Saturday, October 31, 2009

मतदाता पहचान पत्र यानी पहचान कौन

झारखंड में मतदाता पहचान पत्रों में त्रुटियों की शिकायत आम बात है। इसी कड़ी में मुकेश जी की पीड़ा एक साथ कई सवाल खड़े करती है। क्या इस काम में लगे लोगों को अक्षर ज्ञान भी नहीं होता या फिर ये किस तकनीक के सहारे बनाया जाता है, जिसमें त्रुटियां ही अधिक होती हैं और एकदम सही-सही पहचानपत्र बन ही नहीं पाता। क्या मतदाता पहचान पत्र बनाने में सबसे निचले स्तर की सावधानी बरती जाती है। आप खुद फैसला करें कि आखिर सरकारें कर क्या रही हैं आम आदमी के साथ...नीचे जो चिट्ठी है, वह मुकेश जी की टिप्पणी है।

यह क्या नौटंकी है? कैसे होता है ये सब? आखिर मैं या मेरे जैसे लोग करें तो क्या? इसके लिये चुनाव आयोग से लेकर शासन तंत्र तक के किस जिम्मेवार तत्व को सजा मिलनी चाहिए। ऊपर गौर से देखिये, मेरा नाम मुकेश कुमार एंव मेरी पत्नी कुमारी आशा का मतदाता परिचय-पत्र है, जो आज ही चकला राजकीय विद्यालय, ओरमांझी के एक शिक्षक द्वारा बांटा गया है। इस पत्र का जो हाल है, उससे न तो मैं या मेरी पत्नी मतदान कर पायेंगे और न ही किसी अन्य सरकारी गैर सरकारी कार्यों में इस्तेमाल हो सकेगा। मेरा नाम हिन्दी में मुकेश कुमार(सही) एवं अंग्रेजी में राजेश कुमार (गलत) है। मेरे पिताजी का नाम हिन्दी में सियाशरण प्रसाद (सही) और अंग्रेजी में सिया प्रसाद (गलत) अंकित है। इसी तरह मेरी पत्नी का नाम हिन्दी में कुमारी आशा (सही) और अंग्रेजी में मधु देवी (गलत) है। इसमें पति के नाम पर वैसी ही हिन्दी अंग्रेजी वाली गलती है। अब आप ही बताइए, क्या हिन्दी में पति पत्नी का नाम अंग्रेजी में बदला हुआ कैसे हो सकता है। मैं यह सब बताने के लिए इसलिए बाध्य हूं क्योंकि पिछले तीन चार बार से मैं अपना और अपनी पत्नी का मतदाता पहचान पत्र पर सुधार करवा के थक चुका है। लेकिन नतीजा वहीं ढाक के तीन पात वाली है।
मुकेश कुमार
संचालक, सियाजी इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर एजुकेशन, सियाजी कम्युनिकेशन, एनएच-33, चकला मोड़, ओरमांझी, रांची। मो-9708570356, 0651-2576067 (फोन-फैक्स)

Tuesday, October 27, 2009

एक कविता जो सोचने को मजबूर कर दे

डॉ भारती कश्यप ने यह मार्मिक स्लाइड शो प्रेषित किया है, जो बताती है कि आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में हम अपने दोस्तों और जाननेवालों से किस कदर दूर होते चले जा रहे हैं। क्या हम स्वविकास की अंधी दौड़ में शामिल हो गये हैं। सोचिये और हो सके तो इसके निहितार्थ को समझते हुए अपनों से दूर होने की जो कोशिश हो चुकी है, उस खाई को पाटने की दिशा में आगे बढ़िये।



Tuesday, October 20, 2009

विश्वास से मिलती है जीत

डॉ भारती कश्यप एक बार फिर हमसे रू--रू हैं। इस बार उन्होंने आशावादी दृष्टिकोण से मिलनेवाली जीत की मिसाल पेश की है। एक कहानी के माध्यम से उन्होंने यह बताया है कि कैसे एक जानवर भी हिम्मत देने से प्रकृति के नियम के विपरीत अपने लिये राह बना लेता है। कहानी अंग्रेजी में है, लेकिन भाषा इतनी सरल है कि उसे हू--हू प्रकाशित करना ही ठीक लगा। आप भी डॉ भारती कश्यप के आशावादी रुख का रसास्वादन करें।




