Tuesday, July 29, 2008

रेनकोट


मोनिका गुप्ता
अपनी पूरी मस्ती और शोख अदाओं के साथ सावन हमारे सिरहाने आ चुपचाप खड़ा हो चुका है। वातावरण सुगंधित है, प्रकृति में हरियाली छाई हुई है, बादल घुमड़ घुमड़ कर अपने हर्ष का परिचय दे रहे है, वर्षा की रिमझिम बूंदे जीवनदायिनी बन चुकी है और मन उल्लासित है। बच्चे पानी में कागज के नाव तैरा रहे है जिन्हें देखकर लगता है कि सावन ने दस्तक दी है। जब नववधूएं अपने हाथों में मेंहदी रचाकर मायके में अपने प्रिय के आने का इंतजार करती है तब उनकी आंखों में सावन दिखाई देता है। जब गांवों में झूले डलने लगते है और मंगल गीत गाये जाते है तब पता चलता है कि सावन आहिस्ते-आहिस्ते दस्तक दे रहा है। जब बहनें अपने भाइयों के लिए तरह तरह की राखियां बनाती हैं, तो उनके प्यार में दिखता है सावन। जब कांवरिया मीलों चलकर अपने अराध्य देव को जल चढ़ाते है तो उनकी भक्ति में सावन के आने का एहसास होता है। सबसे अलग सावन होता है युवाओं का । प्रेयसी या प्रिय का दिख जाना ही उनके लिए सावन के दर्शन से कम नहीं होता। इस सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो, तो किसी भी गांव या छोटे शहर में, जहां पेड़ों पर झूला डाले किशोरियां, नवयुवतियां या फिर महिलाओं का झुंड देखने को मिले, वहां दो पल ठहर जाइए। वहां दिखेंगी आपको सावन की मस्ती। उनकी हंसी ठिठोली में, उनकी अठखेलियों में। हर व्यक्ति को सावन का यह झूला अपने उम्र के विभिन्न पड़ाव में अपने लोगों से मिलता रहता है। यही झूला हम सबको मिला है मां की बांहों के झूले के रूप में, कभी पिता, कभी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, भैया-भाभी, दीदी या फिर अपने प्रिय के बांहो का झूला। भला कौन भूल सकता है इन प्यार भरे झूलों को?
आज सावन बदल गया है। आने के पहले खूब तपिश देता है, अपने आगमन का विज्ञापन करता है। छतरी, रेनकोट और विज्ञापन के होर्डिंग के रूप में। पर जब कभी यह रात में आ धमकता है, तो सारे विज्ञापन धराशायी हो जाते हैं। न छतरी काम आती है और न ही रेनकोट। गृहस्थी की पूरी झांकी सड़कों पर तैरती नजर आती है, अपने आशियाने के तिनके समेटते नजर आते हैं झोपड़ी के लोग। सावन वहां भी आता है, पर रात में ही कुछ मजदूर लग जाते हैं, बंगले का पानी उलीचने में। नाली खोद दी जाती है, ताकि पानी झोपड़पट्‌टी की तरफ जा सके और बंगले साफ सुथरे और मनोरम दिख सके। रात में बिजली धोखा न दे जाए, इसलिए नया इन्वर्टर खरीदा जाता है। बच्चों के झूलने के लिए एक सीट वाला आधुनिक झूला हॉल में लगा दिया जाता है, पर इसमें वह मज़ा कहां, जो गांव में आम के पेड़ पर लगे झूले में है या फिर उस झोपड़पट्‌टी के सामने एक पेड़ पर साइकिल के खराब टायरों से बने हुए झूले में है। जिसपर बच्चे झूलते हैं, खिलखिलाते हैं, एक दूसरे को झुलाते और फिर गिरने पर रो कर घर चले जाते हैं। सावन खाली बैठे शहरी मज़दूर का भी है, लोकगीतों के साथ खेतों में बुवाई करती महिलाओं का भी है, बीज के लिए कर्ज़ देते व्यापारी का, बाइक पर सरपट भागते युवाओं का, घर में कैद होकर खेलते बच्चों का भी है ये सावन। सावन के रंग की कोई सीमा नहीं। सावनी रंग अलग-अलग तरह से लोगों के चेहरे पर अपना प्रभाव छोड़ता है। इसलिए तो कहा जाता है कि किसी के चेहरे पर यूं ही नहीं खिलता सावनी रंग। रंगों की रंगत में सावनी झूलों की डोर अब भीगने लगी है। टूटते लोगों का सहारा भी बनता है सावन और तिनका-तिनका लोगों को तोड़ भी देता है सावन। कई आंखें हैं, जिनमें सावन की हरियाली दिखती है। पर उससे भी अधिक सैकड़ों आंखें हैं, जिनमें सावन ने आज तक दस्तक ही नहीं दी है। उन्हें पता ही नहीं, क्या होता है और कैसा होता है सावन?

