Thursday, August 28, 2008

हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के

शब्द ही ब्रम्ह हैं ,शब्द ही नाद हैं
शब्द ही सत्य हैं,शब्द सर्वस्व हैं
हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के
शब्द से गीत हैं ,शब्द से मीत हैं
शब्द से प्रीत है, शब्द से जीत है
हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के
शब्द हैं काफिया ,शब्द ही हैं रदीफ
शब्द से नज्म है, शब्द में वज्न है
हम राहगीर हैं, शब्दों के सफर के
शब्द हैं शाश्वत ,शब्द अंतहीन हैं
शब्द ही हैं प्रकृति ,शब्द संसार हैं
हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के
शब्द सरोकार हैं ,शब्द ही प्यार हैं
शब्द त्यौहार हैं ,शब्द व्यवहार हैं
हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के
शब्द ही हैं किताब, शब्द ही ग्रंथगार
शब्द ही हैं नियम, शब्द सरकार हैं
हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के

शब्द हैं शीर्षक , शब्द ही वाक्य हैं
शब्द ही भाषा का अभिसार हैं
हम राहगीर हैं ,शब्दों के सफर के


शब्दों के राही
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी 6 , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो. 09425484452
मेल vivek1959@yahoo.co.in
blog http://vivekkikavitaye.blogspot.com

How To Dance In The Rain

सबसे पहले तो ये बता दूँ कि इस पोस्ट को अंग्रेजी में देने के पीछे सिर्फ़ एक ही कारण है, व्यस्तताकाफी व्यस्त रहने के कारण इसे हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पायाखैर, डॉ भारती कश्यप का यह अनुभव वास्तव में दिल को छू लेने वाला हैआप भी पढ़ें और विचार करें कि क्या आज हम अपने जीवन में इस तरह के संबंधों की डोर मजबूती के साथ पकड़े रहते हैंअगर नहीं, तो ज़रा एक बार सोचिये कि जवानी शास्वत नहीं, बुढापा सब को आएगाज़रूरत है तो सिर्फ़ अपने रिश्तों की बुनियाद मज़बूत करने की ताकि आपके अंत समय तक आपको अपने साथी का साथ मिलता रहे


Dr Bharti kashyap

It was a busy morning, about 8:30, when an elderly gentleman in his 80's, arrived to have his postoperative dressings as he was operated for glaucoma. He said he was in a hurry as he had an appointment at 9:00 am.
I saw him looking at his watch and decided, since I was not busy with another patient, I would evaluate his wound .
On exam, it was well healed, so I talked to one of the paramedical and redressed his wound.

While taking care of his wound, I asked him if he had another doctor's appointment this morning, as he was in such a hurry. The gentleman told me no, that he needed to go to the nursing home to eat breakfast with his wife.
I inquired as to her health. He told me that she had been there for a while and that she was a victim of Alzheimer's Disease. As we talked, I asked if she would be upset if he was a bit late. He replied that she no longer knew who he was, that she had not recognized him in five years now.
I was surprised, and asked him, 'And you still go every morning, even though she doesn't know who you are?'
He smiled as he patted on my head and said,
'She doesn't know me, but I still know who she is.'
I had to hold back tears as he left, and thought, 'That is the kind of love we all want in our life.'

True love is neither physical, nor romantic. True love is an acceptance of all that is, has been, will be, and will not be.

The happiest people don't necessarily have the best of everything; they just make the best of everything they have.
I hope you share this with someone you care about. I just did with my blog friends.

'Life isn't about how to survive the storm, but how to dance in the rain.'

Saturday, August 23, 2008

ओलंपिक और हम

प्रमोद
इस बार बीजिंग ओलंपिक में निश्चय ही पहले अभिन बिंद्रा का स्वर्ण और फ़िर सुशील कुमार एवं वीरेन्द्र कुमार के कांस्य पदक के रूप में हमारे वीर योद्धाओं ने इतिहास रचा है वह भी अपने बल पर इन तीन पदकों ने हमें जश्न मनाने का मौका प्रदान किया है हमने मनाया और इन पदक वीरों को ढेर सारे इनाम भी दिए, जिसके ये हकदार भी हैं इसके बावजूद एक सवाल निश्चय ही हमारे सामने मुह बाए खड़ा है की सवा सौ करोड़ की आवादी वाले देश को पदको के लिए इस कदर तड़पना क्यों पड़ता है?
पदको की जीत के साथ ही इनामों की झडी लग गई इनामों की घोषणाएं इस तेजी से राज्य सरकारों द्वारा की गई कि कई लोगों को तो पदक मिलने की जानकारी इनाम मिलने कि घोषणा के बाद ही मिली होगी काश! इसी प्रकार का जोश और दानवृत्ति हमारे देश में खेल सुविधाओं की आधारभूत संरचनाएं विकसित करने में दिखाई देती तो शायद हम पदकों के लिए इस कदर नही तरसते
हमारे देश में खेल प्रतिभा की भी कमी नही है पर उसे पूरी तरह फलने-फूलने का अवसर नही मिल पाता अच्छे कोच की कमी, आधुनिक खेल संसाधनों का अभाव, खिलाडिओं को वित्तीय सहायता का समुचित प्रबंध होना, खेल प्रबंधन की कमी इत्यादि कारकों के साथ साथ राजनितिक इच्छाशक्ति का अभाव इसके लिए जिम्मेवार हैं खेलों सम्बन्धी आधारभूत संरचना के अभाव में ही जाने कितनी खेल योग्यताएं उभरने से पहले ही दम तोड़ देती हैं
सामान्य दिनों में जनता की अभिरुचि भी मात्र क्रिकेट से जुड़कर रह जाती है जितनी क्रिकेट के प्रति जागरूकता के दर्शन होते हैं उतनी शायद राष्ट्रीय खेल हाकी के प्रति भी नही बच्चों को बल्ला और गेंद आसानी से मिल जाती है पर उन्हें कुश्ती,जिम्नास्टिक, तैराकी, पोल-वाल्ट, बास्केटबाल, हाकी इत्यादि से जुड़ने का मौका शायद ही पाता है ऐसे में ओलम्पिक में हमारा पिछड़ना लाजमी है इस स्थिति से उभरने के लिए हमें 'खेल का मतलब क्रिकेट' की मानसिकता छोड़नी होगी
विद्यालय स्तर से ही खेल प्रतियोगिताओं के आयोजनों तथा उसमे उभरते प्रतिभाओं की पहचान कर उनके निरंतर विकास को अग्रसारित किया जाना अत्यन्त आवश्यक हैनिचले स्तर से खेल प्रतिभाओं के विकास को प्रदान की गई उचित दिशा ही हमें ओलम्पिक में पदकों के सुखाड़ से निजात दिला सकती है
बीजिंग ओलम्पिक में हमारे खिलाड़ियों का पिछले ओलंपिकों के मुकाबले निश्चय ही एक कदम ऊपर का प्रदर्शन रहा है पर जनसँख्या में विश्व में दुसरे स्थान पर रहने वाले भारत के सवा सौ करोड़ लोगो के लिए यह मात्र संतोस्प्रद परिणाम ही कहा जा सकता है. इसे एक सुनहरे खेल भविष्य की और एक संकेत मानकर अगले ओलम्पिक में ज्यादा पदकों के निश्चय के साथ अभी से दृढ़तापूर्वक प्रयास प्रारम्भ कर देना चाहिएतभी हम खेलों के अगले पायदान तक पहुँच सकेंगे

