Thursday, February 26, 2009

धारावी से लॉस एंजिल्स तक


मोनिका गुप्ता

स्लमडॉग मिलिनेयर को ऑस्कर क्या मिला प्रतिक्रिया करने वालों के सुर ही बदल गये। जब फिल्म प्रदर्शित की गयी तो फिल्म स्टार से लेकर, समाज सुधारकों, एनजीओ समेत कई लोगों ने फिल्म की यह कहकर आलोचना की कि फिल्म में भारत की गरीबी को बेचा गया है। आगरा के एक एनजीओ ने फिल्म में ताजमहल में चोरी होते हुए जूते चप्पलों को दिखाये जाने पर विरोध प्रकट किया तो फिल्म स्टार अभिताभ बच्चन ने कहा कि इस फिल्म में भारत की गरीबी को बेचा गया है। लेकिन आठ ऑस्कर मिलने के बाद तो तारीफों की झड़ी लग गयी। अब लोग डैनी बॉयल की फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर को हाथों हाथ ले रहे है। इस बात में कोई शक नहीं कि इस फिल्म में शहरी झुग्गी झोपड़ियों की असलियत सामने आयी है। निःसंदेह इस फिल्म को भारत के अलावा दुनिया के किसी भी देश में फिल्माया जा सकता था। इस फिल्म के लिए भारत से भी अच्छी जगह शायद अफ्रीका हो सकती थी क्योंकि झुग्गी झोपड़ियों के मामले में भारत से ज्यादा धनी अफ्रीका है। वैसे इस दुनिया में जहां विश्व आबादी की एक अरब जनसंख्या झुग्गी झोपड़ियों में जीवन बसर कर रही हो वहां गरीबी ढूंढना कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन डैनी बॉयल ने भारत को ही चुना तो इस मायने में हमें फिल्म निर्देशक का शुक्रगुजार होना चाहिए। इसके द्वारा अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की जो ब्रांडिग हुई वह बिल्कुल उसी तरह है जिस तरह मंदी से जूझ रहे अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा की ब्रांडिंग की गयी। साथ ही गुलजार, एआर रहमान और रसूल पोकुट्टी का ऑस्कर तक पहुंचना भी भारत के लिए गौरव की बात है। ऐसा नहीं है कि स्लमडॉग मिलिनेयर से पहले इन तीनों ने इससे अच्छा संगीत नहीं दिया। लेकिन भारत के इन कलाकारों का ऑस्कर तक पहुंचना भी इसी फिल्म के कारण ही हो पाया है। फिल्म के द्वारा इन कलाकारों ने यह साबित कर दिया है कि संगीत में तकनीक का इस्तेमाल हॉलीवुड की बपौती नहीं। इस मामले में भारतीय कलाकार भी पीछे नहीं। ऐसा नहीं है कि अब से पहले भारतीय फिल्में ऑस्कर के नामांकित नहीं हुई। सारांश, लगान, रंग दे बसंती, तारे जमीं पर आदि फिल्में भी बनीं जिसकी पटकथा, निर्देशन, संगीत आदि बेजोड़ थी। लेकिन इन सबके साथ एक दुर्भाग्य शायद यह रहा कि ये सभी फिल्में हिन्दी भाषा में थी। इस बार कहानी भारत की थी, लेकिन भाषा अंग्रेजी थी जो ज्यूरी मेम्बर का ध्यान आकर्षित कर पायी और गाड़ी पटरी पर आ गयी। इस फिल्म में अभिनय करने वाले स्लम में रहने वाले दो बच्चों को देखें तो इस फिल्म के कारण मिलने वाली उपलब्धियां साफ नजर आएंगी। रूबीना (लतिका) और अजहरुद्दीन (जमाल) के एक कमरे और एक जोड़े कपड़े में जीवन बिताने से लेकर लॉस एंजिल्स के कोडक थियेटर में गाउन और सूट बूट पहनकर रेड कॉरपेट में चलना और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना उपलब्धि के सिवा और कुछ नहीं। अगर इनका धारावी से लॉस एंजिल्स तक जाना संभव हुआ तो माध्यम डैनी बॉयल ही है। वैसे भारत में उगते सूरज की ओर देखने की प्रथा बड़ी पुरानी है सो लोग इस प्रथा का निर्वाह करने से चूकते नहीं। इस बात में कोई दो मत नहीं कि इस फिल्म के लिए ऑस्कर सम्मान भी कम है।

Tuesday, February 24, 2009

ख्वाब को ख्वाब ही बना रहने दो....

ख्वाब को ख्वाब ही बना रहने दो.....
ख्वाब कोई आग ना बन जाए कहीं !!
आग के जलते ही तुम बुझा दो इसे
सब कुछ ही ख़ाक ना हो जाए कहीं !!
अपने मन को कहीं संभाल कर रख
तेरे दामन में दाग ना हो जाए कहीं !!
तेरी जानिब इसलिए मैं नहीं आता !!
मेरी नज़रें तुझमें ही खो जाए ना कहीं !!
खामोशी से इक ग़ज़ल कह गया"गाफिल"
इसके मतलब कुछ और हो जाए ना कहीं !!

ब्लॉगर स‌म्मेलन की खबरों का लेखा-जोखा

22 को हुए ब्लॉगर मीट में तो हम लोगों ने खूब मस्ती की, लेकिन इसकी यादों को स‌ंजो कर रखने की जिम्मेदारी में ज़रा स‌ुस्त हैं हम स‌भी। अभी मैं लोगों के ब्लॉग देख रहा था, तो कुल मिलाकर तीन चार ही ब्लॉग ऎसे दिखे, जिन्होंने स‌म्मेलन की यादें डाल रखी हैं। आप लोगों के ज़ेरे-नज़र पेश कर रहा हूं कि कहां क्या है। अगर आपको कोई जानकारी हो, तो कृपया मेरे पास लिंक भेज दें कि किस ब्लॉगर बंधु ने कहां पर खबर डाली है या तस्वीर डाली है। एक नज़र यहां डालें...
लवली जी ने स‌ंचिका में कुछ टिप्पणी की है
रंजना जी ने अपने ब्लॉग स‌ंवेदना स‌ंसार में स‌ंस्मरण लिखा है
संगीता पुरी जी ने भी खबर पोस्ट की है
स‌ंजीव शेखर जी की गुड़मॉर्निंग झारखंड में खबर है
पारुल जी की चांद पुखराज में मीट की तसवीरें हैं
धरोहर में अभिषेक जी ने पुरानी खबर डाल रखी है
झारखंडी घनश्याम में भी कोई नयी खबर नहीं है
शिवकुमार मिश्रा जी ने तो पूरा स‌ाहित्य ही रच डाला है
मनोरमा-सुमन में कोई नई पोस्ट नहीं है
मनीष जी ने एक शाम मेरे नाम में बहुत ही विस्तार स‌े रिपोर्ट दी है, चित्रों के स‌ाथ
मनीष जी की मुसाफिर हूं यारों में पोस्ट नहींहै
प्रभात जी के गपशप के कोने में भी मीट का एक कोना है

Monday, February 23, 2009

क्या कहें क्या पता !!

क्या कहें क्या पता !!
कैसी ये आरजू ,क्या कहें क्या पता !
तेरे इश्क में हम, हो गए लापता !!
चलते-चलते मेरी, गुम हुई मंजिलें
जायेंगे अब कहाँ,क्या कहें क्या पता !!
तेरे गम से मेरी,आँख नम हो गयीं
कितने आंसू गिरे,क्या कहें क्या पता !!
सुबो से शाम तक,ख़ुद को ढोता हूँ मैं
जान जानी है कब,क्या कहें क्या पता !!
नज्र कर दी तुझे,जिन्दगी भी ये मेरी
करना है तुझको क्या,क्या कहें क्या पता !!
उफ़ मैं भी "गाफिल"हूँ हाय बड़ा बावला
ढूंढता हूँ मैं किसे,क्या कहें क्या पता !!

Sunday, February 22, 2009

एक दिन ब्लोगरों का.........!!

