करें हम हिंदू तो सम्प्रायवादी हैं...साले हम आज तलक भी आते-जाते लोगों को राम-राम ही करते चल रहे हैं...और दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच चुकी.....!!).....
खैर पी.एम. साहेब जी...६०-६५ घंटे पूर्व जो कुछ हमारी आंखों के सामने घटा...वो तो हम सब समेत आपने और भारत के तमाम राजाओं ने भी देखा...जी हाँ...राजाओं...!!वे राजा जो हम सबके द्वारा चुनकर संसद और देश की तमाम विधानसभाओं में भेजे जाते हैं...हमारी तकदीर तय करने...यानी हमारी जिन्दगी और मौत तय करने के लिए... और जिनकी जिन्दगी को सुचारू रूप से चलाने हेतु आप सब....और आप सब की जिन्दगी की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए आप सब ही जो हजारों-हज़ार नौकर-चाकर-पुलिस-संतरी,एस.पी.जी.,बॉडी-गार्ड,हज़ार तरह की सुरक्षा-व्यवस्था,जवान-कमांडो...आदि-आदि....आप सब ख़ुद ही तय करते हो...आप ही तय करते हो किसानों को दी जाने वाली उनकी फसल का समर्थन-मूल्य.....भले ही सेठ-साहूकारों की प्रोफिट-पिपासा शांत ना कर सको....भले ही बड़े-बड़े घरानों की चीजों पे चस्पां होने वाले ऍम.आर.पी को कंट्रोल ना कर सको....आप ही तय करते हो देश के विकास में मंत्रियो और उनके गुर्गों और तमाम अफसरों और अन्य लोगों का योगदान क्या हो...भले ही अपना यह योगदान देने बहाने ये सारे लोग विकास की समूची राशि का गबन कर लें...और देश के बाहर मौजूद बैंकों में क़यामत तक के लिए जमा कर दें....आप काबू ना पा सको.....आप ही तय करते हो देश को चलाने का सिस्टम क्या हो....भले ही मंत्रियो और उनके गुर्गों और तमाम अफसरों और अन्य लोगों द्वारा ये सिस्टम हाईजैक कर लिया जाए....आप टुकुर-टुकुर ताकने के सिवा कुछ ना कर सको.....आप ही तय करते हो कि देश के विकास के लिए किसको क्या देना है...और किससे क्या लेना है....भले ही ये देने और लेने वाले ही इस देन-लेन में घपला कर इसमें भी बंदरबांट कर लें....और आप मुंह बांये खड़े रह जाएँ....आप ही तय करते हो देश को चलाने के लिए टैक्स का निर्धारण क्या हो...और उस टैक्स के आए हुए पैसे का समुचित वितरण कैसे हो....भले ही उस टैक्स निर्धारण में सैकडों भयानक विसंगतियां हों....और टैक्स लेने वाले आपके तमाम कलेक्टर टैक्स नहीं देना सिखाकर उसके एवज में अपना ही घर-बैंक-तिजोरी-पेट आदि-आदि सब ओवर-फ्लो की हद तक भरे जा रहे हों....यहाँ तक की रुपयों की गड्डी के बिस्तर पर सोते हैं और अय्याशी करते हैं....और यह पाक कार्य मंत्री-अफसर-नौकरशाह ही करते हैं.....आप की नाक के ठीक नीचे.....आपकी जानकारी में...गोया की आप ही की रहनुमाई में....६० सालों में आप लोगों की सुरक्षा-व्यवस्था में जितना खर्च हुआ है...उतने में तो देश के तमाम गरीब लोगों का राशन-पानी आ जाता....और जितना धन आपके मंत्री-अफसर-नौकरशाह-विधायक-सांसद और इन सबकी मिली-भगत से उद्योग-पतियों ने बैंकों का धन हड़प-गड़प-हज़म किया है...उतने से एक क्या कई भारतों का अकल्पनीय विकास हो सकता था...है...!!
.........मैं बताऊँ सर....,देश में होने वाले इन और उन तमाम प्रकार के हादसों के लिए अन्य और कोई नहीं,बल्कि आप सब ही और सीधे-सीधे तौर पर जिम्मेवार हो....और इसके लिए आप-सबको अभी-की-अभी फांसी लगा लेनी चाहिए....आप सब तो ख़ुद ही ऐसे जल्लाद हो कि...अपने सामने सब कुछ होते देखते हो...कसूरवारों को कभी दंड नहीं देते....सरकार चलाने के लिए तमाम समझौते करते हो...हर किसी को उसकी मनमानी करने देते हो...अपनी भी मनमानी करते हो...जो चाहे...जब चाहे...जैसे चाहे करते हो...चाहे वो देश-राज्य-शहर-गांव या किसी के भी हित में हो या ना हो....सिर्फ़ अपना हित और अपनी अय्याशी हो...सिर्फ़ अपने स्वार्थ-अपने अंहकार का पोषण हो....देश के इन-आप जैसे लोगों को फांसी भी हो तो कैसी हो....हम तो यह तय करने में भी अक्षम हैं....६० सालों में आप सबों ने अपने-अपने समय के शासनकाल में देश की जो दुर्गति की है...वो अकल्पनीय है....और शैतानों के लिए भी एक उदाहरण है.... प्रशासन-हीनता का ऐसा घटिया उदाहरण शायद नरक या जहन्नुम में भी ना मिले....!!!!देश की हर प्रकार की मशीनरी का इस तरह पंगु बना दिया जाना.....शैतानी परिकल्पना की सफलता का एक अद्भुत उदाहरण है....और इस बात का परिचायक भी कि जब नाकाबिल लोग कहीं पर शासन करते हैं तो कैसे सब कुछ ध्वस्त हो जाता है...!!
अब आप ये जरूर कहेंगे कि ये जो इतना विकास देश का हुआ है...क्या वो तुम्हारे(मेरे) बाप ने किया है.....नहीं माई-बाप नहीं....बल्कि मैं आपसे उलट कर ये पूछना चाहूँगा कि इस विकास में क्या वाकई देश के इस प्रभुसत्ता-संपन्न राजनीतिक वर्ग का कोई रत्ती-भर भी योगदान है.....??!!बल्कि देश के विवेकशील लोगों के अनुसार तो ये वर्ग उलटा विकास में रोड़ा ही है.....!!!!हे वर्तमान और तमाम निवर्तमान पी.एम्. साहेबों मैंने तो सूना है कि शैतान भी हैरान होता है और सबसे ये पूछता चल रहा है कि धरती पर भारत नाम के इस देश में राजनीतिक प्रभुसत्ता-संपन्न यह वर्ग शैतानियत में उनसे भी मीलों आगे कैसे निकल गया है कि किसी भी वाहन से पकड़ ही नहीं आता....और ये भी कि अब वो (शैतान)क्या करे...पहले शैतान थोड़े से थे....अब तो इस वर्ग के उदय होने और शक्ति-संपन्न होने से वो बेरोजगार हो गए हैं....सब निठल्ले बैठे आगे की योजना बना रहे हैं....उनके (शैतानों के )लास्ट सम्मेलन में ये प्रस्ताव पारित हुआ है कि अब शैतान परोपकार और पुण्य का कार्य करेंगे...अब उन कार्यों की रूप-रेखा बनाई जा रही है...जल्द ही इसे कार्यान्वित किया जायेगा...!!
..............हे वर्तमान और तमाम निवर्तमान पी.एम्. साहेबों....मंत्रियों...छोटे-बड़े-छुटभैय्ये नेताओं...तमाम सरकारी कारिंदों तमाम शक्तिशाली लोगों....... ऐसा लगता है कि अगरचे तुन्हें देश की जरुरत सिर्फ़-व्-सिर्फ़ अपने और अपने कुटुंब का स्वार्थ और हित साधने के लिए है...अपनी गंदी वासनाओं की पूर्ति के लिए देश की अस्मिता को बेच देने के लिए है....तो तुम्हे एक बार फ़िर राम-राम....मगर इसके लिए तुम सब अपने लिए एक नया देश (क्यूंकि गद्दारों को कौन अपने पास पनाह देगा...!!??)बना लो....हम देश के आम नागरिक तुम सबों को आश्वस्त करते हैं कि हम कई देशों की सरकारों को इस बात के लिए मना लेंगे कि अपने यहाँ से थोडी-थोडी जगह देकर इनके लिए एक नए देश के निर्माण में सहयोग करें....हमें आशा है कि हम ऐसा कर पायेंगे....क्यूंकि हम जानते हैं कि धरती का दिल बहुत बड़ा है.....!!!!

Saturday, November 29, 2008

हम क्या करें गाफिल....??!!


वहाँ कौन है तेरा...मुसाफिर....
जायेगा कहाँ.....
दम ले ले.....
दम ले...दम ले ले...
दम ले ले घडी भर...
ये समा पायेगा कहाँ...
पिघलता सा जा रहा है हर ओर
किसी बदलती हुई-सी शै की तरह.....
किसका कौन-सा मुकाम है...
किसी को कुछ
पता भी तो नहीं....
कभी रास्ते खो जाते हैं...
और कभी तो...
मुकाम ही बदल जाते हैं....
बदलता ही जा रहा है सब कुछ....
वजह या बेवजह...
किसी को कुछ भी नहीं पता
और जो कुछ पता है हमें...
वो कितना सोद्देश्य है...
या कितना निरक्षेप....
और कितना निस्वार्थ...
ये भी भला कौन जानता है.....
मगर जो कुछ भी
घट रहा है हमारे आसपास
वो इतना कमज़र्फ़ है....
और इतना तंगदिल...
इतना तंग नज़र है....
और इतना आत्ममुग्ध...
किसी को वह...
जीने ही नहीं देना चाहता...
सिवाय अपने ...
या अपने कुछ लोगों के....!!
तो क्या एक झंडे....
एक धरम....
एक बोली में...
सिमट जाना चाहिए
हम सबको
हम सातों अरब को....??
यही आज मै सोच रहा हूँ......!!

Friday, November 28, 2008





(रचना जी की कविता पर...)
ब्लोगिंग इन्टरनेट की देन है......,
....और रिश्ते आदमी का इजाद...!!
...........ब्लोगिंग एक शौक है....,
.........और रिश्ते एक जरूरत....!!
ब्लोगिंग हमारी सोच है.......,
और रिश्ते सोच का सार्थक अंत....!!
रिश्ते अगर किसी भी चीज़ से बनते हैं....,
तो उन्हें बेशक बन ही जाने दें....!!
रिश्ते बाकी ही कहाँ रहे...
अब भला आदमियत में....!!
अब तो सिर्फ़ आदमी है....,
और ढेर सारे उसके शौक...!!
इनके बीच अगर थोड़े-से रिश्ते..
पैदा भी हो जाएँ...तो हर्ज़ क्या है....??
रिश्ते तो प्रश्न हैं...हमारे...बीच के संबधों का...,
और हम उनके उत्तर...अपने संबधों द्वारा...!!
जिनका कोई भी नही...
उनसे पूछिए रिश्तों का अर्थ....!!
जिन्होंने खोये हैं रिश्ते...
वे ही जानते हैं...रिश्तों के मानी...!!
रिश्ते तो प्यार हैं...बेशक तकरार भी...,
उसकी बाद उनका अहसास भी...
थोड़ा रूमानी भी...थोड़ा नफरत भी...
नफरत से सीख लेकर....
पुनः प्यार भी ला सकते हम....
और प्यार ही प्यार हो..........
तो फिर बात ही क्या....
मगर ब्लोगिंग जरूरी हो या ना हो...
प्यार तो जरूरी है.....!!
और उसके लिए रिश्ते तो...
उससे भी ज्यादा जरूरी....!!
ब्लोगिंग रहे ना रहे....
रिश्ते हमेशा बच रहेंगे....
रिश्ते अगर बच गए....
तो बच रहेंगे हम भी....
बेशक ब्लोगिंग ही करने के लिए....!! कविता पर...)

