अ चाँद ! आ आज !! ई ईद है !!
ऐ , एक बार सिर्फ़ -
ऊ ,उर्स-सी रौशनी की चादर बनकर ,
ओ ,ओस की शीतल महक होकर ,
औ ,और कुरान की पाक इबारत-सा ,
अं ,अंग-अंग में मेरे आकर छा जा !!
अः,अंततः मुझे सूरज बना जा !!
क , कालिमा की एक लकीर हूँ मैं !
ख,खुदी से बिल्कुल परे हूँ मैं !
ग, गाफिल हूँ मैं तुझ-तक से भी !
घ, घायल हूँ किस तीर का मैं ?
च,चुप क्यूँ है तू बोल ना ?
छ,छुपा हुआ है तू अब तक कहाँ ?
ज ,जहाँ भर में मैं तुझे ढूंढें फिरूँ!!
झ,झाडू-सा तू अब मुझे बुहार !!
ट ,टट्टू-सा मुझे जोत दिया !
ठ,ठठेरों के आगे फ़ेंक दिया !
ड ,डमरू-सा ना मुझे और बजा !
ढ,ढूंढता हूँ तुझे,अब मिल भी जा !!
त ,ताक रहा हूँ मैं सारी राह तेरी !
थ,थकती नहीं कभी आँखे मेरी !
द,देखता है तू मुझे अब क्या ?
धः,धधक रहा है ये सीना मेरा !
न ,नाफ़रमानी कभी करूंगा नहीं !
प ,प्रीत की डोरियाँ बाधुंगा मैं !
फ,फलक-सा अब तू मुझे बना दे !
ब ,बच्चों-सा मुझे निर्मल कर दे !
भ,भगत तो तेरा हो ही गया हूँ !
म ,माँगता हूँ जो,मुझे वर दे !
य ,यार तू बेमिसाल बन जा मेरा !
र ,राह की पतवार बन जा मेरा !
ल ,लड़कपन खेल में गवां चुका मैं !
व् ,वां के अब सब भेद बता दे !
स ,साफ़-स्वच्छ-सा सब दिखा दे !
श,शंख-नाद अब मुझमें बजा दे !
ह ,हाँ-हाँ मेरे यार तू आज -
मेरी सच्ची-मुच्ची की ईद मना दे !!
आज मुझे तू पुरे चाँद-सा खिला दे !!
मुझसे सबको गले लगा दे !
आज मुझको सबसे गले लगा दे !!!!
Tuesday, September 30, 2008
Monday, September 29, 2008
ईद मुबारक...
बादलों की ओढ़नी थोड़ा हटाकर
चाँद ने सबसे कहा कल ईद है
पैगाम है यह आसमां से धरती सुने
अंत हो आतंक का, हल ईद है
ईद मुबारक....
दो टूक ...आहत है आम आदमी
दो टूक ...आहत है आम आदमी
माननीय अमिताभ जी ,
आप देश के करोड़ो युवाओ के रोल माडल थे , पर हिन्दी के मामले में जिस तरह आपने समझौते की स्वार्थी नीति अपनाई देश का आम आदमी
आहत हैं .
माननीय अर्जुन सिंग जी ,
आप अराजकता फैलाने में माहिर हैं . आपने फ्री बिजली बाँटी . आपने जिसने जहाँ कब्जा कर लिया उसे उस जमीन का पट्टा बाँटा , एड्हाक लोगों को बिना पी एस सी के रैग्युलर कर डाला .जब जितना मौका मिला आपने अराजकता फैलाकर , स्वयं की वाह वाही लूटी .अब आप आतंक वादियों के समर्थन में ... देश का आम आदमी
आहत हैं .
देश का आम आदमी
आहत हैं .
माननीय मुलायम सिग जी ,
सिमी का ऐसा समर्थन क्यों?देश का आम आदमी
आहत हैं .
माननीय अमिताभ जी ,
आप देश के करोड़ो युवाओ के रोल माडल थे , पर हिन्दी के मामले में जिस तरह आपने समझौते की स्वार्थी नीति अपनाई देश का आम आदमी
आहत हैं .
माननीय अर्जुन सिंग जी ,
आप अराजकता फैलाने में माहिर हैं . आपने फ्री बिजली बाँटी . आपने जिसने जहाँ कब्जा कर लिया उसे उस जमीन का पट्टा बाँटा , एड्हाक लोगों को बिना पी एस सी के रैग्युलर कर डाला .जब जितना मौका मिला आपने अराजकता फैलाकर , स्वयं की वाह वाही लूटी .अब आप आतंक वादियों के समर्थन में ... देश का आम आदमी
आहत हैं .
देश का आम आदमी
आहत हैं .
माननीय मुलायम सिग जी ,
सिमी का ऐसा समर्थन क्यों?देश का आम आदमी
आहत हैं .
ये आप कैसी पूजा कर रहे हैं?

मोनिका गुप्ता
भारत में नवरात्र के उत्सव का आगाज हो चुका है। भव्य प्रतिमाएं लोगों तक पहुंचने लगी हैं। पंडाल सजने लगे हैं। प्रकाश व्यवस्था की होड़ मची है। दुर्गा मां की प्रतिमा को विभिन्न वस्त्रों और आभूषणों से सजाने के लिए खरीददारी हो रही है। चंदे इक्ट्ठे किये जा रहे हैं। यह पूजा नारी शक्ति की अराधना का पर्व है। पूरे देश में रात-रात भर जागकर पूजा की तैयारियां की जा रही हैं। एक ऐसे देश में जहां शाम ढलने के बाद बाहर निकलने के लिए स्त्री को किसी साथी की जरूरत होती है। उसके मन में डर होता है कि कोई छेड़ न दे, कोई बदतमीज़ी न कर दे। भारत विभिन्नताओं का देश है। यहां हर बात में विभिन्नता पायी जाती है। इस विभिन्नता की सबसे अच्छी मिसाल हमें नवरात्र के उत्सव में देखने को मिलती है। पंडाल में हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़ प्रतिमा को देखने के लिए ऐसे ललायित रहते हैं, मानो देवी दर्शन न हुए तो जीवन ही निरर्थक हो जाएगा। लोग दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभाव से माता की प्रतिमा को नमन करते हैं और जैसे ही पंडाल से बाहर आते हैं उनके हाथ भीड़ का फायदा उठाने में व्यस्त हो जाते हैं। इस मामले में यहां के लोगों की सोच में भी विभिन्नता देखने को मिलती है। मानवीय संस्कार, संदर्भ, आदर्श, विचार सब भूल जाओ लेकिन पूजनीय प्रतीकों को कभी मत भूलो। जिस देश के करोड़ों नर-नारी नारीशक्ति की इतनी भक्तिभाव से पूजा अर्चना करते हैं, खुद को समर्पित करती हैं, उत्सव के आनंद के लिए करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, उसी देश में कन्या संतान के पैदा होने को बोझ समझा जाता है। उसके पैदा होने पर अपने अराध्य देव से यही कामना की जाती है कि हमें नहीं चाहिए यह कन्या शिशु। हमें तो अपने कुल का चिराग चाहिए और वो लड़की नहीं हो सकती। भेजना ही है तो कोई गोपाल, कन्हैया या फिर ठुमक-ठुमक चलने वाले रामचंद्र भेजो, लक्ष्मी जी और सरस्वती जी को अपने पास ही रखो। उनकी तो हमें पूजा करनी है लेकिन लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती सरीखी बेटी का पालन पोषण नहीं करना है। सचमुच अदभुत देश है यह। जहां जय माता की और औरत को लेकर दी जाने वाली गालियां...जैसे शब्दों का उच्चारण एक साथ होता है। वसुधैव कुटुंबकम की तर्ज पर माता का यूनिवर्सल सम्मान भी है और यूनिवर्सल अपमान भी। इस देश के लोग नवरात्र के अवसर पर नौ दिन पूजा अर्चना करेंगे, हवन करेंगे, मदिरापान-मांसभक्षण छोड़ देंगे, मगर साक्षात नारी के सामने आते ही देवी भक्तों की आंखें वहीं टिक जाएंगी जहां जन्म के समय टिकी थीं। स्त्रीस्वरूप की पूजा तभी हो सकती है जब वह मूर्ति रूप में शक्ति की प्रतीक हो। स्कूल-कॉलेज जाने वाली, बाजार जाने वाली, बच्चे पालने वाली, पति की सेवा करने वाली, मोपेड चलाने वाली औरतें तो बस सीटी सुनने या सामने से आ रहे किसी पुरुष के धक्के खाने योग्य है। लोग न जाने किस देवी की पूजा कर रहे हैं? पूजा करनी है तो अपनी मां, बहन, बेटी और पत्नी की करो- जो तुम्हारा लालन पालन करती है, जो तुम्हारी सहभागी होती है, जो तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करती है। वैसे सही में शक्ति स्वरूपा दुर्गा, विद्यादायिनी सरस्वती, धन की देवी लक्ष्मी की पूजा तभी सफल होगी, जब पंडाल में रखी प्रतिमा के साथ-साथ सड़क पर चलने वाली साधारण महिला का सच्चा सम्मान होगा। उस दिन भारत में नवरात्र के उत्सव में भक्ति के अलावा भारतीय संस्कृति की सार्थकता भी सिद्ध हो जाएगी।
Friday, September 26, 2008
रांची में लड़कियों के निकलने पर पाबंदी!

ज़मज़म वेल्फेयर सोसाइटी, रांची ने ईद से पूर्व रातों को बाज़ार में लड़कियों को न घूमने की हिदायत दी है। सोसाइटी ने बाकायदा एलान जारी किया है कि मुस्लिम लड़कियों के मां-बाप ईद की खरीदारी के नाम पर अपनी लड़िकयों को देर रात तक बाज़ार में घूमने की छूट न दें। इसे पाबंदी के साथ लागू करें, ताकि रातों को लड़कियों के साथ कुछ मनचले किस्म के युवकों का मेल-जोल न हो। संस्था की ओर से एक पत्र सभी मुस्लिम एदारों के नाम जारी किया गया है, जिसमें इस बात की तसदीक की है कि ईद के चांद रात को देर रात तक लड़कियां घरों से बाहर रहती हैं, जिससे नामहरम लड़के उनसे मिलते हैं। इस प्रवृत्ति को संस्था ने इस्लामी मआशरे के लिए खतरनाक बताया है और सभी अभीभावकों से इस पर पाबंदी लगाने की मांग की है। इस संस्था की ओर से जारी चिट्ठी के मजमून को अलविदा जुमे की नमाज़ के पूर्व रांची के सभी मसजिदों में पढ़कर सुनाया भी गया। चांद रात को लड़कियों के देर रात तक स्वच्छंद घूमने-फिरने का इस एलान के बाद कोई असर पड़ता है या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा।
Wednesday, September 24, 2008
मेरी चीज़ें !!
मेरे पास ढेर सारी चीज़ें थीं -
मैं उन्हें काफी दिनों तक सहेजता रहा ,
मगर -
अंततः उनमें से एक भी चीज़ न बची !!
और -
मैं बिल्कुल अकेला रह गया !!
तब मैंने जाना कि चीज़ें ,
कभी सहारा नहीं बनती ,आदमी का ,
यहाँ तक कि साया भी नहीं !!
अंततः
आप भी नहीं बचते ,चीज़ों की तरह !!
फिर, एक दिन अचानक -
वे सारी चीजें -
मेरे पास वापस आ गयीं ,
और मैनें उन्हें -
समस्त पृथ्वी-वासियों में बाँट दिया -
मगर तब भी -
मेरे पास कुछ चीज़ें बच ही रहीं !!
तब मैनें उन्हें -
अन्तरिक्ष-वासियों को दे डाला !!
सबने मुझे धन्यवाद दिया,
और मैनें भी उन्हें ,
उनके ढेर सारे प्यार के लिए !!
मैनें पाया कि -
मेरी समस्त चीज़ें तो ,
मेरे पास ही मौजूद थीं ,
और भी सघन होकर -
सबके -
ढेर सारे प्यार के रूप में !!
मैं उन्हें काफी दिनों तक सहेजता रहा ,
मगर -
अंततः उनमें से एक भी चीज़ न बची !!
और -
मैं बिल्कुल अकेला रह गया !!