दिनांक २२-०२-२००९,स्थान-कश्यप आई मेमोरियल हॉस्पिटल सभागार,रांची (झारखंड)डाक्टर भारती कश्यप,श्री शैलेश भारतवासी,श्री घनश्याम श्रीवास्तव,श्री मनीष कुमार...........तथा अन्य लोगों के सहयोग से पूर्वी क्षेत्र के ब्लोगरों (यानि चिट्ठाकारों)का जमावडा यानि सम्मलेन एक बेहद अनौपचारिक माहौल में हँसी-खुशी भरे होलियाना अंदाज़ में अभी थोडी ही देर पहले संपन्न हुआ....!!स्थानीय पत्र रांची एक्सप्रेस के संपादक श्री बलबीर दत्त जी,दैनिक आज के संपादक श्री दिलीप जी ,स्वयं डॉ. भारती जी ब्लोगिंग की बाबत अपने विचारों से सभी को अवगत कराया.शैलेश जी एवं मनीष जी ब्लोगिंग के तकनीकी पक्षों और इसके सकारात्मक पक्षों पर प्रकाश डाला तथा ब्लोगरों को अनेकानेक चीज़ों की जानकारी प्रदान की.
इस जमावडे में संगीता पुरी(बोकारो)गत्यात्मक ज्योतिषी वाली,पारुल जी (चाँद पुखराज का तथा सरगम),रंजना सिंह,टाटा(संवेदना संसार)शिव कुमार मिश्रा,कोलकाता(शिवकुमार मिश्रा और ज्ञानदत्त पांडे का ब्लॉग)श्यामल सुमन (मनोरमा)शैलेश भारतवासी(हिन्दी युग्म)दिल्ली,मनीष कुमार(एक शाम मेरे नाम और मुसाफिर हूँ यारों),प्रभात गोपाल झा,अंकुर सिंह,पवन कुमार,कामेश्वर कुमार श्रीवास्तव,अनिल चक्रवर्ती,अमिताभ (किससे कहें),अभिषेक मिश्रा(धरोहर)अश्विनी जी,संजीव शेखर(गुडमोर्निंग झारखड),नीरज पाठक,नदीम अख्तर(रांची हल्ला), मोनिका गुप्ता (रांचीहल्ला), भूतनाथ, नहीं भाई राजीव थेपडा(बात पुरानी हैएवं रांची हल्ला),आनंद कुमार,सुनील चौधरी(दहलीज,रांची हल्ला),विनय चतुर्वेदी(संघतिया),प्रभाकर अग्रवाल,कौशल आनंद ,विजय पाठक,नरेन्द्र नाथ (आई नेक्स्ट),प्रवीर पीटर,शुभाद्र अखौरी,सीमा कुमारी,सुधा कुमारी,विनय कृष्ण,रंजित कुमार,शकर कुमार,मोहम्मद मुद्दसर नज़र,वरुण सिन्हा,दिवाकर शाहदेव.शांतनु सेन,एस.के.बरियार,लालन कुमार सिंह,अरुण महतो,कुमुद रंजन,उमेश कुमार,संजय पांडे,सुधीर कुमार आदि लोगों ने हिस्सा लिया.
इस कार्यक्रम की ख़ास बात यह रही कि ब्लोगिंग को अभी इस देश में उपयुक्त सम्मान न मिलने और इसके प्रति लोगों के संजीदा ना होने के बावजूद अभी इसकी महज शुरुआत बताते हुए लगभग सभी वक्ताओं ने यह मुखर रूप से कहा कि पहले अखबार,फिर इलेक्ट्रिक मीडिया,फिर टेलीविज़न,फिर इंटरनेट और अब ब्लोगिंग को आने वाले समय की मुख्यधारा बताया जा रहा है.समय के साथ यही मीडिया का विकास है.यहाँ आए तकरीबन सभी ब्लोगरों ने ब्लोगिंग पर अपने विचार बांटे.नेट ब्लोगिंग अनजान लोगों का आपस में मिलना-जुलना हुआ......और एक-दूसरे को यह बताते हुए कि अरे हमने तो सोचा था कि आप ऐसे हो....मगर आप तो ऐसे निकले....!!इस रोमांचक माहौल में सबने अपने अनुभव तो बांटे ही,साथ ही एक दूसरे के दोस्त भी बने.....पारुल जी और श्यामल सखा सुमन ने अपने गीतों और गज़लों से सबको भाव विभोर भी किया....
कुल मिला कर यूँ कि इस क्षेत्र में हुए इस अनौपचारिक से सम्मलेन में इस तरह सबका मिलना-जुलना आने वाले वर्षों में ब्लोगरों की होने वाली अहमियत का आभास करा गया....ब्लोगिंग बेशक कोई आन्दोलन नहीं किंतु वैचारिक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म अवश्य बन सकता है....और अब ब्लोगिंग निजी डायरी से ऊपर उठकर एक वैचारिक रूप ले भी रहा है....और देखा-देखी और भी लोग इसके प्रति संजीदा हो रहे है....ऐसे उत्सुक लोगों ने भी इस सम्मलेन में शिरकत की और अपने प्रश्न वक्ताओं के सम्मुख रखे....इस छोटे से किंतु अहम् कार्यक्रम से यह विश्वास पुख्ता हुआ कि आने वाले दिनों में ब्लोगर भी किसी बदलाव का वाहक बनने वाले हैं.....!!

Saturday, February 21, 2009

ब्लॉगर स‌म्मेलन की तैयारी पूरी

रांची में 22 फरवरी (रविवार) को होने वाले ब्लॉगर्स स‌म्मेलन की तैयारी पूरी हो चुकी है। इस कार्यक्रम का आयोजन कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, पुरुलिया रोड, राँची में दिन के 11 बजे दो बजे तक होगा। हॉस्पिटल की स‌ीईओ और रांचीहल्ला की स‌दस्य डॉ भारती कश्यप ने बताया कि उनकी ओर स‌े तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं, अब इंतज़ार है ब्लॉगर्स है। स‌म्मेलन में रांची के कई नामचीन पत्रकार भी जुटेंगे। उल्लेखनीय है कि यह आयोजन हिन्दी युगम वाले भाई ाहब शैलेश भारतवासी के प्रयास होने जा रहा है। इसके लिए ब्लॉगरों को पहले ही आमंत्रित किया जा चुका है। जो ब्लॉगर्स आने में असमर्थ हैं, उनमें स‌े कई ने लिखित स‌ंदेश भी भेजवाया है, जिसे कल स‌म्मेलन में पढ़ा जायेगा। स‌म्मेलन में करीब एक स‌ौ ब्लॉगर्स के जुटने की स‌ंभावना है। उम्मीद है कि इस म्मेलन में रांची प्रकाशित होनेवाले अखबारों के सम्मानित ंपादकगण भी शिरकत करेंगे।

Friday, February 20, 2009

मेरे शहर का एक आदमी............!!