Friday, August 22, 2008

खबरों का सबसे ताकतवर माध्‍यम है रेडियो

कमल शर्मा

मेरे एक मित्र सृजन शिल्‍पी जी का कहना है कि पत्रकारों, आओं अब गांवों की ओर लौटें। वे कहते हैं कि ‘बिजली और केबल कनेक्शन के अभाव में टेलीविज़न भी ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाता। ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा सशक्त माध्यम बचता है जो सुगमता से सुदूर गांवों-देहातों में रहने वाले जन-जन तक बिना किसी बाधा के पहुंचता है। रेडियो आम जनता का माध्यम है और इसकी पहुंच हर जगह है, इसलिए ग्रामीण पत्रकारिता के ध्वजवाहक की भूमिका रेडियो को ही निभानी पड़ेगी। रेडियो के माध्यम से ग्रामीण पत्रकारिता को नई बुलंदियों तक पहुंचाया जा सकता है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए आयाम खोले जा सकते हैं। इसके लिए रेडियो को अपना मिशन महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज्य के स्वप्न को साकार करने को बनाना पड़ेगा और उसको ध्यान में रखते हुए अपने कार्यक्रमों के स्वरूप और सामग्री में अनुकूल परिवर्तन करने होंगे। निश्चित रूप से इस अभियान में रेडियो की भूमिका केवल एक उत्प्रेरक की ही होगी।‘ असल में देखा जाए तो गांवों में ही नहीं, महानगरों, शहरों और कस्‍बों में भी रेडियो बड़ी भूमिका निभा सकता है। आकाशवाणी और बीबीसी आज भी खबरों के लिए गांवों और कस्‍बों में रह रहे लाखों लोगों के लिए समाचार, विचार और मनोरंजन का सशक्‍त माध्‍यम बना हुआ है। देहातों से निकलने वाले छोटे अखबारों के लिए आज भी रेडियो प्राण है।

आकाशवाणी से आने वाले धीमी गति के समाचार इन अखबारों में सुने नहीं लिखे जाते थे ताकि ये अखबार अपनी समाचार जरुरत को पूरा कर सके। शाम को आने वाले खेल समाचार और प्रादेशिक समाचार के बुलेटिन भी यहां ध्‍यान दो-चार पत्रकार बैठकर सुनते थे। वर्ष 1988 में मुझे हरियाणा के कस्‍बे, लेकिन अब शहर करनाल में एक अखबार विश्‍व मानव में काम करने का मौका मिला, जहां दिन भर रेडियो की खबरों को सुना और लिखा जाता था। समाचार एजेंसियों से ज्‍यादा वहां रेडियों को महत्‍व दिया जाता था। हमारे यहां भाषा की सेवा थी लेकिन महीने में यह कई बार चलती ही नहीं थी, ऐसे में रेडियो हमें बचा ले जाता था, अन्‍यथा हो सकता था कि हमें बगैर समाचार के अखबार छापना पड़ता। आज भी गांवों और सीमांत क्षेत्रों में रेडियो का महत्‍व कम नहीं हुआ है। लोग खूब सुनते हैं समाचार, विश्‍लेषण और खास रपटें। यह खबर बीबीसी और आकाशवाणी पर सुनी है, यानी कन्‍फर्म हो गया। ऐसा कहते हैं गांवों में आज भी। हालांकि, यह भी सच है कि रेडियो पर आनी वाली खबरों, खबर कार्यक्रमों में बेहद बदलाव की जरुरत है। नई पीढ़ी की जरुरत के कार्यक्रम शामिल करने होंगे। जहां तक मेरा ज्ञान है सरकार ने एफएम रेडियो को न्‍यूज में आने की अनुमति अभी नहीं दी है। यदि सरकार यह अनुमति दे दें तो गांव भी बेहतर प्रगति कर सकते हैं लेकिन फिर रेडियो सेवा चलाने वालों को यह ध्‍यान में रखना होगा कि वे ग्रामीण पत्रकारिता का विशेष ख्‍याल रखें।

रेडियो पर 24x7 समाचार सेवा दूसरे किसी भी माध्‍यम से बेहतर चल सकती है। इस पर भी टीवी माध्‍यम की तरह समाचार की लाइव सेवा चलाई जा सकती है। अंतरराष्‍ट्रीय, राष्‍ट्रीय, राज्‍यस्‍तरीय समाचारों के अलावा देश के विभिन्‍न जिलों के मुख्‍य समाचार सुनाए जा सकते हैं। खेल, कारोबार, संस्‍कृति, मनोरंजन, इंटरव्‍यू, अपराध, महिला, बच्‍चों से जुड़े समाचार यानी वह सब कुछ जो एक अखबार या टीवी माध्‍यम में बताया जा सकता है। मनोरंजन के अलावा लाइफ स्‍टाइल, कैरियर, शॉपिंग, सिनेमा, शिक्षा आदि सभी के बारे में प्रोग्राम सुनाए जा सकते हैं। यहां मैं जिक्र करुंगा मुंबई विश्‍वविद्यालय का जिसने 107.8 एफएम पर चार घंटे कैम्‍पस समाचार, सेमिनार और विविध विषयों पर चर्चा करने की योजना बनाई है। मेरा ऐसा मानना है कि कम्‍युनिटी रेडियो से हटकर हरेक भाषाओं और हिंदी में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर समाचारों के लिए कार्य किया जा सकता है। प्रिंट माध्‍यम में कई बार छोटे-छोटे गांवों में हर रोज अखबार ही नहीं पहुंच पाते या जो पहुंचते हैं वे वहां पहुंचते-पहुंचते बासी हो जाते हैं। साथ ही किसी अखबार घराने को दो चार प्रतियां भेजने में रुचि भी नहीं रहती। इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम को देखें तो गांवों को बिजली ही नहीं मिल पाती, अब तो यह हालत छोटे और मध्‍यम शहरों की भी है।

