Tuesday, December 23, 2008

हर दिल कुछ कहता है

विष्णु राजगढ़िया
हर इंसान के सीने में एक धड़कता हुआ दिल है. हर दिल को दर्द होता है. यह दर्द किसी को अपना बनाने, किसी का लव पाने के लिए होता है. हर दिल की अपनी कहानी होती है. हर इंसान के अपने सपने होते हैं. लेकिन नार्मली हम किसी कॉमन परसन के सपनों को नहीं समझ पाते. उसके दिल और दर्द को नहीं देख पाते.
फिल्म 'रब ने बना दी जोड़ी' का शाहरूख खान ऐसे ही एक इंसान के दिल और दर्द को सामने लाता है. राजकपूर की फिल्मों में आम इंसान के सपनों को सामने लाने की कोशिशेें होती थीं. लेकिन नार्मली कॉमर्शियल फिल्मों का नायक प्रायः कोई आम इंसान नहीं बल्कि खास होता है. अगर कोई नायक किसी आम इंसान के रूप में सामने आता भी है तो कुछ ही देर में वह खास आदमी में बदल जाता है. यानी अगर उसे लव करना है या सपने देखने हैं तो उसे स्पेशल परसन बनना ही होगा. आम इंसान का काम तो मेहनत मजूरी करना, फेमिली की रिस्पांसिबिलीटी संभालना है. अगर कोई कॉमन वुमन है तो कीचेन और चिल्डे्रन को संभालना ही उसकी पूरी लाइफ है. लव करना या सपने देखना एक चीज है और रोजी-रोटी चलाना दूसरी चीज. दोनों चीजें भला एक ही आदमी कैसे कर सकता है?
ऐसा माना जाता है कि आम आदमी की जिंदगी में रोमांस के लिए समय कहां? मेरे एक मित्र काफी प्राउडली कहा करते- 'यार हमें तो ये सेंटिमेंट, वेंटिमेंट समझ में नहीं आता. हमें इसके लिए फुरसत कहां है.' हालांकि यह स्टेटमेंट वह काफी सेंटिमेंटल होकर दिया करते थे. उनकी मासूमियत बता देती थी कि वह कितने सेंटिमेंटल और नरम दिल इंसान हैं. दूसरों की मदद के लिए वह हर वक्त तैयार मिलते. उनके धड़कते हुए दिल को देखना और समझना बेहद आसान था. लेकिन शायद ही कभी किसी ने इसे समझने की कोशिश की हो.
हम अपने आसपास के आम इंसानों के दिल और उसके दर्द को देखने या समझने की कोशिश नहीं करते. यही कारण है कि एक आम इंसान के रूप में शाहरूख खान एक नीरस और अपने काम से मतलब रखने वाला नजर आता है, वहीं अपने हीरोटिक रोल में एक हंसमुख स्मार्ट नौजवान बन जाता है. एक ही आदमी. फर्क सिर्फ मूंछों या चश्मे और ड्रेस का नहीं. असल डिफरेंस सोच का है. सुरींदर साहनी के रूप में वह एक आम इंसान है जो खुद को हर वक्त पंजाब पावर का एक कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी ही समझता है. वह अपने दिल और अपने दर्द को कभी अपनी न्यूली मैरिड वाइफ तक के सामने लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन वही आदमी राज के रूप में एक बनावटी चेहरा और नकली नाम लेकर एक दिलफेंक रोमांटिक हीरो में बदल जाता है. यानी फिर कहूं तो यह डिफरेंस एक्सटर्नल आउटलुक का नहीं बल्कि इंटरनल पैटर्न ऑफ थिंकिंग का है. सुरींदर साहनी के दिल में धड़कता हुआ दिल है. लेकिन उसका दिमाग उसके दिल को कभी एक्सपोज नहीं होना देता. सुरींदर साहनी अपनी खोल में सिमटे रहने वाला इंसान है. इसके कारण उसके दिल को अपने एक्सपोजर के लिए एक आर्टिफिशियल तरीकों का सहारा लेना पड़ता है. अगर सुरींदर साहनी के दिमाग ने उसके दिल को कैद नहीं किया होता तो वह खुद ही डांसिंग पेयर कांपिटिशन में पार्टिसिपेट कर लेता. तब उसे किसी नकली चेहरे की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अपने असल रूप पर खुद उसे भरोसा नहीं. उसे यह भी कॉंन्फिडेंस नहीं कि उसके लव या डांसिंग टैलेंट पर उसकी पत्नी को भरोसा होगा या नहीं.
कुल मिलाकर पूरा मैटर इंसान को खुद पर और अपने पार्टनर पर कॉन्फिडेंस करने का है. अगर भरोसा होगा तो फिर एक आम इंसान के रूप में भी जॉयफुल लाइफ बितायी जा सकती है. इसके लिए किसी आर्टिफिसियल चीज की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन अगर खुद पर या साथी पर भरोसा नहीं तो हर चीज नीरस और थकानेवाली होगी. बनावटी चीजों के सहारे मिलने वाली हंसी भी बस क्षणिक और बनावटी ही होगी. इससे लाइफ में कॉम्पलिकेशन ही बढ़ेंगे. इसलिए सुरींदर साहनी के लिए बेहतर यही है कि वह अपनी खोल से तुरंत बाहर निकले. लेकिन वह राज बनने की कोशिश न करे. वह सुरींदर साहनी ही रहे. उसी रूप में अपने धड़कते हुए दिल और उसके दर्द को खुलकर एक्सपोजर का स्कोप बनाये. ऐसा होने पर ही उसकी लाइफ रीयली कलरफुल होगी.
(आइ-नेक्स्ट, 23.12.2008 से साभार)

Friday, December 19, 2008

आदमी की इज्ज़त ही कुछ और होती है......!!!


भई बनी हुई चीजों की जीनत कुछ और होती है......
और टूटी हुई चीजों की कीमत कुछ और होती है.....!!
मर-मर कर जीना तो बहुत ही आसान है ऐ दोस्त....
जिंदादिल लोगों की तो हिम्मत कुछ और होती है.....!!
एक ही बार तो आता है आदम यहाँ धरती पर.....
बनकर रहे आदम ही तो रिवायत कुछ होती है....!!
हम गाफिल लोग ही रहते हैं आदतों के बाईस........
और फकीरों की तो हाजत ही कुछ और होती है...!!
जो "धन"को जीते हैं उनका चेहरा होता है कुछ और .......
प्यार बांटने वालों की तो लज्जत ही कुछ और होती है.....!!
लोग जाने क्या-क्या "फिजूल"चाहते हुए ही मर जाते हैं.....
जिन्दगी जीने वालों की तो चाहत ही कुछ और होती है.....!!
जब हम सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं तो गम ही मिलता है.....
सबपे जीते इंसा पे अल्ला की इनायत कुछ और होती है....!!
धारा के साथ जीने को तो सब जीते हैं "गाफिल"
इसके ख़िलाफ़ वालों की ताकत कुछ और होती है.....!!

Thursday, December 18, 2008

अरे भाई...जिन्दगी तो वही देगी....जो...!!!!


