Monday, August 31, 2009

अब मैं केवल तीन ब्लॉगों में ही लिखूंगा

मैं भूत बोल रहा हूँ!!
मेरे प्यारे-प्यारे-प्यारे-प्यारे और बेहद प्यारे दोस्तों.........
आप सबको इस भूतनाथ का बेहद ह्रदय भरा प्रेम.........दोस्तों पिछले समय में मुझे मिले कईयों आमंत्रणों में में मैंने कुछ आमंत्रणों को स्वीकार कर अनेक ब्लॉग में लिख रहा था.....बेशक एक ही आलेख हरेक ब्लॉग में होता था....आज अपनी एक ब्लागर मित्र की आज्ञा या यूँ कहूँ कि एक प्यारी-सी राय मान कर अपने को आज से सिर्फ़ एकाध ब्लाग में सीमित किए दे रहा हूँ...ये ब्लॉग कम्युनिटी ब्लोगों में "कबीरा खड़ा बाज़ार में","रांची-हल्ला" और मेरा ख़ुद का एक मात्र निजी ब्लॉग "बात पुरानी है" तक ही सीमित रहेंगे....!!
बाकी ब्लॉगों के सम्पादकों से मेरा अनुरोध हैं....कि मेरा यह अनुरोध शीघ्रता-पूर्वक स्वीकारते हुए मुझे तुंरत अपने ब्लॉगों से हटा दें.....इतनी जगहों पर एक आलेख भी चस्पां कर पाने में मैं ख़ुद को असमर्थ पाता हूँ....हाँ,इतने दिनों तक मुझे आदर और प्रेम देने के लिए मैं तमाम सम्पादकों का आभारी हूँ....आगे के लिए मुझे क्षमा किया जाए....भूतनाथ अब ख़ास तौर पर "बात पुरानी है !!" पर ही पाया जाएगा.....वैसे भी भूतों के लिए पुराना होकर "गया-बीता" हो जन ही उचित होता है.....तो दोस्तों आप सबको मेरे प्रेम के साथ ऊपर बताये गए ब्लॉगों से मेरी विदा.....एक स्नेहिल ह्रदय आत्मा........भूतनाथ
हरकीरत जी आपकी इस प्रेम भरी राय के लिए मैं आपका भी शुक्रिया अदा करता हूँ....दरअसल मैं ख़ुद भी यही करना चाह रहा था....मगर कुछ प्रेमियों के प्रेम के कारण ऐसा कर नहीं पा रहा था....आज आपकी आज्ञा से ये मैं कर रहा हूँ.....................आपको भी धन्यवाद......!!
एक बात आपसे और कहूँ....अभी मुझे भूतनाथ ही रहने दें.....इसके पीछे कोई बात है.....जो मैं बाद में सबको बता पाउँगा.....आज आखिरी बार मैं सभी ब्लॉगों पर दिखायी दूंगा.....!!कल से सिर्फ़ अपने ब्लाग एवं दो कम्युनिटी ब्लॉगों पर ही रहूंगा.....मुझसे कोई गलती हुई हो तो मैं तहे-दिल से खेद प्रकट करता हूँ....और सबसे क्षमा माँगता हूँ.....!!

Sunday, August 30, 2009

जगदीश भाई हुए सम्मानित

बधाइयां भई बधाइयां! रांचीवालों के लिए एक खुशखबरी है। अपने जगदीश भाई हैं न, अरे वो हरदीप जी (मशहूर छाया पत्रकार) के छोटे भाई, उन्हें अमेरिका की एक संस्था एवे हर्ली इलस्ट्रेशन्स ने सम्मानित किया है। दरअसल, उन्होंने एवे हर्ली की एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, जिसमें छायाचित्रों पर रचनात्मक टिप्पणियां करनी थीं। सबसे ज्यादा और सबसे बेशकीमती सुझावों का आकलन इसी संस्था की टीम ने किया और अपने जगदीश सिंह अमृत जी को पुरस्कृत किया है। यह एक ऑन लाइन प्रतियोगिता थी, जिसमें उन्हें सबसे ज्यादा मददगार टिप्पणी करने का श्रेय गया। इसके अलावा पांच श्रेणी की टिप्पणियों में इनका स्थान दूसरा था। पुरस्कार स्वरूप जगदीश भाई को मेन्सफील्ड, अमेरिका निवासी प्रख्यात महिला चित्रकार एवे हर्ली की पेंटिंग्स के फोटोग्राफ मिले हैं, जिन पर खुद एवे हर्ली ने अपने ऑटोग्राफ दिया है। जगदीश भाई को एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 22 फोटोग्राफ मिले हैं। भई उन्हें तो 17 तारीख को ही यह सम्मान मिल गया था, लेकिन उन्होंने हमसे छुपाकर रखा था, ये तो भला हो रजत दा का, जिनके मुंह से यह निकल गया कि जगदीश भाई को सम्मान मिला है। जगदीश जी को रांचीहल्ला की ओर से लख-लख बधाइयां। और उनसे लड्डू खायेंगे, आज नहीं तो कल...।


Friday, August 28, 2009

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

आज ब्लॉग्गिंग में कोई नौ महीने होने को हुए....मैं कभी किसी झमेले से दूर ही रहा....सच तो यह है....महीने-दो-महीने में ही मैंने ब्लोग्गरों में इस ""टोलेपन"" को भांप लिया था....और इस बात की तस्दीक़ रांची में हुए ब्लोग्गर सम्मेलन में भी भली-प्रकार हो गयी थी.........मैं किसी से ना दूर हूँ ना नज़दीक..........आज पहली बार किसी भी ब्लॉगर की पोस्ट पर इतनी ज्यादा देर ठहरा हूँ...!!....शायद आधे घंटे से भी ज्यादा.......पूरी पोस्ट और हर एक टिप्पणी पर ठहर-ठहर कर सोचते हुए बहुत से विचारों का कबाड़ा मैंने भी अपने दिमाग में इकठ्ठा कर लिया था.......और सोचा कि ना जाने क्या-क्या कुछ लिख मारूंगा.....मगर कविता वाचक्नवी जी की टिप्पणी पर पहुँचते ही सारी बातें अपने-आप ही व्यर्थ हो गयी......और यह सब समय की ऐसी-की-तैसी करना लगा.......बेशक आपके मुद्दे बिलकुल सही हैं....तथ्यवार हैं......और गंभीरता-पूर्वक "सोचनीय" भी....मगर जैसा की कविता जी ने कहा.....अन्त में, यही सत्य है कि जो जितना खरा होगा उतना दीर्घजीवी होगा। कालजयी होने के लिए काल पर जय पाने में समर्थ सर्जना अश्यम्भावी होती है वरना समय की तलछट में सब कुछ खो जाता है......सारी बातों का यही विराम है.......!!
.......मैं ऐसा मानता हूँ....जब तक आदमी है.....उसमें ""टोले"" बनाने का भाव रहेगा ही....क्योंकि ""टोलों"" में सुरक्षा होती है.......पहले पशुओं से थी....फिर प्रकृति से..... फिर अन्य समाजों से.......या अन्य किस्म के ""टोलों"" से.......फिर राज्यों या देशों से....!!!!.....और अब..... अब, अपनी ही भाषा बोलने वाले....लिखने वाले....की विभिन्नताओं से....विभिन्न किस्म की "सोचों" से....!!....रचनाकर्म सर्जन-धर्मिता या सृजनात्मकता नहीं.......बल्कि विभिन्न तरह के "वाद" हैं....!!.....ये "वाद"....क्योंकर बनाए हुए हैं या बनाए जाते हैं....किसके द्वारा बनाए जाते हैं....किसके द्वारा चलाये जाते हैं....कौन से लोग कौन से स्वार्थों से इन "वादों"को पोषते हैं.....सृजन-कर्म सिर्फ एक कला-कर्म ना होकर "वादों की बपौती" क्यों हैं.....और क्यों पसंदीदा चीज़ों के ""टोले"" निर्मित हो जाते हैं....???.....और उनसे विलग दूसरी चीज़ें क्यों उपेक्षा का शिकार बन जाती हैं....??....किन्हीं लोगों के निजी संस्मरण क्यों प्रशंसा पाते हैं...?? और क्यों अच्छी-से-अच्छी बात लोगों के गले नहीं उतरती....!!.....लोगों में देश को बनाने और उसके लिए कुछ कर जाने वाली संजीदा चीज़ें भी क्यों घर नहीं कर पाती...और अन्य मनोरंजनात्मक चीज़ें कैसे "लिफ्ट" होती हैं....!!....क्या लोगों में उपयुक्त संजीदापन नहीं है....या कि भारत के ब्लागर अभी उतने "समझदार" नहीं हुए हैं....या....कि अभी पाठकों का एक बड़ा वर्ग संजीदा चीज़ों से अभी-तक ""अ-जानकार"" है....ऐसे बहुत से ब्लॉग मेरी दृष्टि से होकर निकले हैं जिनके कंटेंट अद्भुत रहे हैं....यहाँ तक कि भाषा अथवा शैली भी....मगर वहां पर हमरे ब्लोगर टिप्पणीकार नहीं दिखे....और अन्य किसी हल्के-फुल्के ब्लॉग पर मस्ती से टिपियाते दिखाई दिए....!!! या कि एक दुसरे को टिपियाकर आत्मरति का सुख लेने का भाव है हम लोगों में.....यहाँ तक कि मैंने अब तक जो भी आलोचनात्मक टिप्पणियां की वहां विशुद्द रूप से सामने वाले को ऊपर उठाने के भाव से यथोचित उचित राय ही दी,कभी किसी को ब्लॉगपर गाते सुना तो उसके बेसुरेपन पर भी उसको चेताया....जबकि वहां बाकि सारे लोग उसकी प्रशंसा में "आत्मरत" थे....और तुर्रा यह कि उक्त ब्लोगर ने मेरे ब्लॉग पर ही आना छोड़ दिया....इससे यह भी इंगित है कि हम सिर्फ प्रशंसा ही चाहते हैं....और इसे पाने लिए हम दूसरों के ब्लॉग पर अपनी प्रशंसा का ""इनवेस्टमेंट""करते हैं....मगर मैं तो भूत हूँ........ मैं सदा ""जो है""....वैसा ही कहकर लौटता हूँ.....बेशक कुछ वक्त लगे....मगर सही बात समझने की तमीज ब्लोगर को आएगी ही.....!!.......
........आवेश.....जहां तक मैं जानता हूँ.....आदमी मनोरंजन पहले पसंद करता है....संजीदगी उसके बाद....और ब्लॉग्गिंग करने वाले लोग भगवान् की दया [अरे-रे-रे क्या बोल गया मैं....भगवान नहीं भाई{सांप्रदायिक हो जाएगा ना....!!}.....उपरवाले की दया] से ""पेट से भरे हुए हैं....और भरे पेट में दुर्भाग्य वश खामख्याली ज्यादा आती है....संजीदगी कम....अरे-अरे-अरे खुद मैं इससे अलग थोडा ना कर रहा हूँ.....फिर एक बात और भी तो है....कि उपरवाले सबके कान में यह फूंककर नीचे भेजा है कि भैया तू ही सबसे श्श्रेष्ठ है.....तुझसे बेहतर कोई नहीं....(तेरी कमीज़ से ज्यादा और कोई कमीज़ सफ़ेद नहीं.......!!)
आवेश भाई.....!!!......नेट पर हम सब अपने-अपने काम के बीच या सारा काम-धाम निबटा कर आते हैं.......काम के बीच हो या काम के बाद........दिल को मनोरंजन ही चाहिए होता है....और ब्लॉग्गिंग के नाम पर हम मनोरंजन ही कर रहे हैं........बल्कि साफ़-साफ़ कहूँ तो मनोरंजन ही कर रहे हैं.......ब्लॉग्गिंग तो इसके बीच कहीं-ना-कहीं हो जा रही है....मुई इतना के बाद भी ना होगी......तो भला कब होगी.......!!........इतना कहने के बाद मैं यह कह कर अपनी समाप्त करना चाहता हूँ....कि मेरी इस बात से कोई सहमत ना भी हो तो मुझे कतई माफ़ ना करे...क्योंकि यह तो खुला विद्रोह है भई....ऐसे बन्दे को तो ब्लॉग्गिंग की राह से सदा के लिए हटा ही देना ही चाहिए....!!.....और ऐसी बातों की चुनौतियों को मैं भूतनाथ अपने पूरे होशोहवास के साथ स्वीकार करता हूँ....!!.....आवेश तुमने शुरुआत कर दी है....तो इसकी इन्तेहाँ अब मैं करूंगा....बेशक मुझे यहाँ से हट ही क्यों ना जाना पड़े....!!

