Friday, June 27, 2008
रांचीहल्ला को आज एक मेल मिला, जो नीचे दिया जा रहा है। हरमू, रांची से जयकिशन सिंह का कहना है की प्रभात ख़बर के 25 जून के अंक के संपादकीय में एक लेख छापा है, जिसमें बाल ठाकरे की करतूतों की हिमायत की गयी है, लेकिन मैंने जब वह आलेख पढ़ा, तो मुझे लगा कि इसमे किसी कि हिमायत नहीं की गयी है, सिर्फ़ यह बताया गया है की बाल ठाकरे भी हिंसा की समस्या का समाधान नहीं हैं। खैर जो भी हो, हम जयकिशन सिंह जी का पत्र यहाँ हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं। Ranchi Halla is a good effort to highlight media related issues, as well as to expose the so called progressive journalists। Just look at the editorial of Prabhat Khabar of 25 june of 2006 with a caption- "Har Shahar ko ek Thakare Ki jarurat hai" Each Town needs a Bal Thakare. This is the hight of the facism and this is the real face of Prabhat Khabar which claims to be a newspaper of movements. Prabhat Khabar is excited with the threating of Bal Thakare which was against the Sikhs of Maharastra. Prabhat Khabar is happy to see that one Bal Thakare is capable to save the Mumbai from the threat of SIKHs but it does not clear that who will save the nation from the Thakares. The most unfortune is the reality that the country is worried with a single Thakre at Mumbai, but the progressive newspaper is advocating for one Thakare in each city. Shame. I request you to publish my views in your blog
Thursday, June 26, 2008
नदीम अख्तर
नाम खूब सुना होगा आपने भी - सूचना आयोग। इस आयोग का काम है लोगों को सूचना उपलब्ध होने में हो रही देरी का समाधान करना और सूचना के अधिकार का दुरूपयोग करने वालों को रास्ते पर लाना। लेकिन क्या आपको मालूम है कि झारखंड में जो सूचना आयोग है, उसमे ऐसे-ऐसे पैरवी-पुत्र घुस गए हैं कि उन्हें मर्यादा तक का ख़याल नहीं है? आपको बता दूँ कि झारखण्ड राज्य सूचना आयोग में कुछ सूचना आयुक्तों ने कुछ दिनों पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त के ही ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था। उनके बारे में खूब कीचड़ उछाले गए। अनाप-शनाप जो मन में आया सब बात मीडिया के सामने सूचना आयुक्तों ने उगले। इतने भद्दे और इतने अशालीन तरीके से सूचना आयोग को अपने अहम को तुष्ट करने का जरिया बनाया गया कि उस पूरे प्रकरण कि अगर विडियो फ़िल्म बना दी जाए तो यकीन मानिये कि वह फ़िल्म सेंसर बोर्ड तो कभी पास नहीं करेगा। और गलती से पास कर भी देगा तो उस पर टैग लगा देगा केवल वयस्कों के लिए। खैर सूचना आयुक्तों को इससे क्या फर्क पड़ता है। ज्यादातर सूचना आयुक्त किसी न किसी तरह से राजनीतिक पहुँच वाले हैं। एक-दो लोगों को छोड़ दिया जाए तो किसी में इस पद की गरिमा को बचाए रखने की कोई चिंता इसलिए नहीं है, क्योंकि इनका संस्कार ही कहीं से भी गरिमामयी नहीं है। सब के सब सुविधा भोगी और सरकारी धन खाने की नियत से यहाँ तक पैरवी कर के पहुंचे हैं। भला बताइए कि अगर समाज सेवा के लिए ही ये लोग यहाँ तक आते तो क्या एक-दूसरे के साथ अहम की लड़ाई होती। और अगर हो भी जाती तो क्या ये तथाकथित बुद्धिजीवी अपनी लड़ाई को सड़क पर ले आते। असल में इन लोगों में से एक ऐसे भी हैं, जो अपने आप को सुप्रीम समझते हैं। उनका ऐसा सोचना है कि समाज के पहले और आखिरी अक्लमंद सिर्फ़ वो ही हैं। बाकी सब कीडे-मकौडे।इसी घमंड के कारण वो समझ लेते हैं कि ये वही जगह (सूचना आयोग) है, जहाँ ये पहले अपने आप को समाज का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कह कर अपने साथियों को हड़काया करते थे। असल में उनकी वो गन्दी और सामंती आदत तो नहीं जा सकी है, इसलिए उनके मन में ये ख़याल रह रह कर आता होगा कि यहाँ मेरी धाक क्यूँ नहीं चलेगी। मैं चला कर रहूँगा, इन साहब के लिए दो पंक्ति...
हवा हुए वो दिन
जब पसीना गुलाब था
अब ऐसे सामंती प्रवृति वाले आदमी को निश्चित रूप से ज़मीन देखनी होगी।और सबसे बड़ी बात तो यह है कि पैरवी के बल पर सूचना आयोग में आ जाना अलग बात है और कार्यकाल समाप्त होने के बाद एक अदद अच्छी नौकरी खोजना अलग है। लाखों का सवाल तो यह है कि क्या ये सूचना आयुक्त अपने कार्यकाल के दौरान इतनी दौलत बटोर लेंगे कि इन्हें आगे कोई काम ना करना पड़े। और अगर नहीं तो ये तैयार रहें अपने पुराने हाउस से ही शर्मिंदा हो कर निकलने के लिए। तब तक के लिए - जय हिंद, इनका ड्रामा चालू है...देखते रहिये...
सुनील चौधरी
कोई क्यों नहीं सुनता इन सिसकियों को
किसी की आँखें नम होती नहीं क्यों
जो हमेशा से दीन-हीन
तब भी जब थे गुलाम हम
अब भी जब हैं आजाद हम.
माँ के स्तनों के दूध सूख गये
पिता की बाहें कमज़ोर हो गयीं
कलम की स्याही सूख चुकी है
कलम की जगह कीबोर्ड
Wednesday, June 25, 2008
आज भी महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार, लिंगभेद, दहेज के कारण प्रताड़ना तथा अन्य उत्पीड़न आदि जारी है परन्तु इन समस्याओं के बावजूद महिलाऐं अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रही है और सभी क्षेत्रों में सफलता की उचाईयों को छु रही हैं। व्यापार, प्रबंधन, इन क्षेत्र में पुरूषों की ही भागीदारी रही है और पुरूष उधमी ही सफल मानें गये है। लेकिन ये मिथक अब टुट रहा है और महिलाएं भी अब सफल उधमी एवं प्रबंधक साबित हो रही है। भारत में काफी महिलाएं सफल उधमी हैं तथा प्रंबधन का कार्य भी वे सफलतापूर्वक कर रही है चाहे वह मल्टीनेशनल कंपनी ही क्यों न हो। इन सफल उधमियों एवं प्रबंधनकर्ताओ में प्रमुख हैं पेप्सी की सीइओ इंदिरा नुयी, बाइकोन की मालकिन किरण शा मजुमदार, शाहनाज हुसैन, शाहनाज हर्बल की मालकिन, अखिला श्रीनीवासन, मैनेजिंग डायरेक्टर, श्रीराम इंवेश्टमेंटस् लिमिटेड। इन महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वे अब किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से कम नहीं हैं और देश एवं समाज के उत्थान में अपनी प्रमुख भूमिका अदा कर रही हैं। ज्योति नायक :प्रेसिडेंट, लिज्जत पापड़
