दोस्तों....आप सबको मेरा असीम....अगाध प्रेम.....!!
मेरे प्यारे दोस्तों,आप सबको भूतनाथ का असीम और निर्बाध प्रेम,
मेरे दोस्तों.......हर वक्त दिल में ढेर सारी चिंताए,विचार,भावनाएं या फिर और भी जाने क्या-क्या कुछ हुआ करता है....इन सबको व्यक्त ना करूँ तो मर जाऊँगा...इसलिए व्यक्त करता रहता हूँ,यह कभी नहीं सोचता कि इसका स्वरुप क्या हो....आलेख-कविता-कहानी-स्मृति या फिर कुछ और.....उस वक्त होता यह कि अपनी पीडा या छटपटाहट को व्यक्त कर दूं....और कार्य-रूप में जो कुछ बन पड़ता है,वो कर डालता हूँ....कभी भी अपनी रचना के विषय में मात्रा,श्रृंगारिकता या अन्य बात को लेकर कुछ नहीं सोचता,बस सहज भाव से सब कुछ लिखा चला जाता मुझसे....आलोचना या प्रशंसा को भी सहज ही लेता हूँ....अलबत्ता इतना अवश्य है कि इन दोनों ही बातों में आपका प्रेम है,और वो प्रेम आपके चंद अक्षरों में मुझपर निरुपित हो जाता है.....और उस प्रेम से मैं आप सबका अहसानमंद होता चला जाता हूँ...हुआ चला जा रहा हूँ....दबता चला जा रहा हूँ...और बदले में मैंने इतना प्रेम भी नहीं दिया....मगर आज आप सबको यही कहूंगा कि आई लव यू.....मुझे आप-सबसे बहुत प्रेम है....और यह मुझसे अनजाने में ही हो गया है....सो मुझे जो बहुत ना भी चाहते हों,उन्हें भी क्षमा-याचना सहित मेरा यह असीम प्रेम पहुंचे...और वो मुझे देर-अबेर कह ही डालें आई लव यू टू.....खैर आप सबका अभिनन्दन....मैं,सच कहूँ तो अपनी यह भावना सही-सही शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहा....सो इसे दो लाईनों में व्यक्त करे डालता हूँ.....
"मेरे भीतर यह दबी-दबी-सी आवाज़ क्यूँ है,
मेरी खामोशी लफ्जों की मोहताज़ क्यूँ है !!
अरे यह क्या लाईने आगे भी बनी जा रही हैं....लो आप सब वो भी झेलो....
"मेरे भीतर यह दबी-दबी-सी आवाज़ क्यूँ है,
मेरी खामोशी लफ्जों की मोहताज़ क्यूँ है !!
बिना थके हुए ही आसमा को नाप लेते हैं
इन परिंदों में भला ऐसी परवाज़ क्यूं है !!
गो,किसी भी दर्द को दूर नहीं कर पाते
दुनिया में इतने सारे सुरीले साज़ क्यूं है !!
जिन्हें पता ही नहीं कि जम्हूरियत क्या है
उन्हीं के सर पे जम्हूरियत का ताज क्यूं है !!
जो गलत करते हैं,मिलेगा उन्हें इसका अंजाम
तुझे क्यूं कोफ्त है"गाफिल",तुझे ऐसी खाज क्यूं है !!
जिंदगी-भर जिसके शोर से सराबोर थी दुनिया
आज वो "गाफिल" इतना बेआवाज़ क्यूं है !!
सब कहते थे तुम जिंदादिल बहुत हो "गाफिल"
जिस्म के मरते ही इक सिमटी हुई लाश क्यूं है !!
उफ़!वही-वही चीज़ों से बोर हो गया हूँ मैं "गाफिल"
कल तक थी जिंदगी,थी,मगर अब आज क्यूं है ??
आप सबका बहुत-बहुत-बहुत आभार....आप सबका "भूतनाथ"
http://baatpuraanihai.blogspot.com/
Sunday, May 31, 2009
दोस्तों....आप सबको मेरा असीम....अगाध प्रेम.....!!
Wednesday, May 27, 2009
आई लव यू दद्दू,सेम तू यू बुद्दू.....!!
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
अरे सुनो ना दद्दू.....!!
अबे....बोल बे बुद्धू....!!
एक सरकार बनाओ ना.....!!
बात क्या है,बताओ ना....!!
हमको समर्थन देना है...!!