हम क्या बचा सकते हैं...और क्या मिटा सकते हैं......ये निर्भर सिर्फ़ एक ही बात पर करता है....कि हम आख़िर चाहते क्या हैं....हम सब के सब चाहते हैं....पढ़-लिख कर अपने लिए एक अदद नौकरी या कोई भी काम....जो हमारी जिंदगी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त धन मुहैया करवा सके....जिससे हम अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें...तथा शादी करके एक-दो बच्चे पैदा करके चैन से जीवन-यापन कर सकें...मगर यहाँ भी मैंने कुछ झूठ ही कह दिया है....क्यूंकि अब परिवार का भरण पोषण करना भी हमारी जिम्मेवारी कहाँ रही....माँ-बाप का काम तो अब बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करना और उन्हें काम-धंधे पर लगा कर अपनी राह पकड़ना है....बच्चों से अपने लिए कोई अपेक्षा करना थोडी ना है....वो मरे या जिए बच्चों की बला से.....खैर ये तो विषयांतर हो गया....मुद्दा यह है कि हम जिन्दगी में क्या चुनते हैं...और उसके केन्द्र में क्या है....!!........और उत्तर भी बिल्कुल साफ़ है....कि सिर्फ़-व्-सिर्फ़ अपना परिवार और उसका हित चुनते हैं...इसका मतलब ये भी हुआ कि हम सबकी जिन्दगी में समाज कुछ नहीं....और उसकी उपादेयता शायद शादी-ब्याह तथा कुछेक अन्य अवसरों पर रस्म अदायगी भर पूरी के लिए है....यानि संक्षेप में यह भी कि समाज होते हुए भी हमारे रोजमर्रा के जीवन से लगभग नदारद ही है...और कुछेक अवसरों पर वो हमारी जीवन में अवांछित या वांछित रूप से टपक पड़ता है....समाज की जरूरतें हमारी जरूरते नहीं हैं......और हमारी जरूरते समाज की नहीं....!!........ अब इतने सारे लोग धरती पर जन्म ले ही रहें हैं...और वो भी हमारे आस-पास ही....तो कुछ-ना-कुछ तो बनेगा ही....समाज ना सही....कुछ और सही....और उसका कुछ-ना-कुछ तो होगा ही....ये ना सही....कुछ और सही...तो समाज यथार्थ होते हुए भी दरअसल विलुप्त ही होता है....जिसे अपनी जरुरत से ही हम अपने पास शरीक करते है...और जरुरत ना होने पर दूध में मक्खी की तरह बाहर....तो जाहिर है जब हम सिर्फ़-व्-सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं....तो हम किसी को भी रौंद कर बस आगे बढ़ जाना चाहते हैं....इस प्रकार सब ही तो इक दूसरे को रौदने के कार्यक्रम में शरीक हैं...और जब ऐसा ही है....तो ये कैसे हो सकता है भला कि इक और तो हम जिन्दगी में आगे बढ़ने की होड़ में सबको धक्का देकर आगे बढ़ना चाहें और दूसरी ओर ये उम्मीद भी करें कि दूसरा हमारा भला चाहे....!! ऐसी स्थिति में हम......हमारा काम.........और हमारी नौकरी ही हमारा एक-मात्र स्वार्थ...एक-मात्र लक्ष्य....एक-मात्र....एक-मात्र अनिवार्यता हो जाता है....वो हमारी देह की चमड़ी की भांति हो जाता है....जिसे किसी भी कीमत पर खोया नहीं जा सकता....फिर चाहे जमीर जाए...चाहे ईमान...चाहे खुद्दारी..चाहे अपने व्यक्तित्व की सारी निजता.....!!....हाँ इतना अवश्य है कि कहीं...कभी सरेआम हमारी इज्ज़त ना चली जाए.....!!.....मगर ऐसा भी कैसे हो सकता है...कि एक ओर तो हम सबकी इज्ज़त उछालते चलें...दूसरी और ये भी चाहें कि हमारी इज्ज़त ढकी ही रहे....सो देर-अबेर हमारी भी इज्ज़त उतर कर ही रहती है....दरअसल दुनिया के सारे कर्म देने के लेने हैं....और यह सारी जिन्दगी गुजार देने के बाद भी हम नहीं समझ नहीं पाते....ये भी बड़ा अद्भुत ही है ना कि दुनिया का सबसे विवेकशील प्राणी और प्राणी-जगत में अपने-आप सर्वश्रेष्ठ समझने वाला मनुष्य जिन्दगी का ज़रा-सा भी पहाडा नहीं जानता...और जिन्दगी-भर सबके साथ मिलकर जीने के बजाय सबसे लड़ने में ही बिता देता है....और सदा अंत में ये सोचता है....कि हाय ये जिन्दगी तो यूँ ही चली गई...कुछ कर भी ना पाये.....!!........अब यह कुछ करना क्या होता है भाई....??जब हर वक्त अपने पेट की भूख....अपने तन के कपड़े...अपने ऊपर इक छत के जुगाड़ की कामना भर में पागल हो रहे...और पागलों की तरह ही मर गए....तो ये कुछ करना भला क्या हुआ होता.....??.........जिन्दगी क्या है.........और इसका मतलब क्या....सबके साथ मिलकर जीने में अगर जीने का आनंद है....तो ये आप-धापी....ये कम्पीटीशन की भावना....ये आगे बढ़ने की साजिश-पूर्ण कोशिशें....ये कपट...ये धूर्तता...ये बेईमानी...ये छल-कपट....ये लालच...ये धन की अंतहीन....असीम चाहत....इस-सबको तो हर हालत में त्यागना ही होगा ही ना....!!??जीने के खाना यानी भोजन पहली और आखिरी जरुरत है....जरुरत है...और इस जरुरत को पूरा करने के लिए धरती के पास पर्याप्त साधन और जगह....मगर हमारी जरूरतें भी तो सुभान-अल्लाह किस-किस किस्म की हैं आज...??!! फेहरिस्त सुनाऊं क्या......??तो जब हमारी जरूरतों का ये हाल है...तो हमारा हाल भला क्या होगा...............हमारी जरूरतों से उनको प्राप्त करने के साधनों से कई गुना कर दें.... हमारा वास्तविक हाल निकल आयेगा...!! तो ये तो हमारी जिन्दगी है....अरे यही तो हमारा चुनाव है.....हमारी जरूरतों के चुनाव से तय होती है हमारी जिन्दगी....!!हमारे ही बीच से बहुत सारे लोग समाज के लिए जीकर निकल जाते हैं....उन्हें अपना ख्याल तक नहीं आता....और मज़ा यह कि ख़ुद जिंदगी उनका ख्याल रखती है.....और लोग-बाग़ जिनके बीच वो जीते हैं....वो उनका ख़याल रखते हैं.......और तो और हम तमाम अम्बानियों....मित्तलों...और ऐसी ही समाज की अनेकानेक अन्य विभूतियों को जरा सी देर में ही समाज द्वारा बिसार दिया जाता है.....और तमाम फ़कीर किस्म के लोग उसी समाज में हजारों वर्षों तक समाज की इक-इक साँस के साथ आते हैं....जाते हैं....!!!!तय तो हमें भी यही तो करना होता है....कि आख़िर हमें क्या करना है......अरे भाई....हम जो चाहेंगे जिन्दगी हमें वही तो देगी.....!!!???

Wednesday, December 17, 2008

गरीबी महसूसना कैसा होता है...

गरीबी को देखा भी है....और महसूस भी किया है.....मगर इन दोनों बातों और ख़ुद के भोगने में बहुत अन्तर है....इसलिए गरीबी जीना....और महसूस करने में हमेशा एक गहरी खायी बनी ही रहेगी....लाख मर्मान्तक कविता लिख मारें हम....किंतु गरीबी को वस्तुतः कतई महसूस नहीं कर सकते हम...बेशक समंदर की अथाह गहराईयाँ नाप लें हम....!!!क्या है गरीबी.....अन्न के इक-इक दाने को तरसती आँखें...? कि बगैर कपडों के ठण्ड से ठिठुरती देह....??कि शानदार छप्पनभोगों का लुत्फ़ उठाते रईसों को ताकती टुकुर-टुकुर नज़रें....!!!कि इलाज़ के अभाव में इक ज़रा से बुखार से मौत का ग्रास बन जाती अमूल्य जिंदगियां......??कि नमक के साथ खायी जाने वाली रोटी या भात....??कि टूटे हुए छप्परों से बेतरह टपकता पानी....और बेबस-ताकती पथराई-सी आँखें....?? कि भयंकर धुप में कठोरतम भूख से बेजान शरीर से अथक और पीडादायी श्रम करते मामूली-से लाचार इन्सान....?
?कि जरा-सी गलती-भर से अपमानजनक टिप्पणियों तथा बेवजह मार का शिकार हो जाना.....??कि ज़रा-ज़रा-सी बात पर माँ-बहन की गंदी गालियों की बौछारें...??कि कुछ सौ रूपयों में खरीद लेना इक जीवित इंसान का समूचा वक्त और पर्व-त्यौहार में भी अपना घर छोड़कर सेठजी की चाकरी...??कि छुट्टी या पगार बढ़ाने की किसी भी बात पर सेठजी की त्योरी और नौकरी से हटाने की धमकी.....!!कि किसी ऊँचे घर के कुत्ते-बिल्लियों से भी निम्नस्तरीय जीवन.....??कि धरती की गोया सबसे बदतरीन जगहों पर सूअरों की भांति ठुंसे हुए लोग....??कि गन्दा पानी पीते....झूठन खाते.....उतरन पहनते....हर वक्त मालिक की सलामी बजाते...जी-हुजूरी करते बस जिन्दगी काट लेने-भर को जिन्दगी जीते लोग.....!!कि दिन-रात मौत का इंतज़ार करती धरती की आबादी की आधी से ज्यादा आम जनता........यही गरीबी है... इस गरीबी क्या अर्थ है...??इस गरीबी को महसूसना भला कैसा हो सकता है....??इस गरीबी के विषय में लिखने के अलावा क्या किया जा सकता है....पता नहीं कुछ किया जा सके अथवा नहीं....मगर इस पर मर्मान्तक-लोमहर्षक गाथा लिख-कर कोई मैग्सेसे....नोबेल....फलाने या ढिकाने पुरस्कार तो अवश्य ही लिए जा सकते हैं....हैं ना......!!??

Tuesday, December 16, 2008

हे सुभाष!!अब हम क्या करें....????


हे सुभाष !! अब हम क्या करें......??
आज रांची हल्ला में नदीम भाई की एक पोस्ट देखी अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर एक पत्रकार द्वारा जूता फेंके जाने को ग़लत ठहराने को लेकर....मुझसे रहा नहीं गया.....और उनको लिखी प्रतिक्रिया यहाँ भी चस्पां कर दी.....एक नागरिक की प्रतिक्रिया के रूप में ...सम्भव है कि मेरा गुस्सा नाजायज हो मगर प्रश्न तो यही है कि इलाज़ आखिर क्या है....उत्तर आखिर क्या हैं ??आगे हमको करना क्या है....??भारत की समस्याएं क्या हैं....और उनका हल क्या है .....सिर्फ़ जबानी जमा-खर्च..........कि इससे आगे भी कुछ....और वह कुछ क्या.............??????
...........................बस एक ही बात कहूँगा भाई....कि देश से बहुतारह प्यार करने वाले इन्सानों के पास जब कोई चारा नहीं बचता तब वे ऐसे कृत्य करने को विवश हो जाते हैं... हजारों ऐसी घटनाएं हैं जहाँ एक अपराधी को दंड नहीं मिला.....अंत में जनता ने हिंसा द्वारा...रक्तपात द्वारा बात का उपसंहार किया.......इसे ग़लत नहीं ठराया जा सकता.......सच तो यह है कि तमाम पढ़े-लिखे लोग तो अपना भविष्य...अपनी नौकरी....मानवाधिकार...और ना जाने कितने ही अनजान कारणों से जरुरी कदम नहीं उठाते....मामला सर से बहुत ऊपर जा पहुंचता है...और तमाम विद्वान-विज्ञ जन चीख-पुकार मचाते रह जाते हैं....अंत में जनता अपना फैसला देती है....तब हम फिर चीखने लग जाएँ...कि हाय-हाय ये तो ग़लत हुआ..... ये तो ग़लत हुआ..... अरे भई जब मब कुछ कबाड़ नहीं पाते तो जो कुछ लोग कुछ कबाड़ने की चेष्टा करते हैं...तो उन्हें करने ही दें ना...ये दरअसल उत्तेजना भर नहीं है....आप देखियेगा भारत में आगे इससे भी बुरा होने जा रहा है....मेरे देखे तो भारत की सड़कों पर तरह-तरह के राजनीतिक अपराधी ,जो तमाम सबूतों के मद्देनज़र और जनता तथा मीडिया की नज़र में पुख्ता तौर पर अपराधी हैं,दौड़ा- दौड़ा कर मारे जाने वाले हैं...और सम्भव है कि उनका नेतृत्व मेरे या आपके बीच ही के कुछ लोग कर रहे हों...या ख़ुद हम ही हों....!!!! असल में भाई सब्र की भी एक इन्तहां होती है....भारत के सन्दर्भ में वो इन्तेहाँ अब ख़त्म होने को आई है....या ख़त्म हो ही चुकी है...अपराधी मन- चले व्यभिचारी सांडों की तरह छुट्टे घूम रहें हैं....और भारत के हर महकमे में...सड़क पर....घर में...हर जगह पर भारत माता का बलात्कार करते...उसकी आत्मा को कचोटते....उसका चीरहरण...उसका मान-मर्दन करते...और उसकी मासूम संतानों पर घनघोर अत्याचार करते राक्षसों की भाति अट्टहास करते....फुफकार करते... अपने अंहकार-शक्ति-धन आदि का फूहड़ प्रदर्शन करते.....विद्रूप रचते.....गोया कि सत्ता के अंधे मद में अपने लिंग का प्रदशन करते घूम रहे हैं...इस सत्ता को कौन जवाब देगा....जनता ही ना.....झारखंड के सन्दर्भ में तो यह तथ्य और भी बेबाक और अश्लीलता की हद से भी गया-बीता या नंगा है....तो इसका इलाज आख़िर क्या है...!!सच जानिए भाई....जनता इन सबको सरेआम पूरी तरह नंगा करके इतना मारेगी-इतना मारेगी कि इनकी सात पुश्त तक की संताने भी प्रदर्शन नाम की चीज़ क्या होती है....यह तक भूल जायेगी....हम और आप जैसे लोग सभ्यता के नाम पर चीखते ही रह जायेंगे कि हाय..हाय ये तो ग़लत है...ये तो ग़लत है....!! अंत में सच तो यही है....परिवर्तन के बारे में हम जैसे लोग सिर्फ़ सोचते हैं....परिवर्तन तो अंततः जनता ही करती है.....करती है ना.....!!!