मेरे शहर का एक आदमी.............!!
..........कब,क्या,क्यूँ,कैसे.........और किस परिणाम की प्राप्ति के लिए होता है......ये किसी को भी नहीं पता.......!!हर कदम पर कईयों भविष्यवक्ता मिलते हैं.....लेकिन अगर आदमी भविष्य को पढ़ ही पाता....तो दुनिया बेरंग ही हो जाती.....!!अभी-अभी हम घर से कहीं जा रहे हों.........और अचानक कहीं किसी भी वक्त हमारे जीवन के सफर का अंत ही हो जाए....!!अभी-अभी हम जिससे मिलकर आ रहे हों........घर पहुँचते ही सूचना मिले कि वो शख्स अभी दस मिनट पहले दुनिया से कूच कर गया........!!हमें कैसा लगे....??हमारे मर जाने की सूचना पर किसी और को कैसा लगे....??
जीवन कैसा है.....जीवन कितना है....जीवक कब तक है....ऐसे प्रश्न तो सबके ही मन में पता नहीं कितनी ही बार उमड़ -घुमड़ करते ही रहते हैं.........मगर जवाब....वो तो सबके ही लिए हर बार ही नदारद होता है.....जीवन को ना जाने कितनी ही उपमाओं से लादा गया है.........मगर इसकी गहराई की थाह भला कौन नाप पाया.........??चलते-फिरते अचानक ही हम पाते हैं की फलां तो चला गया....!!.......हमारे मन में भला कहाँ आता है कि हम ही चले गए.....मौत का स्वाद किसी को भी अच्छा नहीं लगता.........और मौत का रंग...सबको बदरंग.....और हम पाते हैं मगर कि हर और मौत का आँचल लहरा रहा है....हर तरफ़ मौत का खौफ तारी है....!!
.............हर जगह जनसामान्य लोगों के बीच बहुत सारे अलग किस्म के लोग भी होते हैं.....जो समाज की धुंध में......वातावरण के सन्नाटे में कुछ रचते ही रहते हैं.... अपनी ताकत भर कुछ ना कुछ बुनते ही रहते हैं....बेशक समाज उस रचना को बहुत महत्व नहीं देता.....मगर किसी के महत्त्व ना देने भर से अगरचे चीज़ें खारिज हो जाया करती तो,,, मरे हुए लोग सदा-सदा के लिए भूला ही जाते...मगर समय इतना अन्यायी कभी होता कि सबको यूँ ही खारिज कर दे....!!
..........और खारिज किया भी नहीं जाना चाहिए......!!..........रांची जैसे शहर में आज से कोई बीस वर्ष पूर्व एक नाटक का प्रदर्शन हुआ था........"अमली" नाम था उसका.....और इस नाटक के प्रदर्शन के साथ ही रांची के रंगमंच ने जिस शख्स को सही तरीके पहचाना.........उसका नाम था "अशोक कुमार अंचल.....".........बेशक ये नाम नाट्य -जगत में पहले भी सुना जा चुका था.........और पहले ही स्वयम के द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक "पागल-खाना" से सु-विख्यात और सु-चर्चित था..........और उनके पागलखाना ने ढेरों पुरस्कार आदि भी बटोरे.........और प्रशंसित भी हुआ.......और अनेकानेक बार मंचित भी.......और सही मायनों में पागलखाना आज के परिवेश की वीभत्स सच्चाईयों को....और क्रूरताओं को बड़ी गहराई से अभिव्यक्त करता था.......अगर यही नाटक दिल्ली या मुम्बई के किसी निर्देशक ने मंचित करवाया होता तो पता नहीं उसे कहाँ-कहाँ और कितने और कितने ऊँचे बैनर के पुरस्कार मिले होते.....मगर चूँकि रांची मुंबई या दिल्ली तो नहीं........सो इस पर चर्चा बेमानी ही है ना.......!!
..........फुल लेंथ प्ले के रूप में अंचल जी का "अमली" नाटक बहुचर्चित और बहुप्रशंसित रहा.........हाँ मगर उसके अनेकानेक मंचन ना हो पाये........मगर उसने रांची के रंगमच पर उस वक्त गहरी छाप छोड़ी.........और उसके लोक गीत अक्सर रांची के कलाकारों के द्वारा गुनगुनाये जाते रहे..........मुझे याद है कि मैं तब रोज रांची के महावीर चौक में अवस्थित संस्कृति विहार में बिला नागा रिहर्सल देखने जाया करता था.........उन दिनों मैं ख़ुद नाटकों का दीवाना था.......और सच कहूँ तो उस उम्र में यानि १८ वर्ष में पचासों नाटक के मंचन बतौर अभिनेता कर चुका था....तो भला अंचल जी से भला दूर कैसे हुआ होता......उनसे हँसी-मजाक और भी ना जाने कितनी ही बातें.......अब तक भी याद हैं......!!
.........और बाद में उनका एक और रूप उभर कर सामने आया उनका कवि....शायर........गीतकार........और तरन्नुम में ग़ज़ल गाने वाला गायक भी होने का........और आज मुझे यह सोचकर आनंद भी हो रहा है........और कातर भी हो रहा हूँ कि........कम-अज-कम मैं उनके साथ पचास से ज्यादा कवि गोष्ठियों में शामिल रहा होऊंगा....और उनकी तमाम रचनाओं का जवाब मैंने अपनी आशुकविता के रूप में उसी वक्त दे दिया करता था.........पहले तो ख़ुद गद-गद हो जाया करते थे....और फिर उनकी प्रंशंसा से मैं ख़ुद भी....!! कादम्बिनी क्लब की माहवार गोष्ठियों में वे बिला नागा उपस्थित होते थे....अभी तक यह सब सोचना बहुत ही मामूली था.........मगर आज यही कार्य बड़ा दुष्कर हो रहा है...और बड़ा ही अजीब............अब तक ये हम दोनों की यादें थीं मगर आज से ये यादें सिर्फ़ मेरी ही रह गयीं.....वो यादों से ऊपर ही उठ गए.....हर महीने उन्हें किसी ना किसी कार्यक्रम में शरीक देखना या अखबार में पढ़ना गोया मेरी दैनिक दिनचर्या में शुमार हो गया था.........कादम्बिनी क्लब का बंद होना इसके सारे सदस्यों को जैसे एकदम से विलग ही कर गया....और जिनकी कविताओं के मैं जवाब दिया करता था........सब के सब अपनी-अपनी व्यस्तता में डूब गए....और सबसे ज्यादा तो मैं ख़ुद.....!!
और उनमें से सबसे ज्यादा हँसता,बोलता,गाता...और पान खाता शख्स आज से हम सबके बीच है ही नहीं....यह कहना तो दूर अभी तो यह सोचना भी अजीब लग रहा है.... अशोक कुमार अंचल....जिनके कृतित्व को मापा जाना अभी शेष है....आकाशवाणी.....दूरदर्शन.........टेलीविजन धारावाहिक....और भी ना जाने क्या-क्या...हाँ मगर सबका रूप नितांत देशी ही.....ख़ुद उनकी तरह....!!जब किसी का कृतित्व उसके ख़ुद के व्यक्तित्व या चरित्र से मेल खाता हुआ सा लगे तो समझ लो वो आदमी ज्यादातर इमानदार ही है...अपने प्रति भी अपने परिवेश के प्रति भी.....और बेशक वो ज्यादा कुछ समाज को देता हुआ प्रतीत नहीं होता.....मगर यह नहीं दे पाना भी उसमें एक अवयक्त किस्म की छटपटाहट के रूप में व्यक्त होता ही रहता है........और मैंने यह बात बेशक कहीं ना कहीं अंचल जी में में देखी.......और वही एक देशी किस्म का अल्हड व्यक्ति एक सड़क दुर्घटना में मारा जा चुका है.....यह बात दिल को पच ही नहीं पा रही..........और मजा यह की दिल्ली में बैठे मेरे मित्रों यथा अनुराग(अन्वेषी)....पराग(प्रियदर्शन).....राकेश(प्रियदर्शी).....आदि लोगों को रात ही पता चल गई.....और मुझे सुबह नौ-दस बजे....और तिस पर भी मैं ना तो उनके घर....और ना ही घाट पर जा पाया..........और अब रात को अपने ही घर में उस शख्स की बाबत अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ....और अभी कुछ ही देर में ये विचार नेट पर प्रकाशित हो जाने को हैं....कहीं उन्हें याद करके भी तो मैं एक स्वार्थ भरा कार्य नहीं कर रहा.....??........यदि ऐसा है तो भाई "अंचल" मुझे माफ़ कर देना.........मुझे पता भी नहीं कि मैं किस किस्म का गुनहगार कहा जाऊं.....!!

Thursday, February 19, 2009

हाय समाज.........हाय समाज...............!!