This is 'Faith'

Most of us think that money is the only capital needed for a successful living. There are many like Time, Hard Work, Intelligence and Good Health, if properly utilised, can lead us to prosperity and happiness. Of course, Faith is one of the Greatest Capital bestowed upon mankind by God!

Dr Bharti Kashyap
This dog was born on 12-24-02. He was born with 3 legs - 2 healthy hind legs and 1 abnormal front leg which need to be amputated. He of course could not walk when he was born. Even his mother did not want him. His first owner also did not think that he would survive. Therefore, he was thinking of 'putting him to sleep'. By this time, his present owner, Jude Stringfellow, met him and wanted to take care of him. She was determined to teach and train this dog to walk by himself. Therefore she named him 'Faith'. In the beginning, she put Faith on a surfing board to let him feel the movements. Later she used peanut butter on a spoon as a lure and reward for him to stand up and jump around. Even the other dog at home also helped to encourage him to walk. Amazingly, only after 6 months, like a miracle, Faith learned to balance on his 2 hind legs and jumped to move forward. After further training in the snow, he now can walk like a human being. Faith loves to walk around now. No matter where he goes, he just attracts all the people around him. He is now becoming famous on the international scene. He has appeared on various newspapers and TV shows. There is even one book entitled 'With a little faith' being published about him.. He was even considered to appear in one of Harry Potter movies. His present owner Jude Stringfellew has given up her teaching post and plans to take him around the world to teach that even without a perfect body, one can have a perfect soul'. In life there are always undesirable things. Perhaps one will feel better if one changes the point of view from another direction. I hope this message will bring fresh & new ways of thinking to everyone and that everyone can appreciate and be thankful for each beautiful day that follows. Faith is the continual demonstration of the Strength of Life.
Life's battles don't always go, To the stronger or faster man, But soon or late the man who wins Is the man WHO THINKS HE CAN!

Wednesday, October 14, 2009

पशुओं का अखबार

कथाकार रत्नेश कुमार की यह लघु कथा आपको अंदर से सोचने को मजबूर न कर दे, तो कहियेगा कई पत्रकारों ने इस कथा का ई-मेल से आदान प्रदान किया। रजत दा ने यह मेल मुझे भेजा और कहा कि इसे रांचीहल्ला में प्रकाशित करो। आप भी रत्नेश जी की लेखनी का आनंद उठाइये।

पशु समाज के मन-मस्तिष्क में आया कि मानव समाज की तरह अपना भी एक अख़बार हो। मनुष्य के अख़बार में हमारे पशु समाज का कवरेज कम होता है। यदि हमारे पशु समाज का अपना अख़बार होगा तो अधिक-से-अधिक कवरेज होगा। भेड़िया बोला, "रुपया मेरा, किंतु संपादक मेरी मर्जी का होगा। सियार ने कहा, "रुपया आपका होगा, तो निःसंदेह संपादक आपकी मर्जी का ही होगा। भेड़िया मुस्कराया। सियार ने सिर हिलाया।

शेर गरजा, "मेरे रहते दूसरा कैसे संपादक बन सकता है?"

