Sunday, September 20, 2009

चोखेर बालियों की भी इज़्जत करो


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
यह जो विषय है....यह दरअसल स्त्री-पुरुष विषयक है ही नहीं....इसे सिर्फ इंसानी दृष्टि से देखा जाना चाहिए....इस धरती पर परुष और स्त्री दो अलग-अलग प्राणी नहीं हैं...बल्कि सिर्फ-व्-सिर्फ इंसान हैं प्रकृति की एक अद्भुत नेमत.. !!...इन्हें अलग-अलग करके देखने से एक दुसरे पर दोषारोपण की भावना जगती है....जबकि एक समझदार मनुष्य इस बात से वाकिफ है की इस दुनिया में सम्पूर्ण बोल कर कुछ भी नहीं है.....अगर पुरुष नाम का कोई जीव इस धरती पर अपने पुरुष होने के दंभ में अपना "....." लटकाए खुले सांड की तरह घूमता है...और स्त्रियों के साथ "....." करना अपनी बपौती भी समझता है....तो उसे उसकी औकात बतानी ही होगी....उसे इस बात के लिए बाध्य करना ही होगा की वह अपने पजामे के भीतर ही रहे....और उसका नाडा भी कस कर बंद रखे ....अगर वह इतना ही "यौनिक" है...कि उसे स्त्रियों के पहनावे से उत्तेजना हो जाती है...और वह अपने "आपे" से बाहर भी हो जाता हो...तो उसे इस "शुभ कार्य" की शुरुआत...अपने ही घर से क्यों ना शुरू करनी चाहिए....लेकिन यदि ऐसा संभव भी हो तो भी बात तो वही है.... कि उसके "लिंग-रूपी" रूपी तलवार की नोक पर तो स्त्री ही है... इसीलिए हर हाल में पुरुष को अपने इस "लिंगराज" को संभाल कर ही धरना होगा...वरना किसी रोज ऐसा हर एक पुरुष स्त्रियों की मार ही खायेगा...जो अपने "लिंगराज" को संभाल कर नहीं धर सकता...या फिर उसका "प्रदर्शन" नानाविध जगहों पर...नानाविध प्रकारों से करना चाहता हो.....!!
मैं देखता हूँ....कि स्त्रियों द्वारा लिखे जाने वाले इस प्रकार के विषयों पर प्रतिक्रिया में आने वाली कई टिप्पणियाँ [जाहिर है,पुरुषों के द्वारा ही की गयीं...]...अक्सर पुरुषों की इस मानसिकता का बचाव ही करती हुई आती हैं....तुर्रा यह कि महिला ही "ऐसे पारदर्शी और लाज-दिखाऊ-और उत्तेजना भड़काऊ परिधान पहनती है....बेशक कई जगहों पर यह सच भी हो सकता है....मगर दो-तीन-चार साल की बच्चियों के साथ रेप कर उन्हें मार डालने वाले या अधमरा कर देने वाले पुरुषों की बाबत ऐसे महोदयों का क्या ख्याल है भाई....!!
जब किसी बात का ख़याल भर रख कर उसे आत्मसात करना हो....और अपनी गलतियों का सुधार भर करना हो.. तो उस पर भी किसी बहस को जन्म देना किसी की भी ओछी मानसिकता का ही परिचायक है...अगर पुरुष इस दिशा में सही मायनों में स्त्री की पीडा को समझते हैं तो किसी भी भी स्त्री के प्रति किसी भी प्रकार का ऐसा वीभत्स कार्य करना जिससे मर्द की मर्दानगी के प्रति उसमें खौफ पैदा हो जाए....ऐसे तमाम किस्म के "महा-पुरुषों" का उन्हेब विरोध करना ही होगा....और ना सिर्फ विरोध बल्कि उन्हें सीधे-सीधे सज़ा भी देनी होगी...बेशक अपराधी किसी न किसी के रिश्तेदार ही होंगे मगर यह ध्यान रहे धरती पर हो रहे किसी भी अपराध के लिए अपने अपराधी रिश्तेदार को छोड़ना किसी दुसरे के अपराधी रिश्तेदार को अपने घर की स्त्रियों के प्रति अपराध करने के लिए खुला छोड़ना होता है...अगर आप अपना घर बचाना चाहते हो तो पडोसी ही नहीं किसी गैर के घर की रक्षा करनी होगी...अगर इतनी छोटी सी बात भी इस समझदार इंसान को समझ नहीं आती...तो अपना घर भी कभी ना कभी "बर्बाद"होगा....बर्बाद होकर ही रहेगा....किसी का भी खून करो....उसके छींटे अपने दामन पर गिरे बगैर नहीं रहते....!!
अगर ऐसा कुछ भी करना पुरुष का उद्देश्य नहीं है तो ऐसी बात पर बहस का कोई औचित्य....?? अगर इस धरती पर स्त्री जाति आपसे भयभीत है तो उसके भय को समझिये....ना कि तलवार ही भांजना शुरू कर दीजिये....!!
आप ही अपराध करना और आप ही तलवार भांजना शायद पुरूष नाम के जीव की आदिम फितरत है.....किंतु अपनी ही जात की एक अन्य जीव ,जिसका नाम स्त्री है....के साथ रहने के लिए कुछ मामूली सी सभ्यताएं तो सीखनी ही होती है....अगर आप स्त्री-विषयक शर्मो-हया स्त्री जाति से चाहते हो तो उसके प्रति मरदाना शर्मो-हया का दायित्व भी आपका है कि नहीं....कि आपके नंगे-पन को ढकने का काम भी स्त्री का ही है....??ताकत के भरोसे दुनिया जीती जा सकती है.....सत्ता भी कायम की जा सकती है मगर ताकत से किसी का भी भरोसा ना जीता जा सका है....ना जीता जा सकेगा.......!!ताकत के बल पर किसी पर भी किसी भी किस्म का "राज"कायम करने वाला मनुष्य विवेकशील नहीं मन जा जा सकता....बेशक वो मनुष्यता के दंभ में डूबा अपने अंहकार के सागर में गोते खाता रहे......!!दुनिया के तमाम पुरुषों से इसी समझदारी की उम्मीद में......यह भूतनाथ....जो अब धरती पर बेशक नहीं रहा....!!