............न पुरूष और न ही स्त्री..............दरअसल ये तो समाज ही नहीं.........पशुओं के संसार में मजबूत के द्वारा कमजोर को खाए जाने की बात तो समझ आती है......मगर आदमी के विवेकशील होने की बात अगर सच है तो तो आदमी के संसार में ये बात हरगिज ना होती.......और अगरचे होती है.....तो इसे समाज की उपमा से विभूषित करना बिल्कुल नाजायज है....!! पहले तो ये जान लिया जाए कि समाज की परिकल्पना क्या है.....इसे आख़िर क्यूँ गडा गया.....इसके मायने क्या हैं....और इक समाज में आदमी होने के मायने भी क्या हैं....!!
........समाज किसी आभाषित वस्तु का नाम नहीं है....अपितु आदमी की जरूरतों के अनुसार उसकी सहूलियतों के लिए बनाई गई एक उम्दा सी सरंचना है....जिसमें हर आदमी को हर दूसरे आदमी के साथ सहयोग करना था....एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करना था.....एक आदमी ये काम करता.....और दूसरा वो काम करता....तीसरा कुछ और....हर आदमी अपने-अपने हुनर और कौशल के अनुसार समाज में अपने कार्यों का योगदान करता....और इस तरह सबकी जरूरतें पूरी होती रहतीं.....साथ ही हारी-बीमारी में भी लोग एक-दूसरे के काम आते....मगर हुआ क्या............??हर आदमी ने अपने हुनर और कौशल का इस्तेमाल को अपनी मोनोपोली के रूप में परिणत कर लिया...........और उस मोनोपोली को अपने लालच की पूर्ति के एकमात्र कार्यक्रम में झोंक दिया.......लालच की इन्तेहाँ तो यह हुई कि सभी तरह के व्यापार में ,यहाँ तक कि चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में भी लालच की ऐसी पराकाष्ठा का यही घृणित रूप तारी हो गया.....और आज यह राजनीति और सेवा कार्यों में तक में भी यही खेल मौजूं हो गया है....तो फ़िर समाज नाम की चीज़ अगर हममे बची है तो मैं जानना चाहता हूँ कि वो है तो आख़िर कहाँ है....एक समाज के सामाजिक लोगों के रूप में हमारे कार्य आख़िर क्या हैं.....कि हम जहाँ तक हो सके एक-दूसरे को लूट सकें...........????
....................क्या यह सच नहीं कि हम सब एक दूसरे को सहयोग देने की अपेक्षा,उसका कई गुणा उसे लूटते हैं.....वरना ये पेटेंट आदि की अवधारणा क्या है......??और ये किसके हित के लिए है.....लाभ कमाने के अतिरिक्त इसकी उपादेयता क्या है.....??क्या एक सभ्य समाज के विवेकशील मनुष्य के लिए ये शोभा देने वाली बात है कि वो अपनी समझदारी या फ़िर अपने किसी भी किस्म के गुण का उपयोग अपनी जरूरतों की सम्यक पूर्ति हेतु करे ना कि अपनी अंधी भूख की पूर्ति हेतु......??मनुष्य ने मनुष्य को आख़िर देना क्या है.....??क्या मनुष्यता का मतलब सिर्फ़ इतना है कि कभी-कभार आप मनुष्यता के लिए रूदन कर लो.....या कभी किसी पहचान वाले की जरुरत में काम आ जाओ....??..........या कि अपने पाप-कर्म के पश्ताताप में थोड़ा-सा दान-धर्म कर लो.......??
.......................मनुष्यता आख़िर क्या है...........??............अगर सब के सब अपनी-अपनी औकात या ताकत के अनुपात में एक दूसरे को चाहे किसी भी रूप में लूटने में ही मग्न हों....??..........और मनुष्य के द्वारा बनाए गए इस समाज की भी उपादेयता आख़िर क्या है..........??.........और अपने-अपने स्वार्थ में निमग्न स्वार्थियों के इस समूह को आख़िर समाज कहा ही क्यूँ जाना चाहिए..........??.........हम अरबों लोग आख़िर दिन और रात क्या करते हैं........??उन कार्यों का अन्तिम परिणाम क्या है......??अगर ये सच है कि परिणामों से कार्य लक्षित होते हैं.............तो फ़िर मेरा पुनः यही सवाल है कि इस समूह को आखर समाज कैसे और क्यूँ कहा जा सकता है......और कहा भी क्यूँ जाना चाहिए.......??
जहाँ कदम-दर-कदम एक कमज़ोर को निराश-हताश-अपमानित-प्रताडित-और शोषित होना पड़ता है......जहाँ स्त्रियाँ-बच्चे-बूढे और गरीब लोग अपना स्वाभाविक जीवन नहीं जी सकते........??जहाँ हर ताकतवर आदमी एक दानव की तरह व्यवहार करता है........!!??
.........दोस्तों मैं कहना चाहता हूँ कि पहले हम ख़ुद को देख लें कि आख़िर हम कितने पानी हैं.....और हमें इससे उबरने की आवश्यकता है या इसमें और डूबने की........??हम ख़ुद से क्या चाहते हैं.........ये अगर हम सचमुच इमानदारी से सोच सकें तो सचमुच में एक इमानदार समाज बना सकते हैं............!!याद रखिये समाज बनाने के लिए सबसे पहले ख़ुद अपने-आप की आवश्यकता ही पड़ती है........तत्पश्चात ही किसी और की.....!!आशा करता हूँ कि इसे हम पानी अपने सर के ऊपर से गुजर जाने के पूर्व ही समझ पायेंगे..........!!!!