मुंबई जहां मैं रहता हूं, के आखिरी उपनगर दहिसर से केवल 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वसई से लेकर आगे तक के उपनगरों में रोज दस से बारह घंटे बिजली नहीं रहती, समूचे देश की भी स्थिति बिजली के मामले में यही है। देश के दो चार राज्‍य ऐसे होंगे जिन्‍हें छोड़कर हर जगह बिजली की बेहद कमी है। साथ ही गांवों में लोगों को केबल के 200-300 रुपए महीना देना भारी लगता है। लाखों लोग आज भी इस स्थिति में है रंगीन तो छोडि़ए श्‍याम श्‍वेत टीवी भी नहीं खरीद सकते। दूसरों के यहां टीवी होता है, उसे टुकर टुकर देखते रहते हैं। बच्‍चे सपने बुनते रहते हैं कि बड़ा होऊंगा तब टीवी जरुर खरीदूंगा। इसलिए टीवी समाचारों से एक बड़ा वर्ग इन तीन वजहों से वंचित हो जाता है। अब बात करते हैं वेब समाचारों का। जब बिजली ही नहीं तो कंप्‍यूटर कैसे चलेगा। एक कंप्‍यूटर और स्‍टेबलाइजर के लिए कम से कम 30-35 हजार रुपए खर्च करने होते हैं जो हरेक के बस की बात नहीं है।

लेकिन अब तो रेडियो एफएम के साथ 30 रुपए से लेकर 500 रुपए तक की हर रेंज में ईयर फोन के साथ मिलते हैं। दो पैंसिल सेल डाल लिए, और जुड़ गए देश, दुनिया से। यह आकाशवाणी है...या...बीबीसी की इस पहली सभा में आपका स्‍वागत है...। आया न मजा.... क्‍या खेत, क्‍या खलिहान, पशुओं का दूध निकालते हुए, उन्‍हें चराते हुए, शहर में दूध व सब्‍जी बेचने जाते हुए, साइकिल, मोटर साइकिल, बस, रेल, दुकान, नौकरी, कार ड्राइव करते हुए सब जगह समाचार, मनोरंजन वह भी 30 रुपए के रेडियो में..रेडियो खराब भी हो गया तो ज्‍यादा गम नहीं....नया ले लेंगे फिर मजदूरी कर। लेकिन मौजूदा आकाशवाणी, रेडियो सेवा चलाने वाले लोगों की जरुरत के अनुरुप खबरें और कार्यक्रम नहीं दे पा रहे हैं जिससे इनका प्रचलन कम हुआ है। मेरे मित्र सेठ होशंगाबादी बता रहे थे कि मध्‍य प्रदेश और महाराष्‍ट्र के अनेक ऐसे इलाकों में मैं घूमा हूं जहां ढोर चराते लोग और ग्‍वाले, साइकिल पर जाते लोग रेडियो कान से सटाकर रखते थे लेकिन अब यह प्रचलन घटा है। रेडियो श्रोता संघ तो पूरी तरह खत्‍म से हो गए हैं। रेडियो सेवा देने वाले यदि लोगों की आवश्‍यकता पर शोध करें तो रेडियो प्रिंट, टीवी और वेब माध्‍यम को काफी पीछे छोड़कर सबसे शक्तिशाली माध्‍यम बन सकता है।

Wednesday, August 20, 2008

इस मौकापरस्ती को सलाम !

