Friday, October 31, 2008

गुस्सा दबा रह जाता है...!!

गुस्सा तो बहुत आता है......

जाने कब मैं इन .........

इन कमीनों को मार बैठूं .........

गुस्सा दबा रह जाता है !!

गुस्सा बहुत आता है.......

की इनको नंगा करके .........

गधे की पीठ पर दौडाऊं..........

गुस्सा दबा रह जाता है !!

गुस्सा तो बहुत आता है.....

इनका मुंह काला करवाकर...

इनके मुंह पर थूक्वाऊँ ..........

गुस्सा दबा रह जाता है...!!

गुस्सा बहुत आता है.....

समूची जनता से इन्हें...

लात-घूँसे बरसवाऊं .....

गुस्सा दबा ही रह जाता है...!!

इस देश का कुछ भी नहीं बन सकता...

....मैं अभी ............

कुर्बानी के लिए तैयार ही नहीं.....!!!!

Thursday, October 30, 2008

मुश्किलें जिनके साथ जीने में हैं !!

मुश्किलें उनके साथ जीने में है ,

जिनके हाथ इतने मजबूत हैं कि-
तोड़ सकते हैं किसी की भी गर्दन !

मुश्किलें उनके साथ जीने में है,

जो कर रहे हैं हर वक्त-

किसी ना किसी का या.....

हर किसी का जीना हराम !

मुश्किलें उनके साथ जीने में है .....

जिनके लिए जीवन एक खेल है ,

और किसी को भी मार डालना -

उनके खेल का एक अटूट हिस्सा !

मुश्किलें उनके साथ जीने में है ........

जो कुछ नहीं समझते देश को......

और देश का संविधान......

उनके पैरों की जूतियाँ !!

मुश्किलें उनके साथ जीने में है .....

जो सब कुछ इस तरह हड़प कर रहे हैं,

जैसे सब कुछ उनके बाप का ही हो.....

और भारत माता.....उनकी रखैल....!!

मुश्किलें उनके साथ जीने में है,

जिनको बना दिया गया है.....

इतना ज्यादा ताकतवर......

कि वो उड़ा रहे हैं.....

क़ानून का मखौल और...

आम आदमी की धज्जियाँ !! ...
दरअसल ये मुश्किलें.......
हमारे ही साथ हैं.....
हम सबके ही साथ हैं......
मगर सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि
हम सबको ......

जिनके साथ जीने में मुश्किल है ,
उनको .........कोई भी मुश्किल नहीं !!!!







Wednesday, October 29, 2008

आखिर क्या स‌िखाता है स‌ंघ?

कुछ दिनों पहले जनसत्ता में प्रभाष जोशी ने एक लेख लिखा था। आज महाराष्ट्र में हिंसा का जो टांडव चल रहा है, उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह लेख काफी प्रासंगिक लगा। लेख पुराना तो है, लेकिन वर्तमान स‌ंदर्भों स‌े जोड़कर पढ़ेंगे, काफी बातें आइने की तरह स‌ाफ-साफ नज़र आयेंगी।

हिंदू आतंकवादी और हिंदू आतंकवादी संगठन पढ़ने में ही कितना अटपटा लगता है। लेकिन मुंबई में आजकल यही पढ़ रहा हूँ। क्या महाराष्ट्र और महाराष्ट्रियनों में ही ऐसा कुछ है कि वे इस तरह की व्यर्थ और सिरफिरी हिंसा की तरफ खिंचे चले आते हैं, और प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा की कार्रवाई करते है, जैसी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था के रमेश गडकरी और मंगेश निकम ने की? ऐसा क्यों हुआ कि हिंसक प्रतिशोध को राष्ट्र बनाने की प्रेरणा बता कर हिंदुत्व का सिद्घांत निकालने वाले विनायक दामोदर सावरकर भी यहीं हुए और उनके वाहियात शिष्य बाला साहेब ठाकरे भी यहीं विराज रहे हैं? महाराष्ट्र वीरों की भूमि है और शिवाजी महाराज प्रतिशोध की नपुंसक हिंसा का गान और अमल करने वाले तो कभी नहीं थे। फिर क्याऐसी हिंसा को वीरता समझने वालों की एक कमजोर प्रवृत्ति यहाँ चलती आई है। बहुत पीछे नहीं कोई सौ सवा सौ साल पहले ही यहाँ सावरकर हुए। बचपन में मस्जिद पर पत्थर फेंकने से लेकर अभिनव भारत समाज जैसे तथाकथित क्रांतिकारी संगठन उनने बनाए। मदनलाल ढींगरा से सर विलियम कर्जन विली को मरवाने से लेकर नाथूराम गोडसे से महात्मा गांधी तक की हत्या करवाने के पुण्य कार्य उनने किए। दुनिया भर में वीर और क्रांतिकारी वे कहे जाते है जो खुद शस्त्र उठाते हैं और या तो फांसी पर झूल जाते हैं या लड़ते हुए मारे जाते हैं। अपने स्वातंत्रय वीर और क्रांतिकारी सावरकर ने हमेशा दूसरों के हाथ पिस्तौल थमाई और खुद दूर खड़े छल कपट से बचते रहे। और आखिर अस्सी पार करने के बाद बिस्तर पर बुढ़ापे से मरे। बदले की भावना और साजिश से भारत को स्वतंत्र करवाने का उपदेश देने वाले सावरकर को वीर और क्रांतिकारी तो वही मान सकते हैं जो जानते नहीं कि वीरों की हिंसा क्या होती है। इन वीर सावरकर के दो बड़े शिष्य अपने राजनीतिक जीवन में हैं। एक बाला साहेब ठाकरे और दूसरे लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी।

हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था बाला साहेब ठाकरे या उनकी शिवसेना की बनवाई हुई नहीं है। पुलिस को इनके विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े होने या प्रेरित होने के सूत्र भी नहीं मिले है। कहते हैं कोई छह साल हुए एक सभा हो रही थी जिसमें हिंदू देवी देवताओं की निंदा की जा रही थी किसी एक श्रोता ने खड़े होकर इसका विरोध किया। उसे चुप कर दिया गया। लेकिन उसने हिंदू संस्थाओं को इकट्ठा किया और ऐसे सब मौकों पर हिंदू विरोध दर्ज करने के लिए यह हिंदू जन जागृति समिति बनाई। एक सूचना कहती है कि उसे डॉक्टर जयंत आठवले ने बनाया।

इसी से सनातन संस्था भी जुड़ गई जो पनवेल के देवगाँव इलाके से सनातन संकुल आश्रम से चलती है। गुरूकृपा प्रतिष्ठान इस संकुल को चलाता हैं सनातन संस्था कोई अठारह साल से चल रही है। उसका दावा है कि वह सामाजिक कार्य, सत्संग और ध्यान योग ओर आध्यात्मिकता की तलाश में लगे लोगों की संस्था है। महाराष्ट्र भर के पढ़े लिखे लोग दुनियादारी छोड़ कर यहाँ समाज सेवा करने और आध्यात्मिकता में जीने को आते हैं। संस्था हिंदू धर्म और देवी देवताओं के अपमान का विरोध करती हैं। लेकिन हम शांति और संवैधानिक तौर-तरीकों में विश्वास करते हैं। रमेश गडकरी हमारे यहाँ रहता था, लेकिन बम बनाने और फोड़ने की आतंकवादी हरकतों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।


ऐसा लगता है कि हिंदू जन जागृति समिति सनातन संस्था के लोगों ने बनाई है और जमीन से ज्यादा इसकी उपस्थिति ऑन लाइन हैं। इसका कोई मुख्यालय कहीं दिखाई नहीं देता। इसका उद्देश्य हिंदू धर्म की निंदा करने और बदनाम करने वालों के विरुद्घ विश्व भर के हिंदुओं को एक और संगठित करना है। अभी इसका वैश्चिक एजंडा हॉलीवुड फिल्म लव गुरु का विरोध करना और गोवा में स्कूल की किताबों से हिंदू विरोधी उद्घरण हटवाना और रामसेतु की रक्षा करना है। ये दोनों संस्थाएँ मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों का विरोध करती रही हैं। जोधा अकबर फिल्म में इन्हें हिंदू देवी देवताओं का अपमान दिखा और मराठी नाटक आम्ही पाचपुते में महाभारत और उसके पात्रों का मखौल उड़ते लगा। हिंदुओं की भावनाओं को चोट पहुँचाने वाले ऐसे नाटक, फिल्म, चित्र आदि का विरोध करना इन संस्थाओं के लोगों को अपना काम लगता है।

अब महाराष्ट्र पुलिस ने जिन रमेश गडकरी, मंगेश निकम, विक्रम भावे और संतोष आंग्रे को गिरफ्तार किया है वे जोधा अकबर और आम्ही पाचपुते जैसी फिल्म और नाटक का शांतिपूर्ण विरोध करने तक ही नहीं रुके। उनने बम बनाए और जिन हॉलों में यह फिल्म दिखाई और नाटक खेला जा रहा था वहां उन्हें फोड़ा। वाशी नवी मुंबई के विष्णुदास भावे ऑडिटोरियम में इकतीस मई को और ठाणे के गडकरी रंगायतन में चार जून को इनने जो बम फोड़े उनमें से नवी मुंबई में तो कुछ नहीं हुआ पर ठाणे में सात लोग घायल हुए। इसके पहले फरवरी में नए पनवेल के एक सिनेमाघर में भी अनगढ़ बम फोड़ा गया था जहाँ जोधा अकबर फिल्म दिखाई जा रही थी। वहाँ भी कोई हताहत नहीं हुआ था, बम बनाने और फोड़ने की इनकी करतूतों को देखते हुए साफ है कि न तो इन्हें भयंकर मारकर बम बनाना आता है न ये उनसें ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाना जानते हैं।

फिर भी समाज सेवा और अध्यात्म में लगी संस्था के ये लोग बम बनाने और फोड़ने जैसे आतंकवादी अभियान में कैसे और क्यों लग गए। सबसे मजेदार किस्सा रमेश गडकरी का है। समिति और संस्था के ये पचास साल के सेवक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किए हुए हैं और अभी आठ साल पहले तक सफल दुकानदार थे। अंधेरी में उनकी दुकान थी। वे संस्था के सेवकों के संपर्क में आए। उनके काम और उपदेशों का उन पर ऐसा असर पड़ा कि उनने अपनी दुकान बेच दी और जो पैसा मिला उसे बैंक में रख दिया जिसके ब्याज से उनका घर चलता है। उनकी पत्नी नीला भी उनके साथ संस्था की सेविका हो गई। तीन साल पहले इन दोनों ने सांगली का अपना घर भी छोड़ दिया और पनवेल में सनातन संस्था के संकुल आश्रम में आकर रहने लगे। तब तक गडकरी को बम बनाने और फोड़ने में न तो कोई रुचि थी न जानकारी न अनुभव। उनके दोनों दामाद भी सनातन संस्था के सेवक हो गए थे।