Thursday, September 17, 2009

एक बार की बात है...... उल्लू राज की बात है......!!




मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
एक बार क्या हुआ कि जम्बुद्वीप के भारत नाम के इक देश में उल्लू नामक एक जीव का राज्य कायम हो गया.....फिर क्या था,पिछले सारे कानून बदल दिए गए...नए-नए फरमान जारी किए जाने लगे, बाकी चीज़ों की बात तो ठीक थी मगर जब "उलूकराज" ने जब राज्य की जनता को यह फरमान जारी किया कि अब से दिन को रात और रात को दिन कहा जाए....तब लोगों को यह बड़ा नागवार गुजरा.मगर चूँकि इस देश के लोगों को राजाज्ञा की किसी भी आदेश का नाफ़रमानी करने की आदत ही ना थी....सो टाल- मटोल करते हुए भी आखिरकार लोगों ने असंभव सी लगने वाली यह बात भी शिरोधार्य कर ली...!! आख़िर कार अपने पुरखों की संस्कृति और परम्परा की अवहेलना ये लोग कर ही कैसे सकते थे.....एक बात और भी थी कि इस देश के लोगों को अपनी समूची परम्पराओं,चाहे वो कितनी भी गलीच या त्याज्य क्यूँ ना हों,का पालन करना अपने देश के गौरव-भाल को ऊँचा रखने सरीखा प्रतीत होता था....इस कारण भी लोगों के मन में राजाज्ञा को ठुकराने की बात मन में नहीं आई !!
लेकिन प्रथम दिवस से ही इस आज्ञा को मानने में व्यवहारिक कठिनाईयां शुरू हो गयीं, सवेरे सोकर उठते ही राजा के सिपाहियों ने लोगों को वापस घर में धकेलना शुरू कर दिया कि जाओ अभी राज्य के अनुसार रात होनी शुरू हुई है और इस समय किसी को कोई भी कार्य करने की आज्ञा नहीं दी जा सकती....लोगों को हर हालत में अभी सोना ही सोना होगा.....अब बेचारे लोग-बाग़ जो अभी-अभी अपनी नींद भरपूर पूरी करके उठे ही थे,सब-के-सब बगलें झाँकने लगे....सोयें तो कैसे सोयें....मगर अब कुछ किया तो जा सकता नहीं था....लोगों में विरोध करने की शक्ति तो थी ही नहीं....वापस सोने को उद्यत हुए....मगर नींद किसी को भला कहाँ आती....दिन-भर करवट बदल-बदल कर लोग पैंतरे बदलने लगे और मारे भूख के सबका बुरा हाल......बच्चे आदि भूख की जोर से रोयें,सबको शौच की तलब ,मगर हर घर पर राजा के सैनिकों का पहरा......बाप-रे-बाप......तौबा-तौबा ......!!और जब शाम हुई तो घबरा कर सब लोग बिस्तर से उठना शुरू हुए और फटा-फट सब दिन-चर्या और "शौच-चर्या"के कार्य निपटाने शुरू किए लेकिन...... लेकिन अब सबके पेट की हालत नाजुक हो चुकी थी...... सबकी हालत यह कि सब के सब आलस से भरे और उंघते हुए दिखायी देते थे....कोई कार्य करना जैसे दूर की बात थी.....अब हालत यह कि कोई इधर अंगडाई ले तो कोई उधर,कोई उबासी ले,तो कोई बदन तोडे…कुल-मिलाकर यह कि किसी के भी लिए कोई कार्य करना अत्यन्त कठिन-सा हो गया,बल्कि असंभव प्रायः हो गया ……खैर एकाध-दिन तो लोगों के राम-राम करते यूँ ही बीते,फिर आदत तो पड़नी ही थी,सो इस सबकी आदत भी लोगों को पड़ने लगी…राजा के सिपाही जो सर पर सवार रहते थे…!!
दिक्कत तो यह भी थी ना कि बहुत सारे काम हर हालत में दिन में ही सम्भव थे…किसी का बाप भी उन्हें रात में संपन्न नहीं कर सकता था…जैसे खेती-बाड़ी पशुपालन इत्यादि…मगर महाराज उल्लू को समझाता तो कौन समझाता…सब जगह उसी के आदमी…..कौन जाने कि भला कौन उनका गुप्तचर ही निकल जाए…और उल्लू जी को इस बात से भी क्या मतलब कि खेती-बाड़ी किस तरह की जाती है,और इसी प्रकार और भी अन्य कार्य,जो सिर्फ़ दिन में ही निपटाए जा सकते हैं…दुनिया के सभी जीवों में यही एक बात समान रूप से लागू है कि अगर ख़ुद को कोई फर्क ना पड़ता हो तो दूसरा किस तरह जीता है इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं होता….हर कोई यही चाहता है कि “दूसरे” के किसी कार्य से उसे ख़ुद को कोई व्यवधान ना पहुंचे….!!