जूते के पीछे क्या है


नदीम अख्तर
परसों रात बारह-साढ़े बारह बजे के आसपास मैं अपनी पुरानी आदत (टीवी देखना) के आगोश में था। बीबीसी देखता हूं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय खबर और विश्लेषण देखना-जानना पसंद है मुझे। खैर, नींद आ भी रही थी और आंखें खुली भी थीं कि अचानक बीबीसी में नीचे पट्टी में एक खबर पढ़कर अचरज स‌े भर गया। खबर थी - man throws two shoes on bush during a visit of iraq. मेरी तो नींद ही गोल हो गयी। मैं इतना रोमांचित था कि हिंदी चैनलों को पलट कर देखने लगा कि शायद कोई वीडियो हो, जो इस दिलचस्प वाकये को दिखाए। काफी इंतज़ार के बाद भी न तो बीबीसी और ना ही अपने नौटंकीबाज तथाकथित स‌माचार चैनलों ने कोई वीडियो दिखाया। फिर अपने आप को काफी स‌मझाकर मैंने स‌ुला दिया। स‌ुबह उठा, तो टीवी खोलकर स‌बसे पहले आजतक लगा दिया मैंने। जितने न्यूज़ चैनल हैं, लगभग स‌भी में (दूरदर्शन को छोड़ कर) चमचमाता जूता बुश के मुखमंड को करीब स‌े गुजरता देखा जा स‌कता था। एक के बाद एक लगातार जूते चल रहे थे, रीटेक और रिप्ले, कहीं स्लो मोशन में तो कहीं फास्ट स्पीड में। खैर, मैं भी मजा लेने के बाद ज़रा गौर करने लगा कि आखिर इस घटना को भारतीय परिप्रेक्ष्य में कैसे देखा जाना चाहिए। फिर मैं स‌ोचने लगा कि आखिर बुश तो अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, फिर उन्हें मैं अपने देश के नज़रिये स‌े क्यों देखूं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। मंथन के क्रम में एक बात स्पष्ट स‌मझ में आयी कि दुनिया भर के लोगों में बुश के प्रति रोष है, जिसके परिणामस्वरूप एक पढ़े-लिखे और स‌भ्य स‌माज में अपना एक विशिष्ट स्थान रखनेवाले पेशे स‌े ताल्लुक रखनेवाले व्यक्ति के लिए किसी गणतंत्र के निर्वाचित राष्ट्रपति पर जूते चलाने जैसा बेतुका और अभद्र काम भी असभ्य ना रहा। दरअसल, इन जूतों के परिचालन की पृष्ठभूमि में भी बुश हैं, नायक भी बुश हैं और खलनायक भी बुश हैं। बुश यानी रक्तपात का प्रवर्तक, बुश यानी स‌त्ता की प्राप्ति के लिए तेल के भंडारों पर अवैध कब्जे का पैरोकार और बुश यानी मानवता का स‌बसे अभद्र चेहरा। बुश के पिता जॉर्ज बुश स‌ीनियर ने अपने राष्ट्रपतीत्व काल में जो खेल शुरू किया था, उसके वैश्विक स्तर पर प्रायोजक बने डब्ल्यू बुश। इनके पिता की नज़र भी इराक पर थी, पुत्र ने भी इराक को ही चरागाह का आधार धरा घोषित किया। इराक में जो कार्रवाई बुश के पिता स‌ीनियर बुश ने की, उसका खामियाज़ा था आतंकवाद (जिसे आज इस्लामी आतंकवाद कहा जाता है) का उदय। वैसे सीनियर बुश के कार्यकाल में जो ज़्यादतियां इराक और फिलिस्तीन में हुईं, उसे आगे बढ़ाया जॉर्ज बुश (जिन पर जूते चले) ने। जॉर्ज बुश ने यह प्रचार किया था कि इराक के पास स‌ामूहिक विनाश के हथियार हैं, स‌द्दाम हुसैन उन हथियारों स‌े पूरे मध्य-पूर्व को तबाह कर स‌कता है। फिर स‌द्दाम को अल कायदा का स‌हयोगी करार दिया। स‌द्दाम हुसैन को मानवता का विरोधी करार देकर इराक पर बेवजह हमला किया गया। इराक को नेस्तनाबूद तो किया ही गया, स‌ाथ ही स‌ाथ स‌द्दाम हुसैन को अपमानित करके कुत्तों की तरह पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। एक प्रजातांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति का ऎसा हाल, शायद पहले कभी नहीं हुआ होगा। फिर झूठे और फर्जी मुकदमे के बाद स‌द्दाम हुसैन को ठीक ईद-उज़-जोहा के दिन ही फांसी पर लटका दिया गया। मतलब, बुश ने अपने स‌ामने खड़े हो स‌कनेवाले स‌भी रीढ़ वालों को या तो रीढ़विहीन होने पर मजबूर किया, या फिर उसका कत्ल कर दिया।
बात यहीं खत्म नहीं होती। मैं बीबीसी हिंदी डॉट कॉम खंगाल रहा था, तो एक खबर पर नज़र पड़ी। खबर यह थी कि आज भी इराक़ में नागरिक सुविधाएं जर्जर स्थिति में हैं। खबर में रेडक्रॉस का हवाला देते हुए कहा गया था कि इराक पर अमरीकी नेतृत्व में हुए हमले के पाँच साल बाद भी लाखों इराक़ियों को शुद्ध पानी, साफ़ शौच व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं नसीब नहीं हैं। वहां मानवीय हालात बेहद ख़राब हैं। कुछ क्षेत्रों में बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद लाखों लोग ऐसे भी हैं जो रोज़ी रोटी को लेकर परेशान हैं। कुछ परिवार अपनी कमाई का तिहाई हिस्सा यानी क़रीब 150 डॉलर तो शुद्ध पानी ख़रीदने में ख़र्च कर देते हैं। इराक़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अब तक के हालात से भी बदतर हैं और जो सेवाएं उपलब्ध हैं वो इतनी महंगी हैं, जिन्हें ज़्यादातर आम नागरिक वहन नहीं कर सकते। इराक़ी अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ़ और ज़रूरी दवाओं की कमी है और जो सुविधाएं हैं भी, उनका रखरखाव ठीक प्रकार से नहीं किया जाता। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में सिर्फ़ 30 हज़ार बिस्तर हैं जो 80 हज़ार की ज़रूरत के आधे से भी कम हैं। इस बदहाली की वजह है युद्ध। यह बुश की नीति ही थी, जिसने तेल के अकूत भंडार स‌े स‌ंपन्न इस राष्ट्र को फकीरों का ठिकाना बनाकर छोड़ दिया। लाखों जानें गयीं, उसकी तो आप गिनती ही मत कीजिये, क्योंकि एक-एक मासूम मौत के लिए अगर जॉर्ज बुश को फांसी की स‌ज़ा दी जाये, तो यकीन मानिये बुश के हर दिन फांसी के तख्ते पर चढ़ते-चढ़ते खत्म हो जायेंगे लेकिन फांसी की स‌जा खत्म नहीं होगी।
रेडक्रॉस का कहना है कि हज़ारों इराक़ी जंग की शुरूआत के समय से गायब हैं। जंग के दौरान मारे गए लोगों में बहुत से लोगों की पहचान तो अब तक नहीं हुई है क्योंकि इराक़ की सरकारी संस्थाओं तक बहुत कम शव पहुँचे। हजारों इराक़ी जिनमें अधिकांश पुरुष हैं, क़ैद में हैं। इनमें 20 हज़ार लोग बसरा के नज़दीक बक्का के शिविर में हैं, जिसे अमरीका के नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय सेना चला रही है। इराक़ रेडक्रास का दुनिया भर में सबसे बड़ा अभियान है, जिसमें 600 लोग काम करते हैं और जिसका वार्षिक बजट 1060 लाख डॉलर है।
रिपोर्ट पढ़ने के बाद मैं एक आम धारणा पर पहुंचा कि इतना स‌ब कुछ जिस आदमी के कारण हुआ, क्या वह इसके बाद भी इज्ज़त का हकदार है। मैं मानता हूं कि अगर किसी भुक्तभोगी के नज़रिये स‌े देखा जाये, तो बुश के स‌ाथ जो हुआ और जो होगा, वो कम हो रहा है या होगा। लेकिन एक राष्ट्रपति पर एक पत्रकार के द्वारा जूते चलाना कहीं स‌े भी जायज़ नहीं है। यह कृत्य पत्रकारिता को आदर्श पेशा मानने वाले लोगों के लिए गहरे घाव के स‌मान है। इस तरह की कार्रवाई की स‌भ्य स‌माज में कोई जगह नहीं है। वैसे जिस पत्रकार ने यह करतूत की, उसके बचाव में लोग स‌ामने आने लगे हैं और इराक में तो बाकायदा उसकी रिहाई के लिए प्रदर्शन भी हो रहे हैं। वक्त बतायेगा कि इस पत्रकार का क्या होगा लेकिन जो भी हो, बुश को खराब कह कर किसी कीमत पर पत्रकार के कृत्य को जायज़ नहीं ठहराया जा स‌कता।

एक बात कहनी थी आपसे, कहूं?