आश्रम में गडकरी की मंगेश निकम से जान पहचान हुई जो धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई। मंगेश निकम ने कुएँ खोदने वाले एक व्यक्ति से गोला-बारूद मिलाना और विस्फोट करना सीखा था। यही जानकारी बम बनाने के काम भी आई। गडकरी और निकम ने आम्ही पाचपुते मराठी नाटक के विरुद्घ विरोध प्रदर्शन किया था। सतारा के रहने वाले निकम अब गडकरी के साथ मिल कर इस नाटक से होने वाले अपमान का बदला लेना चाहते थे। निकम बम बनाने की सामग्री अमोनियम नाइट्रेट, विस्फोटक, र्छे आदि लेकर आया और उनने सनातन संकुल आश्रम के एक कमरे में बम बनाया। गड़करी गुरुकृपा प्रतिष्ठान की मोटरसाइकिल से बम लेकर निकला, आश्रम की लॉग बुक में उसकी मोटरसाइकिल का नंबर और उसका निकलना दर्ज था। ठाणे के गड़गरी रंग आयतन की पार्किग में ले जाकर रमेश गड़गरी ने गाड़ी खड़ी की वहाँ की लॉग बुक में भी इसी मोटरसाइकिल का नम्बर दर्ज था। आतंकवादी विरोधी दस्ता इन लॉग बुकों के जारिए ही रमेश गडकरी तक इन गतिविधियों से अनजान बता कर उनसे पूरी तरह अलग किया है। और दावा किया है कि उसने आतंकवादी विरोधी दस्ते की खोजबीन में मदद की है। मंगेश निकम ने बम बनाने और फोड़ने में जिन दूसरे लोगों की मदद की थी उनमें से विक्रम भावे और संतोष आंग्रे भी पकड़े गए हैं। रायगढ़ जिले के पेन के रहने वाले विक्रम भावे भी सनातन संकुल आश्रम में आकर रहने लगे थे। वहीं उनकी बम बनाने वाले निकम और गडकरी से मुलाकात हुई थी। संतोष आंग्रे तो आश्रम में ड्राइवर का काम करता था। इनने पनवेल के एक सिनेमा घर में बम रखा था, जिसका विस्फोट नहीं हुआ। रत्नागिरी में एक ईसाई उपदेशक के घर के बाहर भी इनने बम रखा था, जिससे कोई नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन उसमें निकम और दूसरे लोग पकड़े गए थे जो इस साल सत्रह अप्रैल को कोर्ट से छूटे।

इन लोगों की ये सभी कोशिशें देखी जाएँ तो साफ हो जाता है कि न तो ये शातिर पेशेवर अपराधी हैं न इन्हें ठीक से बम बनाना और उन्हें मंजे हुए आतंकवादी की तरह जानमाल के ज्यादा से नुकसान करने के साथ फोड़ना आता है। ये निश्चित ही अपने धर्म और देवी देवताओं के अपमान के विरोध में प्रदर्शन करते हुए हिंसा के रास्ते चले गए और वैसे ही काम करने लगे जैसे सिख और मुसलिम आतंकवादियों ने इस देश में किए हैं। लेकिन इनकी अनुभवहीनता और जानमाल का नुकसान न पहुँचा पाने की मारक अक्षमता इनके अपराध को कम नहीं करती न यह बताती है कि इनके इरादे नेक थे। इनकी संस्थाओं ने इनके कुकर्मों से अपने को अलग करते हुए भी कहा है कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाना बंद होना चाहिए।

लेकिन बाला साहेब ठाकरे के अखबार सामना ने बाकायदा एक संपादकीय लिख कर इन कोशिशों को मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद बताया है। संपादकीय ने कहा है कि हमने जब सुना कि हिंदू लोग भी बम बनाने लगे हैं तो हमें खुशी हुई। लेकिन क्या तो ये घामड़ बम और कहाँ ये फोड़े गए। ठाणे में जो सात घायल हुए वे हिंदू ही हैं। हिंदुओं को खूब ताकतवर बम बनाने चाहिए और उन्हें ठाणे और नवी मुंबई में बन रहे छोटे-छोटे पाकिस्तानों में फोड़ना चाहिए ताकि इस्लामी आतंकवादियों के मारक बमों का जवाब दिया जा सके। लेकिन इनसे भी हिंदुओं और हिंदुत्व की सही रक्षा नहीं होगी। भारत में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ इसलामी आतंकवादियों का राज है और वहाँ पुलिस भी जाने से डरती है। हिंदू संगठनों को जैश, अल कायदा और हिजबुल जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों से सीखना चाहिए। अपने ऐसे आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए कि वे भारत में बने छोटे-छोटे पाकिस्तानों को नष्ट करके उनमें और मुसलमानों में दहशत फैला सके।

यानी हिंदू जन जागृति समिति और सनातन संस्था वाले कितना ही कहें कि वे शांति और संवैधानिक तौर-तरीकों में विश्वास करते हैं और पकड़े गए बम बनाने और फोड़ने वालों की करतूतों से उनका कोई लेना-देना नहीं है, शिवसेना चाहती है कि वे बड़ा आतंक मचा देने वाले संगठन हो जाएँ। सामना को शर्म है तो इस बात की कि इन मूखरे ने क्या तो घामड़ बम बनाए और कहां ले जाकर उन्हें फोड़ा। सामना चाहता है कि आतंक मचाने और हिंसा करने में इन हिंदू संगठनों को इस्लामी आतंकवादी संगठनों से भी ज्यादा चतुर, चुस्त और चाक चौबंद होना चाहिए। हम सब सभी किस्म के आतंकवाद को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन शिवसेना हिंदुओं को आतंकवाद में अव्वल और सक्षम बनाना चाहती है। अब बेचारे वेंकैया नायडू कह रहें हैं कि हमें अपने राज्य को मजबूत करना चाहिए ताकि वह आतंकवाद से निपट सके। सामना कहता है किसका राज्य ? हिंदुओं को वीर और हिंसक होना चाहिए ताकि इस्लामी आतंकवाद से निपट सकें।

वेंकैया नायडू को संघ से पूछना चाहिए। क्या वह भी हिंदुओं को वीर और हिंसक नहीं बनाना चाहता ? सावरकर और हेडगेवार और गोलवलकर क्या कह गए हैं ? संघ क्या सिखाता है?

सबसे गाफिल प्यार कर जाएँ !!

सबको हो मंगलमय दीपावली
सब बातें करे अब भली-भली !!
सब काम आयें अब सबके
सबमें हो इक जिन्दादिली !!
सब एक दुसरे को थाम लें
सबमे भर जाए दरियादिली !!
हर आदमी में कुछ ख़ास हो
हर आदमी में इक खलबली !!
हर आदमी को खुशियाँ मिले
और गम को मारे आकर खली !!
आज गम और कल है ख़ुशी
ये जिंदगी बड़ी है चुलबुली !!
आओ प्यार कर लें "गाफिल"
फिर जिन्दगी जायेगी चली !!

Tuesday, October 28, 2008

दीवाली .....ये क्या करें ??

.................दीवाली की रात बीत चली है ....दिल का उचाटपन बढ़ता ही चला जा रहा है .....सबको दीवाली की शुभकामनाएं देना चाहता हूँ....मगर वे जिनकी सामर्थ्य नहीं दीवाली मनाने की.....जो आज भी भूखे पेट बैठे ताक़ रहे हैं टुकुर-टुकुर महलों की तरफ़....वे जो बाढ़ के बाद जगह-जगह कैम्पों में अपने सूनेपन को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं......वे जिनके रिश्तेदार देश की सीमा की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए हैं .....बच्चों के छोड गए पटाखों को चुन रहे सड़कों पर कुछ काले-कलूटे बच्चे......क़र्ज़ ना चुका पाने की वजह से आत्महत्या कर चुके किसानों के बचे हुए परिवार ......दाने-दाने को मोहताज़ करोड़ों लोग.....जो ना जाने किस क्षण काल-कलवित हो जाने वाले हैं .......ठण्ड में खुले आसमान के नीचे सोने वाले छत-विहीन लोग .....ठण्ड से बिलबिलाते ...कंपकंपाते
आसमान में फटते जोरदार पटाखों की ओर बड़ी ही हसरत से ताकते गरीब-गुर्गे ...........!!.....दीपावली .....देश का सबसे प्रमुख पर्व ........बहुसंख्यक समाज का प्रमुख पर्व .......दीवाली....लफ्ज़ के मायने संम्पन्नता का.... वैभव का प्रदर्शन ....दीवाली....मतलब अरबों-अरबों रूपये का धुंआ बनकर आसमान में क्षण भर में उड़ जाना ..... दीवाली... मतलब ...गरीबों की आंखों का फटा-का-फटा रह जाना .... उनकी हसरतों का जग जाना ...... सोचता हूँ हमें इस कदर मुकम्मल तरीके से दीवाली मनाता देख यदि इनका मन भी एक दिन मचल ही जाए तो ये क्या करेंगे .... मैं तो जो जवाब सोच रहा हूँ,सो सोच रहा हूँ.....आप ही बताये ना कि ये क्या करेंगे ?? मैं जवाब के इंतज़ार में हूँ !!!!

Monday, October 27, 2008

रात को कोई राया था !!

रात आँख खुल गयी
एक सपने ने छुआ था !
आँख भी नम थी,शायद
रात को मैं रोया था !!
आज वो खिल-खिल उठा
बीज जो मैंने बोया था !!
देर तक सोता ही रहा
बड़े दिनों से सोया था!!
आज वो बिखर ही गया
ख्वाब जो मैंने संजोया था !
मुझसे प्यार मांगता था
खुदा रु-ब-रु रोया था !!
था वो जनाजे में शामिल
जिसने मुझे डुबोया था !!
वो मेरे नजदीक था, पर
करवट बदल कर सोया था !
उसके आंसुओं से "गाफिल"
अपना जिस्म भिंगोया था !!

Saturday, October 25, 2008

ज़र्रे से आफताब तक

झारखंड के नेताओं पर लग रहे भ्रष्टाचार के ताबड़तोड़ आरोपों की हकीकत क्या अदालती हस्तक्षेप से सामने आ पायेगी?











