मैं भूत बोल रहा हूँ!!
मेरे प्यारे-प्यारे-प्यारे-प्यारे और बेहद प्यारे दोस्तों.........
आप सबको इस भूतनाथ का बेहद ह्रदय भरा प्रेम.........दोस्तों पिछले समय में मुझे मिले कईयों आमंत्रणों में में मैंने कुछ आमंत्रणों को स्वीकार कर अनेक ब्लॉग में लिख रहा था.....बेशक एक ही आलेख हरेक ब्लॉग में होता था....आज अपनी एक ब्लागर मित्र की आज्ञा या यूँ कहूँ कि एक प्यारी-सी राय मान कर अपने को आज से सिर्फ़ एकाध ब्लाग में सीमित किए दे रहा हूँ...ये ब्लॉग कम्युनिटी ब्लोगों में "कबीरा खड़ा बाज़ार में","रांची-हल्ला" और मेरा ख़ुद का एक मात्र निजी ब्लॉग "बात पुरानी है" तक ही सीमित रहेंगे....!!
बाकी ब्लॉगों के सम्पादकों से मेरा अनुरोध हैं....कि मेरा यह अनुरोध शीघ्रता-पूर्वक स्वीकारते हुए मुझे तुंरत अपने ब्लॉगों से हटा दें.....इतनी जगहों पर एक आलेख भी चस्पां कर पाने में मैं ख़ुद को असमर्थ पाता हूँ....हाँ,इतने दिनों तक मुझे आदर और प्रेम देने के लिए मैं तमाम सम्पादकों का आभारी हूँ....आगे के लिए मुझे क्षमा किया जाए....भूतनाथ अब ख़ास तौर पर "बात पुरानी है !!" पर ही पाया जाएगा.....वैसे भी भूतों के लिए पुराना होकर "गया-बीता" हो जन ही उचित होता है.....तो दोस्तों आप सबको मेरे प्रेम के साथ ऊपर बताये गए ब्लॉगों से मेरी विदा.....एक स्नेहिल ह्रदय आत्मा........भूतनाथ
हरकीरत जी आपकी इस प्रेम भरी राय के लिए मैं आपका भी शुक्रिया अदा करता हूँ....दरअसल मैं ख़ुद भी यही करना चाह रहा था....मगर कुछ प्रेमियों के प्रेम के कारण ऐसा कर नहीं पा रहा था....आज आपकी आज्ञा से ये मैं कर रहा हूँ.....................आपको भी धन्यवाद......!!
एक बात आपसे और कहूँ....अभी मुझे भूतनाथ ही रहने दें.....इसके पीछे कोई बात है.....जो मैं बाद में सबको बता पाउँगा.....आज आखिरी बार मैं सभी ब्लॉगों पर दिखायी दूंगा.....!!कल से सिर्फ़ अपने ब्लाग एवं दो कम्युनिटी ब्लॉगों पर ही रहूंगा.....मुझसे कोई गलती हुई हो तो मैं तहे-दिल से खेद प्रकट करता हूँ....और सबसे क्षमा माँगता हूँ.....!!
Sunday, August 9, 2009
हे गुरुदेव करो स्वीकार
अंश लाल पंद्रे
हे गुरुदेव करो स्वीकार
गुरु वंदन है मेरा संसार
जीवन में मैने है खोया
रखने योग्य कुछ न संजोया
गुरु तुम मेरा करो उद्धार
हे गुरुदेव करो स्वीकार
मैने व्यर्थ ही समय गंवाया
समय गंवा करके पछताया
अब गुरु पद रज ही आधार
हे गुरुदेव करो स्वीकार
निर्बल रहकर बना अभिमानी
समझ रहा खुद को ही ज्ञानी
ये सब दूर करो विकार
हे गुरुदेव करो स्वीकार
अंश लाल पंद्रे
हे गुरुदेव करो स्वीकार
गुरु वंदन है मेरा संसार
जीवन में मैने है खोया
रखने योग्य कुछ न संजोया
गुरु तुम मेरा करो उद्धार
हे गुरुदेव करो स्वीकार
मैने व्यर्थ ही समय गंवाया
समय गंवा करके पछताया
अब गुरु पद रज ही आधार