Thursday, November 27, 2008

अरे भाई राज....कहाँ हो...!!??


baat puraani hai
हम सब एक साथ ही पुराने भी हैं,और नए भी....शरीर से नए...मगर मान्यताओं से पुराने...समय के साथ थोडा नए होते जाते... शरीर से थोड़ा पुराने होता जाते...बाबा आदम जमाने की रुदिवादिताएं भी हममे हैं..और सभ्य भी हम...हम क्या हैं..हम क्यूँ हैं...हम कौन हैं...हमारे वुजूद का मतलब क्या है...??हम कभी भी विचार नहीं करते...नहीं करते ना....!!

Thursday, November 27, 2008
अरे भाई राज....कहाँ हो....!!??


अरे भाई राज कहाँ हो...........??
...........अरे भई राज कहाँ हो आज तुम...?देखो ना अक्खी मुंबई अवाक रह गई है कल के लोमहर्षक हादसों से.....चारों और खून-ही-खून बिखरा पड़ा है..और धमाकों की गूँज मुंबई-वासियों को जाने कब तक सोने नहीं देगी....और जा हजारों लोग आज मार दिए गए है...उनकी चीख की अनुगूंज एक पिशाच की भांति उनके परिवार-वालों के सम्मुख अट्टहास-सी करती रहेगी...हजारों बच्चे...माएं...औरते...बूढे...और अन्य लोग.....यकायक हुए इस हादसे को याद करके जाने कब तक सहमते रहेंगे....!! असहाय-बेबस-नवजात शिशुओं का करून क्रंदन भला किससे देखा जायेगा...!!शायद तुम तो देख पाओगे ओ राज....!!तुम तो पिछले दिनों ही इन सब चीजों के अभ्यस्त हुए हो ना !!....तुमने तो अभी-अभी ही परीक्षा देने जाते हुए छात्रों को दौडा-दौडा कर मारा है....!!किसी और के प्रांत के लोगों से नफरत के नाम पर कई लोगों की जाने तुमने पिछले ही दिनों ली है...और मरने-वालों के परिवारजनों के करून विलाप पर ऐसा ही कुछ अट्टहास तुमने भी किया होगा...जैसा कि अभी-अभी हुए इस मर्मान्तक बम-काण्ड के रचयिता इस वक्त कर रहे होंगे.....!!
...................मुझे नहीं पता ओ राज...कि उस वक्त तुम्हें और इस वक्त इन्हे किसी भी भाषा-प्रांत-मजहब.....या किसी भी और कारण से किन्हीं भी निर्दोष प्राणियों की जान लेकर क्या मिला....और मैं मुरख तो ये भी नहीं जानता कि बन्दूक कैसे चलाई जाती है....बस इतना ही जानता हूँ....कि बन्दूक किसी भी हालत में नहीं चलाई जानी चाहिए क्योंकि इससे किसी की जान जाती है....और जान लेना अब तक के किसी भी मजहब की रीति के अनुसार पाक या पवित्र नहीं माना गया है....बेशक कुछ तंग-दिल लोगों ने बीते समय में हजारों लोगों की जान धर्म का नाम लेकर ही की हैं....लेकिन मैं ये अच्छी तरह जानता हूँ कि यह धर्म के नाम पर पाखण्ड ही ज्यादा रहा है...दुनिया में पैदा हुए किसी भी विवेक-शील इंसान ने कभी भी इस बात का समर्थन नहीं किया है...बल्कि इन चीजों की चहुँ-ओर भर्त्सना ही हुई है....बेशक ऐसा करने वाले लोग अपने समय में बेहद ताकतवर रहे हैं...जैसे कि आज तुम हो...मगर ये भी तो सच है...कि इन तमाम ताकतवर लोगों को समय ने ही बुरी तरह धूल भी चटाई है...वो भी ऐसी कि इनका नामलेवा इनके वंशजों में भी कोई नहीं रहा.....!!
.................तो राज यह समय है...जो किसी की परवाह नहीं करता...और जो इसकी परवाह नहीं करते....उनके साथ ऐसा बर्ताव करता है...कि समय का उपहास करने वालों को अपनी ही पिछली जिंदगी पर बेतरह शर्म आने लगती है....मगर...तब तक तो......हा..हा..हा..हा..हा..(ये समय का ठहाका है!!) समय ही बीत चुका होता है....!!....तो राज समय बड़ा ही बेदर्द है....!!
................मगर ओ राज तुम यह सोच रहे होगे कि वर्तमान घटना तो किसी और का किया करम है....इसमें मैं तुम्हे भला क्यों घसीट रहा हूँ....ठहरो...तुम्हे ये भी बताता हूँ...बरसों से देखता आया हूँ कि कभी तुम्हारे चाचा....तुम्हारे भाई....और आज पिछले कुछ समय से तुम......आपची मुंबई......और आपना महाराष्ट्र के नाम पर लोगों को भड़काते-बरगलाते रहे हो.....और लोगों की कोमल भावनाओं का शोषण करते हुए तुमलोगों ने सत्ता की तमाम सीढिया नापी हैं....हालांकि इस देश में तमाम नेताओं ने पिछले साठ वर्षों में यही किया है....और हर जगह नफरत का बीज ही रोपा है...और इसी का परिणाम है....अपनी आंखों के सामने यह सब जो हम घटता हुआ देख रहे हैं.....!!और तुमसे ये कहने का तात्पर्य सिर्फ़ इतना ही है....इस देश में सिर्फ़ तुम्हारा ही परिवार वह परिवार है...जो हर वक्त शेर की भांति दहाड़ता रहता है...बेशक सिर्फ़ अपनी ही "मांद" में...!!मगर इससे क्या हुआ शेर बेशक अपनी ही मांद में दहाड़े.....!!....है तो शेर ही ना...बिल्ली थोड़ा ही ना बन जायेगा.....??
...................तो तुम सबको हमेशा शेर की दहाड़ते हुए और अपने तमाम वाहियात कारनामों से देश की पत्र-पत्रिकाओं में छाते देखा है... !!....ऐसे वक्त में कहाँ गायब हो जाते हो...क्या किसी पिकनिक स्पॉट में...??मुंबई आज कोई पहली बार नहीं दहली....और ना देश का कोई भी इलाका अब इस दहशतगर्दी से बाकी ही रहा...आतंकियों ने इस सहनशील...सार्वभौम...धर्मनिरक्षेप देश में जब जो चाहे किया है...और कर के चले गए हैं...वरना किसी और देश में तो "नौ-ग्यारह" के बाद वाकई एक चिडिया भी पर नहीं मार सकी है...और एक अन्य देश में एक कार-बम-विस्फोट के बाद एक परिंदा भी दुबारा नहीं फटक पाया.....लेकिन ये भारत देश...जम्बू-द्वीप....जो तमाम राजनीतिक-शेरों.....सामाजिक बाहुबलियों का विशाल देश...जो अभी-अभी ही दुबारा विश्व का सिरमौर बनने जा रहा है....इसके आसमान में ऐसे-वैसे परिंदे तो क्या...इसके घर-घर के आँगन में जंगली कुत्ते-बिल्ली-सियार-लौम्री आदि धावा बोलकर...हग-मूत कर चले जाते हैं....और यहाँ के तमाम बड़े-बड़े सूरमाओं को...और बेशक तुम जैसे शेर का कोई अता-पता नहीं चलता.....!!यहाँ के जिम्मेवार मंत्री तो इस वक्त बेशक कई दर्जन ड्रेसें बदलते हुए पाये जा सकते हैं....!!
...............तो हे महाराष्ट्र के महाबलियों....हे आपची मुंबई के जिंदादिल शेरों.....तुम अभी तक कहाँ छिपे बैठे हो...अरे भई इस वक्त तो तुम्हारी मुंबई...तुम्हारे महाराष्ट्र को वाकई तुम्हारी....और सिर्फ़ तुम्हारी ही जरूरत है....ज़रा अपनी खोल से बाहर तो निकल कर तो आओ....अपनी मर्दानगी इन आतंकियों को तो दिखलाओ...!! क्यूँ इन बिचारे मिलेट्री के निर्दोष जवानों की जान जोखिम में डालते हो !!.....भाई कभी तो देश के असली "काम" आओ...!!तुम्हारे इस पाक-पवित्र कृत्य पर वाकई ये देश बड़ा कृतज्ञ रहेगा....तुम्हारे नाम का पाठ बांचा जायेगा....तुम्हारे बच्चे तुम पर वाकई फक्र करेंगे....तुम्हारी जान खाली नहीं जायेगी....देखते-न-देखते तुम्हारी प्रेरणा से देश के अनेकों रखवाले पैदा हो जायेंगे....और ये देश अपनी संतानों पर फिर से फक्र करना सीख जायेगा....इस देश के लोग महाराष्ट्र वालों की शान में कसीदे गदेंगे...!!.....ओ राज....ओ राज के भाई....ओ राज के चाचा....ओ और कोई भी जो राज का पिछलग्गू या उनका जो कोई भी है....आओ महाराष्ट्र और मुंबई की खातिर आज मर मिटो....आज सबको दिखला ही दो कि तुम सब वाकई शेर ही हो....कोई ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे नहीं....आज सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं....कहाँ हो ओ शेरों...ज़रा अपनी मांद से बाहर तो निकलो......!!??