मगर हमको नहीं लेना है....!!
ले लो ना समर्थन हमसे.....!!
अरे नहीं लेना समर्थन तुमसे....!!
लेकिन हम तो दे के रहेंगे.....!!
लेकिन हम तुमको कोई पद नहीं देंगे....!!
पद की किसको पड़ी है दद्दू...!!
तो समर्थन किस बात का बुद्दू...??
हम सांप्रदायिक सरकार नहीं चाहते....!!
और हम धर्म-निरक्षेप सांप्रदायिक कहलाते हैं....!!
तो क्या हुआ धर्म-निरक्षेप तो हैं ना...!!
लेकिन हम तो इसका अर्थ भी नहीं जानते....!!
तो क्या हुआ धर्म-निर तो हैं ना...!!
लेकिन हमने इसके लिए कभी कुछ किया ही नहीं.....!!
तो क्या हुआ धर्म-निरक्षेप तो हैं ना...
लेकिन इस धर्म-निरक्षेपता का कोई मतलब भी तो हो.....!!
अरे aapki मैडम है ना...इतना ही बहुत है.....!!
लेकिन हमारी मैडम तो सरकार चलाती नहीं....??
तो क्या हुआ वो आपको उँगलियों पर तो नचाती है.....!!
इस नाचने में दर्द बहुत गहरा है बुद्दू.....!!
और सरकार चलाने का सुख भी तो गहरा है ना दद्दू ....!!
लेकिन हमें तुझसे समर्थन नहीं लेना है भाई.....!!
लेकिन हम तुम्हारे ही साथ हैं भाई.....!!
तुम और हमारे साथ...??....अबे कैसा साथ...??
तू तो सदा हमसे लड़ता ही रहा है....!!
बाहर भी दुश्मनों का साथ ही दिया है....!!
आपको ग़लत फहमी है दद्दू.....!!
वो तो राजनीति की बिसात थी......!!
तो अब और क्या है भाई ...??
अब तो आप ही हमारे बाप हो......!!
और मैडम ही है हमारी माई.....!!
अबे तू आदमी है कि गिरगिट....??
तूने राजनीति को बना दिया है किरकिट....!!
अरे दद्दू, हम ना आदमी हैं ना गिरगिट.....!!
असल में राजनीति ही है हमारी सर्विस.....!!
अपनी रऔ में जब हम आ जाते हैं...!!
देश को भी पका कर खा जाते हैं....!!
तुम भी तो दद्दू हमारी ही जात के हो.....!!
आज थोड़ा दम हो गया hai तो.....
हमही से दायें-बाएँ होने लगे......!!
दद्दू......कुछ आगे का भी देख लो...
अपना भला-बुरा का भी सोच लो.....!!
कुछ महीनों में ही तेरे परिवार के लोग.....
तेरी नैया डूबोने लगेंगे....!!
और तब तू और तेरी मैडम.....
हमें खोजने निकल पड़ेंगे......!!
अरे हाँ मेरे बच्चे......कहता तो तू ठीक है!!!
अरे बुद्दू ,मैं तो तुझसे मज़ाक कर रहा था.....!!
कोई सीरिअस थोड़ा ना कह रहा था....!!
आ जा मेरे बच्चे,मेरे गले लग जा.....!!
मेरी गोद में आकर बैठ जा.....!!
अरे वाह मेरे दद्दू.....!!
तुम तो काफी समझदार हो गए हो.....!!
अरे पुत्तर.......!!
साठ सालों की उम्र का है यह असर.....!!
इसी समझदारी से तो हमने तय किया है....
राजनीति का यह दुश्वार सफर.....!!
दद्दू ....!!मेरे प्यारे दद्दू....!!
पुत्तर....!!मेरे प्यारे पुत्तर........!!
आई लव यू दद्दू .....!!
सेम टू यू बुद्दू.....!!
अरे सुनो ना दद्दू.....!!
अबे....बोल बे बुद्धू....!!
एक सरकार बनाओ ना.....!!
बात क्या है,बताओ ना....!!
हमको समर्थन देना है...!!
मगर हमको नहीं लेना है....!!
ले लो ना समर्थन हमसे.....!!
अरे नहीं लेना समर्थन तुमसे....!!
लेकिन हम तो दे के रहेंगे.....!!
लेकिन हम तुमको कोई पद नहीं देंगे....!!
पद की किसको पड़ी है दद्दू...!!