नदीम अख़्तर


क्या आप इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं कि आज का युग मौकेबाज़ों, धोखाबाज़ों, दग़ाबाज़ों, अटकलबाज़ों, अड़ंगेबाज़ों, पैंतरेबाज़ों, सौदेबाज़ों, माफ़ियाबाज़ों, दलालीबाज़ों और भ्रष्टबाज़ों को सलाम करता है। अगर नहीं रखते, तो झारखंड चले आइये। गुरुघंटाल की कसम आपको हर हैरतअंगेज़ लगनेवाली बात पर यकीन होने लगेगा। झारखंड को देखकर अच्छे से अच्छा और बड़े से बड़ा नास्तिक भी ईश्र्वर की सत्ता पर भरोसा करने लगेगा। गुरुजी (शिबू सोरेन) को देखकर पांच टाइम का नमाज़ पढ़ने लगेगा, मधु कोड़ा को देखकर सुबह-शाम पूजा पाठ करने लगेगा और निर्दलीयों को देखकर चर्च जाने लगेगा। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है, मधु कोड़ा को शिबू सोरेन भर-भर मुंह आशीर्वाद दिया करते थे। कोड़ा भी दिन में तीन बार डॉक्टरी सलाह मानने टाइप शिबू सोरेन के पैर छूते रहते थे। अचानक दोनों को छुआछूत का रोग धर लिया। गुरुजी अपना पुराना रंग में उतरेऔर सिंगल प्वाइंट प्रोग्राम कुर्सी पर आके चिपक गये। असल में गुरुजी को जानने वाले इस बात से तो कतई इंकार नहीं कर सकते कि उनकी पहली और आखिरी इच्छा अगर कुछ है, तो वह है सीएम बनना और वह भी झारखंड का ही। उनके सीने में मुख्यमंत्रिया आग बरसों से धधक रही थी लेकिन अवसर ही नहीं मिल पा रहा था। इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर शिबू सोरेन का बस चलता, तो वह जब नरसिम्हा राव की सरकार को बचाने के एवज में पैसे ले रहे थे, उस समय वे खुद के लिए झारखंड का मुख्यमंत्री पद ही मांगते। लेकिन, शिबू सोरेन का दुर्भाग्य कहिए कि उस समय झारखंड ही नहीं बना था और नोटों की हरियाली तो गुरुजी को कहीं भी उठा/बैठा/सुता देती है, यह सभी जानते हैं इसलिए उस समय उनके दिमाग़ में कुछ सूझा ही नहीं होगा। खैर मौका था माल टान लेने का, तो गुरुजी ने टान लिया था। फिर झारखंड बना तो अपने और अपने परिवार के लिए गुरुजी ने जो हसीन सपने देखे थे, उन्हें पूरा करने में जुट गये। लेकिन, हाय रे किस्मत एक बार शिबू सोरेन को बीजेपी वालों ने दग़ा दे दिया। कांग्रेस वालों की तो औकात ही नहीं रही कभी उन्हें सीएम बनाने की। और आज है, तो कांग्रेस भी टुकुर-टुकुर ताक रही है और कांग्रेसी नेता यही सोच रहे हैं कि कैसे ई बुढ़उ निर्दलीय बम का पलीता में आग लगाये और इससे होनेवाली आतिशबाज़ी का हम लोग खूब आनंद उठायें। खैर मौका एक बार फिर गुरुजी के दरवाजे पर दस्तक दे चुका है, लेकिन कुर्सी में खाली एक ठो पौवा है। तीन पौवा अभी भी छितराया हुआ है। 25 तारीख को सबसे बड़ा मौकेबाज का चुनाव मौका भवन में होनेवाला है। गुरुजी का चरित्र देखकर एक सीख मिलती है कि मौकापरस्ती में कभी कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं हो सकता। कल तक जिसे अपना बेटा मान रहे थे, उसे आज गंदी-गंदी गालियां दे रहे हैं। दूसरी ओर मधु कोड़ अपने पिता समान गुरुजी के सामने कल तक साक्षात दंडवत थे, आज कहते फिर रहे हैं कि बुढ़ुवा सठिया गया है। खैर, मधु कोड़ा हों या शिबू सोरेन इतना तय है कि झारखंड की राजनीति फिलहाल इन्हीं के इर्द-गिर्द रेंगती नज़र आयेगी। झारखंड के लोग भी मानसिक रूप से इतने सशक्त नहीं हैं कि वे इन जैसे नेताओं से बाहर आकर कुछ सोच पायें या किसी और अच्छे आदमी को चुन पायें। इन्हीं बंधु तिर्की बहुत अच्छा नेता लगता है। झारखंडियों को शिबू सोरेन का वीजन (???) बहुत अच्छा लगता है। गड्ढा-ढिप्पा, पानी का न आना, लाजवंती बिजली का पर्दा में रहना और चारों तरफ शिष्टाचार का रूप धारण कर चुके भ्रष्टाचार को यहां के लोगों ने विकास मान लिया है। और अगर इन तत्वों पर कोड़ा जी या फिर किसी भी पिछली सरकार को कसौटी पर कसेंगे, तो पायेंगे कि कोड़ा सरकार नम्बर वन है। इस सरकार ने जैसे क्रांतिकारी कार्य किये हैं, वैसी पिछली कोई सरकार करने में कामयाब नहीं हो पायी। इनकी ही सरकार के मंत्री के यहां इसी सरकार के कार्यकाल में नोट गिनने की मशीन खरीदा गयी। इन्हीं के कार्यकाल में डीटीओ का पद दो करोड़ में बिका और रांची के निबंधक की कुर्सी के लिए प्रति माह डेढ़ करोड़ में डील हुआ है। एक मोबाइल इंसपेक्टर की पोस्टिंग (मनचाही) की कीमत 25 लाख तक हो गयी है। ज़मीन जिसे, जितना चाहिए पहले माल डाउन कीजिए और आदिवासी लैंड को रैयती दिखा कर किन लीजिए। अद्‌भुत उपलब्धि है भइ। किसी राज्य में ऐसा देखा-सुना है आपने। साफ-साफ तो संकेत देते हैं ये नेता - आज हमको मौका मिला, तो दूह लिये..कल तुमको मिलेगा तुम भी दूहना। फिलहाल नम्बर में गुरुजी हैं-चलिये दूहने दीजिए उनको, हटिये क्योंकि इस मौकापरस्ती को ही झारखंडी सलाम करते हैं!!! बुझे कुछो कि नहीं?
(रांचीहल्ला सर्वेक्षण में 76 फीसदी लोगों ने शिबू सोरेन को मौकापरस्त बताया है।)