चिट्ठी पढ़े वर्षों हुए

सदियों पहले किसी दृष्टा कवि ने लिखा था- नर कहे दिन जात है/दिन कहे नर जात। बहुत बाद में आचार्य रजनीश ने इसी बात को दूसरे तरीके से बतायाकि इंसान समय को नहीं जीता, समय इंसान को जीता है। इसलिए समय कभी बूढ़ा नहीं होता, लेकिन हमारा शरीर हर बीतते क्षण के साथ बूढ़ा होता चला जाता है। परन्तु बात यहीं पूरी नहीं होती। अगर अध्यात्म के अंतस से देखा जाय तो आज का इंसान हर गुजरते क्षणों के साथ महज बूढ़ा नहीं हो रहा, बल्कि हर घड़ी कुछ न कुछ खो रहा है। एक नये की चाह में बहुत-सी पुरानी चीजों से दूर हो जाता है इंसान। यह प्रगति का फलसफा है। रास्ते पीछे नहीं छूटेंगे तो सफर कैसे तय होगा। पुराने से बंधे रहेंगे तो नये को कैसे पायेंगे। विकास का यही ग्रामर है, यही नियति है, यही इष्ट है।
सवाल उठता है कि क्या विकास का यह ग्रामर मानवीय भावनाओं एवं मानवीय संबंधों पर भी लागू हो सकता है? क्या भावनाओं को भी विकास की आधुनिक अवधारणा के तहत सतत बदलते रहना चाहिए ? अगर चाहिए, तो क्या यह संभव है ? क्या भावनाएं बदलने की चीज है या फिर इसे बदला भी जा सकता है कि नहीं? जवाब मुझे नहीं पता। लेकिन यह सच है कि विकास की आधुनिक युग में हम नयी चीजों के साथ जीने की आदत डाल रहे हैं, जो चीजें छूट जा रही हैं उन पर मगज नहीं खपाते, बल्कि वैकल्पिक व्यवस्थाओं के साथ खुद को एडजस्ट करते चले जाते हैं। इसका सबसे बड़ी बानगी है हमारे जीवन से चिट्ठी-पत्री का निकल जाना। एक समय था जब चिट्ठी लिखना और पढ़ना हमारे जीवन का हिस्सा था। अब इसका स्थान दूरसंचार के नव-साधनों ने ले लिया है। हम न तो चिट्ठी लिखते हैं और न ही पढ़ते हैं। मोबाइल फोन ने चिट्ठी-पत्री की अत्यंत प्रचलित विधा की मिट्टी पलीद कर दी। खत लिख दे सावरिया के नाम बाबू... यह मेरा प्रेम पत्र पढ़के तुम नाराज न होना... चिट्ठी आयी है... डाक बाबू आया... जैसे गाने शायद अब अप्रासंगिक हो गये हैं। भावनाओं से भरे ये गाने शायद अगली पीढ़ियों की समझ न आये और संभव है कि भविष्य की पीढ़ियां इन गीतों के रचनाकारों की खिल्ली तक उड़ायें। गोया कितना बेतुके थे,कितने पिछड़े और असभ्य थे वे लोग, जो बात करने के लिए कागज का सहारा लेते थे।
मोबाइल फोन ने भले ही पत्र-विधा को खत्म कर दिया हो, लेकिन वह इसकी जगह नहीं ले सकता। वजह साफ है। जो बातें लिखकर कहीं जा सकती हैं, वे बोली नहीं जा सकती। बोलना और लिखना; दो अलग-अलग विधाएं हैं। बोलकर हम अपनी बात तो बयां कर सकते हैं, लेकिन अक्सर अपनी भावनाओं को नहीं बता पाते। क्योंकि भावनाओं की अभिव्यक्ति बहुत कठिन होती है। इसके लिए बिम्बों की जरूरत होती है। अक्सर शब्दों की कमी हो जाती है। आखिर संवाद एक तरह का चित्र-शब्दानुवाद ही तो है। हम चित्रों में सोचते हैं और शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं। हर बात पहले दिमाग में चित्रात्मक रूप में जन्म लेता है और जुबान से शब्दों के मार्फत बाहर आता है। पत्र में यह आजादी रहती है कि हम अपनी भावनाओं को बिबांत्मक रूप दे सकें। भले ही वह प्यार की भावना हो या फिर गुस्सा या रोष की । पत्र को हम सहेजकर रख सकते हैं और उसे दोबारा पढ़ सकते हैं। लेकिन फोन को रिकॉर्ड कर सहेजना आसान नहीं है।
बहरहाल, याद नहीं कि पिछले कितने वर्षों से मैंने किसी को चिट्ठी नहीं लिखी। मुद्दतों से किसी ने मुझे पत्र नहीं लिखा। कुछ दोस्त हैं, जो पांच वर्ष पहले तक चिट्ठी लिखा करते थे। लेकिन अब कोई नहीं लिखते। वह भी नहीं ,जिसने यूनीवर्सिटी के फेयरवेल में कसम लेकर कहा था- भाई, खत जरूर लिखूंगा। एक मित्र, पत्र-लेखन जिसका मुख्य शौक था, उसकी भी चिट्ठी अब नहीं आती। वह बहुत शानदार पत्र लिखता था। शायद और लोगों की तरह उसने भी मान लिया होगा कि बातों के अप्रासंगिक होते ही कसमे-वादे भी बेतुके हो जाते हैं। वैसे जब भी उसकी याद आती है, बहुत सिद्दत से आती है। तब उसकी पुरानी चिट्ठी को ही नया समझकर पढ़ लेता हूं। एक और मित्र हैं, जिसके पत्र मेरे लिए किसी कविता से कम नहीं, लेकिन वर्षों से उसने भी कुछ नहीं लिखा। याद दिलाता हूं, तो एसएमएस भेज देता है। हाल में ही उसने एक एसएमएस भेजा था- हाउ ट्रयू ? द रीलेशन व्हिच रिक्वार्यड एफर्ट टू बी मेन्टेन्ड आर नेभर ट्रयू एंड इफ रीलेसंस आर ट्रयू दे नेवर रिक्वायर्ड एनी एफर्ट टू बी मेन्टेन्ड। वाह, क्या तर्क है, बट नाट एडजैक्टली ट्रयू यार ! आखिरकार आदमी ने अपनी आदतों को सही ठहराने के लिए तर्क खोज ही लिया। लेकिन मुझे नहीं लगता कि तर्क किसी कमी को पूरा कर सकता है। गुम हो गयी चीजें, तर्कों से नहीं मिल सकती। खतो-किताबत को हम खो चुके हैं। वह हमारी जिंदगी से निकल चूका है। शायद, सदा-सदा के लिए। कोई तर्क इस चुके, अभरे और रिक्त स्थान नहीं ले सकता। न तो विरक्त का तर्क और न ही आसक्ति का तर्क।

22 को रांची में होगा ब्लॉगर स‌म्मेलन

झारखंड और पश्र्चिम बंगाल (कोलकाता) के ब्लॉगरों का एक म्मेलन 22 फरवरी (रविवार) को रांची में आयोजित होने जा रहा है। यह आयोजन हिन्दी युगम वाले भाई ाहब शैलेश भारतवासी के प्रयास होने जा रहा है। इसके लिए ब्लॉगरों को आमंत्रित किया जा रहा है। शैलेश के अलावा झारखंड की पृष्ठभूमि वाले कुछ ब्लॉगरों लगातार लोगों ंपर्क में हैं। यह आयोजन कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, पुरुलिया रोड, राँची में दिन के 11 बजे दो बजे तक होगा। उम्मीद है कि इस म्मेलन में रांची प्रकाशित होनेवाले अखबारों के सम्मानित ंपादकगण भी शिरकत करेंगे। इस अवसर पर शैलेश जी ब्लॉगिंग से कम परिचित या परिचित लोगों को पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से इस दुनिया की सैर कराएंगे। पारूल चाँद पुखराज कुछ गुनगुनाएंगी, तो शिव कुमार मिश्रा ब्लॉगिंग का इतिहास बतायेंगे। पत्रकार ब्लॉगर इसे वैकल्पिक पत्रकारिता की नज़रिये से देखेगा तो वहीं अनुभवी ब्लॉगर मनीष कुमार भी अलग अनुभव शेयर करेंगे। पहली पाँत से अंतिम पाँत के विद्वानों की बातें होंगी। आयोजन में अग्रणी भूमिका निभा रहे शैलेश जी ने अपील की है कि ब्लॉगर अपने साथ ऐसे साथी को भी लायें जो ब्लॉगिंग में नहीं हैं, लेकिन ब्लॉगिंग के बारे में आपसे/मीडिया से सुनते रहते हैं ताकि कार्यक्रम की रोचकता से प्रभावित होकर वे भी ब्लॉगर बन जायें। इस कार्यक्रम के बारे में अमिताभ मीत (कोलकाता के वरिष्ठ ब्लॉगरों में से एक) लोगों नियमित संपर्क में हैं। शैलेश जी अभी ही ंपर्क कर इस कार्यक्रम के बारे में जानकारी ले कते हैं, उनका नम्बर है - 9454950705, 9873734046

शैलेश जी ने अपने ब्लॉग में काफी विस्तार स‌े इस कार्यक्रम के बारे में लेख लिखा है। यहां पढ़ें

Tuesday, February 17, 2009

मंदी के बहाने बेनकाब हिंदी मीडिया

अभिषेक श्रीवास्तव

ऐसा शायद भारतीय हिंदी मीडिया के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. चाहे वे अखबार हों, पत्रिकाएं या खबरिया चैनल, छंटनी का अभियान चारों और धड़ल्‍ले से जारी है. जाहिर है पिछले एक दशक के दौरान भारत ने मीडिया का उभार बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी की खाद के सहारे होते देखा है. वही दौर बाजार में उछाल का गवाह भी रहा है. यह बात कई बार कही जा चुकी है कि उदारीकरण के दौर में जो निजी मीडिया अस्तित्‍व में आया, वह पूरी तरह बाजार से संचालित होता रहा है. लेकिन मीडिया के स्‍वयंभू झंडाबरदार खुद पर सवाल न लगे, इस कारण से इस तथ्‍य को झुठलाते रहे हैं.

अमेरिका के वॉल स्‍ट्रीट से शुरू हुई तथाकथित वैश्विक आर्थिक मंदी ने इस प्रस्‍थापना को सिद्ध कर दिया है कि मुख्‍यधारा का मीडिया पूरी तरह बाजार पर आधारित है और इसके कंटेंट से लेकर रूप तक सब कुछ बाजारू ताकतों के हितों को पुष्‍ट करता है. इस बात को समझने के लिए एक नजर पिछले आठ साल यानी 2000 से लेकर 2008 तक भारत में मुख्‍यधारा के मीडिया के विकास पर डाल लें और उसके बाद पिछले तकरीबन तीन-चार महीनों में यहां हुई छंटनी की वारदातों के बरअक्‍स रख कर देखें.