तो समर्थन किस बात का बुद्दू...??
हम सांप्रदायिक सरकार नहीं चाहते....!!
और हम धर्म-निरक्षेप सांप्रदायिक कहलाते हैं....!!
तो क्या हुआ धर्म-निरक्षेप तो हैं ना...!!
लेकिन हम तो इसका अर्थ भी नहीं जानते....!!
तो क्या हुआ धर्म-निर तो हैं ना...!!
लेकिन हमने इसके लिए कभी कुछ किया ही नहीं.....!!
तो क्या हुआ धर्म-निरक्षेप तो हैं ना...
लेकिन इस धर्म-निरक्षेपता का कोई मतलब भी तो हो.....!!
अरे aapki मैडम है ना...इतना ही बहुत है.....!!
लेकिन हमारी मैडम तो सरकार चलाती नहीं....??
तो क्या हुआ वो आपको उँगलियों पर तो नचाती है.....!!
इस नाचने में दर्द बहुत गहरा है बुद्दू.....!!
और सरकार चलाने का सुख भी तो गहरा है ना दद्दू ....!!
लेकिन हमें तुझसे समर्थन नहीं लेना है भाई.....!!
लेकिन हम तुम्हारे ही साथ हैं भाई.....!!
तुम और हमारे साथ...??....अबे कैसा साथ...??
तू तो सदा हमसे लड़ता ही रहा है....!!
बाहर भी दुश्मनों का साथ ही दिया है....!!
आपको ग़लत फहमी है दद्दू.....!!
वो तो राजनीति की बिसात थी......!!
तो अब और क्या है भाई ...??
अब तो आप ही हमारे बाप हो......!!
और मैडम ही है हमारी माई.....!!
अबे तू आदमी है कि गिरगिट....??
तूने राजनीति को बना दिया है किरकिट....!!
अरे दद्दू, हम ना आदमी हैं ना गिरगिट.....!!
असल में राजनीति ही है हमारी सर्विस.....!!
अपनी रऔ में जब हम आ जाते हैं...!!
देश को भी पका कर खा जाते हैं....!!
तुम भी तो दद्दू हमारी ही जात के हो.....!!
आज थोड़ा दम हो गया hai तो.....
हमही से दायें-बाएँ होने लगे......!!
दद्दू......कुछ आगे का भी देख लो...
अपना भला-बुरा का भी सोच लो.....!!
कुछ महीनों में ही तेरे परिवार के लोग.....
तेरी नैया डूबोने लगेंगे....!!
और तब तू और तेरी मैडम.....
हमें खोजने निकल पड़ेंगे......!!
अरे हाँ मेरे बच्चे......कहता तो तू ठीक है!!!
अरे बुद्दू ,मैं तो तुझसे मज़ाक कर रहा था.....!!
कोई सीरिअस थोड़ा ना कह रहा था....!!
आ जा मेरे बच्चे,मेरे गले लग जा.....!!
मेरी गोद में आकर बैठ जा.....!!
अरे वाह मेरे दद्दू.....!!
तुम तो काफी समझदार हो गए हो.....!!
अरे पुत्तर.......!!
साठ सालों की उम्र का है यह असर.....!!
इसी समझदारी से तो हमने तय किया है....
राजनीति का यह दुश्वार सफर.....!!
दद्दू ....!!मेरे प्यारे दद्दू....!!
पुत्तर....!!मेरे प्यारे पुत्तर........!!
आई लव यू दद्दू .....!!
सेम टू यू बुद्दू.....!!
Monday, May 25, 2009
रास्ता होता है अपनी जगह....बस नज़र नहीं आता.....!!
कभी-कभी ऐसा भी होता है
हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता.....!!
और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम....
खीजते हैं,परेशान होते हैं...
चारों तरफ़ अपनी अक्ल दौडाते हैं
मगर रास्ता है कि नहीं ही मिलता....
अपने अनुभव के घोडे को हम....
चारों दिशाओं में दौडाते हैं......
कितनी ही तेज़ रफ़्तार से ये घोडे
हम तक लौट-लौट आते हैं वापस
बिना कोई मंजिल पाये हुए.....!!
रास्ता है कि नहीं मिलता......!!
हमारी सोच ही कहीं गूम हो जाती है......
रास्तों के बेनाम चौराहों में.....
ऐसे चौराहों पर अक्सर रास्ते भी
अनगिनत हो जाया करते हैं..........