उल्लू राजा ने सभी जगह अपने आदमी फिट कर दिए,हर महत्वपूर्ण जगह पर अपने "वफादारों"को बिठा दिया,कहीं दूसरे उल्लू…कहीं चमगादड़….कहीं लोमडी….कहीं सियार….और इस तरह सभी मंत्रालयों….इस प्रकार इस सभी सम्मानित पदों को इसी तरह के तमाम निशाचर जीव ही सुशोभित करने लगे….सर्वत्र अंधेरे या यूँ कहूँ कि "अंधेरगर्दी"का राज कायम हो गया….बेशक किसी भी मनुष्य को यह राज “सूट” नहीं कर रहा था….और ना ही यह सब उसके स्वभाव के अनुकूल ही था….मगर अपनी सुखपूर्वक रहने...अपनी दिनचर्या में किसी प्रकार का खलल ना पड़ने की इच्छा और अपनी कायरता के चलते वह इन परिस्थितियों में रहने पर ख़ुद को विवश कर लिया था….या यूँ कहूँ कि वह मनुष्यता ही भूल गया था….और धीरे-धीरे ख़ुद भी उल्लू या इसी भाँती का निशाचर याकि पशु ही बन चला था…सभी उल्लुओं को वाह महाराज....वाह महाराज कहने का आदि बन चला था… अपनी अकर्मण्यता के कारण वाह उन्हीं उल्लूओं की हुक्म-उदूली करता था,जिनके चलते उसका जीवन इस कदर तबाह हो गया था……!!....उन्हीं निशाचरों की चरण-वन्दना करता था...जिनको सारे वक्त गरियाता रहता था....या तो चुपके-चुपके या फिर "अपने ही लोगों या किसी मित्र के बीच"....!!