नदीम
अख्तर

"लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो, जिसके मुंह में लगाम है।'
प्रख्यात कवि धूमिल की अंतिम कविता की ये अंतिम पंक्तियां हैं। जिस समय उन्होंने ये पंक्तियां लिखी होंगी, उस समय भले ही इनकी प्रासंगिकता कहीं और रही होगी लेकिन आज झारखंड में इसकी व्याख्या आम आदमी की सटीक तस्वीर सामने लाने वाली सिद्ध हो रही है। झारखंड के कुछ लोहारों (राजनेताओं) की वजह से घोड़ों (आम आदमी) के मुंह लहुलुहान हैं। पिछले महीने (सितंबर 2008) सत्ता और बिचौलियों की सांठगांठ के ऐसे-ऐसे उदाहरण सामने आये, जिनसे राज्य का एक बड़ा वर्ग स्तब्ध हुआ। मीडिया ने मसालेदार खबरें छापीं और राजनीतिक विरोधियों ने खूब छींटाकशी की। बात इतनी बढ़ी कि अदालत की दहलीज़ तक जा पहुंची। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल यह रह गया कि क्या भ्रष्टाचार के ये आरोप कभी सिद्ध भी हो पायेंगे।
अब इसे कालक्रम का खेल ही कहेंगे कि एक नवसृजित राज्य में लूट संस्कृति की शुरुआत के आठ साल के बाद कहानी का पटाक्षेप हुआ भी तो राज्य के बाहर। मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गत 17 सितंबर की सुबह दुबई जाते वक्त जमशेदपुर (झारखंड) निवासी संजय चौधरी नामक एक व्यक्ति को कस्टम विभाग के लोगों ने रोका। तलाशी के दौरान इस व्यक्ति के पास से भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिली। वह विदेशी मुद्रा दुबई ले जा रहा था, जिसे नेशनल बैंक ऑफ दुबई के खाते में जमा कराया जाता। स्थानीय मीडिया ने यह दावा किया कि जिस संजय चौधरी को मुंबई कस्टम ने पकड़ा, उसके संबंध पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से रहे हैं। यही वजह है कि कल तक एक मामूली सा व्यवसाय करनेवाला व्यक्ति आज एक अरबपति बन गया। इस दौरान कई दस्तावेज़ गुपचुप तरीके से मीडिया को उपलब्ध कराये गये, जिनमें झारखंड के खाली होते खज़ाने की असलियत छुपी है। हद तो तब हो गयी, जब पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने यह कह दिया कि वे किसी संजय चौधरी को नहीं जानते। दूसरी ओर दस्तावेज़ बताते हैं कि जिस संजय चौधरी को उन्होंने पहचानने से इंकार कर दिया, उसके पासपोर्ट की अनुशंसा खुद मधु कोड़ा ने की थी। बात यहीं खत्म नहीं हुई। किसी ज़माने में पार्टी लाइन के कारण मधु कोड़ा के शुभचिंतक रह चुके भाजपा विधायक सरयू राय ने यह खुलासा कर दिया कि संजय चौधरी और मधु कोड़ा एक साथ थाइलैंड गये थे। सरयू राय कहते हैं - "मधु कोड़ा को यह बताना चाहिए कि 2005 में विजयादशमी के दिन कोलकाता से थाई एयरवेज़ के जहाज़ से जब वे बैंकॉक गये थे, तो उनके साथ दो अन्य लोग कौन थे। क्या वे संजय चौधरी और बिनोद सिन्हा नहीं थे।' असल में आरोप यह है कि मधु कोड़ा ने अपने कार्यकाल के दौरान संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के माध्यम से अनैतिक तरीके से अकूत संपत्ति अर्जित की और सत्ता से नज़दीकी का इस्तेमाल करते हुए सारा धन विदेशों में निवेश किया। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि आखिर झारखंड के खज़ाने से कितने अरब रुपये बाहर जा चुके हैं।
वैसे इस मामले में जो दूसरा नाम सामने आया है वह है बिनोद सिन्हा का। उनके खाकपति से अरबपति बनने की अलग कहानी है। बेइंतहा ज़मीन-जायदाद, कई फ्लैट, महंगी गाड़ियों व फैक्ट्रियों के मालिक बिनोद सिन्हा झारखंड गठन से पहले एनएसयूआइ के चाईबासा नगर अध्यक्ष हुआ करते थे। उस समय लघु सिंचाई विभाग में ठेकेदारी करते थे, जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत 95,000 रुपये कर्ज लिये थे। इसके बाद चार वर्षों (2003-07) में बिनोद सिन्हा अकूत संपत्ति के मालिक हो गये। आखिर इतना सबकुछ कैसे हुआ? सीएम हाउस के कुछ नियमित आगंतुक कहते हैं - "मधु कोड़ा के कार्यकाल में कभी एक भी काम, चाहे वह निजी हो या सरकारी, बिना बिनोद सिन्हा या संजय चौधरी के नहीं हुआ। सीएम हाउस से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और अन्य सचिवालयों में मधु कोड़ा से ज़्यादा आदेश इन दोनों के द्वारा अफसरों को दिया जाता था, जिसका समय से पालन भी हो जाता था।'
झारखंड को कंगाल कर अपना घर भरने की प्रक्रिया के तहत कई नाम सामने आये हैं, जिन्हें लेकर अब मामला अदालत में पहुंचा है। रांची निवासी दुर्गा उरांव ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका (जनहित-4007/2008) दायर कर हरिनारायण राय, एनोस एक्का, कमलेश सिंह, चंद्रप्रकाश चौधरी, दुलाल भुइयां, भानु प्रताप शाही और बंधु तिर्की (सभी राज्य के कैबिनेट मंत्री) की संपत्ति की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। इसी मामले में एक हस्तक्षेप याचिका रांची निवासी अरुण कुमार ने दायर की है, जिसमें उक्त लोगों के साथ-साथ मधु कोड़ा, बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी को भी पार्टी बनाते हुए इन तीनों की संपत्तियों की भी जांच सीबीआइ से कराने की मांग की गयी है। हालांकि अदालत ने इस मामले में अभी कोई फैसला नहीं सुनाया है लेकिन अगर अदालत ने दुर्गा उरांव और अरुण कुमार की याचिकाओं के आधार पर जांच के आदेश दिये, तो परत-दर-परत कई राज़ और खुलते चले जायेंगे।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे मामलों की वैधानिक ज़मीन कितनी मज़बूत होती है। झारखंड हाइकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता और याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं ऋतु कुमार कहती हैं - "लगभग इसी प्रकार का एक मामला पिछले साल (2007 में, वोल 4, एसएससी 380) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था(विश्र्वनाथ चौधरी बनाम केंद्र सरकार एवं अन्य)। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में सीबीआइ को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जांच का आदेश दिया था। अब हमें इंतज़ार है 21 तारीख का, जब उच्च न्यायालय का फैसला आता है।'
वैसे इस मामले में मधु कोड़ा और उनके सहयोगियों को भले ही प्रतिवादी बनाकर न्याय के कटघरे में खड़ा करने की गुहार लग रही हो लेकिन एक हकीकत यह भी है कि झारखंड गठन के बाद से लगभग सभी सरकारों में ऐसे लोग पर्दे के पीछे से खेलते रहे हैं जिनकी गिनती आज के संजय चौधरियों और बिनोद सिन्हाओं में हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। राज्य में जब पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे, तो भाजपा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभानेवाले एनोस एक्का (झारखंड पार्टी के इकलौते विधायक) के सहयोगी/मित्र तिलेश्र्वर साहू को एक बोर्ड में राज्य मंत्री का दर्जा बतौर ईनाम मिला था। उसके बाद उनके एक से एक कारनामों ने उन्हें इतनी ख्याति दिलायी कि अंततः मंत्री एनोस एक्का को ही उनसे किनारा कसना पड़ा। विभिन्न सरकारों को जोबा माझी (यूजीडीपी विधायक) के समर्थन की सौदेबाजी करनेवाले नजम अंसारी को सात साल से आवास बोर्ड की कुर्सी मिली हुई है। उन्होंने शहर के बीचों-बीच बेशकीमती ज़मीन बिल्डरों से बेच दी, तो विधानसभा से लेकर हाइकोर्ट तक के हस्तक्षेप ने पूरी पोल-पट्टी खोल कर रख दी। अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में अमरजीत सिंह उर्फ काले सरदार का बोलबाला था। इसके अलावा मुंडा को कंप्यूटर की शिक्षा देनेवाले तापस मल्लिक ने तो बाकायदा सीएम हाउस से उद्योग स्थापना के लिए सिंगल विंडो सिस्टम खोल रखा था। उस समय यह कहा जाता था कि अगर झारखंड में कुछ करना है, तो पहले तापस जी से हामी भरवा लें। यही हाल बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में भी था। उनकी करीबी महिला मित्र मंजू राय की सरकार में इस कदर पकड़ थी कि सुबह-सुबह कई लाल-पीली बत्तियों वाली गाड़ियों के मालिक मनचाही पोस्टिंग के लिए उनके यहां भीड़ लगाये रहते थे। मरांडी के ही एक और करीबी हुआ करते थे अशोक अग्रवाल जो दिल्ली से झारखंड की नीतियों को तय करने के माहिर माने जाते थे। मधु कोड़ा के कार्यकाल के ही एक और बैक-स्टेज परफॉर्मर थे अरुण श्रीवास्तव। वे थे तो कोड़ा के आप्त सचिव लेकिन उन्होंने क्रशर व्यवसाय में इस कदर पैठ बनायी कि आज झारखंड में इनका नाम गिने-चुने उद्यमियों में लिया जाता है।
इन नामों और कारनामों के बीच बड़ा सवाल यह रह जाता है कि क्या अगर किसी पर अपराध सिद्ध भी हो जाये और उन्हें सजा भी मिल जाये, तो झारखंड और यहां के आम नागरिकों को जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई कैसे होगी। इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन उससे पहले लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी हाइकोर्ट की ओर, जहां कम से कम यह तय हो जाना है कि आखिर ज़र्रे से आफताब तक के सफर में मुसाफिरों की कमीज़ गंदी हुई है या नहीं।
( पब्लिक एजेंडा से साभार)

अमिताभ जी ने शुरू की हिन्दी में ब्लागिंग

अमिताभ जी ने शुरू की हिन्दी में ब्लागिंग,

जया जी के हिन्दी को लेकर बयान और फिर आपके कदम पीछे खींच लेने के कारण मैं बेहद दुखी था ...
अमिताभ जी की हिन्दी ब्लागिंग ने उस पर कुछ मरहम लगाया है ..
हिन्दी ब्लाग जगत में उनका हार्दिक स्वागत है .
रोमन टंकण से हिन्दी में आफ लाइन लिखने हेतु तख्ती साफ्टवेयर का उपयोग कर सकते हैं , यह अंतरजाल पर सहज सुलभ है , फिर ..कट ,पेस्ट से ब्लाग पर सुगमता से पोस्टिंग कर सकते हैं . सभी हिन्दी प्रेमियों हेतु यह सूचना दे रहा हूँ . किसी भी कठिनाई हेतु किसी भी समय निसंकोच मुझे ०९४२५४८४४५२ पर संपर्क किया जा सकता है . हिन्दी ब्लागिंग को बढ़ावा देने हेतु सहज सुलभ हूँ .
http://vivekkevyang.blogspot.com
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http://pitashrikirachnaye.blogspot.com
जैसे मेरे ठिकानों पर हार्दिक स्वागत है .