हे गुरुदेव करो स्वीकार
निर्बल रहकर बना अभिमानी
समझ रहा खुद को ही ज्ञानी
ये सब दूर करो विकार
हे गुरुदेव करो स्वीकार
अंश लाल पंद्रे
Thursday, August 6, 2009
ऐसी ही कार्रवाईयों से तो जल उठता है देश
ऐसी ही कार्रवाईयों से तो जल उठता है देश
पता नहीं क्यों इस देश की तमाम सरकारें यही समझती हैं कि उसके और उसके कर्ता-धर्ताओं के अलावे तमाम भारतवासी “चूतिये”हैं !!{दरअसल यहाँ मुझे इससे खराब कोई शब्द नहीं मिल रहा,मैं इससे भी ज्यादा गंदे शब्द का इस्तेमाल करना चाहता हूँ,इसके लिए पाठक मुझे माफ़ करें !!}
इस देश के तमाम खेवनहारों में यह कमी अनिवार्य रूप से पाई जाती है,कि जनता की आवाज़ को,उसकी इच्छा,आवश्यकता और अधिकारों की अनदेखी ही करते हैं, गोया जनता मनुष्य ना होकर जानवर हों,और उनके मुख से किसी भी अर्थ वाली आवाजें नहीं उठनी चाहिए!!और अगर जो उठीं,तो जनता को गोलियों से भूने जाने के तैयार रहना चाहिए !!यह सब देश के तारणहर्ताओं की चरमरा चुकी सोच का परिचायक है,यहाँ यह ध्यान रख लेना चाहिए कि चरमरा चुकी चीज़ों की या तो मरम्मत की जाती है,या फिर उन्हें बदल दिया जाता है,यह नहीं कि ऐसी राय देने वालों की जान ही ले ली जाये,मगर जैसा कि इस देश में जो ना हो जाए,वो कम है,सो हमें इस देश की तमाम सरकारों के द्वारा यही सब देखने को मिलता है !!
मणिपुर की राजधानी इम्फाल में कल यही हुआ,पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में एक नागरिक की अमानुषिक हत्या के बाद हुए जनांदोलन और बंदी के आखरी दिन के अंत में सुरक्षा-बलों की गोली-बारी के पश्चात इम्फाल में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया गया!!यहाँ यह विदित हो कि उससे पहले आत्मसमर्पण कर चुके एक प्रदर्शनकारी युवक चोंग्खाम संजीत को सुरक्षा-बलों द्वारा सड़क पर घसीटकर एक मॉल में ले जाया गया था,जहां फिर उसकी निर्ममता-पूर्वक हत्या कर दी गयी थी!!इम्फाल में “अपुंगा लूप “नामक संगठन द्वारा इसी फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ प्रदर्शन बुलाया गया था.मगर जैसा कि हम जानते हैं कि भारत नाम के इस देश की तमाम राष्ट्रीय और राज्य-सरकारें पहले किसी भी जनांदोलन को बेरहमी और भीषणता से कुचलती हैं,मगर जब इससे स्थितियां उनके नियंत्रण के और भी ज्यादा बाहर हो जाती हैं,तो संबद्द संगठनों को बातचीत का प्रस्ताव भेजती हैं,मगर ज्यादातर तो वह बातचीत की इच्छुक ही नहीं दिखती क्योंकि जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि जनता की आवाज़ को,उसकी इच्छा,आवश्यकता और अधिकारों को उसका “चुतियापा”,बेवजह का क्रंदन या अपने अंहकार पर चोट समझती है.और इसी का परिणाम है,देश में जगह-जगह पर हो रहे तरह-तरह के मुद्दों पर जनव्यापी आन्दोलन-प्रदर्शन या आखिरकार हिंसा !!