Monday, July 28, 2008

पूरे कुएं में भंग



रंजीत

जब कुएं में ही भंग हो, तो कौन होश में और कौन मदहोशी में , यह बात ही बेमानी हो जाती है ? ऐसे में अगर भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों का सामान्यीकरण न किया जाय तो क्या किया जाय ? हम बचपन से पढ़ते आये हैं कि अंगुली उठाने से पहले व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित कर लो और अपने दामन की जांच भी। लेकिन लगता है अब इसकी अनिवार्यता नहीं रह गयी। जिसकी पूंछ उठाओं मादा ही निकलेगी। अंगुली जिस पर टिकेगी वही भ्रष्ट निकलेंगे । अगर नहीं, तो समझो इन्हें मौका नहीं मिला।
गत दिनों संसद में नोट और वोट के प्रदर्शन की घटनाओं के बाद पूरे देश के मीडिया ने गिरती राजनीति पर जमकर आंसू बहायी। ऐसा लगा जैसे राजनीतिक अधोपतन से सबसे ज्यादा व्यथित पत्रकार समुदाय ही है। लेकिन उसी घटनाक्रम में जो पत्रकार-मीडिया समूह भ्रष्टाचार के कटघरे में खड़ा होते नजर आये, उन पर शायद किन्हीं की नजर नहीं पड़ी। या यूं कहिए कि नजर पड़कर भी उन्हें कुछ नहीं दिखा। या फिर ऐसा कह लीजिए कि ये यह मानकर चलने लगे हैं कि जो अन्य करें वह पाप और जो हम करें वह पुण्य। इंसान का बचा जूठा और भगवान का प्रसाद। नोट प्रदर्शन प्रकरण में उस चैनल वाले ने क्या किया, जिसने पूरे मामले का स्टिंग ऑपरेशन किया था ? वह भी पूर्व नियोजित और पूरी तैयारी के साथ। आखिर उसने अगर इस लेनदेन को कैमरे में कैद किया तो प्रसारण क्यों नहीं किया। सामाजिक अधोपतन पर शब्दों और अक्षरों की आंसू बहाने वाले विद्वान पत्रकारों की अक्ल में यह बात नहीं अट रही क्या ? चैनल वालों की ओर से कह दिया गया कि यह विशेषाधिकार का मामला बनता है, इसलिए वे इसका प्रसारण नहीं करेंगे। लेकिन मैं मुफ्त में उन्हें कुछ सलाह देना चाहता हूं। उन्हें मालूम होना चाहिए भारत की 32 करोड़ जनता ग्रेजुएट हैं और उनको विशेषाधिकार की बात अच्छी तरह समझ में आती है। आखिर विशेषाधिकार की ही बात थी तो उस समय यह लागू क्यों नहीं हुई जब प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेते सांसदों की तस्वीर सार्वजनिक की गयी थी। जवाब बहुत सरल है- तब बात टीआरपी की थी। लेकिन इस बार बात कुछ बना लेने की हो गयी तो सारी नैतिकता, ईमानदारी और सरोकार आदि- इत्यादि चले गये घास काटने।
झारखंड के एक बड़बोले पत्रकार आजीवन अपनी ईमानदारी का पींग अपने कनिष्ठों को सुनाते रहते थे और कहते थे कि उनके पास तो रहने के लिए एक अदद घर भी नहीं है। वे तो ईमानदारी की झुग्गी में रहते हैं। लेकिन इनकम टैक्स वालों के यहां उन्होंने जो रिटर्न फाइल किया उसमें दो जुड़वा फ्लैट का जिक्र भी है, जिसकी कीमत 35 लाख रुपये है।
ऐसे में यह बात अब बिल्कुल शोभा नहीं देती कि कोई जनता के नाम पर ईमानदारी का भाषण छोड़े। चाहे वह पत्रकार हो या नेता। सब बराबर हो गये हैं। जो नहीं हुए हैं वे लाइन में खड़े हैं। अगर यह सच नहीं है तो ईमानदार पत्रकार इसके विरोध में आगे क्यों नहीं आते। पिछले एक दशक में क्या पत्रकारों के किसी समूह ने मीडिया में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की है ? मुझे तो याद नहीं आ रहा। दरअसल हम सभी भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे लोग हैं और अब इसके इतने आदी हो गये हैं कि हमें सड़ांध में भी खूशबू की महक मिलने लगी है। इसलिए जो जहां है वहीं थैला भर रहा है। कोई भी गंभीरतापूर्वक कभी भी यह नहीं सोचता की इसकी कीमत हम ही चुका रहे हैं। कभी आतंकियों के हाथों, तो कभी अपराधियों के हाथों तो कभी स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवस्था के भ्रष्टों के हाथों। हम सभी किस्तों में मरने के अभ्यस्त हो गये हैं। शायद इसलिए अज्ञेय जी ने कभी लिखा था
एक दिन मैं कहीं किसी सड़क पर गिरा पाया जाऊंगा
तब लोग मेरे शव के पास आयेंगे
मेरी नसों और धड़कनों को जांचे बगैर मुझे मृत घोषित कर देंगे
और कहेंगे अच्छा-भला आदमी था- बेचारा
उस दिन मैं हंसने लायक नहीं रहूंगा
इसलिए उस बात को लेकर आज मुझे हंसना चाहिए

Saturday, July 26, 2008

बंगलौर और अब अहमदाबाद, आगे कहाँ ?

सुनील चौधरी
धमाकों से भारत गूंज रहा है. माँ की चीत्कारें, बीवी की सिसकियाँ. हम सब सुन रहे है. मौन. पत्थर की मूरत बनकर. अभी-अभी टीवी पर ख़बर आई की अहमदाबाद में चार स्थानों पर धमाका.हम मौन बनके सुन और देख रहे है. आगे भी मौन ही रहेंगे. क्यों? क्योंकि मेरे शहर में धमाका नहीं हुआ. सरकार चिल्लाएगी. कहेगी खुफिया सूचना थी. फिर किसी आतंकवादी संगठन पर दोष थोप दिया जाएगा. इस धमाके का दोषी भी जाहिर है पकिस्तान ही होगा. सुरक्षा बढ़ाने के दावे किए जायेंगे. टीवी पर चेहरा चमकेगा. एंकर सवाल करेगा. वो जवाब देंगे. फिर कहानी ख़त्म. न सुरक्षा बढेगी और न ही धमाका रूकेगा. और हम क्या करेंगे. अरे भाई इंतज़ार करेंगे, अगले धमाके का. ........ताकि टीवी पर फिर बैठकर घंटा दो घंटा गुजरेंगे. क्या हम मौन ही रहेंगे. पर कबतक. कबतक इनके झूठे आश्वासन सुनते रहेंगे. एक बात और धमाका bjp शासित राज्यों में ही हो रहा है. आख़िर क्या संदेश देना कहते है ये लोग. केन्द्र और राज्य सरकार क्या कर कर रही है. क्या अब हम अपने देश में भी सुरक्षित नही रह पाएंगे. अब सवाल तो येही उठता है न की अब कौन.

और तो और बंगलौर के बाद पूरे देश में हाई एलर्ट की घोषणा की गई थी. अब आप ही बताओ क्या यही है हाई एलर्ट. आख़िर जो मारे गए इसके लिए गुनाहगार कौन है ?

Thursday, July 24, 2008

चार दिनों दा प्यार हो रब्बा...