देखा जाए तो धरती के अनेक देशों में समय-समय पर इस प्रकार का उलूक-राज कायम होता रहा है किंतु कभी भी दुनिया के समस्त मनुष्य इसे दूर करने या भगाने के लिए "एक"नहीं हुए....कि यह मामला उनका नहीं था......!!इस प्रकार समय बीतता गया…इस उल्लू-राज में अनेक साधू-संत आदि आए और इस लगभग उल्लू याकि पशु बन चुके मनुष्य को उसकी सच्चाई…उसकी आत्मा का अहसास कराने हेतु अनेकानेक वचन और अन्य प्रकार की बातें कहकर उसे वापस मनुष्य बनाने की अथक चेष्टा की….मगर इसने अपने उल्लुपने को ही अपनी सच्चाई समझ कर इसी तरह जीने को आत्मसात कर लिया है….और कहते हैं पृथ्वी पर जम्बू-द्वीप में भारत नामक के उस देश में आज तक “उल्लू-राज” कायम है…और मज़ा यह कि उसके निशाचरी नागरिक किसी मसीहा की बात भी नहीं जोहते…ऐसा लगता है कि वो पशुओं की तरह जीने को ही अभ्यस्त हो चुके हैं…।!![वो देश कहाँ है…सो लेखक नहीं जानता…॥!!]


किसकी है ये ज़मीं,किसका आसमा
हम तो खड़े हैं बिल्कुल तन्हा यहाँ !!
क्या सबको इतनी नफ़रत है मुझसे
कोई आता जाता तक नहीं अब यहाँ !!
मेरी तिशनगी मिट क्यूँ नहीं पाती
समंदर तो फैला हुआ है नीला नीला !!
कुछ दर्द को छुकर निकला हूँ अभी
अभी दामन मेरा है थोड़ा गीला गीला !!
अक्सर मेरे भीतर कोई दिखाई देता है
खुदा है या है फिर और ही कोई मेरा !!
मेरे आस पास है यह किसका वुजूद
ये कौन है चारो ही तरफ फैला हुआ !!
अब चुप भी हो जाओ ओ गाफ़िल तुम
शी ई ई देखो कोई है तुम्हे सुनता हुआ !!

Monday, September 14, 2009

मोहनी सुर सोहनी आशा भोंसले।अन्श लाल पंद्रे

मोहनी सुर सोहनी आशा भोंसले।
प्रवाहिनी सुर सरिता आशा भोंसले।।

कंठ कुसुमित मधुर विकसित स्वर गुंजनमय।
गीत ग़ज़ल भजन छंद गायन सिंगार मय।
वास मिठास कंठ सदा आशा भोंसले।।

संगीत फिल्म-सुगम जगत गायकी मधुमय।
हिय होय नहिं तृप्त सुनके कला गुनमय।
स्वर मिल्लका बिंदास आशा भोंसले।।

प्रख्यात संगीतकार किये नव प्रयोग।
खिल के महके सभी गीत जो कि संयोग।
जादू भरी आवाज़ आशा भोंसले।।

Friday, September 11, 2009

मेरे तो चारों तरफ आग ही आग है!!



यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है
मेरे तो चारों तरफ आग ही आग है!!
कितनी अकुलाहट भरी है जिन्दगी
हर तरफ चीख-पुकार भागमभाग है!!
अब तो मैं अपने ही लहू को पीऊंगा
इक दरिंदगी भरी अब मेरी प्यास है!!
मेरे भीतर तो तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा
मुझपर ऐ दोस्त अंधेरों का लिबास है!!
हर तरफ पानियों के मेले दिखलाती है
उफ़ ये जिंदगी है या कि इक अजाब है!!
हर लम्हा ऐसा गर्मियत से भरा हुआ है
ऐसा लगता है कि हयात इक आग है !!
हम मर न जाएँ तो फिर करें भी क्या
कातिल को हमारी ही गर्दन की आस है!!
रवायतों को तोड़ना गलत है "गाफिल"
यही रवायतें तो शाखे-दरख्ते-हयात हैं!!

Thursday, September 10, 2009

By Dr Bharti Kashyap
Good Evening!!



Never cry for any relation in
life
Because for the one whom you cry
Does not deserve your tears
And the one who deserves
Will never let you cry.................


Treat everyone with politeness
Even those who are rude to you,
Not because they are not nice
But because you are nice.......................


Never search your happiness
In others
Which will make you
Feel alone,
Rather search it in yourself
You will feel happy
Even if you are left alone......................


Always have
A positive attitude in life.
There is something positive
In every person.
Even a stopped watch is right
Twice a day.......................






Monday, September 7, 2009

हम भूत बोल रहें हैं.....चीनी कम....चीनी कम......!!