Wednesday, November 26, 2008

हकीकत से सामना

अक्सर बस में सफर करते कुछ एेसी चीजें देखने सुनने को िमल जाती हैं िजससे समाज का चिरतऱ अाईने की नजर अाने लगता है। िदल्ली से नोएडा ३२३ नंबर की बस में जब िकसी तरह घुस कर लोहे की पाइप से लटक गया और सांस लेने की कोिशश करने लगा तो देखा िक सामने सीट पर एक काफी बुजुगॆ व्यिक्त उंघ रहे हैं। िसर में कई जगह से िसली हुई टोपी, काफी पुराना स्वेटर और अपनी उमऱ जी चुका चूजा पहने हुए थे। हाथ में सांईं बाबा की अंगूठी पहन रखी थी। पास में एक छोटा सा झोला था। मैं उन्हें देख रहा था। उस वक्त मेरी दादी मुझे याद अाईं, जो अब नहीं हैं। उनकी ही तरह झुिरॆयां थीं। उमऱ के साथ त्वचा का िसकुड़ जाना मैंने उनमें देखा था। वैसा ही इन बाबा के हाथों में देखा। मन में ख्याल अाया िक इस उमऱ तक िजंदा रहा तो मेरी भी यही दशा होगी। बस में गाना बज रहा था न कजरे की धार न मोितयों का हार न कोई िकया श्रंगार िफर भी िकतनी सुंदर हो.... बस टोल िबऱज होते हुए नोएडा अाई तो कुछ सवार उतरे। अब सही से सांस ले पा रहा था। इतने में ही उस बुजुगॆ की नींद खुली और उन्होंने बड़ी धीमी अावाज में कुछ कहा। मैंने ध्यान िदया, तो उन्होंने िफर कहा, १२-२२ कहां है। मैंने कहा अभी दूर है। बस में लोगों का चढ़ना-उतरना जारी था। थोड़ी ही देर में उन्होंने मुझसे कहा वृद्ध लोगों का अाश्रम कहां है। यह बात कहते-कहते उनका गला रुंध गया। मुझे मालूम नहीं था िक वह कहां है। मैंने अन्य याितऱयों और बस के कंडक्टर से जानना चाहा, पर िकसी को कुछ नहीं मालूम था। उन्होंने िफर कहा सरकारी स्कूल के पास है सेक्टर २२ में। मैंने उनसे कहा िक अाप सेक्टर २२ में उतर जाइये िफर िकसी से पूछ लीिजएगा। एक बार को मेरा मन िकया िक मैं भी उतर लूं और िजतनी मदद हो सके कर दूं। पर कर न पाया। मेरे साथ कुछ सामान था और अॉिफस समय पर पहुंचने का दबाव। इन िदनों मंदी ने इस कदर डरा रखा है िक लगता है िक हो सकता है समय पर न पहुंचा तो क्या होगा? खैर वह तो उतर गए सेक्टर २२ में, पर मैं सोचता रहा, अात्म मंथन करता रहा। पहले िसफॆ समाचार सुनता था िक अाज कल के बच्चे अपने माता-िपता को वृद्धा अाश्रम में रहने भेज देते हैं। पतऱकािरता के अाठ वषॆ के अनुभव में बड़े शहर की इस हकीकत से पहली बार सामना हुअा था।

Tuesday, November 25, 2008

साम्राज्यवाद के खिलाफ, लोकतंत्र के लिए

यह लेख स‌ह भाषण कल शाम को ही भाई स‌चिन (नई इबारतें) ने मुझे भेजा। लेख बड़ा था इसलिए इसे पढ़ने में देर हो गयी। प्रणय कृष्ण जी ने अपनी बातों में जो यथार्थ के पुट डाले हैं, वह लाजवाब हैं। उम्मीद है आप भी इनसे स‌हमत होंगे.
आज पूंजी के गढ़ में अभूतपूर्व संकट उभर आया है। नया साम्राज्यवाद जिसने भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नयी विश्व व्यवस्था, पूंजी के संकट को हल करने के लिए कायम की थी, उसे यह एहसास को चला है कि इस तरकीब ने भी पूंजी के जन्मजात संकट यानी मंदी को हल करने की क्षमता खोनी शुरू कर दी है। बराक ओबामा का अमरीका के राष्ट्रपति पद पर सत्तारूढ़ होना इसी परिघटना को सूचित करता है। आज अर्थशास्त्रियों के बीच भीषण बहस चल रही है कि अमरीका में बैंकों की आत्महत्या पूंजी के लंबे चलने वाले आधरभूत संकट का आगाज़ है या फिर थोड़े समय में समाप्त हो जाने वाली तात्कालिक समस्या। बहरहाल इस संकट से उबरने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं वे साम्राज्य के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं। अमरीका की सरकार दिवालिया हो रहे कारपोरेट बैंकों को संकट से उबारने के लिए सामान्य नागरिकों की कमायी से पाए टैक्सों को झोंक रही है। यानी मुनाफे तो पूंजीपति घरानों की निजी संपत्ति है जबकि नुकसान का सामाजीकरण किया जा रहा है। उपभोग आधरित आर्थिक विकास के चलते बैंकों ने अपनी पूंजी से कई गुना ज्यादा कर्ज बांटा ताकि लोग खूब खर्च कर सकें। जाहिर है कि ये कर्ज किसी वास्तविक पूंजी के बदले नहीं दिए गए थे, लिहाजा इनके न लौटने पर ये बैंक दिवालिया हो गए। पिछले 30 सालों से विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में एक ऐसी बैंकिंग प्रणाली का विकास हुआ जिसने उत्पादक-पूंजी की जगह सट्टा-पूंजी के माध्यम से पूंजी पर मुनाफे को जबर्दस्त ढंग से बढ़ाया। खेती, उद्योग और व्यवसाय में निवेश के जरिए लोगों को रोजगार देते हुए यह मुनाफा नहीं आया। यह मुनाफा पैसे से पैसा बनाने की तरकीब से आया। दूसरे विश्वयुद्ध( के बाद लगभग 40 वर्ष तक अति-उत्पादन और मंदी से निपटने में कीन्सवादी कल्याणकारी राज्य पर आधरित आर्थिक विकास का ढांचा कारगर रहा। लेकिन उसके कारगर रहने में अमरीका द्वारा दुनिया भर में थोपे गए युद्धोंके जरिए सैन्य-औद्योगिक मुनाफे की भी बड़ी भूमिका रही। 70 के दशक के आखीर और 80 के प्रारंभ में इस ढांचे ने काम करना बंद कर दिया और तभी से रीगन और थैचर के नेतृत्व में पूंजी के उस युग की शुरुआत हुई जिसे भूमंडलीकरण या नई विश्व व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। इस व्यवस्था को सिर्फ रीगन या थैचर ने कायम नहीं किया बल्कि तमाम तीसरी दुनिया के देशों के सामंती-पूंजीपति तबकों ने अपने ही देशों की लूट में फायदे का हिस्सेदार बनने के लिए खुशी-खुशी इस व्यवस्था को अंगीकार किया। हमारे देश के हुक्मरानों ने भी ऐसा ही किया। इस व्यवस्था के तहत पूंजी और संपत्ति के विकास और प्रवाह के नियमन पर अलग-अलग देशों ने अपनी राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से जो भी उपाय किए थे उन्हें खत्म किया गया, बहुराष्ट्रीय पूंजी को संप्रभु देशों की खेती, उद्योग, विपणन, व्यापार, जल-जंगल-जमीन, शिक्षा और मानवीय संसाधनो में घुसपैठ कर बेतहाशा मुनाफा कमाने की छूट दी गई। निजीकरण के जरिए सरकारों ने जनता के पैसे से कायम किए गए उद्योगों को औने-पौने बड़े पूंजीपति घरानों के हवाले किया। विदेशी मालों के लिए संप्रभु देशों ने अपने बाजार खोल दिए और जिन मालों के उत्पादन में वे आत्मनिर्भर थे वे भी बाहर से आने लगे। टैक्स कम किए गए ताकि पूंजीपति के पास निवेश के लिए अधिक पूंजी हो जिससे विकास हो, कारपोरेट टैक्सों को कम करने का नतीजा यह हुआ कि सरकारों के पास सामाजिक कल्याण-शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार पर खर्च करने के लिए और खेती आदि में किसानों और छोटे-मझोले उद्योगों को सहायता (सिब्सडी देने के लिए पूंजी नहीं बची। विभिन्न देशों की पूंजीवादी या गैर-पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं को एक ही विश्व बाजार अर्थव्यवस्था में सोख लिया गया। मुनाफा बढ़ाने के लिए सस्ते श्रम और कच्चे माल की तलाश में उत्पादन को बड़े पूंजीपति देशों से हटाकर तमाम तीसरी दुनिया के देशों में स्थानान्तरित करने की मुहिम चलायी गई, जिसे आउटसोर्सिंग कहा जाता है। ऐसे व्यवसायों में जिन्हें रोजगार मिला उन्हें राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा पगार मिलने लगी, लेकिन निचले और मèयम वर्गों के बड़े हिस्से की वास्तविक आय में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। आय में बढ़ोत्तरी न होने से मांग घटी और मांग के मुकाबले उत्पादन ज्यादा होने की समस्या फिर सर उठाने लगी। दूसरी ओर ध्नी तबकों ने उत्पादन की जगह सट्टेबाजी के जरिए मुनाफा बढ़ाने की ओर कदम बढ़ाया। हमारे देश में पिछले एक दशक में लगभग 1लाख 36 हजार किसानों ने आत्महत्या की। ये आमतौर पर वे किसान थे जिन्होंने दुनिया की मंडी में बिकाऊ फसलें कर्ज लेकर उगाई थीं लेकिन उनकी फसलें बिक नहीं सकीं। आज अर्थव्यवस्था में ज्यादातर मजदूरों को ठेके पर काम करना पड़ता है और उनकी दैनिक जरूरतों की चीजें बाजार में ही उपलब्धहैं। जिन्हें खरीदने के लिए उनकी आय कभी भी पूरी नहीं पड़ती। गांव छोड़कर दूर-दराज के इलाकों में रोजगार की तलाश में भटकने वाले ये भारतीय नागरिक इस विश्व व्यवस्था में इंसान से एक दर्जा कम वजूद रखते हैं। विकास दर और सेंसेक्स की उछाल में रमे मुट्ठी भर सफल हिंदुस्तानी 20 करोड़ ऐसे भूखे हिंदुस्तानियों से रहन-सहन, बोली-बानी, जीवनशैली से पूरी तरह अलग हो चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय खाद्यनीति शोध संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक हमारा देश सबसे ज्यादा भूखा है। अमरीका में आए ताजा वित्तीय भूचाल ने आउटसोर्सिंग के बूते और स्टॉक माकेर्ट के सट्टों के जरिए अमीर हुए मध्यवर्गीय भारतीयों को पहली बार यह एहसास दिलाया है कि अंतत: वे इसी देश के रहने वाले हैं जो कि भूखा और दुखी है। भारत में आउटसोर्सिंग उद्योग की 40 फीसदी आय विकसित देशों के वित्तीय क्षेत्रा से आती है। इस क्षेत्र में आई तबाही के चलते बैंगलोर और नोएडा व गुडगांव जैसे समृद्धि के नए टापू भी डूबने से शायद ही बच पाएं। कई जगह दो लाख रूपए महीना पाने वाले 20 हजार पर आ गए। छंटनी इन उद्योगों से बड़े पैमाने पर हो रही है। शेयर दलालों और व्यवसायियों की आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं। अमरीका में भारतीय मूल के व्यवसायी ने सपरिवार खुदकुशी कर ली। भारत में इस भूचाल के पड़ने वाले प्रभावों को सट्टा बाजार की गिरावटों, मंहगाई, रूपए की दर में गिरावट और विकास की संभावित दरों में गिरावट में देखा जा सकता है। दरअसल पूंजीपतियों के लिए किसानों की जमीन हड़पकर विदेशी पूंजी के बूते उन्हें तमाम टैक्सों से मुक्ति देते हुए जिस विकास के मॉडल को भारत के हुक्मरान यहां लाद रहे हैं वह भारी तबाही और विस्थापन के बावजूद चल नहीं सकेगा। परमाणु करार करके सत्ताधरियों ने अमरीका के आण्विक रिएक्टर उद्योग को डूबने से बचा लिया है। तमाम सैन्य समझौते अमरीका के सैन्य उद्योगों को राहत देंगे। इस तरह हम लगातार अमरीका के संकट को हल करने में हलाक होते जाएंगे। दरअसल पिछले दो दशकों से सरकारों ने पूरे देश को ही खुदकुशी की राह पर बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अमरीका के `वार ऑन टेरर´ में शामिल होकर हमारी सरकारों ने अमरीका के शत्रुओं को अपना शत्रु बना लिया है। देश चतुदिर्क आतंकवाद के हमले झेल रहा है। दक्षिण एशिया में भारत और अमरीका की रणनीतिक साझेदारी तमाम पड़ोसियों से हमें अलगाव में डाल देगी। इस्राइल के साथ भारत के मजबूत होते रिश्तों ने मèय एशिया में भी भारत के प्रति नकारात्मक भावनाओं को जन्म दिया है। हमारा देश अमरीका के पिछलग्गू के रूप में देखा जा रहा है और दुनिया भर में अमरीकी हमलों से तबाह होते लोग हमें भी अपना दुश्मन मान बैठें तो कोई आश्चर्य नहीं। आज देश अंदर और बाहर से जितना असुरक्षित है उतना शायद ही कभी रहा हो। अमरीकी साम्राज्यवाद का टाइटैनिक 21वीं सदी में तेजी से बर्फीली चट्टान से टकराने की ओर बढ़ रहा है। हमारे शासकों ने देश की नौका उसके साथ बांध् दी है, जिससे संबंध्-विच्छेद के लिए जनता का संग्राम आज की देशभक्ति और युगधर्म है।

