Friday, January 30, 2009
गांधी को गाली देने से पहले...
बरसों से गांधी के बारे में बहुत सारे विचार पढता चला आ रहा हूँ! अनेक लोगों के विचार तो गाँधी को एक घटिया और निकृष्ट प्राणी मानते हुए उनसे घृणा तक करते हैं!! गांधीजी ने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के लिए कोई तैंतीस सालों तक संघर्ष किया। उनके अफ्रीका से भारत लौटने के पूर्व भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां क्या थीं, भारत एक देश के रूप में पिरोया हुआ था भी की नहीं, इक्का-दुक्का छिट-पुट आन्दोलन को छोड़कर (एकमात्र 1857 का ग़दर बड़ा ग़दर हुआ था तब तक) कोई भी संघर्ष या उसकी भावना क्या भारत के नागरिकों में थी, या उस वक्त भारत का निवासी भारत शब्द को वृहत्तर सन्दर्भों में देखता भी था अथवा नहीं, या उस वक्त भारत नाम के इस सामाजिक देश में राजनीतिक चेतना थी भी कि नहीं, या इस देश में देश होने की भावना जन-जन में थी भी कि नहीं !! इक बनी-बनाई चीज़ में तो आलोचना के तमाम पहलु खोजे जा सकते हैं, चीज़ बनाना दुष्कर होता है, महान लोग यही दुष्कर कार्य करने का बीड़ा लेते हैं और बाकी के लोग उस कार्य की आलोचना!! लेकिन सवाल ये नहीं है, सवाल तो ये है कि मैदान में खेल होते वक्त या तो आप खिलाड़ी हों या अंपायर-रेफरी हों या कम-से-कम दर्शक तो हों.!! या किसी भी माध्यम से उस खेल का हिस्सा तो हों! अब बेशक पकी-पकाई रोटी में आप सौ दुर्गुण देख सकते हों, सच तो यह भी है कि ये भी भरे पेट में ही सम्भव है। खाली पेट में तो यही आपके लिए अमृत-तुल्य होती है। मेरी बात आपके द्वारा समझी जा रही होगी, क्यूंकि इधर मैं लगातार देखता आ रहा हूँ कि गांधी को गाली देने वाले लोगों कि संख्या बढती ही चली जा रही है, क्यूँ भई आप कौन हो "उसे" गाली देने वाले? एक मोहल्ले के रूप में भी ख़ुद को बाँध कर ना रख सकने वाले आप, सूटेड-बूटेड होकर रहने वाले आप, इंगरेजी या हिंग्रेजी बोलने वाले आप, अपने बाल-बच्चों में खोये रहने वाले आप, अपने हित के लिए देश का टैक्स खाने वाले आप, तरह-तरह की चोरियां-बेईमानियाँ करने वाले आप, अपने अंहकार के पोषण के लिए किसी भी हद तक गिर जाने वाले आप, बच्चों, गरीबों, मजलूमों का बेतरह शोषण करने वाले आप, स्त्रियों को दोयम दर्जे का समझने वाले आप और भी न जाने क्या-क्या करने वाले आप। आप कौन हैं भाई?
आपकी गांधी के पासंग औकात भी क्या है? आप गांधी के साथ इक पल भी रहे हो क्या? आपने गांधी के काल की परिस्थितियों का सत्संग का इक पल भी जीया है क्या? क्या आप घर तक को एकजुट कर सकते हो? उसे मोतियों की तरह पिरो सकते हो? सच तो यह है कि इस लेखक की भी गांधी नाम के सज्जन से बहुत-बहुत-बहुत सी "खार" है कि गांधी नाम का ये महापुरुष मीडिया में आए विमर्शों के अनुसार विक्षिप्त था, औरतों के साथ सोता था, पत्नी को पीटता था, पुत्र के साथ भी उचित व्यवहार नहीं करता था, ऐसी बहुत सारी अन्य बातें, जिनका स्त्रोत मीडिया ही है, के माध्यम से मैं भी खार खाने लगा हूँ, लेकिन मैं नहीं जानता कि और मुझे कोई यह बता भी नहीं सकता कि यह सब कितना कुछ सच है और इस सबके भीतर असल में क्या है? जो भी हो, मगर इतना अवश्य जानता हूँ कि "गांधी" नाम के इस शख्स के सम्मुख मैं क्या हूँ! आराम की जिन्दगी जीते हुए हम सब आजाद और "आजादखयाल" लोग किसी भी चीज़ को बिल्कुल भी गंभीरता से ना समझने वाले हमलोग और अतिशय गंभीरता का दंभ भरने वाले हमलोग, परिस्थितियों का आकलन मन-मर्जी या मनमाने ढंग करने वाले हमलोग, किसी अन्य की बात या तथ्य की छानबीन ना कर उसी के आधार पर अन्वेषण कर परिणाम स्थापित करने वाले हम लोग!! मैं अक्सर सोचता हूँ कि बिन औकात के हम लोग किसी के भी बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं। खासकर उस व्यक्ति के बारे में जिसके सर के इक बाल के बराबर भी हम नहीं। एक चोर भी अगर जिसने अपने समाज में कोई अमूल्य योगदान दिया है और हमने अगर सिवाय अपने पेट भरने के जिन्दगी में और कुछ भी नहीं किया तो बागवान की खातिर हमें उस चोर की बाबत चुप ही बैठना चाहिए और अगरचे वो गांधी नाम का व्यक्ति हो तो सौ जनम भी हम उसके बारे में कुछ भी बोलने के हकदार नहीं। मैं आपको बता दूँ कि गाँधी सिर्फ़ इक व्यक्ति का नाम नहीं, एक देशीय चेतना का नाम है, एक ब्रहमांडइय चेतना का नाम है, एक सूरज हैं वो जो बिन लाग-लपेट के सबको रौशनी देता है। उनके बहुत सारे विचारों का विरोध करते हुए मैं पाता हूँ कि मैं उनके सामने एक कीडा हूँ। मैं चाहे जो कुछ भी उनके बारे में कह लूँ, सच तो यही है कि मैंने और ऐसा कहने वाले तमाम लोगों ने कभी कुछ रचा ही नहीं। देश की आजादी तो दूर, आज़ाद देश में अपने मोहल्ले की गंदगी को साफ़ कराने का कभी बीडा नहीं उठाया। गली-चौक-चौराहों-पत्र-पत्रिकाओं-मीडिया-टी.वी. आदि में बक-बक करना और बात है, और सही मायनों में अपने समाज के लिए कुछ भी योगदान करना और बात। मेरी बोलती यहीं आकर बंद हो जाती है। दोस्तों किसी पर चीखने-चिल्लाने से पहले हम यह भी सोच लें कि हम क्या हैं और किसके बारे में किसकी बात पर चीख रहे हैं!! गांधी को गरियाने की औकात रखने वाले हम यह भी तो नहीं जानते कि अगर गांधी हमारे सामने होते तो हमें भी माफ़ करते। ऐसे लोग पहले किसी स्वच्छ तालाब में अपना मुंह धोकर आयें और अपनी आत्मा की गहराई से ये महसूस करें कि राम क्या है। किसी की भी आलोचना करने से पूर्व और अगर वो व्यक्ति देश के लिए अपना जीवन आत्मोसर्ग कर के गया हो!! आज गांधी जी की पुण्यतिथि है। इस पुण्यतिथि पर हम अवश्य ये सोच कर देखें कि आज जिसकी पुण्यतिथि हम मना रहे हैं, उसे याद कर रहे हैं और आने वाले तमाम वर्ष याद करेंगे, बजाय इसके हमारी पुण्यतिथि पर हमें याद करने वाले लोग कितने होंगे?