देखिये गरीब भईया जी
हमन तो एक्क ही बतवा कहेंगे......एही की.....बहुते चीज़ दूर होन्ने से मीठा हो जाता है......आदमिवा से कोइयो चीज़ को दूर कर दीजिये ना....ऊ चीज्वा ससुरवा तुरंते मीठा हुई जावेगा....सरकारे भी एही भाँती सोचती है....झूठो का झंझट काहे करें...ससुरी चीनी को मायके भेज दो देखो आदमी केतनों पईसा खर्च करके ससुरा उसको,जे है से की लेयिये आवेगा.....आउर देखिये बाबू ई धरती पर गरीबन को जीने-वीने का कोइयो हक़-वक नहीं है....उसको जरुरत अगर अमीरन को खेती करने,जूता बनाने,पखाना साफ़ करने,दाई-नौकर का तमाम काम करने,वेटर-स्टाफ का काम करने,चपरासीगिरी करने या मालिक का कोइयो हुकम बजाने का खातिर नहीं हो तो ई ससुर साला गरीब आदमीं का औकाते का है की साला ऊ इस सुन्दर,कोमल,रतन-गर्भा धरती पर जी सके.......आउर ई बात के वास्ते दुनिया का तमाम गरीबन को अमीरन लोगन का धन्यावाद ज्ञापित करना चाहिए....और साला ई गरीब लोग है की कभी महंगाई,कभी का,कभी का.....ससुरा बात-बात पे झूठो-मूठो जुलुस-वुलुस निकाल-निकाल कर माहौल को एकदम गंधा देता है...चीनी तो एगो छोटका सा बात है....अबे ससुरा महँगा हो गया तो मत खाओ.......तुमको कोई बोला की तूम चीनी खायिबे करो......??
एए फटफटिया बाबू लोगन अब,जे है से की ई सब बातन को तूम सब बंद भी करो.....साला महीना-दू महीना से इही सब चिल्ला रहे हो तूम सब...अरे तूम सबका मुह्न्वा दुखता नहीं का....तूम सब लोग थकते नहीं का.....अरे भईया एतना तो समझो की ई सार ग्लोबल युग है.....आउर कोई भी बात धरती पर होता है तो ऊ एके सेकेण्ड में ई पार से ऊ पार पहंच जाता है.....देस का बदनामी तो होयिबे करता है.....आउर ससुरा उहाँ का ब्यापारी भी अपना चीनी को भारत के वास्ते आउर भी महँगा कर देता है....बोलो....दोहरा नुकसान हुआ की नहीं...!!....देस को ई नुक्सान किसके कारण हुआ.....तुमरे कारण....ससुरा फटफटिया माफिक हल्ला करते रहते हो.....का दाम है भईया चीनी का.....चालीस रुपिया....सो तूम हमको बताओ....ई एको डालर है.....????अभी भी एक डालर में कुछ रुपिया कम है ई.....साला किसी चीज़ में तुम सब अगर एको डालर भी खर्च नहीं कर सकते....तो हमरे पियारे से भईया.... तूम साला जिन्दा काहे को हो....अभी के अभी मरो साला तूम......साला गू-मूत में रहने वाला.....नदी नाला में जीने वाला तूम सब लोग चीनी खायेगा.....???....चलो भागो यहाँ से.....हम पूछते हैं की हम चीनी खा-खाकर मर गए.....तब्बो भूत बने.....तूम सब चीनी नहीं खाकर मरेगा....तब का कुच्छ और बन जाएगा का....??बनना तो सब्बेको भूते है ना....!!तब काहे को चिंता लेता है की कौन का खाया....कौन का नहीं खाया.....??
आउर दूसरा बात ई भी हमरा सुनो बबुआ....जे है से की......ई ससुरा जो दुःख आदि जो है ना......ऊ ससुरा आदमी का करम-फल है...ईससे कोइयो नहीं बच सकता.....तूम का भगवान् हो......??तूम ससुरा का दरिद्र.....""नारायण""हो.....??अरे भईया काहे एतना फडफडाते हो....खुदो चैन से जीओ....आउर हम सरकार-अफसर-नेता आउर अमीर लोगों को चैन से जीने दो....हम लोग का मिटटी खाकर पईदा लियें हैं.....??
आउर भईया एग्गो आखिर बात.....आखिर जब तूम सबको हम सबका सुख नहीं देखा जाता....या तूम सब हम लोगो से घिरिना करते हो तो भईया....तूम सबके आस-पास जो भी नदी-कुँआ-तालाब-पोखर.....या जो भी कुच्छो हो...उसमें जाकर डूब मरो....काहे ससुर धरती का सांति-वान्ति भंग करते हो.....अमीरों का रंग में भंग करते हो.....हम कहते हैं की तूम लोग तब्बो नहीं मानोगे तो साला हम मिलेटरी बुलवा देंगे......तूम सब साला के ऊपर बूल-डोजर चढवा देंगे.....थोडा कह कर जा रहे है....तूम जियादा ही समझ लेना.....!!
रोज आँखे हुई मेरी नम
रोज इक हादसा देखा....!!
मुझसे रहा नहीं गया तब
जब किसी को बेवफा देखा !!
मैं खुद के साथ जा बैठा
जब खुद को तनहा देखा !!
रूठ जाना मुमकिन नहीं
बेशक उसे रूठा हुआ देखा !!
गलियां सुनसान क्यूँ हैं भाई
क्या तुमने कुछ हुआ देखा !!
मैं उसे तन्हा समझता रहा
पर इतना बड़ा कुनबा देखा !!
आज तुझे बताऊँ "गाफिल"
धरती पर क्या-क्या देखा !!