नई विश्व-व्यवस्था में समायोजित होने के क्रम में हमारे देश की सत्ताधरी पार्टियों ने जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी के साथ-साथ उड़ीसा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, बंगाल हर कहीं जल-जंगल-जमीन पर कब्जा, विरोध् में उठने वाले आंदोलनों का बर्बर दमन, राजनीति से बुनियादी मुद्दों को गायब कर धर्म-जाति-क्षेत्र के नाम पर जनता को लड़ाना, इस युद्द के अनेक रूप हैं। जिन जनविरोधी कामों को सरकारें जनाक्रोश के डर से खुद नहीं कर पातीं उन्हें अदालतें अंजाम दे रही हैं। सरदार सरोवर बांध् को ऊंचा करने से लेकर पास्को और वेदान्त जमीन हड़प मामलों, दिल्ली में सुपर शॉपिंग मॉल की श्रृंखला को फायदा पहुंचाने के लिए सीलिंग जैसे फैसले कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने वाले और मेहनतकश जनता के खिलाफ हैं। पिछले 2 दशकों में अदालती भ्रष्टाचार, कारपोरेट घरानों और राजनीतिक दलों से प्रभावित न जाने कितने फैसलों के बारे में चर्चाएं आम हैं। गाजियाबाद के अदालती कर्मचारियों के पी.एफ. घोटाले में जजों की संलिप्तता से संबंधित मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश तक सुनवाई में बैठने से कन्नी काट गए। कलकत्ता हाईकोर्ट का भ्रष्टाचार में आरोपी एक जज खुलेआम ललकार रहा है कि हिम्मत हो तो,महाभियोग चलाकर देखो।
भूमंडलीकरण के दौर की राजनीति सत्ता की पार्टियों के बीच नूराकुश्ती बनकर रह गई है। जनता से निपटने के लिए काले कानूनों, फर्जी एन्काउन्टरों और अमरीका के साथ सैन्य साझेदारी के सभी पक्षधर हैं। अपने ही देश को विदेशियों के साथ मिलकर लूटने में हमारे देश का दलाल पूंजीपति और नौकरशाह तबका लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गैर-संसदीय हथियारबंद सेनाएं इस हद तक ताकतवर हो चुकी हैं कि उनकी बम फैक्ट्रियां पकड़ी जाती हैं, उनके सदस्य मालेगांव जैसी जगहों पर बम विस्पफोट में लिप्त पाए जाते हैं, फिर भी उन पर प्रतिबंध लगाने की बात कोई सरकार नहीं सोच पाती। उन्होंने देश की सेना, नौकरशाही और गुप्तचर व्यवस्था तक में इस हद तक घुसपैठ बना ली है कि सत्ता में रहे बगैर भी उनकी हमलावर क्षमता कापफी अधिक है। कम से कम आज की तारीख में किसी भी और राजनीतिक अथवा गैर-राजनीतिक समूह की मारक क्षमता उनसे अधिक नहीं है। आज देश में यह पता लगाना बहुत मुश्किल है कि किसी खास आतंकी घटना के पीछे वास्तव में कौन है। अल्पसंख्यकों पर हमले इस्लामी आतंकवाद के हौव्वे के नाम पर या फिर धर्मांतरण के नाम पर खुलेआम जारी हैं। राजसत्ता के द्वारा भी और संघ परिवार द्वारा भी। जामिया का बाटला हाउस एन्काउन्टर हो या मुंबई में राहुल राज का एन्काउन्टर, तमाम निर्दोष लोग एक फासीवादी होती जा रही राज्य मशीनरी के शिकार हो रहे हैं। जबकि खुलेआम हिंदुओं को आत्मघाती दस्ता बनाने की अपील करने वाले बाल ठाकरे या उत्तर भारतीयों पर कहर ढाने वाले राज ठाकरे कानून और संविधन से ऊपर हैं। हाल के वर्षों में दया नायक सहित करीब बीसियों एन्काउन्टर स्पेशलिस्टों के मामले प्रकाश में आ चुके हैं जिन्होंने माफियाओं के लिए काम करते हुए अरबों की संपत्ति खड़ी की। यही वह मंजर है जब हम आज धुमिल की धरती पर अपना 11 वां राष्ट्रीय सम्मेलन कर रहे हैं।
जहां फासीवादी राजनीति खुद को लगातार संस्कृति के खोल में पेश करती रही है वहीं जन संस्कृति को लगातार राजनीतिक होते जाना पड़ेगा। वाल्टर बेंजामिन ने लिखा था `होमर के समय में जो मनुष्यता ओलंपियन देवताओं के मनन का विषय थी, अब वह अपने ही मनन का विषय है। उसका आत्म-निर्वासन इस हद तक बढ़ चुका है कि वह अपने ही विनाश का अनुभव प्रथम कोटि के सौन्दर्यात्मक आनंद की तरह कर सकती है। राजनीति की यही दशा है जिसे फासीवाद सौन्दर्यात्मक बनाता जा रहा है। कम्युनिज्म कला का राजनीतिकरण करके ही इसका जवाब देता है।´´ (इल्युमिनेशंस, अनुवाद हैरी जॉन, फॉन्टाना, 1992, पृ. 235, द वर्क ऑपफ आर्ट इन द एज ऑपफ मकैनिकल रिप्रोडक्शन दरअसल आज हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या लगातार हिंदी में डब होकर आ रही हालीवुड की डिजास्टर मूवीज़ पर èयान दें तो बेंजामिन की बात अिध्क पुष्ट होगी। बेंजामिन के ही शब्द लें तो `सौन्दयीर्कृत राजनीति का उच्चतम रूप युद्ध है´। खाड़ी युद्ध से लेकर सद्दाम की पफांसी तक टी.वी. के पर्दे पर देखते हुए करोड़ों लोगों ने विनाशलीला को एन्जॉय किया है। सनसनी की खोज में फर्जी मुठभेड़ तक आयोजित कराने वाले टी.वी. चैनलों ने अपराध्, युद्ध और अंधविश्वास को उपभोक्ता वस्तुओं में बदला है। कारगिल युद्ध के आसपास भारत-पाक रिश्तों पर बनी फिल्म ने अंधराष्ट्रवाद और मुस्लिम-विरोध् को कलात्मक आनंद में बदला। फर्जी एन्काउन्टर के स्पेशलिस्टों को नायक का दर्जा दिलाया। अखबार में लिखने वाले तमाम कॉलमनिस्ट गुजरात जनसंहार से लेकर कंघमाल तक की घटनाओं को स्वाभाविक बनाने के प्रयास में तरह-तरह के तर्क गढ़ते रहे हैं। फर्जी एन्काउन्टर पर सवाल उठाने वाले देशद्रोही बताए जाते हैं। देशभक्ति को इतना सस्ता बनाया गया कि कोई भी मापिफया, डकैत या लंपट भी पाकिस्तान अथवा मुशरर्पफ को चार गाली देकर या फिर पाकिस्तान के खिलापफ भारतीय क्रिकेट टीम की जीत पर पटाखे पफोड़कर देशभक्त का तमगा पा सकता है। अमरीका के खिलापफ कुछ भी बोलने पर तत्काल आपको चीन या पाकिस्तान का समर्थक घोषित कर दिया जाएगा। आस्था का दायरा अब पुलिस और सेना तक पहुंच गया है। जिस तरह हमारे सारे अच्छे कर्मों के लिए विधता उत्तरदायी है और बुरे कर्मों के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं और विधता के दंड को हमें स्वीकार करना चाहिए, उसी तरह अब पुलिस और सेना जिस किसी को प्रताड़ित करती है उसे उसके बुरे कर्मों का परिणाम बताया जा रहा है। पुलिस, सेना और राजसत्ता आज के नए भगवान हैं, जिन पर उंगली उठाना कुफ्र है। भीतर तक सड़ चुकी अदालती व्यवस्था के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने वाले भ्रष्ट नेता-नौकरशाह और अपराधी हर रोज अखबारों और टी.वी. के पर्दों पर दिख जाते हैं। जिस न्याय व्यवस्था को ऐसे तत्वों का सम्मान मिले उसकी न्यायप्रियता के बारे में सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। जिस तरह का कॉमन सेंस कारपोरेट मीडिया, शैक्षणिक संस्थाएं, अदालतें, जातिगत संस्थाएं, धर्मगुरु आज बना रहे हैं, वह फासीवाद के ही अनुकूल है और साम्राज्यवाद के मंसूबों को पूरा करने वाला है।
ऐसे में सांस्कृतिक प्रतिरोध् के कौन से रूप हो सकते हैं? संस्कृति या कला के राजनीतिकरण की दिशा क्या हो सकती है? किस तरह की संस्थाएं हम बना सकते हैं? जनांदोलनों की देश में कोई कमी नहीं, भले ही वे किसी संगठित पार्टी या विचारधरा द्वारा संचालित न भी हो रहे हों। क्या प्रतिरोध सांस्कृतिक कर्म का इनसे कोई रिश्ता जुड़ पाता है? क्या साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा, नाटक या फिर बौद्धिक विमर्श के क्षेत्र में काम कर रहे लोग व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों की चेतना को बड़े पैमाने पर अभिव्यक्त कर पा रहे हैं? देश के गरीबों का एक बहुत बड़ा तबका अपनी-अपनी जाति के बड़े लोगों के पीछे अपने सांस्कृतिक-वैचारिक पिछड़ेपन के कारण घिसट रहा है। जाहिर है यह स्थिति गरीबों को सचेतन वर्ग के रूप में राजनीतिक रूप से गोलबंद होने से रोकती है। क्या हमारा संस्कृतिकर्म उन वैचारिक और सांस्कृतिक जंजीरों से उन्हें मुक्त करने में कोई भूमिका निभा रहा है जिनमें जकड़े हुए वे अपने ही शोषकों को मजबूत करने को अभिशप्त हैं? साहित्य-संस्कृति सिर्फ इसी अर्थ में राजनीति के आगे चलने वाली मशाल हो सकती है कि वह जनान्दोलनों के लिए रास्ता सापफ करे, गरीबों को वर्ग सचेतन बनाने में वैचारिक और सांस्कृतिक अस्त्रा मुहैया करे। जबकि संस्कृति और उसकी संस्थाओं का एक बहुत बड़ा दायरा बाजार या राजसत्ता ने घेर लिया है (और लोकसंस्कृति भी इस दायरे से मुक्त नहीं हैद्ध तब उन दोनों से स्वायत्त कोई वैकल्पिक दायरा क्या हम निर्मित कर सके हैं? इस दायरे का ठोस रूप संगठन के अलावा शायद ही कुछ और हो, लेकिन संस्कृति और बौद्धिक कर्म में लगे हुए ढेर सारे धर्मनिरपेक्ष और किंचित प्रगतिशील लोग भी बाजार अथवा राजसत्ता की अपेक्षा संगठन को ही अपनी स्वतंत्रा रचनात्मकता में बड़ी बाधा माने बैठे हैं। क्या बाजार अथवा राजसत्ता असंगठित क्षेत्र हैं? सच तो यह है कि बाजार और राजसत्ता ही नहीं बल्कि सामंती मूल्यों वाली हमारी समाज-व्यवस्था जिसमें जातिगत विशेषाधिकार और जातिगत कलंक आज भी बड़ी भूमिका निभाते हैं, हमारे समाज के स्वाभाविक संगठन हैं। परिवार व्यवस्था को भी ऐसा ही मानना चाहिए। मुश्किल यह है कि इसी व्यवस्था में रहते हुए उसके प्रति रैडिकल आलोचनात्मक दृष्टि के साथ हमें प्रतिरोध् के लिए संगठित होना है। यह टेढ़ी खीर है, धरा के विरुद्ध तैरना है लेकिन और कोई विकल्प नहीं है।