और जिंदगी एक अंतहीन इम्तेहान.....!!!
अगर इसे एक कविता ना समझो
तो एक बात बताऊँ दोस्त.....??
रास्ता तो हर जगह ही होता है.....
अपनी सही जगह पर ही होता है.....
बस.....
हमें नज़र ही नहीं आता......!!!!
हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता.....!!
और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम....
खीजते हैं,परेशान होते हैं...
चारों तरफ़ अपनी अक्ल दौडाते हैं
मगर रास्ता है कि नहीं ही मिलता....
अपने अनुभव के घोडे को हम....
चारों दिशाओं में दौडाते हैं......
कितनी ही तेज़ रफ़्तार से ये घोडे
हम तक लौट-लौट आते हैं वापस
बिना कोई मंजिल पाये हुए.....!!
रास्ता है कि नहीं मिलता......!!
हमारी सोच ही कहीं गूम हो जाती है......
रास्तों के बेनाम चौराहों में.....
ऐसे चौराहों पर अक्सर रास्ते भी
अनगिनत हो जाया करते हैं..........
और जिंदगी एक अंतहीन इम्तेहान.....!!!
अगर इसे एक कविता ना समझो
तो एक बात बताऊँ दोस्त.....??
रास्ता तो हर जगह ही होता है.....
अपनी सही जगह पर ही होता है.....
बस.....
हमें नज़र ही नहीं आता......!!!!
Saturday, May 23, 2009
संसद में बढ़ता वामा का रुतबा
मोनिका गुप्तापंद्रहवीं लोकसभा चुनाव की शांतिपूर्ण समाप्ति के बाद दूसरी बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार का गठन हो चुका है। अपनी आर्थिक नीतियों के लिए विख्यात मनमोहन सिंह से आधी आबादी के नेतृत्व का कहां तक कल्याण हो पायेगा, यह सवाल अब भी शेष है। हमेशा की तरह विवादों में रहने वाला महिला आरक्षण विधेयक क्या इस बार भी विवाद का शिकार होगा या फिर कोई सकारात्मक परिणाम निकलेगा। इस बात का महत्व इस चुनाव के बाद इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अब तक के भारतीय इतिहास में इस बार सबसे ज्यादा महिला प्रत्याशियों का चुनाव हुआ है। पहले के सभी रिकॉर्ड को तोड़ते हुए इस बार 61 महिला सांसद बनकर आयी है। इनमें से 17 ऐसी महिलाएं जो 40 से कम उम्र की है और इन सदस्यों में से 50 फीसद ऐसी महिलाएं जिन्होंने राजनीति की शुरुआत ज़मीनी स्तर से की है। सांसद बनकर आने वाली कुल महिलाओं में 23 कांग्रेस से हैं और 13 भारतीय जनता पार्टी से। पूरे देश में सबसे अधिक महिला सांसदों की भागीदारी उत्तर प्रदेश से है जहां से 13 महिलाएं सांसद है। उसके बाद पश्चिम बंगाल से-सात। वर्ष 2009 में 556 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था। अब तक सबसे कम छठीं लोकसभा चुनाव (1977-80) में 3.8 फीसद महिलाएं सांसद चुनी गयी थीं। इस बार सबसे अधिक लगभग 10 फीसद महिलाएं चुनी गयी हैं। प्रथम लोकसभा चुनाव (1952-57) में 4.4 फीसद और तेरहवीं लोकसभा चुनाव (1999-2004) में 9.2 फीसद महिलाओं की हिस्सेदारी रही थी। सवाल यह है कि साल दर साल बढ़ती महिला सांसदों की संख्या क्या महिलाओं के उद्धार के लिए नयी राह खोल पायेगी। इन महिलाओं के नेतृत्व में क्या ग्रामीण महिलाओं को संरक्षण मिलेगा या फिर अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ती पंचायतों की ग्रामीण महिलाएं हमेशा की तरह संघर्षशील बनी रहेंगी। वर्ष 1992 के संविधान संशोधन द्वारा लाये गये महिला आरक्षण विधेयक ने जहां महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया था, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रो में महिला पंचायतों की बढ़ती संख्या इसका पुरजोर समर्थन कर रही है। हालांकि, केंद्र में अब तक विवादों में घिरा महिला आरक्षण विधेयक अपने अस्तित्व में नहीं आ पाया है, लेकिन कुछ राज्यों ने इसके लिए शुरुआत कर दी है। इनमें सबसे आगे है कर्नाटक। उसके बाद मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, बिहार और हाल ही में उत्तराखंड ने भी पंचायत स्तर पर 33 फीसद आरक्षण की घोषणा कर दी है। इतना ही नहीं ये राज्य 50 फीसद आरक्षण पर जोर देने की ओर बढ़ रहे हैं, जो इस दिशा में सकारात्मक पहल है। अब चूंकि राज्यों में और खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने सकारात्मक सोच को बल दिया है। लेकिन आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि 61 महिला सासंद के बलबूते इस विधेयक का क्या होता है और देश के हर हिस्से में हर तरह से महिलाएं कैसे और कितनी सक्षम और मजबूत हो पाती हैं।
Friday, May 22, 2009
हम तो बस करतब दिखा रहे हैं......!!