Sunday, September 6, 2009

महामृत्युंजय मंत्र हिन्दी ..... प्रो. सी. बी. श्रीवास्तव विदग्ध

महामृत्युंजय मंत्र हिन्दी पद्यानुवाद

ॐ त्र्यंम्बकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

अर्थ: त्रिनेत्र शिव जी को प्रणाम, जो सुगंध से परिपूर्ण हैं और मानव जाति का पालन करते हैं। वे मुझे माया और मृत्यु से बचाएं, जिस तरह पकी हुई ककडी अपनी बेल से स्वत: अलग हो जाती है, ठीक उसी तरह हमें संसार के दुखों और मोह-माया के बंधनों से मुक्ति प्रदान करे।


विधि: संध्याकाल में दीपक जलाकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके शांत भाव से 108, 28 या 11 बार जप करना चाहिए।
लाभ: शरीर स्वस्थ रहता है और दुर्घटनाओं से बचाव होता है।
हिन्दी भावानुवाद

द्वारा ..... प्रो. सी. बी. श्रीवास्तव विदग्ध

सतत शांति सुख वृद्धि हित , शिव को करो प्रणाम
माया ,मृत्यु ,औ" मोह से रक्षक जिनका नाम !!

Friday, September 4, 2009

काली घटा जल बरसाये दुधिया।

काली घटा जल बरसाये दुधिया।
हँसे ताल झरने मौज करे नदिया।।

रिमझिम-रिमझिम सावन भादों गाये।
धरती की देखो हरियाली भाये।
पवन मंद-मंद बहे मुस्काये बगिया।।

मत पूछो बिजली कड़क चमक जाये।
देख यही दिल की धड़कन बढ़ जाये।
हँसे है सन्नाटा हुई दूर निंदिया।।

पड़ती फुहार खूब जियरा लुभाये।
बदली पल भर में उमड़-घुमड़ जाये।
महक छोड़-छोड़ के बहे पुरवइया।।

50 नागरिकों को मिलेगा आरटीआइ सिटिजन अवार्ड

विष्णु राजगढ़िया
सूचना कानून की चौथी वर्शगांठ पर 10 अक्तूबर 2009 को राज्य के 50 नागरिकों को आरटीआइ सिटिजन अवार्ड दिया जायेगा। झारखंड आरटीआइ फोरम के अध्यक्ष बलराम एवं सचिव विष्णु राजगढ़िया के अनुसार इसके लिए नामांकन 30 सितंबर 2009 तक आमंत्रित हैं।
किसे मिल सकता है आरटीआइ सिटिजन अवार्ड अवार्ड?
ऐसे नागरिकों को जिन्होंने सूचना कानून द्वारा ऐसा काम किया हो-
1. जिससे नौकरशाहों की गलत प्रवृति पर रोक लगती हो।
2. जिससे कोई गलत कारनामा या भ्रष्टाचार सामने आता हो।
3. जिससे कोई जायज काम बिना रिश्वत दिये हो गया हो।
4. जिससे जनहित में महत्वपूर्ण काम हुआ हो या बदलाव आया हो।
5. जिससे सूचना कानून के प्रचार प्रसार में मदद मिली हो।
झारखंड का कोई नागरिक स्वयं अपने लिए अथवा किसी अन्य के लिए नामांकन
भेज सकता है। यह एवार्ड सिटिजन क्लब द्वारा प्रायोजित है। इसके लिए सूचना
कानून के तहत किये गये कार्यों, सफलता के विवरण एवं संबंधित दस्तावेजों की
फोटो कापी के साथ अपना पूरा पता, फोन नंबर, ईमेल पता इत्यादि भेजना होगा। पता है-
झारखंड आरटीआइ फोरम, 4-सी, घराना पैलेस,
संध्या टावर, पुरलिया रोड, रांची।
वेबसाइट- www.rti.net.in, http://rtistory.blogspot.com
ईमेल- rtistory@gmail.com
विशेष जानकारी के लिए संपर्क- श्री आर.एन. सिंह- 9430246440

Thursday, September 3, 2009

ब्रांडेड दारू और गांधीवाद की छाप...