तब मैंने जाना कि चीज़ें ,
कभी सहारा नहीं बनती ,आदमी का ,
यहाँ तक कि साया भी नहीं !!
अंततः
आप भी नहीं बचते ,चीज़ों की तरह !!
फिर, एक दिन अचानक -
वे सारी चीजें -
मेरे पास वापस आ गयीं ,
और मैनें उन्हें -
समस्त पृथ्वी-वासियों में बाँट दिया -
मगर तब भी -
मेरे पास कुछ चीज़ें बच ही रहीं !!
तब मैनें उन्हें -
अन्तरिक्ष-वासियों को दे डाला !!
सबने मुझे धन्यवाद दिया,
और मैनें भी उन्हें ,
उनके ढेर सारे प्यार के लिए !!
मैनें पाया कि -
मेरी समस्त चीज़ें तो ,
मेरे पास ही मौजूद थीं ,
और भी सघन होकर -
सबके -
ढेर सारे प्यार के रूप में !!
Tuesday, September 23, 2008
ऐसे लोगों को हमारा सलाम !!
सवेरे-सवेरे ही देखा कि बिहार के बाड़ पीड़ित इलाके में काम कर रहे डॉक्टरों की टीम में से एक डाक्टर की मौत अचानक ही हो गयी,मगर उन विपरीत परिस्थितियों में भी बचे डाक्टरों ने वहां से वापस आने बजाय अब वहीं रहकर काम करने का फैसला किया है,यही उनके अनुसार मृतक डाक्टर को उनकी भावभीनी श्रद्दांजलि होगी !! यह पढ़ते ही आँखें नम हों आयीं, और मन-ही-मन में उनको सैल्यूट को हाथ जैसे माथे पर जा लगे !!आज,जबकि हर ओर पैसे के लिए मारा-मारी,हर ओर प्रतिस्पर्धा के पीछे भागा-भागी,तथा जीवन जीने के तमाम साधनों को पाने के लिए हर प्रकार की लम्पटता को,हर प्रकार के स्वार्थ को अपनाना एक अनिवार्य घटना मान लिया गया है,वहां ऐसे लोगों के इस स्तुत्य जज्बे को सलाम ही किया जा सकता है!!हमारे आस-पास तो घटनाएं बहुत घटती रहती हैं,लेकिन लगभग सारी ही घटनाएं सिर्फ़ व् सिर्फ़ अपने बेतरह एवं अनंत स्वार्थ से अभिप्रेत होती हैं,या स्वजनों की सहायता हेतु किए गए कार्य-मात्र होते हैं ,यहाँ तक की लोग तो अपने रिश्तेदारो को सहयोग करते हुए भी उनपर अपने अहसान का इतना ज्यादा लाड देते हैं की बेचारे रिश्तेदार उस अहसान के बोझ टेल घुट कर मर जाएँ !!और यह सबको मान्य भी है !!इसे बिना स्वार्थ के किया जाने वाला किसी का कोई भी कार्य मानो एक ईश्वरीय घटना ही प्रतीत होता है !!शायद देश के सुपुत्र इन्ही लोगों को कहा जाता है,यही वो प्रेरणाएं हैं,जिनसे मानव की सेवा की सीख ली जा सकती है,अगरचे कोई सीख लेने को हम तैयार हों !!क्या हमारी युवा पीढी की आंखों में अपने देश के लिए भी कुछ सपने बचे हुए है??यदि रत्ती भर भी इसका जवाब हाँ में है,तो यह भी सच है की भारत के भविष्य की तस्वीर कुछ बेहतर है,वरना कुछ गिने-चुने लोगों ने तो इसे बेच ही डाला है !!
हम बेईमान कब बनेंगे?
प्रमोद
आज बैठे-बैठे अचानक मन में एक विचार आया। पहले जब फोटो बनवाना होता था तो नेगेटिव लिए स्टूडियो की और दौड़ते थे। अब कितना आसान हो गया है सबकुछ। डिजीटल कैमरा भी ऐसी चीज है जो हमारी तस्वीर बिना नेगेटिव बनाये ही प्रस्तुत कर देती है। फ़िर मन में विचार आया- "कहीं ऐसा तो नही की हम ही नेगेटिव हो गए हैं, इसीलिए वह कैमरा सीधे हमारी पाजिटिव मतलब फोटो प्रस्तुत कर देती है।" तो आइये जरा चर्चा करते हैं।
आज के दौर में भ्रष्टता, सम्वेदनशून्यता, मूल्यहीनता, नृशंशता, असत्य बोलने की प्रवृति, स्वार्थपरकता इत्यादि आदमी की पहचान बन गई है। यदि आप इससे परे हैं तो फ़िर आपके लिए कुछ संज्ञाएँ निर्धारित कर दी गई हैं- 'बनता है!', 'ख़ुद को देवता समझता है', 'सनकी है', इत्यादि-इत्यादि। मेरे कहने का मतलब है कि अगर आप उपरोक्त गुणों से आभूषित नही हैं तो फ़िर आदमी नही वरन ............हैं। विडम्बना है कि इन सारे आदमियों के गुणों को पूर्व के दार्शनिक-महात्माओं ने नकारात्मक गुण कहा है। तो इन गुणों से युक्त हम लोग हुए न नकारात्मक यानि नेगेटिव आदमी।
खैर, छोडिये दार्शनिक-महात्माओं की बातें। वास्तविकता यही है की आज के युग में मनुष्य वही है जो नेगेटिव हो। चलिए पहचान भी आसान हो गई। कैमरा यदि आपकी नेगेटिव बनता है तो फ़िर आप आम आदमी नही बल्कि विशिष्ट हैं। अब भला पशु तो हम हैं नही जो पेट भरने पर सामने भोजन रहे तो भी उसकी ओर नही देखता। कहा जाता है कि सिंह पेट भरने पर शिकार नही करता। हम तो बस भविष्य के लिए बचाने और जमा करने के फेर में लगे रहते हैं और इसके लिए ऊपर के सारे गुणों को किसी भी हद तक जाकर अपना सकते हैं।
चलिए बच्चों को पशु और मनुष्य में अन्तर बताने के दौरान इन गुणों के आधार पर विभेद बताने में आसानी होगी। पर एक चीज तो है कि हम एक मामले में ईमानदारी जरुर बरतते हैं, वह है- उपरोक्त सारे गुणों का अपनाने में हम कोताही नही करते। बस मौके के तलाश में रहते हैं, जैसे ही मौका मिलता है हम यह दिखा देते हैं कि आदमी होने के सारे गुण हमारे अन्दर मौजूद हैं और कैमरे में हमारी सदा पाजिटिव फोटो ही निकलेगी नेगेटिव कभी नही क्योंकि हम ख़ुद ही नेगेटिव हैं।
यही एक बात जेहन में नही उतरी कि आख़िर हम यह ईमानदारी नामक अवगुण को क्यों बचाए फ़िर रहे हैं भले ही वह उपरोक्त गुणों के सन्दर्भ में, उनकी रक्षा में ही क्यों न हो? इस अवगुण को भी अगर हम दूर कर पायें और भ्रष्टता, सम्वेदनशून्यता, मूल्यहीनता, नृशंशता, असत्य बोलने की प्रवृति, स्वार्थपरकता इत्यादि गुणों के पालन और रक्षा में भी बेईमानी बरते तो शायद कुछ अच्छा हो। तो इसी प्रश्न के साथ अपने विचारों के इस प्रवाह को रोकने का प्रयास करता हूँ- "उपरोक्त आज के आदमी के लिए आवश्यक गुणों के रक्षा और पालन के प्रति हम बेईमान कब बनेंगे?"
आज बैठे-बैठे अचानक मन में एक विचार आया। पहले जब फोटो बनवाना होता था तो नेगेटिव लिए स्टूडियो की और दौड़ते थे। अब कितना आसान हो गया है सबकुछ। डिजीटल कैमरा भी ऐसी चीज है जो हमारी तस्वीर बिना नेगेटिव बनाये ही प्रस्तुत कर देती है। फ़िर मन में विचार आया- "कहीं ऐसा तो नही की हम ही नेगेटिव हो गए हैं, इसीलिए वह कैमरा सीधे हमारी पाजिटिव मतलब फोटो प्रस्तुत कर देती है।" तो आइये जरा चर्चा करते हैं।
आज के दौर में भ्रष्टता, सम्वेदनशून्यता, मूल्यहीनता, नृशंशता, असत्य बोलने की प्रवृति, स्वार्थपरकता इत्यादि आदमी की पहचान बन गई है। यदि आप इससे परे हैं तो फ़िर आपके लिए कुछ संज्ञाएँ निर्धारित कर दी गई हैं- 'बनता है!', 'ख़ुद को देवता समझता है', 'सनकी है', इत्यादि-इत्यादि। मेरे कहने का मतलब है कि अगर आप उपरोक्त गुणों से आभूषित नही हैं तो फ़िर आदमी नही वरन ............हैं। विडम्बना है कि इन सारे आदमियों के गुणों को पूर्व के दार्शनिक-महात्माओं ने नकारात्मक गुण कहा है। तो इन गुणों से युक्त हम लोग हुए न नकारात्मक यानि नेगेटिव आदमी।
खैर, छोडिये दार्शनिक-महात्माओं की बातें। वास्तविकता यही है की आज के युग में मनुष्य वही है जो नेगेटिव हो। चलिए पहचान भी आसान हो गई। कैमरा यदि आपकी नेगेटिव बनता है तो फ़िर आप आम आदमी नही बल्कि विशिष्ट हैं। अब भला पशु तो हम हैं नही जो पेट भरने पर सामने भोजन रहे तो भी उसकी ओर नही देखता। कहा जाता है कि सिंह पेट भरने पर शिकार नही करता। हम तो बस भविष्य के लिए बचाने और जमा करने के फेर में लगे रहते हैं और इसके लिए ऊपर के सारे गुणों को किसी भी हद तक जाकर अपना सकते हैं।
चलिए बच्चों को पशु और मनुष्य में अन्तर बताने के दौरान इन गुणों के आधार पर विभेद बताने में आसानी होगी। पर एक चीज तो है कि हम एक मामले में ईमानदारी जरुर बरतते हैं, वह है- उपरोक्त सारे गुणों का अपनाने में हम कोताही नही करते। बस मौके के तलाश में रहते हैं, जैसे ही मौका मिलता है हम यह दिखा देते हैं कि आदमी होने के सारे गुण हमारे अन्दर मौजूद हैं और कैमरे में हमारी सदा पाजिटिव फोटो ही निकलेगी नेगेटिव कभी नही क्योंकि हम ख़ुद ही नेगेटिव हैं।
यही एक बात जेहन में नही उतरी कि आख़िर हम यह ईमानदारी नामक अवगुण को क्यों बचाए फ़िर रहे हैं भले ही वह उपरोक्त गुणों के सन्दर्भ में, उनकी रक्षा में ही क्यों न हो? इस अवगुण को भी अगर हम दूर कर पायें और भ्रष्टता, सम्वेदनशून्यता, मूल्यहीनता, नृशंशता, असत्य बोलने की प्रवृति, स्वार्थपरकता इत्यादि गुणों के पालन और रक्षा में भी बेईमानी बरते तो शायद कुछ अच्छा हो। तो इसी प्रश्न के साथ अपने विचारों के इस प्रवाह को रोकने का प्रयास करता हूँ- "उपरोक्त आज के आदमी के लिए आवश्यक गुणों के रक्षा और पालन के प्रति हम बेईमान कब बनेंगे?"
Monday, September 22, 2008
बडिए कमा लिए हो भइया !!
बडिए कमा लिए हो भइया !!कहाँ से कमाए हो भइया ??
जनता से ना ...!!तनी सुन जनतवा को लौटा भी दो भइया !!
जनतवा से तनी-तनी सुन करके ना लिए हो भइया ??
तनिये-तनी लौटाने को कह रहे हैं हम तुमको भइया !!
का कहा ..?अपनी मेहनत से ई सब कमाए हो भइया !!
तो इतना घमंड कौन बात का कर रहे हो भैया !!
एतना गुस्सा कऊन बात का करते हो बड़के भैया ??
पईसा तो नहीं रहने का,इतना भी मत ..... भइया !!
तुम अपना सामान किसको बेचे थे,जनता को भइया!!