बात शुरू होती है पिछले साल अक्‍टूबर से, जब 'सियार आया-सियार आया' की तर्ज पर भारत में मंदी के आने का एलान किया गया. किसी को तब तक उम्‍मीद नहीं थी कि विनिर्माण और निर्यात के क्षेत्र को छोड़ कर बहुत बड़ा असर किसी अन्‍य उत्‍पादक या सेवा क्षेत्र पर पड़ेगा. लेकिन कम ही लोग यह समझ पा रहे थे कि तीन-चार साल पहले टाइम्‍स समूह द्वारा प्राइवेट ट्रीटी में निवेश का जो खेला शुरू किया गया था, उसकी मार अब दिखाई देगी.
उस वक्‍त तमाम लोगों ने टाइम्‍स समूह के इस कदम की आलोचना की थी कि उसने निजी कंपनियों और निगमों में पूंजी निवेश के लिए एक कंपनी का निर्माण किया है, हालांकि कई ने यह भी कहा था कि भारतीय मीडिया में ट्रेंड सेटर तो यही प्रतिष्‍ठान रहा है और आगे चल कर कई अन्‍य मीडिया प्रतिष्‍ठान इसी की राह पकड़ेंगे. लिहाजा, बड़ी चोट टाइम्‍स समूह के कर्मचारियों को लगी जब टाइम्‍स जॉब्‍स डॉट कॉम और इस समूह के अन्‍य पोर्टल से करीब 500 लोगों से चुपके से इस्‍तीफा लिखवा लिया गया और खबर कानों-कान किसी तक नहीं पहुंची. इसके बाद दिल्‍ली के मीडिया बाजार में हल्‍ला हुआ कि यह समूह 1400 पत्रकारों की सूची तैयार कर रहा है जिनकी छंटनी की जानी है. यह महज शुरुआत थी. तब तक अन्‍य मीडिया प्रतिष्‍ठानों में छंटनी की कोई घटना नहीं हुई थी.
अचानक पत्रकारों को नौकरी से निकाले जाने के मामलों की बाढ़ आ गई. अमर उजाला ने पंजाब में कई संस्‍करण बंद कर डाले. एक दिन रोजाना की तरह सकाल टाइम्‍स के करीब 70 कर्मचारी जब दिल्‍ली के आईटीओ स्थित अपने दफ्तर पहुंचे, तो उन्‍हें दीवार पर तालाबंदी की पर्ची चस्‍पां मिली. दैनिक भास्‍कर ने कई पत्रकारों को इधर-उधर कर दिया और जंगल की आग की तरह खबर फैल गई कि सियार आ चुका है.
मंदी का सियार नवभारत टाइम्‍स में तब से लेकर अब तक करीब दस पत्रकारों को निगल चुका है. काफी जोश-खरोश से फरवरी 2008 में शुरू किए गए हिंदी के इकनॉमिक टाइम्‍स में आठ लोगों की सूची तैयार कर दी गई और तीन को बख्‍शते हुए पांच को उनके घरों का रास्‍ता दिखा दिया गया. ये सारे ऐसे डेस्‍क पर काम करने वाले नए पत्रकार थे जिनका वेतन शुरुआती पांच अंकों में था.

सबसे शर्मनाक घटना तो हिंदुस्‍तान दैनिक में हुई जब एक साथ 13 पत्रकारों को बगैर कोई कारण बताए बाहर कर दिया गया. ये सभी 20 से 30 साल से हिंदुस्‍तान टाइम्‍स समूह के कारिंदे थे. दूसरे, इनमें से सभी मैदानी इलाकों के रहने वाले थे.
यह प्रक्रिया अब भी जारी है और खबरें हैं कि एकाध नए चैनलों की भ्रूण हत्‍या होने वाली है और हिंदी के बिजनेस अखबार अपना बोरिया-बिस्‍तर समेटने वाले हैं.
सवाल उठता है कि क्‍या सचमुच भारतीय मीडिया पर मंदी का असर है या यह सिर्फ एक बहाना भर है. हफ्ता भर भी नहीं हुआ है कि कुछ बड़े पत्रकार अमेरिकी परिपाटी पर केंद्र सरकार से मीडिया के लिए राहत पैकेज मांगने गए थे. चुनावी साल में सरकार ने सबसे तेज कदम उठाते हुए अखबारी कागज पर तमाम किस्‍म के शुल्‍क हटा दिए. जिस दिन यह खबर आई, उसके अगले ही दिन टाइम्‍स ग्रुप से एक और शुरुआती पांच अंकों वाले पत्रकार को चलता कर दिया गया.
यह सही है कि विज्ञापनों से आने वाले राजस्‍व में भारी कमी आई है, लेकिन वैश्विक मंदी का असली असर अर्थव्‍यवस्‍था के उस क्षेत्र पर पड़ा है जहां वित्‍तीय पूंजी का नंगा नाच चलता है और जो सिर्फ सट्टेबाजी में लगाई जाती है. जाहिर है, जो समूह स्‍टॉक एक्‍सचेंज में सूचीबद्ध होंगे, उन्‍हें कुछ ज्‍यादा असर पड़ सकता है, लेकिन ऐसे कम ही हैं.

(इस रिपोर्ट की दूसरी कड़ी पढ़िये रविवार.कॉम में। यह रिपोर्ट भी रविवार स‌े ही स‌ाभार ली गयी है। रिपोर्ट के लिए आलोक पुतुल जी और अभिषेक श्रीवास्तव जी को स‌ाधुवाद।)

Monday, February 16, 2009

हे ईश्वर !!मैं किसे कम या ज़्यादा आंकूं..!

हे ईश्वर !!
मनुष्यता का भला चाहने वाले लोग
इतने सुस्त और काहिल क्यूँ हैं....
जबकि इसी का खून करने वाले
देखो ना कितनी मुस्तैदी से
अपना काम निपटाया करते हैं....!!
हे ईश्वर !!
मनुष्यता....मनुष्यता...और
मनुष्यता की बातें करने वाले
सिर्फ़ बातें ही क्यूँ करते रह जाते हैं....
अगरचे इसी का हरण करने वाले
दिन-रात इसका चीरहरण करते रहते हैं...!!
हे ईश्वर !!
मनुष्यता को सम्भव बनाने वाले लोग
सदा यही क्यूँ सोचते रहते हैं कि
मनुष्यता कायम करना बड़ा ही कठिन है...
जबकि दरिंदगी से इसकी हत्या करने वाले
कितनी सफलतापूर्वक अपना कार्य करते हैं....!!
हे ईश्वर !!
मनुष्य की जान बचाने वाले इतना डरते क्यूँ हैं
कि अपने घर से बाहर ही नहीं निकलते..
किसी की जान बचाने के लिए
अगरचे मनुष्य की जान लेने वाले...
अपनी देकर भी किसी की जान ले लेते हैं....!!
मैं अकसर ये सोचता हूँ कि
मैं किसे कम या बेसी करके आंकू
वो,जो सीधे-सीधे आदमी की जान लेकर
आदमियत को बदनाम करते हैं....
या वो, जो आदमी की बाबत सिर्फ़
बतकही में व्यस्त रहते हैं....और
सेमिनारों में जाम भरते हैं....!!??

Thursday, February 12, 2009

अंहकार का गणित जीवन को नष्ट कर देता है....!!