आप लाजवाब लिखते हो साहब....मगर ये इस ग़ज़ल में वो बात नहीं......जो बात...........आप समझ गए होंगे.....हम सबको सिर्फ़ बढ़िया है...और एक-दूसरे को बधाई ही देने से फुर्सत नहीं मिलती....मजा यह कि हर ब्लागर की हर रचना श्रेष्ट ही होती है.....मगर यह सच भी नहीं होता.........अब ब्लॉग जगत में इस बात की गुन्जायिश जरूरी हो गई है....कि रचनाओं पर सच में ही सारगर्भित टिप्पणियां हों...ना कि सिर्फ़-व्-सिर्फ़ प्रशंसा के भाव...........आपकी रचनाएँ बड़ी अच्छी होती हैं... मगर सारी तो किसी की भी अच्छी नहीं हो सकती.....फिर कुछ ऐसे भी तो हैं...जो वाकई बहुत लाज़वाब नहीं लिखते....मगर उनकी भी वैसी ही प्रशंसा हम पाते हैं... क्यूँ भाई....एक कम अच्छी रचना को आप जरुरत से ज्यादा सम्मान देकर क्या आप उसकी भलाई करते हो....??नहीं ये उसका नुक्सान ही है....वो कमतर चीजों को भी अच्छा ही मान लेगा....और उसका टेस्ट शुरुआत से ही कमतर रह जायेगा.....!!.......प्रशंसा अच्छी बात है.....मगर औसत चीज़ के बारे में उचित ढंग से बताया जाना ज्यादा अच्छी प्रशंसा होगी...वो किसी नए...किंतु समझदार लेखक के लिए उसके हित का साधन भी बनेगी....और गैर समझदार अगर अनावश्यक रूप से उसे तूल दे...दे....तब भी कई ब्लागरों द्वारा उसे समझाया जाना मुमकिन है.....अमूमन तो सभी आए दिन अपनी पोस्ट प्रकाशित करते हैं....मगर वो हमेशा ही अपने "स्वामी" के स्तर की हो ही....ये कतई जरूरी नहीं.....हम सब लेखक भी हैं और अपने ही प्रकाशक भी.....यानि कि हम सब अकेले-अकेले भी मिडिया की इक-इक इकाई हैं....मिडिया के अंकुश में रहने की बात तो हमने कर दी....मगर हम पर किसका अंकुश है...??और अंकुश-हीन हम प्रकाशक-ब्लॉगर-लेखक जो स्तरीयता की मिसाल बन सकते हैं अपनी हड़बड़ी में...........रचनाओं को पेलने की अपनी घनघोर शौकीनी में ख़ुद अपनी-.....हिन्दी की-.......ब्लागर-जगत की-.....और हिन्दी- साहित्य का ही नुक्सान ना कर बैठें....!!हर रचना तो प्रेमचंद...ग़ालिब....मीर......आदि-आदि-आदि की भी जबरदस्त नहीं हुई थी.........हम किस खेत की मुली हैं....?? भाईयों .... इसे आप अपने ऊपर मत ले लीजियेगा.....आज तो बस इक विचार आ गया....जो जाने कब से मन में घूमता रहा है....आज संयोग-वशात मन से बाहर निकल पड़ा...वो भी आपकी रचना पर कमेन्ट के रूप में....सच में तो मैं आपसे बड़ा छोटा हूँ....मगर क्या करूँ आपने ख़ुद ने अपने लिए मानदंड काफ़ी ऊँचे बना लिए हैं... वैसे मेरा कमेन्ट आप-पर है भी नहीं...ये मुझ-सहित सब पर पूरी शिद्दत के साथ लागू होता है..........कम-से-कम उन सभी पर जो ब्लागरों में अत्यन्त लोकप्रिय हैं... सभी नए आने वालों को सही बात बताना बड़ों का कर्तव्य है...बिना अपनी बदनामी वगैरह की बाबत सोचे हुए...बदनाम होकर भी यदि कुछ अच्छा हो जाए तो यह ठीकरा आज मेरे ही सर....मैं यहाँ सीखने आया था....लेकिन देखा कि यहाँ तो कुछ सिखाया तो जाता ही .....!!नहीं बस रचनाएं ही रचनाये पेली जाती हैं....और अपनी रचनाओं पर टिप्पणियों का आनंद.....!!.....थोड़ा मज़ा तो मैंने भी लिया....मगर वही-वही-वही-वही..........देखते हुए अब ऊब-सी हो रही है...ये इसलिए है...कि सब (मेरे सहित) के सब दीवाने-गालिब-सी पुस्तक शायद आधे साल में ही ठोक देने वालें हैं.....बेशक "दीवान" पर रखने लायक उनमें चार भी ना हों....!!........ यह दुनिया बड़ी अद्भुत है... छोटे-छोटे युवा भी चकित कर देने वाला साहित्य रच रहे हैं.....बेशक साहित्य की अधिकता के कारण बहुत सारी अधबनी..अधूरी...अपरिपूर्ण रचनाएं भी आ जा रही हैं.....अब तक मैं ख़ुद भी इसमें शामिल रहा हूँ.... मगर अब और नहीं...!!.......सोचना भी जरुरी है कि कितना-क्या-और किस हद तक सही है खुबसूरत भी...और समय की आवश्यकता भी......!!....सिर्फ़ तात्कालिक भाव भर ही न हों.....हमारे विचार....!!...बल्कि ऐसे भी हों जो हमें चकित भी करें...और उसी वक्त व्यथित भी... भाईयों आपकी पोस्ट पर हमेशा अच्छा लगा है...मेरी बात को अन्यथा ना ले लेंगे...मुझे आपका प्यार और सुझाव दोनों ही चाहिए....जिसे मैंने बड़ी शिद्दत से एक टिप्पणी में आपसे मांगे भी थे....हम सभी ग़ज़ल के...कविता के....या किसी और विषय के जानकारों को अपनी जानकारी बांटनी चाहिए...मैं ख़ुद तो अनभिज्ञ हूँ....और यहाँ बहुत सारे लोग अद्भुत हैं....वो हम सबका मार्गदर्शन भी करते चलें.....हम जैसे लोग सदा आभारी रहेंगे...सच...हाँ सच.....!!

Sunday, December 14, 2008

रात भर मैं पागलों की तरह कुछ सोचता रहा....!!



प्यार से गले लगाया जब सिसकती मिली रात....
पास जब उसके गया तब सिमटती मिली रात...!!
रात जब आँखे खुलीं उफ़ तनहा-सी बैठी थी रात...
साँस से जब साँसे मिलीं तो लिपटती मिली रात !!
मैं दिखाता उसे नूर-ऐ-सबा सौगाते-सुबह की झलक
सुबह से पहले ही मगर सो गई वो चमचमाती रात
रात जब रात का मन ना लगा तब यूँ "गाफिल"
की पेट में गुदगुदी तो हंसने लगी मदमदाती रात !!
रात को जब कायनात भी थक-थकाकर सो गई
रात भर भागती फिरी बावली जगमगाती रात !!
रात को इक कोने में मुझको गमगीं-सा पाकर
सकपकाकर रोने लगी यकायक कसमसाती रात !!
रात जब रात का मन ना लगा तब यूँ "गाफिल"
की पेट में गुदगुदी तो हंसने लगी मदमदाती रात !!

Saturday, December 13, 2008

७५ वां दिन.....सौवीं पोस्ट....मुझे माफ़ करें....!!

चलते-चलते जब भी मैं साँस लेता हूँ .........
इक लम्हा अपनी उम्र का रब को देता हूँ.....!!
मैं तो अपने-आप से अक्सर चौंक जाता हूँ....
मैं अपने-आप को अक्सर ही आवाज़ देता हूँ...!!
मौत भी जब मुझसे मायूस हो लौट जाती है....
ख़ुद ही उसकी चौखट पर मैं आहट देता हूँ...!!
क्यूँ हो जाता है यारब मुझसे बिन-बात खफा
जा ना अपनी उम्र तुझे मैं यूँ ही दान देता हूँ..!!
क्यूँ धरती पे ला पटका है मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़...
वो तो मैं हूँ फिर भी तुझपर अपनी जान देता हूँ...!!
सुनाई देती है मुझे अक्सर उसकी ही धड़कन...
उसको याद करके "गाफिल"जब मैं साँस लेता हूँ...!!

यादें क्यूँ आतीं हैं....!!


बीते हुए लम्हे....
गुजरे हुए पल.....
बिखरी हुई यादें.....
थोडी-सी कसक.....
थोडी सी-सी महक....
डूबी हुई कोई सिसकी....
कोई खुशनुमा-सी शाम.....
या दर्द में डूबा संगीत..........
सुरमई से कुछ भीने-भीने रंग.....
यादों से विभोर होता हुआ मन.......
मचलती हुई कई धड़कनें....
फड़कती हुई शरीर की कुछ नसें.....
जाने क्या कहता तो है मन....
जाने क्या बुनता हुआ-सा रहता है तन....
बहुत दिनों पहले की तो ये बातें थीं......
आज तक ये क्यूँ जलती हुई-सी रहती है....
ये आग मचलती हुई-सी क्यूँ रहती है.....
अगर प्यार कुछ नहीं तो बुझ ही जाए ना....
और अगर कुछ है तो आग लगाये ना...
बरसों पहले बुझ चुकी जो आग है....
वो अब तलक दिखायी कैसे देती है....
और हमारी तन्हाईयों में उसकी सायं-सायं
की गूँज सुनाई क्यूँ देती है....!!
प्यार अमर है तो पास आए ना....
और क्षणिक है तो मिट जाए ना......
मगर इस तरह आ-आकर हमें रुलाये ना....!!

Friday, December 12, 2008

ये कोई ग़ज़ल नहीं....!!





मैं मिन्नतें करता हूँ और करता है वो मुझसे तकरार है....

कह नहीं सकता मगर मुझे अल्लाह से कितना प्यार है !!

बहुत ही तेज़ हम चले कि,घड़ी की सुई भी पीछे छुट गई....

वक्त का पता नहीं पर,मुआ ये किस घोडे पर सवार है....!!

मुसीबतें कई तरह की हमारे साथ में हैं लगी ही हुईं

शरीर से है बीमार कोई तो कोई मन से गया हार है !!