Thursday, January 29, 2009
रात,खो गया मेरा दिल!!
कल रात ही मेरा दिल चोरी चला गया,और मुझे कुछ पता भी ना चला,
वो तो सुबह को जब नहाने लगा,
तब लगा,सीने में कुछ कमी-सी है,
टटोला,तो पाया,हाय दिल ही नहीं !!
धक्क से रह गया सीना दिल के बगैर,
रात रजाई ओड़ कर सोया था,
मगर रजाई की किसी भी सिलवट में,
मेरा खोया दिल ना मिला,
टेबल के ऊपर,कुर्सी के नीचे,
गद्दे के भीतर,पलंग के अन्दर,
किसी खाली मर्तबान में,
या बाहर बियाबान में,
गुलदस्ते के भीतर,
या किताब की किसी तह में,
और आईने में नहीं मिला मुझे मेरा दिल !!
दिल के बगैर मैं क्या करता,
घर से बाहर कैसे निकलता,
मैं वहीं बैठकर रोने लगा,
मुझे रोता हुआ देखकर,
अचानक बेखटके की आवाज़-सी हुई,
और जब आँखे खोली,
तो किसी को अपने आंसू पोंछते हुए पाया
देखा तो,
सामने अपने ही दिल को
मंद-मंद मुस्कुराते पाया,
दिल से लिपट गया मैं और पूछा उसे,
रात भर कहाँ थे,
बोला,रात को पढ़ी थी ना आपने,
गुलज़ार साहब की भीगी हुई-सी नज़्म,
मैं उसी में उतर गया था,
और रात भर उनकी नज्मों से
बहुत सारा रस पीकर
मैं आपके पास वापस आ गया हूँ.....!!
Wednesday, January 28, 2009
हे राम, अब तू ही बचा!!
अब इसे महज इत्तेफाक कहें या फिर सुनियोजित अतिवाद लेकिन हकीकत यही है कि भारतीय जनता पार्टी के शासनवाले राज्यों में हिंसा का इस्तेमाल बहुत ही करीने से साम्प्रदायिकता और कट्टरता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने लोगों को बताया कि कैसे एक गर्भवति महिला के पेट से भ्रूण निकाल कर उसे आग के हवाले किया जाता है, कैसे औरतों की इज्ज़त लूट कर बेशर्मी के साथ जय श्रीराम का नारा लगाया जाता है और कैसे मासूमों का कत्ले-आम किया जाता है, क्योंकि वे माइनॉरिटी में होते हैं। इसी प्रकार भाजपा समर्थित बीजू जनता दल की उड़िसा सरकार ने बताया कि ईसाइयों को कैसे नंगा कर गांव से भगाया जाता है, कैसे चर्चों को आग के हवाले किया जाता है और कैसे एक स्वामी जी की हत्या के कथित जुर्म में हजारों लोगों को इंसानियत से ही बेदखल किया जाता है। यह सूची काफी लंबी है। भाजपा और उसकी सरकारों ने इस देश को तोड़ने की जो मुहिम छेड़ रखी है, उसकी एक कड़ी अब दक्षिण भारत से भी जुड़ गयी है। अब तक दक्षिण क्षेत्र भगवा आचरण से अछूता था, लेकिन कर्नाटक के 'नाटक' के बाद येद्यूरप्पा की सरकार ने वहां के शिक्षित समाज में भी जहर घोलना शुरू कर दिया है। कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनने के बाद वहां चर्चों और ईसाई संस्थाओं पर हमले हुए और मशहूर चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन की प्रदर्शनी में तोड़फोड़ की गयी। बात यहीं नहीं रुकती। श्रीराम के नाम पर स्थापित निर्लज्जों की एक फूहड़ सेना ने 24 जनवरी को एक पब में जाकर कोहराम मचाया। वहां लड़कियों के साथ जो व्यवहार किया गया, उसकी निंदा करने से बेहतर है कि लड़कियां खुद यह तय करें कि उन्हें तालीबानी व्यवस्था में जीना है या फिर एक सभ्य समाज में। काबुल में तालीबान का कहर कहीं से भी श्रीराम सेना से अलग नहीं था। इस खेल में सरकार की मिलीभगत तो होगी ही, क्योंकि श्रीराम के नाम पर राजनीति करनेवालों की ही सरकार आज कर्नाटक में है। मैं पूछती हूं कि अगर कल को किसी सरकार द्वारा समर्थित संगठन की ओर से यह घोषणा कर दी जाये कि अब किसी औरत को पानी नहीं पीना है, तो क्या श्रीराम सेना और इन जैसे आतंकी अपनी मां-बहनों को भी पानी पीने से रोकेंगे। शर्म है कर्नाटक सरकार पर, शर्म है भारतीय जनता पार्टी की सरकारों पर और शर्म है देश के नपुंसक कानून पर, जो सिर्फ दलालों को चांदी कटवाने के लिए ही स्थापित हुआ प्रतीत होता है। थू...Monday, January 26, 2009
स्लम-डॉग की वाह-वाह.....!!