सियार हाथ जोड़कर बोला, "क्षमा करें वनराज, आप शासक हैं, शासन कीजिए। संपादक का काम अपने अधीनस्थ सेवक को दीजिए। शिकायत का मौका न दूँगा। यदि शिकायत हो तो मेरा सिर ले लीजिए। यह सिर आपका ही तो है। शेर सियार की विनम्रता से प्रभावित हुआ। उसने कहा, "सियार जी, आप में एक संपादक का जन्मजात लक्षण है। हमें आपके लक्षण और प्रतिभा का लाभ उठाना चाहिए।" जब तक शेर बोलता रहा, सियार भक्त हनुमान की तरह हाथ जोड़े रहा और प्रभु-प्रभु के सदृश वनराज-वनराज करता रहा। मन-ही-मन मुस्कराते भेड़िया की आँख़ें सियार की ओर उठीं। सियार गद्गद् हो गया। उसे लगा कि उसे संपादक का नियुक्ति पत्र मिल गया। शेर को शेरनी ने इशारे से बुला लिया। उसके दवा का वक्त हो गया था। भेड़िया और सियार ने बैलों की नियुक्ति उप-संपादक के पद पर की और कुत्तों को मुख्य/विशेष संवाददाता बनाया। चूँकि कुत्तों में सूंघने की शक्ति अधिक होती है। समाचार सूंघना कुत्तों के ही वश का है। कौओं को भी कार्यालय संवाददाता/स्टिंगर बनाया गया, जिससे आने-जाने वालों, उद्घाटन समापन करनेवालों की सूचना-ऊचना, ख़बर-उबर मिल सके। कोयल ने सियार से संपर्क किया। सियार ने कोयल को बहुत मुश्किल से मिलने का समय दिया। उसके बाद मिलने पर कई दिन आज-कल कर उसे दौड़ाता रहा। वह अंततः बोला, "अख़बार में तुम्हारा क्या काम? कोयल ने कहा, "कला, साहित्य और संस्कृति का एकाध पन्ना तो रहेगा ही। वह बोला, "मैनेजमेंट पक्षी को लेने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। कौओं पर ही ब़डी मुश्किल से राजी हुआ।

जहां तक कला-संस्कृति की बात है, तो बिल्ली है ही। मैनेजमेंट म्याऊं पसंद है। उसे कूक से परहेज है। मैं तो चाहता हूँ कि तुम अख़बार का अंग बनो। तुम्हारे रहने से अख़बार पढ़ने वालों को लगेगा कि वसंत है, मैनेजमेंट का डिसीजन अख़बार में... नो एडजस्टमेंट विदाउट मैनेजमेंट्स कॉन्सेंट। कोयल लौट गयी। सियार जी के संपादन में अख़बार निकला और निकल रहा है। शेर बिस्तर पर है। शेरनी सेवा कर रही है। भेड़िया साहब प्रसन्न हैं।

(वागर्थ-पृष्ठ संख्या 116, अक्तूबर, 2009 से साभार)

पुरुषोत्तम ....


(यह थोड़ी पुरानी कविता है)

त्याग दिया वैदेही को
और जंगल में भिजवाया
एक अधम धोबी के कही पर
सीता को वन वन भटकाया
उस दुःख की क्या सीमा होगी
जो जानकी ने पाया
कितनी जल्दी भूल गए तुम
उसने साथ निभाया

उसने साथ निभाया
जब तुम कैकेयी को खटक रहे थे
दर दर ठोकर खाकर,
वन वन भटक रहे थे



अरे, कौन रोकता उसको !!
कौन रोकता उसको !!
वह रह सकती थी राज-भवन में
इन्कार कर दिया था उसने
तभी तो थी वह अशोक-वन में !
कैसे पुरुषोत्तम हो तुम !
क्या साथ निभाया तुमने !
जब निभाने की बारी आई
तभी मुँह छुपाया तुमने ?

छोड़ना ही था सीता को
तो खुद छोड़ कर आते
अपने मन की उलझन
एक बार तो उसे बताते !
तुम क्या जानो कितना विशाल
ह्रदय है स्त्री जाति का
समझ जाती उलझन सीता
अपने प्राणप्रिय पति का

चरणों से ही सही, तुमने
अहिल्या का स्पर्श किया था
पर-स्त्री थी अहिल्या
क्या यह अन्याय नहीं था ?
तुम स्पर्श करो तो वह 'उद्धार' कहलाता है
कोई और स्पर्श करे तो,
'स्पर्शित' !
अग्नि-परीक्षा पाता है