बन गए मशीन हम और अपनी ही आदतों के गुलाम भी

काम इतने कि हर कोई गोया दर्द की लहर पर सवार है...!!

उडा रहा है हमारी ये पतंग कौन कितनी लम्बी डोर से...

और सोचते हैं हम ये कि हम अपनी सासों पे सवार हैं...!!

बही जा रही है अपनी नाव किस दिशा में बीच समंदर

किसी और के हाथ में"गाफिल" इस नाव की पतवार है !!

Wednesday, December 10, 2008

प्रेम अजर है..प्रेम अमर है....!!



प्रेम अजर है...प्रेम अमर है.....!!


प्रेम अमर है....और अजर है.....
प्रेम है पूजा...इसमें असर है....!!
प्यार में डूबे....वो ही जाने....
इसका कितना गहरा असर है!!
नाम किसी का लेते ही हो...
जाता है साँसों पे असर है...!!
आँख से आँख मिलते ही इक
आग का हो जाता गो बसर है!!
तूफां में इक किश्ती हो जैसे
आती-जाती हर-इक लहर है !!
प्रेम में जीना हो या मरना....
"गाफिल"अमृत या कि ज़हर है !!

क्या हत्या एक खेल है..??न बाबा ना....!!





क्या बोलूं....क्या लिखूं मैं....कि मोशे का दर्द दूर हो सके.....वो पता नहीं कैसे..कब तलक दूर होगा....??जिंदा इंसानों को बेबात मौत की नींद सुला देने वाले लोग कैसे होते हैं....उनकी चमड़ी...उनका मांस...उनकी हड्डी....उनके उत्तक....उनका पेट...उनकी नसें....उनके पैर...उनके हाथ....उनका माथा....उनके दांत....उनकी जीभ... उनकी मज्जा...उनका लीवर...उनकी किडनी....उनकी आंत.....उनके तलवे.....उनकी हथेली.....उनकी ऊँगली.....उनके नाखून...............उनका.........खून.........उनका...... दिल........उनका दिमाग.........उनकी रूह.........मैं समझना-जानना-देखना-पढ़ना चाहता हूँ....कि बेवजह गोली-बन्दूक-बम-बारूद-ग्रेनेड..........यानि कि हर पल आदमी की मौत को अंजाम देते लोग...खुदा का काम ख़ुद करते लोग कैसे होते हैं....मेरे भीतर इक मर्मान्तक-आत्मा-भेदी छटपटाहट जन्म ले चुकी है....कि जो भी इसान किसी भी प्रकार के गैर-इंसानी काम को दिन-रात ही करते चलते हैं...वो भला कैसे होते हैं...मैं उन्हें झिंझोड़कर पूछना चाहता हूँ कि ये सब उन्होंने क्यूँ किया....ये सब वो क्यूँ करते हैं....खून-का-खून बहा कर उन्हें कैसा आनंद मिलता है....किस सुख को प्राप्त करते हैं ये वहशी...मासूमों को मरता हुआ देखकर....!!??....मैं पूछना चाहता हूँ उनसे कि अपनी जिन माँ-बहनों-भाईओं और एनी रिश्तेदारों को वो अपने घर हंसता हुआ छोड़कर आए हैं.......उनमें से किसी भी एक को,जिन्हें वो सबसा कम प्यार भी करते होंवों.....,को लाकर अभी-की-अभी कुत्ते-बिल्ली या किसी भी तरह की हैवानियत भरी मौत उन्हें मारूं....उन्हें उनकी आंखों के सामने तड़पता हुआ छोड़ दूँ....उन्हें आँखें खोल कर ये सब देखने को मजबूर भी कर दूँ....तो अभी-की-अभी वे बताएं कि उन्हें कैसा लगेगा....!!??......यदि सचमुच ही अच्छा....तो अभी-की-अभी मैं उन्हें कहूँ...कि आओ सारी धरती के लोगों को ख़त्म कर डालो.....या फ़िर एक दिन वो ऐसा ही कर डालें...कि अपनी ही माँ-बहनों का कत्ल कर डाले...और उन्हें तड़पता हुआ....मरता हुआ देखते रहें.....??!!ये कैसी नफरत है.....??ये नफरत किसके प्रति है.....??इस नफरत का कारण क्या है....??और इस नफरत का क्या यही अन्तिम मुकाम है......??क्या हत्या के अलावा....या विध्वंस के अलावा कोई और रास्ता नहीं है....और क्या ये विध्वंस या हत्या का मार्ग...उनकी मंजिल-प्राप्ति में किसी भी प्रकार से सहायक हो भी रहा है.....??कितने वर्षों से ये लोमहर्षक कृत्य किया जाता चला आ रहा है.....क्या इससे सचमुच कोई सार्थक मुकाम हासिल हो पाया है....??या महज ये अपनी ताकत का प्रदर्शन-भर है.....!!यदि यह ताकत का प्रदर्शन भी है तो किसलिए....किसके लिए.....??आख़िर इस प्रदर्शन का कोई उपयोग भी है कि नहीं....या कि मज़ाक-ही-मज़ाक में ह्त्या का खेल चल रहा है.....!!??ये मज़ाक क्या है....??ये ताकत कैसी है....क्या ताकत का रूप सदा वहशी ही होता है....??क्या ताकत आदमी को आदमी और उसकी जान को जान नहीं समझती....??और यदि ऐसा है भी है तो इस तमाम प्रकार के लोगों को सबसे पहले अपनी ही जान क्यूँ नहीं ले लेनी चाहिए.....??अगर जेहाद का मतलब जेहाद है तो अपनी जान लेना तो उसका परम-परिष्कृत रूप होगा.....!!जेहाद का महानतम जेहाद...क्यूँ ठीक है ना....!!......इसलिए तमाम प्रकार के जान लेने वालों को मेरी सलाह है कि बजाय किसी अन्य की जान लेने के सीधे ख़ुद की जान लेकर उपरवाले के पास परम पद प्राप्त कर लेवें....उससे आने वाली मानवता भी उनकी अहसानमंद रहेगी.....वो भी सदा के लिए......!!!!

Tuesday, December 9, 2008

खेल फर्रुखाबाद का जारी है !!


खेल फर्रुखाबाद का जारी है !!

एक कमीनापन यहाँ के माहौल पर तारी है.
ये कमीनापन हम सब पर ही तो भारी है....!!
इस कमीनेपन को हम कहाँ तक ढोएँ बाबा...
ये कमीनापन कुछ लोगों की ख़ास सवारी है !!
देश-राज्य-शहर किसी की कोई कीमत नहीं है...
यहाँ हर कोई अपने जमीर का व्यापारी है !!
देश पर मर-मिटने की कीमत है कुछ लाख..
और ओलोम्पिक विजेता करोड़ों का खिलाड़ी है !!
हर इक दफ्तरी काम में याँ इक घोटाला है....
हर इक जगह खेल फर्रुखाबाद का जारी है !!
इमानदार हों,ये तो कभी हो ही नहीं सकता
मत्री-संत्री-पुलिस-अफसर-सेठ सभी की यारी है !!
ईमान की कीमत पैसा कैसे हो सकता है भला
सदियों से ये सवाल "गाफिल" हम पर भारी है !!
इस नंगे-पन का कोई अंत नहीं है क्या......?

Monday, December 8, 2008

इस थोडी-सी बिना पढ़ी-लिखी जगह पर......!!








एक ऊँचे से ताड़ के पेड़ पर........घने पत्तों वाली लम्बी डालियों के बीच.......थोडी-सी जगह पर.......खेल रही हैं कुछ गिलहरियाँ......फुदकती....उछलती..... मचलती.... दौड़ती....भागती......जरा-सी ही जगह पर........बिना लड़े और झगडे....मिल-जुल कर खेल रही हैं ये बिना पढ़ी-लिखी ये गिलहरियाँ.......!!
......................कई पेड़ हैं एक साथ खड़े हुए.....थोडी-सी ही जगह पर.......एक दूसरे के साथ हँसते और गपियाते हुए......तरह-तरह के पत्तों वाले.....तरह-तरह के फूलों वाले.....सदियों से ये एक ही साथ रहते हुए.....जीवित और स्पंदित....बिना पढ़े-लिखे पेड़......!!
..................इसी थोडी-सी ही जगह में.......कई तरह के पंछी.....कई तरह के जीव-जंतु....बरसों से साथ-साथ ही रहते हैं.......हिल-मिल कर....खेलते-खाते....हँसते- बतियाते......अपनी उम्र पूरी करके मर जाते.........मगर किसी ने भी आज तक यह नहीं कहा..........हमारी है....या हमारे बाप-दादा की है......या हमारे बाद यहाँ रहेंगे हमारे बच्चे........बिना पढ़े-लिखे ही.........!!
......................कितने ही मौसम बदलते हैं.......बदले हैं.......मौसमों के साथ फल-फूल भी....जीव-जंतु भी.....मगर माहौल तनिक भी नहीं बदलता.......वैसा ही बना रहता है....तरो-ताज़ा......सदाबहार.......हरा-भरा.....खुशनुमा.......!!......टी.वी.पर एक मिनट में दर्जनों चैनल बदलते हम.........यहाँ एक ही दृश्य को देखते मिनट-घंटे-दिन तो क्या.....इक पूरी जिन्दगी ही निकाल दें........एक ही दृश्य को निरखते हुए......!!
.............................बिना पढ़े-लिखे पहाड़.....बिना पढ़े-लिखे जीव-जंतु.....बिना पढ़े-लिखे पेड़.......और बिना पढ़ा-लिखा आसमा.....रह रहे हैं इसी बिना पढ़ी-लिखी पृथ्वी पर......आपनी-अपनी जगह पर.....बिना एक दूसरे का अतिक्रमण किए हुए.....बिना एक-दूसरे से झगडे हुए........किसी के बाप-दादा की नहीं हुई ये ज़मीन..........किसी ने भी इसे कभी अपना भी नहीं कहा........मगर जमीन का बिना इक छोटा-सा टुकडा खरीदे हुए भी........पृथ्वी को जिया है इन्होने अपनी आत्मा की तरह.......धरती के हर इक स्पंदन को......इन्होने जिया है अपनी हर-इक आती-जाती साँस की तरह........!!
.................गिलहरियों का खेल अभी तक चल ही रहा है.........इस पेड़ से उस पेड़....इस डाली से उस डाली.........पंछी आ-जा रहे हैं उड़-उड़ कर वापस अपनी ही छोटी-सी जगह पर.......और आश्चर्य तो यह है कि तरह-तरह के ये पेड़-पौधे.....पक्षी....जंतु.....पहाड़....नदी....आसमा....धरती......सब समझते हैं एक-दूसरे की भाषा.....बिना पढ़े-लिखे ही.....!!
.................यहीं पास ही खड़ी हुई हैं......कुछ निर्जीव बिल्डिंगे.......और बनने को तैयार हैं कुछ और नई भी......कई प्लाट तो काट लिए गए हैं.....और कुछ काटे जाने वाले भी हैं.......इसी थोडी-सी जगह पर हैं......ऊपर बताये गए पेड़....पहाड़.....जंतु....पंछी.....नदी....और ख़ुद यह जमीन भी......!!..........!!........!!
..............बस कुछ ही समय में ख़त्म हो जाने को हैं....ये बिना पढ़े-लिखे लुभावने दृश्य........!!.......!!