कि कोई भूत-वूत सामान खरीदता था भैया ??
जिन्दा लोगन ही तुम्हारा सामानवा लेता था भइया !!
जिंदा लोग ही मिलकर तुमको सेठ बनाया है भइया !!
बहुत जरुरी है अब तुमरा सहयोग हे बाबू भइया !!
जिंदा लोगों के अब तुम करो कुछ ओ प्यारे भैया !!
धरती रो रही है तुमको पुकार-पुकार कर ओ भइया !!
उसके बच्चों की कुछ मदद करो ऐ समर्थवान भइया !!
देखो कितना चीत्कार है ई धरती पर ओ भोले भइया !!
तुम्हारे ही पौरूष को ललकार है ये क्षत्रिय भइया !!
तुमको कसम इस माटी की ,जिसका तुमने खाया !!
यूँ मर गए तो माटी कहेगी,हाय नपुंसक !दैया-रे दैया!!
जनता से ना ...!!तनी सुन जनतवा को लौटा भी दो भइया !!
जनतवा से तनी-तनी सुन करके ना लिए हो भइया ??
तनिये-तनी लौटाने को कह रहे हैं हम तुमको भइया !!
का कहा ..?अपनी मेहनत से ई सब कमाए हो भइया !!
तो इतना घमंड कौन बात का कर रहे हो भैया !!
एतना गुस्सा कऊन बात का करते हो बड़के भैया ??
पईसा तो नहीं रहने का,इतना भी मत ..... भइया !!
तुम अपना सामान किसको बेचे थे,जनता को भइया!!
कि कोई भूत-वूत सामान खरीदता था भैया ??
जिन्दा लोगन ही तुम्हारा सामानवा लेता था भइया !!
जिंदा लोग ही मिलकर तुमको सेठ बनाया है भइया !!
बहुत जरुरी है अब तुमरा सहयोग हे बाबू भइया !!
जिंदा लोगों के अब तुम करो कुछ ओ प्यारे भैया !!
धरती रो रही है तुमको पुकार-पुकार कर ओ भइया !!
उसके बच्चों की कुछ मदद करो ऐ समर्थवान भइया !!
देखो कितना चीत्कार है ई धरती पर ओ भोले भइया !!
तुम्हारे ही पौरूष को ललकार है ये क्षत्रिय भइया !!
तुमको कसम इस माटी की ,जिसका तुमने खाया !!
यूँ मर गए तो माटी कहेगी,हाय नपुंसक !दैया-रे दैया!!
वेश्यागमन करोगे !!??
आज तक समझ ही नहीं पाया कि अलग-अलग व्यक्तियों के साथ सोने वाली स्त्रियाँ वेश्या होती है या अलग-अलग स्त्रियों के साथ सोने वाला पुरूष वेश्या !! वेश्या के बारे में बहुत कुछ कहा जाता रहा है, कहा जाता रहेगा.... लेकिन कोई स्त्री वेश्या क्यूँ है? उसका उत्स क्या है? वह वेश्या क्यूँ है? क्या अब वो इस जीवन से निजात पाना चाहती है? उसने जीवन में क्या चाहा था? क्या माँगा था? दरअसल क्या वह इस धंधे को धंधा समझती है? धंधे के उसूल अपने से पृथक चीजों को बेचना होता है? अपनी ही देह का मजबूरी में पैसे कमाने के लिए इस्तेमाल करना क्या सचमुच एक स्वस्थ व्यापार कहा जा सकता है?? अगर सचमुच ऐसा है तो एक अच्छी से अच्छी वेश्या की, एक टुच्चे से टुच्चे व्यापारी कि तुलना में क्या साख, मान-सम्मान, हैसियत या रूतबा होता है?? एक वेश्या, जिसका इस्तेमाल हम अपने अनिर्वर्चनीय आनंद के लिए करते हैं, उसको हकीकत में हम क्या इज्जत देते हैं?? यदि नहीं तो क्यों हमने स्त्री जाति के एक विशाल वर्ग को इतना स्तरहीन, इतना मलीन, इतना व्यक्तित्व-विहीन बनाया हुआ है?? क्या सिर्फ़ अपनी विष्ठा-वीर्य उसमें त्यागने के लिए?? वेश्या को बनाए रखने में किसका हाथ है?? यदि हम सच ही में स्त्री को इज्जत देते हैं या वाकई हमारे भीतर उसके लिए पवित्र भावनाएं हैं!! तो क्या हमें इनके उन्मूलन के प्रयास नहीं करने चाहिए?? यदि हम ऐसा कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं तो जमाने से यह क्या चीखना-चिल्लाना करते रहते हैं?? हम सामर्थ्यहीन लोग झूठ-मूठ ही राग अलापते रहते हैं और विभ्भिन्न प्रकार की पोथियों के पन्ने काले करते रहते हैं?? ...स्त्री को जब भोगना ही है, तो बदनामी का भी मज़ा लो ...!! यों चोरी-छुपे भोगकर इज्जतदार होने का भी ढोंग क्यों?? ...यानी कि अन्दर भी बल्ले-बल्ले .... बाहर भी बल्ले-बल्ले !!वाह रे आदमी !! इसे ही तो कहते हैं चित भी मेरी ...पट भी मेरी !!!!
.......सब वादे हैं...वादों का क्या !!
......रिश्ते जिन्दगी को धीमा कर देते हैं!!रिश्ते मतलब,एक -दूसरे की फिक्र!!रिश्ते मतलब,एक-दूसरे को प्यार!!रिश्ते मतलब,रोज-रोज की तकरार-मनुहार!!रिश्ते मतलब,एक-दूसरे को अपना वक्त देना......कुल-मिलाकर वक्त खोटा करना !!और वक्त!!वो तो हम सब के पास बेहद कम है,देखो ना भागा ही जा रहा है!!नामुराद साला!!ठहरता ही नहीं!!जिन्दगी में कित्ते तो काम हैं!!ये करना है,वो करना है!!इससे आगे बढ़ना है,उससे आगे जाना है!!मकान बनाना है,बच्चों की शादी,ऊँचा रहन-सहन,मोबाइल,गाड़ी,कपड़े,टी.वी, फ्रीज,कंप्यूटर,डी.वी.डी.प्लेयर,तरह-तरह के अन्य साजो-सामान....ना जाने कितना और कुछ.....!!जिन्दगी की इन सच्चाईयों के बीच रिश्तों की भला बिसात ही क्या ?? प्लीज रिश्तों की कोई बात ना कीजिये !!रिश्ते दरअसल अन्धकार हैं, आज के दौर की ये चकाचौंध हमारी रौशनी!!हमें अपने समय से बहुत आगे जाना है,हममे से हर एक को,हर एक से आगे जाना है,कहाँ .... पता नहीं !!!! बूढे माँ-बाप... इन्होने तो अपना फ़र्ज़ पूरा किया,किसी पर अहसान थोड़ा ही ना किया!! रिश्ते !!हा-हा-हा-हा!! रिश्ते दर्द हैं!!रिश्ते दुख हैं!!रिश्तों से भला कैसी रिश्तेदारी?? रिश्तों से कोई ना निभाओ यारी !! रिश्ते धुंध हैं !!धुंध के पार जाना है!!अब शायद कोई अपनी माँ से पैदा ना होगा!!अब शायद किसी का कोई बाप ना होगा !! सच !!!!
धर्म तो प्रेम का एक पर्याय है...
प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
धर्म तो प्रेम का एक पर्याय है, प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये।
पूजा वो है जो मन से हो जिसके लिये, आरती-धूप-चंदन नहीं चाहिये ।।
सब कंंगूरे, कलष और मीनार हैं
भावना के सृजन औं लगन के लिये
शंख घण्टों की ध्वनियॉं, अजानें-सभी हैं
सही ध्यान केन्द्रीकरण के लिये।
जो समझते है, वे सब हैं कहते यही
धर्म का धर्म से भेद कुछ भी नहीं
भावनाओं को बहका के झकझोरने
प्रलयकारी प्रंभजन नहीं चाहिये ।।1।।
एक भगवान है सारे संसार का,
लोगों ने रख लिये उसके कई नाम है।
कहीं मिन्दर हैं, मिस्जद है गुरूद्वारे हैं
कहीं गिरजा-उसी के ये सब धाम है।
व्यक्तिगत धारणा और विष्वास की,
सभी को संवैधानिक खुली छूट हैं
तो किसी के भी धार्मिक अनुष्ठान का कोई
खण्डन या मण्डन नहीं चाहिये ।।2।।
तर्क से फर्क बढ़ता रहा है सदा,
धर्म तो सिर्फ श्रद्धा है विष्वास है
मन से जो साफ जितना है व्यवहार में
इष्ट के अपने वह उतना ही पास है।
भक्ति को भूमि सीमा भवन स्थल की,
या कि सामान की कुछ जरूरत नहीं
उपरी साज सज्जा दिखावा है सब,
धर्म को कोई ठनगन नहीं चाहिये ।।3।।
भेद का हो समापन, सृजन हो नये
एक ऐसे सदन का जहॉं सब मिलें
जिसके विस्तीर्ण गुम्बद के नीचे सभी
धर्म औं पंथ के फूल हिलमिल खिलें।
धर्म को स्वच्छ ममता का घर चाहिये,
ईट- पत्थर से निर्मित नहीं कोई भवन,
भाव-सुमनों को छाया/औं जल चाहिये,
लू के झौंको की झुलसन नहीं चाहिये ।।5।।
है कपट, धर्म का राजनीतीकरण,
नीति के बिन न सार्थक कोई आचरण
धर्म है लोकहित का खुला रास्ता,
रास्ते को कहॉं चाहिये आवरण ?
भूल-भटकाव में राह मिलती नहीं,
साफ दिल हो तो बात इन्साफ की
धर्म है मन-मिलन, धर्म के नाम पर,
कहीं कोई विखण्डन नहीं चाहिये
धर्म तो प्रेम का एक पर्याय है, प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये।
पूजा वो है जो मन से हो जिसके लिये, आरती-धूप-चंदन नहीं चाहिये ।।
सब कंंगूरे, कलष और मीनार हैं
भावना के सृजन औं लगन के लिये
शंख घण्टों की ध्वनियॉं, अजानें-सभी हैं
सही ध्यान केन्द्रीकरण के लिये।
जो समझते है, वे सब हैं कहते यही
धर्म का धर्म से भेद कुछ भी नहीं
भावनाओं को बहका के झकझोरने
प्रलयकारी प्रंभजन नहीं चाहिये ।।1।।
एक भगवान है सारे संसार का,
लोगों ने रख लिये उसके कई नाम है।
कहीं मिन्दर हैं, मिस्जद है गुरूद्वारे हैं
कहीं गिरजा-उसी के ये सब धाम है।
व्यक्तिगत धारणा और विष्वास की,
सभी को संवैधानिक खुली छूट हैं
तो किसी के भी धार्मिक अनुष्ठान का कोई
खण्डन या मण्डन नहीं चाहिये ।।2।।
तर्क से फर्क बढ़ता रहा है सदा,
धर्म तो सिर्फ श्रद्धा है विष्वास है
मन से जो साफ जितना है व्यवहार में
इष्ट के अपने वह उतना ही पास है।
भक्ति को भूमि सीमा भवन स्थल की,
या कि सामान की कुछ जरूरत नहीं
उपरी साज सज्जा दिखावा है सब,
धर्म को कोई ठनगन नहीं चाहिये ।।3।।
भेद का हो समापन, सृजन हो नये
एक ऐसे सदन का जहॉं सब मिलें
जिसके विस्तीर्ण गुम्बद के नीचे सभी
धर्म औं पंथ के फूल हिलमिल खिलें।
धर्म को स्वच्छ ममता का घर चाहिये,
ईट- पत्थर से निर्मित नहीं कोई भवन,
भाव-सुमनों को छाया/औं जल चाहिये,
लू के झौंको की झुलसन नहीं चाहिये ।।5।।
है कपट, धर्म का राजनीतीकरण,
नीति के बिन न सार्थक कोई आचरण
धर्म है लोकहित का खुला रास्ता,
रास्ते को कहॉं चाहिये आवरण ?