Friday, January 23, 2009
विष्णु राजगढ़िया जी नई दुनिया के झारखंड प्रभारी बने
Thursday, January 22, 2009
Self centered system and the people
Rajat kumar gupta
Wednesday, January 21, 2009
रियाल्टी शो और क्षेत्रवाद
मोनिका गुप्तापिछले साल बिहारी-मराठी विवाद के रूप में क्षेत्रवाद का जो रूप सामने आया, वो चकित करने वाला तो नहीं था लेकिन सोचनीय जरूर था। आजादी के 60 साल बाद भी हम जिस सोच से न निकल पाये हों वह क्षेत्रवाद अब भी पहले की ही तरह हमारे समाज में विद्यमान है और तेजी से अपनी जड़ें फैला रहा है। पूरे भारत में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र का अलगाव अब भी पहले की तरह मौजूद है। अब भी क्षेत्रीय भावना को उजागर कर राजनीति की जाने की पुरानी पंरपरा पहले की तरह विद्यमान है। खैर, भारत में ऐसी घटनाओं की कोई कमी नहीं जिसने समय-समय पर इस भावना को हवा दी हो और साथ ही इसका विरोध भी हुआ हो। लेकिन आज क्षेत्रीयता व्यक्ति के मनोरंजन कक्ष तक घुस चुकी है। कुछ दिनों पहले मैं अपने घर में टेलीविजन के विभिन्न चैनलों में दिखाये जा रहे रियाल्टी शो देख रही थी। अमूनन ये प्रोग्राम गीत-संगीत औऱ नृत्य प्रतियोगिता के रूप में दिखाई जाती है। इसमें एसएमएस के जरिए लोगों से वोटिंग करायी जाती है और प्रतिभागी की योग्यता का आकलन किया जा रहा था। प्रतियोगिता चलती रही एक-एक कर प्रतिभागी आते गये। अपनी कला का प्रदर्शन किया। अब बारी थी प्रतिभागियों और जजों द्वारा वोट मांगने की। अब प्रतिभागी देश के कोने-कोने से थे तो जाहिर है कि कोई पंजाबी, कोई मराठी, कोई बिहारी, कोई गुजराती, कोई बंगाली आदि हो। ऐसे में घोषणा की जाती है कि फलां आदमी पंजाब प्रांत से है। सभी पंजाबी भाइयों से अनुरोध है कि अपने पंजाबी पुतर को अधिक से अधिक एसएमएस कर विजयी बनावें। फिर फलां लड़की गुजरात की है। गुजरातियों से अनुरोध है कि यदि वे अपने क्षेत्र के प्रतिभागी को विजय-ताज पहनते हुए देखना चाहते है तो खूब एसएमएस करें। इसी तरह बारी-बारी से अन्य प्रतिभागियों ने भी अपने लिए वोट-भीख मांगना शुरू कर दिया। मानो, उनकी कला लोगों के एसएमएस की मोहताज हो और वोट न मिले, तो उनकी कला की रोशनी निस्तेज हो जाएगी। इसी तरह एक प्रतिभागी जो मध्यप्रदेश की थी। उसे अंततः एसएमएस न मिलने की वजह से प्रोग्राम से बाहर निकलना पड़ा। लगी रोने और कोसने मध्यप्रदेश के लोगों को। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि आप मेरा सहयोग नहीं करेंगे। आपकी वजह से ही मुझे इस प्रोग्राम से बाहर निकलना पड़ रहा है। मेरा क्या मैं तो यहां से निकल कर किसी और जगह जाकर अपने लिए जगह बना लूंगी। लेकिन आप लोगों को सोचना चाहिए कि इससे मध्यप्रदेश का ही नाम खराब हुआ है। जब उस प्रतिभागी का ऐसा वक्तव्य सुनने को मिला तो लगा ये तो हद हो गई। क्या मध्यप्रदेश के लोगों ने ही आपको विजयी बनाने की जिम्मेदारी ले रखी थी ? या फिर उनके आदेश से ही आप इस प्रोग्राम में भाग लेने आई थीं। उस पर भी जो प्रतिभागियों को जज करने वाले लोग और जो प्रोग्राम को चलाने वाला एन्कर होते हैं वे भी ये कहते नहीं थकते कि फलां आदमी कोलकाता से है। इसलिए कोलकातावासियों से अनुरोध है कि अधिक से अधिक वोट दें। फलां आदमी झारखंड का है इसलिए झारखंडवासियों एसएमएस करने में कंजूसी न करें। अब आनेवाली पीढ़ी के मन में इससे ज्यादा क्षेत्रीयता की नींव औऱ कौन रख सकता है? जब दिन रात टीवी चैनल इस तरह के प्रोग्राम चला रहे हों और हर बार अपने अपने प्रांत का नाम लेकर हिन्दुस्तानी होने के सुबूत ही मिटा रहे हों तो क्षेत्रवाद और जातिगत भावना की जड़ें तो जमेंगी ही। आप बिहारी-मराठी के विवाद पर कितना भी हो-हल्ला कर लें लेकिन यदि अपने बेडरूम में घुसी इस क्षेत्रवाद के शंखनाद को इसी तरह बजने देंगे तो यह समझ लीजिए कि आपकी आनेवाली पीढ़ी आपसे केरल जाने के लिए पास्पोर्ट बनवाने की मांग करेगी। क्या इस तरह के वक्तव्य का इस्तेमाल कर हम आने वाली पीढ़ी की सोच को संकुचित नहीं कर रहे? क्या हम उन्हें यह नहीं बता रहे कि तुम बिहारी हो, मराठी हो, पंजाबी, असमी हो, झारखंडी हो लेकिन इन सबसे परे केवल हिन्दुस्तानी हो ये नहीं बता रहे है? आप निश्चित रूप से इस तरह के प्रोग्राम का प्रसारण कीजिए, भारतीय प्रतिभा को लोगों के सामने लाइये, उन्हें एक मंच प्रदान कीजिए। लेकिन किसी बिहारी, मराठी, पंजाबी, बंगाली, झारखंडी, गुजराती, असमी इत्यादि के रूप में नहीं बल्कि केवल एक हिन्दुस्तानी के रूप में।
Tuesday, January 20, 2009
कभी धुप चिलचिलाये.....!!
कभी शाम गीत गाये....!!
जिसे अनसुना करूँ मैं
वही कान में समाये.....!!
उसमें है वो नजाकत
कितना वो खिलखिलाए !!
सरेआम ये कह रहा हूँ
मुझे कुछ नहीं है आए...!!
चाँद भी है अपनी जगह
तारे भी तो टिमटिमाये...!!
जिसे जाना मुझसे आगे
मुझपे वो चढ़ के जाए...!!
रहना नहीं है "गाफिल"
इतना भी जुड़ ना जाए...!!