चार बांसों के ऊपर झूलती रस्सी.....
रस्सी पर चलता नट....
अभी गिरा, अभी गिरा, अभी गिरा
मगर नट तो नट है ना
चलता जाता है....
बिना गिरे ही
इस छोर से उस छोर
पहुँच ही जाता है.....!!
इस क्षण आशा और
अगले ही पल इक सपना ध्वस्त....!!
अभी-अभी.....
इक क्षण भर की कोई उमंग
और अगले ही पल से
कोई अपार दुःख
अनन्त काल तक
अभी-अभी हम अच्छा-खासा
बोल बतिया रहे थे और
अभी अभी टांग ही टूट गई....!!
कभी बाल-बच्चों के बीच....
कभी सास बहु के बीच.....
कभी आदमी औरत के के बीच
कभी मान-मनुहार के बीच
कभी रार-तकरार के बीच....
कभी अच्छाई-बुराई के बीच
कभी प्रशंसा-निंदा के बीच
कभी बाप-बेटे के बीच
कभी भाई-भाई के बीच
कभी बॉस और कामगार के बीच
कभी कलह और खुशियों के बीच
कभी सुख और के बीच....
जैसे एक अंतहीन रस्सी
इस छोर से उस छोर तक
बिना किसी डंडे के ही
टंगी हुई है ,और हम
एक नट की भांति
करतब दिखाते हुए
बल खाते हुए
गिरने-संभलने के बीच
चले जा रहे हैं.....
बिना यह जाने हुए कि....
दूसरा जो छोर है....
उस पर तो मौत खड़ी हुई है....
हम संभल भी गए तो
कोई अवसर नहीं है....
कुछ भी पा लेने का.....!!!!
रस्सी पर चलता नट....
अभी गिरा, अभी गिरा, अभी गिरा
मगर नट तो नट है ना
चलता जाता है....
बिना गिरे ही
इस छोर से उस छोर
पहुँच ही जाता है.....!!
इस क्षण आशा और
अगले ही पल इक सपना ध्वस्त....!!
अभी-अभी.....
इक क्षण भर की कोई उमंग
और अगले ही पल से
कोई अपार दुःख
अनन्त काल तक
अभी-अभी हम अच्छा-खासा
बोल बतिया रहे थे और
अभी अभी टांग ही टूट गई....!!
कभी बाल-बच्चों के बीच....
कभी सास बहु के बीच.....
कभी आदमी औरत के के बीच
कभी मान-मनुहार के बीच
कभी रार-तकरार के बीच....
कभी अच्छाई-बुराई के बीच
कभी प्रशंसा-निंदा के बीच
कभी बाप-बेटे के बीच
कभी भाई-भाई के बीच
कभी बॉस और कामगार के बीच
कभी कलह और खुशियों के बीच
कभी सुख और के बीच....
जैसे एक अंतहीन रस्सी
इस छोर से उस छोर तक
बिना किसी डंडे के ही
टंगी हुई है ,और हम
एक नट की भांति
करतब दिखाते हुए
बल खाते हुए
गिरने-संभलने के बीच
चले जा रहे हैं.....
बिना यह जाने हुए कि....
दूसरा जो छोर है....
उस पर तो मौत खड़ी हुई है....
हम संभल भी गए तो
कोई अवसर नहीं है....
कुछ भी पा लेने का.....!!!!