छल से सीता को छोड़कर पुरुष बने इतराते हो !
भगवान् जाने कैसे तुम 'पुरुषोत्तम' कहलाते हो
एक ही प्रार्थना है प्रभु !
इस कलियुग में मत आना
गली गली में रावण हैं
मुश्किल है सीता को बचाना
वन उपवन भी नहीं मिलेंगे
कहाँ छोड़ कर आओगे !
क्योंकि, तुम तो बस,
अहिल्याओं का उद्धार करोगे
और सीताओं को पाषाण बनाओगे

Tuesday, October 13, 2009

हिंदुत्व ...तेरी कहानी....


बहुत पुरानी बात है
पृथ्वी के पूर्वी कोने में
एक अति तेजस्वी बालक ने
जन्म लिया
ओजपूर्ण था मुखमंडल उसका
सभ्यता की पहली धोती
उसने ही थी पहनी
ज्ञान-विज्ञान से बना
तन उसका
कीर्ति पताका लहराई
ऊंचे गगन में
यशगान की धुन फ़ैल गयी
संपूर्ण भुवन में

धीरे धीरे वो श्रेष्ठ बालक
अति सुन्दर युवक बन गया
उसकी ज्ञान भरी बातें
लोग गाने लगे
इस कोने से उस कोने तक
पहुँचाने लगे और
धीरे-धीरे अपनी बातें भी
मिलाने लगे

हजारों वर्ष
हो गयी उम्र उसकी
बोल नहीं सकता वह
खो दी उसने अपनी वाणी
आज भी लोग
उसके नाम के गीत गा रहे हैं
अब उसकी नहीं
सिर्फ
अपनी सुना रहे हैं
नाम लेले कर उसका
थोथा ज्ञान फैला रहे हैं
जो बात कभी नहीं कही
उसके नाम उद्धरित करते जा रहे हैं
वह मूक चुप-चाप सब कुछ
देख रहा है
सोचता है-
क्या मैंने कहा था ?
और ये क्या कह रहा है ?

इस आस से कि शायद
उसकी वाणी लौट आये
फिर वो इन मूर्खों
को समझाए
जीए जा रहा है
लांछन उन व्याख्याओं का
जो उसने कभी नहीं दिया
अपने सर लिए जा रहा है

सच्चाई के पत्थरों से
जो सीधी सरल सी राह
उसने बनायीं थी
जिसमें संस्कारों के फूल और
सहिष्णुता कि छाया, छाई थी
उस मार्ग से कई वक्र रास्ते
लोगों ने लिए हैं निकाल
अंधविश्वास,छुआ-छूत
आदि राहों का
बिछा दिया अकाट्य जाल
जिसकी परिधि
ऐसी फैली कि
फैलती ही गयी
सत्य मार्ग धूल-धूसरित होकर
इस चक्रव्यूह में लुप्त हुआ
संस्कारों के फूल मुरझाये
वेद-पुराण सब गुप्त हुआ

सच ही तो है
एक झूठ सौ बार कहो तो
सबने सच मानी है है
हिन्दुत्व !
तेरी भी यही कहानी है