Monday, January 19, 2009
क्या करें िशक्षक
इन िदनों बड़े और मंझोले शहरों के माता-िपता दोनों कामकाजी होते हैं(ज्यादातर)। एेसे में बच्चे के िलए वक्त िनकालना उनके िलए थोड़ा मुिश्कल होता है। उनके पास अपने िलए वक्त कम पड़ जाता है। एेसे में िशक्षकों की भूिमका और बढ़ जाती है। तो क्या उन्हें वह अिधकार नहीं िमलना चािहए जो अापके बच्चे के िहत के िलए हो। गलती करने पर अाप अपने बच्चे के कान के नीचे बजाना नहीं भूलते, तो गलती करने पर क्या िशक्षक उन्हें नहीं मार सकते। यह बात इतर है िक कभी-कभी कुछ िशक्षक हद पार कर जाते हैं िजतकी वजह से बच्चों को नुकसान पहुंचता है। पूरे देश में हजारों स्कूल होंगे पर मारपीट की चंद ही खबरें अाती हैं। अनुमानतः हजार में से एक बच्चे को हो सकता है िक िपटाई के ज्यादा नुकसान पहुंच जाता हो। पर एेसा नहीं िक िशक्षक कसाई हैं और बच्चे बकरे। स्कूल कत्लगाह, जहां बच्चों पर जम कर अत्याचार िकए जाते हों।
सवाल इस बात का है िक िशक्षक बच्चों को पीटे नहीं तो क्या करें। इस बात का कोई िदशा िनदेॆश नहीं अाया है। बच्चा क्लास में िसगरेट पीए, बच्चा क्लास में हुड़दंग मचाए, पूरी कक्षा को िडस्टबॆ करे तो िशक्षक क्या करें इस बारे में कोई िनदेॆश नहीं अाया है। मुझे लगता है िक िशक्षकों को क्लास छोड़ कर कैंटीन में बैठ अाराम से चाय पीनी चािहए। जब वह कोई कदम उठा ही नहीं सकते तो िफर पूरी क्लास को पढ़ाएंगे कैसे।
मुसीबत यहां खत्म नहीं होती। िशक्षक यिद पढ़ाएंगे नहीं तो िरजल्ट खऱाब होगा। िशक्षा महकमा से लेकर मंतऱालय तक से बात अाएगी िक फलां स्कूल का िरजल्ट खराब हो गया। िशक्षक पढ़ाते ही नहीं। वह िवभाग यह नहीं सोचता िक उसकी मुसीबतें क्या हैं। िकन परेशािनयों से उसे गुजरना पड़ता है। सुअर बकरी िगनने से लेकर पल्स पोिलयो और चुनाव की ड्यूटी में उसे लगाया जाता है और उम्मीद की जाती है िक िरजल्ट शत पऱितशत हो।
एेसे में इस िनदेॆश की भी अपेक्षा है िक इन परेशािनयों के हल के िलए भी कोई िनदेॆश अाए।
मियाँ "गाफिल" के शेर.........!!
दिल मुहब्बत से लबरेज़ हो गया था
मिरे साथ वाकया क्या हुआ,पता नहीं !!
अब और चलने से क्या होगा ऐ "गाफिल"
हम तो सफर में ही अपने मुकाम रखते हैं...!!
अपनी हसरतों का क्या करूँ मैं "गाफिल"
इक साँस भी मिरी मर्ज़ी से नहीं आती.....!!
इस तरह कटे दुःख के दिन
दर्द आते रहे,हम गिनते रहे....!!
बच्चे जब किताब थामते हैं...
उदास हो जाया करते हैं खेल....!!
वो मेरी रहनुमाई में लगा हुआ था
और मेरा कहीं अता-पता ही न था !!
कितने नेकबख्त इंसान हो तुम गाफिल हाय हाय
किसी को दिया हुआ दिल भी उससे लौटा लाये....??
राह में जिसकी हमने नज़रें बिछायी थी क्या
अभी जो हमें छोड़कर गई,मिरी तन्हाई थी क्या....??
बारहां हम गए थे उसे यूँ भूलकर
बारहाँ उसको हमारी याद आई थी क्या...??
हिचकियाँ इतनी गहरी आती हैं क्यूँ
लगता है जैसे हमें अल्ला याद करता है....!!
उससे इतना प्यार हमें है "गाफिल "
हमसे आने की फरियाद करता है.....!!
इक तमाशा अपने इर्द-गिर्द बना लिया है
हमने खुदा को अपना शागिर्द बना लिया है...!!
Sunday, January 18, 2009
मुश्किलें
जिनके हाथ इतने मजबूत हैं कि
तोड़ सकते हैं जो किसी भी गर्दन!!
मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं
जो कर रहे हैं हर वक्त-
किसी ना किसी का
या सबका ही जीना हराम!!
मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं
जिनके लिए जीवन एक खेल है
किसी को मार डालना
उनके खेल का इक अटूट हिस्सा !!
मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं
जो देश को कुछ भी नहीं समझते
और देश का संविधान
उनके पैरों की जूतियाँ!!
मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं
जो सब कुछ इस तरह गड़प कर रहे हैं
जैसे सब कुछ उनके बाप का हो
और भारतमाता !!
जैसे उनकी इक रखैल!
मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं
जिनको बना दिया गया है
इतना ज्यादा ताकतवर
कि वो उड़ा रहे हैं हर वक्त
आम आदमी की धज्जियाँ
और क़ानून का सरेआम मखौल!!
दरअसल ये मुश्किलें
हम सबके ही साथ हैं
मगर मुश्किल यह है
कि
हमें जिनके साथ जीने में
अत्यन्त मुश्किलें हैं
उनको
कोई मुश्किल ही नहीं??