साहित्य के ही क्षेत्र को लें। आजकल यह कहने का चलन हो गया है कि साहित्य प्रतिरोध् का क्षेत्र है, मानो कि यह कोई स्वयंसिद्ध त हो। लेकिन यदि हम प्रकाशन जगत, सरकारी खरीद, साहित्य-संस्कृति की सरकारी संस्थाओं, कारपोरेट घरानों के साहित्यिक जाल पर नजर दौड़ाएं तो साहित्य की वर्तमान दशा-दिशा पर उनके प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह मानना गलत होगा कि पूंजीवादी बाजार और राजसत्ता ने साहित्य के क्षेत्र को अछूता छोड़ दिया है। जब हम साहित्यिक आलोचना की दुनिया पर नजर डालते हैं तो साहित्य के उत्पादन संबंधें के बारे में, उसके उपभोग पक्ष के बारे में कम ही जानकारी मिल पाती है। विचारधारा की बातें जरूर मिलती हैं लेकिन साहित्य उत्पादन की वस्तुगत परिस्थितियों पर नजर कम जाती है। हमारे संगठन के साथ यह बात जरूर शुरू से रही आई कि हमने इस पक्ष को अनदेखा कभी नहीं किया। साहित्य और संस्कृति के समाजशास्त्र, आलोचना की राजनीति, आलोचना की सामाजिकता, संस्कृति विमर्श के समकालीन संदर्भ, साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक हमले के दौर में जनभाषाओं की चुनौतियों, साहित्य में वर्ग की अवधरणा आदि पर हाल के वर्षों में हमारे अध्यक्ष महोदय ने खास बल दिया है। यदि हम अपने पहले महासचिव गोरख पाण्डेय के लेखन को याद करें तो यह बात हमारे लिए नई नहीं है। नया है वह परिवेश जिसमें इन अवधरणाओं को नए रूपों में व्यावहारिक धरातल पर विकसित करने की जरूरत है। हमने अभी इस स्तर पर कम ही काम किया है। अभी तो हमारे बीच ही इन्हें स्पष्ट होना बाकी है। स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समूहों की अिस्मता के साहित्य की आजकल चर्चा कापफी है। हमने वैचारिक स्तर पर इन विमर्श में हस्तक्षेप किया है और कोशिश की है कि इन विमर्श के वर्गसार को विश्लेषित किया जाए और उन्हें अभिजन वर्ग की जगह गरीब तबकों के संघर्षों की अभिव्यक्ति की दिशा में प्रेरित किया जाए। यह स्वागतयोग्य बात है कि दलित लेखकों का बड़ा हिस्सा साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण का विरोधी है जबकि दलित राजनीति और उसके वैचारिक नेताओं का बड़ा तबका उसका सहयोगी है। साहित्य के दायरे के सिकुड़ने को लेकर चिंतित कई लोग उसे बाजारोन्मुख बनाने के लिए `टैलेन्ट हन्ट´ में उतरे हुए हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि मुनाफे के प्रकाशनतंत्र के जरिए ही किताबें लोगों तक पहुंचने की जगह करोड़ों की सरकारी खरीद में महज़ कुछ लाइबे्ररियों में पहुंचाई जाती हैं जिन तक जनता की पहुंच नहीं है। क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि सिंगूर-नंदीग्राम, नर्मदाघाटी, किसानों की आत्महत्या, चेंगारा (केरल के दलितों के भूमि संघर्षों, कश्मीर घाटी और पूर्वोत्तर प्रान्तों में सैनिक दमन के खिलापफ छोटे बजट की डाक्यूमेन्ट्री फिल्में तो बनी हैं, लेकिन इन संघर्षों के बीच जीते मरते लोगों की दास्तानें 40 करोड़ लोगों की हिंदी भाषा के साहित्य में दर्ज नहीं हो पा रही हैं? यह सच है कि पिछले 2 दशकों में साहित्य ने सांप्रदायिकता, सामंती उत्पीड़न और बाजारवाद की आलोचना के बहुरंगी चित्रा उपस्थित किए हैं लेकिन अभी भी संघर्षरत आमलोगों ने, किसानों-नौजवानों और आदिवासियों ने हमारे साहित्य को अपने जीवन संघर्ष के लिए जरूरी नहीं पाया है। जिनके पास संघर्षों के अनुभव हैं उनके पास अभिव्यक्ति के साध्न नहीं और जिनके पास अभिव्यक्ति के साध्न और कौशल है उनके पास उन अनुभवों का आत्मीय परिचय नहीं। क्या इस खाईं को हमारा साहित्य पाट पाया है ? मुक्तिबोध् को कचोट थी कि `मैं उनका ही होता जिनसे रूप-भाव पाए हैं´ या फिर गोरख पाण्डेय ने लेखकों के विचारधरात्मक रूपान्तरण, अंतर्वस्तु और रूप के द्वंद्वात्मक संबंध तथा संप्रेषण की समस्या को सुलझाने को कार्यभार माना था। इस कार्यभार को वहन करना आज भी क्या उतना ही जरूरी नहीं है ? गोरख जी ने लिखा था ``कलात्मकता और लोकप्रियता एक दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी हैं। हम मध्यवर्ग के लिए या उच्चवर्ग के लिए किसान और मजदूर के जीवन और संघर्ष से जुड़ी रचनाएं नहीं करते, हमारे प्राथमिक श्रोता और पाठक खुद मजदूर और किसान हों, इस पर ध्यान देना चाहिए।´´ जिस तरह उस समय शास्त्रीयतावाद, आधुनिकतावाद और अराजकता की प्रवृत्तियों से लड़ना पड़ा था, उसी तरह से आज भी इन चिंताओं को वहन करने वाले तमाम लोगों को उत्तर-आधुनिकता, उत्तर-संरचनावाद और उत्तर-औपनिवेशिकता के शासकवर्गीय भाष्य से प्रेरित उन सिद्धांतों से जरूर ही दो-दो हाथ करना पड़ेगा जो इतिहास, यथार्थवाद और विचारधरा के विरोध् में प्रस्तावित किए जा रहे हैं। इस भ्रम में किसी को नहीं रहना चाहिए कि इस तरह के भाष्यों और सिद्धांत को कुछ व्यक्ति अभिव्यक्त कर रहे हैं बल्कि ये प्रयास सांस्थानिक हैं। हमारी अकादमियां पश्चिम के जिन सत्ता-केन्द्रों से जुड़ी हुई हैं, यह उनका एजेंडा है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय भाषाओं का साहित्य अमरीका की लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में कैटलॉग होता है, उनका चयन और वर्गीकरण होता है, उनके कैनन बनाए जाते हैं। अभी तो अंग्रेजी में लिखे या अनूदित भारतीय साहित्य की ही पश्चिम के अकादमिक हलकों और कारपोरेट पुरस्कार-दाताओं में पूछ है,लेकिन वह दिन दूर नहीं जब यह सब कुछ भारतीय भाषाओं की मौलिक कृतियों तक भी पहुंचेगा। दरअसल मानवाधिकार से लेकर साहित्य तक सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधि का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो पश्चिम के संस्थागत प्रयासों से अछूता हो। यह व्यक्तियों की बात नहीं है और न ही उनकी इच्छा-अनिच्छा से प्रभावित होने वाली चीज है। जाहिर है कि पश्चिम के कारपोरेट फाउन्डेशनों, बड़ी पूंजी के एन.जी.ओ. और एम्बेसियों को हमारी भाषाओं और साहित्य या हमारे मानवाधिकार आंदोलनों में दिलचस्पी महज़ विश्वबंधुत्व के चलते नहीं है। उनके एजेंडा स्पष्ट हैं।
हमने हाल के दिनों में फिल्म समारोहों के बेहतर आयोजन के अनुभव प्राप्त किए हैं। एक वह समय भी जरूर था जब फिल्म डिवीजन सार्थक और गरीबों के जीवन संघर्षों पर बनने वाली छोटे बजट की फिल्म को फाइनेन्स कर दिया करता था और वे दूरदर्शन पर दिखाई भी जाती थीं। इन फिल्म के खिलापफ बाजारू फिल्में बनाने वाले यह आरोप लगाते थे कि गरीब आदमी यों ही जीवन की चक्की में पिसता रहता है और अगर यही सब फिल्म के पर्दे पर भी वह देखेगा तो उसकी निराशा और दु:ख और बढ़ेंगे जबकि कॉमर्शियल फिल्म की मार-धड़, सेक्स और सनसनी उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, राहत तो देते हैं। फिर भी यह कहना होगा कि इन भोथरे तर्कों से लोहा लेते हुए समानान्तर फिल्म का निर्माण प्रतिरोधी कला की दृष्टि के साथ होता रहा। लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में वे संस्थाएं जानबूझ कर नष्ट की गईं जो सार्थक सिनेमा को थोड़ी पूंजी उपलब्ध करा दिया करती थीं। आज अज़ीज़ मिर्जा, बेनेगल या निहलानी तक को माकेर्ट फ्रेंडली बनने पर मजबूर होना पड़ रहा है। दूसरी तरपफ डॉक्यूमेंटरी फिल्म ने अनेक आंदोलनों को डॉक्यूमेंट किया है। हमारे साथियों ने तमाम ऐसी फिल्म व तीसरी दुनिया के प्रतिबिंबनिर्माताओं की फिल्म को दिखलाया है। जरूर हमारे साथी संघर्षरत जनता की फिल्म का निर्माण करने में सक्षम होंगे लेकिन ऐसा वे तभी कर सकेंगे जब वे पूंजी के तर्क का मुकाबला संगठन के तर्क से कर सकेंगे।
नाटक के क्षेत्रा में भी यही बात कमोबेश लागू है। हमारे साथियों ने नुक्कड़ और स्टेज दोनों पर बिहार की बाढ़ से लेकर जामिया नगर के फर्जी एन्काउन्टर तक बेहद लोकप्रिय नाटक खेले हैं। नाट्य विध का हमारा अनुभव बिहार में सामंतवाद विरोधी किसान आंदोलन के साथ-साथ पनपा है। भगतसिंह जन्मशती के अवसर पर उनके जीवन पर भी हिरावल ने नाटक खेला। 1857 से लेकर हाल के अमरीकी वित्तीय भूचाल तक न जाने कितने विषय ऐसे हैं जिन पर हम नाटकों के जरिए आम जनता को सरलता से अपनी बात पहुंचा सकते हैं। इसे संस्थाब( रूप दिए जाने की ओर कुछ कदम हमने जरूर बढ़ाए हैं। परफार्मिंग आर्टिस्ट हमारे सांस्कृतिक आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता बन सकें और रोजी-रोजगार की चिंता उन्हें हर दिन न साले इसके लिए बड़े प्रयास की जरूरत है।