किरण शा मजूमदार :चैयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर, बाइकोन
प्रीथा रेड्डी :मैनेजिंग डायरेक्टर, अपोलो अस्पताल
रंजना कुमार : चैयरमैन, नाबार्ड
शाहनाज हुसैन :सीइओ, शाहनाज हर्बल्स
इंदिरा कृष्णामूर्ति नुयी, विश्व की चौथी सबसे बड़ी खाद्य एवं पेय कंपनी पेप्सी की सीइओ हैं। फोब्र्स मैगजीन के अनुसार 2007 में विश्व की 100 प्रभावशाली महिलाओं मे इनका पांचवा स्थान है तथा फार्च्यून मैगजीन ने 2006 एवं 2007 में इन्हें व्यापार जगत में सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में पहला स्थान दिया है। किरण शा मजूमदार 2000 करोड़ से भी अधिक पूंजी वाली बायोकोंन ग्रुप की स्वामी है। 1978 में इस कंपनी की इन्होनें स्थापना की थी। ये भारत की एक सफल महिला उधोगपति मानी जाती है। भारत सरकार ने इन्हें 1989 में पद्मश्री एवं 2005 में पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया है। अखिला श्रीनीवासन 5000 करोड़ की स्वामित्व वाली श्रीराम ग्रुप की सहायक कंपनी श्रीराम इंवेश्टमेंट्स लिमिटेड की प्रमुख हैं। 2001 में एफआइसीसीआइ नें इन्हें उधोग जगत में अपनी योगदान के लिये अवार्ड से नवाजा है। सौदर्य प्रसाधन के क्षेत्र में क्रांति लाने का श्रेय शाहनाज हुसैन को है। इन्होनें प्राचीनतम आयुर्वेदिक तकनीक का सहारा लेकर हर्बल सौंर्दय प्रसाधन को बाजार में लाने का कार्य किया। आज वे 100 मिलीयन डालर से उपर की शाहनाज हर्बल्स की मालकिन है। 1970 में स्थापित इस ग्रुप की शाखा पुरे विश्व में लगभग 400 स्थानों पर स्थापित हैं। ज्योति नायक लिज्जत पापड़ की प्रसिडेंट हैं। 2001-2002 में इकोनोमिक टाईम्स नें सर्वश्रेष्ठ बिजनेशवोमैन के सम्मान से नवाजा। यें लिज्जत पापड़ की गरिमामय इतिहास को बरकरार रखी हुई हैं। 15 मार्च 1959 में मुम्बई में सात महिलाओं ने महिला गृह निर्माण उधोग के अंर्तगत लिज्जत पापड़ का व्यापार शुरू किया था। आज इसमें 42 हजार महिलायें कार्य कर रही है। पूरे देश में इसकी 67 शाखाएं चल रही है। इसकी संपति 350 करोड़ से उपर चली गई है। यह उधोग महिलाओं की सशक्त भागीदारी की एक गाथा है। एकता कपुर बालाजी टेली फिल्म की मालकिन हैं। टेलीविजन में सीरियलों के अलावा फिल्म निर्माण में भी इनकी कंपनी सफल रही है। नैना लाल किदवई, रीतु नंदा, रेनुका रामनाथ और अनेक महिलायें सफलतापूर्वक व्यापार को चला रही हैं। महिलाएं न केवल व्यापारिक सफलता हासिल कर चुकी हैं बल्कि अपने आप को सफल प्रबंधक साबित कर चुकी हैं। ये महिलायें भारत में और लोगों खासकर महिलाओं के लिये प्रेरणास्रोत का कार्य कर रहीं हैं। ये साबित कर चुकी हैं कि अगर बुंलद इरादे और अदम्य इच्छाशक्ति हो तो लक्ष्य को पाया जा सकता है चाहे डगर कितना भी कठिन क्यों न हो। ये भारत की पुरूष प्रधान समाज में अपनी पहचान बना चुकी हैं इस इरादे से कि हम में भी है दम
Monday, June 23, 2008
अरुण कुमार बर्णवाल
झारखण्ड सरकार ने काफी इंतजार के बाद सूचना आयुक्त के नाम की घोषणा तो कर दी, परन्तु इसमें राजनीति का असर देखा गया । सूचना कानून को जन-जन तक पहुचने में अहम् भूमीका निभानेवाले विष्णु राजगडिया को नजर अंदाज कर दिया गया । विष्णु जी इस मुकाम तक नहीं जाएं इसमें उनके पुराने दोस्तों ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ा । प्रभात खबर छोडने के बाद से ही उनके पीछे गुपचुप तरीके से यह प्रयास किया जा रहा था कि वह इसमें सफल न हों । इसमें वे सफल भी हो गये । देखा जाये तो झारखंड में सूचना के अधिकार को फैलाने में श्री राजगडिया ने काफी योगदान दिया है, उसपर राजनीति तो होनी ही थी। अभी सिर्फ़ इतना ही हुआ है कि एक और जनता के लिए काम करने वाले का मन कुछ देर के लिए टूटा है। सवाल तो कई हैं, लेकिन उससे होगा क्या। जो लोग आज सूचना आयुक्त कि कुर्सी पर बैठे हैं, उनकी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने से बेहतर है कि साडी-गली व्यवस्था को ही ठीक करने का प्रयास किया जाए। झारखंड सरकार को कोटि-कोटि प्रणाम...!!
Saturday, June 21, 2008
विष्णु जी सूचना का अधिकार किताब के लेखक भी हैं। वे देश में सूचना का अधिकार कानून लागू कराने के लिए काफी लडाई भी लड़ चुके हैं। ख़ास कर प्रभात ख़बर के माध्यम से उन्होंने सूचना आन्दोलन को एक मुकाम पर पहुंचाया। रांचीहल्ला की टीम उन्हें उनके नए दायित्व के लिए शुभकामनाएं देती है और उनसे अपेक्षा रखती है की जिस तरह उन्होंने सूचना आन्दोलन की मशाल जलाई उसी तरह वे गरीब बच्चों का जीवनस्तर ऊपर उठाने कि दिशा में अग्रसर रहेंगे।
Friday, June 20, 2008




प्रभात ख़बर के चार लोगों का धनबाद से पटना तबादला
प्रभात ख़बर धनबाद के चार कर्मचारियों का पटना ट्रान्सफर कर दिया गया है। सभी डेस्क में ही काम करते थे। अभी यह स्पष्ट नही है कि यह तबादले क्यों किए गए हैं, लेकिन जानकार सूत्र बताते हैं कि हाल ही में ज्वाइन कर चुके नए संपादक श्री दीपक अम्बस्ठ हिन्दुस्तान से कुछ लोगों को अपनी टीम में शामिल करने के लिए ले आए हैं। इसी वजह से धनबाद के पुराने लड़कों को इधर-उधर एडजस्ट किया जा रहा है। वैसे ख़बर यह भी है की जिन लोगों का तबादला हुआ है, उन्होंने ख़ुद यह बात नए संपादक से कहा था कि आप हम लोगों का तबादला पटना कर दें। जिन लोगों का तबादला किया गया है, उनके नाम इस प्रकार हैं - 1 देवेन्द्र कुमार 2 ओम प्रकाश उर्फ़ ओ पी 3 रंजय कुमार 4 अनिरुद्ध (ऊपर तस्वीर क्रम में है.)