फंस गये दोनों ही देश महाजन के फंदे में
14 जनवरी को एक साथ दो खबरें आयीं। पहली खबर थी- अमेरिका ने पाकिस्तान को गैर सैनिक सहायता में तीन गुना बढ़ोत्तरी करने का प्रस्ताव दिया। इसके चंद घंटे बाद ही भारतीय सेना द्वारा उच्च तकनीक के हथियार
खरीदने की घोषणा हो गयी। यानी महाजन का मंदा पड़ा कारोबार फिर से चल निकला। हथियार बेचने का फायदेमंद धंधा।भारत और पाकिस्तान के बीच व्याप्त तनाव के बीच सौदेबाज़ी का इससे नंगा उदाहरण क्या हो सकता है। काफी अरसे से यह बात समय-समय पर कही जाती है, पर इसके विरोध में पूरी दुनिया एकजुट होकर स्वर मुखर नहीं कर पाती। इराक में रासायनिक हथियार होने के आरोप में हुए हमले के बाद किसी देश अथवा महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठन में यह हिम्मत नहीं है कि वह अमेरिका से पूछे- "तुमने जो आरोप लगाये थे, उसका क्या हुआ। सद्दाम हुसैन को तो फांसी पर लटका दिया, पर रासायनिक या सामूहिक विनाश के हथियार कहां हैं?" किसी ने अब तक नहीं पूछा और आगे भी ऎसा ही होगा।
यानी दो ध्रुवीय सत्ता के समाप्त होने के बाद पूंजीवादी अमेरिका नये सिरे से अपनी मंदी को पाटने के लिए खाड़ी क्षेत्र के देशों के बाद अब दक्षिण एशियाई क्षेत्र का चयन कर चुका है। 1947 के बाद से अब तक यह क्षेत्र उसका सफल बाज़ार जो रहा है। आज़ादी के बाद के घटनाक्रमों और परोक्ष तौर पर अमेरिकी मदद से फैलायी गयी नफ़रत के बीज वैसे पेड़ो की शक्ल अख़्तियार कर चुके हैं, जिन्हें उखाड़ना आसान नहीं। साहित्यिक और सांस्कृतिक मोर्चे से दूरी को पाटने की कोशिश क्या शुरू हुई, अमेरिका की त्योरियां चढ़ने लगीं। जिस बाज़ार में वह एक-दूसरे के घोर विरोधी प्रतिद्वंद्वियों को इतने दिनों से हथियार बेचता आया है, वह बाज़ार अगर समाप्त हो जाये, तो उसकी दुकानदारी का क्या होगा। चलो खुद ही पंच बन जाओ, दोनों पक्षों को समझाने का नाटक करो और अपनी दुकानदारी पक्की करो।
बचपन में बंदर और चूहों की एक कहानी पढ़ी थी। एक रोटी के टुकड़े को लेकर दो चूहे आपस में लड़ रहे थे। मौके की ताड़ में बैठा बंदर दोनों के बीच सही बंटवारा कराने पहुंच गया। उसने रोटी के दो टुकड़े इस तरीके से किये कि दोनों बराबर न हों। फिर दोनों को बराबर हिस्सा देने के नाम पर वह बड़े हिस्से का एक भाग इस तरीके से खा गया कि वह हिस्सा दूसरे से छोटा हो गया। इसी तरह अंततः पूरी रोटी ही बंदर के पेट में चली गयी। भारत-पाकिस्तान तनाव और हाल के घटनाक्रमों से बरबस ही इस कहानी की याद आती है। ब्लॉग पढ़नेवालों के लिए चूहों और बंदर का नाम बताना मैं ज़रूरी नहीं समझता। खैर, पता नहीं कि देश चला रहे लोगों ने यह कहानी पढ़ी भी है या नहीं या फिर कहीं ऎसा तो नहीं कि वे अपनी पढ़ाई का वास्तविक जीवन में इस्तेमाल नहीं करते। जो बताना ज़रूरी है, वह यह कि मुम्बई हमलों के अलावा भी कई मुद्दों पर भारतवासियों को लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है। पहली नज़र तो भारतीय रुपया और डॉलर की कीमत के बीच का उतार-चढ़ाव है। जिस गति और अनुपात में भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डॉलर के मुकाबले मज़बूत हो रहा था (अक्तूबर 2007 में यह 39.08 रुपये प्रति डॉलर पर था, अभी यह 48.61 रुपये है : श्रोत - याहू फायनांस इनकॉरपोरेशन), उससे यह स्थिति बन रही थी कि अगले बीस साल में भारतीय रुपया डॉलर से ज़्यादा महंगा हो सकता था। इस स्थिति में तेज़ी आते ही अमेरिकी बाज़ार में आयी मंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था में सूनामी आ गयी। अब सूचना तकनीक पर हमले की बारी है। सत्यम के साथ-साथ अन्य भारतीय आइटी कंपनियों पर यह परोक्ष हमला है। जो देश हर मुद्दे को अपने लाभ और पैसे से तौलता हो, उसके लिए भारतीय कंपनियों के निरंतर बढ़ते वर्चस्व को पचा पाना कठिन होता है। वैसे भी अमेरिकी समाज हार मानने की मानसिक स्थिति में नहीं होता। अमेरिका का दौरा कर चुके लोगों ने यदी सच बताया है, तो यहां हम भारत-पाक तनाव पर इतना कुछ सोच रहे हैं, पर आम अमेरिकी को भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की बात तो दूर, दोनों देशों की भौगोलिक स्थिति तक का सटीक ज्ञान नहीं होता। यह औसत अमेरिकी सोच है और हम यहां बराक ओबामा की जीत से संबंधित समीकरणों पर मगजमारी करने में व्यस्त रहते हैं। पर, ऎसी स्थिति चीन, जापान या कोरिया जैसे देशों की नहीं। उन्होंने अपने विकास का लक्ष्य स्थिर रखा है और उनकी सोच में अमेरिका सिर्फ एक चुनौती है, बहस या वक्त ज़ाया करने का मुद्दा नहीं।
इस बात पर भी नज़र रखने की ज़रूरत है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था फिलहाल किस स्थिति में है और वहां की प्रगति का दर क्या है। क्या भारत पड़ोसी देश के साथ उपजे तनाव में अपनी ऊर्जा को विकास के अलावा कहीं और खर्च करने पर मजबूर तो नहीं हो रहा है। अगर ऎसा है, तो समझदार लोगों को इस दिशा में पहल करनी होगी। टीवी चैनल अब भी युद्ध के तनाव से ग्रस्त हैं। एक भी ऎसा नहीं होगा, जब किसी चैनल पर मुम्बई हमले से संबंधित पुरानी क्लिपिंग्स न दिखाई जाती हो। यानी वे लगातार युद्ध जैसा माहौल बनाये रखना चाहते हैं।
इस ओर भी नज़रदारी ज़रूरी है कि क्या वाकई दूसरे देश अपनी परेशानियों के मुकाबले भारत की ज़रूरत को अधिक ध्यान देंगे। ज़ाहिर सी बात है कि जो खुद भूखा और बीमार हो, उससे परोपकार और समाज कल्याण की उम्मीद नहीं की जा सकती। अगर यह बात सच है, तो दूसरों से अधिक बौद्धिक (यह प्रमाणित तथ्य है) भारतीय समाज दो पड़ोसी देशों के तनाव के नाम पर क्या कुछ गंवा रहा है। टीवी पर एक विज्ञापन आता है, जो यातायात के नियमों से संबंधित है। इस विज्ञापन में एक शीर्षक भी अंत में दिखता है - "फैसला आपका, क्योंकि सर है आपका।" क्या हम कुछ इस तरीके से नहीं सोच सकते या फिर अपने परिचितों के बीच बहस को इस दायरे में नहीं मोड़ सकते? इस मुद्दे पर भी गंभीरता आवश्यक है कि क्या भारत के तमाम राजनीति दल इस मुद्दे पर अंदर से वही रवैया रखते हैं, जो उनके नेता टीवी चैनलों पर दर्शा रहे हैं या वह कहावत चरितार्थ हो रही है कि - " यह लंका है, यहां सभी बावन गज वाले होते हैं।" हम सभी ने एक नहीं, कई बार यह बात पढ़ी है, तो कई बार जीवन के यथार्थ में इसे महसूस भी किया है कि दूसरे की लकीर मिटाने की कोशिश में खुद को मिटाने से बेहत और सार्थक तरीका यह है कि एक लकीर के मुकाबले दूसरी बड़ी लकीर खींच दी जाये। भारत के लिए दुनिया में अमेरिकी लकीर ही चुनौती है। अब वह किस रास्ते जायेगा, यह तो हम और आप ही तय करेंगे।
Sunday, January 11, 2009
झारखण्ड का मुख्यमंत्री कौन है मम्मी.....??