नदीम अख्तर

अभी अखबार पढ़ते-पढ़ते मुझे बाहर से फ़िल्म जन्नत का ये गाना सुनाई दिया. चार दिनों दा प्यार हो रब्बा... लम्बी जुदाई, लम्बी जुदाई. मौका और दस्तूर के हिसाब से ही गाना बज रहा था, इसलिए चेहरे पर एक मुस्कान खिल गयी. असल में संप्रग और वाम के रिश्तों की टूटी डोर और सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकले जाने के बाद इस गाने की प्रासंगिकता और बढ़ी हुई लगी. लेकिन फर्क सिर्फ़ इतना ही है कि वाम और संप्रग का बेमेल प्यार या फिर यूँ कहें कि वाम दलों द्वारा संप्रग के साथ अप्राकृतिक राजनीतिक यौनाचार चार दिनों तक नहीं बल्कि चार सालों तक चला. सरकार बहुत ज़्यादा तकलीफ महसूस करने लगी, तो उसने भी बिस्तर से उठने की हिम्मत दिखा ही दी. लेकिन वाम दलों ने लाजवंती सरकार की इस हिमाकत का बदला अपने ही वरिष्ठ साथी से ले लिया. 40 सालों तक जिसने पार्टी (सीपीएम) की निःस्वार्थ सेवा की, उसे एक झटके में पार्टी से निष्कासित कर डाला. आख़िर माकपा क्या चाहती थी सोमनाथ चटर्जी से. क्या वे स्पीकर के दायित्व का निर्वहन न करके एक आम राजनेता की तरह आचरण करते. स्पीकर होने का मतलब जिस करीने से सोमनाथ चटर्जी ने भारत के लोगों और राजनेताओं को समझाया है, संसदीय इतिहास में आज तक इतने कायदे से कोई नहीं समझा पाया था. सोमनाथ चटर्जी भले ही विश्वास मत से पहले कुर्सी छोड़ कर नहीं गए, लेकिन उन्होंने विश्वास मत की पूरी प्रक्रिया के दौरान अपने आचरण में किसी दल विशेष का पुट सुवासित नहीं होने दिया. अपना काम बखूबी अंजाम दिया और वैसी नौबत भी नहीं आयी की स्पीकर को पक्ष-विपक्ष के मतों में समानता आने के कारण अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना पडा हो. और जब सोमनाथ चटर्जी ने अपने मत का इस्तेमाल ही नहीं किया, तो उनके ऊपर किसी के समर्थन या फिर किसी के विरोध का आरोप कैसे मढ़ा जा सकता है. सिर्फ़ इसलिए कि सोमनाथ जी माकपा के संसद हैं, और उन्हें भी नोटों का बण्डल दिखने जैसा कोई नाटक करना चाहिए था वेल में खड़े हो कर. या फिर उन्हें भी इस्तीफा देकर आम माकपाइयों की तरह "इन्कलाब मुर्दाबाद" का नारा लगना चाहिए था क्या? आख़िर सोमनाथ चटर्जी इस्तीफा दे भी देते तो क्या होता, संप्रग ने अभी जिस प्रकार सांसदों का जुगाड़ किया वैसे ही सोमनाथ के इस्तीफे के बाद भी जुगाड़ कर ही लेते संप्रग के नेता. और वैसे भी राजनितिक आरोप तो दोनों और से लगाये जा रहे हैं. कौन दूध का धुला है. पक्ष के पास तो विपक्ष से ज़्यादा तादाद में सांसद हैं विपक्षी दलों पर आरोप लगाने के लिए. असल में माकपा को ऐसा लग रहा है कि इस खेल में उनकी नहीं चली, तो आगे जहाँ-जहाँ उनकी सरकार है वहाँ की जनता को ये क्या मुंह दिखाएंगे? लोगों से क्या कहेंगे कि हम कांग्रेस के साथ हो चुके हैं, असल में इन्हें सरकार से या फिर यूँ कहें कि कांग्रेस से पल्ला तो छुडाना ही था, बस मौके की तलाश थी, वो मिल गया. अब उस मौके के बाण से कुछ तीर भी छूट रहे हैं. एक तीर सोमनाथ चटर्जी को लगा है, आगे देखिये और किसे-किसे लगता है...

Wednesday, July 23, 2008


बस बोलना है, इसलिए बोल दो...

नदीम अख्तर

लोकसभा में सरकार को बहुमत मिलने की खबरें सभी अखबारों में आयी हैं, आज मैं दफ्तर आया तो हिन्दी अखबारों पर नज़र डाल रहा था. एक अखबार में राधाकृष्ण किशोर (झारखण्ड के पलामू से विधायक हैं और काफी जानकार माने जाते हैं.) का वक्तव्य पढ़ा. बहुत हंसी आयी, और अफ़सोस भी हुआ कि किशोर के स्तर का नेता ऐसा नादानी भरा बात भी कर सकता है. दरअसल किशोर ने कहा है कि जब नोटों का बंडल सदन में लहरा दिया गया तो वोटिंग नहीं करानी चाहिए. किशोर शायद संसदीय मामलों के कम जानकार हैं और साथ ही साथ साक्ष्यों की पहचान के मामले में भी उनकी समझ सिर्फ़ बोलने के लिए बोल देने के जैसी और उतनी ही प्रतीत होती है. किशोर साहब कह रहे हैं कि नोट के बंडल ही साक्ष्य थे, इस मामले में मैं अमर सिंह के बयान की तारीफ करता हूँ कि क्या कल को अमर सिंह सदन में स्पीकर के आसन के पास जा कर कहें कि मुझे आडवाणी जी ने पाँच करोड़ रुपए भिजवाये हैं और कहा है कि उनके बारे में जितना उल्टा-सीधा जानते हो वो राज़ मत उगलना, और मेरे पक्ष में संसद में वोट करो, तो क्या रुपयों को आधार मान कर उस समय उसे ही साक्ष्य मान लिया जाएगा. और क्या उस कथित साक्ष्य के सन्दर्भ में ही सदन की कार्यवाही अपने निर्धारित कार्यक्रमों के अनुसार नहीं चलेगी या रोक दी जायेगी. वैसे भी सदन कि कार्यवाही (business of house) कार्य मंत्रणा समिति तय करती है, उसी अनुसार सदन की कार्यवाही चलती है. ये कार्यवाही तभी बदल सकती है, जब किसी आपात स्थिति में कोई सदस्य ये सूचना देने के लिए खड़ा हो कि स्पीकर नियमानुकूल कार्यवाही का सञ्चालन नहीं कर रहे हैं. और/या किसी सदस्य के द्वारा पक्ष की ओर से विधि सम्मत कार्य न करने के साक्ष्य दिए जायें, वो भी कार्य सञ्चालन सूची में उल्लेख के उपरांत, पूर्व सूचना पर. अब ज़रा गौर कीजिये की राजग की ओर से कल के प्रसंग से पहले विपक्ष के नेता के मध्यम से कोई जानकारी आसन तक नहीं पहुंचवाई गयी, कि हम लोगों को पैसे दिए गए हैं और हम उसे सूचना के रूप में स्पीकर तो बताना चाहते हैं. नोटों का बण्डल उठाया और आ कर लहरा दिया सदन में. अरे नोट तो किसी के पास भी हो सकते हैं, फिर अगर ऐसे ही नोट दिखने से संसद की कार्यवाही का रुख मुड जाया करेगा, तो कल से सदन की नियमावली में एक नियम यह भी जोड़ना होगा कि नोटों का बण्डल ही किसी भी समय सदन की कार्यवाही को रोकने के लिए पर्याप्त है. और किशोर साहब ये भी कहते हैं, कि सरकार जिस विशवास के लिए मत प्राप्त करने वाली थी, उसे ही रोक देना चाहिए था. कितनी बचकानी है ये बात. सरकार जिसके ऊपर विपक्ष को ही विश्वास नहीं, सत्ता पक्ष का चार सालों तक साथ देने वाले वाम दलों को ही विश्वास नहीं, उसे सत्ता में बने रहने कैसे दिया जाना चाहिए, जब तक वो बहुमत साबित ना कर दे. दरअसल, किशोर साहब और उनके जैसे और भी लोग कल के घटनाक्रम को लेकर इसलिए ज़्यादा हाय-तौबा मचा रहे हैं, क्योंकि इन्हें अपने गंठबंधन का ही रटा-रटाया राग अलापना है. लेकिन किशोर साहब जैसे लोगों से मैं पूछता हूँ कि क्या बोलने के लिए ही सिर्फ़ बोलना ज़रूरी है. अरे जिस मुद्दे पर आपके साथियों ने ही आपका साथ छोड़ दिया हो, क्या उस मुद्दे पर चुप ही रहना बेहतर नहीं है. क्या बोलने से आदमी बहुत विद्वान माना जाने लगता है?