मैं इन सभी कर्मठ युवाओं को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। ये सभी काफी मेहनती हैं और दुनिया के किसी भी कोने में रह कर रोते हुए आदमी को हँसाने का माद्दा रखते हैं। नयी चुनौती ये जल्द ही संभालेंगे। इन्हें रांचीहल्ला टीम की ओर से ढेर सारी सुभकामनाएं।
Thursday, June 19, 2008
कश्मीर में इस बार सैलानी मौसम सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। डल झील में शिकारों की मरम्मत का काम बदस्तूर जारी है और सालों से जिन हाउसबोट मालिकों ने अपनी रोज़ी के इंतज़ाम का कोई दूसरा ज़रिया ढूंढ लिया था, वे भी अब पर्यटन से होनेवाली आमदनी की ओर नज़र टिकाये बैठे हैं। कश्मीर के हालात सुधरने का ला न केवल वहां के लोगों को मिलेगा, बल्कि वर्षों से सिने जगत की नज़रों से ओझल हो चुकी घाटी की वादियां के फ़िर से रुपहले पर्दे पर नज़र आने की पूरी उम्मीद है। हाल ही में फील्म दास्तान की शूटिंग कश्मीर में पूरी की गयी, जिससे स्थानीय लोगों में आशा की किरण जगी है। पहलगाम में जब गांव के बेटे अनुपम खेर ने इस फिल्म की शूटिंग के लिए कदम रखा, तो लोग खुशी से झूम उठे। राहुल बोस, सारिका और खेर के साथ जब फिल्मकार संतोष शिवन घाटी में आये, तो यह एक तरह से नये युग की शुरुआत के जैसा ही था। एक वक्त था, जब बाहरी दृश्यों को फिल्मानें के लिए कश्मीर को निर्देशक अपनी पहली पसंद मानते थे। फिर जैसे-जैसे यहां आतंक की फैक्ट्री फली-फूली वैसे-वैसे बौलीवूड ने घाटियों से कन्नी काट ली। अब बदलते हालात के साथ ऐसा महसूस किया जाने लगा है कि बीते समय की कुछ हिट आरज़ू, आन मिलो सजना और सिलसिला जैसी फिल्मों की ही तरह नयी फिल्मों की भी शूटिंग यहां पूरी होगी। दरअसल, कश्मीर में आतंकवादियों की धमकी के कारण यहां के सिनेमा ह‚ल बंद कर दिये गये थे और कोई शूटिंग भी वर्ष 1990 से नहीं हो रही थी। 90 में आंतकी चेतावनी के बाद श्रीनगर के पल्लाडियम और सोपोर के समद टाकीज़ को बंद कर दिया गया था। इसके बाद शाह सिनेमा, खैयाम और सिराज के खुले रहने के कारण इन पर ग्रेनेड हमले हुए और अब ये सिनेमाघर सेना की निगरानी में हैं। अभी पूरे कश्मीर में केवल एक सिनेमा घर नीलम ही है, जहां शो चल रहे हैं। इसे दोबारा तब खोला गया, जब इसके मालिकों को यह आभास हुआ कि स्थिति तेज़ी से बदल रही है। 1960 से 1990 के दौरान प्रतिवर्ष तकरीबन 90 फिल्में कश्मीर में बंटी थीं, लेकिन आज 18 साल से घाटी में फिल्म निर्माण का कार्य पूरी तरह से ठप हो गया है। 18 वर्षों में दास्तान ही इकलौती फ़िल्म होगी, जो कश्मीर में बन कर तैयार होगी। दूसरी ओर कश्मीर में 1975 की बालीवुड हिट शोले का रिमेक तैयार किया गया है, जो कश्मीरी में है। नाम भी वही है - शोले। इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद ऐसा महसूस किया जा रहा है कि जल्द ही कश्मीर के पुराने दिन लौटेंगे।
वैसे पुलिस और सुरक्षा बलों को हजारों आतंकवादियों की संख्या को सैकड़ों में लाने के लिए 17 से अधिक साल का लम्बा समय लगा है, जिसके लिए लगातार संघर्ष अब भी जारी है। अब देखना होगा कि आकंतवादियों पर नकेल इसी तरह से कसी रहेगी या गर्मियों में राज्य में होने जा रहे चुनावों पर नजर टिकाये आकंतवादी अपनी हिंसक हसरतों के चलते उन्हें चुनौती देंगे। (आगे पढिये गूगल पर कश्मीरी में सर्च इंजन)
Tuesday, June 17, 2008
बड़ी संख्या में आज लड़की न चाहने वाले दंपित्त भी इनका सहारा ले रहे हैं। दिल्ली में रहने वाली मधुमति(नाम बदला हुआ) दो बेटियों की मां बनने के बाद जब तीसरी बार गर्भवती हुई तो उसने भ्रूण परीक्षण कराया। यह पता लगने पर कि उसके भ्रूण में फिर एक कन्या पल रही है, उसने गर्भपात करा लिया। भ्रूण हत्या की यह प्रक्रिया उसने इस उम्मीद के साथ आठ बार दोहराई कि वो एक बेटे की मां बन सके। लेकिन ऐसा करने के क्रम में उसकी सेहत इतनी खराब हो गयी कि वह फिर आगे मां नही बन सकी। सामान्यत: ऐसा देखा गया है कि भारत के छोटे या पिछड़े शहरों में ही ऐसी घटनाये ज्यादा देखने को मिलती है। लेकिन हाल ही में बड़ी संख्या में एनआरआई द्वारा कन्या भ्रूण की जांच से यह बात झूठी साबित हो गयी। विदेशों में रहने वाले भारतीय भी लिंग जांच में पीछे नही है। अपने देश में परिवार वालों से मिलने के नाम पर अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) भी लिंग जांच करवाने भारत आते रहते है। कारण विदेशों में महंगा गर्भपात नही करा सकते और साथ ही वहां ये सुविधाएं इतनी सहजता से उपलब्ध नही है। हालांकि अजन्मे शिशु के लड़का या लड़की होने की जानकारी देना कानूनन अपराध है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर वर्ष साढ़े सात लाख कन्याओं को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है। ऐसी ही एक कहानी मीना की है। मीना का (नाम बदला हुआ) जन्म ब्रिटेन में ही हुआ और वह एक पंजाबी मध्यम वर्गीय परिवार में पली-बढ़ी। शादी के बाद एक के बाद एक तीन बेटियां हुई। उसके ऊपर बहुत दबाव रहता कि वह बेटा पैदा करने में नाकाम रही। लड़का पैदा करने का सामाजिक दबाव भारतीय परिवेश में बहुत अधिक होता है और यह दबाव ब्रिटेन में रहने वाली भारतीय महिलाओं पर भी कम नही होता। यह दबाव हमेशा पति के परिवार वालों की ओर से ही होता है, ऐसी बात नही .जैसे ही कोई महिला गर्भवती होती है, आसपास के लोग कहने लगते है कि देखना इस बार लड़का ही होगा, हम लड़के पैदा होने पर खुशियां मनाएंगे। लेकिन अगर लड़की पैदा हो जाए तो सब निराश हो जाते है। मन मसोस कर रह जाते हैं। उसे हमेशा बेटा न पैदा करने का ताना दिया जाता। परिवार में उसके राय की अहमियत नही रह जाती और उसे उपेक्षित कर दिया जाता। जब वह चौथी बार गर्भवती हुई तो अपने पति के साथ भारत आकर लिंग जांच कराने का फ़ैसला किया यह जानने के लिए की गर्भ में लड़का है या लड़की। वह इस बात से चिंतित थी कि अगर इस बार लड़की हुई तो क्या होगा, यह परिवार के लिए बहुत ज़रूरी था और आर्थिक तौर पर भी उसका परिवार चार लड़कियों का बोझ नही उठा सकता था। तब उसने इंटरनेट पर भारत के डॉक्टरों को खोजा, दिल्ली में टेस्ट करवाने पर पता चल गया कि इस बार भी लड़की है और उसे गिराने का फैसला कर लिया।
चिकित्सा पत्रिका लांसेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जो महिलाएं पहले ही लड़की को जन्म दे चुकी हैं, वे अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल दोबारा लड़की न होने के लिए करती हैं। शोधकर्ताओं ने कहा है कि लड़कियों की भ्रूण हत्या का चलन पढ़ी लिखी महिलाओं में ज्यादा है और धर्म का भी इस पर कोई असर नही पड़ा। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के चलते भारत में लिंगानुपात में असंतुलन लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। भारत में कन्या भ्रूण की हत्या में सामाजिक-आर्थिक पहलू ज्यादा ज़िम्मेदार होता है। भारत में परंपरागत रूप से लड़की को हीन समझा गया है और उसे ज़िम्मेदारी समझा गया है। कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का कहना है, `इससे अलग कोई और हिंसक गतिविधि इतनी दर्दनाक नहीं है और यह बहुत शर्मनाक भी है। महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण के तमाम सरकारी गैर सरकारी दावों और प्रयासों के बावजूद पुरूषों की तुलना में महिलाओं की संख्या में और कमी आ रही है। जन सान्खिक्य आयोग की हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अगले कुछ वर्षो में प्रति हज़ार पुरूषों की तुलना में महिलाओं की सं`या में और गिरावट आएगी। सेंटर फार सोशल रिसर्च की निदेशक एवं कन्या भ्रूण हत्या पर नियंत्रण के लिए सरकार द्वारा गठित प्री कनसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीकल पैनल की सदस्य रंजना कुमार ने कहा कि यह आंकड़े इस धारणा को गलत ठहराते हैं कि शिक्षा और विकास से महिलाओं के प्रति लोगों की सोच में बदलाव आता है। कन्या भ्रूण हत्या के पीछे रूढ़िवादी सामाजिक कारणों के साथ साथ तकनीकी सुविधाएं भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। अल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकें में गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए विकसित की गई थी लेकिन अपने देश में इसका प्रयोग धड़ल्ले से लिंग निर्धारण के लिए किया जाने लगा। ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस तकनीक के फैलाव से भ्रूण हत्याओं के आंकड़ों में तेजी से इज़ाफ़ा हुआ। लड़कियों के प्रति इस नकारात्मक स्वाभाव के गंभीर सामाजिक और अन्य प्रभाव हो सकते है। बार-बार गर्भपात से औरतों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। गैर-सरकारी संगठनों ने महिला उत्थान अध्ययन केंद्र और सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च ने एक संयुक्त प्रकाशन में चेतावनी दी है कि यदि महिलाओं की संख्या ऐसे ही घटती रही तो महिलाओं पर हमले होंगे, उसे ज़बरदस्ती एक से अधिक पुरूषों की पत्नी बनने पर मजबूर भी किया जा सकता है। अरब जातियों में लड़कियों को जिंदा दफ़न करने की प्रथा असभ्य काल में प्रचलित थी लेकिन भारत में कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा उन क्षेत्रों में बढ़ी हैं जहां शिक्षा, खासकर महिलाओं की शिक्षा काफी उच्च दर पर है और लोगों का आर्थिक स्तर भी अच्छा है। महिला उत्थान के लिए काम करने वाली ग़ैर सरकारी संगठन ´जागूरी´ की अध्यक्षा कल्याणी मेनन सेन का कहना है, स्त्री जिस शिक्षा के लिए महिला आंदोलन चलाए गए, वही शिक्षा आज जहां पहुंची है वहां महिलाओं की संख्या घट रही है। महिला शिक्षा अपने आप में महिला उत्थान का कारण नही बन सकती बल्कि यह शिक्षा के साथ उच्च स्तर की विकासवादी मानसिकता के साथ ही सम्भव है।
बेटे की चाहत ने बिगाड़ दिया अनुपात
Monday, June 16, 2008
प्रदीप जी को मिला वर्षों की मेहनत का फल
Saturday, June 14, 2008
रविप्रकाश जी आइनेक्स्ट के एडिटर बने
एक अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत प्रभात खबर, रांची से एक साथ आठ लोगों ने इस्तीफा देकर वहीं पर नए लांच होने जा रहे आई-नेक्स्ट को ज्वाइन कर लिया। ये सभी प्रभात खबर, रांची में डिप्टी एडीटर रवि प्रकाश के नेतृत्व में आई-नेक्स्ट में आए। रवि प्रकाश आई-नेक्स्ट रांची के संपादकीय प्रभारी होंगे। इसी जून महीने के अंत में आई-नेक्स्ट का रांची सं प्रकाशन संभावित है। रवि प्रकाश के साथ जो लोग प्रभात खबर छोड़कर आई-नेक्स्ट में आए हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं... नरेंद्र, ताज, राजेश राय , अनुप्रिया वर्मा, पिंटू दुबे, विजय पांडेय और विकास। इन सभी रवि प्रकाश के साथ ही प्रभात खबर से इस्तीफा देकर आई-नेक्स्ट ज्वाइन किया। हालांकि सूत्रों का कहना है कि यह सब होना अप्रत्याशित नहीं है। प्रभात खबर से हमेशा लोग जाते रहे हैं और उनकी जगह नए लोग आकर सफलतापूर्वक काम संभालते रहे हैं। वहीं, अन्य लोगों का कहना है कि अभी कुछ लोग और प्रभात खबर से टूट सकते हैं।
अब थोड़ी बात रवि प्रकाश के बारे में जो आई-नेक्स्ट, रांची के संपादकीय प्रभारी होंगे। रांची से पहले रवि देवघर में थे और यहां 2 वर्षों तक प्रभात खबर के रेजीडेंट एडीटर रहे। देवघर से पहले वे पटना में बतौर न्यूज एडीटर प्रभात खबर में कार्यरत रहे। रवि प्रकाश ने उत्तर प्रदेश के भी कई जिलों में काम किया है। वे बतौर सीनियर सब एडीटर दैनिक जागरण, बरेली और मुरादाबाद में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
रवि प्रकाश ने रिपोर्टिंग के फ्रंट पर भी नाम कमाया हुआ है। नेपाल में शाही नरसंहार और सार्क सम्मेलन जैसे इवेंट्स को रवि ने काठमांडू जाकर कवर किया। इन इवेंट्स पर जो तथ्य व रिपोर्ट रवि ने प्रकाशित किए, वे काफी चर्चित हुए।
यह ख़बर सबसे पहले भडास में आयी और उसके बाद मेरी (नदीम अख्तर की) बात रवी जी से हुई। उन्होंने इसकी पुष्टी कर दी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने जागरण रांची के दफ्तर के ऊपर में ही बने आइनेक्स्ट के दफ्तर में योगदान भी दे दिया है। उनके अनुसार आइनेक्स्ट रांची की लौन्चिंग २१ जून को सम्भव है। रवि जी के साथ चूंकि मैं भी प्रभात ख़बर में काम कर चुका हूँ इसलिए यह कह सकता हूँ कि आइनेक्स्ट को रवी जी निश्चित ही एक अच्छे मुकाम पर पहुंचाने में कामयाब होंगे। रांचीहल्ला की पूरी टीम के तरफ़ से उनको लख-लख बधाइयां...
संशोधन
सबसे पहले क्षमा याचना उन लोगों से, जिन्हें इस पोस्ट के कारण थोडी सी भी परेशानी हुई। मैं बता दूँ कि आई-नेक्स्ट ज्वाइन करने वाले जिन आठ लोगों के नाम प्रभात ख़बर से जाने वालों की फेहरिस्त में था, उनमें से तीन लोग अज्ञात कारणों से प्रभात ख़बर में ही रुक गए हैं। इन लोगों के नाम हैं - विकास कुमार (धुर्वा निवासी), अनुप्रिया वर्मा और ताज। इन लोगों को पन्द्रह जून की शाम प्रभात ख़बर में ही काम करते हुए देखा गया। इनके अलावा नरेन्द्र जी के बारे में कहा गया है कि उन्होंने काफी पहले ही इस्तीफा दे दिया था, इसलिए उनका वर्त्तमान में प्रभात ख़बर से कोई लेना देना नही था। दुबे हिंदुस्तान के कर्मचारी थे। वे पहले ही प्रभात ख़बर छोड़ चुके थे। वहीं राजेश राय प्रभात ख़बर पटना के कर्मचारी थे। इसके अलावा जिन विजय पाण्डेय के बरे में कहा गया हैम उन्हें कोई नहीं जानता कि वे प्रभात ख़बर के किस संस्करण में थे। तो कुल मिला कर आज कि तारिख मे प्रभात ख़बर से आफिसियल जानकारी यही मिली है कि आई-नेक्स्ट जाने वाले प्रभात ख़बर के केवल एक कर्मचारी हैं, जिनका नाम है रवि प्रकाश।
आई-नेक्स्ट ज्वाइन करने से पहले मैं प्रभात ख़बर में ही काम कर रहा था। मुझे आई-नेक्स्ट से कॉल आया तो मैं साक्षात्कार देने गया था। वहाँ से आने के बाद प्रभात ख़बर मे मुझसे पूछा गया कि आप साक्षात्कार देने गए थे? मैंने अपनी साफगोई से बता दिया कि हाँ हम गए थे। प्रभात ख़बर के कार्यकारी संपादक ओंम प्रकाश अश्क जी ने मुझसे इसी बात पर इस्तीफा मांग लिया। अब बताइए, अगर कोई मजदूर नरेगा के तहत गाँव मे काम कर रहा हो और उसी दौरान शहर में काम खोजने के लिए एक दिन के वास्ते चला जाए, तो क्या उसको नरेगा से भी काम नहीं मिलेगा ? यह तो ऐसा ही है कि अगर किसी कारण से मेरी सूरत ही पसंद नहीं है, तो मुझे किसी भी मामले में घसीट कर काम छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाए। और मेरे साथ भी यही हुआ, मुझसे जबरदस्ती इस्तीफा ले लिया गया, जबकि मैं प्रभात ख़बर में ही काम करना चाहता था। मेरा कुसूर तो इतना ही था न कि मैं साक्षात्कार में शामिल होने चला गया था, तो फ़िर उन लोगों से भी इस्तीफा क्यों नहीं माँगा गया जो लोग मेरे साथ ही साक्षात्कार देने के लिए आई-नेक्स्ट गए हुए थे। क्या मेरी शक्ल इतनी ख़राब है कि अकेले हम ही से इस्तीफा माँगना उचित समझा गया। और मैं यह पूछना चाहता हूँ कि आख़िर यह कहाँ का न्याय है कि अगर कोई आदमी बेहतर विकल्प कि तलाश करे तो उससे रोज़ी-रोटी ही छीन ली जाए? वैसे मुझे अब इस बात का कोई गम नहीं कि मुझे इस्तीफा देना पड़ा लेकिन गम इस बात का है कि हमको अपने घर से ही अपने परिवार वालों ने बेगाना कर दिया। खैर हमको किसी से कोई शिकायत नहीं है। पत्रकारिता में हम सभी को यह याद रखना चाहिए कि किसी भी आदमी से किसी कि भी मुलाक़ात कहीं भी हो सकती है, और जब भी हम एक-दूसरे से मिलें तो कभी एक-दूसरे से नज़रें मिलाने में शर्मिंदगी महसूस न हो।
आप सभी का आभारी
नरेन्द्र कुमार
(यह चिठ्ठी नरेन्द्र जी ने रांचीहल्ला टीम को १६ जून की सुबह ही भेजी है। नरेन्द्र जी फिलहाल आई-नेक्स्ट में हैं)
अमरकांत ने भी आई-नेक्स्ट ज्वाइन किया
प्रभात ख़बर में कार्यरत अमरकांत ने आई-नेक्स्ट ज्वाइन कर लिया है। आज (18 जून) उन्होंने अपना योगदान दिया है। उन्होंने रांचीहल्ला से बातचीत करते हुए कहा की जिस तरह वो प्रभात ख़बर में म्हणत और लगन से काम किया करते थे, वैसे ही आई-नेक्स्ट में भी करेंगे। अमरकांत जी मूलतः शिक्षा बीट के पत्रकार हैं। उन्होंने अपने पत्रकारिता के माध्यम से कई बड़ी स्टोरी ब्रेक की। निष्पक्ष पत्रिकारिता की राह में अग्रसर अमरकांत जी युवा और कर्मठ तो हैं ही, साथ ही साथ कर्मयोगी भी हैं। उनका पैतृक आवास बोकारो में है। संयोग से मुझे उनके घर जाने का
एक बार मौका मिला, तो मैं गया। लेकिन बहुत अफ़सोस तब हुआ जब मैं धनबाद से बोकारो उनसे मिलने गया और उन्ही से मुलाकात नही हो पाई। खैर ये बात एक साल पुरानी है, जब मैं धनबाद प्रभात ख़बर में हुआ करता था। स्मृतियाँ अनंत हैं....