गांधी के तीन बंदरों का सांकेतिक इस्तेमाल अंगरेजी शराब के प्रचार में वाल पेंटिंग के रूप में चमकते हुए देखने को मिला. अब विगत माह नीलाम हुए उनके चश्मा-चप्पल और कटोरे के साथ किसी मॉडल के आने का इंतजार कीजिए, जो गांधीजी के कटोरे में दारू डालकर बोलेगी- इट्स ए राइट च्वायस ऑफ बापू!

निराला

मैं बुरा देख नहीं सकता

मैं बुरा बोल नहीं सकता

मैं बुरा सुन नहीं सकता...

क्योंकि मैं ऑफिसर हूं. आप भी अपना ऑफिसर स्वयं ढूढिए. पीजिए...

यह नया विज्ञापन है या पुराना, यह सही-सही नहीं पता लेकिन एक शराब का प्रचार कुछ इसी अंदाज में एक छोटे से ढाबे की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में उभरा हुआ देख कर स्वाभाविक तौर पर नया लगा और चौंकानेवाला भी. पिछले दिनों रांची-पटना हाइवे पर मोटरसाइकिल से गुजरने के क्रम में जिस एक ढाबे पर थोड़ी चाय-पानी के लिए रूकना हुआ था, वहीं यह वाल पेंटिंग देखने को मिला. यह ढाबा एनएच-33 पर है. रांची से पटना की ओर जाने पर कुछ ही दूरी पर जैविक उद्यान के पास. इसे देखने के बाद कुछ देर तक और वहां रूक गया. यह सोच कर कि कोई शराब पीने वाला आये तो जरा उसके अंदाज से इस प्रचार का मिलान किया जाये. जाहिर-सी बात है, उस ढाबे पर बैठ कर दारू पीने वाले गांधी का नाम लेकर दारू पीते हैं, खरीदते हैं. मजाक में ही सही. ढाबा मालिक मौजूद नहीं थे तब. वहां के कर्मियों को यह पता नहीं था कि इस प्रचार को कंपनी वालों ने दीवार पर रंगवा दिया है या ढाबा मालिक ने. यह तो पता नहीं चल सका लेकिन वहां से चलते समय कुछ बातें याद आने लगी.

इंटरनेट की दुनिया में गांधी का नाम अश्लील चुटकुलों में प्रयोग में लाने, चर्चित टीवी शो में बड़ी-बड़ी हस्तियों के सामने, सेलिब्रिटियों के द्वारा गांधी की तुलना मल्लिका शेहरावत और सलमान खान से कर लेने के बाद गांधी के नाम पर चल रहे तरह-तरह के खेल-तमाशे में शराब का यह प्रचार एक नयी कड़ी के रूप में पिछले कई वर्षों से चलन में आ गया है. मुझे याद आ रहा था पिछले दिनों की नीलामी वाली बात. पिछले दिनों मीडिया में गांधी का चप्पल, चश्मा और कटोरे का नीलाम होना छाया हुआ था. कुछ हंगामा भी मचा रहे थे. ज्यादा हंगामा इसलिए था, क्योंकि एक शराब कंपनी के संचालक ने गांधी के सामानों को हासिल करने के लिए उसकी बोली लगायी थी. कुछेक ने यह आशंका जतायी थी कि कल को क्या पता गांधी के उस कटोरे में दारू लेकर कोई मॉडल गांधी का चप्पल और चश्मा पहनकर प्रचार करते हुए बोले:- यह गांधी का च्वाइस है... इसमें असंभव भी तो कुछ नहीं दिखता. आज उस छोटे से ढाबे पर चमक रहा दारू का प्रचार, जिसमें गांधी के तीनों बंदरों का बिंब के तौर पर इस्तेमाल बिना किसी हिचक के हुआ है. कल को कोई मॉडल भी गांधी के चश्मे, चप्पल और कटोरे के साथ- दारू पिलाने का पाठ पढ़ाये कि- इट्स ए राइट चवाइस ऑफ बापू...!