भूल-भटकाव में राह मिलती नहीं,
साफ दिल हो तो बात इन्साफ की
धर्म है मन-मिलन, धर्म के नाम पर,
कहीं कोई विखण्डन नहीं चाहिये
रिलेशन, इमोशन और मीडिया
विष्णु राजगढ़िया
लोग कहते हैं कि अब हम उस दौर में पहुंच गये हैं जहां सेंटिमेंट का कोई मतलब नहीं रहा। मेरे एक मित्र काफी
कांफिडेंस से कहा भी करते हैं कि यार मेरे पास सेंटिमेंट-वेंटिमेंट के लिए फालतू टाइम नहीं है। मीडिया के बड़े हिस्से का भी यही कैलकुलेशन है कि अब ह्यूमेन एंगिल और सॉफ्ट स्टोरिज की कदर नहीं। उनके रीडरशिप सर्वे चाहे जितने भी साइंटिफिक होने का क्लेम करते हों, यही कनक्लूड करते हैं कि आज अगर मास मीडिया को इतनी हार्ड कांपिटिशन में सरवाइव करना हो तो धूम-धड़ाका टाइप मैटेरियल ही सहारा है। हालांकि इंस्टेंट एक्साइटमेंट पैदा करके अचानक चर्चा में आने वाले टीवी चैनलों या पत्र-पत्रिकाओं की दुर्गति भी हमने देखी है। जबकि अब एक छोटा-सा एक्जाम्पुल काफी राहत देने वाला है। हिंदी के एक ब्लॉग पर एक लेडी डॉक्टर के संस्मरण पर पाठकों के जबरदस्त रिस्पांस से मीडिया-मैनेजरों को बहुत कुछ सीखने की ओपुरचुनिटी मिल सकती है।
रांचीहल्ला डॉट ब्लागस्पॉट डॉट कॉम पर डॉ भारती कष्यप ने लिखा है- 'हाउ टू डांस इन द रैन । ' इसे अंग्रेजी में पब्लिश किया गया है जबकि ब्लॉग हिंदी का है और इसके मैक्सिमम रीडर भी हिंदी के ही हैं। लेकिन इस पोस्टिंग पर पहले ही दिन 14 रीडर का रिएक्शन आना काफी पोजिटिव सिगनल है।
पहले देखें कि आई-स्पेशलिस्ट डॉ भारती ने लिखा क्या है। इस संस्मरण के अनुसार डॉ भारती के क्लीनिक में एक सुबह एक ओल्ड-एज पेशेंट आया। उसकी आंख में ग्लूकोमा का आपरेशन हुआ था। उसे पोस्ट-ओपरेटिव ड्रेसिंग करानी थी। उस वॄद्ध मरीज ने अपना इलाज जल्द करने का आग्रह किया था। डॉ भारती ने उसकी ड्रेसिंग पहले करा दी। इस दौरान यह जानने का प्रयास किया कि आखिर उसे जल्दबाजी क्यों है। पता चला कि उस वॄद्ध की पत्नी किसी अन्य अस्पताल में भरती है और उसे नाश्ता कराने के लिए जाने की जल्दबाजी है।
वृद्ध ने यह भी बताया कि पत्नी पिछले पांच साल से अल्जामर रोग की शिकार है और किसी को पहचानती तक नहीं। अपने पति को भी नहीं। इसके बावजूद उसका पति हर सुबह अस्पताल जाकर उसके साथ ही नाश्ता करता है। इस पर डॉ भारती ने सरप्राइज होकर पूछा कि जब वह आपको पहचानती तक नहीं, इसके बावजूद आप हर सुबह जाकर उसके साथ ही नाश्ता क्यों करते हैं, इस पर वृद्ध ने जवाब दिया कि वह मुझे भले ही नहीं पहचानती हो, मैं तो जानता हूं कि वह कौन है।
इस संस्मरण के सहारे डॉ भारती ने बताना चाहा है कि यही वह सच्चा प्रेम है जिसकी कामना हम अपने जीवन में करते हैं। सच्चा प्रेम न तो शारीरिक होता है और न रोमांटिक बल्कि हम जो हैं, जैसे हैं, उसी रूप में एक-दूसरे को पसंद करें, करते रहें, तभी सच्चा प्रेम है। इस संस्मरण को ब्लॉग के एडीटर नदीम अख्तर ने इस सवाल के साथ पब्लिश किया है- 'क्या आज हम अपने जीवन में इस तरह के रिष्तों की डोर मजबूती से थामे रहते हैं? बुढ़ापा सबको आयेगा. जरूरत है अपने रिश्तों की बुनियाद मजबूत करने की, ताकि अंत समय तक आपको अपने साथी का साथ मिले ।'
इस संस्मरण और इसके साथ ऐसे उपदेश को आधुनिक मीडिया-मैनेजर फालतू चीज मानते हैं। अनसेलेबुल. अनरीडेबुल। ऐसी चीजों से न तो अखबार का सर्कुलेशन बढ़ेगा और न टीवी चैनल की रेटिंग। लेकिन इस संस्मरण को मिले रिस्पांस ने साबित कर दिया कि अगर आपके लिए मार्केट ही प्रायोरिटी है तो भी अच्छी चीजों के जरिये भी अपने अखबार की बिक्री और चैनल की टीआरपी बढ़ा सकते हैं। सनसनी से वन-टाइम एचिवमेंट हो सकता है। लेकिन अच्छी चीजें पढ़़कर जुड़े पाठक किसी सच्चे प्रेम की तरह जीवन भर साथ निभायेंगे। जिस तरह वह वृद्ध अपनी पत्नी का साथ निभाये चला जा रहा है। क्या मीडिया खुद के लिए ऐसे सच्चे साथियों की तलाश करता है?
आइ-नेक्स्ट 20-09-2008 में प्रकाशित
लोग कहते हैं कि अब हम उस दौर में पहुंच गये हैं जहां सेंटिमेंट का कोई मतलब नहीं रहा। मेरे एक मित्र काफी
रांचीहल्ला डॉट ब्लागस्पॉट डॉट कॉम पर डॉ भारती कष्यप ने लिखा है- 'हाउ टू डांस इन द रैन । ' इसे अंग्रेजी में पब्लिश किया गया है जबकि ब्लॉग हिंदी का है और इसके मैक्सिमम रीडर भी हिंदी के ही हैं। लेकिन इस पोस्टिंग पर पहले ही दिन 14 रीडर का रिएक्शन आना काफी पोजिटिव सिगनल है।
पहले देखें कि आई-स्पेशलिस्ट डॉ भारती ने लिखा क्या है। इस संस्मरण के अनुसार डॉ भारती के क्लीनिक में एक सुबह एक ओल्ड-एज पेशेंट आया। उसकी आंख में ग्लूकोमा का आपरेशन हुआ था। उसे पोस्ट-ओपरेटिव ड्रेसिंग करानी थी। उस वॄद्ध मरीज ने अपना इलाज जल्द करने का आग्रह किया था। डॉ भारती ने उसकी ड्रेसिंग पहले करा दी। इस दौरान यह जानने का प्रयास किया कि आखिर उसे जल्दबाजी क्यों है। पता चला कि उस वॄद्ध की पत्नी किसी अन्य अस्पताल में भरती है और उसे नाश्ता कराने के लिए जाने की जल्दबाजी है।
इस संस्मरण के सहारे डॉ भारती ने बताना चाहा है कि यही वह सच्चा प्रेम है जिसकी कामना हम अपने जीवन में करते हैं। सच्चा प्रेम न तो शारीरिक होता है और न रोमांटिक बल्कि हम जो हैं, जैसे हैं, उसी रूप में एक-दूसरे को पसंद करें, करते रहें, तभी सच्चा प्रेम है। इस संस्मरण को ब्लॉग के एडीटर नदीम अख्तर ने इस सवाल के साथ पब्लिश किया है- 'क्या आज हम अपने जीवन में इस तरह के रिष्तों की डोर मजबूती से थामे रहते हैं? बुढ़ापा सबको आयेगा. जरूरत है अपने रिश्तों की बुनियाद मजबूत करने की, ताकि अंत समय तक आपको अपने साथी का साथ मिले ।'
इस संस्मरण और इसके साथ ऐसे उपदेश को आधुनिक मीडिया-मैनेजर फालतू चीज मानते हैं। अनसेलेबुल. अनरीडेबुल। ऐसी चीजों से न तो अखबार का सर्कुलेशन बढ़ेगा और न टीवी चैनल की रेटिंग। लेकिन इस संस्मरण को मिले रिस्पांस ने साबित कर दिया कि अगर आपके लिए मार्केट ही प्रायोरिटी है तो भी अच्छी चीजों के जरिये भी अपने अखबार की बिक्री और चैनल की टीआरपी बढ़ा सकते हैं। सनसनी से वन-टाइम एचिवमेंट हो सकता है। लेकिन अच्छी चीजें पढ़़कर जुड़े पाठक किसी सच्चे प्रेम की तरह जीवन भर साथ निभायेंगे। जिस तरह वह वृद्ध अपनी पत्नी का साथ निभाये चला जा रहा है। क्या मीडिया खुद के लिए ऐसे सच्चे साथियों की तलाश करता है?
आइ-नेक्स्ट 20-09-2008 में प्रकाशित
Sunday, September 21, 2008
भाइयों और बहनों,
आप सबों को साधू भौरा का प्रेम भरा नमस्कार,
दोस्तों देखता हूँ कि इन दिनों स्थानीय अखबारों में बार-बार मेरे किसी पंजैय पोदरी से से सम्बन्ध होने की बातें उछाली जा रही हैं,बिना किसी अकाट्य सबूत के किसी का चीरहरण करना सरासर ग़लत तो है ही,हमारी मानहानि भी है,इसलिए इसे अविलम्ब बंद किया जाए!दोस्तों मैं वर्षों से एक राजनेता हूँ,और जनता की सेवा में मैंने आज तक कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है!बेशक मैंने अपने मुर्ख्अमन्त्रित्वकाल में ख़ुद भी बहुत मनमानियां कीं ,और औरों को भी करने दी!!लोकतंत्र का तकाजा था,सो कभी किसी को कुछ भी करने से नहीं रोका,आपने इसे मेरी कमजोरी समझा,मगर मैं चुप रहा,आपने मेरे सन्दर्भ में भ्रष्टाचार की उलटी-सीधी खबरें छापी मगर मैंने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की,मगर आज मैं पहली बार अपना मुंह खोल रहा हूँ,क्योंकि मैं समझता हूँ कि अब पानी सर से गुजर रहा है,और बार-बार मेरी शान में हिमाकत की जा रही है !!
सार्वजनिक जीवन में ऐसा कई बार होता है कि अत्यन्त जरूरी कार्यों के सिलसिले में आपको बहुत सारे लोगों से मिलना-जुलना होता है,ये सारे लोग प्रत्यक्ष ही आते हों,ऐसा नहीं होता,बहुत सारे लोग किसी अन्य चैनल की मार्फ़त भी आते है जिनका नाम याद रखना तो दूर,ठीक से उनकी शक्ल भी याद नहीं रहती !!इससे आप किसी के सम्बन्ध किसी से जोड़ दे,यह नितांत ग़लत है!!
एक मंत्रिमंडल में कई मंत्री होते हैं,हर एक की,कार्यों के सिलसिले में मिलने वालों से कोई व्यक्तिगत जान-पहचान हो,ऐसा हरगिज नहीं होता !! मंत्री बनते ही हम अन्तर्यामी थोड़े हो जाते हैं,आपमें में से भी कोई भी हमसे मिलकर उचित काम कर या करवा सकता है,हरेक काम में कई ज़रूरी कारवायिआं होती हैं और एक ही कार्य के लिए बार-बार मिलना भी अत्यन्त ज़रूरी हो जाता है,इस में आप बेशक किसी का सम्बन्ध किसी से जोड़ सकते हैं मगर ये सच ही हो,ये ज़रूरी नहीं!! तो मैं तो आपकी बातों की काट करूँ,इसमें भी मैं अपनी तौहीन समझता हूँ,मगर कहीं जनता भी आपकी लत-पट बातों से गुमराह न जाए इसलिए मैं अपने विचार संप्रेषित कर रहा हूँ !!