मम्मी झारखंड के मुख्यमंत्री कौन हैं....??.....मेरी सात साल की बच्ची ने अपनी मम्मी से पूछा.....मेरी पत्नी ने सवालिया निगाहों से मेरी और देखा और वही सवाल मुझपर दागा मेरे मुस्कुराने पर वो बोली...हँसते क्या हो मैं अखबार पढ़ती हूँ क्या...??आज बताती हूँ कि मरांडी हैं...तो कल मुंडा हो जाता है.....फिर कभी सोरेन....तो तीन बाद फिर मुंडा....कुछ दिन बाद फिर कौडा तो फिर सोरेन.....बच्चा सोरेन रटता है....तो फिर कोई चुनाव....और सोरेन की हार....और तो और....किसी के सी.एम्.पद से हटते ही कई दिनों तक कभी स्टीफन....कभी दुर्गा... कभी हेमंत....कभी रुपी....कभी कौडा....कभी बंधू...कभी हेमलाल.....कभी चम्पई....कभी कोई....कभी कोई.....मैं तो समझ ही पाती कि आख़िर झारखंड का सी.एम्. कब और कौन है....??....जब मुझे ही नहीं पता कि कब कौन है....तो बच्ची को क्या बताऊँ....??..........पत्नी की बात तो बिल्कुल ठीक थी.....मगर मैं भी इस सवाल में फँस ही गया...मैंने अपने मित्र को फोन लगाया....और छूटते ही उससे पूछा कि .....अरे यार सोरेन जी ने इस्तीफा दिया कि नहीं...... मित्र ने कहा...यार दस मिनट पहले तक तो ऐसी कोई ख़बर नहीं है.....उसके द्वारा ऐसा कहे जाने पर मुझे खीझ से ज्यादा मज़ा आया....मैंने और भी दोस्तों को फ़ोन घुमाया...सबका जवाब वही था....तब मैंने अपने छोटे भाई,जो उसी वक्त शहर के मुख्या चौराहे से आया था,से वही सवाल किया....तो उसने कहा...नहीं अभी तक तो "उ"इस्तीफा नहीं दिया है......तब मैंने पत्नी से कहा कि भई अभी तक तो "गुरूजी" ही मुख्यमंत्री हैं.....मगर आज ये बता तो दोगी और सवेरे उसके जाने के बाद अखबार मिलेगा.....और हो सकता है कि उसके स्कूल पहुँचने तक कोई और ही मुख्यमंत्री हो.....!!.................ये सब क्या है....क्यूँ है.....??और किस हद तक गहरा है....??हमारे देश के नेता समूचे विश्व में शायद सबसे ज्यादा गालियाँ खाते हैं.....अब तो लगता है....कि बस उनका जनता से सरेआम मार खाना ही बाकि है....!! ऐसा दिख पढता है कि किसी को भी आमद की आहात सुनाई नहीं दे रही है....और गुस्सा दिनों-दिन बढता ही जा रहा है....और यदि ये सच है तो आने वाले दिनों में क्या होने वाला है....ये सोचने से भी भय लगता है....!!
...........सवाल पुनः यही है....कि ये सब क्यूँ हैं...ये सब क्या है....और भारतीय राजनीती में यह सब कितने दिनों तक चलता रहेगा...??और क्या इन नेताओं का....याकि देश के ख़िलाफ़ काम करने वाले तमाम लोगों का निर्णय क्या भारत का अवाम सरेआम लेगा......याकि इसकी सज़ा आख़िर में किसी मध्ययुगीन परम्परा की तरह खौफनाक ढंग से दी जायेगी....??
..............विश्व का सिरमौर बनने के सपने देखता ये देश क्या ऐसे लोगों के साथ आगे बढेगा....??दो-चार क्षेत्रों में कुछ सफलता का स्वाद चखने वाला ये देश क्या सम्पूर्ण रूप में वाकई अनुकरणीय है....??......क्या इसकी वास्तविक समस्या....यानी कि इसके नेता....नागरिक....गन्दगी....गरीबी.....भुखमरी....बे-इमानी.....भ्रष्टाचार... धार्मिक मधान्धता......काहिली....अदूरदर्शिता...और गंदगी के सबसे छिछले स्तर को मात देती राजनीति का कोई वास्तविक निदान निकल भी पायेगा....??
..................मैं और मेरे ऐसे कितने ही लोग इन समस्याओं के पीछे पागल हैं....और इन चिंताओं के पागलपन के साथ अपना जीवन-यापन कर रहे हैं.....क्या हमारे रहनुमाओं को यह जरा भी अहसास है....कि....आम जनता के सीने में क्या घट रहा है.....और जो घट रहा है....वो अगर इसी रूप में सीने से बाहर निकला तो इसका परिणाम क्या होने वाला है...??
Thursday, January 8, 2009
हाय गाफिल हम क्या करें.....??
सांस भी न ले सके,फिर क्या करे...??
सोचते हैं हम...रात और दिन ही ये .....
ये करें कि वो करें,हम क्या करें...??
रात को तो रात चुपचाप होती है....
इस चुप्पी को कैसे तोडें,क्या करें...??
दिन को तपती धुप में,हर मोड़ पर...
कितने चौराहे खड़े हैं हम क्या करें??
सामना होते ही उनसे हाय-हाय....
साँस रुक-रुक सी जाए है,क्या करें??
कित्ता तनहा सीने में ये दिल अकेला
इसको कोई जाए मिल,कि क्या करें??
जुस्तजू ख़ुद की है"गाफिल",ढूंढे क्या
ख़ुद को गर मिल जाएँ हम तो क्या करें??
तीन ग़ज़लें जैसी ही कुछ.....!!
प्यारे दोस्तों.................
नीचे की तीनों पोस्टें आज की मेरी व्यथा हैं....सिर्फ़ मेरी कलम से निकलीं भर हैं....वरना हैं तो हम सब की ही.....जी करता है खूब रोएँ.....मगर जी चाहता है....सब कुछ को....इस जकड़न को तोड़ ही देन.....मगर जी तो जी है....इसका क्या...........दिल चाहता है.....................!!
यः आदमी इतना बदहाल क्यूँ है....??