हो सकता है कि इनमें से बहुत सारे आन्दोलन फर्जी ही हों मगर अधिकाँश तो सच्चाईयों पर या तथ्यों पर आधारित ही होते हैं,जिनकी सरकारें अनदेखी ही करती जाती हैं,और समय के साथ इन प्रदर्शनों या आन्दोलनों का रूप कुरूप या वीभत्स होता चला जाता है,वर्तमान में मणिपुर इसकी जीवंत मिसाल है!!ज्ञातव्य हो कि यह वही मणिपुर है जहां कुछ ही समय बीता जब यहाँ की महिलायें भारत के सुरक्षा-बलों के अमानुषिकता-बर्बरता और मणिपुरी महिलाओं पर उनके यौनिक दुर्व्यवहारों के खिलाफ पूर्ण-नग्न होकर सड़क पर उतर आयीं थीं….!!क्या भारत जैसे पर्मप्रवादी देश में ऐसे दृश्य की कल्पना भी कर सकते है......?? यदि ऐसा वहां की महिलाओं ने किया तो आप खुद ही विचार करें कि वहां हमारे सुरक्षा बलों या कमांडों ने मणिपुरी महिलाओं के साथ ऐसा क्या सलूक किया होगा?? किसी भी घृणापूर्ण सुलूक के बगैर कहीं किसी देश या समाज की महिलायें ऐसा कठोर और शर्मनाक लगने वाला कदम नहीं उठा सकतीं…..!!मगर ऐसा लगता हैं कि हमारी सरकारों को सत्ता के रुतबे और ताकत के मद में किसी भी बात की,चाहे वह बात कितनी ही लोमहर्षक क्यों ना हो,कोई सुध ही नहीं रहती और यह बात यहाँ का अज्ञानी-से-अज्ञानी गंवार भी सरकार को बता या चेता सकता है!!इसका दूसरा अर्थ यह भी तो है हमारी सरकारें इनसे भी ज्यादा गंवार है{असभ्य और बेगैरत तो खैर वो पहले से ही हैं....!!}
जब सरकारों के कानों पर कोई जूं नहीं रेंगती या जब सरकारें कान में रुई डाल कर चैन की नींद सोई रहती हैं,उस वक्त भी,जब आम नागरिक में सरकारों के“चुतियापे” की वजह से भयंकर गुस्सा खदबदाता रहता है,तब सडकों पर वो सब होता है,जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता और सरकारें तो कतई नहीं….!! ......मणिपुर, झारखण्ड,छत्तीसगढ़ ,कश्मीर,बिहार,महाराष्ट्र,तेलंगाना,नदीग्राम……..!!.....कितने-कितने नाम लिए जाएँ.....कितने उदहारण गिनाएं जाएँ….!!अगर इस सबको गिनने या चेताने का कोई अर्थ ही ना निकले ……!!यदि ऐसा ही है तो आने वाले दिनों जनहित का कोई भी मुद्दा आन्दोलन किये बिना संसद तक पहुँचाया ही ना जा सके…..हिंसा किये बगैर कोई मुद्दा सुलझाया ही ना सके…..!! और दोस्तों मेरा विश्वास कीजिये कि यदि ऐसा हुआ तो सरकारें भी जनता के अतिशय क्रोध का शिकार बन जाएँगी……तब संसद भी नहीं रहेगी…..सच…..!!!!!
bhootnath गुरुवार, अगस्त 06, 2009
पता नहीं क्यों इस देश की तमाम सरकारें यही समझती हैं कि उसके और उसके कर्ता-धर्ताओं के अलावे तमाम भारतवासी “चूतिये”हैं !!{दरअसल यहाँ मुझे इससे खराब कोई शब्द नहीं मिल रहा,मैं इससे भी ज्यादा गंदे शब्द का इस्तेमाल करना चाहता हूँ,इसके लिए पाठक मुझे माफ़ करें !!}
इस देश के तमाम खेवनहारों में यह कमी अनिवार्य रूप से पाई जाती है,कि जनता की आवाज़ को,उसकी इच्छा,आवश्यकता और अधिकारों की अनदेखी ही करते हैं, गोया जनता मनुष्य ना होकर जानवर हों,और उनके मुख से किसी भी अर्थ वाली आवाजें नहीं उठनी चाहिए!!और अगर जो उठीं,तो जनता को गोलियों से भूने जाने के तैयार रहना चाहिए !!यह सब देश के तारणहर्ताओं की चरमरा चुकी सोच का परिचायक है,यहाँ यह ध्यान रख लेना चाहिए कि चरमरा चुकी चीज़ों की या तो मरम्मत की जाती है,या फिर उन्हें बदल दिया जाता है,यह नहीं कि ऐसी राय देने वालों की जान ही ले ली जाये,मगर जैसा कि इस देश में जो ना हो जाए,वो कम है,सो हमें इस देश की तमाम सरकारों के द्वारा यही सब देखने को मिलता है !!
मणिपुर की राजधानी इम्फाल में कल यही हुआ,पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में एक नागरिक की अमानुषिक हत्या के बाद हुए जनांदोलन और बंदी के आखरी दिन के अंत में सुरक्षा-बलों की गोली-बारी के पश्चात इम्फाल में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया गया!!यहाँ यह विदित हो कि उससे पहले आत्मसमर्पण कर चुके एक प्रदर्शनकारी युवक चोंग्खाम संजीत को सुरक्षा-बलों द्वारा सड़क पर घसीटकर एक मॉल में ले जाया गया था,जहां फिर उसकी निर्ममता-पूर्वक हत्या कर दी गयी थी!!इम्फाल में “अपुंगा लूप “नामक संगठन द्वारा इसी फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ प्रदर्शन बुलाया गया था.मगर जैसा कि हम जानते हैं कि भारत नाम के इस देश की तमाम राष्ट्रीय और राज्य-सरकारें पहले किसी भी जनांदोलन को बेरहमी और भीषणता से कुचलती हैं,मगर जब इससे स्थितियां उनके नियंत्रण के और भी ज्यादा बाहर हो जाती हैं,तो संबद्द संगठनों को बातचीत का प्रस्ताव भेजती हैं,मगर ज्यादातर तो वह बातचीत की इच्छुक ही नहीं दिखती क्योंकि जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि जनता की आवाज़ को,उसकी इच्छा,आवश्यकता और अधिकारों को उसका “चुतियापा”,बेवजह का क्रंदन या अपने अंहकार पर चोट समझती है.और इसी का परिणाम है,देश में जगह-जगह पर हो रहे तरह-तरह के मुद्दों पर जनव्यापी आन्दोलन-प्रदर्शन या आखिरकार हिंसा !!