एक नाम,या शक्ल,या एक स्थान,और हुबहू एक ही नाम के माँ-बाप वाले कई व्यक्तियों का होना बिल्कुल लाजिमी होता है मगर आप मिडिया वाले एक नाम के साथ दूसरी सूचनाओं का ऐसा घालमेल कर देते हैं और उसे लैंड-फंड सबूतों से सिद्द भी कर देते हैं कि आदमी साला एकदम से बेचारा हो जाता है,चाहे वो कोई भी हो !!क्या आप नहीं जानते की जिसके ऊपर बिताती है वो ही जानता है!!आप मिडिया वाले हमारे सबसे करीबी होते हैं,आप भी ऐसा करते हैं तो हमें कितना दुःख होता है,ये आप क्या जाने ?कोई राज्य में इन्वेस्ट करने वाला व्यक्ति या उद्योगपति कहीं जाता है,हम उसके किसी कागज पर अपनी अनुशंसा कर देते हैं,या उसकी टिकिट बनवा देते हैं या वो हमारी टिकिट बनवा देता है,या संयोग से एक टिकिट में हमारा नाम या एक ही होटल में हमारा ठहरना ,या सैर-सपाटे के दौरान संयोग-वशात एक ही गंतव्य होने के कारण कहीं आते-जाते हुए रस्ते में भेंटा जाना और भेंटा जाने के कारण कहीं कारण कहीं खाने-पीने बैठ जाना ....इन सबमें आपको साजिश या परिचय वाली क्या बात लगती है?आप भारत के बाहर हों,जम्मू के हों और कोई साउथ-इंडियन आपसे भेंटा जाए और आपसे जड़ों से जुडाव के कारण आपको लंच पर बुलाए ,अथवा अपने साथ रहने को आमंत्रित करे तो क्या आप उसे टूक-सा जवाब दे देंगे ??फ़िर अपने वतन से बाहर कोई अपना-सा मिल ही जाए तो क्या हम पहले उसकी तहकीकात करने लगें कि वो क्या है,कैसा है,बेईमान है कि क्या है ?क्या ऐसा करना सम्भव है ?क्या ऐसा करना उचित होगा?क्या हमारा ऐसा करना हमारे ऊपर उसके विश्वास को ठेस नहीं पहुँचायेगा ??सो आपको सार्वजनिक जीवन जीने वालों के प्रति कोई भी बात अत्यन्त सावधानी पूर्वक कहनी या लिखनी चाहिए!! जनता की समस्स्याओं के लिए हम सतत संघर्ष करते है और उस संघर्ष के दरम्यान अकसर हमसे बहुत सारे लोग जुड़ जाते हैं, और हमारे प्रति अपनी शुभेक्षा के कारण अकसर वे हमारे कहीं आने-जाने,खाने-पीने,रहने-सोने तथा कभी-कभी कुछ मनोरंजन का भी प्रबंध कर देते हैं!!हमारी जिंदगी की जटिलताओं को देखते हुए इस-सब पर किसी को कोई एतराज तो नहीं होना चाहिए,मगर मिडिया का तो जैसे यही एक रोजगार रह गया है कि वो उल्टे-सीधे प्रश्न उठाये या गडे मुर्दे ही उखाडे?सच यह है कि आप नहीं जानते कि यही मिडिया आज-तक हमें ब्लैकमेल करता आया है!!हम इनकी बात माने तो ठीक,वरना ये हमें जन-विरोधी ,भ्रष्टाचारी ,बेईमान और भी ना जाने क्या-क्या कहता है !!मेरी तो जनता से ये गुजारिश है की वो अब ऐसा वातावरण या आन्दोलन तैयार करें,जिससे मिडिया की यह गन्दी दादागिरी ख़त्म हो !!जनता के इस नेक कार्य में देश के तमाम नेता साथ खड़े मिलेंगे ....!!तो बोलिए हम सब मिडिया को मिटा कर रहेंगे !!
हम सबको मिलकर ही राजनीति को स्वच्छ करना है!!मिडिया जनता और नेता के बीच दीवार खड़ी करता है,इस दीवार को अब हमें गिरा देना है!!राजनीति का आनंद आपको और हमको मिलकर ही लेना है,आप पकाएंगे और हम खाएँगे !!हर आदमी एक समय तक अपने माँ-बाप का ही खाता है,हम भी अपने राज्य-अपने देश का खाते हैं तो कौन सा हराम करते हैं,ये बात सबको सोचनी चाहिए !! नेताओं के काम में तो किसी को अपनी टांग ही नहीं घुसानी चाहिए,जो ऐसा करते हैं उन्हें भरसक रोकना ही चाहिए,बल्कि उनकी तो टांग ही तोड़ देनी चाहिए!!आप सब आज ही से ये यत्न करना शुरू कर दे,इसी में हमारी और आपकी भलाई है,हम सदा आपकी भलाई के लिए सोचते हैं,मगर राजनीति में कुछ ग़लत तत्वों के समावेश के कारण कुछ कर नहीं पाते ,आप भी हमारी भलाई की सोचे,आपका भला ख़ुद-ब-ख़ुद हो जायेगा !! आप सबसे बस एक ही छोटी-सी गुजारिश है की किसी भी हालत में मिडिया के बहकावे में नहीं आयें !!आज का मिडिया ख़ुद स्वार्थी है और सदा अपना उल्लू सीधा करने में लगा रहता है !!सो दोस्तों,संक्षेप में यही कहूँगा की आप हम नेताओं को ग़लत नहीं समझे ,आप और हम एक-दूसरे के खेवनहार हैं,आपके बिना हम नहीं हैं !!तो हमारे बिना आपकी चिंता और चाकरी भला कौन करेगा ??
आपके प्रति अपनी समस्त सदिच्छाओं के साथ आपका हितैषी और प्रेमी !! भूतपूर्व मुर्खमंत्री
साधू भौंरा !!
(हस्ताक्षर)
आप सबों को साधू भौरा का प्रेम भरा नमस्कार,
दोस्तों देखता हूँ कि इन दिनों स्थानीय अखबारों में बार-बार मेरे किसी पंजैय पोदरी से से सम्बन्ध होने की बातें उछाली जा रही हैं,बिना किसी अकाट्य सबूत के किसी का चीरहरण करना सरासर ग़लत तो है ही,हमारी मानहानि भी है,इसलिए इसे अविलम्ब बंद किया जाए!दोस्तों मैं वर्षों से एक राजनेता हूँ,और जनता की सेवा में मैंने आज तक कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है!बेशक मैंने अपने मुर्ख्अमन्त्रित्वकाल में ख़ुद भी बहुत मनमानियां कीं ,और औरों को भी करने दी!!लोकतंत्र का तकाजा था,सो कभी किसी को कुछ भी करने से नहीं रोका,आपने इसे मेरी कमजोरी समझा,मगर मैं चुप रहा,आपने मेरे सन्दर्भ में भ्रष्टाचार की उलटी-सीधी खबरें छापी मगर मैंने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की,मगर आज मैं पहली बार अपना मुंह खोल रहा हूँ,क्योंकि मैं समझता हूँ कि अब पानी सर से गुजर रहा है,और बार-बार मेरी शान में हिमाकत की जा रही है !!
सार्वजनिक जीवन में ऐसा कई बार होता है कि अत्यन्त जरूरी कार्यों के सिलसिले में आपको बहुत सारे लोगों से मिलना-जुलना होता है,ये सारे लोग प्रत्यक्ष ही आते हों,ऐसा नहीं होता,बहुत सारे लोग किसी अन्य चैनल की मार्फ़त भी आते है जिनका नाम याद रखना तो दूर,ठीक से उनकी शक्ल भी याद नहीं रहती !!इससे आप किसी के सम्बन्ध किसी से जोड़ दे,यह नितांत ग़लत है!!
एक मंत्रिमंडल में कई मंत्री होते हैं,हर एक की,कार्यों के सिलसिले में मिलने वालों से कोई व्यक्तिगत जान-पहचान हो,ऐसा हरगिज नहीं होता !! मंत्री बनते ही हम अन्तर्यामी थोड़े हो जाते हैं,आपमें में से भी कोई भी हमसे मिलकर उचित काम कर या करवा सकता है,हरेक काम में कई ज़रूरी कारवायिआं होती हैं और एक ही कार्य के लिए बार-बार मिलना भी अत्यन्त ज़रूरी हो जाता है,इस में आप बेशक किसी का सम्बन्ध किसी से जोड़ सकते हैं मगर ये सच ही हो,ये ज़रूरी नहीं!! तो मैं तो आपकी बातों की काट करूँ,इसमें भी मैं अपनी तौहीन समझता हूँ,मगर कहीं जनता भी आपकी लत-पट बातों से गुमराह न जाए इसलिए मैं अपने विचार संप्रेषित कर रहा हूँ !!
एक नाम,या शक्ल,या एक स्थान,और हुबहू एक ही नाम के माँ-बाप वाले कई व्यक्तियों का होना बिल्कुल लाजिमी होता है मगर आप मिडिया वाले एक नाम के साथ दूसरी सूचनाओं का ऐसा घालमेल कर देते हैं और उसे लैंड-फंड सबूतों से सिद्द भी कर देते हैं कि आदमी साला एकदम से बेचारा हो जाता है,चाहे वो कोई भी हो !!क्या आप नहीं जानते की जिसके ऊपर बिताती है वो ही जानता है!!आप मिडिया वाले हमारे सबसे करीबी होते हैं,आप भी ऐसा करते हैं तो हमें कितना दुःख होता है,ये आप क्या जाने ?कोई राज्य में इन्वेस्ट करने वाला व्यक्ति या उद्योगपति कहीं जाता है,हम उसके किसी कागज पर अपनी अनुशंसा कर देते हैं,या उसकी टिकिट बनवा देते हैं या वो हमारी टिकिट बनवा देता है,या संयोग से एक टिकिट में हमारा नाम या एक ही होटल में हमारा ठहरना ,या सैर-सपाटे के दौरान संयोग-वशात एक ही गंतव्य होने के कारण कहीं आते-जाते हुए रस्ते में भेंटा जाना और भेंटा जाने के कारण कहीं कारण कहीं खाने-पीने बैठ जाना ....इन सबमें आपको साजिश या परिचय वाली क्या बात लगती है?आप भारत के बाहर हों,जम्मू के हों और कोई साउथ-इंडियन आपसे भेंटा जाए और आपसे जड़ों से जुडाव के कारण आपको लंच पर बुलाए ,अथवा अपने साथ रहने को आमंत्रित करे तो क्या आप उसे टूक-सा जवाब दे देंगे ??फ़िर अपने वतन से बाहर कोई अपना-सा मिल ही जाए तो क्या हम पहले उसकी तहकीकात करने लगें कि वो क्या है,कैसा है,बेईमान है कि क्या है ?क्या ऐसा करना सम्भव है ?क्या ऐसा करना उचित होगा?क्या हमारा ऐसा करना हमारे ऊपर उसके विश्वास को ठेस नहीं पहुँचायेगा ??सो आपको सार्वजनिक जीवन जीने वालों के प्रति कोई भी बात अत्यन्त सावधानी पूर्वक कहनी या लिखनी चाहिए!! जनता की समस्स्याओं के लिए हम सतत संघर्ष करते है और उस संघर्ष के दरम्यान अकसर हमसे बहुत सारे लोग जुड़ जाते हैं, और हमारे प्रति अपनी शुभेक्षा के कारण अकसर वे हमारे कहीं आने-जाने,खाने-पीने,रहने-सोने तथा कभी-कभी कुछ मनोरंजन का भी प्रबंध कर देते हैं!!हमारी जिंदगी की जटिलताओं को देखते हुए इस-सब पर किसी को कोई एतराज तो नहीं होना चाहिए,मगर मिडिया का तो जैसे यही एक रोजगार रह गया है कि वो उल्टे-सीधे प्रश्न उठाये या गडे मुर्दे ही उखाडे?सच यह है कि आप नहीं जानते कि यही मिडिया आज-तक हमें ब्लैकमेल करता आया है!!हम इनकी बात माने तो ठीक,वरना ये हमें जन-विरोधी ,भ्रष्टाचारी ,बेईमान और भी ना जाने क्या-क्या कहता है !!मेरी तो जनता से ये गुजारिश है की वो अब ऐसा वातावरण या आन्दोलन तैयार करें,जिससे मिडिया की यह गन्दी दादागिरी ख़त्म हो !!जनता के इस नेक कार्य में देश के तमाम नेता साथ खड़े मिलेंगे ....!!तो बोलिए हम सब मिडिया को मिटा कर रहेंगे !!