बेगूसराय के पिछले सम्मेलन के बाद जनमत पत्रिका ने कुछ एक महत्वपूर्ण बहसों में हस्तक्षेप किया है - खासतौर से 1857 से संबंधित बहसों में। कुछ प्रगतिशील मित्रों को 1857 को पहला स्वाधीनता संग्राम या भारतीय राष्ट्र की प्रसवपीड़ा कहे जाने से आपत्ति है। वे इसे सामंती प्रतिक्रिया मानते हैं। जनमत में छपे लेखों में यह कहा गया था कि मार्क्स-एंगेल्स ने इसे प्रथम स्वाधीनता संग्राम माना था। ये साथी यह मांग करते हैं कि उन्हें यह दिखाया जाए कि माक्र्स-एंगेल्स ने ऐसा कहां लिखा। अब उन्हें कौन यह बताए कि उन्होंने इस बात को एक वाक्य में नहीं बल्कि 80 हजार शब्दों में लिखा है। शब्द ही पकड़ना है तो मार्क्सके शब्द हैं `राष्ट्रीय-विद्रोह´। राष्ट्रीय विद्रोह कहते हुए मार्क्स राष्ट्र की बात कर रहे हैं? जाहिर है वे भारत की बात कर रहे हैं, जो राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में था और 1857 इस प्रक्रिया का जरूरी पड़ाव था। यह राष्ट्रीय विद्रोह किसके खिलाफ था? जाहिर है कि औपनिवेशिक अंग्रेज शासकों के खिलापफ था। भारतीय राष्ट्र का औपनिवेशिक शासकों के खिलापफ विद्रोह अगर स्वाधीनता संग्राम नहीं तो और क्या कहा जाएगा? और मार्क्सभी इससे अलग क्या कह रहे थे?
समस्या यह है कि जो मित्र इस महान विद्रोह को सामंती षड्यंत्र मानते हैं और व्यापक किसान-दस्तकार-बहुजन की भागीदारी को सामंती अनुकूलन, वे इतिहास को सर के बल खड़ा कर रहे हैं। मार्क्स ऐसा कतई नहीं मानते थे। वास्तव में ज्यादातर सामंत इस युद्ध में अंगे्रजों के ही साथ थे, जो नहीं थे वे व्यापक जन-भावना के दबाव से अनुकूलित थे. उनमें से कुछ के घोषणापत्रों की प्रतिक्रियावादी बातों से पूरे विद्रोह का सार ग्रहण कर लेना कौन सा इतिहासबोध है? फिर कौन यह दावा कर रहा है कि 1857 में शरीक सारे राजे-रजवाड़े सामाजिक क्रांति करना चाह रहे थे? कौन भला यह दावा करेगा कि इतने बडे जन-समर में ढेरों अंतर्विरोध नहीं थे? सवाल महज़ इतना है कि कौन सा अंतर्विरोध् प्रमुख है जिससे कि उसका चरित्र निर्मित हुआ। दरअसल यह इतिहासबोध् किसी के काम का नहीं, उस बहुजन समाज के काम का तो कतई नहीं जिनके पक्ष से लिखे जाने का वो दावा करता है क्योंकि वह उन्हें भारत की आज़ादी की लड़ाई पर उनकी वास्तविक और वाजिब दावेदारी से वंचित करता है। उत्तर-आधुनिक और भूमंडलीकरण के दौर में हमें लगातार अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों से अलग करने की कोशिशें हजारहां तरीकों से जारी हैं। लेकिन हमें अपने इतिहास के तमाम ऐसे प्रसंगों को सदैव नए संदर्भ में जगाना है जो कि दमन-शोषण के खिलापफ मनुष्य के अनवरत संघर्षों की याद दिलाते हैं। साथ ही लोकजीवन की तमाम ऐसी प्रतिरोधी परंपराओं से भी उन्हें जोड़ना है जो अभी भी जीवित हैं। 1857 पर चल रही हिंदी की बहसों को इसी प्रसंग में देखना होगा।
जनमत के प्रसंग में हमने इस बहस का जिक्र इसलिए किया कि अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बावजूद उसके हस्तक्षेप को रेखांकित किया जा सके। हमें मालूम है कि जनमत से जो अपेक्षाएं हमारे साथी और आम पाठक करते हैं उन्हें हम अभी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। अध्यक्ष महोदय सहित तमाम साथियों के बेहतर सुझाव हमें मिलते रहे हैं लेकिन इन पर अमल हम सदैव नहीं कर पाए हैं। जाहिर है कि इस सम्मेलन से भी सुझाव और आलोचनाएं हमें इसे बेहतर बनाने में मदद करेंगी।
पिछले बेगूसराय सम्मेलन में पूर्व-महासचिव श्री अजय सिंह ने सांस्कृतिक संकुल का जो प्रस्ताव रखा था उसे यहां दोहराने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह आज भी हमारा प्रमुख कार्यभार है जिसे हमें अब चरणबद्ध ढंग से पूरा करने की योजना लेनी होगी। संकुल में अब तक जो भी धनराशि एकत्रित हुई उसके बारे में कार्यकारी महासचिव रिपोर्ट रखेंगे लेकिन जिस एक महत्वपूर्ण उपलिब्ध की चर्चा यहां आवश्यक है वह है लेखक और संस्कृतिकर्मियों के लिए स्थापित सहायताकोष से सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री अमरकांत को 50 हजार रुपए दिया जाना। हमारी इस पहल को लोगों ने काफी सकारात्मक माना है। लेखक के स्वाभिमान की रक्षा में यह छोटा ही प्रयास सही, महत्वपूर्ण जरूर है।
पिछले सम्मेलन के कार्यभारों में राज्य इकाइयों का गठन एक महत्वपूर्ण कार्यभार था लेकिन यह काम अभी सिर्फ झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों के सम्मेलन के जरिए ही हो सका है। दिल्ली, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान के सम्मेलन की योजना हमें यहीं से लेनी होगी। राज्यों और दूसरे सांगठनिक निकायों (सांस्कृतिक संकुल और फिल्म समारोह के संयोजक अलग से रखेंगे और तब हम संगठन की समस्याओं पर गंभीर चर्चा सांगठनिक सत्र में कर सकेंगे।
हमारा सांस्कृतिक आंदोलन और संगठन साम्राज्यवाद और सामंतवाद विरोधी किसान संघर्षों से ही जीवनी शक्ति प्राप्त करता रहा है। उसकी इस कार्यदिशा में कोई बदलाव अपेक्षित नहीं है। लेकिन गांव की ओर, जनपदीय बोलियों की ओर, लोकसंस्कृति की ओर इसी कार्यदिशा के साथ अधिक सक्रियता के साथ बढ़ना हमारे लिए बेहद जरूरी है। इसमें हम तमाम संगठनों और व्यक्तियों को साथ लेकर चलना चाहेंगे। बिहार के शाहाबाद क्षेत्रा के ग्रामीण और कस्बाई अंचलों में 1857 और भगतसिंह जन्मशती कार्यक्रमों की श्रृंखला, पिछले वर्ष कुशीनगर में जोगियापट्टी गांव में संयुक्त रूप से आयोजित लोकरंग कार्यक्रम, गाजीपुर में मुहम्मदाबाद ब्लॉक में आयोजित मेला इस दिशा में किए गए उदाहरणीय प्रयास हैं। जनकवि धुमिल के गांव में हमारे 11वें सम्मेलन का होना इसी कार्यदिशा को मूर्त रूप देने का प्रयास है।
पूरी 20वीं सदी में प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जमातों की अपेक्षा साम्राज्यवादी और फासिस्ट ताकतें संस्कृति का इस्तेमाल अपने हित में कर ले जाने में ज्यादा सपफल रहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके खिलापफ प्रतिरोध् की सांस्कृतिक कोशिशों को हम कम करके आंकें। आज पूरे लैटिन अमेरिका में हम नए किस्म की सांस्कृतिक सक्रियता, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों के साथ-साथ देख रहे हैं। क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देशों ने संस्कृति पर जोर बढ़ाया है। पूंजीवादी मूल्यों की अपेक्षा समाजवादी मूल्यों की श्रेष्ठता की स्थापना सांस्कृतिक अभियान का रूप ले रही हैं। आज जब पूंजीवादी शोषण इस हद तक पहुंच चुका है कि पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व पर ही संकट है तो समाजवाद महज़ बर्बरता से बचाव के लिए नहीं बल्कि मनुष्य प्रजाति के बचे रहने के लिए जरूरी है। आज सांस्कृतिक आंदोलन के लिए बायो-एथिक्स, बायो-कैमिस्ट्री, जेनेटिक टेक्नॉलॉजी, माइक्रो और नैनो दुनिया के तमाम सवाल भी प्रासंगिक हो उठे हैं क्योंकि मानवता और मानवीय संस्कृति के प्रसंग में उनके गंभीर परिणामों के प्रति जागरूकता बहुत जरूरी है। आज सांस्कृतिक कार्यवाही के क्षेत्रों में स्कूल, परिवार, मीडिया और तमाम स्थानीय समुदाय भी शामिल हैं। हम इन क्षेत्रों की अनदेखी नहीं कर सकते। नई विश्व-व्यवस्था के पक्ष में सहमति बनाने के लिए, बौद्धिक समुदाय को साम्राज्यवाद और फासीवाद की आलोचना और उसके विरोध् में कार्यवाही से अलग करने के लिए, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की मशीनरी भारी पैसा खर्च कर रही है। संस्कृतिकर्मियों पर हमले भी तेज हुए हैं। हम बंद दरवाजों के पीछे नहीं रह सकते। हमें सांस्कृतिक हमले से निपटने के लिए आत्मशिक्षण, आलोचनात्मक विवेक और सचेत सांस्कृतिक आदतों का विकास करना ही होगा। और यह सब बगैर संगठन की शक्ति के संभव नहीं।
अगले वर्ष से हम हर वर्ष भारत के विभिन्न राज्यों और भाषाओं में जन संस्कृति मंच के बिरादराना संगठनों का राष्ट्रीय उत्सव आयोजित करेंगे। कला और संस्कृति की तमाम विधाओं में हमारे साथी काम कर रहे हैं। हमारे तमाम नौजवान साथी जो दैनिक या साप्ताहिक अखबार निकालने, कम्युनिटी रेडियो या स्थानीय टी.वी. चैनलों की स्थापना या फिल्म निर्माण का सपना देखते हैं, उसे मैं असंभव नहीं मानता। इतना जरूर है कि हमें अपनी ताकत और कमजोरियों का सही-सही आकलन होना चाहिए। 60 के दशक के यूरोप के छात्र आंदोलन का एक नारा याद आता है `बी रिजनेबल: डिमान्ड द इम्पासिबल´ यानी समझदारी रखिए और असंभव की मांग कीजिए। 70 के दशक का एक नारा था `रियलिटी इज़ ए सब्स्टीट्यूट फॉर यूटोपिया´ अथार्त् यथार्थ आदर्शलोक का स्थानापन्न है। और यूटोपिया नहीं यथार्थ पर खड़े होकर हम जिस आदर्श और सौंदर्य की रचना करेंगे उसे संघर्षरत आमलोग, मजदूर-किसान-नौजवान और आदिवासी अपने जीवन संघर्ष के लिए जरूरी पायेंगे और इसी ओर तो हमारा सारा सांस्कृतिक आंदोलन लक्षित है।
(जन संस्कृति मंच का 11वां राष्ट्रीय सम्मेलन 9-10 नवंबर, खेवली रामेश्वर, बनारस, उत्तर प्रदेश में महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा पढ़ा गया पर्चा)