हो सकता है कि इनमें से बहुत सारे आन्दोलन फर्जी ही हों मगर अधिकाँश तो सच्चाईयों पर या तथ्यों पर आधारित ही होते हैं,जिनकी सरकारें अनदेखी ही करती जाती हैं,और समय के साथ इन प्रदर्शनों या आन्दोलनों का रूप कुरूप या वीभत्स होता चला जाता है,वर्तमान में मणिपुर इसकी जीवंत मिसाल है!!ज्ञातव्य हो कि यह वही मणिपुर है जहां कुछ ही समय बीता जब यहाँ की महिलायें भारत के सुरक्षा-बलों के अमानुषिकता-बर्बरता और मणिपुरी महिलाओं पर उनके यौनिक दुर्व्यवहारों के खिलाफ पूर्ण-नग्न होकर सड़क पर उतर आयीं थीं….!!क्या भारत जैसे पर्मप्रवादी देश में ऐसे दृश्य की कल्पना भी कर सकते है......?? यदि ऐसा वहां की महिलाओं ने किया तो आप खुद ही विचार करें कि वहां हमारे सुरक्षा बलों या कमांडों ने मणिपुरी महिलाओं के साथ ऐसा क्या सलूक किया होगा?? किसी भी घृणापूर्ण सुलूक के बगैर कहीं किसी देश या समाज की महिलायें ऐसा कठोर और शर्मनाक लगने वाला कदम नहीं उठा सकतीं…..!!मगर ऐसा लगता हैं कि हमारी सरकारों को सत्ता के रुतबे और ताकत के मद में किसी भी बात की,चाहे वह बात कितनी ही लोमहर्षक क्यों ना हो,कोई सुध ही नहीं रहती और यह बात यहाँ का अज्ञानी-से-अज्ञानी गंवार भी सरकार को बता या चेता सकता है!!इसका दूसरा अर्थ यह भी तो है हमारी सरकारें इनसे भी ज्यादा गंवार है{असभ्य और बेगैरत तो खैर वो पहले से ही हैं....!!}
जब सरकारों के कानों पर कोई जूं नहीं रेंगती या जब सरकारें कान में रुई डाल कर चैन की नींद सोई रहती हैं,उस वक्त भी,जब आम नागरिक में सरकारों के“चुतियापे” की वजह से भयंकर गुस्सा खदबदाता रहता है,तब सडकों पर वो सब होता है,जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता और सरकारें तो कतई नहीं….!! ......मणिपुर, झारखण्ड,छत्तीसगढ़ ,कश्मीर,बिहार,महाराष्ट्र,तेलंगाना,नदीग्राम……..!!.....कितने-कितने नाम लिए जाएँ.....कितने उदहारण गिनाएं जाएँ….!!अगर इस सबको गिनने या चेताने का कोई अर्थ ही ना निकले ……!!यदि ऐसा ही है तो आने वाले दिनों जनहित का कोई भी मुद्दा आन्दोलन किये बिना संसद तक पहुँचाया ही ना जा सके…..हिंसा किये बगैर कोई मुद्दा सुलझाया ही ना सके…..!! और दोस्तों मेरा विश्वास कीजिये कि यदि ऐसा हुआ तो सरकारें भी जनता के अतिशय क्रोध का शिकार बन जाएँगी……तब संसद भी नहीं रहेगी…..सच…..!!!!!