हम सबको मिलकर ही राजनीति को स्वच्छ करना है!!मिडिया जनता और नेता के बीच दीवार खड़ी करता है,इस दीवार को अब हमें गिरा देना है!!राजनीति का आनंद आपको और हमको मिलकर ही लेना है,आप पकाएंगे और हम खाएँगे !!हर आदमी एक समय तक अपने माँ-बाप का ही खाता है,हम भी अपने राज्य-अपने देश का खाते हैं तो कौन सा हराम करते हैं,ये बात सबको सोचनी चाहिए !! नेताओं के काम में तो किसी को अपनी टांग ही नहीं घुसानी चाहिए,जो ऐसा करते हैं उन्हें भरसक रोकना ही चाहिए,बल्कि उनकी तो टांग ही तोड़ देनी चाहिए!!आप सब आज ही से ये यत्न करना शुरू कर दे,इसी में हमारी और आपकी भलाई है,हम सदा आपकी भलाई के लिए सोचते हैं,मगर राजनीति में कुछ ग़लत तत्वों के समावेश के कारण कुछ कर नहीं पाते ,आप भी हमारी भलाई की सोचे,आपका भला ख़ुद-ब-ख़ुद हो जायेगा !! आप सबसे बस एक ही छोटी-सी गुजारिश है की किसी भी हालत में मिडिया के बहकावे में नहीं आयें !!आज का मिडिया ख़ुद स्वार्थी है और सदा अपना उल्लू सीधा करने में लगा रहता है !!सो दोस्तों,संक्षेप में यही कहूँगा की आप हम नेताओं को ग़लत नहीं समझे ,आप और हम एक-दूसरे के खेवनहार हैं,आपके बिना हम नहीं हैं !!तो हमारे बिना आपकी चिंता और चाकरी भला कौन करेगा ??
आपके प्रति अपनी समस्त सदिच्छाओं के साथ आपका हितैषी और प्रेमी !! भूतपूर्व मुर्खमंत्री
साधू भौंरा !!
(हस्ताक्षर)
Saturday, September 20, 2008
zindagi ज़िन्दगी
की-बोर्ड पर रुकी हुई अंगुलियाँ और विचारशून्य मन, लिखना तो चाहता था पर शब्द नहीं थे....मॉनिटर को ऑफ़ किया और निकल पड़ा सड़क पर......काफी दूर....तभी अचानक घड़ी का इशारा और रिक्शे से घर वापिस.....
रिक्शा धीरे धीरे चल रहा था बिना हड़बड़ी के, रिक्शे वाला कोई चालीस का रहा होगा
"भइया ज़रा तेज़ी से" मैंने कहा
ज़ोर तो बढ़ा पर रिक्शा उसी गति से बढ़ता रहा .....और घड़ी दुगनी तेज़ी से
"यार ज़रा तेज़ चला लो"
"जी" पर नतीजा वही ढाक के तीन पात
"यार..."झल्लाने का कोई फायदा नहीं था "कहाँ के हो भाई?"
"बिहार" जवाब आया और थोड़ा संकोच भी।
"बिहार में कहाँ से?" टाइम पास ही करना था।
"जी, अररिया"
"अरे वहां तो बाढ़ आई हुई है ना?"
कल न्यूज़ में देखा था कुछ।रिक्शा अभी भी धीमे ही चल रहा था।"उधर तो हर साल ही बाढ़ आती है?"
रिक्शा रुक गया, रिक्शेवाले ने अपने गमछे से पसीना पोछा और आंखें भी,
फिर उसी गति से चल पड़ा।
"कुछ बोलो यार?" एक तो इतने धीमे चलता रिक्शा ऊपर से ये चुप्पी मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त थी।
रिक्शेवाले ने पलट कर देखा,"क्या बोलें भइया?"
"अरे मैं तुम्हारे गाँव की बात कर रहा हूँ भाई"
"हमारा गाँव तो पूरा पानी हो गया अब कुछ कहाँ है"
"और घरवाले"मैंने पहली बार ध्यान से देखा रिक्शेवाला पसीना नहीं आंसू पोछ रहा था।
"कुछ पता नहीं? मेरा दो बच्चा और घरवाली का कोई पता नहीं है साहब?"
"पर फ़ोन- वोन?" "परसों किए थे पर अब तो उ बूथ भी बह गया जहाँ फ़ोन करते थे?भतीजा फ़ोन किया था आज,कहा कोई ख़बर नहीं है किसी का" अब तो वो ज़ोर से रो रहा था।
"तो गाँव क्यूँ नहीं चले जाते?"
"क्या फायदा साहब,हम का कर लेंगे वहां जाके, उससे तो यहीं कुछ कमा लेंगे तो शायद आगे काम देगा।"
इसके आगे मैं सुन नहीं पाया, मेरे अन्दर कुछ बज रहा था नहीं मेरा सेलफोन बज रहा था।घर से .....
पापा ने फोन पर बताया कि गाँव वाला घर डूब गया है और चाचा का पूरा परिवार किसी तरह हमारे घर आ पहुँचा है..........फ़ोन सुनने के बाद देखा तो रिक्शेवाला पेडील पर ज़ोर लगा रहा था, मैंने कहा "कोई बात नहीं भइया आराम से चलाओ कोई ज़ल्दी नहीं है।" सेलफोन पर एक मेसेज आया था
"जब भी मैं ज़िन्दगी से मांगता हूँ
थोडी सी छत
वो मुझसे मेरा पूरा आसमान चुरा ले जाती है "
रिक्शा धीरे धीरे चल रहा था बिना हड़बड़ी के, रिक्शे वाला कोई चालीस का रहा होगा
"भइया ज़रा तेज़ी से" मैंने कहा
ज़ोर तो बढ़ा पर रिक्शा उसी गति से बढ़ता रहा .....और घड़ी दुगनी तेज़ी से
"यार ज़रा तेज़ चला लो"
"जी" पर नतीजा वही ढाक के तीन पात
"यार..."झल्लाने का कोई फायदा नहीं था "कहाँ के हो भाई?"
"बिहार" जवाब आया और थोड़ा संकोच भी।
"बिहार में कहाँ से?" टाइम पास ही करना था।
"जी, अररिया"
"अरे वहां तो बाढ़ आई हुई है ना?"
कल न्यूज़ में देखा था कुछ।रिक्शा अभी भी धीमे ही चल रहा था।"उधर तो हर साल ही बाढ़ आती है?"
रिक्शा रुक गया, रिक्शेवाले ने अपने गमछे से पसीना पोछा और आंखें भी,
फिर उसी गति से चल पड़ा।
"कुछ बोलो यार?" एक तो इतने धीमे चलता रिक्शा ऊपर से ये चुप्पी मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त थी।
रिक्शेवाले ने पलट कर देखा,"क्या बोलें भइया?"
"अरे मैं तुम्हारे गाँव की बात कर रहा हूँ भाई"
"हमारा गाँव तो पूरा पानी हो गया अब कुछ कहाँ है"
"और घरवाले"मैंने पहली बार ध्यान से देखा रिक्शेवाला पसीना नहीं आंसू पोछ रहा था।
"कुछ पता नहीं? मेरा दो बच्चा और घरवाली का कोई पता नहीं है साहब?"
"पर फ़ोन- वोन?" "परसों किए थे पर अब तो उ बूथ भी बह गया जहाँ फ़ोन करते थे?भतीजा फ़ोन किया था आज,कहा कोई ख़बर नहीं है किसी का" अब तो वो ज़ोर से रो रहा था।
"तो गाँव क्यूँ नहीं चले जाते?"
"क्या फायदा साहब,हम का कर लेंगे वहां जाके, उससे तो यहीं कुछ कमा लेंगे तो शायद आगे काम देगा।"
इसके आगे मैं सुन नहीं पाया, मेरे अन्दर कुछ बज रहा था नहीं मेरा सेलफोन बज रहा था।घर से .....
पापा ने फोन पर बताया कि गाँव वाला घर डूब गया है और चाचा का पूरा परिवार किसी तरह हमारे घर आ पहुँचा है..........फ़ोन सुनने के बाद देखा तो रिक्शेवाला पेडील पर ज़ोर लगा रहा था, मैंने कहा "कोई बात नहीं भइया आराम से चलाओ कोई ज़ल्दी नहीं है।" सेलफोन पर एक मेसेज आया था
"जब भी मैं ज़िन्दगी से मांगता हूँ
थोडी सी छत
वो मुझसे मेरा पूरा आसमान चुरा ले जाती है "
बदल रही है रांची, ज़रा बच के भइया!!
जमशेदपुर में काम कर रहे युवा पत्रकार अमितेश ने बदलती रांची का मिजाज़ जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया है. ख़ास रांचीहल्ला के लिए किए गए इस सर्वेक्षण के कुछ महत्वपूर्ण अंश ख़बर के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है. काफी दिलचस्प बातें हैं, पढ़ कर रांची की नब्ज़ टटोलने की कोशिश करें...