Thursday, August 27, 2009

काहे कि हम कुछो नहीं समझे हैं.....

भवंरा भवंरा आया रे,
गुनगुन करता आया रे,
फटाक फटाक.....
सुन सुन करता गलियों से अब तक कोई न भाया रे
सौदा करे सहेली का,
सर पे तेल चमेली का,
कान में इतर का भाया रे....
फटाक फटाक...

गिनती न करना इसकी यारों में,
आवारा घूमे गलियारों में
चिपकू हमेशा सताएगा,
ये जायेगा फिर लौटा आएगा,
फूल के सारे कतरे हैं,
जान के सारे खतरे हैं...
कि आया रात का जाया रे...
फटाक फटाक.....

जितना भी झूठ बोले थोडा है,
कीडों की बस्ती का मकौड़ा है,
ये रातों का बिच्छू है कटेगा,
ये जहरीला है जहर चाटेगा...
दरवाजों पे कुंडे दो,
दफा करो ये गुंडे,
ये शैतान का साया रे....
फटाक फटाक...

ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
ये नैया डूबे न
ये भंवरा काटे न.....

अरे भाई बात इ है कि हिंदी-युग्म के आवाज़ में हम इ गीत सुने रहे ...उहाँ टिपिया भी दिए हैं कि बाबू हमको इ गीतवा नहीं समझ में आया है......और तब से हम अपना माथा खोजा-खोजा के थक गए हैं ...अभी तक हमरा पल्ले कुछो नहीं पड़ा है.....
इ गुलजार बाबु का फरमा रहे हैं......आपलोग तो बहुते गुनी जन हो .....गीत-गोबिंद का समझ भी रखते हैं ...हम ठहरे लिख-लोढ़ा पढ़-पत्थर टाइप का जंतु ....हमको ऐसा आदमी चाही जे एक-एक लाइन का मतलब बतावे कि इ है का ???
सुने है कि ऐड्स के प्रति जागरूक करे वास्ते इ सब फंडा हुआ है....लेकिन हम को कोई इ समझावे कि इ में का बात ऐसन है जिसको सुन के बात समझ में आ गयी कि इ ऐड्स की जागरूकता की बात कर रहा है......
हम थोड़ा-मोड़ा पढ़े हैं भाई (M.Sc Zoology, B.ED., M.C.A), और कुछ-कुछ भाषा का भी ज्ञान है.....
असरानी इश्टाइल में हमरे दीमग्वा में भी येही बात घूम रहा हैं कि जब हम नहीं समझे तो 'उ लोग' का समझ जावेंगे ???.....कि खाली 'फटाक-फटाक' पर कूद-फांद कर बैठ जावेंगे.......आखिर कोई एन.जी.ओ. के सौजन्य से इ बना है तो भाई संदेशवा तो ठीक से मिलना चाही कि नाही.......

'ये जायेगा फिर लौटा आएगा'

कौन जावेगा और कौन लौट आवेगा ????
मरीज ?
बीमारी ?
तो आप सब गुनी जानो से हमरी प्रार्थना है कि समझा दीजिये हमको काहे कि हम कुछो नहीं समझे हैं.....

Saturday, August 22, 2009

ऐ भारत !! चल उठ ना मेरे यार !!

ऐ भारत !! चल उठ ना मेरे यार !!




"ए भारत ! उठ ना यार !! देख मैं तेरा लंगोटिया यार भूत बोल रहा हूँ.....!!यार मैं कब से तुझे पुकार रहा हूँ....तुझे सुनाई नहीं देता क्या....??"