bhootnath गुरुवार, अगस्त 06, 2009
जब शिव जी ने सुना - तेरा सरापा कैसा है जानम
जितेंद्र रामहै न अजीब बात। भला भगवान शिव अपनी आरती को छोड़, कहीं फिल्मी गाने सुनते हैं, और वह भी "ऐसी दीवानगी, देखी नहीं कहीं, मैंने इसलिए ..., तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं..., वो लड़की बहुत याद आती है..., तेरा सरापा कैसा है जानम... आदि- आदि।' नहीं न। अरे भाई, इस हाई-टेक युग में भला भगवान शिव कहां पीछे रहनेवाले हैं। शिवभक्त उन्हें आरती के साथ-साथ फिल्मी गीतों की धुन भी सुनाने से कोई कुरेज नहीं कर रहे हैं। यह कोई लतीफा या कहानी नहीं, बल्कि यह एक सच्चाई है। यह है आखों देखी और कानो सुनी सच्चाई। तो जरा गौर करें, वैसे तो मैं मंदिर बहुत कम ही जाता हूं, लेकिन हां कभी मौका मिले तो उससे चुकता भी नहीं हूं। सावन की सोमवारी के दिन हमें शिव मंदिर (पहाड़ी मंदिर) जाने का मौका मिला, सो मैं चला गया। मैं भी उन श्रद्धालुओं में शामिल हो गया, जो भगवान भोले के जलाभिषेक को जा रहे थे। इन्हीं श्रद्धालुओं में एक महिला श्रद्धालु भी शामिल थीं। महिला श्रद्धालु कोई 22-25 साल की रही होंगी। ज्यों ही सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया कि महिला के पास एक फोन आता है और मोबाइल का रिंग टोन है "ऐसी दीवानगी, देखी नहीं कहीं मैंने...' और फिर बकौल महिला, "हैलो, जी अभी-अभी तो आयी, आप दिखाई नहीं दिये, बहुत इंतजार के बाद हम चल दिये, अभी तो आधी सीढ़ी ही चढ़ी हूं, ठीक है, आप वहीं रहिए, मैं वहीं आती हूं।' इसके बाद फोन रखती हुई कुछ फुसफुसाते हुए आगे बढ़ती हैं। थोड़ी देर बाद फोन की घंटी फिर बजती है ऐसी दीवानगी, देखी नहीं कहीं, मैंने ...। तब तक यह महिला श्रद्धालु मंदिर के द्वार तक पहुंच चुकी होती हैं। फिर फोन रिसिव करते हुए, "हां बोलिए, अभी तो मंदिर द्वार तक पहुंची हूं, तबतक पंडित जी कहते हैं "हां यहां सिर्फ जलाभिषेक करें और आगे बढ़ें' महिला कहती हैं' बहुत भीड़ है जी, क्या! अरे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है, एक मिनट, हां पंडित जी यह लीजिए नारियल, हां प्रसादी भी है, हां बोलिए, क्या! कहां जा रहे हैं! इसी बीच "ये लीजिए पंडित जी पैसा, अरे पंडित जी को पैसे दे रही थी, कितनी देर में! नहीं-नहीं जल्दी आना, फिर- चेंज नहीं है बाबा, क्या! आधे घंटे लगेंगे, मैं चली जाऊंगी, ठीक है, जल्दी आइएगा। यह सब सुन कर मैं कुछ सोच पाता कि एक दूसरी श्रद्धालु के फोन की घंटी बजती है, जिसका रिंग टोन रहता है, "तेरे बिना जिंदगी से काई शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं...'। यह सब सुन मैं कुछ देर मंदिर परिसर में बैठ गया और देखने लगा। आधे धंटे के दौरान मैंने देखा मंदिर परिसर में पहुंचे श्रद्धालुओं के मोबाइल के रिंग टोन्स भी अजीब-अजीब होते हैं, किसी में "चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा..., वो लड़की बहुत याद आती है, वो लड़की बहुत याद आती है..., तेरा सरापा, ऐसा है जानम..., तुझे प्यार करने को जी चाहता है... आदि-आदि। और वैसे भी आजकल श्रद्धालु (भक्त) मंदिर जायें या मस्जिद, गुरुद्वारा जायें या गिरिजाघर भला अपने मोबाइल को घर में कैसे छोड़ सकते हैं। हां बहुत होगा तो कुछ लोग अपने-अपने मोबाइल का स्विच ऑफ कर देंगे या नहीं तो साइलेंट कर लेंगे। लेकिन ऐसा सभी तो करेंगे नहीं। और करें भी क्यों। न जाने कब, कहां किसका फोन आ जाये। और हो सकता है किसी श्रद्धालु को किसी का इंतजार भी करना हो। इधर-उधर खोजने से भल अच्छा है कि मोबाइल के सहारे अपने संबंधी-दोस्त-प्रेमी को जगह का पता आसानी से बता दिया जाये, जिससे मिलने में सुविधा हो सुविधा होगी और समय भी बचेगा।