- उभरती राँची के नये रंग को दूर से ही सलाम
- रांची को नकारने की बनती जा रही हैं कई वजहें
- किसी को आम दिन होनेवाली बंद खल रही तो किसी को बाहरी-भीतरी की भावना
- 77 फीसदी ल़डकियों का मानना है कि विक्रम या टेंपो चालक नहीं सुधरेंगे
- मस्ती के लिए सिद्धू-कान्हू पार्क मस्त पर परिवारवालों के लिए जाना त्रस्त
- सर्वेक्षण के अनुसार बिजली विभाग है सबसे भ्रष्ट
- लड़के-ल़डकियों का बिंदासपन रांची को पुरानी रांची से दूर कर रहा है
रांची प्रिय है, पर पुरानी रांची। आज की बदलती-भागती रांची और नये रंगरूप में ढलते रांचीवासी पसंद नहीं आ रहे। आखिर उभरती रांची के नये रंग को दूर से सलाम क्यों किया जा रहा है? रांची को अपनी जान कहने वाले युवा ही
आखिर रांची को क्यों नापसंद करने लगे हैं? रांची के युवाओं को रांची प्रिय है लेकिन रांचीवासी, रांची की संस्कृति और रांची के आकषर्ण केंद्र क्यों नहीं आ रहे पसंद? एक सर्वेक्षण में शामिल किये गये युवाओं के सामने यह सवाल प्रमुखता से उठाया गया।इसमें 96 फीसदी ने रांची के प्रति अपने प्यार का इजहार किया। हममें से कई ने कहा कि रांची बहुत ज्यादा पंसद है लेकिन ब़डी संख्या में खासकर युवाओं ने माना कि रांची कुछ हद तक पंसद है। 38 फीसदी युवाओं का मानना है कि आम दिन होने वाले बंद, ब़ढते अपराध और प्रशासनिक विफलता के कारण उन्हें रांची पसंद नहीं आ रही है। 11 फीसदी युवाओं ने माना कि रांची अमीरों और भ्रष्टाचारियों की शहर बनता जा रहा है और यहां मध्यम वर्ग और गरीबों के लिए कोई जगह नहीं। 13 फीसदी युवाओं को मानना है कि शहरी आधारभूत संरचना विशेषकर यातायात व्यवस्था बेहाल है। जब कि 10 फीसदी युवाओं ने माना कि यहां बाहरी-भीतरी की भावना घर कर गयी है। जाहिर है यह अवधारणा बदलनी चाहिए। और उम्मीद है कि ये रांची है मेरी जान, लेकिन... सर्वे से निकलती सही जानकारी विशेषज्ञ और रांची में चाहत रखने वाले लोगों को रांची की तस्वीर बदलने में कारगर साबित होगी। किसी को रांची की यातायात व्यवस्था खलती है तो किसी को रांची की गंदगी कचोटती है। जैसा कि एक प्रश्न के जवाब में 61 फीसदी युवाओं ने यातायात व्यवस्था के कारण रांची का दिल कहे जाने वाले स्थानों- अलबर्ट एक्का चौक/बिरसा चौक मेन रोड/रातू रोड को रांची का सबसे वाहियात जगह माना। वहीं इस प्रश्न के जवाब में 31 फीसदी युवाओं ने माना कि हिंदपी़डी और अप्पर बाजार गंदगी के मामले में रांची की सबसे बुरी जगह है। रांची को पसंद न करने के कुछ तो एकाध कारण रहे ही होंगे, लेकिन नये रास्ते की ओर ब़ढते हुए रांची के साथ न चाहने के कुछ और कारण भी जु़ड गये हैं। गौर करने वाली बात है कि जब एक सवाल में हमने पूछा कि रांची का कौन सा विभाग या जगह या वर्ग कभी नहीं सुधरने वाला तो लगभग 44 फीसदी युवाओं ने माना कि टेंपों या रिक्शा चालक कभी नहीं सुधरने वाले। इसमें 77 फीसदी ल़डकियां शामिल हैं। 20 फीसदी युवाओं ने माना कि रिम्स कभी नहीं सुधरने वाला, जब कि 15 फीसदी लोगों का मानना है कि रांची नगर निगम कभी नहीं सुधरने वाला है। 10 फीसदी युवाओं ने माना कि छात्रों के हित की बात करने वाला रांची विश्वविद्यालय कभी नहीं सुधरने वाला। रांची में ब़ढती गाड़ियों की संख्या, ट्रैफिक सिस्टम और उसके मैनेजमेंट पर सभी उंगली उठाते हैं परंतु जब युवाओं से ड्राइविंग की बेहाल व्यवस्था के बारे में पूछा गया तो लगभग 39 फीसदी युवाओं ने अप्पर बाजार में गा़डी चालन पर अपने हाथ ख़डे कर लिये। जब कि 37 फीसदी युवाओं ने माना कि मेनरोड पर गा़डी चलाना बिल्कुल दूभर है। सर्वेक्षण में शहर के भ्रष्टतम विभाग को उभारने का प्रयास किया गया और युवाओं ने इस सवाल के जवाब में भी अपनी बेबाक राय दी। 40 फीसदी युवाओं को मानना है कि बिजली विभाग सबसे भ्रष्ट है, जबकि 37 फीसदी लोग पुलिसिया रवैये से परेशान हो पुलिस विभाग को भ्रष्टतम विभाग मानते हैं। अपनी कथनी और करनी से बदनाम रांची नगर निगम को लगभग 13 फीसदी लोग भ्रष्ट विभाग की श्रेणी में लाते हैं। रांची को पसंद करने के कई कारण हो सकते हैं, आखिर यह झारखंड की राजधानी है। स्टाइर्ल, स्पीड और बिंदासपन रांची की पहचान बन चुकी है। परंतु जब युवाओं से परिवार के साथ न जा पानेवाली पंसदीदा जगहों के बारे में पूछा गया तो कुछ विरोधाभास सामने आए। दोस्तों या महिला मित्रों के साथ जाने वाला युवा अपने परिवार के साथ सिद्धू-कान्हू पार्क नहीं जाना चाहता। युवाओं का मानना है कि बदलती रांची का असली चेहरा वहीं दिखता है। लगभग 62 फीसदी युवाओं का मानना है कि सिद्धू-कान्हू पार्क परिवार के साथ नहीं iजाया जा सकता। अपनी शालीनता और प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए जाना जाने वाला रांची आज अपना आकषर्ण खोता नजर आता है। १३ फीसदी लोगों का मानना है कि डियर पार्क और लगभग 12 फीसदी युवा मानते है कि अब रांची के आसपास के पयर्टन स्थल परिवार के साथ जाने लायक नहीं रहे। सर्वेक्षण के दौरान लगभग सभी ने कहा कि रांची बदल रही है और रांची का पुराना मिजाज अब नहीं रहा। जब हमनें लोगों से पूछा कि की बनती नयी पहचान क्या है जो रांची को पुरानी रांची से दूर कर रही है, तो लगभग 35 फीसदी युवाओं का मानना था - ल़डके-ल़डकियों का बिंदासपन। 33 फीसदी युवाओं ने वामपंथी अंदाज में कहा कि रांची भ्रष्टाचारी और पैसे के पीछे भागने वाला शहर बनता जा रहा है। वहीं 20 फीसदी ने कहा कि कंक्रीट में तब्दील होना और गाड़ियों की ठेलमठेल रांची को पुरानी रांची से दूर कर रही है। रांची पर जान छि़डकने और आकर बसने के कई ऐसे कारण एवं केंद्र थे जिनसे रांची की पहचान बनती थी। परंतु उनकी साख या हालत आज गिरती जा रही है। जब युवाओं से इस सन्दर्भ में पूछा गया तो 35 फीसदी का मानना था कि पयर्टन स्थल और सांस्कृतिक केंद्रों की साख गिरती जा रही है। जबकि लगभग २७ फीसदी लोगों का मानना था कि एचइसी प्लांट और उसकी आवासीय कालोनी तथा रिम्स की साख पर बट्टा लग चुका है।
सवाल 1 - क्या आपको रांची प्रिय है?
1. नहीं - 1.67 फीसदी
2. कुछ हद तक - 63.33 फीसदी
3. उदासीन - 1.६७ फीसदी
4. बहुत ज्यादा - 33.34 फीसदी
सवाल 2 - मुझे रांची बिल्कुल पंसद नहीं आ रही, क्योंकि ...
1. यहां बाहरी- भीतरी का भावना घर कर गयी है - 10 फीसदी
2. रांचीवासी एक-दूसरे और शहर की परवाह नहीं करते - 5 फीसदी
3 रांचीवासी उत्साही और खुशमिजाज नहीं - 1.6 फीसदी
4. मनोरजंन के बढ़िया साधन नहीं - 6.67 फीसदी
5. विभिन्न तरह के खाने-पीने की कमी और मौजमस्ती से परहेज करने वाले लोग है यहां - 3.३४ फीसदी
6. यहां के लोग खुले, उदार और सहिष्णु विचार वाले नहीं - 3.34 फीसदी
7. संस्कृति और परंपरा के सवांहक नहीं है रांचीवासी - 1.67 फीसदी
8. अमीरों और भ्रष्टाचारियों की शहर बनता जा रहा है, मध्यम वर्ग और oगरीबों के लिए जगह नहीं - 13.33 फीसदी
9. पढ़ाई-लिखाई का उत्तम केंद्र परंतु ठगों की भरमार है - 3.34 फीसदी
10. शहरी आधारभूत संसाधन विशेषकर यातायात व्यवस्था बेहाल - 11.67 फीसदी
11. आम दिन होने वाले बंद, ब़ढते अपराध और प्रशासनिक विफलता-38.34 फीसदी
सवाल 3 - रांची की सबसे बुरी जगह (गंदगी, जाम, क्राइम, बिजली व्यवस्था , सडक आदि के मामले में)
1. बिरसा चौक / अलबर्ट एक्का चौक/ सुजाता सिनेमा के नजदीक / कांटा टोली चौक / मेन रोड /रातू रोड - यातायात व्यवस्था के कारण - 61.67 फीसदी
2. अप्पर बाजार / स्टेशन रोड / हिंदपी़डी - गंदगी के कारण - 31.67 फीसदी
3. जगन्नाथपुर / धुर्वा / हटिया / कांके - खराब बिजली व्यवस्था के कारण - 6.67 फीसदी
4. धुर्वा, कोकर - सुरक्षा के मामले में - शेष
सवाल 4- रांची की कौन सा विभाग/ जगह/ वर्ग कभी नहीं सुधरने वाली?
1. आरएमसीएच - 20 फीसदी
2. कांटाटोली चौक- 10 फीसदी
3. रांची विश्वविद्यालय - 10 फीसदी
4. सदर अस्पताल - 1.67 फीसदी
5. टेंपों / रिक्शा चालक - 43.34 फीसदी
6. रांची नगरनिगम - 15 फीसदी
सवाल 5 - स़डकें जहां ड्राइविंग करना बिल्कुल बेहाल है?
1. मेन रोड - 36.67 फीसदी
2. कांटा टोली चौक - 6.67 फीसदी
3. रातू रोड - 13.33 फीसदी
4 अप्पर बाजार - 38.34 फीसदी
5. बिरसा चौक - 5 फीसदी
सवाल 6 - सबसे भ्रष्ट विभाग
1. अंचल कार्यालय - 3.34 फीसदी
2. रजिस्ट्री ऑफिस - 1.67 फीसदी
3. रांची नगर निगम - 13.34 फीसदी
4. डीटीओ - 5 फीसदी
5. बिजली विभाग - 40 फीसदी
6. पुलिस - 36.67 फीसदी
सवाल 7- रांची के यातायात व्यवस्था में सबसे ख़राब साधन
1. विक्रम टेंपो - 53.34 फीसदी
2. रिक्शा - 15 फीसदी
3. बस - 13 फीसदी
4. छोटी - 18.67 फीसदी
सवाल 8 - नहीं चाहकर भी परिवार के साथ न जाने वाली रांची की पसंदीदा जगह
1 सिद्धू-कान्हू पार्क - 61.67 फीसदी
2. डियर पार्क - 13.३४ फीसदी
3. बिरसा जैविक उद्यान व ढाबा - 10 फीसदी
4. बिरसा बस स्टैंड - 3.34 फीसदी
5. रांची के आस-पास की पयर्टन स्थल - 11.67 फीसदी
सवाल 9 - रांची की पसंदीदा केंद्र जिसकी हालत या शाख गिरती जा रही है
1 रिम्स - 26.67 फीसदी
2 जिला स्कूल, संत जेवियसर् कॉलेज, बीआइटी, विकास विद्यालय - 11.67 फीसदी
3. एचइसी प्लांट एवं आवासीय कोलोनी - 26.67 फीसदी
4. पयर्टन स्थल एवं सांस्कृतिक केंद्र - 35 फीसदी
सवाल 10 - रांची की बनाती नयी पहचान जो रांची को पुरानी रांची से दूर कर रही है?
1. ल़डके-ल़डकियों का बिंदासपन - 35 फीसदी
2. कंक्रीट में तब्दील होता शहर और गाड़ियों की ठेलमठेल - 20 फीसदी
3. संवेदनहीन होती रांची ; आपसी प्रेम और स्नेह की कमी - 11.67 फीसदी
4. भ्रष्टाचारी शहर और पैसे के पीछे भागने वाला शहर - 33.34 फीसदी
सर्वेक्षण का तरीका - सर्वेक्षण 18 से 35 वर्ष के युवा शहरी रांचीवासियों के बीच किया गया। रांची के चुने गये कॉलेज छात्रों को एक तैयार प्रश्नावली दी गयी। जवाब देने वालों में 49 फीसदी ल़डकियां थी।
सर्वेक्षण में उभरकर आए तथ्य
1.रांची की यातायात व्यवस्था से सभी परेशान हैं। इससे जल्द निजात पाना चाहते हैं। परंतु उपाय सुझाने के मामले में सभी मौन हैं.
2.आम दिन होने वाले बंद, ब़ढते अपराध और प्रशासनिक विफलता से लोगों में रोष ब़ढता जा रहा है।
3. कौन सा वर्ग/विभाग/जगह या यातायात व्यवस्था में सबसे बुरा साधन है, के जवाब में टेंपो चालक या विक्रम ऑटो नाम आया। लगभग 43 फीसदी ने माना कि टेंपो चालक कभी नहीं सुधरने वाले। हो सकता है युवाओं में विशेषकर छात्रों को इन्हीं से पाला प़डता हो। परंतु सबसे ध्यान देने वाली बात है कि इस प्रश्न के जवाब में लगभग 77 फीसदी ल़डकियां साथ ख़डी है। प्रशासन और परिवारवालों को सोचना होगा आखिर क्या कारण है कि ल़डकियां टेंपो या विक्रम की सवारी को बद से बदतर मान रही हैं।
4.सिद्धू-कान्हू पार्क में ल़डके-ल़डकियों की भी़ड ब़ढती जा रही है परंतु परिवारवालों के साथ वो इस सावर्जनिक जगह पर नहीं आना चाहते। शायद, शालीनता की हद पार करने के लिए यह जगह उन्हें अनुकुल लगे लेकिन सनद रहे की विरोधाभास उत्पन्न कर रहे हैं। आप खुद इस मजर् की दवा हैं। आप करें और भुगते रांची...