Tuesday, August 19, 2008

एक आदिम सच की तरह
रंजीत
यह तथ्य हमारे गांवों की है जिसकी पुष्टि गत दिनों इंग्लैंड के ससेक्स और कैंट शहर में हुई। इंग्लैंड के इकोनोमिक एंड सोशल रिसर्च काउंसिल के समाज शास्त्री रूपर्ट ब्राउन ने गत दिनों अपने एक वर्ष के गहन अनुसंधान का निचोड़ रखते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को कट्टर या सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) बनाने में प्राथमिक विद्यालयों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। ब्राउन साहेब ने आनुसंधानिक सर्वेक्षण के हवाले से कहा कि अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, उच्च जाति, निम्न जाति जैसी भावनाएं अगर बाल्यावस्था में एक बार पैदा हो गयीं तो वे ताजिन्दगी खत्म नहीं होंती। अगर किसी तरह चेतन मन से ये भावनाएं गायब भी हो गयीं तो भी अवचेतन में वे जिंदा रहती हैं और समय-समय पर पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार के द्वारा अभिव्यक्त होती रहती हैं। प्राथमिक विद्यालय वह मंच है जहां बच्चों को ऐसी परिस्थितियों से सीधा सामना होता है , जहां वे विभिन्न जाति, धर्म और नस्लीय समुदायों के साथ साझा समय व्यतीत करते हैं। अगर विद्यालय का माहौल सेकुलर हुआ तो बच्चे के सेकुलर होने की संभावना काफी ज्यादा होती है। अगर माहौल उलट रहा तो भेदभाव की ग्रंथियां विकसित होने की भी पूरी संभावना रहती है।जी हां, बाउन साहेब आप सही कह रहे हैं।आप सौ फीसदी सही फरमा रहे हैं। यह सर्वेक्षण अचानक मुझे अपने गांवों के पुराने प्राथमिक विद्यालय और मध्य विद्यालय की याद दिला गया। जहां नौवें वर्ग तक हमलोग अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, बैकवर्ड और फारवर्ड जैसे शब्दों से अपरिचित थे। हमलोग आपस में लड़ते-झगड़ते जरूर थे, लेकिन ऐसा एक भी वाकया मुझे याद नहीं आ रहा है जब हमने जाति या धर्म की किसी बात पर लड़ाई, झगड़ा या गुटबंदी की हो। दिमाग पर लाख जोर देने के बाद भी किसी शिक्षक का कोई ऐसा व्यवहार या वाणी याद नहीं आता जिनमें जाति या धर्म की कोई बू रही हो। हमारे शिक्षक छात्र-छात्राओं को उपनाम जरूर देते थे, लेकिन वे विद्यार्थियों की जाति या धर्म के सूचक नहीं होते थे बल्कि उनके बाह्य गुण-अवगुण के सूचक होते थे। मुझे गणित के शिक्षक मोहमद खुरशीद आलम (सर) याद आते हैं- वे तीव्र बुद्धि के इंसान थे और उनसे बड़ा सेकुलर व्यक्ति मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा। वे वात्सल्य की प्रतिमूर्ति थे। वे संयोगवश भी किन्हीं विद्यार्थियों को उनके वास्तविक नाम से नहीं पुकारते थे। किसी को विभीषण कहते तो किसी को तेलचट्टा तो किसी को बनसियार, किसी को भूतनाथ तो किसी को गोनू झा तो किसी को मियां नसीरुद्दीन। उन्होंने एक दिन पान की एक दुकान पर पान खाते समय खड़े-खड़े घोषणा कर दी कि अगर बोर्ड की परीक्षा साफ-सुथरी हुई तो उनके पचास छात्र और दस छात्राएं ही पास कर पायेंगेऔर प्रथम श्रेणी में सिर्फ एक लड़का ही पास करेगा। मास्टर साहेब की यह सार्वजनिक घोषणा उनके बगल में खड़े इलाके के एक दबंग को पसंद नहीं आया और उसने उन पर एक जाति विशेष की तरफदारी करने का आरोप जड़ दिया। यह बात मास्टर साहेब को इतनी बुरी लगी कि उन्होंने उस व्यक्ति से कभी बात नहीं करने की कसम ले ली। वह व्यक्ति कालांतर में विधायक और मंत्री तक बन गये, लेकिन खुरसीद आलम सर ने उनसे कभी बात नहीं की।हालांकि आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जातिवाद और धर्मवाद की गंदी राजनीति उन विद्यालयों में भी सांप्रदायिकता की बीज पहुंचा चुकी है। प्राथमिक कक्षा के छात्र भी बैकवर्ड, फारवर्ड, मंदिर- मस्जिद , दंगा -फसाद के मायने समझने लगे हैं। मुझे एक अन्य घटना याद आती है। तब हम आठवें वर्ग के छात्र थे और उन दिनों भागलपुर में भीषण सांप्रदायिक दंगा हो रहा था। एक दिन हमारे वर्ग के एक छात्र ने समाज शास्त्र के शिक्षक से पूछ डाला था- दंगा क्या होता है, मास्टर साहेब ? मास्टर साहब ने इसका उत्तर कुछ यूं दिया था- जब आदमीपर पागलपन का भूत सवार हो जाता है तो वह दंगा करने लगता है .. .मैट्रिक पास करने के बाद कॉलेज में प्रवेश किया तो पहली बार अगड़ा-पिछड़ा, मंदिर-मस्जिद का अर्थ समझ में आया। इस दौरान उच्च शिक्षा के दौरान विश्वविद्यालय और कॉलेजों में कई अवसरों पर विभिन्न गुटों में शामिल कराया गयाया मजबूरी और जिज्ञाशा में खुद भी शामिल हुआ। कभी जाति के आधार पर तो कभी धर्म के आधार पर। लेकिन मुझे ये गुट कभी रास नहीं आये। आज सोचता हूं कि आखिर यह कैसे संभव है कि मैं आज भी अपने कई दोस्तों की जाति नहीं जानता। जबकि कुछ के साथ दोस्ती हुये कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मैं उनकी जाति नहीं जानता। .. . शायद मेरे विद्यालय मेरे साथ चल रहे हैं, कर्म में भी और वचन में भी और जीवन में भी .. . एक आदिम सच की तरह यह मेरे जीवन में शामिल है। हमेशा, हमेशा, हमेशा .... किसी को हो न हो भारत को तो इसपर जरूर फक्र होगा।

Sunday, August 17, 2008

कब तक हम विदेश भैजेगे अपने बच्चो को डक्टरी पढ़ाने ..?

इन दिनो देश के ढ़ेरो बच्चे डाक्टरी की शिक्षा पाने के लिये चीन , रूस आदि देशो की ओर जा रहे है . इससे जहां एक तरफ भारत को आर्थिक नुकसान हो रहा है वही लोगो को असाधारण असुविधा हो रही है . पर बचचो के सुखद भविष्य की कामना में लोग यह कदम उठाने को विवश है. ईन देशो से मेडिकल शिक्षित बच्चो को देश में प्रैक्टिस करने के लिये ima की एक परीक्षा पास करणी होती है .
यदि सरकार आर्थिक कारणौ से नये मेडिकल कालेज नही खौल पा रही है तो , निजी क्षेत्र को मेडिकल कालेज शुरू करने दे , इन कालेजो से पास बचचे ima की वही परीक्षा पास करके अपनी प्रैक्टिस कर सकते है .
देश की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है यदि मेदिकल कालेज नही खोले गये तो कुछ ही वर्षो में डाक्टर ढ़ूढ़े नही मिलेंगे .
क्या सोचते है आप?

बंधन और स्वतंत्रता के संयुक्त अवसर पर..............

एक ओर स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं हम ...
दूसरी ओर रक्षा बंधन ...
तो बंधन और स्वतंत्रता के संयुक्त अवसर पर चिंतन करें .
स्वतंत्रता के लिये हम जान देने को तैयार हैं , फिर हमें आखिर बंधन अच्छा क्यो आर कैसे लगता है ....?
उत्तर है हमें वह बंधन अच्छा लगता है जिसमें बहन का सा निश्छल प्यार हो , जिसमें रक्षा का संकल्प हो !
तो ऐसे पावन पुनीत अवसर पर सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई , मंगलकामनायें .
स्वतंत्रता की रक्षा , भावना के बंधन की रक्षा ,हेतु कृत संकल्प हो हम सब .
विवेक रंजन श्रीवास्तव , जबलपुर