सादर , दीप पर्व पर बधाई ! इस बार प्रकाश पर्व पर बिजली का अपव्यय बचायें !
विवेक रंजन श्रीवास्तव

Friday, October 24, 2008

गज़लों जैसा कुछ-कुछ ......"गाफिल "

एक बात बताता हूँ तू जरा ध्यान से सुन ,
मैंने बनाई प्यारी-सी खुदा की इक धून !!
जिन्दगी को जीने में कुछ एहतराम बरत,
तू इसे इक मुफलिस के स्वेटर-सा बून !!
जो तुझे मिला है मिला वो मुझे क्यूँ नहीं,
शायद मुझमे नही थे उसे पाने के वो गुण !!
इक राह जा रही है हर वक्त खुदा की और,
मैं चुनता जाता हूँ हर वक्त उसी की धूल !!
ये जो टूटे हुए कुछ ख्वाब बिखरे हुए हैं ,
मैं इधर चुनता हूँ "गाफिल",तू उधर चुन !!

*********************************
दरख्त की है प्यारे प्यास है कितनी ,
रहती है उसमे शायद चिडिया जितनी !!
समंदर अक्सर ही सोचा करता है कि ,
तैरती हैं आख़िर उसमें मछलियाँ कितनी !!
किसी पल को भी चैन से नहीं बैठता ,
आदमी की आख़िर हाय जरूरते कितनी !!
खुदा से तू अब कुछ और तो मत माँग ,
पहले से ही हैं उसकी तुझपे नेमतें कितनी !!
खुशियाँ जितनी भी उन्हें सर पर धर ,
क्यूँ सोचता है हर शै,तू इतनी कि उतनी!!
अपना वक्त आने तो दे अमां "गाफिल",
खुशियाँ भर-भर मिलेंगी तुझे भी उतनी !!

जीवन क्या है...चलता फिरता एक खिलौना !!

""चीजें अपनी गति से चलती ही रहती है ...कोई आता है ...कोई जाता है ....कोई हैरान है ...कोई परेशां है.....कोई प्रतीक्षारत है...कोई भिक्षारत है...कोई कर्मरत है....कोई युद्दरत....कोई क्या कर रहा है ...कोई क्या....जिन्दगी चलती रही है ...जिन्दगी चलती ही रहेगी....कोई आयेगा...कोई जाएगा....!!!!""............जिन्दगी के मायने क्या हैं ....जिन्दगी की चाहत क्या है ....??""ये जिन्दगी....ये जिन्दगी.....ये जिन्दगी आज जो तुम्हारी ...बदन की छोटी- बड़ी नसों में मचल रही है...तुम्हारे पैरों से चल रही है .....ये जिन्दगी .....ये जिन्दगी ...तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है ....तुम्हारे लफ्जों में ढल रही है.....ये जिन्दगी....ये जिन्दगी...बदलते जिस्मों...बदलती शक्लों में चलता-फिरता ये इक शरारा ......जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ......इसी से सारी चहल-पहल है...इसी से रोशन है हर नज़ारा...... सितारे तोड़ो ...या सर झुकाओ...कलम उठाओ या .......तुम्हारी आंखों की रौशनी तक है खेल सारा...ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा ......ये खेल होगा नहीं दुबारा......ये खेल होगा नहीं दुबारा.......!!""
ना जाने कब किसके ये शब्द पढ़े ...सुने थे ....मगर अब जिन्दगी की अमानत बन गए हैं ये शब्द ...अपने आप में इक दास्ताँ बन गए हैं ये शब्द ...!!पैदा होने के बाद जीना ही हमारी तयशुदा नियति है ...ये बात अलग है कि हम इसको किस तरह जीते हैं ..!!लड़-लड़ कर मर जाते हैं...या अपने आप को किसी ख़ास लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न कर देते हैं.....अपने स्वार्थों की पूर्ति में अपना जीवन होम कर देते हैं या अपने जीवन को ही इक वेदी बना लेते हैं.... चला तो किसी भी तरह से जा सकता है ...मगर ऐसे पथ बना जाना जो अनुकरणीय हों ... जो सबके लिए श्रद्धेय हों ....जो अंततः जीवन के समीचीन आदर्शो की गहराई को फ़िर-फ़िर से आंदोलित कर जाएँ ....जीना तो ऐसे भी है ..और वैसे भी ....और जीना कैसे है ....सिर्फ़ यही तो तय करना है हमको !!!!

जीवन कता है...चलता-फिरता एक खिलौना ....!!!

""चीजें अपनी गति से चलती ही रहती है ...कोई आता है ...कोई जाता है ....कोई हैरान है ...कोई परेशां है.....कोई प्रतीक्षारत है...कोई भिक्षारत है...कोई कर्मरत है....कोई युद्दरत....कोई क्या कर रहा है ...कोई क्या....जिन्दगी चलती रही है ...जिन्दगी चलती ही रहेगी....कोई आयेगा...कोई जाएगा....!!!!""............जिन्दगी के मायने क्या हैं ....जिन्दगी की चाहत क्या है ....??""ये जिन्दगी....ये जिन्दगी.....ये जिन्दगी आज जो तुम्हारी ...बदन की छोटी- बड़ी नसों में मचल रही है...तुम्हारे पैरों से चल रही है .....ये जिन्दगी .....ये जिन्दगी ...तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है ....तुम्हारे लफ्जों में ढल रही है.....ये जिन्दगी....ये जिन्दगी...बदलते जिस्मों...बदलती शक्लों में चलता-फिरता ये इक शरारा ......जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ......इसी से सारी चहल-पहल है...इसी से रोशन है हर नज़ारा...... सितारे तोड़ो ...या सर झुकाओ...कलम उठाओ या .......तुम्हारी आंखों की रौशनी तक है खेल सारा...ये खेल होगा नहीं दुबारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा ......ये खेल होगा नहीं दुबारा......ये खेल होगा नहीं दुबारा.......!!""
ना जाने कब किसके ये शब्द पढ़े ...सुने थे ....मगर अब जिन्दगी की अमानत बन गए हैं ये शब्द ...अपने आप में इक दास्ताँ बन गए हैं ये शब्द ...!!पैदा होने के बाद जीना ही हमारी तयशुदा नियति है ...ये बात अलग है कि हम इसको किस तरह जीते हैं ..!!लड़-लड़ कर मर जाते हैं...या अपने आप को किसी ख़ास लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न कर देते हैं.....अपने स्वार्थों की पूर्ति में अपना जीवन होम कर देते हैं या अपने जीवन को ही इक वेदी बना लेते हैं.... चला तो किसी भी तरह से जा सकता है ...मगर ऐसे पथ बना जाना जो अनुकरणीय हों ... जो सबके लिए श्रद्धेय हों ....जो अंततः जीवन के समीचीन आदर्शो की गहराई को फ़िर-फ़िर से आंदोलित कर जाएँ ....जीना तो ऐसे भी है ..और वैसे भी ....और जीना कैसे है ....सिर्फ़ यही तो तय करना है हमको !!!!