Wednesday, August 5, 2009
मन करता है इस जज़्बे को सजदा करूं
निराला
रांची का एक मोहल्ला है इदरीस कॉलोनी। उसी मोहल्ले की एक संकरी गली में रहता है मो मेराजुद्दीन उर्फ रमजान का परिवार। यह परिवार उद्यमिता की एक मिसाल रहा है. दो दशक पहले तक रमजान का परिवार आर्थिक विपन्नता के उस क़गार पर था, जिसमें दो व"त का भोजन भी नसीब होने की गारंटी नहीं थी। लेकिन अपने अब्बा के इंतकाल के बाद रमजान व उनके दो भाइयों ने लगन, मेहनत और हुनर से घर की आर्थिक हैसियत में बदलाव लाया। रमजान और उसके दोनों भाई लकड़ी के कारीगर हैं। यह परिवार एक बार फिर आर्थिक, मानसिक परेशानियों के भंवर में फंसा है लेकिन एक बड़ी मिसाल भी फिर से कायम हुई है। मिसाल ऐसी, जो बनावटी होते घर-परिवार और समाज के रिश्ते में जीवंतता का अहसास कराती है।
हुआ यह है कि रमजान को पिछले वर्ष बुखार आने की शिकायत हुई। रांची में इलाज हुआ। बकौल रमजान, एक डॉक्टर साहब ने बुखार की जगह टीबी की दवा चला दी। नतीजतन 30 वर्षीय रमजान की दोनों किडनी डैमेज हो गयी। यह खबर उस परिवार पर बिजली गिरने की तरह थी। रमजान इलाज के लिए वेल्लौर गया। वहां क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि आपको किडनी चाहिए, ट्रांसप्लांट करने के लिए। रमजान का इलाज कराने उनके साथ उनकी दोनों बहन सैफु निशा और अफसरी खातून भी गयी थीं। दोनों बहनें किडनी देने के लिए तुरंत तैयार हो गयीं। बड़ी बहन 40 वर्षीया सैफु निशा की किडनी का टेस्ट हुआ। उसके पति को छपरा से बुलाकर सहमति के हस्ताक्षर लिये गये। निशा के पति मुबारक अली बताते हैं- मुझे जैसे ही पता चला कि मेरी पत्नी अपने भाई के लिए किडनी देना चाहती है, मैं तुरंत सब काम छोड़कर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने वेल्लौर पहुंच गया। वह कहते हैं- बहन अपने भाई के लिए कुछ करना चाहती थी, यह मेरे लिए खुशी की बात थी. मुबारक ट्रक ड्राइवर हैं।
अब सैफु निशा की एक किडनी रमजान के शरीर में सेट हो चुकी है। रमजान के इलाज में अब तक आठ लाख का खर्च आ चुका है। हर माह करीब दस हजार की दवा लेनी पड़ रही है। बरसात में लकड़ी का धंधा मंदा है, सो रोजमर्रा के खरचे में भी मुश्किलें आ रही हैं। भाई का इलाज कराने के लिए रमजान के दोनों भाइयों और दोनों बहनों ने अपनी सारी जिंदगी की कमाई, अर्जित संपत्ति को लगा दिया है। सैफु निशा को यह परवाह नहीं कि उसे एक किडनी के सहारे अब जिंदगी भर रहना होगा। इतना ही नहीं, वह छपरा के एक गांव में बसे अपने ससुराल से पल-पल भाई रमजान की खबर लेती है। समय पर दवा खाया कि नहीं, अच्छे से हो या नहीं...वगैरह-वगैरह। भाई-बहन के रिश्ते की यह मिसाल शायद अब के परिवेश में देखने को कम ही मिलता है।