Thursday, August 14, 2008

गबरू जवान हुआ एक किशोर

नदीम अख्तर

प्रभात खबर ने किशोरावस्था की दहलीज़ लांघकर जवानी की सीढ़ियों पर कदम रख दिया है। 14 अगस्त 1984 को शुरू हुआ कारवां आज (2008 में) 25वें वर्ष में प्रवेश कर गया। रांची से प्रभात खबर ने जो लंबी पारी की शुरुआत की थी, उसकी सार्थक परिणति धीरे-धीरे ही सही लेकिन दृढ़ता के साथ सामने आयी। हरिवंश जी के कुशल नेतृत्व में प्रभात खबर ने जो बुलंदियां हासिल की हैं, मीडिया समूह में उसकी मिसाल फिलहाल कहीं नज़र नहीं आती। एक गुमनाम अखबार को 24 वर्षों की अवधि में हरिवंश जी और उनकी टीम ने जिस अथक मेहनत से आज पूरे देश का एक आदर्श स्थापित स्वरूप प्रदान किया है, वह वास्तव में सीखनेवाली बात है। वैसे तो प्रभात खबर के इस सफर के कई साथी रहे, लेकिन आज भी श्रीनिवास जी, मधुकर जी, ओम प्रकाश अश्क जी, अनुज कुमार सिन्हा जी, विजय पाठक जी, विनय भूषण जी, अनिल झा जी जैसे लोग प्रभात खबर को जो बेशकीमती ऊर्जा दे रहे हैं, उसकी बदौलत अखबार बुलंद हौसलों के साथ आगे बढ़ता जा रहा है। प्रभात खबर के 25वें वर्ष के प्रवेश के अवसर पर अखबार की साज-सज्जा में बेहतरीन बदलाव लाये गये हैं, जो पाठकों को और रुचिकर पठनीयता प्रदान करने में सक्षम प्रतीत हो रहे हैं। प्रभात खबर के पचीस वर्ष पूरे होने के मौके पर एक पुस्तक के लोकार्पण की भी योजना है, जिसे निराला लिख रहे हैं, ऐसी खबर है। प्रभात खबर के 24 वर्ष पूरे होने और पचीसवें वर्ष में प्रवेश करने रांचीहल्ला टीम की ओर से ढेर सारी बधाइयां।
जाम ख़ाली है फिर भी...


रजत कुमार गुप्ता

रात चुप-चाप है पर शायद खामोश नहीं,
कैसे कह दूं कि आज फिर होश नहीं
ऐसा डूबा हूं मैं तुम्हारी आंखों में,
हाथ में जाम है पर पीने का होश नहीं ।।

शेर में आंख को शायर ने जिस मकसद से इस्तेमाल किया है, मेरा मकसद उससे भिन्न है। पिछले कई महीनों से झारखंड में शराब की दुकानें बंद हैं। सरकारी द्वारा इन दुकानों की नीलामी नहीं हो पायी है। आधिकारिक तौर पर इसमें कई तकनीकी अड़ंगे हैं। लिहाजा शराब की दुकानों के शटर गिर चुके हैं यानी शराब नहीं मिल रही है। यह तो सरकारी बात हुई। अब वास्तविकता के धरातल पर उतारें तो हकीकत यह है कि दुकानें बंद होने के बाद भी धड़ल्ले से शराब बिक रही है। तो फिर नुकसान किसे है? सिर्फ और सिर्फ सरकार को। यूं तो इससे आम आदमी का कोई रिश्ता नहीं पर अगर गहराई से देखें तो इससे सिर्फ आम आदमी का ही वास्ता है। वरना सरकारी राजस्व की चिंता दूसरों को क्यों भला रहे।
गैर कानूनी तरीके से बिक रही शराब के लिए "प्यासों' को अधिक दाम देना पड़ रहा है। शराब के दुकानदारों ने इसकी जो वैकल्पिक व्यवस्था की है, वे उसका दाम उन्हीं से वसूल रहे हैं। सरकारी अधिकारी, जिन्हें गलत कारोबार रोकने के लिए वेतन मिलता है, इस धंधे को अप्रत्यक्ष संरक्षण देने के लिए अतिरिक्त घूस ले रहे हैं। नीति निर्धारकों ने इस विलंब की स्थिति को बनाये रखने के लिए ही दाम वसूले हैं। नतीजा है कि दूसरे राज्यों से शराब आने अथवा यहां की इकाइयों में उनके उत्पादन का काम यथावत चल रहा है। दुकानों तक शराब पहुंचने का सारा क्रम यथावत होने के बाद भी सरकार को बंदी के नाम पर राजस्व नहीं मिल रहा है।
वैसे यह स्थिति क्यों है, इसका खुलासा आवश्यक है। अखबारों में इस बारे में थोड़ा बहुत छपने के बाद भी मित्रों ने सच कहने का पूरा साहस नहीं किया है। लीजिए कहानी का सस्पेंस समाप्त कर देते हैं। इस शराब के ठेका में अपनी हिस्सेदारी की मांग पर झारखंड के एक नेता ने टांग अड़ा रखी है। उन्हें पहले की तुलना में अधिक हिस्सेदारी चाहिए। दूसरी तरफ राज्य के कुछ शहरों खासकर धनबाद और बोकारो की दुकानों के लिए शराब व्यापारी वह रकम देने पर तैयार नहीं है, जिसकी मांग की जा रही है। धनबाद और बोकारो की यह स्थिति सिर्फ इस वजह से है क्योंकि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल से लोग अपनी "जरूरत का माल' सस्ते में हासिल कर लेते हैं। वैसे शराब की इस गंगा में पक्ष और विपक्ष दोनों के महारथी बह रहे हैं। इसके पहले भी कई अवसरों पर नकली अड़चन पैदा करने के लिए इन्हीं तैराकों ने शराब सिंडिकेट की मदद की है।
अब नेताजी की बढ़ी मांग ने शराब व्यापारियों को नाराज कर दिया है। उनकी नाराजगी का ही आलम है कि सरकार का सारा अमला अब मामले को सुलझाने में जुटा हुआ है। राज्य में गरीबी से होने वाली मौत पर फाइलें उतनी तेजी से नहीं चलती, जितनी की शराब के ठेके की चलती है। जीता-जागता उदाहरण सामने है। सभी को याद होगा कि रामगढ़-ओरमांझी के बीच हुए एक सड़क हादसे में 25 लोग मारे गये। सरकार में शामिल किसी को उनके परिजनों को मुआवजा देने की याद नहीं आयी। सारी सरकार विधायक रमेश सिंह मुंडा की नक्सलियों द्वारा की गयी हत्या से थर्रायी हुई थी। यह है सरकार की प्राथमिकता की असलियत।
इसीलिए तो कहता हूं यारों कि इशारों को समझो
ज़िंदगी ग़मों से भरी है, फिर भी जिए जा रहे हैं,
जाम ख़ाली है फिर भी पिए जा रहे हैं।
जाने क्या क़शिश है उनकी आंखों में,
क्या हम उस बेवफा से वफा किए जा रहे हैं।।