Thursday, October 23, 2008

भारत और महाराष्ट्र का द्वंद्व


नदीम अख्तर
तीन दिन पहले जब राज ठाकरे एंड कंपनी ने मुंबई में बिहारी-झारखंडी और यूपी जैसे बेरोजगार ऊर्वर्क राज्यों के लड़कों को पीटा तो मेरे घर में बहस छिड़ी कि क्या यह मानवता है। मैं कह रहा था कि नहीं यह ठीक नहीं है। बिहार-झारखंड या यूपी स‌े गये लोगों का क्या कसूर। क्या वे रोजगार की तलाश में गये थे, इतनी स‌ी ही गलती है न उनकी? मैं चर्चा के दौरान अपने दो भाइयों को यह स‌मझाने की कोशिश कर रहा था कि भारतीय स‌ंविधान की मूल भावना क्या है। कैसे यह स‌भी को एक समान जीने-खाने के अवसर देता है और कैसे विश्र्व के इस स‌बसे बड़े लोकतंत्र में हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, काले-गोरे के लिए एक स‌मान न्याय की व्यवस्था की गयी है और पूरे देश में कहीं भी किसी को भी जाकर रोजी-रोजगार तलाशने और बसने का पूरा हक है, स‌िर्फ कश्मीर को छोड़ कर। मेरे भाइयों की दलील बेहद सतही थी, जो आम जन की भावनाओं पर आधारित थी। पहले तो मेरे भाइयों ने यह कहा कि राज ठाकरे के गुंडों ने जो किया, वो ठीक किया। उनका कहना था कि वहां पहले भी बिहारी-झारखंडी पिटे जा चुके हैं। वहां खतरा है, यह जानकर भी लोग क्यों गये। क्या बिहार-झारखंड के लड़कों को नहीं मालूम कि वहां मनसे के लोग डंडों स‌े उनका स‌्वागत करेंगे। मैंने कहा कि यह कोई बात तो नहीं हुई कि अगर कोई धमकी दे, तो उस राज्य में ही नहीं जाये और न जाये तो क्या करे। परीक्शा तो देनी ही थी। और, अगर ऎसे ही स‌भी राज्यों में निषेध होता रहा तो पूरे देश में लोगों का आना-जाना, रहना, काम करना स‌ब खत्म हो जायेगा। मेरे भाइयों का कहना था - हो जाये खत्म। न जाये कोई मुंबई। हिंदी भाषी राज्यों स‌े गये एक्टर, एक्ट्रेस, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर स‌भी इस बेहयाई पर अपना विरोध प्रकट करें और यूपी या बिहार में आ कर बस जायें। हिम्मत है तो महाराष्ट्र स‌े अपना नाता तोड़ लें। देखते हैं कि कितने दिनों तक चलेगा बॉलीवुड। गिने-चुने लोग ही हैं मराठी, बॉलीवुड में। ज़्यादातर लोग बिहार-झारखंड-यूपी-दिल्ली के मिलेंगे। इसके अलावा, जो लालू यादव आज आंसू बहा रहे हैं, आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं, उनके हाथ में तो पूरा रेलवे है। क्यों नहीं उन्होंने महाराष्ट्र रेलवे स‌े भर्ती बोर्ड को ही भंग कर दिया। क्यों नहीं उन्होंने एक नया रेलवे भर्ती बोर्ड देवघर में स‌्थापित करने का आदेश दे दिया। क्यों नहीं उन्होंने कैबिनेट में इस बात पर स‌हमति बनवायी कि अब मुंबई में रेलवे स‌े स‌ंबंधित कोई काम नहीं होगा।मुंबई या पूरे महाराष्ट्र स‌े रेलवे के एक-एक काम को स‌माप्त करने का आदेश, तुरंत रेल मंत्रालय के स‌्तर स‌े जारी होना चाहिए था। इसके अलावा मेरे भाइयों का यह भी कहना था कि जो लोग अभी मुंबई या कहीं और काम कर रहे हैं, उन्हें धीरे-धीरे करके अपने-अपने राज्यों में लौट जाना चाहिए, ताकि महाराष्ट्र में श्रम शक्ति का टोटा पड़ जाये। वहां की नेगेटिव बातों का प्रचार इतना हो कि निवेशकों में भय उत्पन्न हो जाये। हिन्दीभाषी राज्यों के मुख्यमंत्री किसी भी इनवेस्टर के स‌ाथ स‌मझौता करने स‌े पहले यह तसदीक करें कि किसी भी निवेशक को तभी ज़मीन या आधारभूत स‌ंरचना उपलब्ध करायी जायेगी, जब वे यह लिख कर दें कि उनका कोई प्रोजेक्ट महाराष्ट्र में नहीं लगेगा। इसके अलावा हर वो काम किया जाये, जिससे महाराष्ट्र के राजनेताओं को उनकी करनी का फल हर रोज स‌ूद स‌मेत मिले। मैं विचारों की इस उग्रता स‌े काफी विचलित हो गया। मुझे यह लगा कि लोग अगर इस कदर आक्रोश में हैं, तो कल को कुछ भी करने लगेंगे। हो स‌कता है कि जो युवा जिल्लत झेल के लौटे हैं, बेरोज़गारी के आलम में गलत लोगों के हाथों में भी फंस जायें। फिर क्या होगा, कोई भी आतंकी गिरोह इन युवाओं को पैसे देगा और कहेगा कि मुंबई स‌्टेशन पर एक बैग रख देना। पैसे के लिए तो बेरोजगार कुछ भी करने को तैयार हो जायेगा। फिर फटेगा बम, जिससे मचेगी तबाही और लोग कहेंगे कि आतंकवादी मासूमों की जान लेते हैं। खुदा या भगवान न करे कि कभी ऎसा हो, लेकिन राज ठाकरे या फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, क्या नाम है... हां..विलास राव देशमुख जैसे नेताओं ने महाराष्ट्र को देश स‌े अलग करने का जो षड्यंत्र रचा है, उसस‌े आने वाले दिनों में ऎसा होना तय मानिये। जब दो देशों के बीच (भारत और महाराष्ट्र) वैमनस‌्यता होगी, तो भारत के लोग भी महाराष्ट्र के खिलाफ षड्यंत्र करेंगे ही। फिर आप उसे आतंकवाद का नाम देना चाहें या फिर देशभक्ति का, नारा तो एक ही लगेगा और वो भी हिंदी में- भारत माता की जय !!!

चाँद की दुनिया में है पहला कदम !!

भारत ने भी अपनी ख़ुद की ताकत से चाँद पर अपने कदम बढ़ा दिए,अगले कुछ ही दिनों में "हम"चाँद पर होंगे !!.....हम कौन ? हम याने भारत !!भारत याने हमारा देश !!हमारा देश माने ....वह जगह जहाँ कि हम रहते हैं....जहाँ की मिटटी का उपजा अन्न हम खाते हैं....जहाँ का दिया हम पहनते हैं.... और संजोग से जिसकी किसी भी उपलब्धि पर हमें एक ख़ास किस्म का गर्व बोध होता है...जिसके खिलाड़ियों के किसी खेल के मैदान में जीतने पर हम खुशियों से उत्त्फुल्ल होने लगते हैं......भारत सिर्फ़ एक शब्द ही नहीं हमारी भावना है.... कुछ क्षेत्रों में पाई सफलताओं का जब हम जश्न मनाते हैं...क्या वो हमने ख़ुद ने अर्जित की होती हैं ??यहाँ तक दूर दिगंत में भी कोई भारतीय मूल का व्यक्ति कोई सफलता प्राप्त करता है...तो हमारे देश के अखबार नाचने-गाने लगते हैं...हालाँकि कोई सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले उसके पूर्वज सुदूर किसी देश में जाकर बसे होंगे....और अब उनका भारत से नाता कभी-कभार जाने वाली यादों से ज्यादा कुछ नहीं .....!!
यह सब क्या है ? जाहिर है कि हम जहाँ रहते हैं....उस देश का नाम हमारे लिए सिर्फ़ एक शब्द भर नहीं होता...बल्कि हमारे दिल की अथाह गहराईयाँ उससे जाकर जुड़ जाती हैं.... जैसे हमारे बच्चे की किसी सफलता पर हम स्वयं इतराते हैं ...वैसे भारत की किसी भी सफलता पे हम दिवाली मनाते हैं ....!!
यह सफलता भारत के चंद सपूतों ने अपने कठिनतम कठोर संघर्षों ...कठिनतम कठोर कर्मों ...अदम्य जिजीविषा...अपने भीतर आगे जाने की भीषण आग से झुलाल्स्ते हुए पायी होती है.....मगर उनकी सफलता हमारी सफलता बन जाती है क्यूँ.... हमारे भीतर इससे क्या घटता है....इस प्रश्न का उत्तर ही भारत के प्रति हमारे प्रेम का परिचायक है !!
..................................मगर यह किस किस्म का हमारा प्रेम है...जहाँ हम एक तरफ़ तो अपने किसी भी मिशन की सफलता के लिए हजारों-लाखों प्रयत्न करते हैं...अथक श्रम करते हैं..... मगर भारत की बदहाल हालत को उसके हाल पर ही छोड़ देते हैं....याकि भारत को सवारने का जिम्मा हमने बेहद गन्दी कौम (जिसके लिए कोई भी गली मुझे कमतर जान पड़ती है ) को दे रखा है....निजी क्षेत्र में जो लोग भयंकर कर्म में तल्लीन है ...वहीं सार्वजनिक क्षेत्र में ....भयंकर लालच..लिप्सा...भ्रष्ट...और तमाम अनैतिक कामों में लिप्त....!!देश के कतिपय अच्छे लोग बहरत को जो गौरव प्रदान करते हैं....चंद घटिया लोग उस गौरव को उससे भी ज्यादा मिटटी में मिला देते हैं....ऐसे लोगों के साथ क्या करना चाहिए ...?यह सवाल आज का सबसे बड़ा सवाल है !!
हमारे चंद्र मिशन की सफलता हमारे चालीस वर्षो पहले अन्तरिक्ष में घुसपैठ करने की करने की कहानी है....क्या हमारे राजनेता...हमारे नौकरशाह इससे कुछ सबक ले सकते है....और वास्तव में भारत को उल्लेखनीय...रचनात्मक...सबल..देश भक्ति से परिपूर्ण...अंततः उल्लेखनीय नेतृत्व दे सकते हैं !!??

Wednesday, October 22, 2008

ओ दिल्लीवालों...महाराष्ट्रवालों !!

अरे दिल्ली वालों ...महाराष्ट्र वालों...असम वालों....आओ...आओ...!!
ऐसा करो महाराष्ट्र वालों..तुम बिहारियों को मारों....!!
दिल्लीवालों तुम किसी और को चुन लो....!!
पंजाब वालों...तुम तो बड़े ही हट्टे-कट्टे हो..!!
तुम क्यूँ चुप बैठे रहोगे भाई...;
तुम भी यु.पी वालों को पीटो ना ...!!
अरे भइया ..तुम तो नाराज हो गए हरियाणा वालों....;
तुम दिल्ली वालों को ही कूट डालो...;
कैसे तुम्हारी छाती पर चढ़े बैठे हैं वर्षों से !!
दक्षिणी वालों .....
तुम वां दूर-दूर से क्या ताक़ रहे हो...
तुम कश्मीर वालों के साथ ही....
दो-दो हाथ कर डालों ना !!
बंगाल वालों अब तुम्हारी बारी है !
तुम तो झारखंड को ही खा जाओ....;
जैसे छीन लिया है तुमसे गुजरात ने ...
तुम्हारे मुहँ की ओर बढ़ता हुआ निवाला !!
अरुणाचल वालों...
तुम क्या मूर्खों की तरह खड़े हो सालों ?
तुम मेघालय वालों की ही माँ.."...."दो !!

भारत माता ......
कितनी शक्ति है तुम्हारे बेटों में!!??
देखो ना किस वीरता से लड़तें हैं....
ये अपने सगे बहनों....भाईयों से !!
ये तो हंसकर मर मिटेंगे किसी भी दुश्मन से !!
मगर इनको ये तो बतलाओ कि....
किसी और से तो ये तब ना लडेंगे...
जब ये आपस में...
लड़कर मर-मिटने से बच रहेंगे.....!!

भारतमाता शक्ति तो अपार है तुम्हारे बेटों में॥
पर ये नहीं जानते कभी भी कि .....
उसे खर्च कहाँ किया जाए ....
फुर्सत में बैठे तेरे बन्दे...
कहीं भी जाकर धमाचौकडी मचा आते हैं....
नहीं सोचते कभी परिणामों की....
सोचते हैं तो सिर्फ़ वोटों की...!!
हे भारतमाता !!
ये तेरा क्या उद्दार करेंगे ??
ये कपटी तो तेरे सामने ही
तेरी अस्मिता का बलात्कार करेंगे !!
ये तुझको अभी-अभी भाड़ में झोंक डालेंगे !!
तू ऐसा कर ...
अभी की अभी तू कूद जा किसी गहरे कुँए में....
या देखती रह कि कैसे करती हैं ...
तेरी ही संताने....तेरी योनि पर प्रहार ......!!??