रांची का एक मोहल्ला है इदरीस कॉलोनी। उसी मोहल्ले की एक संकरी गली में रहता है मो मेराजुद्दीन उर्फ रमजान का परिवार। यह परिवार उद्यमिता की एक मिसाल रहा है. दो दशक पहले तक रमजान का परिवार आर्थिक विपन्नता के उस क़गार पर था, जिसमें दो व"त का भोजन भी नसीब होने की गारंटी नहीं थी। लेकिन अपने अब्बा के इंतकाल के बाद रमजान व उनके दो भाइयों ने लगन, मेहनत और हुनर से घर की आर्थिक हैसियत में बदलाव लाया। रमजान और उसके दोनों भाई लकड़ी के कारीगर हैं। यह परिवार एक बार फिर आर्थिक, मानसिक परेशानियों के भंवर में फंसा है लेकिन एक बड़ी मिसाल भी फिर से कायम हुई है। मिसाल ऐसी, जो बनावटी होते घर-परिवार और समाज के रिश्ते में जीवंतता का अहसास कराती है।
हुआ यह है कि रमजान को पिछले वर्ष बुखार आने की शिकायत हुई। रांची में इलाज हुआ। बकौल रमजान, एक डॉक्टर साहब ने बुखार की जगह टीबी की दवा चला दी। नतीजतन 30 वर्षीय रमजान की दोनों किडनी डैमेज हो गयी। यह खबर उस परिवार पर बिजली गिरने की तरह थी। रमजान इलाज के लिए वेल्लौर गया। वहां क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि आपको किडनी चाहिए, ट्रांसप्लांट करने के लिए। रमजान का इलाज कराने उनके साथ उनकी दोनों बहन सैफु निशा और अफसरी खातून भी गयी थीं। दोनों बहनें किडनी देने के लिए तुरंत तैयार हो गयीं। बड़ी बहन 40 वर्षीया सैफु निशा की किडनी का टेस्ट हुआ। उसके पति को छपरा से बुलाकर सहमति के हस्ताक्षर लिये गये। निशा के पति मुबारक अली बताते हैं- मुझे जैसे ही पता चला कि मेरी पत्नी अपने भाई के लिए किडनी देना चाहती है, मैं तुरंत सब काम छोड़कर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने वेल्लौर पहुंच गया। वह कहते हैं- बहन अपने भाई के लिए कुछ करना चाहती थी, यह मेरे लिए खुशी की बात थी. मुबारक ट्रक ड्राइवर हैं।
अब सैफु निशा की एक किडनी रमजान के शरीर में सेट हो चुकी है। रमजान के इलाज में अब तक आठ लाख का खर्च आ चुका है। हर माह करीब दस हजार की दवा लेनी पड़ रही है। बरसात में लकड़ी का धंधा मंदा है, सो रोजमर्रा के खरचे में भी मुश्किलें आ रही हैं। भाई का इलाज कराने के लिए रमजान के दोनों भाइयों और दोनों बहनों ने अपनी सारी जिंदगी की कमाई, अर्जित संपत्ति को लगा दिया है। सैफु निशा को यह परवाह नहीं कि उसे एक किडनी के सहारे अब जिंदगी भर रहना होगा। इतना ही नहीं, वह छपरा के एक गांव में बसे अपने ससुराल से पल-पल भाई रमजान की खबर लेती है। समय पर दवा खाया कि नहीं, अच्छे से हो या नहीं...वगैरह-वगैरह। भाई-बहन के रिश्ते की यह मिसाल शायद अब के परिवेश में देखने को कम ही मिलता है।
Sunday, August 2, 2009
सब कुछ पगला क्यूँ रहा है......??
पानी कहीं नहीं बरस रहा है....चारों तरफ़ हाहाकार मच चुका है....पिछले साल यही पानी जब झूम-झूम कर बरसा था...तब भी इसी तरह का हाहाकार मचा था....पानी इस तरह क्यूँ पगला जाता है...कभी तो बावला-सा मतवाला तो कभी बिल्कुल ही मौन व्रत....!!
दरअसल इसके जिम्मेवार हम ही तो हैं....इसके बनने के तमाम रास्तों में,इसके बहने के तमाम रास्तों में, इसके खिलने के तमाम रास्तों में हमने अपने नाजायज़ खूंटे गाड दिए हैं....एक बिल्कुल ही स्वतंत्र "आत्मा" को अनेकनेक तरह से बाँध दिया है....जो पेड़ अपने असीम प्यार से इन्हें अपने घर से बांधे रहते हैं,या अपनी प्यार भरी मनुहार से रोके रखते हैं,उन पेडों को काट-काट कर अपना फर्नीचर बना लिया है,और ना जाने क्या-क्या दुर्गति कर दी है हमने पेडों की....!!....धरती को हमने बाँझ बना दिया है....धरती अपना कटा-फटा दामन समेटती सहमती-सकुचाती पानी को रोक तक नहीं सकती,रोके तो उसे ठहराए कहाँ ??....और ठहराए तो बिठाए कहाँ....हमने तो हर जगह मलीन और गंदली कर दी है....!!