Tuesday, July 22, 2008

भावनाओं से ही उपजता है....PASSION

विष्णु राजगढिया जी, मेरा लेख पढने के लिए धन्यवाद। मैं कहना चाहूंगी कि जीवन के हर क्षेत्र में मानवीय भावनाएं अहम भूमिका निभातीं है। यही भावनाएं नहीं हैं, इसलिए तो हमारी राजनीति संवदेनहीन हैं। मै कल लोकसभा की कार्यवाही देख रही थी। यह भी देखा कि कितने संवेदनहीन हमारे नेता हैं। ऐसा इसलिए है कि नेताओं को लोगों की भावनाओं की कद्र नहीं है। मैं हाल ही में देष की चुनिंदा डॉक्टरो के बीच लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में हिस्सा लेने मुंबई गयी थी। एक वर्ष तक चले इस कार्यक्रम में डॉक्टरों को तकनीकी विषेशज्ञता के अलावा समाज के अंदर नेतृत्वकारी दक्षता के हुनर सीखाये जा रहे थे। इसी कार्यक्रम में देश के जाने माने मोटीवेषनल स्पीकर नंदन सवनाल की बातें मुझे आज भी याद हैं कि इमोषन प्ले ग्रेट रोल इन कॉरपरेट वर्ल्ड। (EMOTION PLAY GREAT ROLE IN CORPORATE WORLD).इसलिए मैं कहतीं हूं भावनाओं के बिना देश सेवा हो सकती है, ही गरीबों की सेवा और ना ही आपमें किसी बड़े उपक्रम को विघ्न बाधाओं के बावजूद लगाने का साहस पैदा हो सकता है। इसलिए जो पैशन चाहिए वो भावनाओं से ही उपजता है।