"यार तू आदमी है कि घनचक्कर !! मैं कब से तुझे पुकार रहा हूँ....और तू है कि मेरी बात का जवाब ही नहीं देता...!!"
"अरे यार जवाब नहीं देता, मत दे !! मगर उठ तो जा मेरे यार !! कुछ तो बोल मेरे यार....!!"
"देख यार,हर बात की एक हद होती है...या तो तू सीधी तरह उठ जा,या फिर मैं चलता हूँ....तुझे उठाते-उठाते मैं तो थक गया यार....!!"
"हाँ,देख मेरे चलने का उपक्रम करते ही कैसा करवट लेने लगा है तू....अबे तू सीधी तरह क्यूँ नहीं उठ जाता है मेरे यार....बरसों से मैं तुझे जगा रहा हूँ....सदियों से मेरे और भी दोस्त तुझे उठाते-उठाते खुद ही उठ गए....!!...मगर तू है कि तुझ पर जैसे कोई असर ही नहीं होता.....क्यों बे तूने ये ऐसी-कैसी मगरमच्छ की खाल पायी है....??"
"मेरे दोस्त !! तुझसे बातें करना मुझे बड़ा अच्छा लगता है,इसीलिए तो बार-बार तेरे पास आ जाता हूँ मैं....और तू है कि इतना भाव देता है कि गुस्से से मेरी कनपटी तमतमा जाती हैं..देख मेरे जैसा प्रेमी तुझे कहीं नहीं मिलने वाला,और ज्यादा भाव मारेगा ना तो मुझे भी खो बैठेगा तू....!!"
"अरे...!! ये क्या....!! तेरी तो आखें डबडबा आयीं हैं....!! अरे यार,क्या हुआ तुझे....??अरे कम-से-कम मुझे तो कुछ बता मेरे यार !!"
"ओ...!! तो ये बात है !! यार यह तो कब से ही जानता हूँ....मगर यार मेरा बस ही कहाँ चल पाता है तेरे परिवार पर....तेरी संतानों पर !!...कहने को मैं भी एक तरह से तेरी संतानों में से ही एक हूँ...इतना चाहता है तू मुझे...!! उसके बाद भी तेरे परिवार के विषय में...तेरी पारिवारिक समस्याओं के विषय में कुछ कर ही नहीं पाता मैं...यार मैं क्या भी क्या करूँ, तेरे तमाम बच्चे इतने ज्यादा उच्च-श्रंखल हैं कि मेरा तनिक भी बस उनपर नहीं चल पाता...बल्कि वो मुझसे ऐसे किनाराकसी करते हैं कि जैसे मुझे पहचानते ही नहीं..जैसे मैं उनका कोई नहीं !!"
"क्या कहा,मैं अपनी पूरी ताकत से चेष्टा नहीं करता....??नहीं मेरे यार पूरी कोशिश करता हूँ....अब किसी से लड़-झगड़ थोडी ना सकता हूँ....अगर ऐसा करूँ तो मेरे दिन-रात...और यह सारी जिंदगी लड़ने-झगड़ने में ही ख़त्म हो जाये....मैं क्या करूँ यार...तेरे बच्चे ही बड़े अभिमानी,चालक,धूर्त,मक्कार,लालची और व्यभिचारी है...!!"
"नहीं यार !! मैं तेरे बच्चों को धिक्कार नहीं रहा...तेरा दोस्त हूँ मैं...तुझे वस्तु-स्थिति से मैं ही अवगत नहीं कराउंगा तो भला कौन कराएगा...??"
"देख !! इसमें ऐसा कोई क्रोधित होने की बात भी नहीं है...अपने परिवार के बारे में ऐसा कुछ सुनकर सभी को कष्ट होता है....वैसे यार मैं तेरे गुस्से का तनिक भी बुरा नहीं मानता मेरे यार...!! मैं तो तेरा प्रेमी हूँ और इस जन्म की आखिरी सांस तक तुझ से चिपका रहूंगा.....बल्कि बार-बार तेरे घर में ही जन्म लूँगा....!!
"हाँ एक बात और....वो यह कि मेरा तुझसे यह वादा है कि मैं कभी किसी जन्म में भी असल में तो क्या, सपने में भी तेरा मान-मर्दन करने या तेरी धन-संपत्ति लूटने,या तेरे बच्चों को आपस में लड़ाने,या तेरी बच्चियों के साथ व्यभिचार करने, या किसी भी रूप में तुझे लूटने-खसोटने के व्यापार या उपक्रम में नहीं लगूंगा....!!"
"नहीं यार मैं झूठ नहीं बोलता....और यह बात तू अच्छी तरह जानता भी है....ये अलग बात है कि मैं ऐसा कुछ कर नहीं पा रहा कि तू मुझपर गर्व कर सके....या ऐसा कुछ नहीं पा रहा कि तेरा मनोबल बढे....और तू पहले की तरह सोने-चांदी से लहलहा उठे...तू फिर दूध भरी नदियों से लबालब हो सके....तू फिर ऐसा इक पेड़ हो जाए...जिसकी हर टहनी पर सोने की चिडिया फुर्र-फुर्र करती बोलती-बतिया सके....!!"
"हाँ यार, तू ठीक कह रहा है.....अब तेरी पहली चिंता यह नहीं है, बल्कि यह है कि कैसे तेरी हर संतान को भोजन नसीब हो सके...कैसे तेरा हर बच्चा सुखपूर्वक जीवन-यापन कर सके....यार मेरे मैं जब भी तुझे ऐसा चिंतित देखता हूँ तो मेरी भी आँखें भर-भर आती हैं....मगर धन-बल से मैं इतना समर्थ ही कहाँ कि तेरी समस्त संतानों को यह सब प्रदान कर पाऊं....फिर भी मेरे यार, मुझसे जो भी बन पड़ता है...अवश्य करता हूँ...सच यार....भगवान कसम !!"
"देख हर जगह ऐसा होता है...और तू भी जानता है कि पाँचों उंगलियाँ बराबर तो नहीं ही होती....!!"
"हाँ यार...!! इतना अधिक फर्क कि अरबों बच्चे तो भूखे मरे...और कुछेक बच्चे इतना-इतना डकार जाएँ कि उनको हगने की भी जगह ना मिले....!!...बात तो तेरी एकदम दुरुस्त है... लेकिन कोई इस बारे में क्या कर सकता है....बता ही तो सकता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा...और कोई हजारों-लाखों-करोडों-अरबों बार कहने के बावजूद ना माने तो...तो फिर कैसे क्या हो....कैसे यह सब कुछ बदले...कैसे यह सब ठीक हो....और कैसे तू सही तरह से हंस भी पाए....!!"
"हाँ यार तेरी बात बिलकुल सच्ची है, बल्कि सोलह तो क्या बीस आना खरी है कि ये जो बच्चे हैं...ये इस बात पर तो सदा गर्व करते हैं कि किसी जमाने में तू कितनी बड़ी कद-काठी का था...और उनके माँ-बाप के माँ-बाप....यानि कि उनके समस्त पूर्वज तुझपर अपने जीवन से बहुत-बहुत अधिक फक्र महसूस करते थे....बहुत अभिमान महसूस करते थे...मगर पता नहीं इन्हें यह क्यों नहीं समझ आता कि इनके पूर्वज भी तो अपने माँ-बाप यानि कि तेरे लिए...तेरा भाल ऊपर उठाने के कितना-कितना यत्न करते थे....कितना खटते थे...कितना व्याकुल रहते थे इस बात के लिए कि उनकी किसी गलती से तेरा सर नत-मस्तक ना हो जाए....!!"
"बेशक तू कुछ नहीं कह पाता यह सब मगर मैं तेरी बात समझता हूँ मेरे यार,मगर मैं सब समझता हूँ....तेरी हालत मुझसे कभी छिप नहीं पाती....और मैं तुझे यह वचन देता हूँ....कि आने वाले दिनों में मुझसे जो कुछ भी बन पड़ेगा....अवश्य-अवश्य-अवश्य करूंगा....करता तो मैं अब भी हूँ मेरे यार, भले सार्वजनिक-या सामाजिक रूप से या ढिंढोरा पीट-पीट कर नहीं,मगर ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि मैंने तेरे बारे में कुछ भी बुरा सोचा हो...या तुझसे जान-बूझकर बुरा किया हो....या ऐसा कुछ भी करने की चेष्टा की हो जिससे मुझे तो फायदा और तुझे हानि होती हो....!!!!"
"अच्छा यार ,अब चलता हूँ मैं !! बच्चों को स्कूल से लेकर आना है ,लेकिन मैंने तुझसे जो वादा किया है ,वो मैं अवश्य निभाउंगा....और हाँ मैं यह भी कोशिश करूँगा कि तेरे इस आँगन में तेरे सारे बच्चों को एक साथ खडा कर दूँ कि तेरी सारी सतानें ना सिर्फ़ बिना लड़े-झगडे एक साथ रह सकें...बल्कि वो एक दूसरे के दुःख दर्द में शामिल भी हो सकें,एक समाज में रहते हुए कोई कहीं भी भूखा ना मर सके !!"
"एक काम मगर तो किसी भी तरह तू मेरा भी कर दे ना....वो यह कि तेरी संतानें तुझसे कम-से-कम इतना तो प्रेम करें कि उन्हें तेरी इज्जत अपनी इज्जत लगे....तेरा दर्द अपना दर्द लगे....और तेरी सारी संतानें उन्हें अपने ही सगे भाई-बहन....!! बस इतना भर हो जाए तो मेरा काम आसान हो जाएगा...!!"
"बाकि तू और मैं चाहे कुछ कर सके या ना कर सके...मगर मुझे यह उम्मीद है कि आखिरकार ये सारे लोग एक दिन ठोकर खाकर संभल जायेंगे....और सच बताऊँ मेरे यार....ठोकर खाकर भी ना संभले तो किधर जायेंगे....
जाते जाते एक शेर कहीं सुना था उसे तुझे सुना जाता हूँ...
मैंने तुझसे चाँद-सितारे कब मांगे....
रौशन दिल बेदाग नज़र दे या अल्लाह !!" अब चलता हूँ मेरे यार मेरे प्यार !!"

Friday, August 21, 2009

पचास नागरिकों को मिलेगा आरटीआइ सिटिजन अवार्ड

सूचना कानून की चैथी वर्षगांठ पर झारखंड के पचास नागरिकों को
आरटीआइ सिटिजन अवार्ड दिया जायेगा। इसके लिए नामांकन 15 सितंबर तक
आमंत्रित हैं। झारखंड का कोई नागरिक स्वयं अपने लिए अथवा किसी अन्य के
लिए नामांकन भेज सकता है। इसके लिए सूचना कानून के तहत किये गये कार्यों,
सफलता के विवरण एवं संबंधित दस्तावेजों की फोटो कापी के साथ अपना पूरा
पता, फोन नंबर, ईमेल पता इत्यादि भेजना होगा। यह घोषणा झारखंड आरटीआइ
फोरम के अध्यक्ष बलराम एवं सचिव विष्णु राजगढ़िया ने की है।
नामांकन भेजने का पता है-
झारखंड आरटीआइ फोरम, 4-सी, घराना पैलेस, संध्या टावर, पुरलिया रोड, रांची।
विशेष जानकारी आरएन सिंह से 9430246440 नंबर पर मिलेगी।
rtistory.blogspot.com तथा rti.net.in पर भी जानकारी मिलेगी।
ई-मेल पता है- rtistory@gmail.com

Wednesday, August 19, 2009

गार्गी जी के ब्लॉग से लौट कर.....{भूतनाथ}



मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
हम्म्म्म्म्म्म्म.....ये गार्गी को क्या हो गया भई....??....ये तो ऐसी ना थी....!!....अब मैं देखता हूँ तो क्या देखता हूँ,कि मैं एक गीत हुआ गार्गी के बाल सहला रहा हूँ.....और उसे बस इक चवन्नी भर मुस्कुराने को कह रहा हूँ.....
".....पगली है क्या....हंस दे ज़रा....!! "
.....जीवन है ऐसा.....गम को भूला....!!