गर खे रहा है नाव तू ऐ आदमी
गैर के हाथ यह पतवार क्यूँ है...?
तू अपनी मर्ज़ी का मालिक है गर
तिरे चारों तरफ़ यः बाज़ार क्यूँ है...??
हर कोई सभ्य है और बुद्धिमान भी
हर कोई प्यार का तलबगार क्यूँ है....??
इतनी ही शेखी है आदमियत की तो
इस कदर ज़मीर का व्यापार क्यूँ है....??
बाप रे कि खून इस कदर बिखरा हुआ...
ये आदमी इतना भी खूंखार क्यूँ है...??
हम जानवरों से बात नहीं करते "गाफिल"
आदमी इतना तंगदिल,और बदहाल क्यूँ है ??
ज़हर पी के नीले हो गए....!!
लो हमको रुलाई आ गई.....क्या तुम भी गीले हो गए.....??
जिस रस्ते हम चल रहे थे....आज वो पथरीले हो गए....!!
शाम से ही है दिल बुझा....पेडों के पत्ते पीले हो गए....!!
इस थकान का मैं क्या करूँ....जिस्म सिले-सिले हो गए!!
जख्म जो दिल पे लगे....रेत के वो टीले-टीले हो गए....!!
"गाफिल" जिनका नाम है...ज़हर पी के नीले हो गए....!!
आवन लागी है याद तिरी.......!!
आवन लागी याद तिरी.....दिल देखे है ये बाट तेरी.....!!
कौन इधर से गुज़रा है.....अटकी जाती है साँस मिरी....!!
फूल को डाल पे खिलने दो...देखत है इन्हे आँख मिरी .......!!
कितना गुमसुम बैठा है.....बस दिल में इक है याद तिरी....!!
बस इत उत ही तकती है.....आँख बनी हैं जोगन मिरी....!!
किस किस्से को याद करूँ....याद जो आए जाए ना तिरी.....!!
"गाफिल"मरना मुश्किल है...उसको देखे ना जान जाए मिरी....!!
Wednesday, January 7, 2009
नामधारी जी, बारह अजूबों से कहां अलग हैं आप?
विष्णु राजगढ़िया दैनिक हिंदुस्तान के रांची संस्करण में झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष श्री इंदर सिंह नामधारी के विचारों को लगातार कई दिनों तक प्रमुखता से प्रकाशित किया गया. बारह अजूबे झारखंड के शीर्षक इस श्रृखंला में श्री नामधारी ने उन सारे बिंदुओं को बखूबी उजागर किया है जो आज हर नागरिक के लिए चिंता का विषय है. लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि आज जो कुछ भी है, उसकी नींव एकदम इन्हीं रूपों में रखनेवालों में श्री नामधारी जी का भी नाम है. झारखंड बनने के बाद लंबे समय तक वह झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष रहे. इस नाते उन्हें अवसर था कि लोकतंत्र के इस मंदिर को एक प्रतिष्ठाजनक संस्थान का दरजा देते हुए जनाकांक्षाओं का प्रतिबिंब बनाते. इसके बदले खुलेआम सारी मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाते हुए जिस तरह इसे मदिरालय में बदल दिया गया, उसके कुछ नमूने मैं पेश कर रहा हूं. यह सारी चीजें माननीय श्री नामधारी जी के अध्यक्ष काल की हैं जिसे उनके बाद आने वाले अजूबे बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं-
झारखंड विधानसभा में हुई नियुक्तियों में पारदर्शिता और नियमों के अनुपालन की धज्जियां उड़ायी गयीं. इस पर लगातार सवाल उठे, आंदोलन हुए, अदालती कार्रवाई हुई. इसके बावजूद तरह-तरह की धांधली के रिकार्ड बना दिये गये. किस तरह के पद सृजित करके कैसे लोगों को नियुक्त किया गया और उन्हें कैसे प्रोन्नतियां दी गयीं, ऐसे हर प्रसंग चिंताजनक हैं. बाद के दौर में नियुक्तियों के लिए पैसों के लेन-देन संबंधी मामलों पर चला विवाद तो सच्चाई का बेहद छोटा अंश है.
झारखंड विधानसभा में अधिकारियों और कर्मचारियों की प्रोन्नति में योग्यता, प्रक्रिया और समयसीमा, हर चीज का खुल्लमखुल्ला मजाक उड़ाकर पूरी तरह से मनमानी की गयी. कुछ खास कृपापात्रों को तो एक ही दिन में दो-दो और तीन-तीन बार प्रोन्नति दे दी गयी. सुबह जो आदमी चपरासी था, दोपहर में क्लर्क और शाम तक अफसर बन गया. अखबारों में खबरें छपीं. शर्म उनको मगर नहीं आयी.
झारखंड विधानसभा परिसर में अनगिनत दुकानें, कैंटिन वगैरह हैं. समानता के अधिकार के नाते हर बेरोजगार को हक है कि वह उसे हासिल करने की प्रक्रिया में शामिल हो. लेकिन इनका आबंटन चोरी चुपके अपने चहेतों के बीच कर दिया गया. फिर, इन दुकानों से किराये की वसूली करके इसे जनता के खजाने में जमा किया जाना चाहिए था. लेकिन कितनी वसूली हुई और किसके खजाने में गयी, यह सवाल ही बना रह गया.
झारखंड विधानसभा परिसर में 32 कमरों का एक वातानुकूलित गेस्ट हाउस है जो जनता की खून-पसीने की कमाई के खरचे से चलता है. इस गेस्ट हाउस से मिले किराये की पूरी रकम सरकार की ट्रेजरी में जमा करने का नियम है. लेकिन बेहद मामूली रकम जमा की गयी. शेष रकम कहां गयी, कोई बतानेवाला नहीं. कमरों के किराये के लिए जाली सरकुलर के जरिये एक सौ रुपये के बदले तीन सौ रुपये वसूले गये और रसीद भी जाली थमा दी गयी.
झारखंड विधानसभा के सत्र के दौरान माननीय सदस्यों और अधिकारियों के बीच महंगे उपहार बांटे जाते हैं. ये उपहार किस बजट से बांटे जाते हैं और यह राशि कहां से आती है, यह हरदम विवाद का विषय रहा. स्व. महेंद्र सिंह ने हमेशा इस पर सवाल उठाये और लेने से इंकार किया. उनके पुत्र विनोद सिंह आज उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. विधानसभा अध्यक्ष के नाते श्री नामधारी ने सिर्फ इस एक मामले पर नैतिकता का परिचय दिया होता तो शायद हम जनप्रतिनिधियों से बेहतर भूमिका की अपेक्षा कर रहे होते.