डॉ भारती कश्यप

Monday, July 21, 2008

कृपया नैतिकता की बात मत कीजिये

नदीम अख्तर

एक बात बताइए कि आख़िर इस हमाम में कौन नंगा नहीं है. जो लोग ख़ुद को सबसे साफ़ सुथरा छवि वाला बताते हैं, उनके कारनामे जानते हैं न आप. कोई माई का लाल ये कह नहीं सकता है कि उसने पत्रकारिता के माध्यम से अनुचित लाभ अर्जित करने की कोशिश न की हो. हाँ ये अलग बात है कि कुछ लोग निशाना साधने में कामयाब हो गए और कुछ चूक गए. वैसे अपवाद हर पेशे में आपको मिल जायेंगे. आज भी हमारे सामने बहुत सारे पत्रकार मित्र ऐसे हैं, जिनके घरों में ठीक से चूल्हा नहीं जलता, लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदारी नहीं बेचीं है. या फिर यूँ कहें कि उनका भाव ही नहीं लगा है बाज़ार में. मैं बिल्कुल शर्त के साथ कह सकता हूँ कि आज जिसकी बोली लगेगी वो बिकने को तैयार हो जाएगा. केवल अच्छा खरीदार चाहिए. फ़िर हम लोग सिर्फ़ राजनीति को ही क्यूँ कोसते रहें. राजनेताओं से तो वैसे भी कभी कोई नैतिकता की उम्मीद की ही नहीं जाना चाहिए, क्यूंकि आप अगर पिछले 70 सालों का भारतीय राजनीतिक इतिहास देखेंगे, तो पाएंगे कि सिर्फ़ स्वार्थ ही वो तत्व था, जिसने हर बड़ी राजनीतिक घटना को घटित होने का मौका दिया. जैसे देश को आज़ादी मिलना भी अंग्रेजों की स्वार्थ परक राजनीति का एक हिस्सा था. अंगरेजों ने इस लगभग खोखले हो चुके देश को चलाने से बेहतर यहाँ के स्वार्थियों को सौंप कर इस देश को एक दुधारू गाय की तरह पालने में ही अपनी भलाईए समझी. और आप इतिहास को गौर से पढेंगे तो पाएंगे कि अंग्रेजों ने जब देश को मुक्त किया तो इस देश रुपी गाय का पीछे वाला हिस्सा रखा, जहाँ से दूध ढूह जा सके और गाय के अपशिष्ट से भी उन्हें ही फायदा हो. लेकिन भारत के लोगों को गाय का मुंह मिल गया, जहाँ से सिर्फ़ घास झोंक-झोंक कर गाय को तगड़ा किया जाता है. ये सिर्फ़ सन्दर्भ के लिए था, मुद्दा यह है कि झारखण्ड बना तो यहाँ के लोग यह मान कर चल रहे थे कि बिहार इस गाय का मुंह था और हमारे हिस्स्से जो आया है, वो गाय का थन है और गाय जो खायेगी वो गोबर के रूप में हम लोगों को मिलेगा, इसलिए यहाँ के लोग बहुत खुश थे, लेकिन ज़रा याद कीजिये कि यहाँ के राजनेता वही हैं, जो नरसिम्हा राव की सरकार को बचाने के लिए वाया हर्षद मेहता अपने-आप को तुष्ट करवा चुके हैं. इन्हें तो जब-जब ऐसा मौका मिलेगा, ये कूद जायेंगे हमाम में, क्योंकि ये आज से 18 साल पहले भी नंगे थे, आज भी नंगे हैं और कल भी रहेंगे. कृपया इनसे इनके आचरण के विपरीत सदाचरण की प्रतीक्षा ना करें. और पत्रकार मित्रों का तो कोई दोष ही नहीं, असल में जो लोग एक ईमानदार रिक्शाचालक बनने की भी काबिलियत नहीं रखते, जो एक जाम में दूसरों के तलवे चाटने लगें, जो यह मान बैठें कि चौहान को बस एक ही मौका मिला है, इसलिए चूकना नहीं है, वैसे लोगों को अगर अखबारों और मीडिया समूहों में जगह मिले और वे कथित रूप से पत्रकार हो जायें, तो उनसे कसी नैतिकता कि उम्मीद? वो तो अपने आचरण के अनुकूल काम कर रहे हैं. असली सवाल तो ये है कि आज बाजारवाद कि अंधी दौड़ में अखबार मालिकों और कुछ संपादकों को हर एक बेरोजगार और कम रोज़ी मांगने वाला पत्रकार नाम की वास्तु ही दिखता है. कम पैसा मांग रहा है या फ्री में काम करने को कोई तैयार है, तो बना दो पत्रकार. चला तो चला नहीं चला तो जाएगा बूट लादने. ऐसी मानसिकता के साथ किसी को रखा जाएगा तो कहाँ से गुणवत्ता मिलेगी. गुणवत्ता तो तभी मिलेगी जब आप अपने हिसाब से पत्रकार खोजिये. टेस्ट लीजिये, इंटरव्यू लीजिये और ख़ुद मत लीजिये. अपने संस्थान के लिए बहार से जाने माने, प्रसिद्ध और ख्याति प्राप्त पत्रकारों को बुलवा के उनसे अपने लिए अच्छे पत्रकार चुनवाइये. फिर आपसे वो गुणवत्ता वाला आदमी अगर पैसे ज़्यादा भी मांगे तो दीजिये. आपके पास पैसों की तो कोई कमी है नहीं? जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक हमें पत्रकारों को गाली नहीं बकना चाहिए. क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई जानवर अपनी प्राकृतिक शैली बदल दे, और मनुष्य भी तो एक जानवर ही है, प्राकृतिक रूप से.... वैसे पतनात त्रायते इति पत्रकारः" यानि कि जो पतन से बचाए वह ही पत्रकार है, कम से कम पत्रकारों को इतना ज़रूर याद रखना चाहिए। शेष बहुत जल्द


यह उस कमेन्ट के जवाब में है, जो किसी बाबु जी ने सी-बॉक्स में लिखा है...
आदरणीय वयोवृद्ध बाबू जी
आपकी पहचान तो मैं नहीं जानता, लेकिन इतना ज़रूर समझ रहा हूँ कि आप कुंठा से बुरी तरह ग्रस्त हैं. पत्रकार बिरादरी में अधिसंख्य लोगों का पतीत होना और सभी का पतीत होना दोनों अलग-अलग बातें हैं. मैंने जो लिखा है वो संख्या में अधिक वाली जमात की तरफ़ इशारा है. आप अगर मेरे लेख को ध्यान से पढ़ें होंगे तो आपने देखा होगा की मैंने ये भी लिखा है कि आज भी कई पत्रकारों के यहाँ ठीक से चूल्हा नहीं जलता. और आप अगर चूल्हा जलने का मतलब सिर्फ़ खाने-पकाने से ही निकालते हैं, तो मैं क्षमा चाहूंगा आपसे, लेकिन बता दूँ कि मैंने इस वाक्यांश का प्रयोग दरिद्रता दर्शाने के लिए किया है. मतलब साफ़ है, जो बिल्कुल दरिद्र है, उसके पास अर्थ अर्जन के साधन नहीं हैं बाबू जी. इसलिए मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि हम लोग दूसरों के गिरेबान में झाँकने से पहले अपनी बाहों में भी देख लें. हो सकता है कि हम में से कुछ लोग ईमानदार हों, अपवाद कहाँ नहीं होते, लेकिन जिस रफ़्तार से पत्रकारों का पतन हुआ है, उसने पूरी बिरादरी पर सवालिया निशाँ लगा दिया है. मैंने इसका उपाय भी तो सुझाया है, आप उसे क्यों नहीं मानते. असल में आज इंसान की ये फितरत हो चली है कि वह दूसरों के छप्पर में तुंरत छेद देख लेता है. और रही बात मेरे इन एक्सपेरिएंस होने कि तो मैं बता दूँ कि किसी भी आदमी का अनुभव दो तरीके का होता है, पहला जो वक्त गुजरते-गुजरते अपने आप आ जाता है, और दूसरा ये कि एक आदमी वक्त के साथ-साथ अपने आप को अपग्रेड भी करता है, मुझे लगता है आपके साथ साथ ज्यादातर लोगों ने अनुभव का मतलब सिर्फ़ वक्त का गुज़रना ही समझ लिया है, इसके लिए मैं आपसे फिर क्षमा का प्रार्थी हूँ, लेकिन यकीन मानिये, सिर्फ़ वक्त गुजरने से ही हर पत्रकार बहुत जानकार और काबिल हो गया होता तो आज जितने बड़े घराने हैं, उनके प्रमुख युवा नहीं होते. आपके सामने बहुत सारे उद्धारण होंगे, तो पकी हुई बालों के साथ अपने लिए एक अदद रोज़गार की तलाश में भटक रहे होंगे. क्या वजह है जानते हैं? क्योंकि ज्यादातर घराने आज युवाओं की कार्य क्षमता के कायल हो चुके हैं और मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं कि युवाओं ने अपनी काबिलीयत के बल-बूते वक्त के साथ-साथ भूरे हो रहे बालों वालों को काफ़ी पीछे छोड़ दिया है. आप अगर अपनी उम्र से ही आकलन करेंगे, तो क्या खोया और क्या पाया, इसका अंदाजा आपको भी हो जाएगा...कोशिश तो कीजिये.