......लोगों का क्या....ना हों तो क्या...!!
.....गुमसुम है क्यूँ....सब कुछ भुला...!!
.....जीवन है सपना....बाहर आ जा....!!
....चीज़ों का क्या....सब कुछ मिटता....!!
.....खुद में गुम जा....खुद ही है खुदा....!!
....तुझे ए गार्गी....जीना समझा....!!
...रू-ब-रू है"गाफिल"....हाथ तो मिला॥!!
गार्गी.....तेरे पिछले आर्टिकल में भी ऐसे ही विचारों की पदचाप मुझे सुनाई दी थी....मैंने मटिया दिया....किन्तु इस बार तूने आवाज़ देकर मुझे बुला ही लिया तो बताये देता हूँ....लेकिन मैं तुझे बताऊँ....तो क्या बताऊँ भला.....तेरे खुद के शब्दों में तो खुद ही किसी गहराई की खनक है....तू खुद जीवन के समस्त आयामों को समझती है... सच कहूँ तो जीवन में आने वाले तमाम दुःख हमें इक अविश्वसनीय गहराई प्रदान कर जाते हैं....और आगे आने वाली अन्य परिस्थितियों का और भी गहनता से मुकाबला करने के लिए....या कि उनका और और भी मुहं तोड़ जवाब देने के लिए....याकि जीवन बिलकुल ऐसा ही है....बिलकुल इक सपाट परदे-सा....तस्वीरों-सी घटनाएं रही हैं...और जा रही हैं....कोई भी चीज़ दरअसल अपनी नहीं हैं...यहाँ तक कि प्रेम भी नहीं....जिसको आप गहराई का सबसे विराट पैमाना समझते हो....और औरों को भी समझाते हो...!!....दरअसल सच कहूँ....तो इस विराटतम काल में इक मनुष्य के जीवन में घटने वाली तमाम घटनाएं कुछ हैं ही नहीं.....तो दरअसल कुछ है ही कहाँ...चीज़-चीज़ें-घटनाएं-आदमी या कुछ भी दृश्य का साकार होना....दरअसल है ही नहीं....!!और जब हम इसे देख पाते हैं....तब यह हमको चीज़ों-घटनाओं-मानवों को समझने का तमाम भ्रम मिट जाता है....और रह जाता है....सिर्फ-व्-सिर्फ अहम् ब्रहमास्मि का भाव मात्र.....!!....दरअसल अनंत काल में तमाम चीज़ों का होना और ना होना बराबर ही है...सोचो ना कभी....कि अरबों-खरबों (काल की इक छोटी-सी गणना) में हमारे ६०-७० वर्ष के जीवन का होना....!!....हा॥हा...हा...हा ...हा...कितना अहम् हैं इस आदमी-नुमा जीव का....(आदमी-नुमा इसलिए कह रहा हूँ....कि मैं आदमी को आदमी तक नहीं मानता.....क्योंकि ब्रहमांड में तमाम चीज़ें अपनी नैसर्गिकता के साथ हैं....सिर्फ और सिर्फ आदमी नामक यह जीव[ये नाम भी तो इसका खुद का दिया हुआ है]-नैसर्गिक है.....कृत्रिम....अहंकारी....अविवेकी[और खुद को विवेकशीलता का तमगा पहनाये हुए है....??लम्पट कहीं का....!!].....तो खुद के ज़रा-से जीवन को इतना गौरव-पूर्ण मानने वाला यह जीव....सचमुच मेरी नज़र में बड़ा ही अद्भुत है....!!....किसी भी बात से जिसका तर्क सहमत नहीं होता....किसी भी "चीज़"से जिसका ""....जी.....""नहीं भरता....!!.... क्या ऐसा कोई अन्य जीव इस पृथ्वी पर....??....गार्गी....जैसा कि हम जानते हैं....कोई भी चीज़ अपनी नहीं है....और यह भी कि सब कुछ क्षणभंगुर है...तो फिर सब बात तो यही समाप्त है....और इनसे जुड़े हुए विचार भी तब व्यर्थ ही हैं....विचार भी दरअसल हमारी अपनी कल्पना ही होते हैं,.....!!...इसका अर्थ यह भी तो नहीं कि जीवन ही व्यर्थ है....नहीं जीवन का केवल उतना ही अर्थ है....जितना कि हमारे शब्दों के अर्थ....!!.....अलबत्ता यह अवश्य हो कि जीवन की इस क्षण-भंगुरता को देखते हुए.....आदमी नाम के इस स्वनामधन्य जीव में कम-से-कम जीवन के प्रति इतनी तो तमीज हो.....कि वह ब्रहमांड की सारी चीज़ों,चाहे वो निर्जीव हों या सजीव,के प्रति तमीज दिखा सके....सबका सम्मान करना सीख सके....और इस बहाने अपनी नश्वरता का सम्मान भी कर सके....!!!!

Monday, August 17, 2009

तेरे इंतज़ार का ये कमाल हुआ है

Ek shayara kya khoob keh gayi hain:
आज फिर प्यार का इज़हार हुआ है
ये तमाशा तो कई बार हुआ है


जीतने का हुनर हम भूलने लगे
हारने का ग़म बार-बार हुआ है

कत्ल कहीं हुआ अफवाह सुनी थी
मालूम हुआ मेरा दिल हलाल हुआ है

पत्थरों के ढेर लग गए थे भीड़ में
काँच के दिलों से कुछ ज़लाल हुआ है

जाँ निकल गयी आँखों के रास्ते
तेरे इंतज़ार का ये कमाल हुआ है

ज़लाल=गुस्ताखी,ग़लती,भूल

Sunday, August 16, 2009

धर्म जीने देने के लिए है,मिटाने के लिए नहीं......!!

धर्म जीने देने के लिए है,मिटाने के लिए नहीं......!!
सच कहूँ तो इस्लाम क्या,अपितु सभी धर्मों को आत्म-मंथन की तत्काल ही गहन आवश्यकता है,अगर यह समयानुकूल नहीं हो पाया तो समय इसे ग्रस लेने वाला है,सच कहूँ तो टिप्स मेरे पास भी हैं,मगर इस्लाम के अनुयायी-मौलवी आदि किसी भी टिप्स को स्वीकार करने में अपनी हेठी समझते हैं....दरअसल आदमी का अंहकार कभी आदमी को आदमी नहीं बना रहने देता !!
वह अपने ही दुर्दमनीय हाथों का शिकार हो जाता है,इस्लाम आज एक ऐसे मुकाम पर है,जहां से उसे बदलने की तत्काल आवश्यकता है....जैसा कि हर धर्मों में होता आया है...जैसा कि हम जानते हैं,ये सारी चीज़ें इंसान की ही बनायीं हुई हैं....जैसा कि प्रकृति का अपरिवर्तन-शील नियम ही है...सतत परिवर्तन-शीलता...अगर इंसान इसको ना माने तो पीछे मिट चुकी अनेकानेक चीज़ों और जातियों की तरह उसे भी मिट जाना है......इंसान का असल ध्येय है इंसान होकर जीना....और परमेश्वर की कल्पना उसके इसी ध्येय का एक माध्यम !! परमेश्वर है भी तो आपको उसके एक अंश होकर ही जीना है....और उसके अंश की तरह जीने के लिए अपनी ही रूढ़ पड़ चुकी मान्यताओं की बलिवेदी पर इंसान को मौत अपनाने पर विवश कर देना,यह किसी भी धर्म का ना तो कभी उद्देश्य था...और ना कभी हो भी सकता है....अल्लाह हो या भगवान्....इंसान के जीवन में इनकी महत्ता इंसान की सोच को अपार विस्तार प्रदान करने की होनी चाहिए....बेशक दुनिया में कईयों तरह के धर्म गढ़ लिए जाएँ....मगर धर्म के पागलपन की जगह इंसान होने का पागलपन,एक सच्चे इंसान होने का पागलपन अगर इंसान पर तारी हो सके...अगर अल्लाह या भगवान् के बन्दे अल्लाह और भगवान् के अन्य बन्दों को हंसा सके....उनका दुःख दूर करने को अपने जीवन का उद्देश्य बना सकें....तब तो इंसान होने का कोई अर्थ है....इंसान होने में कोई गरिमा है....और भगवान या अल्लाह के वजूद की कोई सार्थकता......!!मगर यह क्या कि अल्लाह या भगवान् ने आपको भेजा तो है जीने और दूसरों को जीने देने के लिए....और आप यहाँ आकर जीवन को मेटते ही जा रहे हो आप शब्दों की जुगाली में जीवन की गरिमा को नष्ट किये जा रहे हो.... कोई गेरुआ...कोई हरा झंडा उठाये बस एक दुसरे को भयभीत किये जा रहा है....यह सब क्या है....??....क्या यही है जीवन.....आधी आबादी यानि स्त्री जात को आप उसका यथोचित सम्मान से वंचित ही नहीं कर रहे....बल्कि उसे कदम-कदम पर अपमानित करते उसे मौत सरीखा जीवन जीने पर विवश किये हुए हो....यह सब क्या है....तरह-तरह की थोथी मान्यताओं आड़ लेकर इंसान के जीवन को तरह-तरह से प्रताडित किये जा रहे हो..यह सब क्या है...??...अगर सच में ही तुम सबके जीवन का उद्देश्य प्रेम ही है,तो वह सिर्फ तुम्हारे पुराणों और कुरानों में शब्दों तक ही सीमित है क्या....वह तुम्हारे जीवन में कब तलक उतरेगा....तुम्हारा जीवन कुरानानुकुल-पूरानानुकुल कब तलक संभव होगा....तुम्हारे मौलवी और पंडित कब एक दुसरे से हाथ मिलायेंगे.....??तुम्हारे जीवन में कब मानवता का उजाला होगा....??जिसे तुम वाकई प्रेम कहते हो,प्रेम समझते हो,वह जैसा भी हो,वह कब तुम्हारे जीवन को असीम ब्रहामान्दनीय-ब्रहमांडनीय चेतना से पुलकित करेगा....??तुम कब मनुष्य जीवन में अपने मानव होने का यथेष्ट योगदान दोगे....??......कुरान और पुराण के समुचित अर्थ को कब अकथनीय विस्तार दोगे....??जीवन एक बहता हुआ दरिया है दोस्तों....धरम अगर तरह-तरह के दरियायों के नाम हैं....तो इंसान होना इक विराट समुद्र....अगर तुम यह समुद्र हो सको तो सारे धरम तुम्हारे भीतर ही सिमट जायेंगे....और अगर यूँ ही दरिया की तरह उफनते रहे तो समूची मनुष्यता तुम्हारी हिंसा की बाढ़ में विनष्ट हो जायेगी....तुम्हें क्या होना है....यह अब तुम्ही तय करो....ओ मनुष्यों.....यह बात इक भूत तुम्हें तार-तार रोता हुआ बोल रहा रहा है....बोले ही जा रहा है....बोलता ही रहेगा....!!!!