Sunday, November 23, 2008

गाफिल इतना सस्ता नहीं है...!!


इतना तनहा रहना भी अच्छा नहीं है....
सबसे जुदा रहना भी अच्छा नहीं है....!!
हर बात पर हैरत से आँखें फैला दे
आदमी अब इतना भी बच्चा नहीं है....!!
खुदा के नाम पर दे खुदा को ही गच्चा....
पक गया है ये अक्ल का कच्चा नहीं है..!!
आदमी के साथ मिल-बैठ मैंने जाना है ये
आदमी में अब रत्ती-भर भी बच्चा नहीं है..!!
आओ सब मिलके मुहब्बत को दफन कर दें
कि इसके बगैर तो अब कोई रास्ता नहीं है !!
तू आए और तेरे आते ही तेरे साथ चल दे...?
ओ कज़ा,"गाफिल"अभी इतना सस्ता नहीं है !!

Saturday, November 22, 2008

कोशिश करता हूँ छुपाने की...!!


जो तुम पढ़ते हो मेरे चहरे पर...
कोशिश बहुत करता हूँ छुपाने की !!
हरदम हंसता रहता हूँ ना मैं...
तो कोशिश करो मुझे रुलाने की..!!
जिन्दगी तो हर किसी की गोया..
ख्वाब हो इक पागल दीवाने की !!
चेहरे की लकीरें उसकी हैं ऐसी...
छिपने की और ना छिपाने की !!
जिन्दगी जीने की खातिर भईया
जरुरत है किसी नए बहाने की !!
ख्वाब-ख्वाब..ख़याल-ख़याल...बस
हयात है महज इक अफ़साने सी !!
अब तो जरुरत है भाई "गाफिल"
तुझको भी यहाँ से भाग जाने की !!

मैं तेरा क्या लगूं.....!!


मैं तेरा क्या लगूं.....!!


कितना भी रहूँ ग़मगीन मगर हंसता हुआ लगूं...
कोई बद-दुआ भी दे तो उसे बन कर दुआ लगूं !!
ये कड़ी धूप और कभी जो हो बादलों की छाँव...
हर मौसम में मैं फूल सा खिलता ही हुआ लगूं...!!
कई धरम हैं यहाँ और रिवायतें भी हैं कई....
हर किसी को मैं उसके धरम का मसीहा लगूं..!!
अभी तो मैं रात का सन्नाटा बुन रहा हूँ "गाफिल"
दिन में आकर पूछना सूरज कि मैं तेरा क्या लगूं..!!

Friday, November 21, 2008

गुनाहगार हैं सभी.....!!






दिल में बेकली हो तभी हर शाम गुनाहगार लगे है तभी....
शिद्दत हो गर दिल में तो...अपने ही यार लगे है सभी...!!
यार दो बोल मीठा भी बोल दे तो मान जाऊं मैं अभी...
नफरत से लबालब तिरे ये हर्फ़ तो तलवार लगे है सभी....!!
भीतर जो देख ले आदम तो ख़ुद को बदल ही दे अभी...
बाहर तो इक अपने अपने सिवा खतावार ही लगे है सभी..!!
हर कोई हर किसी को माफ़ कर दे तो सब बदल जाए...
मन में बोझ लेकर जीने से जीना भी दुश्वार लगे है सभी..!!
चन्द साँसे ही सौगात में लेकर आयें हैं हम सब यहाँ...
हर नेमत को आपस में बाँट लें,कि यार लगे है सभी....!!
मुहब्बत भरा दिल ये जो अपने पास ना हो "गाफिल"
चूम कर कलियाँ कहें फूल को,कि खार लगे हैं सभी....!!

Wednesday, November 19, 2008

तुम्हारे बिखराए हुए शब्द.....!!

तुम्हारे बिखराए हुए शब्दों के कणों को चुन रहा था मैं...
जो जमी में बेतरतीब थे धूल से सने हुए.....
बड़े प्यार से मैंने उन्हें उठाया वहां से...
हल्का-हल्का झाडा-पोंछा उन्हें...
और थोड़ा थपथपाया...
तभी तो उनका रूप निखर-कर
ऐसा सामने आया......
जमीं पे जब देखा था उन्हें..
कुछ चमकती हुई-सी वस्तू-से लगे थे..
हाथ में जब लिया,तब लगा...
अरे ये तो मोती हैं...
फिर बाहर नहीं छोडा उन्हें...
दिल के भीतर रखकर घर ले आया...
और अब उनका दीदार कैसे कराऊँ...
वो तो अब मेरे मन को मथ रहे हैं...
वो अब मेरी रूह को जज्ब कर रहे हैं....!!

Monday, November 17, 2008

चिंताएं ....हमारा अंत हैं......!!

हम सब एक साथ ही पुराने भी हैं,और नए भी....शरीर से नए...मगर मान्यताओं से पुराने...समय के साथ थोडा नए होते जाते... शरीर से थोड़ा पुराने होता जाते...बाबा आदम जमाने की रुदिवादिताएं भी हममे हैं..और सभ्य भी हम...हम क्या हैं..हम क्यूँ हैं...हम कौन हैं...हमारे वुजूद का मतलब क्या है...??हम कभी भी विचार नहीं करते...नहीं करते ना....!!

चिनाताएं...हमारा अंत हैं.....!!
चिंताएं...एक लम्बी यात्रा है....अंतहीन....
चिंताएं....एक फैला आकाश है....असीम.....
चिंताएं....हमारे होने का इक बोध है.....
चिंताएं....हमारे अंहकार का प्रश्न भी...
चिताएं...कभी दूर नहीं होती हमसे....
...हमारे कामों से ही शुरू होती हैं....
हमारी अनंत....अंतहीन...चिंताएं....और.
हमारे बुझे-बुझे कामों के बर-अक्स...
हरी-भरी होती जाती है हमारी चिंताएं....
एक काम ख़त्म...तो दूसरा शुरू....
दूसरा ख़त्म...तो तीसरा....
दरअसल.......
हमारे काम कभी ख़त्म नहीं होते....
इसके एवज में....
चिंताएं भी खरीद ली जाती हैं.....
चिंताएं हमारी कैद है...हमारा फैलाव भी....
चिंताएं हमारा समाज है..हमारा एकांत भी....
चिंताएं हमारा अहसास हैं....और...
हमारी जिन्दगी के लिए पिशाच भी....
चिंताएं प्रश्न है...और उसका उत्तर भी....
चिंताएं इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं...
कि हम कुछ नहीं कर सकते चिंता के सिवा...
और जिसे हम अपना किया हुआ समझते हैं...
होता है कोई और ही वो हमसे करवा....
मजा ये कि मानते हैं हम....
उसे अपना ही किया हुआ....!!
उसी से तो निकलती हैं...हमारी चिंताएं....
और हमें जलाती भी हैं...बुझाती भी....
.....चिंताओं में अगर...गहरा जायें हम....
तब जान सकते हैं हम.....
अपने अस्तित्व का भ्रम...
हमारे होने की अनुपयोगिता.....
और...
हमारी चिंताओं की असमर्थता....
हमारे हाथ-पैर मारने की व्यर्थता....
और हमारे तमाम दर्शन का पागलपन....
बेशक हमारा कार्य हमारा धर्म है.....
दरअसल..........
दूर आसमान में एक खूंटा बंधा है....
उस खूंटे से अगरचे हम.....
अपनी चिंताओं को बाँध सकें....
तो ही आजाद हो सकते हैं......
अपनी चिंताओं के कैदखाने से हम........!!

एक था बचपन......!!