पता नहीं, अपने ही देश अपने नामों का इतने तरीके से इस्तेमाल होते हुए देख गांधीजी क्या सोच रहे होंगे.

रेड्डी की मौत से उठे कई सवाल

रजत कुमार गुप्ता
यूं तो ऎसे वक्त पर इस किस्म की नकारात्मक बातों को गलत माना जाता है पर मेरी स‌मझ में यह अत्यंत प्रासंगिक है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई राजशेखर रेड्डी के 24 घंटे स‌े अधिक तक गायब होने और फिर मौत की पुष्टि ने पूरे देश की आंतरिक स‌ुरक्षा और हमारी स‌ूचना तकनीक की तैयारियों की पोल खोल दी है। पूर्व में स‌ुरक्षा तैयारियों के बारे में कई किस्म के दावे किये गये थे। यहां तक कि बहुचर्चित मुंबई हमले के बाद इस दिशा में कुछ स‌ुधार भी हुए थे पर कल से लेकर आज तक के घटनाक्रम के बाद असली स‌वाल यह है कि क्या वाकई देश ने ऎसी चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रखा है। इस विषय पर अधिक नकारात्मक टिप्पणी भी शायद स‌मयोचित नहीं पर यह मसला पूरे देश के लिए विचार का मुद्दा जरूर है। दूसरा मसला स‌ूचना तकनीक का है। इस तकनीक में हम लगातार अमेरिका स‌हित अन्य विकसित देशों स‌े आगे होने का दावा करते रहे हैं। केंद्र और राज्यों ने अपने यहां स‌ूचना तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करने के नाम पर करोड़ों नहीं अरबों-अरब रुपये खर्च किये हैं। यह स‌िलसिला अब भी जारी है। स‌वाल है कि क्या स‌ारी तकनीक स‌िर्फ शहरी इलाकों को ध्यान में रखते हुए बनायी जा रही है, जिसे आम इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले बिना किसी अतिरिक्त जानकारी और प्रशिक्षण के स‌िर्फ गूगल अर्थ स‌े देख स‌कता है। 20 घंटे के बाद भी एक मुख्यमंत्री के हेलीकाप्टर का पता नहीं चल पाता, स‌ूचना तकनीक के विकसित होने की दावेदारी में यह घटना हमारी वास्तविकत तैयारियों का परिणाम घोषित करने वाला है। बताते चलें कि अंतरि& स‌े पूरी दुनिया पर नजरदारी करने की दावेदारी के बीच हमारे ही देश में कई इलाके ऎसे हैं, जिनके राजस्व नक्शे आज भी उपलब्ध नहीं हैं। इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले जिस मित्र को इस बात पर भरोसा नहीं, वह छत्तीसगढ़ राज्य स‌रकार के भू राजस्व के रिकार्ड को इंटरनेट स‌े देख स‌कता है। दंतेबाड़ा इलाके में यह नक्शा आज भी हाथ ले बनाये गये नक्शे के तौर पर है।
चूंकि मसला आंध्र प्रदेश का है, इसलिए यह बहस और भी प्रासंगिक है। आंध्र प्रदेश को स‌ूचना तकनीक के मामले में अन्य राज्यों की तुलना में स‌बसे आगे रखा जाता है। दावा तो इस बात का भी है कि वहां के छोटे स‌े छोटे कस्बों तक के छोटे स‌े छोटे भूखंड का आंकड़ा और उन्हें अद्यतन करने की स‌ुविधा इस राज्य में हैं। अंतरिक्ष विज्ञान में लगातार अनुसंधान जारी रखने के क्रम में भी भारत की दावेदारी अन्य विकसित देशों की तुलना में बहुत कम नहीं है। स‌वाल यह है कि क्या वाकई हम इस तकनीक स‌े लैश हो पाये हैं अथवा मुंगेरी लाल के हसीन स‌पने दिखाकर देश की जनता को भरमाया जा रहा है। वह कौन स‌ी बात है कि उन्नत विज्ञान की तकनीक होने की दावेदारी के बाद भी मुख्यमंत्री की तलाश में ऎसी कोई तकनीक काम नहीं आ रही और हमें आज भी अमेरिका के स‌ामने मदद के लिए हाथ फैलाना पड़ रहा है। यह वाकया तब हम स‌भी के स‌ामने हैं जबकि पोखरण (2) की उपलब्धियों पर एक नई बहस छिड़ी हुई है।