Saturday, December 6, 2008

युद्ध स‌माधान नहीं...


नदीम अख्तर
आज जो कुछ नेताओं के बारे में लिखा-पढ़ा, कहा-सुना, दिखाया और देखा जा रहा है, उससे स‌मग्र रूप स‌े स‌हमत होना थोड़ा मुश्किल है। ऎसा मेरा मानना है। देश में लोकतंत्र की जो व्यवस्था है उससे अलग हटकर तो कोई और तंत्र नहीं चलाया जा स‌कता है। हां, ये बात अलग है कि हमें मिलकर ऎसे हमलों और आतंक की कार्रवाई को रोकने के रास्तों पर विचार करना होगा। इस बात स‌े तो आप भी स‌हमत होंगे कि आखिर हिंसा स‌े हिंसा को स‌माप्त नहीं किया जा स‌कता। मैं मानता हूं कि आज हम जो कुछ झेल रहे हैं, वह कालांतर के राजनीतिक-सामाजिक कुप्रबंधन एवं स्वार्थलोलुपता के द्वारा की गयी ज़्यादतियों का प्रतिफल है। आपको याद होगा कि स‌िख स‌मुदाय के धार्मिक स‌्थल स‌्वर्ण मंदिर पर बर्बर स‌ैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन ब्लू स‌्टार) ने पंजाब में आतंकवाद को और बढ़ा दिया था। यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उसी कार्रवाई की प्रतिक्रिया की वेदी चढ़ गईं। फिर उस कार्रवाई की प्रतिक्रियास्वरूप 1984 के दंगे हुए। उस दौरान स‌िख स‌माज के स‌ाथ जो कुछ हुआ, क्या उसे एक भारतीय होने के नाते हम न्यायोचित कह स‌कते हैं। नहीं ना। तो फिर उसके बाद हुई क्रूर कार्रवाईयों को हम ताक पर रखकर आतंक की स‌माप्ति के बारे में कैसे स‌ोच स‌कते हैं। शासन को स‌र्वप्रथम नीतियों में व्यापक बदलाव लाना होगा।
अमेरिका आज अपनी युद्धपरस्त नीतियों का खामियाज़ा भुगत रहा है। उसके पास तो विश्र्व स‌मुदाय स‌े लूटा हुआ खजाना था, जिसके बल पर वह वैश्र्विक मंदी के दौर में आज भी अपने पैरों पर खड़ा है, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह एकदम विपरीत है। हम खुद कमाते हैं, तब खाते हैं; ऎसी स‌्थिति में अगर कोई पाकिस्तान या अन्य मुल्क के स‌ाथ जंग की बात कहे, तो कम स‌े कम इस देश का चिंतनशील नागरिक तो कतई इसका स‌मर्थन नहीं कर स‌कता है। भारत की ओर स‌े युद्ध का आगाज़ किया जाता है, तो पाकिस‌्तान भी पीछे नहीं रहेगा वह भी हमले का जवाब देगा। भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति स‌ंपन्न देश हैं। भारत का लोकतंत्र तो फिर भी काफी गठीला है, लेकिन पाकिस्तान का लोकतंत्र केवल फौजी रहमोकरम का मोहताज है। अर्थ यह है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, इसकी गारंटी वह दे चुका है लेकिन पाकिस्तान के स‌दर की ओर स‌े हाल में इस स‌ंदर्भ में दिया गया वक्तव्य न तो आम अवाम के द्वारा स्वीकार किया गया है और ना ही फौज के द्वारा। पाकिस्तान हमेशा यह कहता आया है कि वह अपने बचाव के लिए अपने रक्षासूत्रों का इस्तेमाल करेगा। ऎसी स‌्थिति में लोगों को यह स‌मझना चाहिए कि पाकिस्तान के स‌ाथ जंग लड़कर आतंक को स‌माप्त करने के दिवास्वप्न देखना अपने मानसिक दीवालियेपन का द्योतक ही है। आपको मालूम होगा कि 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने युद्ध की घोषणा की थी। आज स‌ात स‌ाल हो गये, लेकिन आज भी अफगानिस्तान में आतंक के स‌ौदागर खत्म नहीं हुए हैं। नौबत यह आ गयी है कि एक स‌मय अमेरिका के स‌बसे गुड ब्वॉय रहे हामिद करज़ई (अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति) अब अमेरिका स‌े ही दूर भाग रहे हैं। वह यहां तक कह रहे हैं कि विदेशी स‌ेना के देश छोड़ने की स‌मय स‌ीमा तय होनी चाहिए। क्या आप जानते हैं कि करज़ई आखिर ऎसा क्यों कह रहे हैं? असल में अफ़गानिस्तान में फौज की ज़्यादतियों और असंख्य़ निर्दोष नागरिकों की मौत ने वहां के आम लोगों को ही आतंकियों का हमदर्द बना दिया है। पहले तालिबानी लड़ाकों की स‌ंख्या एक लाख थी, तो आज उन लड़ाकों का स‌ाथ देने के लिए मुल्क की 65 फीसदी आबादी खड़ी है। इसका स‌ीधा अर्थ यह हुआ कि अफगानिस्तान का बहुसंख्य स‌माज आतंकी हो चुका है। लोग हामिद करज़ई को देखना नहीं चाहते। और, चुनाव अगले स‌ाल होनेवाले हैं। स‌ंभवतः स‌ितम्बर में, जिसमें एक बार फिर तालिबान स‌मर्थकों का चुन कर आना तय है। मतलब इस बार जो स‌रकार वहां बनेगी, वह कमोबेश तालिबान की ही होगी।
अब ज़रा पाकिस्तान की परिस्थितियों पर नज़र डालिये। आज की तारीख में अगर हम पाकिस्तान में आतंकियों की गिनती करें, तो कह स‌कते हैं कि मुश्किल स‌े दस हजार लोग शुद्ध रूप स‌े आतंकवादी होंगे। शेष जनता तो हमारे-आपके ही तरह एक-एक वक्त की रोटी के लिए स‌ंघर्ष कर रही है। अगर भारत जंग छेड़ता है, तो आतंकियों के मारे जाने की गारंटी तो नहीं है लेकिन आम आदमी के भारी तादाद में हलाक होने की पूरी गारंटी है। ऎसा इराक़, अफगानिस्तान, दारफुर, स‌ोमालिया, अरमीनिया, वियेतनाम में देखा और महसूस किया जा चुका है। इन स‌भी देशों, और ऎसे ही कई अन्य मुल्कों में मानव स‌भ्यता लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित शासन व्यवस्था और पूरे तंत्र स‌े ही नफरत करती है। इन देशों में आत्मरक्षा ही स‌बसे अहम स‌वाल हो गया है, जो लोग "आत्म" के ही बलबूते करने को मजबूर हैं। इसका प्रतिफल यह है कि हिंसा ने हिंसा को इतना बढ़ा दिया है कि जंग का आगाज करनेवाले मुल्क के स‌ामने अब युद्धरत देशों स‌े पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अमेरिका हो या भारत, एक स‌च्चाई का स‌ामना स‌भी को करना पड़ेगा कि युद्ध स‌े स‌िर्फ नफरत को ही बढ़ाया जा स‌कता है। युद्ध किसी स‌मस्या का स‌माधान नहीं है। अगर ऎसा होता, तो आज अमेरिकी फौज बहुतायत में मानसिक रोगी होकर अपने घर नहीं लौट रहे होते। अगर ऎसा होता, तो संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों पर सूडान, आइवरी कोस्ट और हैती में बाल यौन शोषण के गंभीर आरोप नहीं लगते। और, जो लोग युद्ध के पैरोकार हैं, उनके लिए स‌ंयुक्त राष्ट्र के शांति स‌ैनिकों की करतूत पर इसी स‌ाल जारी रिपोर्ट नज़ीर है। अंतर्राष्ट्रीय गैरसरकारी संस्था-- सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट में बताया गया है कि आंतरिक संघर्ष से बेहाल अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट, सूडान और लैटिन अमेरिकी देश हैती में शांति सैनिकों और अंतर्राष्ट्रीय सहायता एजेंसियों के कार्यकर्ताओं द्वारा स्थानीय बच्चों का शारीरिक व मानसिक शोषण किया जा रहा है। शोषितों में छह वर्ष की उम्र तक के बच्चे भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचने वाली शिकायतों की संख्या वास्तविक घटनाओं की तुलना में काफी कम है। स्थानीय पुलिस भ्रष्टाचार में लिप्त है। पैसे और बंदूक के बल पर स्थानीय प्रशासन को खामोश रहने के लिए मजबूर किया जाता है। स्थानीय बच्चों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पीड़ितों और अच्छी छवि वाले कुछ गैरसरकारी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं से लिये गये गहन साक्षात्कार के हवाले से सेव द चिल्ड्रेन ने कहा है कि शांति सैनिक इन देशों में कई तरह के गंभीर यौन अपराधों में लिप्त हैं। इनमें बाल वेश्यावृत्ति, बलात्कार, समलैंगिक यौनाचार, अश्लील फिल्मों का निर्माण, अश्लील टीका-टिप्पणी, यौन-गुलामी और बाल ट्रैफिकिंग तक के मामले शामिल हैं। रिपोर्ट सामने आने के कुछ ही दिनों पहले ही आइवरी कोस्ट की एक 13 वर्षीय लड़की ने बीबीसी को बताया था कि संयुक्त राष्ट्र के दस शांति सैनिकों ने उसके साथ बलात्कार किया और उसे लह-लुहान अवस्था में छोड़ गये, लेकिन शांति सैनिकों के खिलाफ शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गयी।
इतना ही नहीं, रिपोर्ट में बाल यौन शोषण के विभिन्न तरीकों को विश्लेषित करते हुए कहा है कि सूडान, आइवरी कोस्ट और हैती के उत्पीड़ित बच्चों में 60 प्रतिशत के साथ बलात्कार किया गया जबकि 40 प्रतिशत को भोजन, कपड़े, पैसे आदि का लोभ देकर वासना का शिकार बनाया गया। हैती में 70 उत्पीड़ित बच्चों के एक समूह में से 40 ने कहा कि उनके साथ बलात्कार की घटना घटी। 53 बच्चों ने अश्लील मौखिक टिप्पणी और आपत्तिजनक इशारे की शिकायत की जबकि 40 बच्चों का कहना था कि उन्हें पैसे और भोजन सामग्री का लालच देकर वासना का शिकार बनाया गया। ये बच्चे 6 से 17 वर्ष के आयु वर्ग के थे। इस रिपोर्ट में कई भुक्तभोगी बच्चों की आपबीती उन्हीं के शब्दों में उद्धृत की गयी है। हैती की एक 15 वर्षीय उत्पीड़ित लड़की का बयान यूं है-- "एक दिन मैं अपनी कुछ सहेलियों के साथ एक रिश्तेदार से मिलने जा रही थी। रास्ते में शांति सैनिकों ने मुझे और मेरी सहेलियों को जबरन अगवा कर लिया और फिर सबके साथ बलात्कार किया गया। कुछ लड़कियों को समलैंगिक आचरण के लिए भी मजबूर किया गया। उन लोगों ने मोबाइल फोन के कैमरे से अश्लील फिल्म बनायी और इसके लिए कुछ लड़कियों को पैसे भी दिये।"
अब ज़रा ये स‌ोचें कि क्या वर्दी की ताकत आज़माकर जिन जगहों पर बच्चों-लड़कियों का शोषण किया गया/जा रहा है, वहां आतंकवादी पैदा नहीं होंगे। जिनके स‌ाथ ज़्यादती हुई, वे तो मौका मिलते ही बंदूक उठायेंगे। फिर क्या यह नहीं मालूम कि युद्ध के दौरान स‌ैनिक कार्रवाई में निर्दोषों के मानवाधिकार का क्या हश्र होता है? स‌भी को पता है। अगर भारत-पाकिस्तान में भी युद्ध होगा, तो शोषण और दमन की लंबी दास्तां लिखी जायेगी, जिससे अंततः चरमपंथ ही फले-फूलेगा। आज भारत को आतंक का मुकाबला करना है, तो स‌बसे पहले उसे स‌ामाजिक-राजनैतिक स्तर पर व्याप्त अनियमितता को स‌माप्त करना होगा। कई स‌ारी रपटें आयीं हैं, भारत में अल्पसंख्यकों को लेकर। उन्हें अमल में लाइये। देश के अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेकर की गयी कूटनीतिक कार्रवाई का जब जमीनी स्तर पर स‌मर्थन मिलेगा, तभी पूरी तरह स‌े किसी भी कार्रवाई की स‌ंपूर्ण स‌फलता स‌ुनिश्र्चित हो पायेगी।