Wednesday, August 13, 2008

स्वतंत्रता दिवस की वर्षगांठ

प्रमोद

वाह! स्वतंत्रता दिवस की एक और वर्षगांठ की कल्पना कर मन प्रफुल्लित हो रहा हैयाद करने का समय आया है राष्ट्रभक्त आजादी के दीवानों की कुर्बानियां, उनके द्वारा संजोये गए देश के स्वरुप की कल्पना, जो इतिहास की किताबों में सांसे ले रही हैविडम्बना यह है की प्रथम स्वतंत्रता दिवस को भारत के जिस संरूप की कल्पना की गई थी वह प्रत्येक वर्षगांठ के साथ विकृत रूप ग्रहण करती जा रही हैआजादी की प्रथम वर्षगांठ पर हमारे सामने गर्व करने के लिए थी राष्ट्र को स्वतंत्र कराये जाने के लिए किए गए संग्राम एवं बलिदानों की कहानीआज है हमारे पास मानवीय मूल्यों के ह्रास की कहानी
उत्सव मनाकर ही हमारे कर्तव्य की इतिश्री नही होने वालाअगर हम में जरा-सी भी शर्मो-हया बाकी है तो यह सोचने की बात है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण के मंजर के गवाह तिरंगे को हम क्या मुंह दिखायेंगे? शान से लहराते तिरंगे के निचे खड़े होकर हम कैसे यह स्वीकारेंगे कि हमने राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय मूल्यों का गला घोंट दिया है और इसकी शान में गंभीर गुस्ताखी की है
यह आख़िर कैसे स्वीकारेंगे हम कि जिस राजनैतिक इच्छाशक्ति के बल पर हमने अंग्रेजो को भगा दिया था आज उसका ध्वंश हो चुका हैहम आज संसद में रुपयों के खेल को देखकर भी लज्जित नही होतेलोकतंत्र की मर्यादा को बार-बार कलंकित करते हैंअब राष्ट्रहित की बात पीछे रह गई है और तुच्छ राजनैतिक हितसाधन के लिए किसी हद तक गिरने में हमें कोई संकोच नही होतासरकारें बनाने और बचाने के किए कोई भी तिकड़म आजमाने से हम बाज नही आतेचुनावों में जो एक दूसरे को धुर विरोधी बताते है चुनावों के उपरांत कुर्सी के लिए गले मिल जाते हैं
स्वतंत्रता दिवस की वर्षगांठ पर हर्षोल्लास की जो भावभूमि हम निर्मित करेंगे उसके नीचे का सत्य क्या देखने योग्य होगा? किस मुंह से बताएँगे हम तिरंगे को कि आजादी की लड़ाई को सभी जाति-सम्प्रदाय के लोगों ने एक साथ मिलकर लड़ा था पर आज अपने स्वार्थपूर्ण हितों की पूर्ति के लिए हमने उसे इस कदर विभाजित कर दिया है की वे एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हो जाते हैंअब वाह एकता इतिहास की बात ही रह गई है
तिरंगे के नीचे खड़े होकर हम कैसे स्वीकारेंगे कि वह स्वंत्रता के समय निर्धारित जिन मूल्यों का गवाह है अब उन मूल्यों की कोई कीमत नही रह गई हैअब उसका स्थान भ्रस्टाचार, धार्मिक कट्टरता, जातिगत विभेद, स्वार्थपरकता, संवेदनशुन्यता आदि ने ग्रहण कर लिया हैआज़ादी के समय सम्पूर्ण भारत ने जिस एकता का परिचय दिया था उसका स्थान अब क्षेत्रवाद ने ले लिया हैदेश भाषागत-जातिगत-सम्प्रदायगत विभेद की आग में झुलस रहा हैकैसे कह पाएंगे हम कि जिस इच्छाशक्ति के समक्ष शक्तिशाली अंग्रेज नही टिक पाए वह अब आपसी विद्वेष को भी दूर कर पाने में सक्षम नही रहीबापू ने जिस अहिंसा को अपना हथियार बनाया था उसे हम कब का भूल गए और हिंसा की पराकाष्ठा पर पहुंचकर नर-पिशाच बने घूम रहे हैं
हम कहेंगे, सब स्वीकारेंगे, पर बेशर्मों की तरह क्योंकि हममें शर्म नाम की चीज अब बची ही नहीसच स्वीकारने से हमें कोई ऐतराज़ नहीं पर हम आत्ममंथन नही करेंगेहम जियेंगे, लडेंगे, मरेंगे, सबकुछ करेंगे पर बेशर्मों की तरह तिरंगे को फहराकर, ढोल-नगाडे बजाकर, मिठाइयां बाटकर, आने वाले प्रत्येक स्वंत्रता दिवस की वर्षगांठ धूम-धाम से मनाएंगे और फ़िर अगले रोज से देश पर लगे जख्मों को कुरेदने बैठ जायेंगे