अपनी नाजायज हरकतों से हमने धरती मा को गोया नेस्तनाबूद कर दिया है.....धरती की तमाम अभीप्सा....जरुरत....अपेक्षा...और अन्य तमाम तरह की अपनी जिम्मेवारियों से अपना पल्ला झाड़ लिया है हमने !!....यह बिल्कुल वैसे ही है,जैसे माँ-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की दुश्वारियों को झेलते हुए,ख़ुद किल्लत बर्दाश्त कर उनकी सब ज़रूरत पूरी करते हुए....उन पर अपना असीम प्रेम उड़ेलते हुए...उन्हें इंच-इंच बड़ा होते हुए देखते हुए....उन्हें सालों-साल पाल-पोस कर बड़ा करते हैं.....और बड़ा होते ही यही बच्चे....उन्हें "बोझ"करार कर
देते हैं....उन्हें "ठिकाने" लगा देते हैं....उन्हें सेंट्रिंग में डाल देते हैं....उनकी उपेक्षा करने लगते हैं.....ठीक वैसा ही हमने धरती के संग भी किया है.....और धरती के साथ जो भी कुछ हम करते हैं....उसका सिला हमें मिलने लगा है....पानी पगला रहा है... हवा पगला रहा है....मौसम पगला रहा है....!!.....नदियाँ पगला रही हैं....!!...और न जाने क्या-क्या उलट-पुलट हो रहा मौसमों में....कब गर्मी है....कब सर्दी...और कब बरसात.....किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा....!!??
अगर हम नहीं रुके तो आने वाले बरसों में इसका परिणाम और भी ज्यादा भयावह होने वाला है....धरती हमें चीख-चीख कर कह रही है....अब बस....अब बस....अब बस .....क्या यह चीख हमें सुनाई पड़ रही है....क्या यह आर्तनाद हमें कभी सुनाई पड़ भी पायेगा.....!!क्या हम खुद को रोक सकते हैं .....????
दरअसल इसके जिम्मेवार हम ही तो हैं....इसके बनने के तमाम रास्तों में,इसके बहने के तमाम रास्तों में, इसके खिलने के तमाम रास्तों में हमने अपने नाजायज़ खूंटे गाड दिए हैं....एक बिल्कुल ही स्वतंत्र "आत्मा" को अनेकनेक तरह से बाँध दिया है....जो पेड़ अपने असीम प्यार से इन्हें अपने घर से बांधे रहते हैं,या अपनी प्यार भरी मनुहार से रोके रखते हैं,उन पेडों को काट-काट कर अपना फर्नीचर बना लिया है,और ना जाने क्या-क्या दुर्गति कर दी है हमने पेडों की....!!....धरती को हमने बाँझ बना दिया है....धरती अपना कटा-फटा दामन समेटती सहमती-सकुचाती पानी को रोक तक नहीं सकती,रोके तो उसे ठहराए कहाँ ??....और ठहराए तो बिठाए कहाँ....हमने तो हर जगह मलीन और गंदली कर दी है....!!
अपनी नाजायज हरकतों से हमने धरती मा को गोया नेस्तनाबूद कर दिया है.....धरती की तमाम अभीप्सा....जरुरत....अपेक्षा...और अन्य तमाम तरह की अपनी जिम्मेवारियों से अपना पल्ला झाड़ लिया है हमने !!....यह बिल्कुल वैसे ही है,जैसे माँ-बाप अपने बच्चों को तमाम तरह की दुश्वारियों को झेलते हुए,ख़ुद किल्लत बर्दाश्त कर उनकी सब ज़रूरत पूरी करते हुए....उन पर अपना असीम प्रेम उड़ेलते हुए...उन्हें इंच-इंच बड़ा होते हुए देखते हुए....उन्हें सालों-साल पाल-पोस कर बड़ा करते हैं.....और बड़ा होते ही यही बच्चे....उन्हें "बोझ"करार कर
देते हैं....उन्हें "ठिकाने" लगा देते हैं....उन्हें सेंट्रिंग में डाल देते हैं....उनकी उपेक्षा करने लगते हैं.....ठीक वैसा ही हमने धरती के संग भी किया है.....और धरती के साथ जो भी कुछ हम करते हैं....उसका सिला हमें मिलने लगा है....पानी पगला रहा है... हवा पगला रहा है....मौसम पगला रहा है....!!.....नदियाँ पगला रही हैं....!!...और न जाने क्या-क्या उलट-पुलट हो रहा मौसमों में....कब गर्मी है....कब सर्दी...और कब बरसात.....किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा....!!??
अगर हम नहीं रुके तो आने वाले बरसों में इसका परिणाम और भी ज्यादा भयावह होने वाला है....धरती हमें चीख-चीख कर कह रही है....अब बस....अब बस....अब बस .....क्या यह चीख हमें सुनाई पड़ रही है....क्या यह आर्तनाद हमें कभी सुनाई पड़ भी पायेगा.....!!क्या हम खुद को रोक सकते हैं .....????
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