Friday, December 5, 2008



मैं तो बहुत छोटा हूँ...मैं इस पर क्या लिखूं....,
हाँ मगर सोचता हूँ...मैं तुझे नगमा-ख्वा लिखूं....!!
एक चिंगारी तो मेरे शब्दों के पल्ले पड़ती नहीं...
जलते हुए सूरज को मैं फिर क्या लिखूं.....??
इक महीन सी उदासी दिल के भीतर है तिरी हुई...
नहीं जानता कि इस उदासी का सबब क्या लिखूं...!!
सुबह को देखे हुए शाम तलक मुरझाये हुए देखे..
सदाबहार काँटों की बाबत लिखूं तो क्या लिखूं...??
चाँद ने अक्सर आकर मेरी पलकों को छुआ है..
इस छुवन के अहसास को आख़िर क्या लिखूं...??
कुछ लिखूं तो मुश्किल ना लिखूं तो और मुश्किल
ना लिखूं तो क्या करूँ,अब लिखूं तो क्या लिखूं,
अजीब सी गफलत में रहने लगा हूँ मैं "गाफिल"
तमाम आदमियत के दर्द को आख़िर क्या लिखूं...??

एक प्रजाति, लज्जाविहीन

राकेश कुमार
जी हां, नेताजी कहते हैं। सारी जनता सुनती है और देखती है आतंकवादी विस्फोट में अपनों का बहता खून। क्या कहना! लगता है यह एक धारावाहिक है। सोप ओपेरा। या कह सकते हैं कि एक तरह की सिरीज चल रही है, जैसे क्रिकेट की िसरीज चलती है, उसी प्रकार। हर साल खेल होना है। खेल होता है। और फिर ... कहते हैं...सुनते हैं और देखते हैं का सिलसिला चल पड़ता है।
इन नेताओं की खाल इतनी मोटी हो गयी है कि अब किसी चीज का असर नहीं होता है। उनके अंदर की आत्मा सिर्फ पद और पैसे के लिए जगी रहती है। उसमें व्यक्ति, समाज, राज्य और देश के प्रति कोई लगाव नहीं रह गया है। ये किसी को भी बेच सकते हैं। इन्हें पता ही नहीं चलता की वे क्या बेच रहे हैं। इसी होड़ में यह लगी हुई है यह प्रजाति। जी हां, यह एक किस्म की प्रजाति ही है, जो दिखने में मानव जैसी है, पर व्यवहार में उससे कोसों दूर। आइए जानते हैं कि इस प्रजाति का जन्म कैसे हुआ या हो रहा है।
एक व्यक्ति है। एक बार वह गलती से चुनाव जीत जाता है। नेता बन जाता है। ऐसे ही गठजोड़ की राजनीति में वह मंत्री भी बन जाता है। अब उसके पास बहुत सारी जवाबदेहियां आ जाती हैं। अब जवाबदेही को बचाने के लिए उनको सुरक्षा की जरूरत पड़ती है। और उनके आगे पीछे सुरक्षाकर्मियों की तैनाती हो जाती है। अब वही व्यक्ति आम जनता नहीं रह जाता है। यहां से उसके गुणों में अंतर आना शुरू हो जाता है। अब वह आदमी-आदमी में अंतर करने लगता है। और इस तरह एक नयी प्रजाति का विकास होता है। अब वह अपनी मानव जाति को भूल जाता है।
पहले ऐसी कोई प्रजाति नहीं होती थी। ऐसा माना जाता है कि इनका विकास मानव जाति के एक खास वर्ग के खास कार्य में सफलता को देखते हुए, समय के साथ हुआ है। इस प्रजाति के विकास में लगभग 40-50 वर्षों का समय लगा है। अपने विकास के आरंभिक काल में यह प्रजाति काम करने के प्रति सजग रहती थी। समाज में काम भी होता था। उनमें मानव जाति के अधिकांश गुण मिलते थे। हृदय के धनी और दिमाग के तेज, कर्तव्यपरायण, सजग, कुछ करने की चाहत और देश के प्रति सच्ची भावना। आज भारत में यह सत्तालोलुप, भ्रष्ट, कपटी प्रजाति बहुसंख्य है। ऐसा कहा जाता है कि इसका उदय भारत से ही हुआ होगा, क्योंकि ऐसे लक्षण वाले मानव जाति का वर्णन इतिहास में कभी-कभार मिलता है। देश को गुलाम कराने में इस तरह की प्रजाति का बड़ा योगदान माना गया है। मीर जाफर और जयचंद आज भी इस प्रजाति के आदर्श हैं। कुछ वर्षो बाद, विकासकाल में इनके गुणों में भारी बदलाव आने लगा। आज उपलब्ध प्रजाति के गुणों का पदापर्ण तेजी से हुआ। स्वार्थ की भावना प्रबल होती गयी। आपसी विश्वास क्षीण होने लगा। िदखावटी कार्य करने की चाहत बढ़ती गयी। जबरदस्ती लोकप्रियता पाना इनका प्रमुख कार्य बनता गया। इन पर समस्याओं का प्रभाव कम होता गया। इनकी खाल मोटी होती गयी। बिना काम किये पैसा कमा लेना, इनका मुख्य लक्षण है, इसी काल में दिखाई पडता है। देश के प्रति समपर्ण की सच्ची भावना का ह्रास इसका एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है।
आज के इस मीडिया युग में यह प्रजाति पूरी तरह से निखर गयी है। अब यह हर जगह दिखाई पड़ जाती है। इनके गुणों में व्यापक वृद्धि हुई है। इनकी संख्या भी तेजी से बढ़ती जा रही है। टीवी चैनलों में अपना प्रभाव बराबर दिखाते रहना, इनके पुराने गुण का नवीन संस्करण है। इनमें लोगों को सुनने की क्षमता का ह्रास तेजी से हुआ है। स्वार्थपरायणता का विकास इतनी तेजी से हुआ है कि आज इनका स्वरूप अपने प्रचीन रूप से बिलकुल अलग दिखाई पड़ता है। कभी रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा था, ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी, ये सब तारण के अधिकारी। आज के संदर्भ में नारी को छोड़ दिया जाये, तो बाकी सारे गुण इनमें पाये जाते हैं। शायद तुलसीदास ने भी नहीं सोचा होगा कि मानव के ज्ञान के लिए लिखा गया यह दोहा, किसी एक प्रजाति के गुणों को दर्शाने का काम करेगा।
इसके विकास के कारणों में एक प्रमुख कारण मानव द्वारा इनके कार्यों, व्यवहारों को स्वीकारना, बढ़ावा देना भी है। कालांतर में हुई यह प्रजाति आज मानवता की दुश्मन दिखाई पड़ती है। मनुष्य के विकास में अब ये बाधक की भूमिका निभा रहे हैं। इसलिए जितनी जल्दी हो, इनसे निजात पाने के लिए मनुष्य को कोई न कोई कठोर निर्णय लेकर अमल करने की आवश्यकता है, अन्यथा यह प्रजाति अपने विकास की अंतिम दहलीज को पार कर जायेगी और मानव का अस्तित्व संकट में आ जायेगा।
(लेखक दैनिक प्रभात खबर में कार्यरत हैं)

Thursday, December 4, 2008

सवाल बड़ा दर्दनाक है....!!