Sunday, July 20, 2008

राम रतन धन पाओ












कोई कुर्सी सामने देख गदगद है, तो कोई मन ही मन घुट रहा है

रजत कुमार गुप्ता
केंद्र सरकार के विश्वासमत हासिल करने की जद्दोजहद के बीच यह कहानी याद आ रही है। घटना वास्तविक है और नागपुर के पुराने पत्रकार इस शीर्षक से ही संपूर्ण घटनाक्रम को याद कर चुके होंगे। नागपुर में एक पत्रिका के मालिक का नाम राम-रतन से मिलता जुलता था।
पत्रिका के संपादक तीखे तेवर वाले थे। नागपुर में ही चुनावी सर्वेक्षण के नाम पर विज्ञापन छापने की प्रथा चालू हुई थी। सो पत्रिका के मालिक ने एक प्रत्याशी से पैसा लेकर उनकी जीत सुनिश्चित होने संबंधी एक लेख अखबार में प्रकाशित कराये। जब यह लेख छपा, तब पैसे का भुगतान नहीं हुआ था। दो दिन के बाद प्रत्याशी ने मालिक को इस लेख के पैसे भिजवा दिये तो मौके की प्रतीक्षा करते संपादक ने इसी शीर्षक से संपादकीय लिखा- राम रतन धन पाओ। अंदर में राम की महिमा और राम कथा से संपादकीय की शुरुआत होने के बाद अंततः कलियुग और भ्रष्टाचार की चर्चा पर आकर लेख की समाप्ति कुछ इस तरीके से हुई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि आखिर संपादक ने यह लेख क्यों लिखा है।
परमाणु करार के मसले पर वामपंथियों द्वारा यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद उपजी स्थिति ने इस घटना की याद दिला दी है। मामला 25 करोड़ की न्यूनतम बोली से प्रारंभ होकर 30 तक जा पहुंचा है। इसकी चर्चा नेता ही कर रहे हैं। इसलिए सरकार का टिका रहना, कितना जरूरी है, इसे समझा जा सकता है।
झारखंड के संदर्भ में बात करें तो केंद्र की सरकार के साथ राज्य की सरकार का अस्तित्व भी सीधे तौर पर टिका हुआ है। वहां सरकार गयी तो यहां भी जाते देर नहीं लगेगी। झामुमो ने वहां कांग्रेस का समर्थन नहीं किया तो यहां बाहर से सरकार को समर्थन दे रही कांग्रेस को भी पलटवार करने में समय नहीं लगेगा। भले ही इससे पहले अजय माकन (झारखण्ड कांग्रेस के प्रभारी) राज्य सरकार को कोस कर थक चुके हों, पर इस बार मामला कोसने का नहीं कसने का है। मैं नहीं तो तू भी नहीं की तर्ज पर खुदगर्जी का खेल चल रहा है।
इस खेल में कौन कहां बीमार पड़ा है, दूसरों को सुध तक नहीं है। एक अखबार ने एक नेता की बेहिसाब संपत्ति का विवरण क्या छाप दिया, दूसरों को सांप सूंघ गया। सत्ता को दूसरों की मदद से टिकाये रखने की मजबूरी ने मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को भी लाचार से बना दिया है। हाल के कई घटनाक्रम यह बताते हैं कि राज्य में महत्वपूर्ण फैसलों पर मुख्यमंत्री की नहीं उनके अधीनस्थ अधिकारियों और पीए की चलती है। वैसे इस मसले पर सिर्फ दूसरों को कोसना शायद हमारी आदत में शामिल हो चुका है। लिहाजा मेरी अपील होगी कि हम समय-समय पर आत्म विश्लेषण भी करें। मंत्रियों और उनके पीए से निजी लाभ लेने, अपना जेब भरने के लिए भ्रष्ट अधिकारियों के तबादले की पैरवी करने, लाईसेंस, ठेका और राजनीति मैनेज करने के नाम पर अतिरिक्त आमदनी का जो जरिया पत्रकारों ने अपना रखा है, वह स्पष्ट तौर पर इसी भ्रष्ट राजनीति से जुड़ता है। पलायनवादी सोच यह हो सकती है कि प्रबंधन की इच्छा पर बहुत कुछ करना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि अखबार एक ऐसा उत्पाद (प्रोडक्ट) है जो अधिक पैसे में तैयार होने के बाद कम पैसे में बिकता है। ऐसे में प्रबंधन विज्ञापन के बाद भी अतिरिक्त राजस्व (कमाई) को विवश है। पर इस खोखली दलील में यह बात निश्चित तौर पर शामिल नहीं हो सकती कि हम अपने मोबाइल बिल का रिचार्ज कूपन तक दूसरों से लें, अपनी गाड़ी में तेल डलवाने के लिए दूसरों की चिरौरी करें या अधिकारियों से मोबाइल लें। जिनसे यह निजी लाभ प्राप्त करेंगे, वह भी आपसे कोई न कोई लाभ पाना ही चाहेगा। ऐसी स्थिति में दूसरों को कोसने का क्या फायदा, क्योंकि हम खुद उसी दलदल में शामिल हैं। इसे समय की मांग बताने वालों को भी मैं हिदायत देता हूं क्योंकि हम में से किसी को भी किसी अखबार ने पत्रकार बनने के लिए न्योता नहीं दिया था। हम सभी अपनी इच्छा से इस पेशे से जब जुड़े तो हमें इस पेशे की जिम्मेदारियों और कठिनाइयों का एहसास था। फिर आज मौका देखते ही पलटी मारने का कोई औचित्य भी नहीं। वैसे भविष्य में झारखंड के राम रतनों के धन पाने की कहानी भी आयेगी, पर वह फिर कभी।