Friday, June 13, 2008
वादियों में अमन की आहट
तेज़ी से बदलते हालात ने कश्मीर में नयी संभावनाओं के दरवाज़े खोले हैं। कई आतंकी गतिविधियों के कारण देश के सबसे बदतर राज्य में शुमार होनेवाले जम्मू-कश्मीर में आज तेज़ी से हालात बदलते नज़र आ रहे हैं। सीमा पार आतंकवाद में आयी कमी और एक के बाद एक आतंकियों के पकड़े जाने या फ़िर मुठभेड़ में ढेर होने के कारण इस राज्य में दहशत के सौदागरों की संख्या कम हुई है। यही वजह है कि अब कश्मीर की वादियों में फ़िर से सैलानियों की धमाचौकड़ी सुनने को मिल सकती है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में हिंसा की वारदातों में कमी आने के बाद यहां फिल्म निर्माताओं, निवेशकों, सैलानियों और बड़े उद्योगपतियों ने रुचि दिखानी शुरू की है। राज्य में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने निवेश की इच्छा जतायी है। इसकी शुरूआत राज्य विद्युत विकास कार्पोरेशन (पीडीसी) में निवेश से हो रही है। राज्य सरकार के आर्थिक सलाहकार हसीब द्रबु के अनुसार पीडीसी इसके लिए तैयारियों में जुटी है। पीडीसी 20 हज़ार मेगावाट बिजली का उत्पादन करके भारत का सबसे बड़ा बिजली उत्पादक बनने की क्षमता रखता है। मार्च में ही दुनिया की 12 बड़े निवेशक एक गुट के रूप में वैकल्पिक निवेश स्थलों की तलाश में भारत आए थे। उन्होंने कश्मीर में तीन दिन बिताये। पनबिजली के अलावा उन्होंने राज्य की वित्तीय सेवाओं में भी निवेश करने की इच्छा ज़ाहिर की है। वैसे आधिकारिक तौर पर यह कहा जा रहा है कि राज्य सरकार इस तरह के नियम बना रही है जो विदेशी निवेशकों के लिए भी लाभकारी सिद्ध हों। विदेशी कंपनियों ने लघु और मध्यम उद्योगों में निवेश करने की संभावनाओं पर भी विचार किया है, जिसमें तीन से पांच साल के बीच ही बाज़ार तक पहुंचने की क्षमता हो। सीमा के दोनों ओर होने वाले समझौते के लिए पूरी तैयारी कर ली गयी है और पाकिस्तान की नयी सरकार के दफ्तर संभाल लेने के बाद ऐसे कयास लगाये जा रहे हैं कि इस संदर्भ में बातचीत जल्द ही शुरू होगी। इसके अलावा, केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री जयराम रमेश की मानें तो इन गर्मियों से कश्मीर की सीमा पर दोनों ओर से व्यापार शुरू होने की पूरी उम्मीद है। दूसरी ओर राज्य में बदलते हालात की गवाही कुछ विकास कार्यों की आधारशिलाओं से भी मिलती है। श्रीनगर के नज़दीक पांपोर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला केंद्र की आधारशिला मार्च के अंतिम सप्ताह में रखी गयी। इस केंद्र पर 49 करोड़ डॉलर का खर्च आने की उम्मीद है। सरकार ने राज्य के कारीगरों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए 85 करोड़ रुपये की एक परियोजना भी तैयार की है।
कश्मीर में आतंक के सौदागरों की कम होती संख्या के कारण ही कुछ सृजनात्मक कार्यों में गति आयी है। राज्य पुलिस के अनुसार कश्मीर में अब सिर्फ 450 आतंकी सक्रिय हैं। पिछले साल पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों और सेना ने लगग 460 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया था और आतंकवादियों के सफाए का यह अभियान वर्ष 2008 में भी जारी है। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक फरवरी और मार्च (2008) के दौरान कश्मीर घाटी में घुसपैठ करने की कोशिश करते दर्जन भर आतंकवाद मुठभेड़ के दौरान मारे गये। डीजीपी कुलदीप कुंडा कहते हैं कि माना जा रहा है अब केवल 450 आतंकवादी ही कश्मीर में सक्रिय हैं। हम उनकी गिनती नहीं कर सकते हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति इतनी ही है और इसमें सूचीबद्ध और गैरसूचीबद्ध आतंकवादी भी शामिल हैं। पुलिस के अनुसार आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के भी सैकड़ों आतंकवादियों को हिरासत में लिया जा चुका है। कश्मीर के आईजीपी एसएम सहिया की मानें तो पुलिस ने आतंकवादी संगठनों के शीर्ष नेताओं, उनके जिला कमांडरों और वित्त प्रमुखों को मार गिराया है। अब शीर्ष कमांडरों की संख्या 130 से 160 के बीच ही रह गयी है। वैसे पुलिस यह भी दावा कर रही है कि आतंकवादियों के खिलाफ अभियान में पुलिस को स्थानीय लोगों की भी सहायता मिल रही है। 90 के दशक में आतंकी हिंसा के चलते कश्मीर में प्रतिदिन औसतन नौ आम आदमी मारे जाते थे, लेकिन अब यह आकंड़ा दो पर आ गया है।
(आगे पढिये - बसंत का मौसम और कश्मीर, यह पोस्ट अति शीघ्र प्रकाशित करने कि कोशिश होगी.)
अस्थायी स्थल

बिहार के कोशी नदी का दियारा क्षेत्र चन्द दिनों के बाद जलमग्न हो जाएगा। बरसात की पहली बारिश ही इसे अपने आगोश में समां लेगी। फ़िर अगले वर्ष इसका स्वरूप कैसा होगा? यह कोई नही जानता। शायद यह नदी की मुख्य धारा बन जाए या फ़िर बालू और रेत का संगम भी। पिछले वर्ष जाती हुई जलधारा ने इस टूटी नाव को यहाँ लाकर पटक दिया था जो पिछले छह महीनों से यहीं लगी हुई है।
(यह दिलचस्प जानकारी एकत्र की है हमारे साथी पत्रकार रंजीत जी ने। तस्वीर भेजी है मुकेश कुमार ने। रांचीहल्ला आप दोनों का आभारी है।)
Tuesday, June 10, 2008
विष्णु जी का इन्तेजाम होने वाला है....