मामले और भी हैं लेकिन यहां प्रस्तुत समस्त बिंदुओं पर मीडिया पर लगातार खबरें आयीं हैं और सूचना के अधिकार के जरिये इनके बारे में दस्तावेज हासिल करने के बाद ही इन पर खुलेआम लिखा गया है. ये मामले किताबों और इंटरनेट की भी शोभा बढ़ाते रहे हैं. लेकिन झारखंड विधानसभा की चुप्पी स्वयं गवाह है कि सूचना का अधिकार आने के बाद अब संसदीय विशेषाधिकार के डंडे से लोकतंत्र को हांकना थोड़ा मुश्किल हो गया है. आज जिस तरह एक नागरिक की जनहित याचिका ने मंत्रियों की अकूत संपति को जांच के घेरे में ला दिया है, वैसी पहल झारखंड विधानसभा से जुड़े मामलों में भी संभव है. कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के जरिये विगत आठ बरस के ऐसे विषयों के दस्तावेज हासिल कर सकता है और हर मामले की न्यायिक अथवा सीबीआइ जांच की मांग लेकर अदालत की शरण में जा सकता है. यह जरूरी है ताकि यह बात साफ हो सके कि झारखंड में लूट और बेशरमी की इस पौध की नींव कब किसने कहां और कैसे रखी. झारखंड के अन्य अजूबों पर ताबड़तोड़ कलम चलानेवालों को यह बताना चाहिए कि वे कहां भिन्न हैं.
(लेखक झारखंड आरटीआइ फोरम, रांची के सचिव हैं। यह पत्र दैनिक हिंदुस्तान के रांची संस्करण में 5 एवं 6 जनवरी 2009 को प्रकाशित हो चुका है।)
Life is ten percent what you make it...
Dr Bharti Kashyap'One day I hopped in a taxi and we took off for the airport. We were driving in the right lane when suddenly a black car backed out of a parking space right in front of us. My taxi driver slammed on his brakes, skidded, and missed the other car by just inches! The driver of the other car whipped his head around and started yelling at us. My taxi driver just smiled and waved at the guy. He was really friendly. So I asked, 'Why did you just do that? This guy almost ruined your car and sent us to the hospital.' This is when my taxi driver taught me what is called :
'The Law of the Garbage Truck.'
He explained that many people are like garbage trucks. They run around full of garbage, full of frustration, full of anger, and full of disappointment. As their garbage piles up, they need a place to dump it and sometimes they'll dump it on you. Don't take it personally. Just smile, wave, wish them well, and move on. Don't take their garbage and upset your self, or take it on other people at work, or home. The bottom line is that successful people do not let garbage trucks take over their day. Life's too short to wake up in the morning with regrets. So ... Love the people who treat you right. And, love the ones who don't. Life is ten percent what you make it and ninety percent how you take it! Have a blessed, garbage-free day.'
Keep smiling...
Saturday, January 3, 2009
यही तो जीवन है.....!!!!

Friday, January 2, 2009
नये साल की सबसे अच्छी खबर टेलीग्राफ के पास
नये साल में खबरों की खबर अगर किसी अखबार में दिखी, तो वो न तो प्रभात खबर में थी, नहिन्दुस्तान में और न ही दैनिक जागरण में, मेरे ख्याल से सबसे अच्छी खबर थी टेलीग्राफ के पास। चंद्रजीत मुखर्जी की खबर (Army ruins Dassam party) में बहुत ही करीने से इस सच्चाई से रू-ब-रू कराया गया कि आम आदमी की औकात क्या है। कहीं पुलिस वाले, कहीं नेता, कहीं बड़े अधिकारी, तो कहीं सेना का दबदबा। आदमी के लिए अभिजात्य वर्ग के सामने घुटने टेकने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।पहली जनवरी को यूं तो पिकनिक और धूम-धड़ाके की खबर हर अखबार में दिखी, लेकिन टेलीग्राफ की यह खबर ज़रा हटकर इसलिए थी, क्योंकि इसमें यह बताया गया था कि दसम फॉल को किस तरह आर्मी के एक ब्रिगेडियर के मेहमानों के लिए जवानों ने पूरी तरह से कब्ज़े में कर लिया था। जिस स्थल से फॉल का सबसे मनोरम दृश्य दिखाई देता है, उसे जवानों ने कैप्चर किया वहां किसी आम आदमी को जाने की इजाजत नहीं दी। यह सबकुछ हुआ 14 सिख रेजिमेंट के डेप्युटी जेनरल आफिसर कमांडिंग ब्रिगेडियर पीके राय के मेहमानों को खुश करने के लिए। सिख रेजिमेंट के जवान सुबन नौ बजे ही दसम फॉल पहुंच चुके थे। इन्होंने तम्बू गाड़कर ऎसी बैरिकेडिंग की कि जिस स्थान पर पचास लोग आराम से खा-पी सकें, वहां परिंदा भी पर ना मार सका। बाकायदा टेबुल और कुरसी लगाकर मेहमानों के लिए लजीज वंयजन परोसे गये। वहां से आने-जाने वाले आम लोग हसरत भरी निगाहों से सेना के रसूख को देख कर मन ही मन अपने आम आदमी होने की मातमपूर्सी कर रहे थे। जब कुछ आम लोगों ने जवानों से यह गुजारिश की कि उन्हें थोड़ी देर के लिए उस स्थान पर जाने दिया जाये जहां आम लोगों के पैसे से राज्य सरकार ने फॉल साइट स्पॉट बनाया है, तो जवानों ने लोगों को साफ इंकार करते हुए कहा कि किसी को वहां तब तक नहीं जाने दिया जायेगा, जबतक वहां "साहब" मेहमान हैं। सैन्य अधिकारी के मेहमान जब कॉफी और जूस का मज़ा ले रहे थे, उस वक्त आम लोग टावर से खदेड़े जा रहे थे। एक जवान ने कहा - 'हम वही कर रहे हैं, जो हमें करने को कहा गया है। हमने 9 बजे ही इस जगह को बुक कर लिया था।' एक पर्यटक श्यामल कार कहते हैं - 'दसम फॉल किसी की जागीर नहीं। क्या हमें सिर्फ इसलिए इस स्थल से दूर रखा जा रहा है, क्योंकि हम सिविलियन हैं।' सुधांशु वर्मा ने भी कुछ इसी तरह अपने गुस्से का इज़हार किया। दूसरी ओर टेलीग्राफ ने जब ब्रिगेडियर राय से बातचीत की, तो उन्होंने इस बात से इंकार किया कि उनकी ओर से जवानों को कोई निर्देश दिये भी गये थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी जवान को यह नहीं कहा गया था कि किसी आम आदमी को रोका जाये।
Thursday, January 1, 2009
आहा नया साल...............२००९.........!!??