जन्नत सा एक पिंजरा बना लीजिये

रौनकें मेरे दिल की चुरा लीजिये.
देना है कुछ मुझे तो सजा दीजिये

लब हैं सूखे हुए जैसे साहिल कोई
आह की इनमें कश्ती चला लीजिये

खिल उठे हैं तसल्ली के बूटे, कई
शाखे-उम्मीद पर भी उगा लीजिये

हैं सदी की कतारों में लम्हे खड़े
गिन नहीं पायेंगे इनको सजा लीजिये

नीम-बाज आँखें कब से हैं सूनी पड़ीं
मुट्ठी भर ख्वाब इनमें छुपा लीजिये

है कहाँ कोई महफूज़ ज़माने में, तो
एक जन्नत सा पिंजरा बना लीजिये

Saturday, August 15, 2009

अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!


क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से आ रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!

वन्दे मातरम्.......................!!!!!







वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम् .
शुभ्र-ज्योत्स्नाम् पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥


सप्तकोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले
के बले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हॄदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राण: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥

Friday, August 14, 2009

यूँ हीं...

ख्याल आते रहे
सोहबत में
ज़रुरत के
ज़िन्दगी गुज़रती रही

इशारों को कैसे
जुबां दे दें हम
मोहब्बत बच जाए
दुआ निकलती रही

रेत के बुत से
खड़े रहे सामने
पत्थर की इक नदी
गुज़रती रही

रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही

बेवजह तुम
क्यों ठिठकने लगे हो
मैं अपने ही हाथों
फिसलती रही

आईना तो वो
सीधा-सादा था 'अदा
मैं उसमें बनती
संवरती रही

Thursday, August 13, 2009

स्वाइन फ्लूः खौफ या बाजारवाद

रजत गुप्ता
इस ब्लाग पर मेरे बहुत स‌ारे मित्र मेरी बात स‌े निश्चित तौर पर असहमत हो स‌कते हैं पर कई दिनों के वैचारिक आलस्य के बाद अंततः मैंने इस चर्चित बीमारी पर अपनी स‌ोच व्यक्त करने का कठोर निर्णय ले लिया। लेख लिखे जाने तक दुनिया भर में 1154 लोगों के इस बीमारी स‌े मारे जाने की खबर है। इनमें स‌े किसी और को दूसरी बीमारी थी या नहीं, इसके आंकड़े उपलब्ध नहीं है पर यह खबर है कि यह एक महामारी के तौर पर दुनियाभर में फैल रही है। इस चर्चित बीमारी के खौफ के बीच मुंगेर में स‌ेलिब्रल मलेरिया स‌े दो दर्जन स‌े अधिक लोगों की मौत की खबर गुम स‌ी हो गयी, जहां स‌ौ स‌े अधिक अब भी इस बीमारी स‌े पीड़ित है। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में भी इसी बीमारी स‌े स‌ैकड़ों लोग बीमार हैं, जिनमें दर्जनों की हालत अत्यंत गंभीर है। 13 (शायद अब 15) लोगों की मौत ने 100 करोड़ स‌े अधिक की आबादी वाले इस देश को क्या वाकई भयभीत कर दिया है या बाजारवाद का नया रियलटी शो का नया हथकंडा हम देख और झेल रहे हैं। चूंकि लेख ब्लाग पर है, इसलिए स‌भी पाठक इस बात की जांच कर स‌कते हैं कि इस कथित जानलेवा बीमारी की दवा तामिफ्लू के दाम में हाल के दिनों में काफी कमी आयी है। तो क्या पहले इसकी लागत वास्तविक उत्पादन लागत स‌े कई स‌ौ गुना अधिक थी। जैसा कि हम जानते हैं कि स‌ामान्य किस्म के आयरन और विटामिन टॉनिक जिस दाम पर बिकते हैं, उससे अधिक आयरन एक दर्जन केला या दूसरे फलों के स‌ेवन स‌े प्राप्त हो स‌कता है पर फलाहार स‌े रोगी को वह मनोवैज्ञानिक राहत नहीं मिलती, जो उन्हें डाक्टर का प्रेसक्रिप्सन दे पाता है। पहले भी कई बार यह विचार व्यक्त कर चुका हूं कि दुनियाभर में आई मंदी स‌े भारत काफी प्रभावित हुआ है पर यह मंदी आखिर किस देसी कारण स‌े आयी, यह स्पष्ट नहीं है। स‌िर्फ यह पता चलता है कि अमेरिका में लोगों द्वारा कर्ज नहीं अदा करने स‌े जो अस्थिरता पैदा हुई, उसने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। नतीजा है कि दाल और चीनी आम आदमी की पहुंच स‌े बाहर जा रहा है। कई मुद्दों को एकसाथ जोड़कर देखते हुए ही मैं अपनी इस स‌ोच को व्यक्त कर रहा हूं। कुछ दिनों पहले कृषि मंत्री ने इस बार गन्ना उत्पादन कम होने की बात कही। जो न जानते हों, उन्हें बता दें कि खुद शरद पवार भी महाराष्ट्र में गन्ने के एक शक्तिशाली किसान हैं और देश की चीनी लॉबी के स‌शक्त प्रतिनिधि भी। मानसून की कमी के दौरान उनके इस बयान ने अभी स‌े ही चीनी को बाजार स‌े दूर करना प्रारंभ कर दिया । इसके तुरंत बाद अन्य कृषि उपजों के बारे में भी ऎसा ही बयान आया और दाल की कीमत स‌ौ रुपये के करीब पहुंच गयी। इन स्वदेशी स‌मीकरणों के बीच हम यह नहीं भूल स‌कते कि हाल ही में चुनाव स‌म्पन्न हुए हैं, जिसमें स‌भी राजनीतिक दलों ने औद्योगिक और पूंजीपतियों स‌े चंदा लिया है। अब उस चंदे को दूसरे दरवाजे स‌े लौटाने की जिम्मेदारी स‌त्ता और प्रतिपक्ष की है। इसमें दोनों ही बराबर के शरीक हैं। देश के इस आंतरिक स‌मीकरण के बीच मेड इन इंडिया के लेबल स‌े चीन की एक कंपनी द्वारा अफ्रीका में नकली दवा भेजे जाने का मामला प्रकाश में आया है। इसके तुरंत बाद एक चीनी विद्वान द्वारा भारत के 30 टुकड़े करने की बात भी जाहिर हुई है। दूसरी तरफ अब स्वाइन फ्लू एक महामारी के तौर पर हमारे दिमाग पर बसाया जा रहा है। आने वाले दो दशक दुनिया के शक्ति स‌ंतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक आकलन यह भी है कि बदले परिवेश में अमेरिका और चीन के बाद स‌िर्फ अकेला भारत ही महाशक्ति रह पायेगा। ऎसे में दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों स‌े इस किस्म की चुनौती एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। दुनिया का जो माहौल कुवैत और इराक युद्ध के बाद बन चुका है, उसमें अमेरिका अपने तरीके से दुश्मन को स‌माप्त करने के लिए युद्ध जैसी तकनीक का इस्तेमाल नहीं करेगा। यही स्थिति चीन की भी है, जहां आंतरिक स‌मस्या लगातार जोर पकड़ रही है। इसलिए क्या यह स‌ूअर रोग किसी अप्रत्यक्ष युद्ध को घोष है, इसे गंभीरतापूर्वक स‌मझने की आवश्यकता है।