Tuesday, May 19, 2009
प्रभाकरण के मृत शरीर की तस्वीर
ये है प्रभाकरण की डेड बॉडी। श्रीलंका की सेना ने इस आतंकी को दो दिन पहले ही मार गिराया था। इसकी डीएनए टेस्टिंग अभी अभी हुई है और सेना ने इस मृत शरीर की पुष्टि प्रभाकरण के रूप में की है। इसी के साथ श्रीलंका में 26 साल पुराने आतंक के खेल का फिलहाल अंत हो गया है।
इस फैसले में हैं कई स्पष्ट संकेत भी
रजत गुप्ताभारतीय लोकतंत्र का सबसे महान पर्व सम्पन्न हो गया। चुनावी सर्वे में किसी की भी राय आम जनता की राय से मेल नहीं खाती। इसी तरह ज्योतिष के दुकानदार भी इस बार फिर फेल हो गये। अब इस एकतरफा फैसले के पीछे तर्क गढ़ने का दौर चल पड़ा है। यह दुखद स्थिति है कि जनता बार-बार नीति निर्धारकों को अपनी पसंद और प्राथमिकताओं के बारे में बताती है पर सत्ता पर बैठे लोग या तो इन्हें समझ नहीं पाते या फिर समझना नहीं चाहते।
चारों खाने चित भाजपा की दलील है कि अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस को एकमुश्त वोट दिया। कैमरे के सामने ऎसी दलील देने वालों से कोई यह नहीं पूछता कि अगर ऎसी ही बात थी तो रामपुर सीट से सपा की जयाप्रदा क्यों जीती जबकि कांग्रेस की प्रत्याशी बेगम नूरबानो सहित दो मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में थे। दूसरी तरफ जिन इलाकों में मुसलमान वोट निर्णायक नहीं थे, वहां भाजपा क्यों पराजित हो गयी। इसके ठीक विपरीत विजयी मुस्कान लिये कैमरे के सामने आते कांग्रेसियों को अपनी जीत के लिए नई-नई उपलब्धियां नजर आ रही हैं। इसी क्रम में नये सिरे से इस दल में व्यक्तिपूजा के लिए नया कैरेक्टर बतौर राहुल गांधी के रूप में उभरा है। कांग्रेस की नीतियां अगर इतनी ही प्रभावी थीं तो उसे स्पष्ट बहुमत क्यों नहीं मिला और करीब तीन दशक के वामपंथी शासन से इस बार मुक्ति कैसे मिली। ये चंद सवाल है, जिनके सही जबाव एयरकंडिशंड कमरों में बैठे वन मैन आर्मी वाले नेता नहीं समझ सकते। मजेदार बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में अब बिना समर्थकों वाले नेताओं की ही चलती है। ऎसे लोगों का जनसरोकार से कुछ लेना देना नहीं। वे अपने लिए शायद नगर निगम के पार्षद का चुनाव भी नहीं जीत सकते पर पार्टी के महत्वपूर्ण चिंतक बने हैं। चूंकि यह लेख इंटरनेट के अभ्यस्त हो चुके साथियों को समर्पित हैं। इसलिए मित्रों किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मैं अपनी ओर से आपको कोई तर्क नहीं दूंगा। सिर्फ मेरी समझ से पांच चरणों में हुए चुनाव के परिणामों के इसी क्रम में विश्लेषण से बहुत सी बातें अपने-आप ही स्पष्ट हो जाएंगी। पहले चरण में कहां-कहां चुनाव हुए, उसके बाद क्या स्थिति बनी, दूसरे, तीसरे और चौथे चरण के चुनाव में कौन-कौन से इलाके थे और वहां होने वाले चुनाव प्रचार में कौन से मसले देश के सामने उछाले गये। इनका क्रमवार अध्ययन करते ही हमें एक स्पष्ट फैसले की झलक मिल जाती है। इसलिए दोस्तों यह मान लेना चाहिए कि चुप्पी साधे बैठा वोटर मूर्ख नहीं है और वह बार-बार किसी आवेश में वोट नहीं करता। इस बार के चुनाव में निश्चित तौर पर दलों के कट्टर मतदाताओं ने तो हर हाल में अपने दलों को ही वोट दिया होगा। वोटों का विचलन इस आधार पर नहीं हुआ करता पर जो सामान्य वोटर हैं, उन्होंने पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में, जनता की प्राथमिकताओं के बीच ताल-मेल बैठाते हुए इस बार का फैसला सुनाया है। जरूरी नहीं कि आने वाले विधानसभा चुनावों में ये वोटर इसी क्रम में वोट दें क्योंकि उस चुनाव में उनकी प्राथमिकता कुछ और होगी। इसलिए पांच चरण के चुनाव कार्यक्रम को अपने सामने रखिये और उस क्रम में चुनाव परिणामों को ऱखने के साथ-साथ हर दौर में चुनाव प्रचार के नारों और भाषणों को याद कीजिए। बड़ी आसानी से यह समझ में आ जाएगा कि देश की जनता दरअसल सभी राजनीतिक दलों से क्या कहना चाहती है।