सवाल बड़ा दर्दनाक है......!!
एक भाई ने मेरे वृद्ध माँ-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ने पर बहस की बात उठायी है...........मेरी समझ से बहस तो क्या हो अलबत्ता मैं ये जानने की चेष्टा अवश्य करना चाहता हूँ कि हमारी जिंदगी में बेशक चाहे जितनी मुश्किलें हों..... हमारी बीवी चाहे जैसी हो....हमारे माँ-बाप चाहे जितने गुस्सैल...सनकी...या किन्हीं और अवगुणों (हमारे अनुसार) से भरे हों....(बस व्यभिचारी ना हों...!!) मगर क्या हमें उन्हें छोड़ देना चाहिए....??क्या उन्हें वृद्धाश्रम या किसी और जगह पर फेंक देना चाहिए....??क्या किसी भी परिस्थिति या समस्या की बिना पर हमें उनसे नाता तोड़ना जायज है...??...........भारत के सन्दर्भ में ये प्रश्न बड़ा संवेदनशील...और मर्मान्तक प्रश्न है.....यहाँ मैं यह अवश्य जोड़ना चाहूँगा कि स्थिति गंभीर भी हो तो क्या उनके लालन-पालन का जिम्मा बच्चों (बड़े हो चुके) पर नहीं है....?? अगर बर्तन बजते हों....और उन्हें अलग रखना भी आमदनी के लिहाज़ से असंभव प्राय हो....तब क्या अपने ही जनक-जननी को त्याज्य देना समीचीन है.....??......आज इन सवालों के जवाब मैं आप सबों से चोटी-चोटी टिप्पिनियों के माध्यम से माँगता हूँ....आशा है आप आपनी निष्कपट और इमानदार राय यहाँ पोस्ट करेंगे....चाहे वो किसी के भी पक्ष या ख़िलाफ़ क्यूँ ना हो.....इस बहाने जनमानस के मन की पहचान भी हो जायेगी...... आपके उत्तरों के लिए बेकल मैं............भूतनाथ...........आप सबको यहाँ सादर आमंत्रित करता हूँ....अभी इसी वक्त से...!!

Wednesday, December 3, 2008

भेज दो बूढे माँ-बाप को वृद्धाश्रम में.....!!


आजकल के बच्चे....!!क्या करें इन पर दबाव ही कित्ता सारा है....??कित्ता बोझ है...अपने एकाध बच्चों की परवरिश का...और मुई महंगाई ये भी तो पीछा कहाँ छोड़ती है...इसलिए बच्चे माँ-बाप को ही छोड़ देते हैं....बिचारे आज कल के बच्चे....और ये माँ-बाप....कित्ते तो तंगदिल हैं...कि जिन्हें वर्षों प्यार से पाला-पोसा है...उन्हें ही धिक्कारते हैं....छी-छी-छी ये कैसे माँ-बाप हैं जो अपने ही बच्चों की मजबूरी नहीं समझते.....!!.......इसलिए हे आजकल के बिचारे बच्चों कल का इंतज़ार मत करो....कल करते हो सो आज ही करो....ऐसे मनहूस और गैर-संवेदनशील माँ-बापों को घर बाहर करो....ये गुजरा हुआ कल हैं....ऐसे भी इन्हे मरना है...और वैसे भी...इनकी खातिर तुम अपने बच्चों की इच्छाओं का गला क्यूँ घोंटते हो...अरे आने वाले कल का भविष्य तो उज्जवल करो...माँ-बाप तो यूँ ही हैं....उन्होंने अपने बाल-बच्चों के प्रति अपना कर्तव्य पूरा किया...अब तुम भी तो वो ही करोगे ना... भाड़ में जाएँ माँ-बाप...इनकी बला से क्या तुमने उनके बुढापे का ठेका ले रखा है..?? जाओ एश-मौज करो...और बच्चों को वही सिखाओ... अलबत्ता ये जरूर है....कि चाँद सालों बाद ही इतिहास स्वयम को दुहरायेगा....और तुम्हारे साथ भी वही.....!!!!!!

नेता िरलीफ फंड


सौरभ
हमारे देश के नेताओं में नैितकता कूट-कूट कर भरी हुई है। एेसा नहीं लगता अापको। अपने गृह मंॊी िशवराज पािटल, महाराष्टऱ के गृह मंॊी अार अार पािटल और मुख्यमंॊी िवलासराव देशमुख के उदाहरण देख कर भी अापको यकीन नहीं हो रहा। मुंबई पर हुए अातंकी हमलो से ये इतने अाहत हुए िक नैितक िजम्मेदारी लेते हुए इन लोगों ने अपने पद से इस्तीफा दे िदया। सवाल है नैितकता का तो इन लोगों ने तो अपना धमॆ िनभा िदया। पर भाई मेरे राजनीित का भी तो कुछ तकाजा होता है। अब इनके घरवाले क्या खाएंगे। ये तो बेरोजगार हो गए न। हमें इनके िलए कुछ सोचना चािहए। चिलए एक एेसा फंड बनाएं िजसका नेक उद्देश्य एेसे नैितक नेताओं के बेरोजगार हो जाने के बाद पेंशन देने के काम अाए। इसका नाम हो सकता है नेता िरलीफ फंड या एेसा ही कुछ। अाप भी कुछ नाम सजेस्ट कर सकते हैं। इस फंड में वैसे ही दान स्वीकार िकए जाएंगे जो नैितक तरीके से कमाए न गए हों। घूस की अिधक रािश, इनकम टैक्स की चोरी से बचाया गया धन, सिवॆस टैक्स और तमाम पऱकार के टैक्स की चोरी से बचाए धन इसमें जमा कराए जा सकते हैं। यहां यह बताना जरूरी है िक यिद यह धन नैितक तरीके से कमाया गया होगा तो इन्हें हज्म ही नहीं होगा न। हमें इनकी सेहत का ध्यान भी तो रखना है। एेसा न हो िक हम पैसे तो दे दें, पर सारा पैसा पेट खराब होने की गोली खरीदने में ही बबाॆद हो जाए। भले ही ये नेता हमारा ध्यान न रखते हों, पर हमें तो इनका पूरा ध्यान रखना है न। देिखए न हमारे स्टेशन, हमारे बाजार और हमारी सड़कें िकतनी भी असुरिक्षत हों, पर हमारे नेताओं को तो पूरी सुरक्शा चािहए। भई चािहए क्यों नहीं, ये देश को चलाते हैं, हमारे पैसे को सही जगह इन्वेस्ट करते हैं,िवकास करते हैं। इन्हें सुरक्षा नहीं िमलेगी तो क्या िरक्शा चलानेवाले को िमलेगी। वह अहमक क्या देश चलाता है। इसी िलए तो हमारे अाधे से ज्यादा ब्लैक कैट कमांडो इनकी ही सुरक्षा में लगे रहते है।
मेरे िवचार से एक फंड एेसा भी बनना चािहए िजसमें एेसे लोगों को धन देने के िलए व्यवस्था हो जो धमाकों, बाढ़, भूकंप और इसी तरह की दूसरी अापित्तयों में राहत के तौर पर घोषणा करते हैं। इसकी सबसे ज्यादा जरूरत गुजरात के मुख्यमंॊी नरेंदऱ मोदी को हो सकती है। एेसे मौकों पर सबसे बड़ी घोषणा वही करते हैं। अपने लालू जी को भी इस फंड से फायदा हो जाता है। पऱधानमंॊी जी के राहत कोष की िडमांड अब काफी कम हो गई है। इसका ठेका भी िभन्न िभन्न संस्थाओं ने ले िलया है। एेसे में हम भी एक कोष का गठन कर सकते हैं। इसका नाम घोषणा फंड रखा जा सकता है। ये नाम िसफॆ पऱस्तािवत हैं। लेिकन लोगों से गुजािरश है िक इस फंड में पसीने की कमाई का ही पैसा डालें। क्योंिक पता नहीं कब यह हमारे पिरवावर वालों को िमले। जब भी िमले तो कम से कम यह एहसास तो हो िक इसमें बेईमानी नहीं िमली हुई।

Tuesday, December 2, 2008

दो दिनों पूर्व....इस माहौल पर.....!!


ये विकृत चेहरा किसका है.....??
खून से सना...खून पीता....खून भरा....!!
सबको खौफ दिलाता...,
ये भयानक चेहरा किसका है....??
आंखों में क्रूरता...भावों में दहशत...!!
हाथों में ग्रेनेड.....बम....बन्दूक.....!!.
ये दहशत-गर्द चेहरा किसका है....??
सड़कों पे बिछाता खून......,
किसी को बेवा..किसी को लावारिश...
और किसी को बनाता मरहूम.....!
सबको करता असहाय...
ये कहर बरपाता चेहरा किसका है....??
देता है ये अपनी कैफियत....
कि ये उनका जेहाद है....!!
उनपर हुए इतने ज़ुल्म.....
इन्होने सहे इतने अत्याचार...
अब उसको हम लौटायेंगे....,
हम हर मासूम का खून....
सरेआम सड़कों पे बहायेंगे....!!
ये धूल भरा चेहरा किसका है....??
कहतें हैं हमसे बात करो...
हमारी मांगों पर कान धरो....!!
वरना किसी को नहीं छोडेंगे....!!
सिखलाते हैं सबको कि....
जिनपर हुए ज़ुल्म.....
वो बन्दूक उठा ले...
मानवता का खून कर दें....
बमों से गलबहियां...
और ह्त्या से दोस्ती करता
ये खूंखार चेहरा किसका है....??
मैं सोचता हूँ अक्सर...
हर किसी पर तो कितने ज़ुल्म हुए...!!
कितने सबने गम सहे...
कोई ब्राहमण किसी दलित पर....
कोई क्षत्रिय किसी अन्य पर....
बीते ज़माने में क्या-क्या नहीं बीता....
आओ अब सबको याद करें....
कन्धों पर बन्दूक उठाकर...
हाथों में बम..ग्रेनेड..हथियार...
चलो इंसानियत को नाच नचायें...
आओ हम सब ...........
अब जेहादी बन जाएँ.....!!??