Wednesday, August 12, 2009

सुनो-सुनो-सुनो.....गरीब देशवासियों सुनो...!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
सुनो-सुनो-सुनो.....गरीब देशवासियों सुनो...!!
सुनो-सुनो-सुनो....देश के समस्त गरीब देशवासियों सुनो....हम इस देश की सरकार बोल रहे हैं.....इसलिए तुम सब लोगन हमारी बात कान खोल कर सुनो....हम आपके लिए एक तोहफा लाये हैं...अभी-अभी हमने तुम सबके बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का विधेयक पास कर दिया है...अब आज से तुम सब लोगन अपने गरीब बच्चों को स्कूलों में भेज कर पढ़ा और लिखा कर नवाब बना सकते हो...अब तुम सब लोगन आने वाले दिनों में अमीर लोगों से टक्कर भी ले सकते हो......हालांकि हम जानते हैं कि करोडों-करोड़ बच्चों को मुफ्त में शिक्षा उपलब्ध करा पाना बिल्कुल ही टेढी खीर है....लेकिन इसके बावजूद यह बीडा हमने उठा ही लिया है....न-न-न-....अब आप हमसे यह ना पूछो कि इसके लिए लाखों-लाख करोड़ रूपये का धन कहाँ से आएगा....कम-अज-कम हम अभी तो यह नहीं जानते...मगर यह अवश्य जानते हैं....कि जब हमने यह विधेयक पास कर ही दिया है तो आगे का काम भी भली-भांतिपूर्वक निपटा ही लेंगे.....!!....बेशक कैसे....यह हमको तनिक भी मालूम नहीं....!!
दरअसल हम शुरू से क्रांतिकरी रहे हैं...और हमारी ही की हुई क्रांति से यह देश आजाद भी हुआ है....इसलिए बिना कुछ जाने-समझे ऐसे कदम उठाना हमारे स्वभाव में स्वाभाविक रूप से शुमार रहा है......यह क्रांतिकारी कदम भी हमने अपने स्वभाव की इसी क्रांतिकारी स्वाभाविकता के कारण ही तो उठाया है.....!!हमें मालूम नहीं कि इसके लिए संभवतः करोडों शिक्षक कहाँ से आयेंगे....हमें यह भी मालूम नहीं कि हमारे देश के वो करोडों लोग दो रोज आधे पेट जीते हैं....और भूखे ही सोते हैं....जो अपने तन को ढकने के लिए कपडा तक नहीं खरीद सकते....जो अपने बच्चों को दुकानों-कारखानों और अन्य जगहों पर कमाने के लिए झोंक देते हैं.....कि कम-अज-कम वो अपने पेट की आग को तो बुझा सके... वो अपने बच्चों को कैसे और क्यूँ स्कूल भेजेंगे....??.......उनके पेट को भरने और तन को ढकने के लिए हमारे इंतजामात और दायित्व क्या क्या हैं....हमको नहीं मालूम....!!
.....हमने तो यह भी फरमान जारी कर दिया है कि समूचे निजी स्कूलों को भी २५% बच्चों को मुफ्त शिक्षा देनी होगी....यह मुफ्त शिक्षा वो आपको क्यूँ देंगी...इसका कोई दायित्व-बोध या कर्त्तव्य बोध उनको है या नहीं....या इसका अहसास हमने उनको कराया है या नहीं....यह भी हमको नहीं मालूम....हमारा काम है फरमान जारी करना...क्योंकि हम रजा हैं....सो हमने फरमान जारी कर दिया है....सो उसे पूरा होना ही होगा....!!{और ना भी पूरा हो तो क्या फर्क पड़ता है,क्योंकि हम तो घोडे बेचकर मूत कर सोये हुए होंगे...कोई भी कानून किस गति या नियति को प्राप्त होता है,सो हमको भला क्या मालूम....!!}
गरीब बच्चे अगर गलती से निजी स्कूलों में पहुच भी गए तो वे क्या पहने हुए होंगे.....क्या स्टेशनरी-किताब-बस्ता उनके पास होगी.....क्या जूते आदि उनके पैर में होंगे....सो भी हमको नहीं मालूम....!!उनकी समूची फीस का वहन निजी स्कूल का वह प्रबंधन,जो शिक्षा को सबसे बेहतरीन और सबसे जबरदस्त मुनाफे का व्यवसाय बनाये हुए है, जिसकी पाँचों उंगलियाँ घी में और सर कडाही में है,क्यूँ करेगा ??.....और तो और,ये गरीब बच्चे,जो भाषा के नाम पर सिर्फ व् सिर्फ अपनी मातृभाषा,जिसका शहर वाले कान्वेंटी बच्चे ना तो अर्थ समझते हैं,और ना उसे सभ्य मानते हैं.....इन बच्चों के द्वारा ऐसी ही अबूझ भाषा बोले जाने पर इन बच्चों से कैसा उपहास पूर्वक बर्ताव करेंगे....इसकी कोई आशंका या सूचना हमारे पास नहीं है...और सबसे बड़ी बात तो यह कि इन नव-नौनिहालों द्वारा अंग्रेजी या हिंग्रेजी नहीं बोल पाने की विवशता पहले से मौजूद उन बच्चों के बीच इनकी क्या स्थिति पैदा करेगी.....सो भी हमको नहीं मालूम....हमने बस फरमान जारी कर दिया.....अब आप समझे बस......!!
इसी अंग्रेजी के कारण किसी जमाने में हमारे आज के महानायक,ना भूतो-ना भविष्यति,अमिताभ बच्चन को ना कॉलेज में दाखिला और ना नौकरी तक मिल पायी थी, ऐसा खुद बच्चन साहब ने फरमाया है....संजोग या दुर्योग से ऐसे बच्चन,जो अंग्रेजी नहीं जानते,गली-गली...मोहल्ले-मोहल्ले करोडों की संख्या में घूम रहे हैं....जिन्हें कभी महानायक भी नहीं बनना है.....बस किसी कारखाने की भट्टी में सदा के लिए झूंख जाना है....!!....ऐसी शिक्षा,जो अपनी ही मातृभाषा को भुलवा देती हो,उसे हेय बना देती हो,उसे बोले जाने को पीडादायक बना देती हो....अपने ही लोगों से खुद को सदा के लिए दूर कर देती हो,अपनी ही पहचान छिपाने को मजबूर कर देती हो....अपने ही देश के सम्मान की क़द्र करना भूला देती हो....अपनी ही भाषा के जानने वाले को उपहास का केंद्र बना डालती हो.....और कैरियर {कैरियर बोले तो लाखों की सालाना तनख्वाह का पैकेज,चाहे वो किसी देश में भी मिले,चाहे वो किसी भी कीमत पर मिले....!!??}
खैर ये वक्त इस ग्लोबल वक्त में इस प्रकार की टुच्ची बातें करने का नहीं है....इसलिए हे मेरे अमीर और शहंशाह मंत्रियों-अफसरों-सेठों के देश के गरीबतम लोगों हमने कानून बना दिया है...और आप नहीं जानते कि इसके लिए हमने और पिछली सरकारों ने ना जाने कितनी मेहनत और मश्शकत की है.....किसके लिए...आप ही सब के लिए ना......अब आप इसका लुत्फ़ उठाईये....उठाते ही जाईये.....और वह भी बिल्कुल मुफ्त....जी हाँ एकदम मुफ्त.....!!??

Monday, August 10, 2009

एक प्यारा सा तोहफा

जैसा कि हम सभी जानते हैं, हरदिल अजीज़ डॉक्टर भारती कश्यप इन दिनों हम लोगों तक एक से एक स्लाइड पहुंचा रही हैं। इनकी मेहनत इनकी लगन, इन स्लाइड्स में साफ झलकती है। इस बार भी उन्होंने बहुत ही सुन्दर स्लाइड शो भेजा है, आप सभी इसका लुत्फ उठायें।

Sunday, August 9, 2009

हे गुरुदेव करो स्वीकार

अंश लाल पंद्रे

हे गुरुदेव करो स्वीकार
गुरु वंदन है मेरा संसार

जीवन में मैने है खोया
रखने योग्य कुछ न संजोया
गुरु तुम मेरा करो उद्धार
हे गुरुदेव करो स्वीकार

मैने व्यर्थ ही समय गंवाया
समय गंवा करके पछताया
अब गुरु पद रज ही आधार
हे गुरुदेव करो स्वीकार

निर्बल रहकर बना अभिमानी
समझ रहा खुद को ही ज्ञानी
ये सब दूर करो विकार
हे गुरुदेव करो स्वीकार