प्रभात ख़बर धनबाद के एडिटर विष्णु राजगडिया जी ने विपरीत परिस्थितियों मे इस्तीफा दे दिया है, उनकी जगह दीबक अम्बस्ठ को हरिवंश जी ने अपना नया एडिटर चुना है. दीपक जी पहले जमशेदपुर हिंदुस्तान मे थे, लेकिन किसी कारण से वहाँ से उन्हें हटना पड़ा था, इस वजह से वो कुछ दिन से खाली चल रहे थे. विष्णु जी फिलहाल कुछ नही कर रहे हैं, लेकिन बहुत जल्दी उनका अच्छा इन्तेजाम हो जाएगा ऐसी उम्मीद है. झारखण्ड सरकार की ओर से उन्हें सूचना आयुक्त का पद देने की तैयारी हो चुकी है, विपक्ष के नेता अर्जुन मुंडा की हस्तक्षेप के कारण अभी तक फाइल मे हस्ताक्षर नही हो पाया है. दरअसल जिस संचिका मे विष्णु जी का नाम है उसी संचिका मे संदीप वर्मा का भी नाम है, जो बाबूलाल मरांडी के काफी करीबी समझे जाने वाले दीपक प्रकाश (पूर्व में राज्य खनीज विकास निगम के अध्यक्ष) के साले हैं. अर्जुन मुंडा वैसे किसी आदमी को लाभ नही दिलवाना चाहते हैं, जिसका सम्बन्ध बाबूलाल मरांडी से किसी भी तरह से हो. अर्जुन मुंडा का मानना है कि उनकी कुर्सी बाबूलाल मरांडी के कारण ही चली गयी. अब देखना ये है कि संदीप के भाग्य से विष्णु जी का छींका कब टूटता है.
Tuesday, June 3, 2008
लड़कियों की मंडी
कुनकुरी, छत्तीसगढ़ से
जशपुर जिले का लुड़ेग बीते कुछ दशकों में टमाटर की खूब फसल के कारण प्रसिध्द था. मिट्टी और मौसम अनुकूल होने के कारण यहां के आदिवासियों ने इसे खूब उगाया. कई बार तो ऐसी नौबत आई कि टमाटर खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था, क्योंकि बाजार तक लेकर जाने में परिवहन का खर्च भी निकल नहीं पाता था. यहां कई बार मांग हुई कि टमाटर पर आधारित उद्योग लगा दिये जाएं जिससे आदिवासी किसानों का जीवन स्तर ऊपर उठ जाएगा. लेकिन इस पिछड़े इलाके के लिए कुछ नहीं सोचा गया.
| सबकी किस्मत ऐसी कहां |
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| ललिता के अनुसार उसे हर महीने अच्छी पगार मिलती है लेकिन गांव की दूसरी लड़कियों की किस्मत ललिता जैसी नहीं है. |
पिछले कुछ वर्षों से जशपुर और सरगुजा जिले में एक नई तरह की फसल तैयार हो रही है. उसे बाजार भी खूब मिल रहा है. ये फसल हैं इस इलाके के निर्धन आदिवासी उरांव परिवारों की नाबालिग लड़कियां और बाजार बने हुए हैं दिल्ली गोवा जैसे देश के महानगर. इस फसल को खाद-बीज दे रहे हैं उनके अपने निकट सम्बन्धी और बिचौलिये का काम कर रही हैं, दिल्ली में काम कर रही 200 से ज्यादा प्लेसमेन्ट एजेंसियां.
लड़कियां टमाटर तो होती नहीं. उनकी धमनियों में रक्त का संचार होता है. मन है, जो पंख लगाकर आकाश में उड़ना चाहता हैं. ह्रदय है जिसमें सुख-दुख मान,अपमान, स्वाभिवान कष्ट और प्रसन्नता महसूस कर सकती हैं. पर सरगुजा और जशपुर इलाके के गांवों में 3 दिन भटकने के बाद महसूस हुआ कि इन सब भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार केवल उनको है, जिनके पेट भरे हों.
इनकी आंखों में आंसू भी आते हैं तो रोककर रखना होगा, बाप को बेटी से बिछुड़ने और बेटी को घर की याद आने पर भी दोनों विवश हैं. पुलिस व प्रशासन की मदद नहीं मिलने की आशंका से अभिभावकों के पैरों में बेड़ियां लग गई हैं और बेटियां तो पता नहीं कहां नजरबंद हैं या घुटन भरी कोठियों में बीमार पड़ गई या मार डाली गई.
कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए ऐसी लड़कियों की संख्या सैकड़ों में है, जो एक बार निर्जन जंगल में बनी अपनी झोपड़ी से महानगरों की भूल-भुलैया में अपना भविष्य संवारने का सपना लिए निकल पड़ी और फिर उनका कुछ पता नहीं चला.
सीतापुर ब्लाक के बेलगांव की ललिता एक्का पिछले सात साल से दिल्ली के एक मीडिया हाऊस में झाड़ू पोछे का काम कर रही है. 6वीं तक पढ़ी 19 साल की ललिता से जब हम मिले तो वह संकोच झिझक उसकी आंखों व हाव-भाव व पहनावे में नहीं थे, जो अक्सर इस गांव की लड़कियों में दिखाई देती है.
सपनों के सौदागर
उसने चहककर अंग्रेजी पुट में बताया कि वह पिछले सात सालों से दिल्ली में है और उसे कोई तकलीफ नहीं है. उसकी तनख्वाह बढ़कर अब 4500 रूपये हो गई है, हर माह एक निश्चित तारीख को चेक से इसका भुगतान हो जाता है. साल में एक बार अपने माता-पिता से मिलने के लिए आती हैं, और सबको कुछ न कुछ उपहार व नगदी दे जाती है. बीच-बीच में वह मनीआर्डर भी करती रहती है. जब उससे प्रस्ताव किया गया कि हमें भी दिल्ली में एक घरेलू नौकरानी की जरूरत है, उसने झट से अपना मोबाइल नम्बर दे दिया और कहा कि वह इसका प्रबंध दिल्ली पहुंचते ही कर देगी.
लेकिन हर लड़की का भाग्य ललिता की तरह नहीं है. इसकी तरह कई 'कामयाब' लड़कियों के किस्से गांव में हाथ बांधे बैठी लड़कियों के मन में कुलाचे मारने के लिये काफी है. ललिता तो इस बात से इंकार करती है कि वह किसी प्लेसमेन्ट एजेंसी के लिए काम करती है और लड़कियों को बहला-फुसला कर ले जाने के धंधे में शामिल है पर ज्यादातर दलाली का काम इसी तरह की लड़कियां और स्थानीय युवक कर रहे हैं.
इनकी नजर अपने ही रिश्तेदारों की 8 से 16 साल के बीच की लड़कियों पर होती है. उन्हें झांसा दिया जाता है कि दिल्ली में अच्छा खाना व कपड़ा मुफ्त मिलेगा साथ ही आकर्षक तनख्वाह भी. वहां बड़े-बड़े बंगले हैं, चौड़ी सड़कों पर सरपट दौड़ती एसी गाड़ियां हैं, जिनमें मेमसाहब के साथ मार्केट जाने का मौका मिलेगा. लेकिन वहां जाने के बाद धकेल दी जाती हैं, प्लेसमेंट एजेंसियों के दफ्तरों में, जो किसी काल-कोठरी से कम नहीं. लड़के-लड़कियों को तंग कमरों में रखा जाता है, वहां इन लड़कियों के साथ क्या-क्या होता है, अनुमान लगाना कठिन नहीं है. यह सिलसिला साहबों के बंगलों में भी खत्म नहीं होता.
जशपुर जिले के दुलदुला थाना के अंतर्गत आने वाले चटकपुर गांव की शशिकांता किण्डो को जुलाई 2006 में गांव की ही अनिता और विमला अच्छी नौकरी दिलाने का आश्वासन देकर ले गये थे. वहां पहुंचने के बाद चिराग, दिल्ली के एक प्लेसमेंट एजेंट राजू अगाथा ने हिमांशु बख्शी के यहां नौकरी दिलाई. वहां मालकिन नमिता ने कुछ दिनों तक तो ठीक रखा पर बाद में उसे घर से निकलने भी नहीं दिया जाता था. जब भी शशिकांता गांव वापस लौटने की जिद करती थी, उसे जल्द ही छोड़ देने का भरोसा दिलाया जाता था.
और सपनों का कत्ल...