5.एक सवाल के जवाब में युवाओं ने अपनी बिंदासपन की बात स्वयं स्वीकार की है। उनका मानना है यही रांची को पुरानी की से दूर कर रहा है। ज्यादातर का मानना था कि समय के अनुरूप रांची को भी बदलना होगा बदल भी रही है। परंतु उन्होंने पुरानी चीजों को साथ लेकर चलने और नये-पुराने के बीच संतुलन बनाये रखने पर विश्वास भी जताया।
लेबल:
रांची शहरिया
आ ना कुछ करके दिखाते हैं !!
आ चल तुझे इक खेल खिलाते हैं,चल ज़रा चाँद को ही छु आते हैं !!
आ ना खुशियाँ बटोर कर लाते हैं,कुछ देर जरा बच्चों को खिलाते हैं !!
हर रोज़ अच्छाई की कसम खाते हैं,रोज़ कसम तोड़कर सो जाते हैं!!
खुदा को तो जरा भी नहीं जानते हैं,और मस्जिद में नमाज़ पढ़ आते हैं !!
असल में कुछ दिखाई तो देता नहीं,लोग सपनों की महफ़िल सजाते हैं!!
ख़ुद तो खुदा से किनाराकशी करते हैं,बच्चों को उसकी कसम खिलाते हैं!!
इक दिन मुझे उदास देख बेटी बोली,पापा चलो ना पार्क घूम आते हैं!!
जिनके भीतर कुछ नहीं होता वे अक्सर,अपने कपड़े...जूते दिखाते हैं!!
बाहर तो चलाते हैं वो गोलियाँ और,घर में खुदा की फोटुयें सजाते हैं !!
बहुत ज्यादा छोटी रखी हुई है हमने,आओ प्यार की चादर और फैलाते हैं !!
इबादत थोडी ना करते हैं हम "गाफिल",वो तो बस अपना दिल बहलाते हैं !!
आ ना खुशियाँ बटोर कर लाते हैं,कुछ देर जरा बच्चों को खिलाते हैं !!
हर रोज़ अच्छाई की कसम खाते हैं,रोज़ कसम तोड़कर सो जाते हैं!!
खुदा को तो जरा भी नहीं जानते हैं,और मस्जिद में नमाज़ पढ़ आते हैं !!
असल में कुछ दिखाई तो देता नहीं,लोग सपनों की महफ़िल सजाते हैं!!
ख़ुद तो खुदा से किनाराकशी करते हैं,बच्चों को उसकी कसम खिलाते हैं!!
इक दिन मुझे उदास देख बेटी बोली,पापा चलो ना पार्क घूम आते हैं!!
जिनके भीतर कुछ नहीं होता वे अक्सर,अपने कपड़े...जूते दिखाते हैं!!
बाहर तो चलाते हैं वो गोलियाँ और,घर में खुदा की फोटुयें सजाते हैं !!
बहुत ज्यादा छोटी रखी हुई है हमने,आओ प्यार की चादर और फैलाते हैं !!
इबादत थोडी ना करते हैं हम "गाफिल",वो तो बस अपना दिल बहलाते हैं !!
Thursday, September 18, 2008
"गाफिल"जाने भी दो ना !!
दुनिया बदल रही है,इसे देखने दो ना ,क्या अच्छा है बुरा क्या समझने दो ना !!
रात को आराम से गुजर जाने भी दो,समय से पहले तो रौशनी को पकडो ना !!
खुदा के पास पहुँचने के हैं रस्ते कई ,सबको अपने ही रास्ते पे चलने दो ना !!
तलवारें चलाने से भला खुदा मिला है?हर किसी को उसकी खुदाई बख्शो ना !!
जिसके नाम पे हो जाते हो लामबंद ,कभी उसकी रज़ा को भी तो समझो ना !!
खिंच जाती हैं बात-बात पर तलवारें,अब इतना भी किसी बात को पकडो ना !!
अल्ला को तो खुला-खुला ही रहने दो,अपनी आदतों में तुम उसे तो जकडो ना!!
तेरे होने के भरम में जीता हूँ यारब ,कहाँ हो कभी घर आकर तो मिलो ना !!
तेरे नाम पे ठा-ठा करता है आदम ,यार इसके दिमाग को बदल डालो ना !!
इत्ती-सी बात को दिल में लिए बैठे हो,अब छोड़ो भी "गाफिल"जाने दो ना !!
रात को आराम से गुजर जाने भी दो,समय से पहले तो रौशनी को पकडो ना !!
खुदा के पास पहुँचने के हैं रस्ते कई ,सबको अपने ही रास्ते पे चलने दो ना !!
तलवारें चलाने से भला खुदा मिला है?हर किसी को उसकी खुदाई बख्शो ना !!
जिसके नाम पे हो जाते हो लामबंद ,कभी उसकी रज़ा को भी तो समझो ना !!
खिंच जाती हैं बात-बात पर तलवारें,अब इतना भी किसी बात को पकडो ना !!
अल्ला को तो खुला-खुला ही रहने दो,अपनी आदतों में तुम उसे तो जकडो ना!!
तेरे होने के भरम में जीता हूँ यारब ,कहाँ हो कभी घर आकर तो मिलो ना !!
तेरे नाम पे ठा-ठा करता है आदम ,यार इसके दिमाग को बदल डालो ना !!
इत्ती-सी बात को दिल में लिए बैठे हो,अब छोड़ो भी "गाफिल"जाने दो ना !!
जोर-जुल्म से और बढ़ेगा आतंकवाद
फ़िर फटा मुसलमानी बम (भाग-2) नदीम अख्तर
अब यदि गिरफ्तारियों के बरअक्स देखा जाये तो जिस तरह से सिमी के पूर्व कार्यकर्ताओं को पुलिस उठा रही है उससे तो यही जाहिर होता है कि संगठन दहशतगर्दी में लगा हुआ है। लेकिन ठोस तौर पर देखें तो अबतक देश भर में हुई सिमी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियों में किसी पर पुलिस द्वारा लगाये गये संगीन जुर्म साबित नहीं हुए हैं। जयपुर धमाकों के ठीक बाद यह कहा जाने लगा कि इसके तार उत्तरप्रदेश की अदालतों में हुए सीरियल बम धमाकों से जुड़े हुए हैं। अक्टूबर 2007 में प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तथा शहर वाराणसी व फैजाबाद में विस्फोट हुए थे। विस्फोट में चार वकीलों समेत एक मुवक्किल की मौत हो गयी थी। यहां एसटीएफ ने अबतक इस मामले में चार अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारों में उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के रानी की सराय कस्बे से डाक्टर हकीम मौलाना मोहम्मद तारीक कुरैशी को, जौनपुर के मड़िहाऊं से मोहम्मद खालिद को तथा कश्मीर से सज्जादुर रहमान बानी और मोहम्मद अख्तर को गिरफ्तार किया है।
आतंकवादी होने के आरोप में उत्तरप्रदेश से जिन गिरफ्तारियों को अंजाम देने के बाद एसटीएफ मीडिया माइलेज लेता रहा उन पर सवाल उठने शुरू हो गये। जिसकी शुरूआत रानी की सराय थाने से हुई है जहां मोहम्मद तारीक के परिजनों और ग्रामीणों ने गुमशुदगी का आवेदन दे रखा है। बाराबंकी जेल में बंद कुरैशी को पुलिस ने इतना प्रताड़ित किया कि उसने वह सबकुछ स्वीकार कर लिया जो पुलिस ने चाहा। कुरैशी के दादा का कहना था कि "हमने ही राय दी कि जान रहेगी तो सच झूठ का फैसला हो जायेगा पर अगर पुलिस ने इनकाउंटर में मार डाला तो क्या बच जायेगा।' उत्तरप्रदेश धमाकों के आराेपी के तौर पर पुलिस ने कोलकाता के आफताब अंसारी को भी गिरफ्तार किया लेकिन पन्द्रह दिन बाद उसे एसटीएफ ने छोड़ दिया। इस गिरफ्तारी के चलते बदनामी हुई और एनटीपीसी की नौकरी से आफताब को हाथ धोना पड़ा। गिरफ्तारियों का यह फर्जीवाड़ा यहीं नहीं थमता, बल्कि जौनपुर के मड़िहाऊं से सीरियल बम धमाकों में गिरफ्तार मोहम्मद खालिद के साथ भी एसटीएफ ने यही किया। खालिद के रिश्तेदार मोहम्मद जहीर आलम कहते हैं "पुलिस की इन गिरफ्तारियों से हमें न्याय मिलने की उम्मीद खत्म नहीं हुई थी, लेकिन पिछले दिनों अदालतों में वकीलों ने जो व्यवहार किया उससे जरूर हमारा मन हारने लगा है।' बाराबंकी, फैजाबाद और लखनऊ कोर्ट में पेशी के दौरान वकीलों ने आरोपियों पर तो हमला किया ही, वकील सोएब को भी नहीं बक्शा। जबकि बाराबंकी कोर्ट में सुनवाई ही नहीं होने दी और लखनऊ में पुलिस की मौजूदगी में उन्मादी नारे लगाये। सांप्रदायिकता और पुलिस की भूमिका पर समझ रखने वाले कुछ गैर मुसलिम पुलिस अधिकारी यह स्वीकार करते हैं - "इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कई बार खुफिया और पुलिस भी इन प्रवृितयों को बढ़ावा देती हैं।' खैर, वकीलों ने जो रवैया अख़्तियार किया वह एक समुदाय को संकेत देता है कि तुम्हारे लिये क़ानूनी संविदाएं मृत हैं। सामाजिक फासिवाद का यह प्रारंभिक चरण है। पुलिस की ़ज़्यादतियों का क्या आलम है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन लोगों पर संगीन आरोप लगाये जाते हैं, वे कोर्ट से बाइ़ज़्जत बरी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए गुलजार अहमद वानी, जिन्हें छः अभियोगों से बरीकिया गया। इन पर ज्यादातर मामले दिल्ली में दर्ज थे। गुलाम मोहिउद्दीन भी छः अभियोगों से बरी हुए, जिसमें ज्यादातर दिल्ली में दर्ज थे। मोहम्मद अक्वयला (एफआईआर नं.45/2000 यू/एस 4 एईएस एक्ट, 120बी आईपीसी पीएस. कोतवाली नई दिल्ली) अदालत से बरी किये गये। अब्दुल मोबीन आगरा बम धमाकों से बरी हुए। इन्हीं की तरह मारूफ अहमद आगरा बम धमाकों से बरी हुए। इसके अलावा अनगिनत मामले ऐसे हैं, जो यह बताते हैं कि पुलिस की एकतरफा और ज्यादती से भरी कार्रवाई के कारण मुसलिम युवकों की जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी। जो युवक जेल में रहेगा, बेकसूर, उसके बाहर आने पर समाज उसे कैसे स्वीकार करेगा। सभी को मालूम है कि एक बार जेल यात्रा कर चुके किसी व्यक्ति को कोई अपने यहां काम तक नहीं देता। ऐसे ही लोग संपर्क में आते हैं, सियासी मौकापरस्त लोगों के और पैसों के लिए वह करते हैं, जिसके फटने पर कहा जाता है कि लो फिर फूटा मुसलमानी बम। इसके अलावा आज का मुसलिम समाज अनुसूचित जनजाति से भी बदतर स्थिति में है। लंबे समय तक इस मतावलंबियों के साथ जैसा सामाजिक सौतेलापन किया गया, उसने आज इस समाज को हाशिये पर ढकेल दिया है। नाम मात्र के लोगों को भी नौकरी नहीं है। रोजगार के लिए बैंक लोन नहीं देते। व्यवसाय के लिए जगह नहीं मिलती। मुसलमान के खेत को पानी भी देने मेंे सरकारी महकमे की दो नज़र हो जाती है। मतलब जहां मुसलमान, वहां तकलीफ-मुसीबत अपने आप खड़ी हो जाती है। नतीजा क्या होता है...आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके इस धर्म के लोगों को जब, जहां, जैसे रोटी के इंतजाम का अवसर दिखाई देता है, वह उसी ओर भागते हैं। जब तक देश में ड्राइव चला कर मुसलमानों का जीवन स्तर ऊपर नहीं उठाया जायेगा, तब तक हर एक मुसलमान नामक वस्तु से समग्र रूप से मुख्य धारा में प्रवाहित होने की बेवकूफी भरी अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। (समाप्त
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