अंश लाल पंद्रे

Thursday, August 6, 2009

ऐसी ही कार्रवाईयों से तो जल उठता है देश

ऐसी ही कार्रवाईयों से तो जल उठता है देश


पता नहीं क्यों इस देश की तमाम सरकारें यही समझती हैं कि उसके और उसके कर्ता-धर्ताओं के अलावे तमाम भारतवासी “चूतिये”हैं !!{दरअसल यहाँ मुझे इससे खराब कोई शब्द नहीं मिल रहा,मैं इससे भी ज्यादा गंदे शब्द का इस्तेमाल करना चाहता हूँ,इसके लिए पाठक मुझे माफ़ करें !!}
इस देश के तमाम खेवनहारों में यह कमी अनिवार्य रूप से पाई जाती है,कि जनता की आवाज़ को,उसकी इच्छा,आवश्यकता और अधिकारों की अनदेखी ही करते हैं, गोया जनता मनुष्य ना होकर जानवर हों,और उनके मुख से किसी भी अर्थ वाली आवाजें नहीं उठनी चाहिए!!और अगर जो उठीं,तो जनता को गोलियों से भूने जाने के तैयार रहना चाहिए !!यह सब देश के तारणहर्ताओं की चरमरा चुकी सोच का परिचायक है,यहाँ यह ध्यान रख लेना चाहिए कि चरमरा चुकी चीज़ों की या तो मरम्मत की जाती है,या फिर उन्हें बदल दिया जाता है,यह नहीं कि ऐसी राय देने वालों की जान ही ले ली जाये,मगर जैसा कि इस देश में जो ना हो जाए,वो कम है,सो हमें इस देश की तमाम सरकारों के द्वारा यही सब देखने को मिलता है !!
मणिपुर की राजधानी इम्फाल में कल यही हुआ,पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में एक नागरिक की अमानुषिक हत्या के बाद हुए जनांदोलन और बंदी के आखरी दिन के अंत में सुरक्षा-बलों की गोली-बारी के पश्चात इम्फाल में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया गया!!यहाँ यह विदित हो कि उससे पहले आत्मसमर्पण कर चुके एक प्रदर्शनकारी युवक चोंग्खाम संजीत को सुरक्षा-बलों द्वारा सड़क पर घसीटकर एक मॉल में ले जाया गया था,जहां फिर उसकी निर्ममता-पूर्वक हत्या कर दी गयी थी!!इम्फाल में “अपुंगा लूप “नामक संगठन द्वारा इसी फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ प्रदर्शन बुलाया गया था.मगर जैसा कि हम जानते हैं कि भारत नाम के इस देश की तमाम राष्ट्रीय और राज्य-सरकारें पहले किसी भी जनांदोलन को बेरहमी और भीषणता से कुचलती हैं,मगर जब इससे स्थितियां उनके नियंत्रण के और भी ज्यादा बाहर हो जाती हैं,तो संबद्द संगठनों को बातचीत का प्रस्ताव भेजती हैं,मगर ज्यादातर तो वह बातचीत की इच्छुक ही नहीं दिखती क्योंकि जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि जनता की आवाज़ को,उसकी इच्छा,आवश्यकता और अधिकारों को उसका “चुतियापा”,बेवजह का क्रंदन या अपने अंहकार पर चोट समझती है.और इसी का परिणाम है,देश में जगह-जगह पर हो रहे तरह-तरह के मुद्दों पर जनव्यापी आन्दोलन-प्रदर्शन या आखिरकार हिंसा !!
हो सकता है कि इनमें से बहुत सारे आन्दोलन फर्जी ही हों मगर अधिकाँश तो सच्चाईयों पर या तथ्यों पर आधारित ही होते हैं,जिनकी सरकारें अनदेखी ही करती जाती हैं,और समय के साथ इन प्रदर्शनों या आन्दोलनों का रूप कुरूप या वीभत्स होता चला जाता है,वर्तमान में मणिपुर इसकी जीवंत मिसाल है!!ज्ञातव्य हो कि यह वही मणिपुर है जहां कुछ ही समय बीता जब यहाँ की महिलायें भारत के सुरक्षा-बलों के अमानुषिकता-बर्बरता और मणिपुरी महिलाओं पर उनके यौनिक दुर्व्यवहारों के खिलाफ पूर्ण-नग्न होकर सड़क पर उतर आयीं थीं….!!क्या भारत जैसे पर्मप्रवादी देश में ऐसे दृश्य की कल्पना भी कर सकते है......?? यदि ऐसा वहां की महिलाओं ने किया तो आप खुद ही विचार करें कि वहां हमारे सुरक्षा बलों या कमांडों ने मणिपुरी महिलाओं के साथ ऐसा क्या सलूक किया होगा?? किसी भी घृणापूर्ण सुलूक के बगैर कहीं किसी देश या समाज की महिलायें ऐसा कठोर और शर्मनाक लगने वाला कदम नहीं उठा सकतीं…..!!मगर ऐसा लगता हैं कि हमारी सरकारों को सत्ता के रुतबे और ताकत के मद में किसी भी बात की,चाहे वह बात कितनी ही लोमहर्षक क्यों ना हो,कोई सुध ही नहीं रहती और यह बात यहाँ का अज्ञानी-से-अज्ञानी गंवार भी सरकार को बता या चेता सकता है!!इसका दूसरा अर्थ यह भी तो है हमारी सरकारें इनसे भी ज्यादा गंवार है{असभ्य और बेगैरत तो खैर वो पहले से ही हैं....!!}
जब सरकारों के कानों पर कोई जूं नहीं रेंगती या जब सरकारें कान में रुई डाल कर चैन की नींद सोई रहती हैं,उस वक्त भी,जब आम नागरिक में सरकारों के“चुतियापे” की वजह से भयंकर गुस्सा खदबदाता रहता है,तब सडकों पर वो सब होता है,जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता और सरकारें तो कतई नहीं….!! ......मणिपुर, झारखण्ड,छत्तीसगढ़ ,कश्मीर,बिहार,महाराष्ट्र,तेलंगाना,नदीग्राम……..!!.....कितने-कितने नाम लिए जाएँ.....कितने उदहारण गिनाएं जाएँ….!!अगर इस सबको गिनने या चेताने का कोई अर्थ ही ना निकले ……!!यदि ऐसा ही है तो आने वाले दिनों जनहित का कोई भी मुद्दा आन्दोलन किये बिना संसद तक पहुँचाया ही ना जा सके…..हिंसा किये बगैर कोई मुद्दा सुलझाया ही ना सके…..!! और दोस्तों मेरा विश्वास कीजिये कि यदि ऐसा हुआ तो सरकारें भी जनता के अतिशय क्रोध का शिकार बन जाएँगी……तब संसद भी नहीं रहेगी…..सच…..!!!!!
bhootnath गुरुवार, अगस्त 06, 2009

जब शिव जी ने सुना - तेरा सरापा कैसा है जानम

जितेंद्र राम
है न अजीब बात। भला भगवान शिव अपनी आरती को छोड़, कहीं फिल्मी गाने सुनते हैं, और वह भी "ऐसी दीवानगी, देखी नहीं कहीं, मैंने इसलिए ..., तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं..., वो लड़की बहुत याद आती है..., तेरा सरापा कैसा है जानम... आदि- आदि।' नहीं न। अरे भाई, इस हाई-टेक युग में भला भगवान शिव कहां पीछे रहनेवाले हैं। शिवभक्त उन्हें आरती के साथ-साथ फिल्मी गीतों की धुन भी सुनाने से कोई कुरेज नहीं कर रहे हैं। यह कोई लतीफा या कहानी नहीं, बल्कि यह एक सच्चाई है। यह है आखों देखी और कानो सुनी सच्चाई। तो जरा गौर करें, वैसे तो मैं मंदिर बहुत कम ही जाता हूं, लेकिन हां कभी मौका मिले तो उससे चुकता भी नहीं हूं। सावन की सोमवारी के दिन हमें शिव मंदिर (पहाड़ी मंदिर) जाने का मौका मिला, सो मैं चला गया। मैं भी उन श्रद्धालुओं में शामिल हो गया, जो भगवान भोले के जलाभिषेक को जा रहे थे। इन्हीं श्रद्धालुओं में एक महिला श्रद्धालु भी शामिल थीं। महिला श्रद्धालु कोई 22-25 साल की रही होंगी। ज्यों ही सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया कि महिला के पास एक फोन आता है और मोबाइल का रिंग टोन है "ऐसी दीवानगी, देखी नहीं कहीं मैंने...' और फिर बकौल महिला, "हैलो, जी अभी-अभी तो आयी, आप दिखाई नहीं दिये, बहुत इंतजार के बाद हम चल दिये, अभी तो आधी सीढ़ी ही चढ़ी हूं, ठीक है, आप वहीं रहिए, मैं वहीं आती हूं।' इसके बाद फोन रखती हुई कुछ फुसफुसाते हुए आगे बढ़ती हैं। थोड़ी देर बाद फोन की घंटी फिर बजती है ऐसी दीवानगी, देखी नहीं कहीं, मैंने ...। तब तक यह महिला श्रद्धालु मंदिर के द्वार तक पहुंच चुकी होती हैं। फिर फोन रिसिव करते हुए, "हां बोलिए, अभी तो मंदिर द्वार तक पहुंची हूं, तबतक पंडित जी कहते हैं "हां यहां सिर्फ जलाभिषेक करें और आगे बढ़ें' महिला कहती हैं' बहुत भीड़ है जी, क्या! अरे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है, एक मिनट, हां पंडित जी यह लीजिए नारियल, हां प्रसादी भी है, हां बोलिए, क्या! कहां जा रहे हैं! इसी बीच "ये लीजिए पंडित जी पैसा, अरे पंडित जी को पैसे दे रही थी, कितनी देर में! नहीं-नहीं जल्दी आना, फिर- चेंज नहीं है बाबा, क्या! आधे घंटे लगेंगे, मैं चली जाऊंगी, ठीक है, जल्दी आइएगा। यह सब सुन कर मैं कुछ सोच पाता कि एक दूसरी श्रद्धालु के फोन की घंटी बजती है, जिसका रिंग टोन रहता है, "तेरे बिना जिंदगी से काई शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं...'। यह सब सुन मैं कुछ देर मंदिर परिसर में बैठ गया और देखने लगा। आधे धंटे के दौरान मैंने देखा मंदिर परिसर में पहुंचे श्रद्धालुओं के मोबाइल के रिंग टोन्स भी अजीब-अजीब होते हैं, किसी में "चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा..., वो लड़की बहुत याद आती है, वो लड़की बहुत याद आती है..., तेरा सरापा, ऐसा है जानम..., तुझे प्यार करने को जी चाहता है... आदि-आदि। और वैसे भी आजकल श्रद्धालु (भक्त) मंदिर जायें या मस्जिद, गुरुद्वारा जायें या गिरिजाघर भला अपने मोबाइल को घर में कैसे छोड़ सकते हैं। हां बहुत होगा तो कुछ लोग अपने-अपने मोबाइल का स्विच ऑफ कर देंगे या नहीं तो साइलेंट कर लेंगे। लेकिन ऐसा सभी तो करेंगे नहीं। और करें भी क्यों। न जाने कब, कहां किसका फोन आ जाये। और हो सकता है किसी श्रद्धालु को किसी का इंतजार भी करना हो। इधर-उधर खोजने से भल अच्छा है कि मोबाइल के सहारे अपने संबंधी-दोस्त-प्रेमी को जगह का पता आसानी से बता दिया जाये, जिससे मिलने में सुविधा हो सुविधा होगी और समय भी बचेगा।