इधर गांव में शशि की मां प्रमिला और पिता विन्सेन्ट लकड़ा परेशान हो रहे थे. जब भी वे अपनी बेटी से फोन पर बात करने की कोशिश करते थे, मकान मालकिन उन्हें बात कराने से कोई न कोई बहाना बना देती थी. परेशान होकर उन्होंने दुलदुला थाने में शिकायत कर दी. मालकिन ने तब शशिकांता को धमकाया और उसकी शादी जबरदस्ती उसी अपार्टमेन्ट में वाचमैन का काम करने वाले रविन्द्र कुमार यादव से करा दी. रविन्द्र उसे अपने कमरे में लेकर रहने लगा.
इधर मालकिन से जब शशिकांता से बात कराने कहा जाता था तो उन्होंने कह दिया कि लड़की शादी कर चुकी है और अब उसके पास नहीं है. बहदवास मां अपनी भाई की पत्नी थेलमा के साथ दिल्ली पहुंची. थेलमा 10 साल से दिल्ली में ही रहती थी. रविन्द्र से शशिकांता के बारे में बात की जाती थी तो वह धमकियां देता था, झूठ बोलता था. बाद में उसने यह भी सफाई दी कि वह शशिकांता से शादी करना नहीं चाहता था, उसकी शादी तो पहले ही हो चुकी है और उत्तरप्रदेश के गांव में बीवी बच्चे रहते हैं. यह सब तो शशि की मालकिन के दबाव में उसे करना पड़ा.
| सपने बेचने वाले |
| दिल्ली में तकरीबन 200 प्लेसमेंट एजेंसियां है, जो छत्तीसगढ़ के सरगुजा, जशपुर के अलावा झारखंड के रांची, गुमला, पलामू आदि इलाकों से आदिवासी लड़कियों को घरेलू नौकरानी का काम दिलाने आकर्षित करती हैं. उनके निशाने पर हैं उरांव आदिवासी, जिनमें से अधिकांश ने यहां पर पिछले 5 दशकों से सक्रिय मिशनरियों के प्रभाव में आकर इसाई धर्म अपना लिया है.
ज्यादातर प्लेसमेंट एजेंसियों के संचालक उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड के संदिग्ध प्रवृति के लोग हैं. पहले ये खुद आकर लड़कियों को तलाश कर ले जाते थे लेकिन पिछले दो साल से जब इनके खिलाफ अंचल में आवाज उठने लगी है तो उन आदिवासी लड़की लड़कों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो इन गांवों से पहले से ही निकलकर दिल्ली पहुंच चुके हैं. प्लेसमेंन्ट एजेंसियों ने स्वयंसेवी संगठनों और सरकारी विभागों की आंख में धूल झोंकने के लिए बहुत से नियम कायदे बना रखे हैं. जिनमें से एक यह भी है कि नाबालिग लड़कियों को काम पर नहीं रखा जायेगा. पर उनके निशाने पर 8 से 14 साल की लड़कियां ही हैं. प्लेसमेंट एजेंसियां चलाने वाले ऐसी लड़कियां लाने वाले दलालों को आने-जाने का खर्च और 5 से 15 हजार रूपये तोहफे के तौर पर देते हैं. |
शशि अपनी जान बचाकर गांव लौट गई है. उनके मां-बाप कहते हैं कि अब किसी सूरत में इसे दिल्ली या और कहीं नहीं भेजेंगे. इकलौती बेटी की शादी यहीं किसी अच्छे लड़के से कर देंगे.
हैरत की बात है कि कई बार छोटी उम्र की लड़कियां मां-बाप या भाईयों से नाराज होकर भी घर छोड़कर भागती हैं तो बहुत दूर निकल जाती हैं और कई साल तक घरों की ओर दुबारा नहीं झांकती. पर जब लगातार प्रता़ड़ित हो जाती हैं और कैद होकर रह जाती हैं तो हर तरह का जोखिम उठाकर गांव वापस भाग आती हैं.
लुड़ेग के पास घुरूआम्बा की रमिला टोप्पो के साथ ऐसा ही हुआ. गांव वालों ने बताया कि इस लड़की को गुजरात में किसी घर में नजरबंद कर लिया गया था. उसे घर से निकलने नहीं दिया जाता था और उसके हाथ में कोई पैसा नहीं दिया जाता था. किसी तरह एक सहेली से उसने टिकट के पैसे का प्रबंध किया और जिस कपड़े को पहने हुए थी, उसी में भाग निकली.
दो दिन बाद कुनकुरी पहुंची और 11 किलोमीटर पैदल चलकर रात के 9 बजे घर पहुंची. 6 साल बाद अपनी बेटी को घर पर बहदवास, बीमार हालत में देखकर अनपढ़ मां-बाप की आंखों में आंसू आ गए. वे अपनी बेटी के वापस मिलने की उम्मीद ही खो चुके थे. दूसरी तरफ रमिला जो कहानी बताती है उसके अनुसार वह अपने भाई ने मारपीट की तो नाराज होकर वह भाग गई. गांव से वह सीधे रायगढ़ में मदर टेरेसा अनाथ आश्रम में चली गई और वहां से इंदौर के एक अनाथाश्रम में भेज दिया गया. फिर वहां से सूरत के एक मिशनरी संचालित अनाथाश्रम में रख दिया गया. लगातार वहीं रह रही थी.
रमिला की मानें तो इन अनाथाश्रमों में उसे कोई तकलीफ नहीं थी. खाने और कपड़े दिये जाते थे और पढ़ाई कराई जा रही थी. वह अपनी कहानी बताते वक्त कई बार ठिठकती रही तथा बीच-बीच में अपनी ही कई बातों को झुठला रही थी. जब वहां कोई तकलीफ नहीं थी तो भागकर क्यों आना पड़ा, पूछने पर वह कहने लगी कि घर की याद आ रही थी.
इतने सालों तक सम्पर्क क्यों नहीं किया? वह कहती है कि चूंकि उसने सभी जगहों पर खुद को अनाथ बताया था इसलिये किसी से कहते नहीं बना कि वह घर के लोगों को चिट्ठी लिखना चाहती है या उनसे फोन पर बात करना चाहती है. रमिला जब घर से अकेले निकली तो उसकी उम्र 9 साल के करीब थी. 6 साल बाद लौटने के बाद वह जसपुरिया बोली लगभग भूल गई है और अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में बात कर रही है. वह कम्प्यूटर सीखने और पढ़ाई करने की इच्छा रखती है, इसके लिये रायगढ़ या रांची के किसी बड़े स्कूल में दाखिला लेना चाहती है.
जो लौट के घर न आए
अब उनके गरीब मां-बाप इतने साल बाद मिले अपनी बच्ची को बाहर नहीं भेजना चाहते. साथ ही गरीबी के कारण बहुत बड़े स्कूल में बाहर पढ़ाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं. लेकिन रमिला ने उन्हें साफ कह दिया है कि वह गांव में नहीं रहना चाहती. दिल्ली से गये मीडिया के कुछ लोगों ने रमिला को टटोला तो वह तुरंत उनके साथ दिल्ली निकल चलने के लिए तैयार हो गई.
सरगुजा जिले के बतौली गांव की 14 साल की तारिणी घर से तो निकली थी, पड़ोस में सरसों की भाजी छोड़ने के लिये, लेकिन वह निकल गई दिल्ली. पिता भण्डारी और मां मुनारो किन्डो कुछ दिन बाद यह जानकर कुछ राहत महसूस कर सके कि वह अपने मामा की लड़की प्रमिला के साथ निकली है, जो पहले से ही दिल्ली आती जाती रहती है. बतौली ब्लाक मुख्यालय और उसके आसपास के गांवों से प्रमिला की तरह ही कई नजदीकी रिश्तेदारों ने लड़कियों को घरेलू नौकरानी के लिए काम पर पहुंचाया है, जिनमें से तारिणी समेत कम से कम 7 लड़कियों का आज पता नहीं है कि वे कहां हैं.
तारिणी का फोन साल भर तक आता रहा- कुशलता है, यह बताती रही पर पिछले दो साल से उनका कुछ पता नहीं है. ऐसा ही दुखड़ा बिश्वास नाम की महिला का है जिसकी बेटी सलबिया को कछारडीह के राजेश मिंज नाम का युवक काम दिलाने के बहाने दिल्ली ले गया. भण्डारी और मुनारो अपनी बेटी के नहीं मिलने को लेकर एक दूसरे पर दोष मढ़ते हैं.