Thursday, July 17, 2008

सबकुछ कल पर नहीं टाला जा सकता








डॉ भारती कश्यप

सीइओ द कश्यप मेमोरियल आइ हॉस्पीटल

राज्य गठन के आठ साल पूरे होने को हैं। नवसृजित राज्य ने अपने रास्ते में कई उतार-चढाव देखे। इस पूरे कालखंड में कई सपने साकार हुए, तो कई बिखरे भी। पेशे से मैं एक डॉक्टर हूं. समाज के हर तबके, हर वर्ग से अपने प्रोफेशन की बदौलत रिश्ता बनता चला जाता है। समाज के अमीर-गरीब सबकी मनोभावना, आकांक्षा और फिर पीडा अनुभव करती हूं। निःसदेंह यहां के लोगों के भी सपने हैं।राज्य की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। यानी इस आधी आबादी के गुजर-बसर का संकट है। रोटी, कपडा और मकान जैसे मौलिक चीजों के लिए यह वर्ग संघर्ष करते जीवन काट रहा है। ऐसे में आप यह मानकर चलें कि समाज ये वंचित लोग अपने बूते अपनी स्वास्थ्य की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। अपने ईलाज के लिए अस्पतालों तक नहीं आ सकते हैं। इनके पास संसाधन नहीं हैं, पैसे नहीं हैं, जिससे ये सरकार या फिर निजी क्षेत्र की सेवाएं ले सके। बीमार एवं कुपोषित जिंदगी अभाव में ही कट जाती है। ऐसे में आप बिना इनकी जिंदगी को संवारे और बिना स्वस्थ बनाये एक सबल राज्य की कल्पना भी नहीं कर सकते। राज्य की ये पूरी आबादी मायने रखती है। इनको नजरअंदाज कर हम आगे बढ ही नहीं सकते हैं। समाज के ऐसे लोगों तक जबतक सरकार की सेवाएं नहीं पहुंचेंगी, इनके चौखट तक समाधान नहीं पहुंचेंगी, तबतक राज्य स्वस्थ नहीं बन सकता है। बीमारियों से अपने घर-गांव में लडते ये लोग न विकास की धारा से जुड सकते हैं और न हीं विकास के सहभागी बन सकते हैं। जाहिर सी बात है, हेल्दी स्टेट में ही विकास की सभी अवधारणाएं लागू होते हैं। जिनकी आंखों में रौशनी नहीं है, उनको आप लंबी चौडी सडकें, बडी इमारतें और मेगा मॉल का सपना नहीं दिखा सकते हैं. जो चलने के काबिल नहीं है, उन्हें आप इन सडकों को देकर कुछ भी हासिल नहीं कर रहे हैं। हमें पहले समाज के इन तबकों के बीच पहुंचना होगा। स्वास्थ्य की इनकी जरूरतों को बडे शहरों में सरकारी अस्पताल खोलकर, यहां मशीनें-उपकरणें लगाकर पूरा नहीं किया जा सकता है। आज जबकि सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, अस्पतालों की कमी है, डॉक्टर प्रर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में तो इनको अपनी कल की योजनाओं पर छोड भी नहीं सकते। किसी भी राज्य सरकार को अस्पतालों का जाल-बिछाने, मेडिकल कॉलेज खोलने और फिर डॉक्टर तैयार करने में कम से कम आठ से दस साल लग जायेंगे। अगर तेजी से भी काम हो, तो इन आठ से दस सालों के लिए ऐसे गरीब लोगों को चंद अस्पतालों और कुछ डॉक्टरों के भरोसे नहीं छोडा जा सकता है। सबकुछ कल पर नहीं टाला जा सकता है। ऐसे में उन निजी अस्पतालों को भी आगे लाना होगा, जिन्होंने अच्छे संसाधान जुटाये हैं और उससे बढकर समाज को कुछ देने का जज्बा भी रखते हैं।

जारी रहेगा

Tuesday, July 8, 2008

महिला सशक्तीकरण : कितना सच्चा, कितना...