Wednesday, August 5, 2009

मन करता है इस जज़्बे को सजदा करूं

निराला
रांची का एक मोहल्ला है इदरीस कॉलोनी। उसी मोहल्ले की एक संकरी गली में रहता है मो मेराजुद्दीन उर्फ रमजान का परिवार। यह परिवार उद्यमिता की एक मिसाल रहा है. दो दशक पहले तक रमजान का परिवार आर्थिक विपन्नता के उस क़गार पर था, जिसमें दो व"त का भोजन भी नसीब होने की गारंटी नहीं थी। लेकिन अपने अब्बा के इंतकाल के बाद रमजान व उनके दो भाइयों ने लगन, मेहनत और हुनर से घर की आर्थिक हैसियत में बदलाव लाया। रमजान और उसके दोनों भाई लकड़ी के कारीगर हैं। यह परिवार एक बार फिर आर्थिक, मानसिक परेशानियों के भंवर में फंसा है लेकिन एक बड़ी मिसाल भी फिर से कायम हुई है। मिसाल ऐसी, जो बनावटी होते घर-परिवार और समाज के रिश्ते में जीवंतता का अहसास कराती है।
हुआ यह है कि रमजान को पिछले वर्ष बुखार आने की शिकायत हुई। रांची में इलाज हुआ। बकौल रमजान, एक डॉक्टर साहब ने बुखार की जगह टीबी की दवा चला दी। नतीजतन 30 वर्षीय रमजान की दोनों किडनी डैमेज हो गयी। यह खबर उस परिवार पर बिजली गिरने की तरह थी। रमजान इलाज के लिए वेल्लौर गया। वहां क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि आपको किडनी चाहिए, ट्रांसप्लांट करने के लिए। रमजान का इलाज कराने उनके साथ उनकी दोनों बहन सैफु निशा और अफसरी खातून भी गयी थीं। दोनों बहनें किडनी देने के लिए तुरंत तैयार हो गयीं। बड़ी बहन 40 वर्षीया सैफु निशा की किडनी का टेस्ट हुआ। उसके पति को छपरा से बुलाकर सहमति के हस्ताक्षर लिये गये। निशा के पति मुबारक अली बताते हैं- मुझे जैसे ही पता चला कि मेरी पत्नी अपने भाई के लिए किडनी देना चाहती है, मैं तुरंत सब काम छोड़कर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने वेल्लौर पहुंच गया। वह कहते हैं- बहन अपने भाई के लिए कुछ करना चाहती थी, यह मेरे लिए खुशी की बात थी. मुबारक ट्रक ड्राइवर हैं।
अब सैफु निशा की एक किडनी रमजान के शरीर में सेट हो चुकी है। रमजान के इलाज में अब तक आठ लाख का खर्च आ चुका है। हर माह करीब दस हजार की दवा लेनी पड़ रही है। बरसात में लकड़ी का धंधा मंदा है, सो रोजमर्रा के खरचे में भी मुश्किलें आ रही हैं। भाई का इलाज कराने के लिए रमजान के दोनों भाइयों और दोनों बहनों ने अपनी सारी जिंदगी की कमाई, अर्जित संपत्ति को लगा दिया है। सैफु निशा को यह परवाह नहीं कि उसे एक किडनी के सहारे अब जिंदगी भर रहना होगा। इतना ही नहीं, वह छपरा के एक गांव में बसे अपने ससुराल से पल-पल भाई रमजान की खबर लेती है। समय पर दवा खाया कि नहीं, अच्छे से हो या नहीं...वगैरह-वगैरह। भाई-बहन के रिश्ते की यह मिसाल शायद अब के परिवेश में देखने को कम ही मिलता है।

Sunday, August 2, 2009

सब कुछ पगला क्यूँ रहा है......??

पानी कहीं नहीं बरस रहा है....चारों तरफ़ हाहाकार मच चुका है....पिछले साल यही पानी जब झूम-झूम कर बरसा था...तब भी इसी तरह का हाहाकार मचा था....पानी इस तरह क्यूँ पगला जाता है...कभी तो बावला-सा मतवाला तो कभी बिल्कुल ही मौन व्रत....!!
दरअसल इसके जिम्मेवार हम ही तो हैं....इसके बनने के तमाम रास्तों में,इसके बहने के तमाम रास्तों में, इसके खिलने के तमाम रास्तों में हमने अपने नाजायज़ खूंटे गा दिए हैं....एक बिल्कुल ही स्वतंत्र "आत्मा" को अनेकनेक तरह से बाँध दिया है....जो पेड़ अपने असीम प्यार से इन्हें अपने घर से बांधे रहते हैं,या अपनी प्यार भरी मनुहार से रोके रखते हैं,उन पेडों को काट-काट कर अपना फर्नीचर बना लिया है,और ना जाने क्या-क्या दुर्गति कर दी है हमने पेडों की....!!....धरती को हमने बाँझ बना दिया है....धरती अपना कटा-फटा दामन समेटती सहमती-सकुचाती पानी को रोक तक नहीं सकती,रोके तो उसे ठहराए कहाँ ??....और ठहराए तो बिठाए कहाँ....हमने तो हर जगह मलीन और गंदली कर दी है....!!
अपनी नाजायज हरकतों से हमने धरती मा को गोया नेस्तनाबूद कर दिया है.....धरती की तमाम अभीप्सा....जरुरत....अपेक्षा...और अन्य तमाम तरह की अपनी जिम्मेवारियों से अपना पल्ला झाड़ लिया है हमने !!....यह बिल्कुल वैसे ही है,जैसे माँ-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की दुश्वारियों को झेलते हुए,ख़ुद किल्लत बर्दाश्त कर उनकी सब ज़रूरत पूरी करते हुए....उन पर अपना असीम प्रेम उड़ेलते हुए...उन्हें इंच-इंच बड़ा होते हुए देखते हुए....उन्हें सालों-साल पाल-पोस कर बड़ा करते हैं.....और बड़ा होते ही यही बच्चे....उन्हें "बोझ"करार कर
देते हैं....उन्हें "ठिकाने" लगा देते हैं....उन्हें सेंट्रिंग में डाल देते हैं....उनकी उपेक्षा करने लगते हैं.....ठीक वैसा ही हमने धरती के संग भी किया है.....और धरती के साथ जो भी कुछ हम करते हैं....उसका सिला हमें मिलने लगा है....पानी पगला रहा है... हवा पगला रहा है....मौसम पगला रहा है....!!.....नदियाँ पगला रही हैं....!!...और न जाने क्या-क्या उलट-पुलट हो रहा मौसमों में....कब गर्मी है....कब सर्दी...और कब बरसात.....किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा....!!??
अगर हम नहीं रुके तो आने वाले बरसों में इसका परिणाम और भी ज्यादा भयावह होने वाला है....धरती हमें चीख-चीख कर कह रही है....अब बस....अब बस....अब बस .....क्या यह चीख हमें सुनाई पड़ रही है....क्या यह आर्तनाद हमें कभी सुनाई पड़ भी पायेगा.....!!क्या हम खुद को रोक सकते हैं .....????