मां सफाई देती है कि उसने अपनी बेटी को दिल्ली जाने के लिये मदद बिल्कुल नहीं की. भण्डारी कहता है कि मुनारो के भाईयों के घर के लोगों से वह कई बार अपनी बेटी को वापस लाने के लिये झगड़ चुका है, पर रिश्तेदारी के कारण ज्यादा दबाव नहीं बना पा रहा है. पुलिस में शिकायत क्यों नहीं करते? पूछने पर सब पीड़ित खामोश हो जाते हैं, फिर दबी जबान से बताते हैं कि चूंकि उन्होंने लड़कियों के जाने के बहुत दिन तक कोई शिकायत इस उम्मीद से नहीं की कि लड़की लौटकर आ जाएगी और जब देर हो जाती है तो पुलिस डांटकर भगा देती है.
इस तरह के उदाहरण सरगुजा और जशपुर अंचल के तकरीबन हरेक गांव में मिलेंगे. कुछ लड़कियों ने बाहर में ही कथित रूप से शादी भी कर ली और अपने बच्चे को मां-बाप के पास छोड़कर फिर वापस लौट गईं.लड़ाई जारी है
उरांव-इसाई लड़कियों का मामला होने के कारण जशपुर जिले के कुनकुरी में स्थापित एशिया के दूसरे सबसे बड़े चर्च के संचालकों ने एक स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण विकास केन्द्र का गठन किया है, जिसमें ह्यूमन ट्रेफेकिंग रोकने के लिये अलग से सेल भी बनाया गया है. इसी तरह की सक्रियता सरगुजा के बिशप हाऊस में भी दिखाई गई है, जहां आशा एसोसियेशन गठित किया गया है.
दोनों संगठनों ने मिलकर पदयात्रा और सभाओं के जरिये आदिवासियों के बीच जागरूकता लाने की कोशिश की है, जिससे नाबालिग लड़कियों का शारीरिक शोषण रूक सके. अनेक पर्चे छपवाये गये हैं जिनमें यह बताया गया है कि प्लेसमेंट एजेंसियों में लड़कियों को लड़कों के साथ घुटन भरे छोटे से कमरों में तब तक रखा जाता है, जब तक उन्हें अच्छी पेशगी देने वाला कोठी मालिक नहीं मिल जाता. इन प्लेसमेंट एजेंसियों में बंगलों के 'अनुकूल' बनाने के लिए अश्लील फिल्में दिखाई जाती है, लड़कियों को झांसे में लेकर या उन पर दबाव डालकर उनके साथ बलात्कार भी किया जाता है. कई बार लड़कियां गर्भवती भी हो चुकी है. कुछ लड़कियों को तो भेद खुलने के डर से मार डाला गया और दिल्ली में कहीं पर दफना देने के बाद उनके अभिभावकों को सूचना दी गई है. उनके स्वास्थ्य पर जरा भी ध्यान नहीं दिया जाता. कोठियों में ऐसा ही व्यवहार किये जाने की शिकायत है.
मालिक जहां यौन शोषण के लिये उतावला होता है, वहीं बड़ी मुश्किल से, दलालों और प्लेसमेन्ट एजेंसियों के पीछे काफी खर्च कर मिली बालिका को मालकिन किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहती. उनको कई-कई दिनों तक भूखा रखा जाता है. सीढ़ी, बरामदों में बिना चादर कम्बल के खुले फर्श पर सुलाया जाता है. घर के पुरूष उनकी तरफ निगाह नहीं डालें, इसके लिये उसे मैले कुचैले कपड़ों में रखा जाता है, यहां तक कि बाल न बनाए, इसलिये कंघी भी नहीं दी जाती.
ग्रामीण विकास केन्द्र की सिस्टर्स ने जब कुछ प्लेसमेंन्ट एजेंसियों और घरों में अपनी बहनों को तलाश करने के बहाने से दिल्ली का दौरा किया तो इस तरह के कई वाकये देखे.
स्वयंसेवी संगठनों के अभियान और इनके दबाव पर पुलिस से मिल रहे सहयोग के चलते कहीं-कहीं आदिवासी परिवारों में जागरूकता दिख रही है, पर नाबालिग लड़कियों का व्यापार थमा नहीं है.
सरगुजा से संचालित आशा एसोसियेशन के नौशाद अली कहते हैं कि यहां गरीबी इतनी है कि मां-बाप चाहकर भी अपने बच्चों पर नियंत्रण नहीं कर पाते. दूसरे समुदाय गरीबी को अपनी नियति मानकर चुप रह जाते हैं पर यहां के उरांव-इसाईयों में खुलापन है, जिसके चलते लड़कियां कुछ बनकर दिखाना चाहती हैं और प्रताड़ित होने, शोषण होने, कठोर श्रम कराये जाने की शिकायतों के बावजूद गांवों में पसरे खालीपन से मुक्ति पाने की इच्छा से निकल जाती हैं.
दूसरी ओर ग्रामीण विकास केन्द्र की सिस्टर सेवती पन्ना का कहना है कि मामला केवल गरीबी का नहीं है, कई ऐसे परिवारों की लड़कियां भी मानव-व्यापार करने वाले दलालों के चंगुल में फंस गई हैं, जिनका परिवार ठीक-ठाक कमा खा रहा है. दरअसल, यह दिल्ली में काम करने वाली उन लड़कियों के झांसे में आ रही हैं, जो प्लेसमेंट एजेंसियों से अच्छी कीमत पाने की लालसा में महानगरों के झूठे सपने मासूम लड़कियों को दिखाते हैं.
फिर-फिर नरक
गांव-गांव पैदल घूमकर गायब लड़कियों का पता लगाने और उन्हें वापस लाने के लिये जब-तब दिल्ली जाने वाली सिस्टर एस्थेर खेस का कहना है कि लड़कियों बड़े शहरों के माहौल से अचानक अलग होकर गांव आती हैं तो असहज ही रहती है. हमारे प्रयासों पर तब पानी फिर जाता है, जब लड़कियां गांव में रहने के बजाय उसी नरक में फिर चुपके से भाग जाती हैं. ऐसी कई लड़कियां है जो बुरी तरह प्रताड़ित-शोषित होकर गांव लौटी, पर यहां कोई काम उसके लिये नहीं ढूंढा जा सका. पुनर्वास की समस्या बहुत बड़ी है. हालांकि एनजीओ अपनी तरफ से लड़कियों को व्यस्त रखने के लिए प्रशिक्षण के कुछ कार्यक्रम चला रहे हैं पर इनकी क्षमता बहुत कम है.
सुश्री खेस को आशंका है कि कम्प्यूटर सीखने की इच्छा रखने वाली 6 साल बाद घर लौटकर आई रमिला टोप्पो को फिर भगाने के लिए आसानी से बहकाया जा सकता है.
सरगुजा और कुनकुरी छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक पिछड़े इलाके हैं. जंगल कट चुके हैं. बाक्साइट और पत्थर की खदानों के अलावा कोई उद्योग यहां पर नहीं है, इनमें स्थानीय युवकों को भी रोजगार नहीं मिलता. सिंचाई के साधन न के बराबर हैं. सब एक ही खेती कर पाते हैं. राजधानी से भी ये जिले 400 किलोमीटर से दूर हैं. सरकार और प्रशासन की पकड़ यहां ढीली है. लगभग सभी जन-प्रतिनिधि आदिवासी हैं, जिनकी बात रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव के सामने सुनी नहीं जाती. जशपुर जिले में प्रशासन और सरकार का मतलब दिलीप सिंह जूदेव है, खासकर तब जब सरकार भाजपा की हो. राज्यसभा सदस्य दिलीप सिंह जूदेव राज-परिवार से हैं. सरगुजा और जशपुर दोनों ही इलाकों के राजपरिवारों पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने इस अंचल के विकास में रोड़ा अटकाया है.
स्वयंसेवी अशफाक अली कहते हैं कि लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठेगा तो इलाके में कैंसर की तरह फैल चुके मानव-व्यापार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। अभी तो उरांव आदिवासी परिवारों के भाई, पिता के हाथ खाली हैं, बेटियों को पढ़ाई और शादी करने के दिनों में बाहर भेज देना, उन्हें बिल्कुल नहीं भाता, पर असहाय हैं. इनके हाथ में काम हो, कुछ आय बढ़े तो हिम्मत के साथ वे इन लड़कियों को भी रोकेंगे और लड़कियों का भी भरोसा अपने परिवार व समाज पर बढ़ेगा.
(यह आलेख रविवार.कॉम से साभार लिया गया है.)
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