बधाई हो बधाई ! चँद्रयान की सफलता पर इसरो को , वैज्ञानिकों को और देश को , .....

बधाई हो बधाई ! चँद्रयान की सफलता पर इसरो को , वैज्ञानिकों को और देश को , .....
आदमी चाँद तक तो पहुँच भी गया , आदमियत से अभी पर बहुत दूर है !

Tuesday, October 21, 2008

फिर भी सबको जीना है !!

मैंने जो जिन्दगी को देखा है...जब सपने तार-तार हो जाते हैं...जब आंखों को अंधेरे के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता....जब तन और मन सबसे आदमी घायल हो जाता है...जब कहीं से कोई आसरा नहीं होता....जब एक भी शब्द कहने को नहीं होता.....जब कुछ भी ऐसा नहीं होता जिसके आसरे पर हम जी सकें...तब भी समूचा -सा रोना नहीं होता..... मतलब आशा की कोई एक किरण की आशा कहीं-न-कहीं मन के किसी कोने में छिपी ही होती है....वही हमको एकदम से टूटने से बचाती है....वही हमें चिंदी-चिंदी होने से बचाती है !!
सपने जब एकदम से मर जाते हैं...या जब उन्हें मरा हुआ मान लिया जाता है...तब भी उनकी राख से नए सपने पैदा हो जाते हैं...और वो सपने तो पिछले सपनों से भी ज्यादा पुरजोश ...पुरनूर ...पुरसकून ...पुरहंसी ...पुरखुशी ....होते हैं !!इसलिए तो सब पागल नहीं होते....और ग़मों से एकदम से मर भी नहीं जाते......!! जिन्दगी का मकसद आदमी को हराना या उसे मात देना थोड़ा ही ना है....जिन्दगी को क्या इन फालतू बातों को सोचने का वक्त भी है ??.....नहीं जिन्दगी का मकसद आदमी को उसके पूरे यौवन के साथ....उसकी पूरी खुशी के साथ.....उसके पूरे जज्बातों के साथ....उसकी सारी संवेदना के साथ...उसको पूरी शक्ति के साथ...और उसको,उसकी पूरी तल्लीनता के साथ उसे ना सिर्फ़ जीने देना है,बल्कि उसके जीने में उसकी मदद भी करनी है......!!
दरअसल जिंदगी किसी को नहीं हराती ..... हम ही हार जाते हैं......दरअसल जिन्दगी किसी को मात नहीं देती....हम ही आपा खो बैठते है....ग़लत चालें चलते हैं...और मात खा जाते हैं.....और क्या......बाकी इश्क...प्यार.....धोखा.....दुःख....सुख...मरना....जीना .......लगा हुआ है....लगा ही रहेगा.....हम तो बस एक दूसरे के काम आ सकें ...यही बहुत है...क्यूँ सच है ना ....!! अगर किसी ने ग़लत किया है...या कर रहा है...ये उपरवाला जाने वही न्याय करे.....मगर ये तो निजी जीवन की बातें हैं.....समाज के सन्दर्भों में तो हमें सबके हित के लिए लड़ना ही होगा......कहा है..."आदमी ,आदमी को क्या देगा.....जो भी देगा वही खुदा देगा....और क्या कहूँ.....बस....!!!

राज ठाकरे !

यह गलत है .. और गलत है

राज ठाकरे !
हिन्दी मराठी के नाम पर यह जो राजनीति कर रहे हैं , मैं इसका विरोध करता हूँ .

जब चलते-चलते रस्ते में !!

चलते चलते रस्ते में कई दोस्त नए मिल जाते हैं
कई जन्मों के ज्यूँ साथी हों ,यु हँसते व् बतियाते हैं !!
चुपके -चुपके महफ़िल में वो हमको देखा करते हैं
पर बात हमारी आती है तो लब से लब सिल जाते हैं !!

हिज्र के मौसम में अक्सर दिल को गहराई मिलती है
इस मौसम में अक्सर कुछ गम के गुल खिल जाते हैं !!


अजब-सी तमाशा-सी दुनिया है,गरीबों का सहारा कोई नहीं
सड़कों पे देख के लौंडों को माथे पे बल पड़ जाते हैं !!
किसी से कोई राम-राम नहीं,कहीं कोई भी दुआ-सलाम नहीं
कौन स्कूलों में पढ़ते हैं और काहे को पढ़कर आते हैं !!


सब अपनी खातिर जिन्दा हैं,फ़िर गैर से क्यूँ तो रुसवा हैं
जब सब अपना धंधा करते हैं ,औरों से क्यूँ घबराते हैं !!
सब अपनी-अपनी मौज करो यारों,सब गम अपने हमें दे दो
हम तो गाफिल सबको खिलाकर बचा-खुचा फ़िर ख़ुद खाते हैं !!


कौन है हम दोनों में सबसे गहरा और सबसे बड़ा,इस बात पर
हम अक्सर साहिल पर आकर इस समंदर से ही भिड जाते हैं !!
इश्क से ज्यादा इन दिनों गैर एतबार की बात कोई भी नहीं
जन्म-जन्म की क़समें खाकर ये इसी जन्म में मुकर जातें हैं !!


कज़ा से गहरी और मुकम्मल कोई चीज़ नहीं कायनात में नहीं
अबे रूक जा ओ यमराज के बच्चे,मियाँ "गाफिल" भी आते हैं!!

Monday, October 20, 2008

गिद्धों और चीलों की लडाई

(कोशी बाराज १९८८ में ही अपना कार्यकाल पूरा कर चुका है लेकिन अभी भी इससे काम लिया जारहा )
कोशी तटबंध हादसा की जांच के लिए बिहार सरकार ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित कर दी है। यह आयोग अपने हिसाब से हादसा की जांच करेगा और सरकार को अपनी रिपोर्ट देगा । फिर क्या होगा ? कुछ राजनीतिक दल रिपोर्ट की निष्पक्षता पर उंगली उठायेंगे और कुछ इसके समर्थन में ताल ठोकने लगेंगे। सप्ताह, दो सप्ताह तक जमकर बयानबाजी होगी, फिर सबकुछ फ्रिज हो जायेगा। दोषी अधिकारी, नेता और ठेकेदारों की मूंछें पूर्व की तरह हवा में लहराती रहेंगी। इस तरह कुछ साल गुजर जायेंगे और फिर आने वाले वर्षों में कोशी की कुसहा-2, कुसहा-3, कुसहा-4 की अनगिनत प्रलय-गाथाएं मंचित होंती रहेंगी और जिंदगियां उजड़ती रहेंगी।यह किसी मनहूस ज्योतिष का भविष्यगणना नहीं है। यह तथ्य है, जिसे सरकार जानबूझकर झूठलाना चाहती है। क्योंकि इस तथ्य में कुसहा-1 की सच्चाई छिपी हुई है। अगर इस सच्चाई पर से पर्दा उठ गया तो भ्रष्टाचार पर लगे हुकूमती चिलमनों में बड़े-बड़े छेद हो जायेंगे और सैकड़ों अभियंताओं, दर्जनों आइएएस, आइपीएस, दर्जनों ठेकेदारों और अनगिनत विधायक-मंत्रियों के कुरूप और आदमखोर चेहरे नमूदार हो जायेंगे।वास्तव में कुसहा हादसा ने भ्रष्ट भारतीय तंत्र की पोल खोल दी है। कुसहा (नेपाल) में कोशी तटबंध के टूटने में भ्रष्टाचारियों के आपसी कलह बहुत बड़ा कारण रहा है। कोशी बराज इलाके के लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मजदूरों से बात करने के बात यह पहलू मेरे सामने आया है।दरअसल, भारतीय अधिकारियों ने कोशी के नाम पर पिछले चार दशकों में अरबों रुपये का घोटाला किया है। हर वर्ष तटबंध की मरम्मत, रखरखाव और नदी की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये की लूट होती है। मरम्मत और रखरखाव की राशि का एक बड़ा हिस्सा नेपाल की सीमाओं के अंदर की परियोजनाओं के नाम पर लूटी जाती रही है। दस वर्ष पहले तक नेपाल के लोगों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि कहां क्या हो रहा है, क्योंकि वहां सामाजिक जागरुकता नगण्य थी। लेकिन नेपाल में माओवाद के उदय के बाद स्थिति बदलने लगी। बिल्ली (कोशी माफियाओं) के दुर्भाग्य से राजतंत्री सीका टूट गया। नये नेपाली बल-समूहों को पता चल चुका था कि उनकी सीमा के अंदर की कोशी-परियोजनाओं के नाम पर भारतीय अधिकारी-नेता-ठेकेदार करोड़ों रुपये लूट रहे हैं, लेकिन उन्हें कुछ नहीं दिया जा रहा है। यानी जिसके घर में भोज उसी की थाली में भात नहीं ! तटबंधों की मरम्मत के नाम पर नेपाल के पहाड़ों और जंगलों से लाये गये बोल्डर, बालू और लकड़ियों को भारतीय माफिया काले-बाजार में बेचकर मालामाल हो रहे हैं, लेकिन उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। यह सवाल उन्होंने आमलोगों के जेहन में उतार दिया। कुसहा के निकट के हरिपुर गांव के एक ग्रामीण ने मुझे चेतावनीपूर्ण सलाह दी - सभी इंजीनियर-ओवरसियर भारत के रहेंगे तो यही होगा, अगर हमारे गांवों के लोगों को भी कोशी प्रोजेक्ट का इंजीनियर-हाकिम बनाया गया होता, तो किसकी मजाल थी कि काम रोक देता !! शायद यही वजह थी कि माओवादी नेताओं ने पिछले वर्षों में अपने कार्यकर्ताओं की मदद से दबाव बनाना शुरू किया कि इस लूट में उन्हें बराबर का साझीदार बनाया जाय, अन्यथा वे उन्हें सीमा के अंदर दाखिल नहीं होने देंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो गिद्धों की जमात पर चीलों ने धावा बोल दिया। गिद्ध इसके लिए तैयार नहीं थे। शुरू-शुरू में उन्होंने इन चीलों को कोई भाव नहीं दिया। लेकिन ये भूल गये कि निरंकुश राजतंत्र खटिये पर अंतिम सांसे गिन रहा है और अब उनके झबैत (डकैतों का संरक्षक) बदल चुके हैं। नेपाल की नई राजनीतिक व्यवस्था ने भारतीय गिद्धों की कोई मदद नहीं की। धीरे-धीरे नौबत यहां तक आ पहुंची कि इन्हें तटबंध क्षेत्र में गस्त करने से भी भय होने लगा क्योंकि नेपाली प्रशासन ने इनका सहयोग करना बंद कर दिया।नेपाल के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि कोशी परियोजना के माफिया कोशी के नाम पर वर्षों से नेपाल के पहाड़ी और जंगली संसाधनों मसलन बोल्डर, बालू और लकड़ी का तस्करी कर रहे हैं। यहां तक कि तटबंधों के पुराने बोल्डरों तक को इन माफियाओं ने व्यावसायियों को बेच दिया। नये नेपाली बल-समूह को इनमें भी हिस्सेदारी चाहिए। इसलिए यह तय है कि आने वाले दिनों में मरी (मृत पशुओं की लाश) की मारामारी और बढ़ेगी। ऐसे में तटबंधों का क्या होगा ? इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। और दरबाजे पर दस्तक देते भविष्य के बारे में बात करने वाले को आप मनहूस ज्योतिष तो नहीं कहेंगे न ???