अंहकार और मुर्खता एक दूसरे के पर्याय होते हैं.....मूर्खों को तो अपने अंहकार का पता ही नहीं होता....इसलिए उनका अहंकारी होना लाजिमी हो सकता है मगर...अगर एक बुद्धिमान व्यक्ति भी अहंकारी है तो उससे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं....!!
जिस भी किस्म लडाई हम अपने चारों तरफ़ देखते हैं....उसमें हर जगह अपने किसी न किसी प्रकार के मत...वाद....या प्रचार के परचम को ऊँचा रखने का अंहकार होता है.....इस धरती पर प्रत्येक व्यक्ति...समूह....धर्मावलम्बी....राष्ट्र...यहाँ तक कि किसी भी भांति का कोई भी आध्यात्मिक संगठन तक भी एक किस्म के अंहकार से अछूता नहीं पाया जाता......यही कारण है कि धरती पर शान्ति स्थापित करने के तमाम प्रयास भी इन्हीं अहंकारों की बलिवेदी पर कुर्बान हो जाते हैं.....प्रत्येक मनुष्य को ख़ुद को श्रेष्ठ समझने की एक ऐसी भावना इस जग में व्याप्त है कि ये किसी अन्य को ख़ुद से ऊँचा समझने ही नहीं देती...........और यही मनुष्य यदि किसी भी प्रकार के समूह से सनद्द हो जाए तो उसके अंहकार की बात ही क्या....फ़िर तो उसे और भी बड़े पर लग जाते हैं....तभी तो हम यहाँ तक देखते हैं कि शान्ति की तलाश में किसी गुरु की शरण में गया व्यक्ति भी अपने गुरु को उंचा या महान साबित करने की चेष्टा करता बाकी के गुरुओं को छोटा या हेय तक बता डालता है.....और यहाँ तक कि गुरु भी यही कर्म करने में ख़ुद को रत रखता है....!!
हमारे जीवन में हमारे छोटे-छोटे अंहकार हमारे जीवन के बहुत सारे समय को खोटा कर देते हैं.....और हम सदा दूसरे को कोसते अपना समय नष्ट करते जाते हैं.....बहुत साड़ी परिस्थितियों में बेशक यह सच भी हो दूसरा ही दोषी हो....मगर इससे हमारा अहंकारी होना तो नहीं खारिज होता ना......नहीं होता ना....!!..........मैंने देखा है कि थोड़ा-सा झुक-कर या सामने वाले की बात को ज़रा सा मान कर....या उसे ज़रा सा घुमाव देने के लिए मना कर बहुत सारे झगडे पल भर में समाप्त किए जा सकते हैं....मगर हर हालत में यह संभावना सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम में ही व्याप्त है.....और मजा यह कि अंहकार के वक्त हममें प्रेम होता ही नहीं.....या फ़िर होता भी है तो वह कुछ समय के छिप जाता है....मगर एक बार हमारे मुहं से ग़लत-सलत बात के निकल जाने के पश्चात वाही अंहकार हममें ऐसी जड़ें जमाता है कि हम फ़िर अपने वक्तव्य से पीछे हटने को राजी ही नहीं होते....और जिन्दगी के तमाम झगडे सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी वजह से जिन्दगी भर कायम रह जाते हैं.....कोई भी पक्ष किसी भी किस्म के राजी नामे की ना तो पहल करता है....और ना ही सामने वाले की पहल उचित सम्मान देकर उसका स्वागत करता है....या अपनी और से प्रतिक्रिया स्वरुप कोई कदम बढाता है....तमाम झगडों के बाद सामने वाले के प्रति हमारे मन में इक शाश्वत धिक्कार का भाव पैदा हो जाता है....जो हममे से विदा होने का नाम ही नहीं लेता..........सच तो यह है कि इसी वजह से हम सबने अपने जीवन को नर्क बना लिया होता है.....!!
अंहकार और मुर्खता एक दूसरे के पर्याय होते हैं.....मूर्खों को तो अपने अंहकार का पता ही नहीं होता....इसलिए उनका अहंकारी होना लाजिमी हो सकता है मगर...अगर एक बुद्धिमान व्यक्ति भी अहंकारी है तो उससे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं....!!इसलिए दोस्तों इस वक्त.........बल्कि तमाम वक्त समस्त पृथ्वी वासियों को हमें प्रेम का संदेश फैलाने की जरुरत है..........मगर उससे पूर्व ख़ुद को प्रेममय बना लेने की जरुरत है.........बदला एक किस्म की राक्षसी भावना है.....इसका इसी वक्त तिरस्कार कर हमें सदा के लिए अपने मन को प्रेम की चुनर पहना देनी होगी.........यदि सचमुच ख़ुद से.....हरेक से....संसार से....या प्राणिमात्र से तनिक भी प्रेम करते हैं.....तो यह काम अभी और इसी वक्त से शुरू हो जाना चाहिए....!!आप सबको भूतनाथ का अविकल प्रेम.....!!

Wednesday, February 11, 2009

तेरा इमोशनल अत्याचार..

आज समय के साथ सबकुछ बदल गया है। प्यार, प्यार का इजहार और उसके मायने भी। युवक-युवतियों को सबकुछ रेडीमेड चाहिए। प्यार भी। उसे लगता है कि गुलाब के गुच्छे देकर, ढेरो तोहफे देकर, हाथ में हाथ डालकर घूमकर, रेस्टोरेंट में साथ खाना खाकर और थियेटर में फिल्म देखकर ही प्यार किया जा सकता है। क्योंकि आज का युवा प्यार करना नहीं दिखाना जानता है। बाजार ने पहले ही सभी भावनाओं का बाजारीकरण कर दिया है। आज देवदास के जमाने का न तो देव है, न पारो और न ही चंद्रमुखी। पहले प्यार में देवदास बने युवा अपनी पारो से कहते थे कि तू मुझे देखें मैं तुम्हें देखूं और यही प्यार है। चंद्रमुखी कहती थी कि तुम्हारे एक नजर उठाकर देख लेने भर से मेरा जीवन सफल हो गया। अब का देव कहता है अब देखने का नहीं दिखाने का समय है और अब की चंद्रमुखी कहती है देखने दिखाने से काम नहीं चलेगा, पैसा दो, काम करो और चलते बनो। इस वैलेंटाइन डे में मिलने वाली या वाला अगले साल साथ होगा या नहीं इसकी कोई गांरटी नहीं। जान बचानी हो तो भाई-बहन बन जाओ और इच्छाओं की पूर्ति करनी हो तो समय की भूल कहकर निकल जाओ। प्यार के मामले में कुछ ऐसा ही है आज का युवा। सभी नहीं पर अधिकांश तो जरूर। अब का युवा देवदास की तरह प्रेमिका के घर के दरवाजे पर जाकर मरता नहीं, बल्कि एक के बाद एक कई पारो की फौजें खड़ी कर देता है और चंद्रमुखी के पास जाना भी नहीं भूलता। सब चलता है, चलाने वाले चाहिए की तर्ज पर। अब ना पहले वाले देवदास है ना पारो और न ही वो इमोशन। अब कुछ रह गया तो वह है केवल इमोशन की आड़ में उसका किसी भी तरह प्रयोग कर फायदा उठाना या फिर देव डी की तरह इमोशनल अत्याचार। इसे चलाने में लड़कियां भी कुछ कम नहीं। जब तक चलता है तबतक चलाओ, न चले तो तुम अपने रास्ते हम अपने रास्ते। बेशक जिन्हें कल का पता नहीं उनके लिए आज का वैलेंटाइन डे ही मायने रखेगा। पता नहीं कल हो न हो। इसलिए चाहे लाख विरोध हो जो करना है आज ही कर लो, क्योंकि ये हमारा अधिकार है। बेशक प्यार करना आपका अधिकार है लेकिन प्यार की आड़ में अश्लीलता आपका अधिकार नहीं, प्यार की आड़ में शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति आपका अधिकार नहीं और न ही प्यार की आड़ में समाज में गंदगी फैलाना आपका अधिकार है। प्यार में केवल प्यार करना और उसे निभाना आपका अधिकार है और इसकी अभिव्यक्ति के लिए एक दिन तो क्या पूरा जीवन कम है।

Sunday, February 8, 2009

बेईमान अभिव्यक्ति

मन बहुत अकुला रहा है
ख़ुद
को अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा है

शरीर
इक शव बन गया है

और
दिल भी पत्थर हुआ जा रहा है

जिनको
सौंप कर
अपना
कीमती इक-इक वोट

निश्चिंत
हो गए हैं
एकदम
से हम
वही
हर
इक शख्स
हमारे
चिथड़े
-चिथड़े कर रहा है

और
हमारी चिन्दियाँ-चिन्दियाँ

नोच
-नोच कर खाए जा रहा है

दिन
भर की कसरत के बाद भी

किसी को नसीब नहीं बीस रुप्पल्ली
बीस-बीस हज़ार माहवार पाने वाला कामगार
रो
ज-ब-रोज हड़ताल पर जा रहा है

मेरे आस पास ये भूखे...नंगे
और
बदहाल लोगों की भीड़-सी कैसी है
मेरा
देश तो बरसों से ही

शाईनिंग
इंडिया की दुदुम्भी बजा रहा है

हर
तरफ़ गंदगी-ही-गंदगी का आलम है

अबे
चुप करके बैठ जा ना तू

मेरा
नेता अभी एसी की हवा में

चैन
की बंशी बजा रहा है

मेरा
दिल किसी करवट

चैन
ही नहीं पा रहा है

ना
जाने ये किस
आशंका से घबरा रहा है...