Monday, August 11, 2008

कम्प्यूटर पीड़ित


विवेक रंजन श्रीवास्तव
हमारा समय कम्प्यूटर का है, इधर उधर जहॉ देखें, कम्प्यूटर ही नजर आते है, हर पढा लिखा युवा कम्प्यूटर इंजीनियर है, और विदेष यात्रा करता दिखता है। अपने समय की सर्वश्रेष्ठ षिक्षा पाकर, श्रेष्ठतम सरकारी नौकरी पर लगने के बाद भी आज के प्रौढ पिता वेतन के जिस मुकाम पर पहुंच पाए है, उससे कही अधिक से ही, उनके युवा बच्चे निजी संस्थानों में अपनी नौकरी प्रारंभ कर रहे हैं, यह सब कम्प्यूटर का प्रभाव ही है।
कम्प्यूटर ने भ्रष्टाचार निवारण के क्षेत्र में वो कर दिखाखा है, जो बडी से बडी सामाजिक क्रांति नही कर सकती थी। पुराने समय में कितने मजे थे, मेरे जैसे जुगाडू लोग, काले कोट वाले टीण् सी से गुपचुप बातें करते थे, और सीधे रिजर्वेषन पा जाते थे। अब हम कम्प्यूटर पीडितों की श्रेणी में आ गए है - दो महीने पहले से रिजर्वेषन करवा लो तो ठीक, वरना कोई जुगाड नही। कोई दाल नही गलने वाली, भला यह भी कोई बात हुई। यह सब मुए कम्प्यूटर के कारण ही हुआ है।
कितना अच्छा समय था, कलेक्द्रेट के बाबू साहब शाम को जब घर लौटते थे तो उनकी जेबें भरी रहती थीं अब तो कम्प्यूटरीकरण नें `` सिंगल विंडो प्रणाली बना दी है, जब लोगों से मेल मुलाकात ही नही होगी, तो भला कोई किसी को `ओबलाइज कैसे करेगा, हुये ना बडे बाबू कम्प्यूटर पीडित।
दाल में नमक बराबर, हेराफेरी करने की इजाजत तो हमारी पुरातन परंपरा तक देती है, तभी तो ऐसे प्यारे प्यारे मुहावरे बने हैं, पर यह असंवेदनशील कम्प्यूटर भला इंसानी जज्बातों को क्या समझे ? यहॉ तो ``एंटर´´ का बटन दबा नही कि चटपट सब कुछ रजिस्टर हो गया, कहीं कोई मौका ही नही।
वैसे कम्प्यूटर दो नंबरी पीडा भर नही देता सच्ची बात तो यह है कि इस कम्प्यूटर युग में नंबर दो पर रहना ही कौन चाहता है, मैं तो आजन्म एक नंबरी हूं, मेरी राषि ही बारह राषियों में पहली है, मै कक्षा पहली से अब तक लगातार नंबर एक पर पास होता रहा हूंं । जो पहली नौकरी मिली , आज तक उसी में लगा हुआ हूंं यद्यपि मेरी प्रतिभा को देखकर, मित्र कहते रहते हैं, कि मैं कोई दूसरी नौकरी क्यों नही करता `` नौकरी डॉट कॉम की मदद से,पर अपने को दो नंबर का कोई काम पसंद ही नही है, सो पहली नौकरी को ही बाकायदा लैटर पैड और विजिटिंग कार्ड पर चिपकाए घूम रहे हैं। आज के पीडित युवाओं की तरह नही कि सगाई के समय किसी कंपनी में , षादी के समय किसी और में , एवं हनीमून से लौटकर किसी तीसरी कंपनी में , ये लोग तो इतनी नौकरियॉं बदलते हैं कि जब तक मॉं बाप इनकी पहली कंपनी का सही- सही नाम बोलना सीख पाते है, ये फट से और बडे पे पैकेज के साथ, दूसरी कंपनी में षिफ्ट कर जाते हैं, इन्हें केाई सेंटीमेंटल लगाव ही नही होता अपने जॉब से। मैं तो उस समय का प्राणी हूं, जब सेंटीमेंटस का इतना महत्व था कि पहली पत्नी को जीवन भर ढोने का संकल्प, यदि उंंघते- उंंघते भी ले लिया तो बस ले लिया। पटे न पटे, कितनी भी नोंकझोंक हो पर निभाना तो है, निभाने में कठिनाई हो तो खुद निभो।
आज के कम्प्यूटर पीडितों की तरह नही कि इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए प्यार हो गया और चीटिंग करते हुए षादी,फिर बीटिंग करते हुए तलाक।
हॉं हम कम्प्यूटर की एक नंबरी पीडाओं की चर्चा कर रहे थ्ेा, अब तो `` पैन ³ªाइव´´ का जमाना है, पहले फ्लॉपी होती थी, जो चाहे जब धोखा दे देती थी, एक कम्प्यूटर से कॉपी करके ले जाओ, तो दूसरे पर खुलने से ही इंकार कर देती थी। आज भी कभी साफ्टवेयर मैच नही करता, कभी फोंन्टस मैच नही करते, अक्सर कम्प्यूटर, मौके पर ऐसा धोखा देते हैं कि सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है, फिर बैकअप से निकालने की कोषिष करते रहो। कभी जल्दबाजी में पासवर्ड याद नही आता, तो कभी सर्वर डाउन रहता है। कभी साइट नही खुलती तो कभी पॉप अप खुल जाता है, कभी वायरस आ जाते हैं तो कभी हैर्कस आपकी जरुरी जानकारी ले भागते हैं, अर्थात कम्प्यूटर ने जितना आराम दिया है, उससे ज्यादा पीडायें भी दी हैं। हर दिन एक नई डिवाइस बाजार में आ जाती है, ``सेलरॉन´´ से ``पी-5´´ के कम्प्यूटर बदलते- बदलते और सीण्डी ड्राइव से डीण्वीण्डी राईटर तक का सफर , डाट मैट्रिक्स से लेजर प्रिंटर तक बदलाव, अपडेट रहने के चक्कर में मेरा तो बजट ही बिगड रहा है। पायरेटेड साफ्टवेयर न खरीदने के अपने एक नंबरी आदर्शों के चलते मेरी कम्प्यूटर पीडित होने की समस्यांए अनंत हैं, आप की आप जानें। अजब दुनिया है इंटरनेट की कहॉं तो हम अपनी एक-एक जानकारी छिपा कर रखते हैं, और कहॉं इंटरनेट पर सब कुछ खुला- खुला है, वैब कैम से तो लोंगों के बैडरुम तक सार्वजनिक है, तो हैं ना हम सब किसी न किसी तरह कम्प्यूटर पीड़ित ?
विवेक रंजन श्रीवास्तव
रामपुर, जबलपुर





Sunday, August 10, 2008

इन तस्वीरों को गौर से देखिये
ये तस्वीरें चीन की हैं। असल में पिछले 7 अगस्त से अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश चीन की यात्रा पर हैं। 10 अगस्त (रविवार) को बुश बीजिंग के एक चर्च में सन्डे मास प्रेयर में भाग लेने गए। उनकी सुरक्षा का हवाला दे कर वहाँ से ईसाई धर्म के मानने वालों को निकाल दिया गया। यहाँ तक कि जो लोग इस चर्च में पिछले 50 सालों से प्रार्थना करते आ रहे हैं, उन बूढे लोगों को भी भगा दिया गया। बुश इस चर्च में इसलिए गए थे, ताकि वे चीन में धार्मिक स्वतन्त्रता को अधिकार के रूप में देश में सशक्त तरीके से लागू करवा सकें। दूसरी ओर उनके इस प्रयास को उनके चर्च के भीतर जाते ही चीनी पुलिस ने धूल धूसरित कर दिए। मतलब साफ़ है, इस दुनिया में धर्म को मानने या न मानने का पैमाना भी अब अमीरी के आगे बौना हो गया है। अमीर, शक्तिशाली और समृद्ध जॉर्ज बुश को रोकना तो मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है इसलिए गरीब ईसाइयों को ही रोक दिया गया। तेल लेने गया उनकी धार्मिक स्वतन्त्रता का मामला....