Sunday, October 19, 2008

हम भी कुछ कर लें !!

जिन्दगी को इस कदर पुर सुकून सा जिए ,
ये हिसाब मौत से ज्यादा का कर लें !!
आग बरसेगी आसमान से आज
आ तेरे आँचल का छाता कर लें !!
जहाँ प्यार से कम कुछ भी ना मिले
इक मुहब्बत से भरा हाता कर लें !!
भले ही उसमें किसी की चिट्ठी ना हो ,
अपने संग हम भी इक लिफाफा कर लें !!
ऐ मौत इक ज़रा बाहर को ही ठहर ना ,
हम अपने आप को जरा सरापा कर लें !!
गाफिल किसी मुर्गे का नाम नहीं मियां ,
कि चत काटा और पट मुहँ में धर लें !!

बीती बात को जाने दे !!

बीती बात को जाने दे

नए समय को आने दे !

समय बड़ा नादाँ है

बच्चों-सा समझाने दे !

यार अब कैसा है तू

उसको भी बतलाने दे !

बड़ा ही अच्छा लगता है

बुरे समय को आने दे !

कन्नी काट ना मुझसे तू

मुझसे ना कतराने दे !

इतना बुरा नहीं "गाफिल"

ख़ुद को पास तो आने दे !!

सच्ची, मैं भूत बोल रहा हूँ !!

मेरी गुजरी हुई जिन्दगी के प्यारे-प्यारे दोस्तों,अब बड़ा प्यार उमड़ता है आपलोगों के ऊपर!!जबकि जब तक मैं जिन्दा था,आपसबों से झगड़ता ही रहता था!!मैं और मेरे जैसे अनेक लोग अक्सर ऐसी-ऐसी बातों पर झगड़ते थे कि आज जब मई उन बातों को सोचता हूँ,तो ख़ुद पर बड़ा आश्चर्य होता है,कि उफ़ हाय मैं ऐसा था?यदि मैं ऐसा था तो जीते-जी मुझे इस बात कि अक्ल क्यूँ नहीं आई ,आदमी होते हुए मुझमें आदमियों जैसा विवेक क्यों नहीं जागृत हुआ?मै मूर्खों कि तरह क्यूँ सबसे व्यवहार करता रहा?यदि मुझमे इतनी ही अक्ल थी ,तो मैंने अगली बार अपनी गलतियों को क्यूँ नहीं सुधारा?और हरेक बार फिर-फिर से वही-वही गलतियाँ कैसे करता रहा ?कैसे मैं हर वक्त दोहरा और पाखंडपूर्ण जीवन जीता रहा?क्यों मेरे दोस्त खासतौर पर मेरी ही जात या धर्म के या फिर कुछेक मेरे नजदीकी भर ही रहे?गैर धर्म के लोगों को मैं काले चश्मे से क्यूँ देखता रहा?किसी गैर धर्म के लोगों में मैं अपने आप को क्यूँ समेट लेता था?उनसे कटा-कटा क्यूँ रहता था?मैं सदा यह क्यूँ सोचता था कि चित्रों में दिखने वाले मेरे भगवान् ही बेस्ट हैं,और इस बात पर मैं उनसे झगड़ता भी रहता था!!भगवान के नाम पर मैनें इतने काले कारनामे किए कि जिनके उदाहरण देने लगूं,तो फिर से एक जन्म लेना पड़ जाएगा !!अनमोल रत्न-जडित ,विराट आभामंडल से दीप्त अत्यन्त ख़ूबसूरत से दिखाई देते मेरे भगवान मुझे वाकई आकर्षित करते थे,मगर मैनें अपने अंधेपन में यह कभी नहीं सोचा कि ठीक है मेरे भगवान तो सुंदर हैं मगर इसमें उन विजातीय खुदाओं का क्या कसूर?फिर यह भी कि मेरे भगवान मेरे घर में हैं,तो उनके खुदा भी उनके घर में होंगे!!जब मुझे उनसे कोई मतलब ही नहीं है,तो मै उनके खुदा को लेकर क्यों परेशां हूँ?ये तो वही बात हुई कि मान मान मैं तेरा मेहमान !! अरे भाई जब तुम अपने घर में जी रहे हो तो दूसरों को भी उनके घर में जीने दो !!अपने घर में तुम क्या पका रहे हो ,जब यह किसी को पता नहीं लगने देना चाहते ,तो दूसरों के घर में क्यूँ टांक-झाँक करते हो?एक तरफ़ सभ्यता का पाठ पढ़ते हो,दूसरी और बिना उनकी इजाजत के क्यूँ उनका मन-परिवर्तन करना चाहते हो?कोई और किसे पूजता है,इससे तुम्हारे बाप का क्या बन या बिगड़ जाएगा?तुम अपने घर में घी-चुपडी रोटी खा रहे हो ,और जिसे सूखी रोटी भी नसीब में नहीं है क्या उन्हें तुम्हारा बाप रोटी दे रहा है?.........महाराष्ट्र में एक समय शिवाजी महाराज का राज्य था,एक बार उनके गुरु महाराज उनकी राजधानी में पधारे,तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने उन्हें बताया कि उनके राज्य में सब खुशहाल हैं,सबको राज्य के अधिकारी रोटी,कपड़ा,घर और ज़रूरत की तमाम वस्तुएं उपलब्ध करवा रहे हैं,चारों और शान्ति और स्म्रिद्दी का राज है!गरु महाराज बड़े संतुष्ट हुए,मगर वे तत्क्षण ही ताड़ गए कि ये शिवाजी का अंहकार बोल रहा है,शिवाजी को वे एक चट्टान के पास ले गए और कहा कि ज़रा इसे तूद्वाएं ,शिवाजी बड़े चकित हुए कि गुरु ऐसा क्यूँ करवा रहे हैं ,मगर गुरु की आगया थी सो उन्होंने शिला को तोड़ने का आदेश दिया,तो जैसे ही शिला टूटी ,उसमे से कुछ छोटे-छोटे कीडे बाहर निकले!!गुरु ने पुछा कि इनको भोजन कौन दे रहा है?गुरु कि बात का मर्म समझते ही शिवाजी शर्म से पानी-पानी हो गए,और गुरु-चरणों में गिर पड़े!!सार ये है कि हम दरअसल किसी को कुछ नहीं देते,तो हमें क्या हक़ बन पड़ता है कि किसी जिंदगी में अँधेरा बिखेरें या उसका जीवन ही छीन लें?अपने अनमोल जीवन को हम किन बातों के झगडे में व्यर्थ करतें हैं,हम अक्सर बदतमीजी से भरे हुए ही क्यूँ रहते हैं,अपने सही होने के सिवा हमें हर कोई ग़लत ही क्यूँ प्रतीत होता है?हम हर वक्त दूसरों पर हावी क्यूँ होना चाहते हैं?हम अपने जैसे अपनी मर्जी से किसी को क्यूँ नहीं रहने देना चाहते ?हम क्यूँ किसी को अपनी बराबरी में नहीं देखना चाहते?यह भी एक बहुत बड़ी विसंगति है,कि एक और तो हम दूसरों को अपने बराबर नहीं देख सकते,और दूसरी तरफ़ गरीब लोगों के साथ उठने-बैठने में भी अपनी तौहीन समझते हैं,यहाँ तक कि अपने गरीब रिश्तेदारों को भी नहीं पहचानते !!हम वाकई बड़े अद्भुत जीव हैं!हम जो चाहते हैं उससे ठीक उल्टा ही चलते हैं!!चाहते हैं प्यार मगर करते हैं नफरत!!दूसरों से चाहते हैं इमानदारी ,मगर ख़ुद हर वक्त करते हैं बेईमानी !!आदमी की दुनिया के मानदंड बड़े ही विचित्र हैं !!मगर मैं जो भी कुछ सोच रहा था वो अब बिल्कुल फिजूल था,क्योंकि मैं तो अब मर ही चुका था और किसी को अब कुछ भी कह नहीं सकता था,कहता भी तो बजाय कुछ समझने के कोई भी बंद बुरी तरह डर ही जाता !
तो इस तरह मैं एक फिजूल की जिंदगी धरती पर गुजारकर गया!!आज अफ़सोस कर रहा हूँ!!मैं ये आप सबों को इसलिए बता रहा हूँ कि आप भी मेरी तरह कीडे-मकोडे-सी जिंदगी गुजर कर जायें,बल्कि अपनी बाकी की जिंदगी को एक नया रंग दे .....उसमे उल्लास भर दे....उसमे अथाह प्यार भर दे...बच्चा हो या कोई बड़ा,आपके पास आए तो यह महसूस करे कि वो किसी आदमी के पास ही आया ...!!आदमी होना एक बड़ी अद्भुत बात है हम वाकई आदमी की तरह ही जीकर जिन्दगी गुजार दे यह भी हमारे लिए एक अद्भुत बात ही होगी!!......कहा भी है कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसान होना......आज मैं बेशक एक भूत हो गया हूँ,लेकिन आपका साथ ही देना चाहता हूँ ......मगर आपके लिए तो फिलहाल इतना ही बहुत है कि आप सचमुच एक इंसान बनकर दूस्ररे की तरफ़ मोहब्बत का हाथ बढायें....आज बस इतना ही .....सबको भूतों का प्यार.......!!!