Monday, May 18, 2009
लोकसभा चुनावः कई रिकार्ड बने झारखंड में
जितेंद्र रामयूं तो 15वीं लोकसभा का चुनाव परिणाम पूरे देश में चौकानेवाला रहा। लेकिन झारखंड के लिए भी कई मायनों में अहम रहा। परिणाम झारखंड के लिए कई नये रिकार्ड भी लेकर आया। इनमें से तीन प्रमुख हैं-
पहलाः इस बार झारखंड से कोई महिला सांसद नहीं बन पायीं। जबकि, 14वीं लोकसभा में झारखंड से दो सांसद जीती थीं। कांग्रेस की सुशीला केरकेट्टा खूंटी से और जमशेदपुर के झामुमो सांसद सुनील महतो की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में उन्हीं की पत्नी सुमन महातो। हालांकि झारखंड के 14 लोकसभा सीटों के लिए मुख्य रूप से लगभग सात महिलाएं चुनाव मैदान में थीं। इन सात महिलाओं में से एक सिटिंग एमपी भी शामिल थीं। वे थीं जमशेदपुर से झारखंड मुक्ति मोर्चा की सुमन महतो, जो इस बार भाजपा प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा से लगभग 119663 मतों से हार गयीं। 13वीं लोकसभा में भी झारखंड से दो महिला सांसद थीं। एक जमशेदपुर से आभा महतो और दूसरी धनबाद से प्रो. रीता वर्मा (दोनों भाजपा)।
दूसराः झारखंड ही एक ऐसा राज्य है जिसके चारों के चारों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने लोकसभा का चुनाव जीता और वह भी अलग-अलग पार्टियों से। झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी झाविमो से 48520 मतों से जीते, दूसरे अर्जुन मुंडा भाजपा से 119663 मत हासिल की, तीसरे मधु कोड़ा निर्दलीय से 88913 मत प्राप्त कर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को शिकस्त दी और चौथे मुख्यमंत्री शिबू सोरेन झामुमो से 18812 मतों से जीत हासिल की। इनमें से दो पूर्व मुख्यमंत्री पहली बार संसद की दहलीज पर कदम रखेंगे। इनमें मधु कोड़ा और अर्जुन मुंडा शामिल हैं, जबकि दो पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और शिबू सोरेन पहले भी संसद में अपनी जगह बना चुके हैं।
तीसराः सबसे अहम रिकॉर्ड ये है कि झारखंड में पहली बार कोई उम्मीदवार जेल से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की है। वे हैं झामुमो की टिकट पर चुनाव लड़नेवाले पलामू के सांसद कामेश्वर बैठा। जो इस राज्य में भी नहीं दूसरे राज्य (बिहार के सासाराम जेल) की जेल में बंद हैं। वे 23538 मतों से जीत कर विजय रहे। कामेश्वर बैठा दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ते हुए यह जीत हासिल की। इससे पूर्व 2007 में पलामू में हुए लोकसभा उपचुनाव में वे बसपा से चुनाव लड़े थे और राजद के घूरन राम से चुनाव हार गये थे। मालूम हो कि कामेश्वर बैठा नक्सली जगत के कुख्यात और इनामी थे। इससे पूर्व भी झारखंड में कभी कोई चुनाव जेल में बंद उम्मीवार ने नहीं जीता, चाहे वह चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का।
चौथाः महज 14 लोकसभा सीटों वाले झारखंड राज्य में 15वीं लोकसभा चुनाव में मात्र तीन ऐसे सांसद बने जो 14वीं लोकसभा में भी निर्वाचित हुए थे। इनमें केंद्रीय राज्य मंत्री सुबोधकांत सहाय, बाबूलाल मरांडी और शिबू सोरेन (दोनों पूर्व मुख्यमंत्री) शामिल हैं।
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