Friday, February 6, 2009

अखबार से निकाले जाते ये बेचारे...

मोनिका गुप्ता
मंदी ने तो जैसे लोगों का जीना ही हराम कर रखा है। किसी न्यूज चैनल को देख लें या फिर कोई अखबार उठाकर पढ़ लें। ऐसा कोई दिन न होगा जिसमें आपको मंदी की मार, मंदी का प्रभाव, मंदी के कारण छंटनी आदि आदि पढ़ने, देखने और सुनने को ना मिले। हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की गई जिसमें बताया गया कि वर्ष 2008 के आखिरी तीन महीनों में पांच लाख लोगों की नौकरियां गयी और आने वाले समय में पूरे विश्व में पांच करोड़ लोगों के बेरोजगार होने की आशंका जतायी गयी। इससे देश के युवा और कामगार इतने ज्यादा भयभीत हो गये कि दिन-रात नौकरी बचाने के बारे में सोचने लगे। देश के इतिहास में यह पहला मौका है, जिसमें एक स्नातक को कम पढ़े लिखे लोगों की तुलना में नौकरी खोजने की इतनी ज्यादा चिंता होगी। अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में तो तथाकथित मंदी का बहाना बनाकर बहुत पहले ही छंटनी करनी शुरू कर दी गई। देश के विभिन्न हिस्सों से मजदूर काम छोड़कर घर लौट आये। कई कंपनियों में तो हजारों की संख्या में कर्मचारियों को निकाल दिया गया। अब बड़ी-बड़ी कंपनियों में छंटनियां हो रही हों, तो मीडिया हाउस कैसे पीछे रह सकता है। सो उसने भी अपने कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया। इस क्षेत्र में सबसे पहले गाज गिरी विज्ञापन विभाग के कर्मचारियों पर। जो विज्ञापन लाने में अक्षम रहे उन्हें सबसे पहले बाहर का रास्ता दिखाया गया, क्योंकि मालिक अब कंटेट इज द किंग की पुरानी अवधारणा पर विश्वास नहीं करते। उन्हें पता है कि बाजार में बने रहने के लिए मनी इज द किंग का अनुसरण करना बेहद जरूरी है। इसी मंदी का शिकार होकर सकाल टाइम्स दिल्ली का ऑफिस बंद हो चुका है और टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, प्रभात खबर सरीखे अखबारों में छंटनियां जारी है। अब बात करते है कि संपादकीय विभाग की। जब छंटनी हो रही हो तो इनपर भी गाज गिरना स्वाभाविक है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि गाज गिरेगी तो किस पर। जाहिर है उनपर जो कमज़ोर हों, जिनकी भूमिका कंपनी या फिर व्यक्ति विशेष के लिए मायने नहीं रखती या फिर जिसकी कंपनी के ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों से नहीं बनती। इन सब के बीच इस बात पर गौर करना बेहद जरूरी है कि जिस किसी मीडिया हाउस में छंटनियां हो रही हैं, वहां छंटनी के शिकार 5000-15000 रुपये मासिक कमाने वाले लोग हैं। गौर करने लायक बात यह है कि जिस मीडिया हाउस का सालाना टर्न ओवर करोड़ों का हो वहां इस स्तर के कर्मचारियों को हटाने से क्या फायदा होगा। जबकि इस स्थिति में भी मासिक 50,000-1,00,000 कमाने वाले कर्मचारियों की नौकरी बरकरार है। ऐसे में मुख्य मुद्दा यह है कि जब प्रोडक्शन की बात होती है तो निचले स्तर के कर्मचारी याद आते हैं और जब क्रेडिट लेने की बात होती है तो ऊपर के लोगों की पीठ ठोंकी जाती है। लेकिन मंदी का शिकार यदि कोई बनता है तो वह है प्रोडक्शन में सबसे अधिक योगदान देने वाला कर्मचारी।

मेरी तस्वीर को सीने से लगाता क्यूँ है

मुझसे ना मिलने की कसम खाता क्यूँ है ?
मेरी तस्वीर को सीने से लगाता क्यूँ है ?
अनदिखा सा रहता है क्यूँ मुझको यारब
और लोगों से मिरा दीदार कराता क्यूँ है ?
वक्त मरहम है,दिल को तसल्ली देता है,गर
तो फ़िर वो हमें खंजर चुभाता क्यूँ है ?
दिल को मेरे भी जरा तपिश तो ले लेने दे
साए से मेरे धुप चुरा कर ले जाता क्यूँ है ?
हश्र तक भी जो पूरे ना हों ऐसे मिरे यारब
सपने हम सबको दिखाता है,दिखाता क्यूँ है ?
तेरे चक्कर में घनचक्कर हुआ हूँ मैं "गाफिल"
मेरी मर्ज़ी के खिलाफ मुझे चलाता क्यूँ है ?
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एक बात तो बता अ दोस्त......
तुझे प्यार करना अच्छा लगता है......
या नफरत करना..........??
धत्त.......
ये भी भला कोई पूछने की बात है.....
प्यार करना.....और क्या....!!
क्यूँ....अ मेरे दोस्त ??
क्यूंकि प्यार से ही दुनिया....
दुनिया बनी हुई रहती है.....!!
बस मेरे दोस्त.....
मुझे तुझसे यही पूछना था....!!

Sunday, February 1, 2009

नई दुनिया झारखंड से भी शुरू



दिल्ली, रायपुर, ग्वालियर, बिलास्पुर, इंदौर, जबलपुर और भोपाल के बाद नई दुनिया ने झारखंड से भी अपना प्रकाशन शुरू कर दिया है। रांची से आज (पहली फरवरी 2009) से नई दुनिया का साप्ताहिक प्रकाशन शुरू हो गया। यह अखबार 16 पन्ने का है, जिसके साथ एक 48 पन्ने की मैग्जीन भी पाठकों को उपलब्ध करायी जा रही है। अखबार के झारखंड प्रभारी श्री विष्णु राजगढ़िया जी ने अखबार की लॉन्चिंग के मौके पर खुशी का इज़हार किया। रांची में अखबार के कार्यालय का पता है - नई दुनिया, 305 मंगल टावर, ओल्ड एचबी रोड, कांटा टोली चौक, रांची, झारखंड झारखंड संस्करण का -मेल एड्रेस है - ndranchi@gmail.com आज लॉन्च हुए अखबार में दो पन्ने रांची के स्थानीय खबरों के हैं और एक पन्ना झारखंड की वर्तमान राजनीति पर केंद्रित एक रिपोर्ट का है। अखबार की लॉन्चिंग के लिए कोई समारोह का आयोजन नहीं किया गया। सादगी के साथ इसे बाज़ार में पाठकों के लिए उपलब्ध करा दिया गया। शीघ्र ही यह अखबार रांची के अलावा अन्य स्थानों की खबरों के साथ दैनिक प्रकाशित होगा। रांचीहल्ला टीम अखबार की तरक्की की कामना करती है।