Saturday, October 18, 2008

ज़र्रे से आफताब तक

झारखंड के नेताओं पर लग रहे भ्रष्टाचार के ताबड़तोड़ आरोपों की हकीकत क्या अदालती हस्तक्षेप से सामने आ पायेगी?














नदीम
अख्तर

"लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो, जिसके मुंह में लगाम है।'
प्रख्यात कवि धूमिल की अंतिम कविता की ये अंतिम पंक्तियां हैं। जिस समय उन्होंने ये पंक्तियां लिखी होंगी, उस समय भले ही इनकी प्रासंगिकता कहीं और रही होगी लेकिन आज झारखंड में इसकी व्याख्या आम आदमी की सटीक तस्वीर सामने लाने वाली सिद्ध हो रही है। झारखंड के कुछ लोहारों (राजनेताओं) की वजह से घोड़ों (आम आदमी) के मुंह लहुलुहान हैं। पिछले महीने (सितंबर 2008) सत्ता और बिचौलियों की सांठगांठ के ऐसे-ऐसे उदाहरण सामने आये, जिनसे राज्य का एक बड़ा वर्ग स्तब्ध हुआ। मीडिया ने मसालेदार खबरें छापीं और राजनीतिक विरोधियों ने खूब छींटाकशी की। बात इतनी बढ़ी कि अदालत की दहलीज़ तक जा पहुंची। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल यह रह गया कि क्या भ्रष्टाचार के ये आरोप कभी सिद्ध भी हो पायेंगे।
अब इसे कालक्रम का खेल ही कहेंगे कि एक नवसृजित राज्य में लूट संस्कृति की शुरुआत के आठ साल के बाद कहानी का पटाक्षेप हुआ भी तो राज्य के बाहर। मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गत 17 सितंबर की सुबह दुबई जाते वक्त जमशेदपुर (झारखंड) निवासी संजय चौधरी नामक एक व्यक्ति को कस्टम विभाग के लोगों ने रोका। तलाशी के दौरान इस व्यक्ति के पास से भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिली। वह विदेशी मुद्रा दुबई ले जा रहा था, जिसे नेशनल बैंक ऑफ दुबई के खाते में जमा कराया जाता। स्थानीय मीडिया ने यह दावा किया कि जिस संजय चौधरी को मुंबई कस्टम ने पकड़ा, उसके संबंध पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा से रहे हैं। यही वजह है कि कल तक एक मामूली सा व्यवसाय करनेवाला व्यक्ति आज एक अरबपति बन गया। इस दौरान कई दस्तावेज़ गुपचुप तरीके से मीडिया को उपलब्ध कराये गये, जिनमें झारखंड के खाली होते खज़ाने की असलियत छुपी है। हद तो तब हो गयी, जब पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने यह कह दिया कि वे किसी संजय चौधरी को नहीं जानते। दूसरी ओर दस्तावेज़ बताते हैं कि जिस संजय चौधरी को उन्होंने पहचानने से इंकार कर दिया, उसके पासपोर्ट की अनुशंसा खुद मधु कोड़ा ने की थी। बात यहीं खत्म नहीं हुई। किसी ज़माने में पार्टी लाइन के कारण मधु कोड़ा के शुभचिंतक रह चुके भाजपा विधायक सरयू राय ने यह खुलासा कर दिया कि संजय चौधरी और मधु कोड़ा एक साथ थाइलैंड गये थे। सरयू राय कहते हैं - "मधु कोड़ा को यह बताना चाहिए कि 2005 में विजयादशमी के दिन कोलकाता से थाई एयरवेज़ के जहाज़ से जब वे बैंकॉक गये थे, तो उनके साथ दो अन्य लोग कौन थे। क्या वे संजय चौधरी और बिनोद सिन्हा नहीं थे।' असल में आरोप यह है कि मधु कोड़ा ने अपने कार्यकाल के दौरान संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के माध्यम से अनैतिक तरीके से अकूत संपत्ति अर्जित की और सत्ता से नज़दीकी का इस्तेमाल करते हुए सारा धन विदेशों में निवेश किया। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि आखिर झारखंड के खज़ाने से कितने अरब रुपये बाहर जा चुके हैं।
वैसे इस मामले में जो दूसरा नाम सामने आया है वह है बिनोद सिन्हा का। उनके खाकपति से अरबपति बनने की अलग कहानी है। बेइंतहा ज़मीन-जायदाद, कई फ्लैट, महंगी गाड़ियों व फैक्ट्रियों के मालिक बिनोद सिन्हा झारखंड गठन से पहले एनएसयूआइ के चाईबासा नगर अध्यक्ष हुआ करते थे। उस समय लघु सिंचाई विभाग में ठेकेदारी करते थे, जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत 95,000 रुपये कर्ज लिये थे। इसके बाद चार वर्षों (2003-07) में बिनोद सिन्हा अकूत संपत्ति के मालिक हो गये। आखिर इतना सबकुछ कैसे हुआ? सीएम हाउस के कुछ नियमित आगंतुक कहते हैं - "मधु कोड़ा के कार्यकाल में कभी एक भी काम, चाहे वह निजी हो या सरकारी, बिना बिनोद सिन्हा या संजय चौधरी के नहीं हुआ। सीएम हाउस से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और अन्य सचिवालयों में मधु कोड़ा से ज़्यादा आदेश इन दोनों के द्वारा अफसरों को दिया जाता था, जिसका समय से पालन भी हो जाता था।'
झारखंड को कंगाल कर अपना घर भरने की प्रक्रिया के तहत कई नाम सामने आये हैं, जिन्हें लेकर अब मामला अदालत में पहुंचा है। रांची निवासी दुर्गा उरांव ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका (जनहित-4007/2008) दायर कर हरिनारायण राय, एनोस एक्का, कमलेश सिंह, चंद्रप्रकाश चौधरी, दुलाल भुइयां, भानु प्रताप शाही और बंधु तिर्की (सभी राज्य के कैबिनेट मंत्री) की संपत्ति की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। इसी मामले में एक हस्तक्षेप याचिका रांची निवासी अरुण कुमार ने दायर की है, जिसमें उक्त लोगों के साथ-साथ मधु कोड़ा, बिनोद सिन्हा और संजय चौधरी को भी पार्टी बनाते हुए इन तीनों की संपत्तियों की भी जांच सीबीआइ से कराने की मांग की गयी है। हालांकि अदालत ने इस मामले में अभी कोई फैसला नहीं सुनाया है लेकिन अगर अदालत ने दुर्गा उरांव और अरुण कुमार की याचिकाओं के आधार पर जांच के आदेश दिये, तो परत-दर-परत कई राज़ और खुलते चले जायेंगे।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे मामलों की वैधानिक ज़मीन कितनी मज़बूत होती है। झारखंड हाइकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता और याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं ऋतु कुमार कहती हैं - "लगभग इसी प्रकार का एक मामला पिछले साल (2007 में, वोल 4, एसएससी 380) सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था(विश्र्वनाथ चौधरी बनाम केंद्र सरकार एवं अन्य)। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में सीबीआइ को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जांच का आदेश दिया था। अब हमें इंतज़ार है 21 तारीख का, जब उच्च न्यायालय का फैसला आता है।'
वैसे इस मामले में मधु कोड़ा और उनके सहयोगियों को भले ही प्रतिवादी बनाकर न्याय के कटघरे में खड़ा करने की गुहार लग रही हो लेकिन एक हकीकत यह भी है कि झारखंड गठन के बाद से लगभग सभी सरकारों में ऐसे लोग पर्दे के पीछे से खेलते रहे हैं जिनकी गिनती आज के संजय चौधरियों और बिनोद सिन्हाओं में हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। राज्य में जब पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे, तो भाजपा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभानेवाले एनोस एक्का (झारखंड पार्टी के इकलौते विधायक) के सहयोगी/मित्र तिलेश्र्वर साहू को एक बोर्ड में राज्य मंत्री का दर्जा बतौर ईनाम मिला था। उसके बाद उनके एक से एक कारनामों ने उन्हें इतनी ख्याति दिलायी कि अंततः मंत्री एनोस एक्का को ही उनसे किनारा कसना पड़ा। विभिन्न सरकारों को जोबा माझी (यूजीडीपी विधायक) के समर्थन की सौदेबाजी करनेवाले नजम अंसारी को सात साल से आवास बोर्ड की कुर्सी मिली हुई है। उन्होंने शहर के बीचों-बीच बेशकीमती ज़मीन बिल्डरों से बेच दी, तो विधानसभा से लेकर हाइकोर्ट तक के हस्तक्षेप ने पूरी पोल-पट्टी खोल कर रख दी। अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में अमरजीत सिंह उर्फ काले सरदार का बोलबाला था। इसके अलावा मुंडा को कंप्यूटर की शिक्षा देनेवाले तापस मल्लिक ने तो बाकायदा सीएम हाउस से उद्योग स्थापना के लिए सिंगल विंडो सिस्टम खोल रखा था। उस समय यह कहा जाता था कि अगर झारखंड में कुछ करना है, तो पहले तापस जी से हामी भरवा लें। यही हाल बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में भी था। उनकी करीबी महिला मित्र मंजू राय की सरकार में इस कदर पकड़ थी कि सुबह-सुबह कई लाल-पीली बत्तियों वाली गाड़ियों के मालिक मनचाही पोस्टिंग के लिए उनके यहां भीड़ लगाये रहते थे। मरांडी के ही एक और करीबी हुआ करते थे अशोक अग्रवाल जो दिल्ली से झारखंड की नीतियों को तय करने के माहिर माने जाते थे। मधु कोड़ा के कार्यकाल के ही एक और बैक-स्टेज परफॉर्मर थे अरुण श्रीवास्तव। वे थे तो कोड़ा के आप्त सचिव लेकिन उन्होंने क्रशर व्यवसाय में इस कदर पैठ बनायी कि आज झारखंड में इनका नाम गिने-चुने उद्यमियों में लिया जाता है।
इन नामों और कारनामों के बीच बड़ा सवाल यह रह जाता है कि क्या अगर किसी पर अपराध सिद्ध भी हो जाये और उन्हें सजा भी मिल जाये, तो झारखंड और यहां के आम नागरिकों को जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई कैसे होगी। इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन उससे पहले लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी हाइकोर्ट की ओर, जहां कम से कम यह तय हो जाना है कि आखिर ज़र्रे से आफताब तक के सफर में मुसाफिरों की कमीज़ गंदी हुई है या नहीं।
( पब्लिक एजेंडा से साभार)