Sunday, October 11, 2009

मुहल्ले का नोबेल

जब से ओबामा को शांित के िलए नोबेल िमलने की खबर अायी है मेरे मुहल‍ले का छुट‍टन भी मूंछ पर ताव िदये घूम रहा है. छुट्टन यूं तो काफी फेमस है. या यूं कहें फेमस हो गया है. कैसे यह अलग कहानी है. मुहल्ले में उसकी एक अलग तरह की इमेज है. मिहलाओं का सम्म‍ान करता है ओबामा की ही तरह. घूरता है पर बड़े शरीफ अंदाज में. कनखियों से. कभी फब्तियां नहीं कसता, पर जबान ही तो है कभी-कभी फिसल जाती है. कुछ अल बल बोला ही जाता है. लेकिन टेंशन की बात नहीं है. अब जब से उसने यह खबर सुनी है कि ओबामा को नोबेल मिला है उसकी खुशी का ठिकाना नहीं है. कहता फिर रहा है कि अब उसे भी नोबल मिलने का रास्ता साफ हो गया है. वह भी दावेदारी कर सकता है. मैंने पूछा रे मूरख तुझे क्यों मिलेगा नोबेल. तुझमें एेसी कौन सी बात है. तूने कहां शांित फैलायी है. जब देखो तब कहीं न कहीं फसाद कराता फिरता है फिर तुझे क्योव नोबेल मिलेगा. उसने झट से कला भला ओबामा ने कहां शांति फैलायी है. उसने एेसा कौन सा तीन मार लिया है. फिर उसने अपने कारनामों की लिस्ट जारी की. सूची काफी लंबी है. कुछ नमूने पेश हैं. मो इस्माइल के बेटे असलम और सिन्हा साहब के बेटे विक्की के बीच जब खेल-खेल मेz मारपीट इतनी बढ़ गयी थी और दोनों ओर से लाठियां निकल गयी थीं तब मैंने ही तो दोनों के बीच में शांति करायी थीं. दो भाइयोव के झगड़े तो कई बार सुलझा चुका हूं. मुहल्ले में पानी को लेकर जब घमासान मचा था तब भी तो मैं ही सबसे अागे खड़ा था. अब बताइये इतने महान काम के बाद भी मुझे कोई पुरस्कार न मिले तो यह अन्याय ही होगा न. छोटे मोटे पुरस्कार तो कई बार मिल चुके हैं. कई बार पुिलस ने भी अपने अंदाज में सम्मानित किया है. अब शांति के इस झंडाबरदार को नोबेल नहीं मिलेगा तो फिर किसे मिलेगा. कम से कम मुहल्ले का नोबेल तो छुट्टन को िदया ही जाना चाहिए.

Saturday, October 10, 2009

आज उर्मिला बोलेगी |


सावधान ! हे रघुवंश
वो शब्द एक न तोलेगी
मूक बधिर नहीं,कुलवधू है
आज उर्मिला बोलेगी |

कैकेयी ने दो वरदान लिए
श्री दशरथ ने फिर प्राण दिए
रघुबर आज्ञा शिरोधार्य कर
वन की ओर प्रस्थान किये
भ्रातृप्रेम की प्रचंड ऊष्मा
फिर लखन ह्रदय में डोल गई
मूक बधिर नहीं, कुलवधू है
आज उर्मिला बोलेगी |

रघुकुल की यही रीत बनाई
भार्या से न कभी वचन निभाई
पितृभक्ति है सर्वोपरि
फिर पूजते प्रजा और भाई
पत्नी का जीवन क्या होगा
ये सोच कभी न गुजरेगी
मूक बधिर नहीं, कुलवधू है
आज उर्मिला बोलेगी |

चौदह बरस तक बाट जोहाया
एक पत्र भी नहीं पठाया
नवयौवन की दहलीज़ फांद कर
अधेड़ावस्था में जीवन आया
इतनी रातें ? कितने आँसू ?
की कीमत क्या अयोध्या देगी ?
मूक बधिर नहीं, कुलवधू है
आज उर्मिला बोलेगी |

हाथ जोड़ कर विनती करूँ मैं
सातों जनम मुझे ही अपनाना
परन्तु अगले जनम में लक्ष्मण
राम के भाई नहीं बन जाना
एक जनम जो पीड़ा झेली
अगले जनम न झेलेगी
मूक बधिर नहीं, कुलवधू है
आज उर्मिला बोलेगी |

Friday, October 9, 2009

शूर्पनखा !