एक था बचपन....बड़ा ही शरारती....बड़ा ही नटखट....,
वह बड़ों को करता था.....बार-बार ही डिस्टर्ब.....,
और छोटों से करता था...हर वक्त ही मारधाड़....,
वो कुछ काम तो...करता भी नहीं था....,
खेलता ही रहता था.....हर वक्त....,
कभी ये तोडा...तो कभी वो.....,
और कभी-कभी तो...,
हाथ-पैर तक तुड़वा बैठता था....
खेल-खेल में ही बचपन...
तो कभी कुछ जला भी लेता था...
अनजाने में ही बचपन.....!!
बचपन तो किसी की कुछ.....
सुनता भी तो नहीं था.....
बस अपनी ही चलाता रहता था....!!
मम्मी की डांट खाता तो....
सहम-सहम-सा जाता था बचपन....
और पापा मारते थे तो....
सुबकने लगता था बचपन.....
मगर अगले कुछ ही सेकेंडों में...
सब कुछ भूल भी जाता था...वो...
मम्मी के गालों की पप्पी लेता...
और पापा के गले में झूल जाता था बचपन....
सब कुछ तो क्षण-भर में ही भूल जाता था वो...
मम्मी की डांट...और पापा की मार...
और बदले में उन्हें देता था...अपना...
मीठा-मीठा दुलार...तुतलाया हुआ प्यार...!!
और भी इक ख़ास बात थी उस बचपन की...
कि हर इक बात पर हैरान जाता था बचपन...
बन्दर के चिचियाने से...घोडे के हिनहिनाने से...
मेढक के फुदकने से...और मछली के तैरने से....
वो कहीं भी बिना बताये ही चला जाता था.....
सब उसे पुकारते ही रह जाते थे....
और उसके कुछ भी ना सुनने पर....
आँखे तरेर कर उसे देखा करते...
और वो अनदेखा-सा कर...
अपनी ही मनमानियां करता जाता....
ऐसा था भाई...वो अलबेला-सा बचपन...!!
बचपन की बातें ख़त्म.....
और बड़ों की शुरू...
बड़ों के बारे में बस इतना ही...
कि जिन्दगी बचाई जा सकती थी.....
अगरचे....
बचा कर रख लिया जाता....
जिन्दगी में थोडा-सा बचपन....!!

कांटे...फूल...आदमी....!!

हम सब एक साथ ही पुराने भी हैं,और नए भी....शरीर से नए...मगर मान्यताओं से पुराने...समय के साथ थोडा नए होते जाते... शरीर से थोड़ा पुराने होता जाते...बाबा आदम जमाने की रुदिवादिताएं भी हममे हैं..और सभ्य भी हम...हम क्या हैं..हम क्यूँ हैं...हम कौन हैं...हमारे वुजूद का मतलब क्या है...??हम कभी भी विचार नहीं करते...नहीं करते ना....!!
कांटे..फूल...आदमी....!!

...आदमी का तो काम ही यही है भाई....पहले नागफनी उगाना...फ़िर उसके काँटों में ख़ुद ही फंस भी जाना...बेशक उसके बाद भी वो कुछ नहीं सीखता....फूलों से भरे पौधों में से फूल तोडे जाते हैं....और कांटे वहीं-के वहीं....फूल फ़िर उगते हैं..फिर तोड़ लिए जाते हैं......टूटे हुए फूल आदमी के पास जाकर मुरझा जाते हैं....फूल ख़त्म हो रहे हैं....और कांटे बढ़ते जा रहे....और आदमी का दमन....खून से तर......!!

प्रेम के मायने क्या हैं..!!??

हम सब एक साथ ही पुराने भी हैं,और नए भी....शरीर से नए...मगर मान्यताओं से पुराने...समय के साथ थोडा नए होते जाते... शरीर से थोड़ा पुराने होता जाते...बाबा आदम जमाने की रुदिवादिताएं भी हममे हैं..और सभ्य भी हम...हम क्या हैं..हम क्यूँ हैं...हम कौन हैं...हमारे वुजूद का मतलब क्या है...??हम कभी भी विचार नहीं करते...नहीं करते ना....!!
प्रेम के मायने क्या हैं.....!!
हम किसी को भी कोई सहारा नहीं दे पाते....सिवाय अपनी बातों के....और किसी हद तक अपने प्रेम को प्रदान करने के...जो प्रकृति ने हमें प्रदत्त किया है...हमें भी...जानवरों को भी....प्रेम हमेशा सेक्स ही नहीं होता....प्रेम एक घनिष्ठता है....प्रेम एक अंतरंगता है...प्रेम किसी के साथ अपनी एकरूपता है....प्रेम का कोई एक रूप भी नहीं....प्रेम ना तो पवित्र है....और ना पाप....वो तो बस नैसर्गिक है....और सबको ही प्रदान है...ईश्वर द्वारा...और जिनके लिए ईश्वर नहीं है...उनके लिए भी नैसर्गिकता तो है ही...प्रेम को आप कैसे व्यक्त करते हैं...क्या जो आंखों से व्यक्त किया जाए...वही प्रेम है...!!जब आप किसी को प्रेम करना चाहते हैं....तो उसे आपको कभी चूमना होता है...और कभी बाहों में ले लेना भी...कभी सहलाना भी प्रेम है...कभी...थपथपाना भी....ये प्रेम की अनिवार्य आंगिक क्रियाएं हैं...अगर आप इन्हे पाप करार देते हों तो यह आपकी मर्ज़ी है...वगरना प्रेम तो प्रेम है...और जब भी व्यक्त होगा....तब निस्संदेह कई फ़ुट की दूरी पर तो नहीं ही खड़े रहेंगे...अपने प्रेमी पात्र से....!!अब आपकी यहाँ पर भी वही सोच है.....तो सबसे पहले अपने बच्चों से ही प्यार करना छोड़ दीजिये.....प्रेम अगर कहीं-कहीं वासना भी है...तो आप उसे अपवित्र नहीं कह सकते...क्यूंकि धरती के किन्हीं वीरानों में रहते हुए भी...प्रेम के बारे में कुछ नहीं जानते हुए भी...यहाँ तक "प्रेम"नाम के इस पवित्र या अपवित्र शब्द तक को नहीं जानते हुए भी आप वही करेंगे...जो आपका मन या आपका शरीर आपसे करवाएगा...अब आपका शरीर भी अपवित्र है...और आपका मन भी ....तो फिर पूछिये उस ऊपरवाले से कि उसने आपको ऐसा "कामुक" शरीर क्यूँ दिया....और तो और उसमें ऐसा चिंतन करने वाला मन भी क्यूँ-कर बख्शा....किसी चीज़ को जरुरत भर किया जाए तो वह पवित्र है...और उससे ज्यादा.....तो वीभत्स...!!आप शरीर को घृणित मानते हैं..और प्रेम को अपवित्र.....और विश्व बाबा-आदम काल से बढ़ता ही बढ़ता चला जाता है...आपके पूर्वजों से लेकर आप सब वही करते चले रहें....हैं....और अपने बच्चों को ये सब घृणित है...ऐसा बताते हुए....आप सचमुच महान हैं......हे सभ्य और पवित्रतम मानव जी....उर्फ़ इंसान जी...उर्फ़ आदमी जी...उर्फ़ दो पाए के प्राणी जी...!!.....प्रेम का अर्थ आप-सबने क्या बना दिया है कभी सोचा भी है...तमाम शब्दों का अर्थ आपने क्या बना दिया है..कभी सोचा भी...प्यार क्या है.....कभी सच्ची-सच्ची सोचिये ना....कभी सच्चे-सच्चे प्रेम के दो बोल बोलिए ना...प्यार को ऐसा विराट रूप दीजिये ना कि ईश्वर हैरां हो जाए कि हाय इतना गहरा....!!...इतना अगाध......!!इतना असीम......!!इतना सुंदर.....अपनी सभी मानवीय....क्रियायों के बावजूद भी इतना पवित्र...और अंततः इतना पवित्र......!!(प्यार सेक्स के बावजूद पवित्र होता है...)प्यार के पंख खोल दीजिये ना....दुनिया अभी-की-अभी उड़ने को तैयार है...!!प्यार के बोल.....बोल दीजिये ना...दुनिया अभी-की अभी आपके सामने पसर जाने को तैयार है.....प्यार....प्यार...प्यार...बस प्यार....क्या आप सचमुच प्यार करने को तैयार हैं....!!??

Saturday, November 15, 2008

गुलजार....क्या हैं.....!!

......गुलजार.....क्या....हैं...??...गुलजार....बस...और क्या...!!....क्या वो गुलजार नाम के इस छोटे-से शब्द में समा भी पाते है......बल्लीमारान की वो छोटी-छोटी पोशीदा-सी गलियाँ......गुल्जार को सुनना भी एक गजब-सा अहसास है....जो उनके गले से निकल कर...हमारे दिमाग के तंतुओं से होता हुआ...हमारे दिल को साँस-सी देता हुआ...हमारे जिस्म के पोर-पोर को सराबोर कर देता है......अपने अहसास को वो जिन शब्दों में व्यक्त करते हैं....वे शब्द आम-से होते हुए भी करामात की हद तक मिश्री से भरे हो जाते हैं....गरम चाशनी की कडाही से अभी-अभी ताज़ा-ताज़ा-से निकलते हुए से.....जभी तो...गुलजार....गुलजार हैं....इस शब्द की तो जैसे अब कोई उपमा ही नहीं...हे गुलजार भाई.....खुदा ने जिन-जिन शब्दों में "सान कर" इस धरती पे भेजा है.....उसे यदि हम आत्मसात कर लें तो....तो यह धरती किसी फूलों की बगिया-सी महक उठे....आसमान के सारे सितारे उस बगिया के फूलों से खेलने आया करें....और खुदा....खुदा तो सृष्टि के अपनापे पर मद्दम-मद्दम-सा हंसता रहे...हंसता ही रहे.....और ब्रहमांड के सारे शैतान इस मेल-जोल को अवाक होकर ताकते रह जाएँ....मुहं खोले ही धरती से रुखसत हो जाए.....हम सबका जीवन....जीवन-सा सुंदर.....सुगन्धित...और मधुर हो जाए.....!!

Friday, November 14, 2008

जिन्दगी क्या है.....!!

जिन्दगी बड़ी कीमती चीज़ है....हम इसको बचाएं कैसे.....हर महफ़िल में आना-जाना चाहते हैं लेकिन जाएँ कैसे...!!
जिन्दगी एक ख्वाब की तरह उड़नछू होती जा रही है...वक्त सरपट भागता......जा रहा....!!इस दौड़ में हम कहाँ हैं....इस दौड़ का मतलब क्या है....समझ से परे है...... उलझने....जद्दोजहद.....खुशी....उदासी..... तिकड़म...हार-जीत और भी ना जाने क्या-क्या....यह खेल- सा कैसा है और इसका मतलब क्या है....समझ से बाहर है...सब कुछ समझ से ही बाहर है तो फ़िर जिंदगी क्या है...और इसके मायने हमारे लिए क्या....ये भी समझ से बाहर ही है....फ़िर हम क्या करें....एकरसता को ही जीतें रहें??.....इसका भी क्या अर्थ ?...अर्थ...अर्थ...अर्थ ....क्या करें...करें...क्या करें ??
व्याकुलता घट तो नहीं जाती...अगर ऐसा ही होता तो व्यस्तता से सारे जज्बात काबू ना हो गए होते...??.....हम वक्त को थाम कर रखना...या वक्त को अपने मन-मुताबिक...मन-माफिक काम में लेना चाहते हैं....और यह भी सच है कि वक्त कभी किसी के भी मुताबिक ना चला है...और ना ही चलेगा...अलबत्ता जब कभी सब कुछ हमारे मन मुताबिक चलता है....हमें सब कुछ अपने काबू में लगता है....और ज्यूँही इसका उलट हुआ नहीं....सब गनदम-गोल....जिन्दगी आख़िर क्या है....क्यूँ है... कब तलक है...कहाँ तक है..ये सब क्या है...क्यूँ है...क्या है...क्यूँ है....क्या है...क्यूँ है...
??