मोनिका गुप्ता

देश की आधी आबादी आत्मनिर्भर और सशक्त हो रही है और अपनी मंजिलें तय कर रही है लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है जो सोचने पर विवश करता है कि क्या वाकई महिला के सशक्तीकरण का वह दौर आया है, जिसकी कल्पना कभी हमारे देश के महान पुरुषों ने की थी।
हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह आधी आबादी पूरी आधी बन पायी है। हां, लिंगानुपात का अंतर देखें तो पता चलेगा कि जल्द ही महिला जनसंख्या पुरुष जनसंख्या की आधी हो जाएगी। लेकिन बात जहां अधिकार और स्वतंत्रता की हो वहां स्थिति अब भी संदिग्ध है। सवाल अभी भी यह है कि क्या भारत की महिलाएं पहले की तुलना में सशक्त हैं? क्या महिलाओं की यह सोच साकार हो पायी है कि उन्हें भी पुरुषों के समान अधिकार और स्वतंत्रता मिले।
यदि भारत के शीर्ष पदों पर बैठी महिलाओं की उपलब्धियां देखें तो निश्चित रूप से सशक्तीकरण का आभास होता है। इस आभास को साकार करने का काम भी खुद संघर्षशील महिलाओं ने ही किया है। महिला आबादी का कुछ प्रतिशत तो ऐसा जरूर है जिन्हें देखकर यह भ्रांति होती है कि महिलाएं सशक्त हो रही हैं। फिर चाहे वह व्यवसाय का क्षेत्र हो, राजनीति का, खेल का, मनोरंजन का या फिर कोई औरसभी में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है और वे बेहतर साबित हो रही हैं।
कारण कई हैं इस कथित सशक्तीकरण के। कई तरह से कन्या भ्रूण हत्या करने के बाद भी लड़कियों का जन्म हो रहा है। यह माना कि प्रति 1000 पुरुषों पर अब 927 लड़कियां हैं और यह अंतर दिन--दिन बढ़ता ही जा रहा है लेकिन जिन्हें जीवन मिल रहा है, वह पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। पहले की तुलना में आज ज़्यादा लड़कियां स्कूल जा रही हैं। उनमें से बहुत दसवीं, बारहवीं और आगे की पढ़ाई में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर रही हैं।
खराब आर्थिक स्थिति और बिना किसी प्रायोजक के महिला हॉकी टीम ने एशिया कप जीता है, तो यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। महिला क्रिकेट को भले ही बड़े पैमाने पर प्रायोजक नहीं मिलते हैं, लेकिन कम-से-कम महिला उत्पाद से संबंधित प्रायोजक तो मिल ही रहे हैं, जो सकारात्मक संकेत है। आज महिलाएं खेल के क्षेत्र में बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी निभा रही है। जिसमें अपर्णा पोपट (बैडमिंटन खिलाड़ी), डायना एडुलजी (क्रिकेट क्रूसेडर), कोनेरू हम्पी (शतरंज क्विन), अंजलि भागवत (शार्प शूटर), मैक कैरी कोर्न (बॉक्सर), अंजू बॉबी जॉर्ज (एथलीट), कुंजारानी देवी (वेटलिफ्टर), कर्नम मल्लेश्वरी (वेट लिफ्टर), पीटी उषा (एथलीट), सानिया मिर्जा (टेनिस खिलाड़ी) कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने खेल जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है और देश का नाम रोशन किया है।
इसी तरह महिला राजनीतिज्ञों ने भी पुरूष आधिपत्य क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ा है। प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी, मायावती, जयललिता, उमा भारती, मेहबूबा मुफ्ती, वृंदा करात, ममता बनर्जी, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, शीला दीक्षित कुछ ऐसे चर्चित नाम है जिन्होंने पुरुष एकाधिपत्य क्षेत्र में आधिपत्य कायम किया है। यह बात और है कि महिला आरक्षण विधेयक अब भी ठंडे बस्ते में है। आरक्षण देने के नाम पर महिला सांसदों के काफी शोर शराबे के बाद भी महिलाएं लगातार छली जा रही हैं, फ़िर भी महिलाएं राजनीति में रही हैं, जो महिलाओं के सशक्त होने का ही प्रमाण कहा जा सकता है।
केवल राजनीति में ही नहीं बल्कि आर्थिक क्षेत्र में महिलाएं विकास में योगदान दे रही है। स्वयं सहायता समूह से लेकर देश की नामी गिरामी बैंकों और कंपनियों की बागडोर आज महिलाओं के हाथ में है। किरण मजूमदार शॉ(अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, बायोकॉन लिमिटेड), नयना लाल किदवई( सीईओ, एचएसबीसी), शहनाज हुसैन (सीइओ, शहनाज हुसैन हर्बल), मल्लिका श्रीनिवासन(निदेशक, ट्रैक्टर एंड फॉर्म इक्विपमेंट लिमिटेड), उषा थोरत (डिप्टी गर्वनर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया), ज्योति नायक(अध्यक्ष, श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़), सिमोन टाटा (अध्यक्ष, ट्रेंट लिमिटेड), सुलज्जा फिरोदिया मोटवानी (संयुक्त प्रबंध निदेशक, काइनेटिक इंजीनियरिंग लिमिटेड एंड काइनेटिक फिनांस), रंजना कुमार (अध्यक्ष, नार्बाड), कल्पना मोरपारिया (संयुक्त प्रबंध निदेशक, आईसीआईसीआई) ने आर्थिक जगत में अपनी हिस्सेदारी निभायी है।
इनके अलावा कुछ ऐसे नाम भी है जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तीकरण को सार्थक किया है। सौराष्ट्र के चामराज जिले गांव की रत्नाबेन मोटर मैकेनिक है। जिसकी उम्र 60 वर्ष से भी ज्यादा है। इस उम्र में परिवार का पालन पोषण करने के लिए वह मोटर मैकेनिक का काम करती है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां किसी महिला के काम करने के बारे में सोचना भी एक डरावने सपने जैसा है। अगर सुदूर गांव में रहने वाली इस रत्नाबेन के काम की लोग सराहना करते है तो यहां महिला सशक्तीकरण की सार्थकता सिद्ध होती है। यदि विदर्भ में किसानों की आत्महत्या से त्रस्त महिलाएं स्वयं सहायता समूह बनाकर परिवार का सहारा बन रही है, तो हम कह सकते है कि महिलाएं सशक्त हो रही है। विदर्भ के केसलापुर की शोभा दलित है और विदर्भ में स्वयं सहायता समूह की लोकप्रियता को बढ़ाने वाली मुख्य भागीदार भी है। उनके गुट को 25,000 से ज्यादा का कर्ज मिला है और वो हर दिन सौ से ज्यादा बच्चों के लिए खिचड़ी पकाती हैं। यहीं की हेमलता अब अन्य महिलाओं के सहयोग से पीसीओ बूथ चलाती है। वह रोजाना 1000 रुपये तक कमाती है और अपने परिवार का भरण पोषण करती है, तो यहां महिला के सशक्त होने का प्रमाण मिलता है। केवल हिंदू महिलाएं बल्कि मुस्लिम महिलाएं भी इस क्षेत्र में आगे है। मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 62 प्रतिशत मदरसे महिलाओं की देखरेख में है। लेकिन फिर एक सवाल उठता है कि इन सबके बावजूद महिलाएं उपेक्षित क्यों है? क्यों बलात्कार के खिलाफ निरंतर कड़े होते कानून के बावजूद बलात्कार की शिकार लड़कियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है क्यों महिलाओं के खिलाफ अपराध ब़ढते जा रहे है? क्यों भारत में लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के बाद भी माता पिता को ज्यादा दहेज़ देना पड़ता है? वो क्यों शादी के नाम पर समझौता करने को तैयार हो जाते है? विज्ञान और चिकित्सा की प्रगति के बावजूद क्यों लाखों महिलाएं जन्म देने के समय मौत का शिकार हो जाती है? क्यों आज भी दहेज़ के नाम पर बहुएँ जलायी जाती हैं? संसद में महिलाओं के अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले क्यों महिला को सुरक्षा उपलब्ध नहीं करा पाते? ये कुछ ऐसे सवाल है जो सोचने पर मजबूत करते है कि क्या आधी आबादी को खुशियां मनानी चाहिए? जिन महिलाओं का जिक्र मीडिया के गलियारों में होता है या जो चर्चा में रहती हैं उन्हें देखकर ये कहा जा सकता है कि महिलाएं सशक्त है। लेकिन जिनकी गली मुहल्लों में भी चर्चा नहीं होती, वो भी इसी देश की महिलाएं है। फिर महिला चाहे अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित, ग्रामीण हो या शहरी, जवान हो या बूढी सभी के हिस्से में महिला सशक्तीकरण का प्रसाद आना चाहिए। इन दोनों पक्षों को इससे जो़डना बहुत जरूरी है। बात केवल औरत की होगी तो कभी न्याय नहीं होगा, मांग मनुष्य के रूप में होनी चाहिए, तभी सारी समस्याएं समाप्त होंगी। फिर चाहे महिला के सशक्त होने का कितना भी उत्सव मनाइए, सब जायज होगा।