शूर्पनखा ! हे सुंदरी तू प्रज्ञं और विद्वान्,
किस दुविधा में गवाँ आई तू अपना मान-सम्मान
स्वर्ण-लंका की लंकेश्वरी, भगिनी बहुत दुराली
युद्ध कला में निपुण, सेनापति, पराक्रमी राजकुमारी
राजनीति में प्रवीण, शासक और अधिकारी
बस प्रेम कला में अनुतीर्ण हो, हार गई बेचारी
इतनी सी बात पर शत्रु बना जहान
शूर्पनखा ! हे सुंदरी तू प्रज्ञं और विद्वान्,

क्या प्रेम निवेदन करने को, सिर्फ मिले तुझे रघुराई ?
भेज दिया लक्ष्मण के पास, देखो उनकी चतुराई !
स्वयं को दुविधा से निकाल, अनुज की जान फँसाई !
कर्त्तव्य अग्रज का रघुवर ने, बड़ी अच्छी तरह निभाई !
लखन राम से कब कम थे, बहुत पौरुष दिखलायी !
तुझ पर अपने शौर्य का, जम कर जोर आजमाई !
एक नारी की नाक काट कर, बने बड़े बलवान !
शूर्पनखा ! हे सुंदरी तू प्रज्ञं और विद्वान्,



ईश्वर थे रघुवर बस करते ईश का काम
एक मुर्ख नारी का गर बचा लेते सम्मान
तुच्छ प्रेम निवेदन पर करते न अपमान
अधम नारी को दे देते थोड़ा सा वो ज्ञान
अपमानित कर, नाक काट कर हो न पाया निदान
युद्ध के बीज ही अंकुरित हुए, यह नहीं विधि का विधान
हे शूर्पनखा ! थी बस नारी तू, खोई नहीं सम्मान
नादानी में करवा गयी कुछ पुरुषों की पहचान

एकादशानन


(एक पुरानी रचना है )
अक्सर मेरे विचार, बार बार जनक के खेत तक जाते हैं
परन्तु हर बार मेरे विचार, कुछ और उलझ से जाते हैं
जनक अगर सदेह थे, तो विदेह क्योँ कहाते हैं ?
क्योँ हमेशा हर बात पर हम रावण को दोषी पाते हैं ?
मेरे विचार, फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं

क्योँ दशानन रक्तपूरित कलश जनक के खेत में दबाता है ?
क्योँ जनक के हल का फल उस घड़े से ही जा टकराता है ?
कैसे रावण के पाप का घड़ा कन्या का स्वरुप पाता है ?
क्योँ उस कन्या को जनकपुर सिंहासन बेटी स्वरुप अपनाता है ?
किस रिश्ते से उस बालिका को जनकपुत्री बताते हैं ?
मेरे विचार, फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं

क्योँ रावण सीता स्वयंवर में बिना बुलाये जाता है ?
क्योँ उस सभा में होकर भी वह स्पर्धा से कतराता है ?
क्योँ उसको ललकार कर प्रतिद्वन्दी बनाया जाता है ?
क्योँ लंकापति शिवभक्त, शिव धनुष तोड़ नहीं पता है ?
क्योँ रावण की अल्पशक्ति पर शंकर स्वयम् चकराते हैं ?
मेरे विचार, फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं

क्योँ इतना तिरस्कृत होकर भी, वह दंडकवन को जाता है ?
किस प्रेम के वश में वह, सीता को हर ले जाता है ?
कितना पराक्रमी, बलशाली, पर सिया से मुंहकी खाता है ?
क्योँ जानकी को राजभवन नहीं, अशोकवन में ठहराता है ?
क्या छल-छद्म पर चलने वाले इतनी जल्दी झुक जाते हैं ?
मेरे विचार, फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं

क्योँ इतिहास दशानन को इतना नीच बताता है ?
फिर भी लंकापति मृत्युशैया पर रघुवर को पाठ पढ़ाता है
वह कौन सा ज्ञान था जिसे सुन कर राम नतमस्तक हो जाते हैं ?
चरित्रहीन का वध करके भी रघुवर क्यों पछताते हैं ?
रक्तकलश से कन्या तक का रहस्य समझ नहीं पाते हैं
इसीलिए तो मेरे विचार जनक के खेत तक जाते हैं